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शुक्रवार, 18 जून, 2021 वर्ष का ग्यारहवाँ सप्ताह

 

शुक्रवार, 18 जून, 2021

वर्ष का ग्यारहवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : 2 कुरिन्थियों 11:18, 21-30



18) जब बहुत से लोग उन बातों की डींग मारते हैं, जो संसार की दृष्टि में महत्व रखती है, तो मैं भी वही करूँगा।

21) मैं संकोच के साथ स्वीकार करता हूँ कि आप लोगों के साथ इस प्रकार का व्यवहार करने का मुझे साहस नहीं हुआ। आप इसे मेरी नादानी समझें, किन्तु जिन बातों के विषय में वे लोग डींग मारने का साहस करते हैं, मैं भी उन बातों के विषय में वही कर सकता हूँ।

22) वे इब्रानी हैं? मैं भी हूँ! वे इस्राएली हैं? मैं भी हूँ! वे इब्राहीम की सन्तान हैं? मैं भी हूँ!

23) मैं नादानी की झोंक में कहता हूँ कि मैं इस में उन से बढ़ कर हूँ। मैंने उन से अधिक परिश्रम किया, अधिक समय बन्दीगृह में बिताया और अधिक बार कोड़े खाये। मैं बारम्बार प्राण संकट में पड़ा।

24) यहूदियों ने मुझ पाँच बार एक कम चालीस कोड़े लगाये।

25) मैं तीन बार बेंतों से पीटा और एक बार पत्थरों से मारा गया। तीन बार ऐसा हुआ कि जिस नाव पर मैं यात्रा कर कर रहा था, वह टूट गयी और एक बार वह पूरे चैबीस घण्टे खुले समुद्र पर इधर-उधर बहती रही।

26) मैं बारम्बार यात्रा करता रहा। मुझे नदियों के खतरे का सामना करना पड़ा, डाकुओं के खतरे, समुद्र के खतरे और कपटी भाइयो के खतरे का।

27) मैंने कठोर परिश्रम किया और बहुत-सी रातें जागते हुए बितायीं। मुझे अक्सर भोजन नहीं मिला। भूख-प्यास, ठण्ड और कपड़ों के अभाव-यह सब मैं सहता रहा

28) और इन बातों के अतिरिक्त सब कलीसियाओं के विषय में मेरी चिन्ता हर समय बनी रहती है।

29) जब कोई दुर्बल है, तो क्या मैं उसकी दुर्बलता से प्रभावित नहीं? जब किसी का पतन होता है, तो क्या मैं इसका तीखा अनुभव नहीं करता?

30) यदि किसी बात पर गर्व करना है, तो मैं अपनी दुर्बलताओं पर गर्व करूँगा।



सुसमाचार : मत्ती 6:19-23



19) पृथ्वी पर अपने लिए पूँजी जमा नहीं क जहाँ मोरचा लगता है, कीडे़ खाते हैं और चोर सेंध लगा कर चुराते हैं।

20) स्वर्ग में अपने लिए पूँजी जमा करो, जहाँ न तो मोरचा लगता है, न कीड़े खाते हैं और न चोर सेंध लगा कर चुराते हैं।

21) क्योंकि जहाँ तुम्हारी पूँजी है, वही तुम्हारा हृदय भी होगा।

22) आँख शरीर का दीपक है। यदि तुम्हारी आँख अच्छी है, तो तुम्हारा सारा शरीर प्रकाशमान होगा;

23) किन्तु यदि तुम्हारी आँख बीमार है, तो तुम्हारा सारा शरीर अंधकारमय होगा। इसलिए जो ज्योति तुम में है, यदि वही अंधकार है, तो यह कितना घोर अंधकार होगा!



📚 मनन-चिंतन



आज के सुसमाचार में प्रभु येसु दो बातों पर हमारा ध्यान आर्कषित करते हैं - सच्चा धन और शरीर की ज्योति। आज हम अत्यधिक भौतिकवाद में जीवन-यापन कर रहे हैं, जहाँ ज्यादातर लोग धन पर विश्वास करते हैं, कि धन ही सभी समस्याओं का समाधान है। और ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे पैसे से खरीदा नहीं जा सकता, और ऐसा कोई भी समस्या नहीं है जिसे पैसे द्वारा हासिल न किया जा सके। इस प्रकार का विश्वास आज भी व्याप्त है यद्यपि यह कई बार गलत भी साबित हुआ है।

आज के सुसमाचार में प्रभु हमें से प्रेरित करते हुए कहते हैं अपना विश्वास और अपनी सुरक्षा ऐसी चीजों पर डालें जो कम अनश्वर हो और अधिक बना रहने वाला हो। वे कहते हैं, ’’स्वर्ग में अपने लिए पूँजी जमा करो, जहाँ न तो मोरचा लगता है, न कीडे़ खाते है और न चोर सेंध लगाकर चुराते हैं (मत्ती 6:20)। स्वर्ग में धन जमा करने का तात्पार्य यह है कि हम भले कार्य द्वारा धन कमायें जो हमारे भावी जीवन के लिए सार्थक होगा। और प्रभु येसु बड़ी चतुराई से कहते हैं, ’’जहाँ तुम्हारा धन है, वहीं तुम्हारा हदय भी होगा।’’ (मŸाी 5:21)। वास्तव हमें अपने आप से प्रश्न पूछना है, कहाँ मेरी पूंजी है? क्या मैं इसे अपनी जीवन में मूल्य देता हूँ? और कैसे मैं इसके अनुसार जीवन जीता हूँं।

सुसमाचार के दूसरे भाग में प्रभु येसु कहते हैं ’’आँख शरीर का दीपक है’’ (मत्ती 6:22) कहने का तात्पर्य यह है कि जो मैं अपने आंतरिक आँख से देखता हूँ वही मेरे जीवन का सब कुछ निर्धारित करता है।’’ यदि तुम्हारी आँख अच्छी है तो तुम्हारा सारा शरीर प्रकाशमान होगा, किन्तु यदि तुम्हारी आँख बीमार है, तो तुम्हारा सारा, शरीर अन्धकारमय होगा।’’ (मत्ती 6:23)



📚 REFLECTION




In today’s gospel Jesus brings out two things to our attention: the true treasure and lamp. Today we are living in a highly materialistic world where a very large number of people seem to believe that material wealth is the solution of every problem. There is nothing that money cannot buy, no problem it cannot solve. This belief prevails even though it is shown to be false.

In the gospel Jesus urges us to put our trust and security in something less perishable, something more lasting. He says, “Store up treasure for yourself with God. Where no moth or rust can destroy nor thief come and steal it” (Mt.6:20). To ‘store up treasure in heaven’ is not just to pile up a whole of ‘good works’ but it can to our credit for the next life. And as Jesus wisely says, ‘where your treasure is, there will your heart be also’ (Mt. 6:21). Obviously, the question for us today is: where is our treasure? What do I value most in life? And how do I live with?

In the second part of the gospel Jesus says, “The lamp of the body is the eye” (Mt.6:22). That is to say, what I see with my inner eye determines everything else about my life. “If your eye that is your vision is sound, your whole body, that is, your whole being will be filled with light. But if your eye is diseased, your whole body will be all darkness” (Mt.6:23).



✍ -Br Biniush Topno


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गुरुवार, 17 जून, 2021 वर्ष का ग्यारहवाँ सप्ताह

 

गुरुवार, 17 जून, 2021

वर्ष का ग्यारहवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : 2 कुरिन्थियों 11:1-11



1) आप लोग मेरा अनुसरण करें, जिस तरह मैं मसीह का अनुसरण करता हूँ।

2) आप लोग हर बात में मुझे याद करते हैं और मुझसे जो शिक्षा मिलती है, उसमें दृढ़ बने रहते हैं। इसलिए मैं आप लोगों की प्रशंसा करता हूँ।

3) फिर भी मैं आप को यह बताना चाहता हूँ कि मसीह प्रत्येक पुरुष के शीर्ष हैं, पुरुष स्त्री का शीर्ष है और ईश्वर मसीह का शीर्ष।

4) जो पुरुष सिर ढक कर प्रार्थना या भविष्यवाणी करता है, वह अपने सिर का अपमान करता है

5) और जो स्त्री बिना सिर ढ़के प्रार्थना या भविष्यवाणी करती है, वह अपने सिर का अपमान करती है; क्योंकि वह उस स्त्री-जैसी है, जिसका सिर मूँड़ा हुआ है।

6) यदि कोई स्त्री अपना सिर नहीं ढकती, तो सिर मुँड़वा ले। यदि कटे हुए केश या मूँड़ा हुआ सिर स्त्री के लिए लज्जा की बात है, तो वह अपना सिर ढ़क ले।

7) पुरुष को अपना सिर नहीं ढकना चाहिए; क्योंकि वह ईश्वर का प्रतिरूप और उसकी महिमा का प्रतिबिम्ब है। जब कि स्त्री पुरुष की महिमा का प्रतिबिम्ब है।

8) पुरुष स्त्री से नहीं बना, बल्कि स्त्री पुरुष से बनी

9) और पुरुष की सृष्टि स्त्री के लिए नहीं हुई, बल्कि पुरुष के लिए स्त्री की सृष्टि हुई।

10) इसलिए स्वर्गदूतों के कारण स्त्री को अधीनता का चिन्ह अपने सिर पर पहनना चाहिए।

11) फिर भी प्रभु के विधान के अनुसार स्त्री के बिना पुरुष कुछ नहीं है और पुरुष के बिना स्त्री कुछ नहीं।



सुसमाचार : मत्ती 6:7-15



7) ’’प्रार्थना करते समय ग़ैर-यहूदियों की तरह रट नहीं लगाओ। वे समझते हैं कि लम्बी-लम्बी प्रार्थनाएँ करने से हमारी सुनवाई होती है।

8) उनके समान नहीं बनो, क्योंकि तुम्हारे माँगने से पहले ही तुम्हारा पिता जानता है कि तुम्हें किन किन चीज़ों की ज़रूरत है।

9) तो इस प्रकार प्रार्थना किया करो- स्वर्ग में विराजमान हमारे पिता! तेरा नाम पवित्र माना जाये।

10) तेरा राज्य आये। तेरी इच्छा जैसे स्वर्ग में, वैसे पृथ्वी पर भी पूरी हो।

11) आज हमारा प्रतिदिन का आहार हमें दे।

12) हमारे अपराध क्षमा कर, जैसे हमने भी अपने अपराधियों को क्षमा किया है।

13) और हमें परीक्षा में न डाल, बल्कि बुराई से हमें बचा।

14) यदि तुम दूसरों के अपराध क्षमा करोगे, तो तुम्हरा स्वर्गिक पिता भी तुम्हें क्षमा करेगा।

15) परन्तु यदि तुम दूसरों को क्षमा नहीं करोगे, तो तुम्हारा पिता भी तुम्हारे अपराध क्षमा नहीं करेगा।



📚 मनन-चिंतन



आज के सुसमाचार में प्रभु येसु प्रार्थना को एक अत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत करते हैं। वे प्रार्थना को ईश्वर से जोड़ते हैं क्योंकि प्रार्थना के द्वारा ही हम ईश्वर की इच्छा को जान सकते हैं आज प्रभु येसु हमें आर्दश प्रार्थना ’हे पिता’ सिखाते हैं जिसका उदेश्य है ईश्वर और मुनष्यों के बीच का संबध। वास्तव में प्रार्थना मनुष्य को ईश्वर से बांधे रखती है। प्रार्थना के द्वारा ही हम हमारी जरूरतों और आवश्यकताओं की पुरी करते हैं। सुसमाचार में प्रभु कहते हैं ’प्रार्थना करते समय गैर-यहूदियों की तरह रट नहीं लगाओ। वे समझते हैं कि लम्बी-लम्बी प्रार्थना करने से हमारी सुनवाई होती है। (मत्ती 6:7)।

इस संदर्भ में, जब हम करीबी से इन वाक्यों को देखते हैं, तो हमें पता चलता है कि प्रभु येसु गैर-यहूदियों के धार्मिक प्रार्थना, ईश्वर की महानता को स्वीकारना, उनकी महिमा और सम्मान, उनकी राज्य की खोज, उनकी इच्छा को पुरा करना, उन्हीं के द्वारा हमारी आवश्यकताओं को पुरा करना, उन्हीं से मेल-मिलाप करना और उन्हीं के द्वारा प्रलोभनों से दूर होना है। यही सच्ची और आर्दश प्रार्थना है।



📚 REFLECTION




In today’s gospel Jesus presents prayer in a beautiful manner. He connects prayer with God, because through prayer we can know the will of God. Today Jesus teaches us the ideal prayer ‘Our Father’ whose aim is to establish relationship between God and man. In reality, prayer holds human being with God. Through prayer we can fulfil our needs and desires. In the gospel Jesus says, “And in praying, do not heap up empty phrases as the Gentiles do; for they think that they will be heard for their many words”(Mt.6:7).

In this context, when we look closely at these verses we find that Jesus was pointing the religious principles of the Gentiles. In fact, the real prayer is; to acknowledge God’s greatness, ascribe glory and honour, seek his kingdom, long for his will to be done in our lives, putting forward our needs and offerings, being reconciled to be receive forgiveness, and imploring to keep away from sin and evil inclinations. This is the true and ideal prayer.



✍ -Br Biniush Topno


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बुधवार, 16 जून, 2021 वर्ष का ग्यारहवाँ सप्ताह

 

बुधवार, 16 जून, 2021

वर्ष का ग्यारहवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : 2 कुरिन्थियों 9:6-11



6) इस बात का ध्यान रखें कि जो कम बोता है, वह कम लुनता है और जो अधिक बोता है, वह अधिक लुनता है।

7) हर एक ने अपने मन में जिनता निश्चित किया है, उतना ही दे। वह अनिच्छा से अथवा लाचारी से ऐसा न करे, क्योंकि ‘‘ईश्वर प्रसन्नता से देने वाले को प्यार करता है’’।

8) ईश्वर आप लोगों को प्रचुर मात्रा में हर प्रकार का वरदान देने में समर्थ है, जिससे आप को कभी किसी तरह की कोई कमी नहीं हो, बल्कि हर भले काम के लिए चन्दा देने के लिए भी बहुत कुछ बच जाये।

9) धर्मग्रन्थ में लिखा है- उसने उदारतापूर्वक दरिद्रों को दान दिया है, उसकी धार्मिकता सदा बनी रहती है।

10) जो बोने वाले को बीज और खाने वाले को भोजन देता है, वह आप को बोने के लिए बीज देगा, उसे बढ़ायेगा और आपकी उदारता की अच्छी फसल उत्पन्न करेगा।

11) इस तरह आप लोग हर प्रकार के धन से सम्पन्न हो कर उदारता दिखाने में समर्थ होंगे।



सुसमाचार : मत्ती 6:1-6, 16-18



1) ’’सावधान रहो। लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए अपने धर्मकार्यो का प्रदर्शन न करो, नहीं तो तुम अपने स्वर्गिक पिता के पुरस्कार से वंचित रह जाओगे।

2) जब तुम दान देते हो, तो इसका ढिंढोरा नहीं पिटवाओ।ढोंगी सभागृहों और गलियों में ऐसा ही किया करते हैं, जिससे लोग उनकी प्रशंसा करें। मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- वे अपना पुरस्कार पा चुके हैं।

3) जब तुम दान देते हो, तो तुम्हारा बायाँ हाथ यह न जानने पाये कि तुम्हारा दायाँ हाथ क्या कर रहा है।

4) तुम्हारा दान गुप्त रहे और तुम्हारा पिता, जो सब कुछ देखता है, तुम्हें पुरस्कार देगा।

5) ’’ढोगियों की तरह प्रार्थना नहीं करो। वे सभागृहों में और चैकों पर खड़ा हो कर प्रार्थना करना पंसद करते हैं, जिससे लोग उन्हें देखें। मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- वे अपना पुरस्कार पा चुके हैं।

6) जब तुम प्रार्थना करते हो, तो अपने कमरें में जा कर द्वार बंद कर लो और एकान्त में अपने पिता से प्रार्थना करो। तुम्हारा पिता, जो एकांत को भी देखता है, तुम्हें पुरस्कार देगा।

16 ढोंगियों की तरह मुँह उदास बना कर उपवास नहीं करो। वे अपना मुँह मलिन बना लेते हैं, जिससे लोग यह समझें कि वे उपवास कर रहें हैं। मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- वे अपना पुरस्कार पा चुके हैं।

17) जब तुम उपवास करते हो, तो अपने सिर में तेल लगाओ और अपना मुँह धो लो,

18) जिससे लोगों को नहीं, केवल तुम्हारे पिता को, जो अदृश्य है, यह पता चले कि तुम उपवास कर रहे हो। तुम्हारा पिता, जो अदृश्य को भी देखता है, तुम्हें पुरस्कार देगा।



📚 मनन-चिंतन





’ईश्वर प्रसन्नता से देने वाले को प्यार करता है’ (2 कुरिन्थ 9:7)। यह संत पौलुस के कुरिन्थियों के दूसरे पत्र का एक महत्वपूर्ण वाक्यांश है। यह सिर्फ न केवल दान या भले कार्य तक सीमित नहीं है। बल्कि यह व्यक्ति के आंतरिक स्वाभाव का परिचयक है। क्योंकि कि ईश्वर बोने वाले को बीज और खाने वाले को भोजन देता है, वह आप को बोने के लिए बीज देगा, उसे बढ़ायेगा और आपकी उदारता की अच्छी फसल उत्पन्न करेगा (2 कुरिन्थ 9:10)। यदि हमें जीवन में अच्छी बीज उत्पन्न करना है तो हमें ईश्वर से अपने हदय से जुड़ा रहना होगा, क्योंकि ईश्वर सबका सृष्टिकर्त्ता है। हमें ईश्वर को अपना सर्वस्व देना होगा। संत पिता फ्रांसिस आज के सुसमाचार पाठ को हमारे ख्रीस्तीय जीवन के तीन स्तंभ के रूप में देखते है प्रार्थना, उपवास और भिक्षादान। उनके अनुसार उपवास का अर्थ है प्रलोभनों से अपने को दूर रखना, प्रार्थना हमें अपने स्वर्थ से छुटकारा दिलाता और भिक्षादान हमें अनावश्यक चीजें के उपयोग से मुक्त करता है।

आज हमें अपने धर्मकार्यों को सफलतापूवर्क निभाने के लिए हमें शास्त्रियों और ढ़ोगियों की तरह नहीं, वरन एक सच्चे हदय से प्रार्थना, उपवास और भिक्षदान करना है। प्रार्थना का अर्थ ही है ईश्वर से वार्तालाप करना।



📚 REFLECTION




“God loves the cheerful giver” (2Cor.9:7). This is St Paul’s second letter to the Corinthians is an important verse; this is not limited only to almsgiving and good works, it reveals the inner attitude of the people. Because God supplies seed to the sower and bread for food will supply and multiply your seed for sowing and increase the harvest of your righteousness(2Cor.9:10). If we have to produce seed in life then we have to get connected with the Lord; for he is the creator of all, and offer everything.

Pope Francis sees today’s gospel as the three pillars of Christian life: prayer, fasting and almsgiving, he says fasting makes turn away from the temptation, prayer frees us from our ego, and almsgiving keeps us away from hoarding unnecessary things. To fulfil our piety today we have to surpass the righteousness of the Pharisees and the scribes, and live the true spirit of prayer, fasting and almsgiving. The very meaning of prayer is to have conversation with God.



✍ -Br Biniush Topno


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मंगलवार, 15 जून, 2021 वर्ष का ग्यारहवाँ सप्ताह

 

मंगलवार, 15 जून, 2021

वर्ष का ग्यारहवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : 2 कुरिन्थियों 8:1-9



1) भाइयो! मैं आप लोगों को उस अनुग्रह के विषय में बताना चाहता हूँ, जिसे ईश्वर ने मकेदूनिया की कलीसियाओं को प्रदान किया है।

2) संकटों की अग्नि-परीक्षा में भी उनका आनन्द अपार रहा और तंगहाली में रहते हुए भी उन्होंने बड़ी उदारता का परिचय दिया है।

3) उन्होंने अपने सामर्थ्य के अनुसार, बल्कि उस से भी अधिक, चन्दा दिया है।

4) उन्होंने स्वयं ही बड़े आग्रह के साथ मुझसे अनुरोध किया कि उन्हें भी सन्तों की सहायता के लिए चन्दा देने का सौभाग्य मिले।

5) वे अपनी उदारता में हमारी आशा से बहुत अधिक आगे बढ़ गये। उन्होंने पहले ईश्वर के प्रति और बाद में, ईश्वर की इच्छा के अनुसार, हमारे प्रति अपने को अर्पित किया।

6) इसलिए हमने तीतुस से अनुरोध किया है कि उन्होंने जिस परोपकार का कार्य प्रवर्तित किया था, वह उस को आप लोगों के बीच पूरा कर दें।

7) आप लोग हर बात में- विश्वास, अभिव्यक्ति, ज्ञान, सब प्रकार की धर्म-सेवा और हमारे प्रति प्रेम में बढ़े-चढ़ें हैं; इसलिए आप लोगों को इस परोपकार में भी बड़ी उदारता दिखानी चाहिए।

8) मैं इस सम्बन्ध में कोई आदेश नहीं दे रहा हूँ, बल्कि दूसरे लोगों की उदारता की चर्चा कर मैं आपके प्रेम की सच्चाई की परीक्षा लेना चाहता हूँ।

9) आप लोग हमारे प्रभु ईसा मसीह की उदारता जानते हैं। वह धनी थे, किन्तु आप लोगों के कारण निर्धन बन गये, जिससे आप उनकी निर्धनता द्वारा धनी बन गये।




सुसमाचार : मत्ती 5:43-48




(43) ’’तुम लोगों ने सुना है कि कहा गया है- अपने पड़ोसी से प्रेम करो और अपने बैरी से बैर।

(44) परन्तु में तुम से कहता हूँ- अपने शत्रुओं से प्रेम करों और जो तुम पर अत्याचार करते हैं, उनके लिए प्रार्थना करो।

(45) इस से तुम अपने स्वर्गिक पिता की संतान बन जाओगे; क्योंकि वह भले और बुरे, दोनों पर अपना सूर्य उगाता तथा धर्मी और अधर्मी, दोनों पर पानी बरसाता है।

(46) यदि तुम उन्हीं से प्रेम करत हो, जो तुम से प्रेम करते हैं, तो पुरस्कार का दावा कैसे कर सकते हो? क्या नाकेदार भी ऐसा नहीं करते ?

(47) और यदि तुम अपने भाइयों को ही नमस्कार करते हो, तो क्या बडा काम करते हो? क्या गै़र -यहूदी भी ऐसा नहीं करते?

(48) इसलिए तुम पूर्ण बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गिक पिता पूर्ण है।



📚 मनन-चिंतन




आज हम पर्वत प्रवचन के अंतिम पदों में पहुँच चुके हैं, और प्रभु येसु हमें महत्वपूर्ण शिक्षा देते हुए कहते हैं कि अपने शत्रुओं से प्रेम करो और जो तुम पर अत्याचार करते हैं उनके लिए प्रार्थना करो (मत्ती 5:44)। यह हम सभों के लिए प्रभु येसु का निमंत्रण एवं चुनौती है। निमंत्रण इसलिए क्योंकि इससे हम अपने को स्वर्गिक पिता की संतान बनाते हैं। चुनौती इसलिए क्योंकि यह हमारे प्राकृति के विरूध्द है। हम उन्हीं लोगों को प्यार करते हैं। जो हमें प्यार करते हैं। प्रभु हमें एक क्रांतिकारी शिक्षा दे रहे हैं। वे कहते हैं यदि तुम उन्हीं से प्रेम करते हो, जो तुम से प्रेम करते हैं तो पुस्कार का दावा कैसे कर सकते हो? क्या नाकेदार भी ऐसा नहीं करते? (मत्ती 5:46) इसलिए आज प्रभु येसु हमें पूर्ण बनने के लिए निमंत्रण देतें है, तुम पूर्ण बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गिक पिता पूर्ण है। (मत्ती 5:48) हम पूर्ण तभी बन सकते हैं जब हम सपूर्ण रूप से अपने जीवन मेें स्वर्थ और अहम से दूर होंगे। प्रभु येसु ने स्वयं क्रूस पर से कहा,-’’हे पिता, इन्हें माफ कर दे, वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं?’’ ईश्वर सभों के लिए अपना सूर्य उगाता तथा धर्मी और अधर्मी, दोनों पर पानी बरसाता है (मत्ती 5:45)




📚 REFLECTION




Today we have reached the end of the verses of the Sermon on the Mount, and Jesus gives us an important lesson and says, “Love your enemies and pray for those who persecute you” (Mt.5:44). This is an invitation and a challenge today for us. It is an invitation for us because with this we can become the children of God and it is a challenge because it is against our nature. We love only those who love us. Today Jesus is giving us a revolutionary lesson. He says, “If you love those who love you, what reward do you have? Do not even the tax collectors do the same” (Mt.5:46). That is why Jesus today invites us to become perfect, “Be perfect, therefore, as your heavenly father is perfect” (Mt.5:48). We can become perfect only when keep aside our ego and selfishness. Jesus said, as he died on the cross, ‘Father, forgive them, for they do not know what they are doing’. God makes his sun rise on the evil and on the good, and sends rain on the righteous and on the unrighteous (Mt.5:45)



✍ -Br Biniush Topno


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सोमवार, 14 जून, 2021 वर्ष का ग्यारहवाँ सप्ताह

 

सोमवार, 14 जून, 2021

वर्ष का ग्यारहवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : 2 कुरिन्थियों 6:1-10



1) ईश्वर के सहयोगी होने के नाते हम आप लोगों से यह अनुरोध करते हैं कि आप को ईश्वर की जो कृपा मिली है, उसे व्यर्थ न होने दे;

2) क्योंकि वह कहता है - उपयुक्त समय में मैंने तुम्हारी ुसुनी; कल्याण के दिन मैंने तुम्हारी सहायता की। और देखिए, अभी उपयुक्त समय है, अभी कल्याण का दिन है।

3) हम हर बात में इसका ध्यान रखते हैं कि किसी को हमारी ओर उंगली उठाने का अवसर न मिले। कहीं ऐसा न हो कि हमारे सेवा-कार्य पर कलंक लगे।

4 (4-5) हम कष्ट, अभाव, संकट, कोड़ों की मार, कैद और उपद्रव में धीर बने हुए हैं और अथक परिश्रम, जागरण तथा उपवास करते हुए, हर परिस्थिति में, ईश्वर के योग्य सेवक की तरह आचरण करने का प्रयत्न करते हैं।

6) (6-7) हमारी सिफ़ारिश है- निर्दोष, जीवन, अन्तर्दृष्टि, सहनशीलता, मिलनसारी, पवित्र आत्मा के वरदान, निष्कपट प्रेम, सत्य का प्रचार, ईश्वर का सामर्थ्य। हम दाहिने और बायें हाथ में धार्मिकता के शस्त्र लिये संघर्ष करते रहते हैं।

8) सम्मान और अपमान, प्रशंसा और निन्दा- यह सब हमारे भाग्य में है। हम कपटी समझे जाते हैं, किन्तु हम सत्य बोलते हैं।

9) हम नगण्य हैं, किन्तु सब लोग हमें मानते हैं। हम मरने-मरने को हैं, किन्तु हम जीवित हैं। हम मार खाते हैं, किन्तु हमारा वध नहीं होता।

10) हम दुःखी हैं, फिर भी आप हर समय आनन्दित हैं। हम दरिद्र हैं, फिर भी हम बहुतों को सम्पन्न बनाते हैं। हमारे पास कुछ नहीं है; फिर सब कुछ हमारा है।



सुसमाचार : मत्ती 5:38-42



(38) तुम लोगों ने सुना है कि कहा गया है- आँख के बदले आँख, दाँत के बदले दाँत।

(39) परंतु मैं तुम से कहता हूँ दुष्ट का सामना नहीं करो। यदि कोई तुम्हारे दाहिने गाल पर थप्पड मारे, तो दूसरा भी उसके सामने कर दो।

(40) जो मुक़दमा लड़ कर तुम्हारा कुरता लेना चाहता है, उसे अपनी चादर भी ले लेने दो।

(41) और यदि कोई तुम्हें आधा कोस बेगार में ले जाये, तो उसके साथ कोस भर चले जाओ।

(42) जो तुम से माँगता है, उसे दे दो जो तुम से उधार लेना चाहता है, उस से मुँह न मोड़ो।



📚 मनन-चिंतन



जब हम आज के सुसमाचार को पढ़ते हैं तो हम पाते हैं कि प्रभु येसु के शब्द सभों को आश्चर्य चकित कर देता है, क्योंकि हमारा न्याय प्रक्रिया या सोच अलग है। यहाँ पर हम न्याय को संसारिक तर्क के विरूध्द पाते हैं। संसारिक न्याय दोनों पक्षों को बराबरी का दर्जा देती है, आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत।

लेकिन, प्रभु येसु सुसमाचार में इस से आगे बढ़कर कहते हैं यदि कोई गाल पर थप्पड़ मारे तो उसके साथ रहकर, कुछ समय निकालकर अपने को समर्पित कर दो। और यदि वह कुछ माँगता है, तो उसे और अधिक देना चाहिए। यही प्रभु येसु का नियम है, वह न्याय जो, दूसरी न्याय से सर्वथा अलग है - आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत।

संत पौलुस भी आज के पाठ में ऐसे ही अभिव्यक्ति देते हैं, जिसे हम गाल पर थप्पड़ मारना और उस प्रकार के चीज के अर्थ को समझ सकते हैं। और वे अपने शब्दों को अन्त करते हुए कहते हैं:- जैसे लोगों के पास कुछ नहीं है और फिर भी उनके पास सब कुछ है (2 कुरिन्थ 6:10)



📚 REFLECTION




When we read today’s gospel we find that Jesus’ word surprise everyone. Our thinking of justice is different. This is something that goes against the world’s logic. The worldly justice gives reasonable justice for both; an eye for an eye, and a tooth for a tooth. Because we must defend ourselves, we must fight; we have to defend on our ground. And if someone strikes us once, we will strike them twice and so defend ourselves. This is the normal thinking.

Yet, Jesus goes beyond this and says that after we have been struck, one ought to pause for a while together with the other person, to dedicate sometime to the person. And if he asks for something, we ought to give him even more. This is Jesus’ law: the justice that delivers in another justice, totally different from ‘an eye for an eye, and a tooth for a tooth’. St Paul gives us an expression that may help us to understand the meaning of the blow to the cheek and the other such things. In fact, he ends with the words: as people having nothing, and yet possessing everything (2Cor.6:10).


✍ -Br Biniush Topno


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Daily Mass Readings for Sunday, 13 June 2021

 Daily Mass Readings for Sunday,                       13 June 2021                

ELEVENTH SUNDAY IN ORDINARY TIME

First Reading: Ezekiel 17: 22-24
Responsorial Psalm: Psalms 92: 2-3, 13-14, 15-16
Second Reading: Second Corinthians 5: 6-10
Gospel: Mark 4: 26-34

Also Read: Mass Reading Reflection for 13 June 2021


First Reading: Ezekiel 17: 22-24

22 Thus saith the Lord God: I myself will take of the marrow of the high cedar, and will set it: I will crop off a tender twig from the top of the branches thereof, and I will plant it on a mountain high and eminent.

23 On the high mountains of Israel will I plant it, and it shall shoot forth into branches, and shall bear fruit, and it shall become a great cedar: and all birds shall dwell under it, and every fowl shall make its nest under the shadow of the branches thereof.

24 And all the trees of the country shall know that I the Lord have brought down the high tree, and exalted the low tree: and have dried up the green tree, and have caused the dry tree to flourish. I the Lord have spoken and have done it.

Responsorial Psalm: Psalms 92: 2-3, 13-14, 15-16

R. (2a) Lord, it is good to give thanks to you.

2 It is good to give praise to the Lord: and to sing to thy name, O most High.

3 To shew forth thy mercy in the morning, and thy truth in the night:

R. Lord, it is good to give thanks to you.

13 The just shall flourish like the palm tree: he shall grow up like the cedar of Libanus.

14 They that are planted in the house of the Lord shall flourish in the courts of the house of our God.

R. Lord, it is good to give thanks to you.

15 They shall still increase in a fruitful old age: and shall be well treated,

16 That they may shew, That the Lord our God is righteous, and there is no iniquity in him.

R. Lord, it is good to give thanks to you.

Second Reading: Second Corinthians 5: 6-10

6 Therefore having always confidence, knowing that, while we are in the body, we are absent from the Lord.

7 (For we walk by faith, and not by sight.)

8 But we are confident, and have a good will to be absent rather from the body, and to be present with the Lord.

9 And therefore we labour, whether absent or present, to please him.

10 For we must all be manifested before the judgement seat of Christ, that every one may receive the proper things of the body, according as he hath done, whether it be good or evil.

Alleluia

R. Alleluia, alleluia.

The seed is the word of God, Christ is the sower. All who come to him will live forever.

R. Alleluia, alleluia.

Gospel: Mark 4: 26-34

26 And he said: So is the kingdom of God, as if a man should cast seed into the earth,

27 And should sleep, and rise, night and day, and the seed should spring, and grow up whilst he knoweth not.

28 For the earth of itself bringeth forth fruit, first the blade, then the ear, afterwards the full corn in the ear.

29 And when the fruit is brought forth, immediately he putteth in the sickle, because the harvest is come.

30 And he said: To what shall we liken the kingdom of God? or to what parable shall we compare it?

31 It is as a grain of mustard seed: which when it is sown in the earth, is less than all the seeds that are in the earth:

32 And when it is sown, it groweth up, and becometh greater than all herbs, and shooteth out great branches, so that the birds of the air may dwell under the shadow thereof.

33 And with many such parables, he spoke to them the word, according as they were able to hear.

34 And without parable he did not speak unto them; but apart, he explained all things to his disciples.

✍️Br. Biniush Topno

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                             Praise the lord

इतवार, 13 जून, 2021 वर्ष का ग्यारहवाँ इतवार

 

इतवार, 13 जून, 2021

वर्ष का ग्यारहवाँ इतवार

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पहला पाठ : एज़ेकिएल का ग्रन्थ 17:22-24



22) “प्रभु-ईश्वर यह कहता है- मैं देवदार की फुनगी से, उसकी ऊँची-ऊँची शाखाओं से एक टहनी काटूँगा। उसे मैं स्वयं एक ऊँचे पहाड़ पर लगाऊँगा,

23) उसे मैं इस्राएल के ऊँचे पहाड़ पर लगाऊँगा। उस में डालियाँ निकल आयेंगी। वह फल उत्पन्न करेगा और एक शानदार देवदार बन जायेगा। नाना प्रकार के पक्षी उसके नीचे आ जायेंगे; वे उसकी डालियों की छाया में बसेरा करेंगे

24) और मैदान के सभी पेड़ जान लेंगे कि मैं प्रभु, ऊँचे वृक्ष को नीचा बना देता हूँ और नीचे वृक्ष को ऊँचा। मैं हरे वृक्ष को सूखा बना देता हूँ और सूखे वृक्ष को हरा। मैं, प्रभु जो कह चुका हूँ, उसे पूरा कर देता हूँ।“



दूसरा पाठ: कुरिन्थियों के नाम सन्त पौलुस का दूसरा पत्र 5:6-10



6) इसलिए हम सदा ईश्वर का भरोसा रखते हैं। हम यह जानते हैं, कि हम जब तक इस शरीर में हैं, तब तक हम प्रभु से दूर, परदेश में निवास करते हैं;

7) क्योंकि हम आँखों-देखी बातों पर नहीं, बल्कि विश्वास पर चलते हैं। हमें तो ईश्वर पर पूरा भरोसा है।

8) हम शरीर का घर छोड़ कर प्रभु के यहाँ बसना अधिक पसन्द करते हैं।

9) इसलिए हम चाहे घर में हों चाहे परदेश में, हमारी एकमात्र अभिलाषा यह है कि हम प्रभु को अच्छे लगे;

10) क्योंकि हम सबों को मसीह के न्यायासन के सामने पेश किया जायेगा। प्रत्येक व्यक्ति ने शरीर में रहते समय जो कुछ किया है, चाहे वह भलाई हो या बुराई, उसे उसका बदला चुकाया जायेगा।



सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 4:26-34



26) ईसा ने उन से कहा, ’’ईश्वर का राज्य उस मनुष्य के सदृश है, जो भूमि में बीज बोता है।

27) वह रात को सोने जाता और सुबह उठता है। बीज उगता है और बढ़ता जाता है हालाँकि उसे यह पता नहीं कि यह कैसे हो रहा है।

28) भूमि अपने आप फसल पैदा करती है- पहले अंकुर, फिर बाल और बाद में पूरा दाना।

29 फ़सल तैयार होते ही वह हँसिया चलाने लगता है, क्योंकि कटनी का समय आ गया है।’’

30) ईसा ने कहा, ’’हम ईश्वर के राज्य की तुलना किस से करें? हम किस दृष्टान्त द्वारा उसका निरूपण करें?

31) वह राई के दाने के सदृश है। मिट्टी में बोये जाते समय वह दुनिया भर का सब से छोटा दाना है;

32) परन्तु बाद में बढ़ते-बढ़ते वह सब पौधों से बड़ा हो जाता है और उस में इतनी बड़ी-बड़ी डालियाँ निकल आती हैं कि आकाश के पंछी उसकी छाया में बसेरा कर सकते हैं।

33) वह इस प्रकार के बहुत-से दृष्टान्तों द्वारा लोगों को उनकी समझ के अनुसार सुसमाचार सुनाते थे।

34) वह बिना दृष्टान्त के लोगों से कुछ नहीं कहते थे, लेकिन एकान्त में अपने शिष्यों को सब बातें समझाते थे।



📚 मनन-चिंतन



आज वर्ष का ग्यारहवाँ इतवार है। आज के पहले पाठ एवं सुसमाचार में हम एक आर्दश पिता के बारे में सुनते हैं, जो हमेशा अपने बच्चों की भलाई की कामना करता हैं। और हर संभव उनकी आवश्यकताओं को पुरा करने का प्रयास करता है। वह इसके लिए योजना बनाता है एवं हर सपनों को पुरा करने का भरसक प्रयास करता है। इसे हम संत योहन के सुसमाचार 3:16 में पढ़ते हैं, ’’ईश्वर ने संसार को इतना प्यार किया कि उसने उसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उसमें विश्वास करता है, उसका सर्वनाश न हो, बल्कि वह अनंन्त जीवन प्राप्त करे।’’ ईश्वर हर व्यक्ति के जीवन में कार्य करता है जैसा कि वह प्रकृति के साथ करता है। वह सृष्टि के हर एक चीज पर अपनी उपस्थिति एवं कार्य बनाये रखता है।

आज के पहले पाठ मे ंहम सुनते हैं कि ईश्वर (इसा्रलियों) लोगों की भलाई की पहल करता है वह एक छोटी सी टहनी से शक्तिशाली पेड़ बनाता है। प्रभु कहता है, वह इस्राएल को ऊँचे पहाड़ पर लगायेगा और उसमें डालियाँ निकल आएगी (ऐजेकिएल 17:23)। इससे ईश्वर यह स्पष्ट करना चाहता है कि वह इस्राएल को एक महान राष्ट्र बनायेगा।

दूसरे पाठ में संत पौलुस कुरिन्थ के विश्वासियों को बताते हैं कि हमें ईश्वर को प्रसन्न रखना है। वे आगे बताते हैं कि हमें प्रभु येसु ने एक नये सृष्टि बनना है। प्रभु येसु के अनुयायी होने के नाते प्रभु के समनरूप बनना है। संत पौलुस की भी यही इच्छा थी कि वे भी हमेशा प्रभु के लिए एक नया जीवन जीयें।

आज के सुसमाचार में दो दृष्टांत है जो ईश्वर के राज्य की रहस्यों के बारे में बताते हैं इसके लिए वह बीज और पौधे का उपयोग करते हैं जिस प्रकार जब बीज बोया जाता है तो वह अंकुरित होकर बिना किसी बाहय दबाव से बढ़ता है उसी प्रकार हमारा ख्रीस्तीय विश्वास भी बढ़ता है जब हम ईश्वर पर सब कुछ समर्पित करते हैं और उसी प्रकार पौधा भी जब बढ़कर पेड़ में परिर्वत हो जाता है तब वह सबको आश्रय देता, और पंछी उसकी छाया में बसेरा करते हैं। (मारकुस 4:32)


✍फादर आइजक एक्का

📚 REFLECTION




Today is the eleventh Sunday of the year. In today’s first reading and in the gospel we hear about the benevolent father, who always wishes for the wellbeing of his children, and tries to fulfil every need. For this he plans a dream and dreams for them. He is a benevolent father who cares for his children. We read in gospel of John3:16, “For God so loved the world that he gave his only son, so that everyone who believes in him may not perish but may have eternal life.” God works in every human person as he would work in nature. We can see how God causes for each single item of his creation and builds into his own presence and action.

In today’s first reading we hear that God takes initiative for the wellbeing of the people of Israel. He causes a small shoot to grow into a mighty tree. God says he will plant Israel on high mountain and its branches shall spread (Ez.17:23); with this God wished to make Israel a great nation.

In the second reading Paul reminds the Corinthian that we need to always please God. And further he says that we have to become a new creation in Christ. As a follower of Christ we need to be like Christ. This was also the aim of Paul that we have to live a new life in Christ.

In the gospel today we have two parables concerning the growth and the mystery of the kingdom of God. For this he uses the images of seed and the plant. As the seed is sown it first sprouts and grows without any hindrance, likewise our Christian life grows without any external hurdles when we submit ourselves to God. And as the plant grows and becomes a tree, it gives shade and the birds make shelter in it (Mk.4:32).



✍ -Fr. Isaac Ekka

मनन-चिंतन-2


आज के सुसमाचार में प्रभु येसु कहते हैं, "ईश्वर का राज्य उस मनुष्य के सदृश है, जो भूमि में बीज बोता है। वह रात को सोने जाता और सुबह उठता है। बीज उगता है और बढ़ता जाता है हालाँकि उसे यह पता नहीं कि यह कैसे हो रहा है। भूमि अपने आप फसल पैदा करती है- पहले अंकुर, फिर बाल और बाद में पूरा दाना। फ़सल तैयार होते ही वह हँसिया चलाने लगता है, क्योंकि कटनी का समय आ गया है।" किसान खेत में मेहनत तो ज़रूर करता है, परन्तु वह यह नहीं कह सकता कि मैंने कुछ पैदा किया है। फ़सल तो ईश्वर की देन है। स्तोत्र 127:1-2 में हम पढ़ते हैं, “यदि प्रभु ही घर नहीं बनाये, तो राजमन्त्रियों का श्रम व्यर्थ है। यदि प्रभु ही नगर की रक्षा नहीं करे, तो पहरेदार व्यर्थ जागते हैं। कठोर परिश्रम की रोटी खानेवालो! तुम व्यर्थ ही सबेरे जागते और देर से सोने जाते हो; वह अपने सोये हुए भक्त का भरण-पोषण करता है।”

हमारे बच्चे भी ईश्वर के वरदान है। काईन को जन्म देने के बाद हेवा ने कहा, ''मैंने प्रभु की कृपा से एक मनुष्य को जन्म दिया'' (उत्पत्ति 4:1) ईश्वर ने पति-पत्नियों को विवाह संस्कार के अंतर्गत बच्चे पैदा करने की क्षमता दी है, परन्तु वास्तव मे बच्चे ईश्वर की देन है। उत्पत्ति 20:1-2 में हम देखते हैं, कि “जब राहेल ने देखा कि उससे याकूब को कोई पुत्र नहीं हुआ है, तब वह अपनी बहन से जलने लगी और उसने याकूब से कहा, ''मुझे बाल-बच्चे दो, नहीं तो मैं मर जाऊँगी'' याकूब को राहेल पर क्रोध आ गया। वह कहने लगा, ''मैं क्या ईश्वर बन सकता हूँ। उसी ने तो तुम्हें सन्तान से वंचित किया।'' ईश्वर ने इब्राहीम और सारा को उनके बुढ़ापे में एक बच्चे का वरदान दिया।

हम हर कार्य के लिए ईश्वर पर निर्भर है। इसलिए स्तोत्रकार कहते हैं,“यदि प्रभु ने हमारा साथ नहीं दिया होता, तो जब लोगों ने हम पर चढ़ाई की और हम पर उनका क्रोध भड़का, तब वे हमें जीवित ही निगल गये होते। बाढ़ हमें डुबा गयी होती, प्रचण्ड धारा ने हमें बहा दिया होता और चारों ओर उमड़ती लहरों में हम डूब कर मर गये होते।” (स्तोत्र 124:2-5) संत याकूब हम से कहते हैं, “आप लोग जो यह कहते हैं, "हम आज या कल अमुक नगर जायेंगे, एक वर्ष तक वहाँ रह कर व्यापार करेंगे और धन कमायेंगे", मेरी बात सुनें। आप नहीं जानते कि कल आपका क्या हाल होगा। आपका जीवन एक कुहरा मात्र है- वह एक क्षण दिखाई दे कर लुप्त हो जाता है। आप लोगों को यह कहना चाहिए, "यदि ईश्वर की इच्छा होगी, तो हम जीवित रहेंगे और यह या वह काम करेंगे"। याकूब 4:13-15)

इसी कारण हमें ईश्वर के प्रति हमेशा कृतज्ञ बने रहना चाहिए। एक डाक्टर ने एक 65 साल के मरीज के हृदय का ऑपरेशन किया। उसे यह कहा गया कि कम से कम 5 साल के लिए उसे डरने की कोई ज़रूरत नहीं है। ऑपरेशन का खर्च था 3 लाख रुपये। बिल देख कर उस मरीज ने ईश्वर को धन्यवाद दिया। डाक्टर को आश्चर्य हुआ और उन्होंने उस मरीज से पूछा, “मैंने सोचा कि आप इतना बडा बिल देख कर दुखी होंगे। परन्तु आप खुशी से ईश्वर को धन्यवाद दे रहे हैं। ऐसा क्यों?” तब उसने उत्तर दिया, “आप पाँच साल मेरे हृदय को चलाने के लिए 3 लाख रुपये ले रहे हैं। परन्तु पिछले 65 सालों में उसे चलाने के लिए मेरे ईश्वर ने मुझ से एक पैसा नहीं लिया। यह सोच कर मैं ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ।“

राजाओं तथा शासकों को भी ईश्वर के अधिकार का आदर करना चाहिए। प्रज्ञा ग्रन्थ 6:1-5 में कहा गया है, “राजाओें! सुनो और समझो। पृथ्वी भर के शासको! शिक्षा ग्रहण करो। तुम, जो बहुसंख्यक लोगों पर अधिकार जताते हो और बहुत-से राष्ट्रों का शासन करने पर गर्व करते हो, मेरी बातों पर कान दो; क्योंकि प्रभु ने तुम्हें प्रभुत्व प्रदान किया, सर्वोच्च ईश्वर ने तुम्हे अधिकार दिया। वही तुम्हारे कार्यों का लेखा लेगा और तुम्हारे विचारों की जाँच करेगा। तुम उसके राज्य के सेवक मात्र हो। इसलिए यदि तुमने सच्चा न्याय नहीं किया, विधि का पालन नहीं किया और ईश्वर की इच्छा पूरी नहीं की, तो वह भीषण रूप में अचानक तुम्हारे सामने प्रकट होगा; क्योंकि उच्च अधिकारियों का कठोर न्याय किया जायेगा।” समुएल के पहले ग्रन्थ, अध्याय 17 में हमे देखते हैं कि दाऊद फ़िलिस्ती महापराक्रमी गोलयत से कहते हैं, “तुम तलवार, भाला और बरछी लिये मुझ से लड़ने आ रहे हो। मैं तो विश्वमण्डल के प्रभु, इस्राएली सेनाओं के ईश्वर के नाम पर तुम से लड़ने आ रहा हूँ, जिसे तुमने चुनौती दी है।” उसी ईश्वर की शक्ति से बालक दाऊद ने फिलिस्ती महापराक्रमी को मार गिराया। बाद में दाऊद भी घमण्ड कर अपनी ताकत पर भरोसा रख कर जनगणना की आज्ञा दे कर पाप करते हैं। न्यायकर्ता के ग्रन्थ अध्याय 7 में हम देखते हैं कि गिदओन 32,000 सैनिकों को लेकर मिदियानियों के विरुध्द युध्द करने जाते हैं, तब ईश्वर उन से कहते हैं, "तुम्हारे पास लोगों की संख्या बहुत अधिक है। इसलिए मैं मिदयानियों को उनके हाथ नहीं दूँगा, क्योंकि इस से इस्राएली डींग मारेंगे कि हमने अपने बाहुबल से अपना उद्धार किया है।“ तब प्रभु 31,700 सैनिकों वापस भेजने की आज्ञा देते है। ईश्वर की शक्ति पर निर्भर रह कर गिदयोन ने केवल 300 सैनिकों के साथ युध्द में जा कर मिदियानियों को पराजित किया।

इस प्रकार पवित्र वचन हमें यह शिक्षा देता है कि ईश्वर के बिना हम कुछ भी नहीं कर सकते हैं। प्रभु येसु कहते हैं, “जिस तरह दाखलता में रहे बिना डाली स्वयं नहीं फल सकती, उसी तरह मुझ में रहे बिना तुम भी नहीं फल सकते”। योहन 15:4)



✍-Br. Biniush Topno

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