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आज का पवित्र वचन 4 मई, 2021 मंगलवार - पास्का का पाँचवाँ सप्ताह

 

4 मई, 2021

मंगलवार - पास्का का पाँचवाँ सप्ताह




पहला पाठ : प्रेरित-चरित 14:19-28


19) इसके बाद कुछ यहूदियों ने अन्ताखिया तथा इकोनियुम से आ कर लोगों को अपने पक्ष में मिला लिया। वे पौलुस को पत्थरों से मार कर और मरा समझ कर नगर के बाहर घसीट ले गये;

20) किन्तु जब शिष्य पौलुस के चारों ओर एकत्र हो गये, तो वह उठ खड़ा हुआ और नगर लौट आया। दूसरे दिन वह बरनाबस के साथ देरबे चल दिया।

21) उन्होंने उस नगर में सुसमाचार का प्रचार किया और बहुत शिष्य बनाये। इसके बाद वे लुस्त्रा और इकोनियुम हो कर अन्ताखिया लौटे।

22) वे शिष्यों को ढारस बँधाते और यह कहते हुए विश्वास में दृढ़ रहने के लिए अनुरोध करते कि हमें बहुत से कष्ट सह कर ईश्वर के राज्य में प्रवेश करना है।

23) उन्होंने हर एक कलीसिया में अध्यक्षों को नियुक्त किया और प्रार्थना तथा उपवास करने के बाद उन लोगों को प्रभु के हाथों सौंप दिया, जिस में वे लोग विश्वास कर चुके थे।

24) वे पिसिदिया पार कर पम्फुलिया पहुँचे

25) और पेरगे में सुसमाचार का प्रचार करने के बाद अत्तालिया आये।

26) वहाँ से वे नाव पर सवार हो कर अन्ताखिया चल दिये, जहाँ से वे चले गये थे और जहाँ लोगों ने उस कार्य के लिए ईश्वर की कृपा माँगी थी, जिसे उन्होंने अब पूरा किया था।

27) वहाँ पहुँचकर और कलसिया की सभा बुला कर वे बताते रहे कि ईश्वर ने उनके द्वारा क्या-क्या किया और कैसे गै़र-यहूदियों के लिए विश्वास का द्वार खोला।

28) वे बहुत समय तक वहाँ शिष्यों के साथ रहे।


सुसमाचार : योहन 14:27-31


27) मैं तुम्हारे लिये शांति छोड जाता हूँ। अपनी शांति तुम्हें प्रदान करता हूँ। वह संसार की शांति-जैसी नहीं है। तुम्हारा जी घबराये नहीं। भीरु मत बनो।

28) तुमने मुझ को यह कहते सुना- मैं जा रहा हूँ और फिर तुम्हारे पास आऊँगा। यदि तुम मुझे प्यार करते, तो आनन्दित होते कि मैं पिता के पास जा रहा हूँ, क्योंकि पिता मुझ से महान है।

29) मैंने पहले ही तुम लोगों को यह बताया, जिससे ऐसा हो जाने पर तुम विश्वास करो।

30) अब मैं तुम लोगों से अधिक बातें नहीं करूँगा क्योंकि इस संसार का नायक आ रहा है। वह मेरा कुछ नहीं बिगाड सकता,

31) किन्तु यह आवश्यक है कि संसार जान जाये कि मैं पिता को प्यार करता हूँ और पिता ने मुझे जैसा आदेश दिया है मैं वैसा ही करता हूँ। उठो! हम यहाँ से चलें।’’


📚 मनन-चिंतन


जब जीवन में सब अस्त वयस्त हो और ह्दय व्याकुल हो तो केवल शांति ही हमें उस अवस्था से उबार सकता है। प्रभु येसु शांति के राजा है, तथा पुनरुत्थान के बाद जब वे शिष्यों को बंद कमरे में दर्शन देते है तो सबसे पहले यही आशिष देते है कि तुम्हें शांति मिले।

आज का सुसमाचार हमारे बीच में येसु और शिष्यों के बीच में उस वार्तालाप को रखता है जो प्रभु येसु ने पवित्र आत्मा के आने के विषय बताने के बाद कही थी। प्रभु येसु को ज्ञात था कि उनके मरण के बाद पेंतेकोस्त तक शिष्य व्याकुल हो जायेगंे, घबरा जायेंगे इसलिये प्रभु उन से कहते है, ‘‘मैं तुम्हारे लिये शांति छोड़ जाता हूॅं। अपनी शांति तुम्हें प्रदान करता हॅूं। वह संसार की शांति जैसी नहीं है। तुम्हारा जी घबराये नहीं। भीरु मन बनों।’’

मैं तुम्हारे लिये शांति छोड़ जाता हॅूं। अपनी शांति तुम्हें प्रदान करता हॅूं - प्रभु येसु जाते जाते यह आश्वसन देते जाते हैं वह जाते जाते अपनी शांति देकर जाऐंगे। प्रभु की शांति किस प्रकार की है? प्रभु की शांति इस संसार की शांति से परे है। जब शिष्यगण येसु के साथ झील पार कर रहे थे तब अचानक झंझावट उठा और नाव पानी से भरी जा रही थी। येसु दुम्बाल में तकिया लगाकर सो रहे थे तब शिष्यों ने उन्हे जगाया और प्रभु ने वायु को डॉंटा और पूर्ण शांति छा गई (मत्ती 8ः23-27)। शिष्य उस घटना के समय बहुत डर गये थे क्योकि झंझावट केवल बाहर ही नहीं परंतु उनके भीतर उनके ह्दय में भी था। प्रभु येसु उस झंझावट भरी घटना में जहॉं बहुत शोरगुल था, लहरो का नाव से टकराव था ऐसी स्थिति में भी वे शांत भाव से सो रहे थे क्योकि प्रभु के भीतर झंझावट नहीं परंतु शांति था। प्रभु की शांति का राज-पिता ईश्वर के प्रति पूर्ण रूप से समर्पण तथा विश्वास होना। अर्थात् भले ही मेरे चारों ओर तबाही हो हाहाकार हो फिर भी विश्वास होना कि प्रभु मेरे साथ है, मेरे भीतर है वह मेरा कुछ भी अनिष्ठ नहीं होने देगा। यह विश्वास और शांति केवल येसु ही हमें प्रदान कर सकते है।

आइये हम प्रभु की शांति को ग्रहण करने उसको महसूस करने के लिए आज के वचन के द्वारा प्रार्थना करें।



📚 REFLECTION



When there is turmoil in the life and heart is anxious then only peace can overcome that situation. Jesus is the Prince of Peace, and after the Resurrection when he meets the disciples in the closed room he first and foremost gives the blessing of peace.

Today’s Gospel keeps before us the conversation between Jesus and the disciples about the situation after telling about coming of Holy Spirit. Lord Jesus knew that after his death till the Pentecost disciples will be disturbed, frighten that’s why Lord says to them, “Peace I leave with you; my peace I give to you. I do not give to you as the world gives. Do not let your hearts be troubled, and do not let them be afraid.”

Peace I leave with you; my peace I give to you- Before leaving Jesus gives the assurance of his peace. What kind is the Peace of the Lord? Peace of God is different from the peace of the world. When disciples were crossing the sea along with Jesus, suddenly a windstorm arose on the sea, so great that the boat was being swamped by the waves. Jesus was sleeping and the disciples woke him and Jesus rebuked the winds and the sea; and there was a dead calm (Mt 8:23-27). Disciples were very frightened of that incident because the storm was not only outside but also inside of them, in their hearts. Jesus in that incident full of storm where there was lot of alarm and excursions, boat was being swamped by the waves; even in this situation Jesus was sleeping peacefully because the inside Jesus there was peace not the storm. The secret of Jesus’ peace is the full trust and surrender in the Abba Father. That means to say even if I am surrounded by the destruction or outcry then also having strong believe that God is with me, inside me and he will never allow anything to harm me. This kind of trust and peace only Jesus can give us.

Let’s pray through today’s word that we may receive and experience Lord’s peace.


 -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!

आज का पवित्र वचन 3 मई, 2021 प्रेरित फ़िलिप और याकूब का पर्व

 

3 मई, 2021

प्रेरित फ़िलिप और याकूब का पर्व

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पहला पाठ : कुरिन्थियों के नाम सन्त पौलुस का पहला पत्र 15:1-8


1) भाइयो! मैं आप लोगेां को उस सुसमाचार का स्मरण दिलाना चाहता हूँ, जिसका प्रचार मैंने आपके बीच किया, जिसे आपने ग्रहण किया, जिस में आप दृढ बने हुये हैं,

2) और यदि आप उसे उसी रूप में बनाये रखेंगे, जिस रूप में मैंने उसे आप को सुनाया, तो उसके द्वारा आप को मुक्ति मिलेगी। नहीं तो आपका विश्वाश व्यर्थ होगा।

3) मैंने आप लोगों को मुख्य रूप से वही शिक्षा सुनायी, जो मुझे मिली थी और वह इस प्रकार है- मसीह हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए मरे, जैसा कि धर्मग्रन्थ में लिखा है।

4) वह कब्र में रखे गये और तीसरे दिन जी उठे, जैसा कि धर्मग्रन्थ में लिखा है।

5) वह कैफ़स को और बाद में बारहों में दिखाई दिये।

6) फिर वही एक ही समय पाँच सौ से अधिक भाइयों को दिखाई दिये। उन में से अधिकांश आज भी जीवित हैं, यद्यपि कुछ मर गये हैं।

7) बाद में वह याकूब को और फिर सब प्रेरितों को दिखाई दिये।

8) सब के बाद वह मुझे भी, मानों ठीक समय से पीछे जन्में को दिखाई दिये।


सुसमाचार : सन्त योहन 14:6-14


6) ईसा ने उस से कहा, ’’मार्ग सत्य और जीवन मैं हूँ। मुझ से हो कर गये बिना कोई पिता के पास नहीं आ सकता।’’

7) यदि तुम मुझे पहचानते हो, तो मेरे पिता को भी पहचानोगे। अब तो तुम लोगों ने उसे पहचाना भी है और देखा भी है।’’

8) फिलिप ने उन से कहा, ’’प्रभु! हमें पिता के दर्शन कराइये। हमारे लिये इतना ही बहुत है।’’

9) ईसा ने कहा, ’’फिलिप! मैं इतने समय तक तुम लोगों के साथ रहा, फिर भी तुमने मुझे नहीं पहचाना? जिसने मुझे देखा है उसने पिता को भी देखा है। फिर तुम यह क्या कहते हो- हमें पिता के दर्शन कराइये?’’

10) क्या तुम विश्वास नहीं करते कि मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में हैं? मैं जो शिक्षा देता हूँ वह मेरी अपनी शिक्षा नहीं है। मुझ में निवास करने वाला पिता मेरे द्वारा अपने महान कार्य संपन्न करता है।

11) मेरी इस बात पर विश्वास करो कि मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में हैं, नहीं तो उन महान कार्यों के कारण ही इस बात पर विश्वास करो।

12) मैं तुम लोगो से यह कहता हूँ जो मुझ में सिवश्वास करता है, वह स्वयं वे कार्य करेगा, जिन्हें मैं करता हूँ। वह उन से भी महान कार्य करेगा। क्योंकि मैं पिता के पास जा रहा हूँ।

13) तुम मेरा नाम ले कर जो कुछ माँगोगे, मैं तुम्हें वही प्रदान करूँगा, जिससे पुत्र के द्वारा पिता की महिमा प्रकट हो।

14) यदि तुम मेरा नाम लेकर मुझ से कुछ भी माँगोगें, तो मैं तुम्हें वही प्रदान करूँगा।


📚 मनन-चिंतन


प्रभु येसु ने इस संसार में अपने कार्य को आगे ले चलने के लिए बारहों शिष्यों को चंुना जो आगे चल कर प्रेरित कहलाये। आज माता कलीसिया उन बारहों में से दो प्रेरित -संत फिलिप और संत याकुब का स्मरण करते हुये उनका पर्व मनाती है। प्रेरित कलीसिया के मजबूत प्रचारक थे जिन्होने अपने जीवन द्वारा जीवित प्रभु का साक्ष्य दिया।

बाईबिल में याकुब के विषय में बहुत ही कम विवरण दिया गया है। परंतु फिलिप के विषय में याकुब से ज्यादा विवरण पाते है। आज के सुसमाचार में भी हम प्रभु येसु और फिलिप के बीच में वार्तालाप को पाते है जहॉं प्रभु येसु एक महान रहस्य फिलिप के प्रश्न का उत्तर देते समय प्रकट करते है- ‘‘जिसने मुझे देखा है उसने पिता को भी देखा है।’’

जब कभी हम किसी प्रेरित संत का पर्व मनाते है तब हमारे सामने उनके जीवन के तीन भागों पर मनन करना चाहिए-

पहला-प्रेरितों का प्रभु येसु से मिलने से पहले का जीवन

दूसरा-प्ररितों का प्रभु येसु के साथ बिताया हुआ जीवन

तीसना-प्रेरितों का प्रभु येसु के पुनरुत्थान के बाद का जीवन

पहले जीवन भाग अर्थात् प्रभु येसु से मिलने से पहले वे अज्ञानता में जीवन व्यतीत कर रहें थे, एक संसारिक जीवन जी रहें थे।

दूसरे भाग में जहॉं वे प्रभु येसु के साथ समय बिताते है- जहॉं पर वे प्रभु येसु के चमत्कारों को देखते है, उनके प्रवचन और दृष्टांतों को सुनते है, येसु के द्वारा प्रकट किये गये महान रहस्यों को सुनते है लेकिन वे उन सब को उस समय नहीं समझ पाते है।

तीसरे भाग में प्रभु येसु के पुनरुत्थान और पवित्र आत्मा से भरने के बाद उनको प्रभु येसु द्वारा कहीं गई सभी बातों और रहस्यों को अर्थ पता चलता है, उन्हे पता चलता है कि येसु कौन है? और उस से भी अधिक वे संासारिक जीवन से उपर उठ कर उन्हें अपने जीवन का अर्थ और जीवन का मकसद पता चलता है।

ये तीनों भाग प्रेरितों के जीवन में प्रमुख भुमिका निभाती है जहॉं पर वे साधारण जीवन से महान संत के रूप में उभर कर सामने आते है। प्रेरितो का जीवन हम सभी को प्रेरणा देता है कि हम भी येसु और अपने जीवन के मकसद को पहचाने और यह तभी हो सकता है जब हम यह तीनों जीवन के भाग को पूर्णता तक इस संसार में जीयंे। हममें से अधिकतर लोग पहले या दूसरे जीवन के भाग में ही सिमट कर रह जाते है। आईये हम प्रेरित फिलिप और याकुब से प्रार्थना करें कि जिस प्रकार उन्होंने प्रभु और उनके इस संसार में आने के मकसद को पहचान कर उनके कार्यों के लिए अपने जीवन तक को न्योछावर कर दिया, हम भी उसी प्रकार येसु को सच्चे रूप में पहचान सकें।



📚 REFLECTION



Jesus chose the twelve disciples who were later called Apostles to carry forward his mission in this world. Among the twelve, today the Catholic Church remembers the two Apostles- St.Philip and St. James and celebrates their feasts. Apostles were the strong preacher who witnessed the Lord through their lives

There is very less information about St.James in the Bible, but there is somewhat more description of Philip than James in the Bible. In today’s Gospel passage we see the conversation between Jesus and Philip where Lord Jesus reveals the great mystery while answering to the question of Philip- “Whoever has seen me has seen the Father.”

Wheneve we celebrate the feasts of any Apostles then we have to reflect the three phases of their lives-

First-The life of Apostles before encountering Jesus

Second- The life of Apostles spend with Jesus

Third- The life of Apostles after the Resurrection of Jesus

In the first phase of their lives i.e., before meeting Jesus there were living an ignorant life, a worldly life.

In Second phase where they spend their lives with Jesus- They witness the miracles of Jesus, they hear the sermons and parables of Jesus, they listen the great mysteries revealed by Jesus but at that moment they were not able to understand it fully.

In the Third phase- After the Resurrection of Jesus and filling of the Holy Spirit they understand the meaning of the words and mystery spoken by Jesus, they come to know who the Jesus really is? And all the more they rise above the worldlylives and come to know the meaning and purpose of their lives.

These three phases plays an important role in the lives of Apostles where they come forward as the great Saint from their simple lives. Life of Apostles gives us an inspiration that we must also recognize Jesus and the purpose of our lives and this is only possible when we live all these three phases of lives in this world. Most of us remain in the first or second phase only. Let’s pray to St. Philip and St. James as they recognized Jesus and the purpose of his coming surrendered their lives for it, we too may be able to recognize Jesus in true way.


 -Br. Biniush Topno


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आज का पवित्र वचन 2 मई, 2021 पास्का का पाँचवाँ इतवार

 

2 मई, 2021

पास्का का पाँचवाँ इतवार

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पहला पाठ :प्रेरित-चरित . 9:26-31


26) जब साऊल येरुसालेम पहुँचा, तो वह शिष्यों के समुदाय में सम्मिलित हो जाने की कोशिश करता रहा, किन्तु वे सब उसे से डरते थे, क्योंकि उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि वह सचमुच ईसा का शिष्य बन गया है।

27) तब बरनाबस ने उसे प्रेरितों के पास ले जा कर उन्हें बताया कि साऊल ने मार्ग में प्रभु के दर्शन किये थे और प्रभु ने उस से बात की थी और यह भी बताया कि साऊल ने दमिश्क में निर्भीकता से ईसा के नाम का प्रचार किया था।

28) इसके बाद साऊल येरुसालेम में प्रेरितों के साथ आता-जाता रहा

29) और निर्भीकता से ईसा के नाम का प्रचार करता रहा। वह यूनानी-भाषी यहूदियों से बातचीत और बहस किया करता था, किन्तु वे लोग उसे मार डालना चाहते थे।

30) जब भाइयों को इसका पता चला, तो उन्होंने साऊल को कैसरिया ले जा कर तरसुस भेजा।

31) उस समय समस्त यहूदिया, गलीलिया तथा समारिया में कलीसिया को शान्ति मिली। उसका विकास होता जा रहा था और वह, प्रभु पर श्रद्धा रखती हुई और पवित्र आत्मा की सान्त्वना द्वारा बल प्राप्त करती हुई, बराबर बढ़ती जाती थी।


दूसरा पाठ :1 योहन 3:18-2


18) बच्चो! हम वचन से नहीं, कर्म से, मुख से नहीं, हृदय के एक दूसरे को प्प्यार करें।

19) इसी से हम जान जायेंगे कि हम सत्य की सन्तान हैं और जब कभी हमारा अन्तः करण हम पर दोष लगायेगा, तो हम ईश्वर के सामने अपने को आश्वासन दे सकेंगे;

20) क्योंकि ईश्वर हमारे अन्तःकरण से बड़ा हौ और वह सब कुछ जानता है।

21) प्यारे भाइयो! यदि हमारा अन्तः करण हम पर दोष नहीं लगाता है, तो हम ईश्वर पर पूरा भरोसा रख सकते हैं।

22) हम उस से जो कुछ माँगेंगे, वह हमें वहीं प्रदान करेगा; क्योंकि हम उसकी आज्ञाओं को पालन करते हंa और वही करते हैं, जो उसे अच्छा लगता है।

23) और उसकी आाज्ञा यह है कि हम उसके पुत्र ईसा मसीह के नाम में विश्वास करें और एक दूसरे को प्यार करें, जैसा कि मसीह ने हमें आदेश दिया।

24) जो ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करता है, वह ईश्वर में निवास करता है और ईश्वर उस में और हम जानते हैं कि वह हम में निवास करता है; क्योंकि उसने हम को आपना आत्मा प्रदान किया है।


सुसमाचार : योहन 15:1-8.


1) मैं सच्ची दाखलता हूँ और मेरा पिता बागवान है।

2) वह उस डाली को, जो मुझ में नहीं फलती, काट देता है और उस डाली को जो फलती है, छाँटता है। जिससे वह और भी अधिक फल उत्पन्न करें।

3) मैंने तुम लोगो को जो शिक्षा दी है, उसके कारण तुम शुद्ध हो गये हो।

4) तुम मुझ में रहो और मैं तुम में रहूँगा। जिस तरह दाखलता में रहे बिना डाली स्वयं नहीं फल सकती, उसी तरह मुझ में रहे बिना तुम भी नहीं फल सकते।

5) मैं दाखलता हूँ और तुम डालियाँ हो। जो मुझ में रहता है और मैं जिसमें रहता हूँ वही फलता है क्योंकि मुझ से अलग रहकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।

6) यदि कोई मुझ में नहीं रहता तो वह सूखी डाली की तरह फेंक दिया जाता है। लोग ऐसी डालियाँ बटोर लेते हैं और आग में झोंक कर जला देते हैं।

7) यदि तुम मुझ में रहो और तुम में मेरी शिक्षा बनी रहती है तो चाहे जो माँगो, वह तुम्हें दिया जायेगा।

8) मेरे पिता की महिमा इस से प्रकट होगी कि तुम लोग बहुत फल उत्पन्न करो और मेरे शिष्य बने रहो।


📚 मनन-चिंतन


बाईबिल में सर्वत्र प्रभु ईश्वर ने मनुष्य से एक रिश्ता जोड़ने की कोशिश की है और इस हेतु ईश्वर ने मनुष्य के साथ समय समय पर विधान रचा जिससे वे हमारे ईश्वर हो और हम उनकी प्रजा। आज का सुसमाचार हमें उस रिश्ते के संबंध के विषय में बताता है

आज के सुसमाचार में प्रभु येसु बहुत ही सुंदर दृष्टांत के जरिये हमारे और ईश्वर के बीच में रिश्ते को प्रकट करते है।

आज हमारे समक्ष मनन चिंतन के लिए दाखलता और डालियॉं का विवरण है। जहॉं प्रभु हम सबको दाखलता और डालियॉं का संबंध बताते हुए उनमें बने रहनें के लिए आहवान कर रहे है। प्रभु में बने रहने से क्या फायदा है? प्रभु में बने रहने से हम कभी नहीं मुरझायेंगे, हम जो कुछ प्रभु से प्रार्थना में मॉंगेंगे वह हमें मिल जायेगी तथा हमारे लिए कुछ भी असंभव नहीं होगा, जिस प्रकार संत पौलुस कहते है, ‘‘जो मुझे बल प्रदान करते हैं, मै उनकी सहायता से सब कुछ कर सकता हॅूं’’ (फिल्लपि. 4:13)।

प्रभु में बने रहने का तात्पर्य क्या है? प्रभु में बने रहने का तात्पर्य है कि उनकी शिक्षा में बने रहना यह हमें बताता है कि हम केवल उनके वचनों को पढ़े, सुने या याद ही नहीं करें परंतु उन वचनों को जिये, उन वचनों को हमारे जीवन में झलकने दे जिससे जो कोई हमें देंखे या सम्पर्क करें तो उन्हे जीता जागता, चलता फिरता सुसमाचार के दर्शन हो या अनुभव हो। जिस प्रकार संत याकूब अपने पत्र 1ः22-25 में कहते है, ‘‘वचन के श्रोता ही नहीं, बल्कि उसके पालनकर्ता भी बनें। जो व्यक्ति वचन सुनता है, किन्तु उसके अनुसार आचरण नही करता, उस मनुष्य के सदृश है, जो दर्पण में अपना चेहरा देखता है। वह अपने को देख कर चला जाता है और उसे याद नहीं रहता कि उसका अपना स्वरूप कैसा है। किन्तु जो व्यक्ति उस संहिता को, जो पूर्ण है और हमें स्वतन्त्रता प्रदान करती है, ध्यान से देखता और उसका पालन करता है। वह उस श्रोता के सदृश नहीं, जो तुरंत भूल जाता है, बल्कि वह कर्ता बन जाता और उस संहिता को अपने जीवन में चरितार्थ करता है।’’

इसलिए हम श्रोता ही नहीं परंतु वचन के पालनकर्ता के लिए बुलाये गये है। अगर येसु का वचन कहता है कि हमें अपने पड़ोसियों को अपने समान प्रेम करना चाहिए तो ‘‘हम वचन से नहीं, कर्म से, मुख से नहीं, ह्दय से एक दूसरे को प्यार करें’’ (1योहन 3:18)।

प्रभु में बने रहने से प्रभु का जीवन हमारे जीवन में संचार होने लग जाता है और हम प्रभु में एक हो जाते है और जो कार्य प्रभु इस संसार में करना चाहता है वह हमारे जीवन द्वारा पूर्ण होता है। प्रभु इस संसार में बहुत फल उत्पन्न करना चाहते है परंतु उसको पूर्ण होने के लिए हम सभी को उनसे जुड़े रहने की जरूरत है। आईये आज के दिन हम प्रार्थना करें कि हम निरंतर प्रभु से जुड़े रहे जिस प्रकार संत पौलुस जुड़े हुए थे। वे रोमियों के नाम पत्र में कहते हैं, ‘‘कौन हम को मसीह के प्रेम से वंचित कर सकता है? मुझे दृढ़ विश्वास है कि न तो मरण या जीवन, न स्वर्गदूत या नरकदूत, न वर्तमान या भविष्य, न आकाश या पाताल की कोई शक्ति और न समस्त सृष्टि में कोई या कुछ हमें ईश्वर के उस प्रेम से वंचित कर सकता है, जो हमें हमारे प्रभु ईश्वर मसीह द्वारा मिला है’’ (रोमियो 8:35,38-39)।


📚 REFLECTION



In the entire bible we find God trying to establish a relationship with the humans and for this time to time God makes a covenant with the peope so that He may be our Lord and we be his people. Today’s Gospel tells us about the connection about that relationship.

In today’s gospel Jesus with a beautiful parable sets before us the connection between God and human.

Today we have the description of vine and the branches for our reflection, where telling the connection between vine and the branches Lord invites us to remain or abide in him. Let’s see what are the benefits of remaining or abiding in him- By Remaining in the Lord we will never fade, what ever we ask Lord in prayer we will receive, all the more nothing will be impossible for us as St. Paul says, “I can do all things with the help of him who strengthens me.” (Philipp.4:13).

What is the meaning of abiding in the Lord? It means to remain/abide in his teachings which tells us that we not only have to read, listen and memorize his words but to live those words, those words should reflect in our lives so that whoever comes in contact with us they may experience the living gospel. As St. James says in his letter 1:22-25, “Be doers of the word, andnotmeely hearers who deceive themselves. For if any are hearers of the word and not doers, they are like those wholook at themselvesin a mirror; for they look at themselves and, on going away, immediately forget what they were like. But those who look into the perfect law, the law of liberty, and persevere, become not hearers who forget but doers who act.”

That’s why we are called not merely for hearers but to be the doers of the word. If the word of God says love your neibhours as yourself then “let us love, not in word or speech, but in truth and action.” (1Jn 3:18)

By abiding in God, the life of God start generating in us and we become one in the Lord; and the work that God wants in this world reaches to its fulfillment through our lives. God wants to bear much fruits in this world but for that to happen in its fulfillment we all need to remain in him. Let’s pray today that we may always remain united with him as St. Paul remained. St. Paul says in his letter, “Who will separate us from the love of Christ? Will hardship, or distress, or persecution, or famine, or nakedness, or peril, or sword? For I am convinced that neither death, nor life, nor angels, nor rulers, nor things present, nor things to come, nor powers, nor height, nor depth, nor anything else in all creation, will be able to separate us from the love of God in Christ Jesus our Lord. (Romans 8:35, 38-39).



मनन-चिंतन-2


येसु ने सुसमाचार के द्वारा इस बात पर जोर डाला कि विश्वासगण विश्वास के फल उत्पन्न करे। जो विश्वास के फल उत्पन्न करता है वह पिता को प्रिय होता है तथा ऐसे विश्वासियों को पिता और अधिक कृपा प्रदान करता है। ’’वह उस डाली को जो फलती है, छाँटता है। जिससे वह और भी अधिक फल उत्पन्न करें।’’(योहन 15:02) इस प्रकार पिता उन डालियों या लोगों को विभिन्न घटनाओं और परिस्थितियों के द्वारा और अधिक सक्षम एवं योग्य बनाता है। सेवक और आर्शिफियों के दृष्टांत (देखिए मत्ती 25:14-30) द्वारा येसु इस बात को पुनः दर्शाते है कि फल उत्पन्न करना विश्वासी का मूलभूत कर्तव्य है तथा ऐसे फलदायी विश्वासियों को और अधिक दिया जाता है। ’’क्योंकि जिसके पास कुछ है, उसी को और दिया जायेगा और उसके पास बहुत हो जायेगा, लेकिन जिसके पास कुछ नहीं है, उस से वह भी ले लिया जायेगा, जो उसके पास है।’’(मत्ती 25:29) इसी परिपेक्ष्य में ईसा फलहीन अंजीर के पेड़ को सूखा देते हैं क्योंकि उसमें पत्तियॉ तो थी लेकिन फल नहीं थे। (देखिए मारकुस 11:12-14) ईसा की ये बात यही दर्शाती है कि ईश्वर हम से सदैव फल की आशा करते हैं। इसके विपरीत यदि हम किसी भी कारणवश फल पैदा नहीं करते हैं तो यह बात ईश्वर को अप्रसन्न करती है तथा हमारे विनाश का कारण बनती है। तुम अधिक फल उत्पन्न करो और तुम्हारा फल बना रहे।

हमारे फलदायी होने का रहस्य इस बात में छिपा है कि हम पिता से संयुक्त रहे। पिता से संुयक्त रहकर ही हम जीवन में विश्वास के फल उत्पन्न कर सकते हैं। जब एक छः साल के बच्चे ने पहली बार समुद्र की लहरों को देखा तो वह बहुत रोमांचित हो गया। वह उन लहरों के साथ हमेशा के लिए रहना चाहता था किन्तु यह उसके लिए संभव नहीं था। इसलिए वह उन लहरों को एक बाल्टी में भर कर अपने साथ घर पर ले आया। किन्तु बाल्टी में लहरे नहीं थी। जिस प्रकार समुद्र का पानी समुद्र से अलग होकर लहरें पैदा नहीं कर सकता उसी प्रकार हरेक विश्वासी पिता परमेश्वर से दूर रहकर कुछ भी नहीं कर सकता है। ईश्वर की आशिष ही हमारे जीवन एवं कार्यों को सफलता प्रदान करती है। इसी सच्चाई को इंगित करते हुए स्तोत्रकार कहता है, ’’यदि प्रभु ही घर नहीं बनाये, तो राजमन्त्रियों का श्रम व्यर्थ है। यदि प्रभु ही नगर की रक्षा नहीं करे, तो पहरेदार व्यर्थ जागते हैं। 2) कठोर परिश्रम की रोटी खानेवालो! तुम व्यर्थ ही सबेरे जागते और देर से सोने जाते हो....’’ (स्तोत्र 127:1-2) प्रभु भी कहते हैं, ’’....जो मुझ में रहता है और मैं जिसमें रहता हूँ वही फलता है क्योंकि मुझ से अलग रहकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।’’ (योहन 15:5)

हम प्रभु के साथ किस प्रकार जुडे रहना चाहिए जिससे हम भी फलदायी बने तथा और अधिक फल पैदा करे। प्रभु से संयुक्त रहने के लिए हमें उनकी शिक्षाओं को आत्मसात कर उसके अनुसार अपने जीवन को ढालना चाहिए। बीज के दृष्टांत के द्वारा येसु इसी सच्चाई को प्रतिपादित करते हुए बताते हैं कि वही बीज फल उत्पन्न करता है जो अच्छी भूमि में गिरा हो। इसका तात्पर्य है कि बीज को फलदायी बनने के लिए उसका अच्छी भूमि में अकुरित होकर बढना अत्यंत आवश्यक है। ’’जो अच्छी भूमि में बोये गये हैं, ये वे लोग हैं, जो वचन सुनते हैं- उसे ग्रहण करते हैं और फल लाते हैं -कोई तीस गुना, कोई साठ गुना, कोई सौ गुना।’’(मारकुस 4:20)

जब हम अपनी इच्छाओं एवं सांसारिक बातों को केन्द्र में रखकर नहीं बल्कि ईश्वर की शिक्षा के अनुसार अपने जीवन का कार्यान्वन करते हैं तथा वचन से मार्गदर्शन पाकर जीवन के छोटे-बडे निर्णय लेते हैं। तब हमारे जीवन में अनेक बदलाव आते हैं। हमारा जीवन अधिक प्रज्ञावान तथा सच्चा बन जाता है। जिस जीवन का चित्रण स्तोत्रकार करते हैं वह हमारे जीवन की सच्चाई बन जाता है, ’’मैं तेरी शिक्षा का मनन किया करता हूँ, इसलिए मैं अपने शिक्षकों से अधिक बुद्धिमान् हूँ। मैंने तेरी आज्ञाओं का पालन किया है, इसलिए मैं वयोवृद्धों से अधिक विवेकशील हूँ। तेरे नियमों का पालन करने के लिए मैं कुमार्ग से दूर रहा हूँ। मैं तेरी आज्ञाओं के मार्ग से नहीं भटका हूँ, क्योंकि तूने स्वयं मुझे शिक्षा दी है। मुँह में टपकने वाले मधु की अपेक्षा तेरी शिक्षा मेरे लिए अधिक मधुर है। तेरी आज्ञाओं से मुझे विवेक मिला, इसलिए मैं असत्य के मार्ग से घृणा करता हूँ। तेरी शिक्षा मुझे ज्योति प्रदान करती और मेरा पथ आलोकित करती है।’’ (स्तोत्र 119:99-105)

हमें भी अपने जीवन में ख्रीस्तीय विश्वास एवं सुसमाचारिय शिक्षा को जीना चाहिए जिससे हमारे स्वर्गिक पिता को माहिमा प्राप्त हो।


 Br. Biniush Topno

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1 मई, 2021 - शनिवार – पास्का का चौथा सप्ताह सन्त योसेफ श्रमिक - ऐच्छिक स्मृति

 

1 मई, 2021 - शनिवार – पास्का का चौथा सप्ताह

सन्त योसेफ श्रमिक - ऐच्छिक स्मृति

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 13:44-52

44) अगले विश्राम-दिवस नगर के प्रायः सब लोग ईश्वर का वचन सुनने के लिए इकट्ठे हो गये।

45) यहूदी इतनी बड़ी भीड़ देख कर ईर्ष्या से जल रहे थे और पौलुस की निंदा करते हुए उसकी बातों का खण्डन करते रहे।

46) पौलुस और बरनाबस ने निडर हो कर कहा, ’’यह आवश्यक था कि पहले आप लोगों को ईश्वर का वचन सुनाया जाये, परंतु आप लोग इसे अस्वीकार करते हैं और अपने को अनंत जीवन के योग्य नहीं समझते; इसलिए हम अब गैर-यहूदियों के पास जाते हैं।

47) प्रभु ने हमें यह आदेश दिया है, मैंने तुम्हें राष्ट्रों की ज्योति बना दिया हैं, जिससे तुम्हारे द्वारा मुक्ति का संदेश पृथ्वी के सीमांतों तक फैल जाये।’’

48) गैर-यहूदी यह सुन कर आनन्दित हो गये और ईश्वर के वचन की स्तृति करते रहे। जितने लोग अनंत जीवन के लिए चुने गये थे, उन्होंने विश्वास किया

49) और सारे प्रदेश में प्रभु का वचन फैल गया।

50) किंतु यहूदियों ने प्रतिष्ठित भक्त महिलाओं तथा नगर के नेताओ को उभाड़ा, पौलुस तथा बरनाबस के विरुद्ध उपद्रव खड़ा कर दिया और उन्हें अपने इलाके से निकाल दिया।

51) पौलुस और बरनाबस उन्हें चेतावनी देने के लिए अपने पैरों की धूल झाड़ कर इकोनियुम चले गये।

52) शिष्य आनन्द और पवित्र आत्मा से परिपूर्ण थे।

सुसमाचार : योहन 14:7-14


7) यदि तुम मुझे पहचानते हो, तो मेरे पिता को भी पहचानोगे। अब तो तुम लोगों ने उसे पहचाना भी है और देखा भी है।’’

8) फिलिप ने उन से कहा, ’’प्रभु! हमें पिता के दर्शन कराइये। हमारे लिये इतना ही बहुत है।’’

9) ईसा ने कहा, ’’फिलिप! मैं इतने समय तक तुम लोगों के साथ रहा, फिर भी तुमने मुझे नहीं पहचाना? जिसने मुझे देखा है उसने पिता को भी देखा है। फिर तुम यह क्या कहते हो- हमें पिता के दर्शन कराइये?’’

10) क्या तुम विश्वास नहीं करते कि मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में हैं? मैं जो शिक्षा देता हूँ वह मेरी अपनी शिक्षा नहीं है। मुझ में निवास करने वाला पिता मेरे द्वारा अपने महान कार्य संपन्न करता है।

11) मेरी इस बात पर विश्वास करो कि मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में हैं, नहीं तो उन महान कार्यों के कारण ही इस बात पर विश्वास करो।

12) मैं तुम लोगो से यह कहता हूँ जो मुझ में सिवश्वास करता है, वह स्वयं वे कार्य करेगा, जिन्हें मैं करता हूँ। वह उन से भी महान कार्य करेगा। क्योंकि मैं पिता के पास जा रहा हूँ।

13) तुम मेरा नाम ले कर जो कुछ माँगोगे, मैं तुम्हें वही प्रदान करूँगा, जिससे पुत्र के द्वारा पिता की महिमा प्रकट हो।

14) यदि तुम मेरा नाम लेकर मुझ से कुछ भी माँगोगें, तो मैं तुम्हें वही प्रदान करूँगा।


श्रमिक संत यूसुफ़

पहला पाठ: उत्पत्ति 1:26-2:3


26) ईश्वर ने कहा, ''हम मनुष्य को अपना प्रतिरूप बनायें, यह हमारे सदृश हो। वह समुद्र की मछलियों, आकाश के पक्षियों घरेलू और जंगली जानवरों और जमीन पर रेंगने वाले सब जीवजन्तुओं पर शासन करें।''

27) ईश्वर ने मनुष्य को अपना प्रतिरूप बनाया; उसने उसे ईश्वर का प्रतिरूप बनाया; उसने नर और नारी के रूप में उनकी सृष्टि की।

28) ईश्वर ने यह कह कर उन्हें आशीर्वाद दिया, ''फलोफूलो। पृथ्वी पर फैल जाओ और उसे अपने अधीन कर लो। समुद्र की मछलियों, आकाश के पक्षियों और पृथ्वी पर विचरने वाले सब जीवजन्तुओं पर शासन करो।''

29) ईश्वर ने कहा, मैं तुम को पृथ्वी भर के बीज पैदा करने वाले सब पौधे और बीजदार फल देने वाले सब पेड़ देता हूँ। वह तुम्हारा भोजन होगा। मैं सब जंगली जानवरों को, आकाश के सब पक्षियों को,

30) पृथ्वी पर विचरने वाले जीवजन्तुओं को उनके भोजन के लिए पौधों की हरियाली देता हूँ'' और ऐसा ही हुआ।

31) ईश्वर ने अपने द्वारा बनाया हुआ सब कुछ देखा और यह उसको अच्छा लगा। सन्ध्या हुई और फिर भोर हुआ यह छठा दिन था।

1) ईश्वर ने जिन जंगली जीव-जन्तुओं को बनाया था, उन में साँप सब से धूर्त था। उसने स्त्री से कहा, ''क्या ईश्वर ने सचमुच तुम को मना किया कि वाटिका के किसी वृक्ष का फल मत खाना''?

2) स्त्री ने साँप को उत्तर दिया, ''हम वाटिका के वृक्षों के फल खा सकते हैं।

3) परन्तु वाटिका के बीचोंबीच वाले वृक्ष के फलों के विषय में ईश्वर ने यह कहा - तुम उन्हें नहीं खाना। उनका स्पर्श तक नहीं करना, नहीं तो मर जाओगे।''


अथवा - पहला पाठ: कलोसियों 3:14-15, 17, 23-24


14) इसके अतिरिक्त, आपस में प्रेम-भाव बनाये रखें। वह सब कुछ एकता में बाँध कर पूर्णता तक पहुँचा देता है।

15) मसीह की शान्ति आपके हृदय में राज्य करे। इसी शान्ति के लिए आप लोग, एक शरीर के अंग बन कर, बुलाये गये हैं। आप लोग कृतज्ञ बने रहें।

17) आप जो भी कहें या करें, वह सब प्रभु ईसा के नाम पर किया करें। आप लोग उन्हीं के द्वारा पिता-परमेश्वर को धन्यवाद देते रहें।

23) आप लोग जो भी काम करें, मन लगा कर करें, मानों मनुष्यों के लिए नहीं, बल्कि प्रभु के लिए काम कर रहे हों;

24) क्योंकि आप जानते हैं कि प्रभु पुरस्कार के रूप में आप को विरासत प्रदान करेगा। आप लोग प्रभु के दास हैं।


सुसमाचार : मत्ती 13:54-58


54) वे अपने नगर आये, जहाँ वे लोगों को उनके सभागृह में शिक्षा देते थे। वे अचम्भे में पड़ कर कहते थे, "इसे यह ज्ञान और यह सामर्थ्य कहाँ से मिला?

55) क्या यह बढ़ई का बेटा नहीं है? क्या मरियम इसकी माँ नहीं? क्या याकूब, यूसुफ़, सिमोन और यूदस इसके भाई नहीं?

56) क्या इसकी सब बहनें हमारे बीच नहीं रहतीं? तो यह सब इसे कहाँ से मिला?"

57) पर वे ईसा में विश्वास नहीं कर सके। ईसा ने उन से कहा, "अपने नगर और अपने घर में नबी का आदर नहीं होता।"

58) लोगों के अविश्वास के कारण उन्होंने वहाँ बहुत कम चमत्कार दिखाये।


📚 मनन-चिंतन


संत युसूफ- जिन्होने मरियम, येसु और ईश्वर की योजना के लिए अपना सुख और जीवन को न्योछावर कर दिया उनका आज हम सम्पूर्ण कलिसिया के साथ मिलकर श्रमिक संत के रूप में पर्व मनाते है। यह पर्व हमारे लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संत पिता फ्रांसिस ने यह वर्ष संत युसूफ के वर्ष के रूप मंे घोषित किया है।

संत युसूफ न केवल पवित्र परिवार के रक्षक रहे है अपितु वे विश्वव्यापि कलीसिया के संरक्षक भी है। आज सम्पूर्ण कलीसिया श्रमिक संत युसूफ का पर्व मनाती है। यह पर्व हमारे समक्ष संत युसूफ के सभी गुणों में से एक- कर्मठता के गुण को विशेष रूप से प्रकट करता है।

संत युसूफ एक मेहनती संत है जिन्होनें अपने परिवार को आगे बढ़ाने के लिए न केवल आध्यात्मिक रूप से परंतु शारीरिक रूप से मेहनत और कार्य किया। वे एक बढ़ाई थे और उन्होने अपना कार्य बहुत श्रद्धापूर्वक और ईमानदारी से किया। उनका जीवन उनके परिवार के प्रति समर्पित जीवन था।

संत युसूफ हम सभी के लिए एक प्रेरणा है जो हमें बताते है कि किस प्रकार हम धर्मी होने के साथ साथ कर्मठ व्यक्ति भी हो सकते है। संत युसूफ के बचपन के विषय में हम ज्यादा नहीं जानते परंतु हम उनको येसु के जन्म के घटनाओं के बीच में एक धर्मी और रक्षक पिता के रूप में जानते है। संत युसूफ पवित्र परिवार के आदर्श पिता है। मेहनत और परिश्रम करने वाले व्यक्तियों के लिए भी संत युसूफ एक आदर्श है।

आज के इस पर्व के दिन हमे अपने परिवारों के लिए प्रार्थना करें विशेष करके परिवार के मुखिया के लिए जो अपने श्रम और बलिदान द्वारा परिवार का पालन पोषण एवं हर खतरों से बचाने के लिए अपना जीवन अर्पित करते है। संत युसूफ उन सभी पिताओं को आदर्श पिता के रूप में आशीष दें। आमेन!



📚 REFLECTION



Today we are celebratin the feast of St. Joseph-the worker, who surrendered his life and happiness for the sake of Mary, Jesus and for the plan of God. This feast is all the more important for us as this year is being declared as the year of St. Joseph by Pope Francis.

St. Joseph was not only the protector of the Holy family but He is also the Patron of the Universal Church. Today that Universal Catholic Church celebrates the feast of St. Joseph-the worker. This feast highlights the value of hard work or diligence of St. Joseph among the many other values.

St. Joseph is a hard working Saint who worked hard not only in spiritual level but also in physical level to bring forth his family. He was a carpenter and he did his work with full dedication and honesty. His life was the life surrendered for his family.

St. Joseph is an inspiration for all of us who teaches us that a person can be hard working along with the righteousness quality in him/her. We do not know much about his childhood life but we come to know him as a righteous man and the protector of his family in the midst of the event of Jesus’ birth. St. Joseph is an ideal Father of the Holy Family. St. Joseph is an ideal for the people who do hard work in their lives.

In today’s feast let us pray for our family especially for the leader of the family, who through the hard work and sacrifices upbrings the family and offers his life for the protection of his family. May St. Joseph bless all those fathers as the ideal fathers.

 -Br. Biniush Topno


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आज का पवित्र वचन शुक्रवार - 30 अप्रैल 2021

 

शुक्रवार - 30 अप्रैल 2021




पहला पाठ : प्रेरित-चरित 13:26-33


26) ’’भाइयों! इब्राहीम के वंशजों और यहाँ उपस्थित ईश्वर के भक्तों! मुक्ति का यह संदेश हम सबों के पास भेजा गया है।

27) येरुसालेम के निवासियों तथा उनके शासकों ने ईसा को नहीं पहचाना। उन्हें दण्डाज्ञा दिला कर उन्होंने अनजाने ही नबियों के वे कथन पूरे कर दिये, जो प्रत्येक विश्राम-दिवस को पढ़ कर सुनाये जाते हैं।

28) उन्हें प्राणदण्ड के योग्य कोई दोष उन में नहीं मिला, फिर भी उन्होंने पिलातुस से अनुरोध किया कि उनका वध किया जाये।

29) उन्होंने उनके विषय में जो कुछ लिखा है, वह सब पूरा करने के बाद उन्हें क्रूस के काठ से उतारा और कब्र में रख दिया।

30) ईश्वर ने उन्हें तीसरे दिन मृतकों में से पुनर्जीवित किया

31) और वह बहुत दिनों तक उन लोगों को दर्शन देते रहे, जो उनके साथ गलीलिया से येरुसालेम आये थे। अब वे ही जनता के सामने उनके साक्षी हैं।

32) हम आप लोगों का यह सुसमाचार सुनाते हैं कि ईश्वर ने हमारे पूर्वजों से जो प्रतिज्ञा की थी।

33) उसे उनकी संतति के लिए अर्थात् हमारे लिए पूरा किया है। उसने ईसा को पुनर्जीवित किया है, जैसा कि द्वितीय स्तोत्र में लिखा है, तुम मेरे पुत्र हो। आज मैंने तुम को उत्पन्न किया हैं।


सुसमाचार : योहन 14:1-6


1) तुम्हारा जी घबराये नहीं। ईश्वर में विश्वास करो और मुझ में भी विश्वास करो!

2) मेरे पिता के यहाँ बहुत से निवास स्थान हैं। यदि ऐसा नहीं होता, तो मैं तुम्हें बता देता क्योंकि मैं तुम्हारे लिये स्थान का प्रबंध करने जाता हूँ।

3) मैं वहाँ जाकर तुम्हारे लिये स्थान का प्रबन्ध करने के बाद फिर आऊँगा और तुम्हें अपने यहाँ ले जाउँगा, जिससे जहाँ मैं हूँ, वहाँ तुम भी रहो।

4) मैं जहाँ जा रहा हूँ, तुम वहाँ का मार्ग जानते हो।

5 थोमस ने उन से कहा, ’’प्रभु! हम यह भी नहीं जानते कि आप कहाँ जा रहे हैं, तो वहाँ का मार्ग कैसे जान सकते हैं?’’

6) ईसा ने उस से कहा, ’’मार्ग सत्य और जीवन मैं हूँ। मुझ से हो कर गये बिना कोई पिता के पास नहीं आ सकता।’’


📚 मनन-चिंतन


प्रभु येसु प्रतिज्ञात मुक्तिदाता एवं मसीह थे जिन्हें ईश्वर ने भेजा था। किन्तु जिन लोगों को उनका स्वागत करना था उन्होंने ने ही उन्हें को क्रूस पर चढाकर मार डाला। उन्होंने उन्हें पहचाना नहीं तथा अपने अज्ञान में उन्हें मार डाला। वे शायद ऐसे मसीह की राह देख रहे थे जो उन्हें रोमियों से मुक्ति दिला कर राजनैतिक सत्ता को उलटफेर दे।

उनके इस कुकर्म और अज्ञान का कारण यह था कि उन्होंने धर्मग्रंथ में दी गयी नबियों की वाणियों पर ध्यान जिन्हें उनके सभागृहों हर विश्राम दिवस को पढकर सुनाई जाती थी। (13:27) उन्होंने वचन को सुना पर समझे नहीं। येसु उनके इसी पाखण्ड को दिखाते हुये कहते हैं, ’’तुम लोग यह समझ कर धम्रग्रन्थ का अनुशीलन करते हो कि उस में तुम्हें अनन्त जीवन का मार्ग मिलेगा। वही धर्मग्रन्ध मेरे विषय में साक्ष्य देता है, फिर भी तुम लोग जीवन प्राप्त करने के लिए मेरे पास आना नहीं चाहते।’’ (योहन 5:39-40)

धर्मग्रंथ को जानता तथा उसे समझना दो अलग-अलग बातें हैं। वचन को जानने के लिये हमें मनुष्य के प्रयासों की जरूरत पडती है किन्तु उसे समझने के लिये ईश्वर की सहायता की आवश्यकता महसूस होती है क्योंकि वे ईश-वचन है जिन्हें केवल ईश्वर ही समझा सकता है। वचन को समझने के हमें अपने पूर्वाग्रहों तथा मानसिक-व्यवस्ता से परे जाना होगा। हमें वचन को खुले दिल से समझना चाहिये जिससे वह जो हमें बनाना चाहता है वह भले ही हमारे आशाओं के विपरीत हो क्यों न हो हम समझ सके। यदि हम किसी विचार को लेकर जडवत बने रहते हैं ईश्वर वचन हमारे लिये नये द्वार नहीं खोल सकता क्योंकि हम अपने आप को ईश्वर की योजना अनुरूप बदलना ही नहीं चाहते हैं।

यहूदियों की भी यही दशा थी। उनके विचार में मसीह का आगमन एक भव्य एवं शानदार घटना होगी जिसे देखकर सभी भौंचके हो जायेगे तथा राजनैतिक सत्ता परिवर्तन करेंगे। वे अपने घमण्ड में इतने चूर थे कि वे यह भी नहीं जानते थे वे मसीह को ग्रहण करने के अयोग्य है। येसु उनकी स्थिति को बताते हुये कहते हैं, ’’तुम सुनते रहोगे, परन्तु नहीं समझोगे। तुम देखते रहोगे, परन्तु तुम्हें नहीं दिखेगा, क्योंकि इन लोगों की बुद्धि मारी गई है। ये कानों से सुनना नहीं चाहतेय इन्होंने अपनी आँख बंद कर ली हैं। कहीं ऐसा न हो कि ये आँखों से देख ले, कानों से सुन लें, बुद्धि से समझ लें, मेरी ओर लौट आयें और मैं इन्हें भला चंगा कर दूँ। (मत्ती 13:14-15)

हमारे जीवन में भी हम बाइबिल पढते तथा उसका अर्थ अपने जीवन में ढुंढते है। हमें उन उपायों के बारे में सोचते है जो हमारी कल्पना के दायरे में है। किन्तु हमारी कल्पना के कहीं अधिर महान है तथा वे हमारे क्षणिक सुख के लिये नहीं वरन् स्थायी सुख और कल्याण के लिये योजना बनाता है। आइये हम भी ईशवचन को खुले और सरल हृदय से ग्रहण करे।



📚 REFLECTION



Although Jesus was the promised Saviour and Messiah God had sent yet he was rejected and killed by the very people who should have welcomed him. They rejected Jesus because they did not recognise Him when he came. They were perhaps looking for a political Messiah who would deliver them from Roman domination.

The reason they didn’t recognize Him is that they did not hear the voices of the prophets who spoke to them every Sabbath as God’s Word was read aloud (13:27). They heard the words but they did not understand it. As Jesus fittingly rebuked them, “You search the Scriptures because you think that in them you have eternal life; it is these that testify about Me; and you are unwilling to come to Me so that you may have life” (John 5:39-40).

Knowing the scripture and understanding it are two different things. By our human effort we can learn it but to understand we need God’s help as they are his own words. To receive this understanding one must be freed of his own pre-conception and pre-occupation. We need to be open to what the word of God could mean and relate to our life beyond our expectation. If we remain fixed on certain ideas then the unfolding of the word of would not take place. Jews were firm believers in the word of God but were also a closed people. Their ideas were fixed that Messiah would be a political and a macho man who would overthrow the Romans and installed the Jewish rule. His advent would be a spectacular event and so on and so forth. They could never imagine that they themselves were not fit to receive him. The fittingly summed up their plight, “You will keep on hearing, but will not understand; you will keep on seeing, but will not perceive; for the heart of this people has become dull, with their ears they scarcely hear, and they have closed their eyes, otherwise they would see with their eyes, hear with their ears, and understand with their heart and return, and I would heal them” (Matt. 13:14-15).

In our life’s too we read Bible and search of its meaning in our life. We look for solution that is suitable and imaginable to us but God is beyond our intellect and he looks for lasting good and welfare of us. Hence let us read and receive the word with an open and simple heart.

 -Br. Biniush Topno


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आज का पवित्र वचन गुरुवार - 29 अप्रैल 2021

 

गुरुवार - 29 अप्रैल 2021

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 13:13-25


13) पौलुस और उसके साथी नाव से चल कर पाफ़ोस से पम्फुलिया के पेरगे पहुँचे। वहाँ योहन उन्हें छोड़ कर येरुसालेम लौट गया।

14) पौलुस और बरनाबस पेरगे से आगे बढ़ कर पिसिदिया के अंताखिया पहुँचे। वे विश्राम के दिन सभागृह में जा कर बैठ गये।

15) संहिता तथा नबियों का पाठ समाप्त हो जाने पर सभागृह के अधिकारियों ने उन्हें यह कहला भेजा, ’’भाइयों! यदि आप प्रवचन के रूप में जनता से कुछ कहना चाहें, तो कहिए’’।

16) इस पर पौलुस खड़़ा हो गया और हाथ से उन्हें चुप रहने का संकेत कर बोलाः ’’इस्राएली भाइयो और ईश्वर-भक्त सज्जनो! सुनिए।

17) इस्राएली प्रजा के ईश्वर ने हमारे पूर्वजों को चुना, उन्हें मिस्र देश में प्रवास के समय महान बनाया और वह अपने बाहुबल से उन्हें वहाँ से निकाल लाया।

18) उसने चालीस बरस तक मरूभूमि में उनकी देखभाल की।

19) इसके बाद उसने कनान देश में सात राष्ट्रों को नष्ट किया और उनकी भूमि हमारे पूर्वजों के अधिकार में दे दी।

20) लगभग साढ़े चार सौ वर्ष बाद वह उनके लिए न्यायकर्ताओं को नियुक्त करने लगा और नबी समूएल के समय तक ऐसा करता रहा।

21) तब उन्होंने अपने लिए एक राजा की माँग की और ईश्वर ने उन्हें बेनयामीनवंशी कीस के पुत्र साऊल को प्रदान किया, जो चालीस वर्ष तक राज्य करता रहा

22) इसके बाद ईश्वर ने दाऊद को उनका राजा बनाया और उनके विषय में यह साक्ष्य दिया- मुझे अपने मन के अनुकूल एक मनुष्य, येस्से का पुत्र दाऊद मिल गया है। वह मेरी सभी इच्छाएँ पूरी करेगा।

23) ईश्वर ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार उन्हीं दाऊद के वंश में इस्राएल के लिए एक मुक्तिदाता अर्थात् ईसा को उत्पन्न किया हैं।

24) उनके आगमन से पहले अग्रदूत योहन ने इस्राएल की सारी प्रजा को पश्चाताप के बपतिस्मा का उपदेश दिया था।

25) अपना जीवन-कार्य पूरा करते समय योहन ने कहा, ’तुम लोग मुझे जो समझते हो, मैं वह नहीं हूँ। किंतु देखो, मेरे बाद वह आने वाले हैं, जिनके चरणों के जूते खोलने योग्य भी मैं नहीं हूँ।’


सुसमाचार : योहन 13:16-20


16) मैं तुम से यह कहता हूँ- सेवक अपने स्वामी से बड़ा नहीं होता और न भेजा हुआ उस से, जिसने उसे भेजा।

17) यदि तुम ये बातें समझकर उनके अनुसार आचरण करोगे, तो धन्य होंगे।

18) मैं तुम सबों के विषय में यह नहीं कह रहा हूँ। मैं जानता हूँ कि मैंने किन-किन लोगों को चुना है; परन्तु यह इसलिये हुआ कि धर्मग्रंथ का यह कथन पूरा हो जाये: जो मेरी रोटी खाता है, उसने मुझे लंगी मारी हैं।

19) अब मैं तुम्हें पहले ही यह बताता हूँ जिससे ऐसा हो जाने पर तुम विश्वास करो कि मैं वही हूँ।

20) मैं तुम से यह कहता हूँ- जो मेरे भेजे हुये का स्वागत करता है, वह मेरा स्वागत करता है और जो मेरा स्वागत करता है, वह उसका स्वागत करता है जिसने मुझे भेजा।


📚 मनन-चिंतन


जब सभागृह के अधिकारी ने पौलुस को जनता से प्रवचन देने का अनुरोध किया तो उन्होंने इस्राएल के मुक्ति के इतिहास को दोहराया। ईश्वर ने इस प्रक्रिया की शुरूआत को इब्राहिम, इसहाक और याकूब को चुनकर आगे बढाया। यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने ईश्वर को नहीं चुना था किन्तु ईश्वर ने उन्हें चुना था। फिर ईश्वर ने उन्हें मिस्र देश में फलने-फूलने दिया तथा बाद में वहां की गुलामी से मुक्त करा कर उन्हें एक राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। ईश्वर ने सात देशों को नष्ट कर उनके लिये स्थान तैयार किया। उसने उनके लिये न्यायकर्ताओं, नबियों तथा राजा को नियुक्त किया। दाउद जो उनके इतिहास के सबसे गौरवशाली पुरूषों में से है, के वंश से एक मसीह की प्रतिज्ञा की। और अंत में योहन बपतिस्ता ने येसु मसीह के आगमन की घोषणा की।

ये घटनायें सारे इतिहास विशेषकरके मुक्ति के इतिहास पर ईश्वर के प्रभुत्व को बताती है। ईश्वर ने इस्राएल को चुना तथा स्थापित किया। इस कार्य का लक्ष्य तथा पराकाष्ठा प्रभु येसु है। ऐफिसियों के नाम पत्र में संत पौलुस लिखते हैं, ’’उसने अपनी मंगलमय इच्छा के अनुसार निश्चय किया था कि वह समय पूरा हो जाने पर स्वर्ग तथा पृथ्वी में जो कुछ है, वह सब मसीह के अधीन कर एकता में बाँध देगा। उसने अपने संकल्प का यह रहस्य हम पर प्रकट किया है।’’(ऐफेसिया 1:11) जो भी व्यक्ति येसु की सार्वभौमिकता एवं ईश्वत्व को नही मानता वह ईश्वर का नहीं हो सकता है। पुराने विधान का मुख्य उददेश्य भविष्य में आने वाले मसीह की प्रतिज्ञा तथा उन्हें चिन्हित करना था। मसीह नबियों की सभी भविष्यवाणियों का सच तथा अनुग्रह की परिपूर्णता है। ईश्वन ने अपनी चुनी प्रजा से मुक्तिदाता भेजने की प्रतिज्ञा की थी और वह प्रतिज्ञात मुक्तिदाता, दाउद के पुत्र, हमारे प्रभु ईसा मसीह है।



📚 REFLECTION



When Paul was invited by the synagogue president to speak a message of God, he chose to narrate the salvation history of Israel. God began the process by choosing Abraham, Isaac, and Jacob. It was not their choice of God, but God’s choice of them, that is significant. Then, God made them flourished in Egypt and set them free from the slavery, brought them out and established them as a nation. He destroyed seven nations to make a place for them. He provided them judges, prophets and the kings to rule over them. From David, one of the most distinguished personalities, he promised them a Messiah. It was John the Baptist who welcomed Jesus in most humble manner.

It shows God and His sovereignty over all of history, especially the history of salvation. it was God who took initiative in choosing and establishing Israel.

However,the goal and culmination of history is the Jesus Christ. God purposed to sum up all things in heaven and earth in Christ (Eph. 1:11). “All things have been created through Him and for Him. He is before all things, and in Him all things hold together. He is also head of the body, the church; and He is the beginning, the firstborn from the dead, so that He Himself will come to have first place in everything”.

Anyone denies the centrality and supremacy of Jesus Christ is not from God. All of the Old Testament was written to point forward to Jesus Christ. He is thefulfilment of prophecies and fulness of grace.God graciously promised His chosen people to send a Saviour, and that Jesus, the son of David, is that promised Saviour.

 -Br. Biniush Topno


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आज का पवित्र वचन बुधवार - 28 अप्रैल 2021

 

बुधवार - 28 अप्रैल 2021

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 12:24-13:5


12:24) ईश्वर का वचन बढ़ता और फैलता गया।

25) बनाराबस और साऊल अपना सेवा-कार्य पूरा कर येरुसालेम से लौटे और अपने साथ योहन को ले आये, जो मारकुस कहलाता था।

13:1) अंताखिया की कलीसिया में कई नबी और शिक्षक थे- जैसे बरनाबस, सिमेयोन, जो नीगेर कहलाता था, लुकियुस कुरेनी, राजा हेरोद का दूध-भाई मनाहेन और साऊल।

2) वे किसी दिन उपवास करते हुए प्रभु की उपासना कर ही रहे थे कि पवित्र आत्मा ने कहा, ’’मैंने बरनाबस तथा साऊल को एक विशेष कार्य के लिए निर्दिष्ट किया हैं। उन्हें मेरे लिए अलग कर दो।’’

3) इसलिए उपवास तथा प्रार्थना समाप्त करने के बाद उन्होंने बरनाबस तथा साऊल पर हाथ रखे और उन्हें जाने की अनुमति दे देी।

4) पवित्र आत्मा द्वारा भेजे हुए बरनाबस और साऊल सिलूकिया गये और वहाँ से वे नाव पर क्रुप्रुस चले।

5) सलमिस पहुँच कर वे यहूदियों के सभागृहों में ईश्वर के वचन का प्रचार करते रहे। योहन भी उनके साथ रह कर उनकी सहयता करता था।



सुसमाचार : योहन 12:44-50



45) और जो मुझे देखता है, वह उस को देखता है जिसने मुझे भेजा।

46) मैं ज्योति बन कर संसार में आया हूँ, जिससे जो मुझ में विश्वास करता हैं वह अन्धकार में नहीं रहे।

47) यदि कोई मेरी शिक्षा सुनकर उस पर नहीं चलता, तो मैं उसे दोषी नही ठहराता हूँ क्योंकि मैं संसार को दोषी ठहराने नहीं, संसार का उद्वार करने आया हूँ।

48) जो मेरा तिरस्कार करता और मेरी शिक्षा ग्रहण करने से इंकार करता है, वह अवश्य ही दोषी ठहराया जायेगा। जो शिक्षा मैंने दी है, वही उसे अंतिम दिन दोषी ठहरा देगी।

49) मैनें अपनी ओर से कुछ नहीं कहा। पिता ने जिसने मुझे भेजा, आदेश दिया है कि मुझे क्या कहना और कैसे बोलना है।

50) मैं जानता हूँ कि उसका आदेश अनंत जीवन है। इसलिये मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे वैसे ही कहता हूँ जैसे पिता ने मुझ से कहा है।


📚 मनन-चिंतन


आज का पहला पाठ कलीसिया के नेताओं के पवित्र और धर्मपरायण चरित्र के बारे में प्रकाश डालता है। हम पाते हैं वे सभी पवित्र, आज्ञाकारी तथा प्रार्थनामय नेता थे। उनका चरित्र धार्मिक था। प्रार्थना के दौरान ईश्वर हम से व्यक्तिगत रूप से बातें करते तथा उनकी योजना एवं उददेश्यों को हम पर प्रकट करते हैं। प्रार्थना तथा उपवास एक धार्मिक व्यक्ति की मूलभूत दिनचर्या होती है। यह मनुष्य की ईश्वर के प्रति गहरायी को प्रकट करता है। प्रभु येसु ने स्वयं अनेक बार प्रार्थना करने की जरूरत पर जोर डाला तथा अनेक बार वे स्वयं भी प्रार्थना में लीन पाये गये। येसु ने उनके जीवन की मुख्य घटनाओं के पहले अत्यंत त्रीवता के साथ प्रार्थना की।

जब साउल और बरनाबस अन्यों के साथ मिलकर प्रार्थना तथा उपवास रखकर ईश्वर की उपासना कर रहे थे तो पवित्र आत्मा ने उन्हें यह कहकर निर्देशित किया, ’’मैंने बरनाबस और साउल को एक विशेष कार्य के लिये निर्दिष्ट किया है। उन्हें मेरे लिये अलग कर दो।’’ उन नेताओं की विशिष्ट योजना नहीं थी किन्तु इस प्रकार उन्होंने जाना कि ईश्वर की उनके लिये एक योजना है। उस योजना के तहत उन्होंने स्वेच्छा तथा शीघ्रता से ईश्वर के निर्देश का पालन किया। उनकी यह शीघ्रता तथा स्वेच्छा उनके धार्मिक चरित्र का चिन्ह है।

बरनाबस और साउल तत्कालीन कलीसिया के दो सबसे प्रमुख व्यक्तियों में थे तथा ईश्वर ने उन्हंछ मिशनरी यात्रा में भेजा। उनके इस प्रकार अचानक चले जाने से वहां की स्थानीय कलीसिया को गहरा दुख और खालीपन महसूस हुआ होगा लेकिन उन्होंने बिना किसी हिचक और विरोध के, आत्मा के निर्देशों का पालन किया तथा अपने इन दोनों महान हस्तियों को अंताखिया से बाहर जाने दिया। पवित्र आत्मा के प्रति आज्ञापालन बनने के लिये हमें ईश्वर की आराधना करने के लिये समय निकालना चाहिये तथा उनका निर्देशन ढूंढना चाहिये।




📚 REFLECTION



Today’s first reading tells us about the godly characteristics of the leaders of the churches. It tells that all of them were very pious, obedient and praying leaders. They had a godly character. It is while praying that God speaks to us more personally and reveals his plans and purposes to and for us. Prayer and fasting are basic habits of a godly persons. They reveal the depth a person has with God. Lord Jesus several times mentioned the needs for prayers and he himself was found praying many times. He prayed intensely before all the major events of his life.

While Saul and Barnabas along with others were worshiping the Lord in prayer and fasting,the Holy Spirit speaks to them and directs them about Saul and Barnabas. “Set apart for me Barnabas and Saul for the work to which I have called them.” While they apparently had no specific plan for themselves but God had for them. They experienced God’s will and willingly and promptly responded to it. It yet again points out godliness of the them as they were so willing and prompt to obey the Lord’s commands.

Barnabas and Saul were two of the most important men in that church, and God sent them out on this missionary journey. Their sudden going must have given a deep sense of loss to the church there but without a word of protest, the church obeyed the Spirit’s directive and released these gifted men for ministry outside of Antioch.To be obedient to the Holy Spirit, wemust take time to worship God and seek His direction.

 -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!