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18 जनवरी 2022, मंगलवार

 

18 जनवरी 2022, मंगलवार

सामान्य काल का दूसरा सप्ताह

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📒 पहला पाठ: समुएल का पहला ग्रन्थ 16:1-13

1) प्रभु ने समूएल से कहा, ‘‘तुम कब तक उस साऊल के कारण शोक मनाते रहोगे, जिसे मैंने इस्राएल के राजा के रूप में अस्वीकार किया है? तुम सींग में तेल भर कर जाओ। मैं तुम्हें बेथलेहेम-निवासी यिशय के यहाँ भेजता हूँ, क्योंकि मैंने उसके पुत्रों में एक को राजा चुना है।"

2) समूएल ने यह उत्तर दिया, ‘‘मैं कैसे जा सकता हूँ? साऊल को इसका पता चलेगा और वह मुझे मार डालेगा।’’ इस पर प्रभु ने कहा, ‘‘अपने साथ एक कलोर ले जाओ और यह कहो कि मैं प्रभु को बलि चढ़ाने आया हूँ।

3) यज्ञ के लिए यिशय को निमन्त्रण दो। मैं बाद में तुम्हें बताऊँगा कि तुम्हें क्या करना है- मैं जिसे तुम्हें दिखाऊँगा, उसी को मेरी ओर से अभिशेक करोगे।’’

4) प्रभु ने जो कहा था, समूएल ने वही किया। जब वह बेथलेहेम पहुँचा, तो नगर के अधिकारी घबरा कर उसके पास दौडे़ आये और बोले, ‘‘कैसे पधारे? कुशल तो है?’’

5) समूएल ने कहा, ‘‘सब कुशल है। मैं प्रभु को बलि चढ़ाने आया हूँ। अपने को शुद्ध करो और मेरे साथ बलि चढ़ाने आओ।’’ उसने यिशय और उसके पुत्रों को शुद्ध किया और उन्हें यज्ञ के लिए निमन्त्रण दिया।

6) जब वे आये और समूएल ने एलीआब को देखा, तो वह यह सोचने लगा कि निश्चय ही यही ईश्वर का अभिषिक्त है।

7) परन्तु ईश्वर ने समूएल से कहा, ‘‘उसके रूप-रंग और लम्बे क़द का ध्यान न रखो। मैं उसे नहीं चाहता। प्रभु मनुष्य की तरह विचार नहीं करता। मनुष्य तो बाहरी रूप-रंग देखता है, किन्तु प्रभु हृदय देखता है।’’

8) यिशय ने अबीनादाब को बुला कर उसे समूएल के सामने उपस्थित किया। समूएल ने कहा, ‘‘प्रभु ने उसे को भी नहीं चुना।’’

9) तब यिशय ने शम्मा को उपस्थित किया, किन्तु समूएल ने कहा, ‘‘प्रभु ने उस को भी नहीं चुना।’’

10) इस प्रकार यिशय ने अपने सात पुत्रों को समूएल के सामने उपस्थित किया। किन्तु समूएल ने यिशय से कहा, ‘‘प्रभु ने उन में किसी को भी नहीं चुना।’’

11) उसने यिशय से पूछा, ‘‘क्या तुम्हारे पुत्र इतने ही है? ’’यिशय ने उत्तर दिया, ‘‘सब से छोटा यहाँ नहीं है। वह भेडे़ चरा रहा है।‘‘ तब समूएल ने यिशय से कहा, ‘‘उसे बुला भेजो। जब तक वह नहीं आयेगा, हम भोजन पर नहीं बैठेंगे।’’

12) इसलिए यिशय ने उसे बुला भेजा। लड़के का रंग गुलाबी, उसकी आँखें सुन्दर और उसका शरीर सुडौल था। ईश्वर ने समूएल से कहा, ‘‘उठो, इसका अभिशेक करो। यह वही है।’’

13) समूएल ने तेल का सींग हाथ में ले लिया और उसके भाइयों के सामने उसका अभिशेक किया। ईश्वर का आत्मा दाऊद पर छा गया और उसी दिन से उसके साथ विद्यमान रहा। समूएल लौट कर रामा चल दिया।

📙 सुसमाचार : सन्त मारकुस 2:23-28

23) ईसा किसी विश्राम के दिन गेहूँ के खे़तों से हो कर जा रहे थे। उनके शिष्य राह चलते बालें तोड़ने लगे।

24) फ़रीसियों ने ईसा से कहा, ’’देखिए, जो काम विश्राम के दिन मना है, ये क्यों वही कर रहे हैं?’’

25) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, ’’क्या तुम लोगों ने कभी यह नहीं पढ़ा कि जब दाऊद और उनके साथी भूखे थे और खाने को उनके पास कुछ नहीं था, तो दाऊद ने क्या किया था?

26) उन्होंने महायाजक अबियाथार के समय ईश-मन्दिर में प्रवेश कर भेंट की रोटियाँ खायीं और अपने साथियों को भी खिलायीं। याजकों को छोड़ किसी और को उन्हें खाने की आज्ञा तो नहीं थी।’’

27) ईसा ने उन से कहा, ’’विश्राम-दिवस मनुष्य के लिए बना है, न कि मनुष्य विश्राम-दिवस के लिए।

28) इसलिए मानव पुत्र विश्राम-दिवस का भी स्वामी है।’’

📚 मनन-चिंतन

फरीसियों को क्रोधित करने वाली एक बात यह थी कि येसु ने विश्राम दिवस के नियमों को तोड़ा। फरीसियों ने विश्राम दिवस के नियमों की व्याख्या बहुत ही संकीर्ण तरीके से की थी। येसु चाहते थे कि वे समझें कि ईश्वर की आज्ञाएँ मनुष्य के लाभ और कल्याण के लिए हैं। हमारे प्रभु चाहते हैं कि हम सुखी रहें। कानूनों का इस्तेमाल इंसानों पर अत्याचार करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। इसके विपरीत येसु कहते हैं, “थके-माँदे और बोझ से दबे हुए लोगो! तुम सभी मेरे पास आओ। मैं तुम्हें विश्राम दूँगा। मेरा जूआ अपने ऊपर ले लो और मुझ से सीखो। मैं स्वभाव से नम्र और विनीत हूँ। इस तरह तुम अपनी आत्मा के लिए शान्ति पाओगे, क्योंकि मेरा जूआ सहज है और मेरा बोझ हल्का।" (मत्ती 11:28-30)। प्रभु में, हमें आराम, सांत्वना और आनंद पाना चाहिए।


📚 REFLECTION

One of the things that angered the Pharisees was that Jesus broke the Sabbath laws. The Pharisees had interpreted the Sabbath laws in a very narrow and ritualistic way. Jesus wanted them to understand that the commandments of God were meant for the benefit and welfare of human beings. Our Lord wants us to be happy. The laws were not meant to be used to oppress human beings. On the contrary Jesus says, “Come to me, all you that are weary and are carrying heavy burdens, and I will give you rest. Take my yoke upon you, and learn from me; for I am gentle and humble in heart, and you will find rest for your souls. For my yoke is easy, and my burden is light.” (Mt 11:28-30). In the Lord, we need to find comfort, solace and joy.



📚 मनन-चिंतन - 02


धार्मिक प्रथाओं सहित किसी भी प्रकार के मानव व्यवहार या प्रथा से प्रभु ईश्वर को कोई लाभ नहीं होता है। धर्म मनुष्य के लिए है कि वह अपने जीवन के लिए समझदार लक्ष्य और मूल्य प्रणाली रख सकें। ईश्वर सभी लोगों की भलाई चाहते हैं। ईश्वर केवल एक है। कोई ईसाई ईश्वर, हिंदू ईश्वर या इस्लामी ईश्वर नहीं है। ईश्वर सभी का कल्याण चाहते हैं। वे नहीं चाहते कि कोई भी भूखा, प्यासा, बीमार या परेशानी में रहे। वे चाहते हैं कि सभी लोगों का जीवन आरामदायक और शांतिप्रद हो। येसु के प्रचार के विषय, ईश्वर के राज्य का सारांश भी यही था। प्रभु ने मानव को प्रभु के दिन को पवित्र रखने की आज्ञा दी। वह विश्राम का दिन है। यह कानून मानव के कल्याण के लिए बनाया गया था। हम किसी भी तरह से ईश्वर के नाम पर विभिन्न धार्मिक प्रथाओं को शुरू करके ईश्वर की महानता में कुछ नहीं जोड़ सकते हैं। विश्राम दिवस के आचरण की आज्ञा लोगों को परेशान करने की आज्ञा नहीं थी, बल्कि लोगों को आराम और विश्राम देने के लिए थी। येसु के समय के कुछ निष्ठावान धर्मगुरुओं ने विश्राम दिवस के आचरण के लिए कई नियम बनाये और प्रतिबंध लगाए। वे लोगों के लिए सहायक नहीं थे, लेकिन उन्होंने उनके जीवन को दयनीय बना दिया। हमें अपने नियमों और विनियमों की जांच करने और उन पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है कि क्या वे ईश्वर और पड़ोसी को प्यार करने में सहायक हैं या नहीं।



📚 REFLECTION


God does not benefit from human practices of any kind including religious practices. Religion is meant for human beings to have sensible goal and a value system for their lives. God wills the good of all. There is only one God. There is no Christian God, Hindu God or Islamic God. God wants the welfare of everyone. He does not want any one to remain hungry, thirsty, sick or in trouble. He wants everyone to have a comfortable, peaceful and joyful life. That is the logic of the Kingdom of God, the theme of Jesus’ preaching. The Lord commanded human beings to keep the Sabbath holy. That is a day of rest – a day to rest in God, to breathe the goodness of God. This law was made for the welfare of the human beings. We cannot add in any way to the greatness of God by introducing various new religious practices in the name of God. Sabbath was not meant to be a law to trouble the people of God, but was meant to give rest and relaxation to God’s people. Some of the scrupulous religious leaders of Jesus’ time introduced too many regulations and restrictions for the practice of the Sabbath. They were not helpful to people but made their lives difficult and at times miserable. We need to examine and reconsider our rules and regulations as to whether they are helpful in loving God and the neighbor.


 -Br. Biniush Topno


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16 जनुवरी 2022, इतवार

 

16 जनवरी 2022, इतवार

सामान्य काल का दूसरा इतवार

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📒 पहला पाठ : इसायाह 62:1-5

1) मैं सियोन के विषय में तब तक चुप नहीं रहूँगा, मैं येरुसालेम के विषय में तब तक विश्राम नहीं करूँगा, जब तक उसकी धार्मिकता उषा की तरह नहीं चमकेगी, जब तक उसका उद्धार धधकती मशाल की तरह प्रकट नहीं होगा।

2) तब राष्ट्र तेरी धार्मिकता देखेंगे और समस्त राजा तेरी महिमा। तेरा एक नया नाम रखा जायेगा, जो प्रभु के मुख से उच्चरित होगा।

3) तू प्रभु के हाथ में एक गौरवपूर्ण मुकुट बनेगी, अपने ईश्वर के हाथ में एक राजकीय किरीट।

4) तू न तो फिर ’परित्यक्ता’ कहलायेगी और न तेरा देश ’उजाड़’; बल्कि तू ’परमप्रिय’ कहलायेगी और तेरे देश का नाम होगाः ’सुहागिन’; क्योंकि प्रभु तुझ पर प्रसन्न होगा और तेरे देश को एक स्वामी मिलेगा।

5) जिस तरह नवयुवक कन्या से ब्याह करता है, उसी तरह तेरा निर्माता तेरा पाणिग्रहण करेगा। जिस तरह वर अपनी वधू पर रीझता है, उसी तरह तेरा ईश्वर तुझ पर प्रसन्न होगा।



📒 दूसरा पाठ : 1कुरिन्थियो 12:4-11


4) कृपादान तो नाना प्रकार के होते हैं, किन्तु आत्मा एक ही है।

5) सेवाएँ तो नाना प्रकार की होती हैं, किन्तु प्रभु एक ही हैं।

6) प्रभावशाली कार्य तो नाना प्रकार के होते हैं, किन्तु एक ही ईश्वर द्वारा सबों में सब कार्य सम्पन्न होते हैं।

7) वह प्रत्येक को वरदान देता है, जिससे वह सबों के हित के लिए पवित्र आत्मा को प्रकट करे।

8) किसी को आत्मा द्वारा प्रज्ञा के शब्द मिलते हैं, किसी को उसी आत्मा द्वारा ज्ञान के शब्द मिलते हैं

9) और किसी को उसी आत्मा द्वारा विश्वास मिलता है। वही आत्मा किसी को रोगियों को चंगा करने का,

10) किसी को चमत्कार दिखाने का, किसी को भविष्यवाणी करने का, किसी को आत्माओं की परख करने का, किसी को भाषाएँ बोलने का और किसी को भाषाओं की व्याख्या करने का वरदान देता है।

11) एक ही और वही आत्मा यह सब करता है; वह अपनी इच्छा के अनुसार प्रत्येक को अलग-अलग वरदान देता है।


📒 सुसमाचार : योहन 2:1-11


1) तीसरे दिन गलीलिया के काना में एक विवाह था। ईसा की माता वहीं थी।

2) ईसा और उनके शिष्य भी विवाह में निमन्त्रित थे।

3) अंगूरी समाप्त हो जाने पर ईसा की माता ने उन से कहा, "उन लोगो के पास अंगूरी नहीं रह गयी है"।

4) ईसा ने उत्तर दिया, "भदे! इस से मुझ को और आप को क्या, अभी तक मेरा समय नहीं आया है।"

5) उनकी माता ने सेवकों से कहा, "वे तुम लोगों से जो कुछ कहें वही करना"।

6) वहाँ यहूदियों के शुद्धीकरण के लिए पत्थर के छः मटके रखे थे। उन में दो-दो तीन तीन मन समाता था।

7) ईसा ने सेवकों से कहा, “मटकों में पानी भर दो“। सेवकों ने उन्हें लबालब भर दिया।

8) फिर ईसा ने उन से कहा, "अब निकाल कर भोज के प्रबन्धक के पास ले जाओ"। उन्होंने ऐसा ही किया।

9) प्रबन्धक ने वह पानी चखा, जो अंगूरी बन गया था। उसे मालूम नहीं था कि यह अंगूरी कहाँ से आयी है। जिन सेवकों ने पानी निकाला था, वे जानते थे। इसलिए प्रबन्धक ने दुल्हे को बुला कर

10) कहा, "सब कोई पहले बढि़या अंगूरी परोसते हैं, और लोगों के नशे में आ जाने पर घटिया। आपने बढि़या अंगूरी अब तक रख छोड़ी है।"

11) ईसा ने अपना यह पहला चमत्कार गलीलिया के काना में दिखाया। उन्होंने अपनी महिमा प्रकट की और उनके शिष्यों ने उन में विश्वास किया।


📚 मनन-चिंतन


हमारी धन्य माँ मरियम ने काना में परिवार की आवश्यकता को महसूस किया और उन्हें राहत दिलाने के लिए सामने आयी। वे परिवार की मदद करने हेतु एक चमत्कार करने के लिए येसु से निवेदन करती हैं। यही वे सभी मानव परिवारों के लिए करना चाहती हैं। ऐसा लगता है कि उस परिवार के किसी भी सदस्य ने उनसे मदद नहीं मांगी थी। माता मरियम ने उनकी मदद करने की पहल की क्योंकि वे उनके प्रति दयालु और सहानुभूतिपूर्ण मनोभाव रखती थीं। वे उनके कल्याण और अच्छे नाम में रुचि रखती थी। लूक 1:39-45 में हम देखते हैं कि मरियम एलिज़बेथ की सहायता करने के लिए यूदा के नगर के लिए शीघ्रता से प्रस्थान करती हैं। सुसमाचार हमें यह नहीं बताता है कि एलिज़बेथ ने भी मरियम की मदद माँगी थी। वे हमारी कठिनाइयों में हमारी मदद करने के लिए पहल करती है। वे हमारी सहायता करने के लिए तत्पर रहती हैं। यदि हम मरियम के करीब रहेंगे, तो वे हमारी कठिनाइयों और समस्याओं के समय सक्रिय बन कर अपने पुत्र येसु से समाधान ढूंढेगी।



📚 REFLECTION

Our Blessed Mother sensed the need of the family at Cana and came to their rescue. She approached Jesus to work a miracle to help the family. This is what she wishes to do for all human families. The family does not seem to have asked her for help. She took the initiative to help them because she was compassionate and sympathetic towards them. She was interested in their welfare and good name. In Lk 1:39-45 we find Mary rushing to Elizabeth’s home to assist her. There too we do not find any request made to Mary. She takes initiative to help us in our difficulties. If we keep close to Mary, she will act in times of our difficulties and problem and find solution from Jesus, her son.


📚 मनन-चिंतन -02


संत योहन के सुसमाचार में येसु की माता मरियम का उल्लेख केवल दो ही बार किया गया है- एक काना के विवाह भोज में जहाँ से येसु अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करते हैं तथा दूसरा क्रूस मरण के समय। यह एक प्रकार से हमें बताने का तरीका हो सकता है कि माता मरियम के द्वारा जो भूमिका निभाई गई है उससे यह स्पष्ट होता है वे न केवल येसु की माँ थी बल्कि वह प्रभु येसु के साथ हमारे मुक्ति कार्य में सक्रिय रुप से सहभागिनी भी थी। हमने पढ़ा है कि काना के विवाह भोज में माता मरियम आमंत्रित थी तथा स्वयं येसु और उनके शिष्य भी आमंत्रित किये गये थे। भोज शुरु होने के कुछ देर बाद ही अंगूरी समाप्त हो गई, माता मरियम स्वयं इसकी पहल करते हुये अपने पुत्र येसु से निवेदन करती है और येसु अपना प्रथम चमत्कार करते हैं।

माता मरियम को यह कैसे मालूम था कि उनका पुत्र यह कर सकते हैं? दूसरा दिलचस्प प्रश्न इस घटना से यह उठता है कि यदि माता मरियम को यह पता था कि येसु चमत्कार कर सकते हैं तो फिर भी उन्होंने कभी भी अपने परिवार के लिये यह नहीं मांगा कि रुपयों-पैसों में कुछ वृद्धि कर दो जिससे परिवार की जरुरतें पूरी की जा सके? आखिर परोपकार घर से ही तो शुरु होता है! परन्तु मरियम और येसु ने अपनी जरुरतों से कहीं अधिक सर्वप्रथम ईश्वर की इच्छा को प्रथम स्थान दिया।

येसु जानते थे कि उनमें लोगों के जीवन का उद्धार करने की शक्ति है। येसु चालीस दिन तक निर्जन प्रदेश में उपवास करते हैं। इसके बाद उन्हें भूख लगी। तब शैतान आकर उन्हें सलाह देता है कि वह पत्थरों को रोटियों में बदल ले और अपनी भूख मिटायें, परन्तु येसु यह नहीं करते हैं। लेकिन बाद में हम यह देखते हैं कि येसु रोटियों का चमत्कार कर एक बड़ी भीड़ को खिलाते हैं। काना का चमत्कार हमें क्या बताता है? क्या ईश्वरीय वरदान अपने स्वयं के लाभ के लिये है या फिर दूसरों की सेवा एवं भलाई के लिये है? आज के दूसरे पाठ में संत पौलुस पवित्र आत्मा के विभिन्न वरदानों का वर्णन करते हुये कहते हैं कि पवित्र आत्मा प्रत्येक को दूसरों की भलाई एवं सार्वजनिक कल्याण के लिये वरदान देता है।

ईश्वर ने मुझे क्या-क्या वरदान दिये हैं? क्या मैं इन वरदानों का उपयोग अपने समुदाय की सेवा एवं भलाई के लिये करता हूँ? शायद हम आश्चर्य करते होंगे कि आजकल पवित्र आत्मा के प्रकटीकरण क्यों नहीं होते हैं, जैसा कि हम बाइबिल में पढ़ते हैं। कितना अच्छा होता शायद यदि हम अपने अन्दर मौजूद वरदानों को दूसरों की भलाई के लिये उपयोग करते जैसे प्रार्थना, गीत-संगीत, पालन-पोषण, परोपकार, प्रोत्साहन, सहायता, प्रेरणा-देने, लिखने या व्याख्या आदि का वरदान। तब हम अपने जीवन में चमत्कार देखेंगे कि दूसरों के साथ सहानुभूति एक मूल चमत्कार है। हम अपने स्वयं के लिये असीसी के संत फ्रांसिस की प्रार्थना को बोल सकते हैं-

हे प्रभु मुझे अपनी शांति का साधन बना।

जहाँ घृणा हो, वहाँ मैं प्रेम भर दूँ।

जहाँ आघात हो वहाँ क्षमा भर दूँ।

जहाँ शंका हो वहाँ विश्वास भर दूँ ।

जहाँ निराशा हो वहाँ मैं आशा जगा दूँ।

जहाँ अंधकार हो वहाँ मैं ज्योति जला दूँ।

जहाँ खिन्नता हो वहाँ मैं हर्ष भर दूँ।

हे मेरे ईश्वर मुझे यह वरदान दो कि मैं

सान्त्वना पाने की आशा न करूँ बल्कि सान्त्वना देता रहूँ

समझा जाने की आशा न करूँ, बल्कि समझता ही रहूँ

प्यार पाने की आशा न करूँ, बल्कि प्यार देता ही रहूँ

क्योंकि त्याग के द्वारा ही प्राप्ति होती है,

माफ करने से ही माफी मिलती है, तथा मृत्यु के द्वारा ही अनन्त जीवन की प्राप्ति होती है।

सुसमाचार लेखक संत योहन यह नहीं कहते हैं कि येसु ने चमत्कार या आश्चर्यजनक कार्य किये बल्कि वे उन्हें ‘चिन्ह‘ कहते हैं क्योंकि वे हमें अधिक गहराई से समझने की ओर इशारा करते हैं जो हमारी आँखों के परे है। सही अर्थों में यह ‘चिन्ह‘ ही है जो येसु ने प्रदर्शित किया था जो उनके व्यक्तित्व और उसके मनुष्यों को बचाने की शक्ति को वर्णन करते हैं। जो चमत्कार काना के विवाह भोज में हुआ था यह उसकी शुरुआत थी। यह एक नमूना था कि येसु इस प्रकार के अन्य कार्य अपने पूरे जीवन काल में करेंगे।

बहुत से लोगों को चर्च के कार्यों को जीवन प्रदान करने वाला नहीं बल्कि पूजन समारोह उन्हें निरर्थक लगता है। कलीसिया की ओर से उन्हें उन चिन्हों को देखने की जरुरत है जो अधिक स्नेहशील एवं जीवन-दायक हैं, जिससे कि ख्रीस्तीयों में प्रभु येसु के दुःखों और कष्टों को दूर करने की क्षमता को देख सकें। कोई भी ऐसी खबर को नहीं सुनना चाहता जो उन्हें खुशी प्रदान नहीं करती और विशेषकर जब सुसमाचार अधिकार जताते हुये और प्रवचन धमकी भरे शब्दों में दिया जाये? प्रभु येसु ख्रीस्त प्यार करने की शक्ति और हमारे अस्तित्व को महत्व देने ही आये ताकि हम समझदारी एवं आनंद का जीवन जी सकें। अगर आज लोग केवल सैद्धांतिक धर्म के बारे में जानते हैं तो वे कभी भी येसु के द्वारा फैलाई गई खुशी का अनुभव नहीं कर पायेंगे और बहुत से लोग अपने को ईश्वर से दूर रखेंगे।

विवाह समारोह में पानी, दाखरस के रुप में तभी अनुभव किया गया जब वह ‘बढ़ाया गया‘ अथार्त जब उसे छः बडे़ पानी के मटकों में भरा गया जो यहूदियों के शुध्दीकरण के लिये प्रयोग किया जाता था। सिद्धांत पर आधारित धर्म आज समाप्त हो चुका है। उसमें जीवनदायक जल नहीं है जिसमें सभी मानवीय जरुरतों को शुद्ध तथा संतुष्ट करने की क्षमता हो। येसु के परिवर्तन लाने वाली शक्ति को व्यक्त करने के लिये केवल शब्द ही पर्याप्त नहीं है वरन् सेवा भावना की जरुरत है। सुसमाचार का प्रचार मात्र बात करना, प्रवचन देना, शिक्षा देना, किसी का न्याय करना, डराना और दोषी ठहराना नहीं है। हमें जरुरत है कि हम स्वयं की जीवन-शैली के माध्यम से प्रसन्नचित येसु को दर्शा सकें। आज हमारे धर्म को जरुरत है कि यह एक आनंद एवं समारोह का स्थान हो जहाँ विश्वासीगण अपनेपन का अहसास कर सके जैसा कि काना के विवाह भोज में हुआ था।


 -Br. Biniush Topno


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13 जनवरी 2022, गुरुवार

 

13 जनवरी 2022, गुरुवार

सामान्य काल का पहला सप्ताह

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📒 पहला पाठ: समुएल का पहला ग्रन्थ 4 :1-11


1) समूएल की बात इस्राएल भर में मान्य थी। उन दिनों फ़िलिस्ती इस्राएल पर आक्रमण करने के लिए एकत्र हो गये और इस्राएली उनका सामना करने निकले। उन्होंने एबेन-एजे़र के पास पड़ाव डाला और फ़िलिस्तियों ने अफ़ेद मे।

2) फ़िलिस्ती इस्राएलियों के सामने पंक्तिबद्ध हो गये। घमासान युद्ध हुआ और इस्राएली हार गये। फ़िलिस्तियों ने रणक्षेत्र में लगभग चार हजार सैनिकों को मार डाला।

3) जब सेना पड़ाव में लौट आयी, तो इस्राएली नेताओं ने कहा, ‘‘प्रभु ने आज हमें फ़िलिस्तियों से क्यों हारने दिया? हम षिलो जा कर प्रभु की मंजूषा ले आयें। वह हमारे साथ चले और हमें हमारे शत्रुओं के पंजे से छुड़ाये।’’

4) उन्होंने मंजूषा ले आने कुछ लोगों को षिलों भेजा। यह विश्वमण्डल के प्रभु के विधान की मंजूषा है, जो केरूबीम पर विराजमान है। एली के दोनों पुत्र होप़नी और पीनहास ईश्वर के विधान की मंजूषा के साथ आये।

5) जब प्रभु के विधान की मंजूषा पड़ाव में पहुँची, तो सब इस्राएली इतने ज़ोर से जयकार करने लगे कि पृथ्वी गूँज उठी।

6) फ़िलिस्तियों ने जयकार का वह नाद सुन कर कहा, ‘‘इब्रानियों के पड़ाव में इस महान् जयकार का क्या अर्थ है?’’ जब उन्हें यह पता चला कि प्रभु की मंजूषा पड़ाव में आ गयी है,

7) तो वे डरने लगे। उन्होंने कहा, ‘‘ईश्वर पड़ाव में आ गया है।

8) हाय! हम हार गये! उस शक्तिशाली ईश्वर के हाथ से हमें कौन बचा सकता है? यह तो वही ईश्वर है, जिसने मिस्रियों को मरुभूमि में नाना प्रकार की विपत्तियों से मारा।

9) फ़िलिस्तियों! हिम्मत बाँधों और शूरवीरों की तरह लड़ो! नहीं तो तुम इब्रानियों के दास बनोगे, जैसे कि वे तुम्हारे दास थे। शूरवीरों की तरह लड़ो!’’

10) फ़िलिस्तियों ने आक्रमण किया। इस्राएली हार कर अपने तम्बूओं में भाग गये। यह उनकी करारी हार थी। इस्राएलियों के तीस हज़ार पैदल सैनिक मारे गये,

11) ईश्वर की मंजूषा छीन ली गयी और एली के दोनों पुत्र होप़नी और पीनहास भी मार दिये गये।


📒 सुसमाचार : सन्त मारकुस 1:40-45


40) एक कोढ़ी ईसा के पास आया और घुटने टेक कर उन से अनुनय-विनय करते हुए बोला, ’’आप चाहें तो मुझे शुद्ध कर सकते हैं’’।

41) ईसा को तरस हो आया। उन्होंने हाथ बढ़ाकर यह कहते हुए उसका स्पर्श किया, ’’मैं यही चाहता हूँ- शुद्ध हो जाओ’’।

42) उसी क्षण उसका कोढ़ दूर हुआ और वह शुद्ध हो गया।

43) ईसा ने उसे यह कड़ी चेतावनी देते हुए तुरन्त विदा किया,

44) ’’सावधान! किसी से कुछ न कहो। जा कर अपने को याजकों को दिखाओ और अपने शुद्धीकरण के लिए मूसा द्वारा निर्धारित भेंट चढ़ाओ, जिससे तुम्हारा स्वास्थ्यलाभ प्रमाणित हो जाये’’।

45) परन्तु वह वहाँ से विदा हो कर चारों ओर खुल कर इसकी चर्चा करने लगा। इस से ईसा के लिए प्रकट रूप से नगरों में जाना असम्भव हो गया; इसलिए वह निर्जन स्थानों में रहते थे फिर भी लोग चारों ओर से उनके पास आते थे।


📚 मनन-चिंतन


आज के सुसमाचार में हम सबसे अच्छी प्रार्थनाओं में से एक पाते हैं। कोढ़ी येसु से कहता है, "आप चाहें तो मुझे शुद्ध कर सकते हैं"। एक आदर्श प्रार्थना में हम ईश्वर की इच्छा के आगे आत्म-समर्पण करते हैं। गतसमनी की वाटिका में, येसु ने प्रार्थना की, “मेरे पिता! यदि हो सके, तो यह प्याला मुझ से टल जाये। फिर भी मेरी नही, बल्कि तेरी ही इच्छा पूरी हो।" (मत्ती 26:39)। माता मरियम ने भी ईश्वर की इच्छा के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और कहा, "देखिए, मैं प्रभु की दासी हूँ। आपका कथन मुझ में पूरा हो जाये।" (लूकस 1:38)। हमारे प्रभु जानते हैं कि हमें किस चीज़ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। वे हमें हम से ज्यादा जानते हैं। यिरमियाह 29:11 में हम पढ़ते हैं, "मैं तुम्हारे लिए निर्धारित अपनी योजनाएँ जानता हूँ“- यह प्रभु की वाणी है- “तुम्हारे हित की योजनाएँ, अहित की नहीं, तुम्हारे लिए आशामय भविय की योजनाएं।” जब हमारे सर्वज्ञ ईश्वर के पास हमारे लिए इतनी बड़ी कल्याणकारी योजनाएं हैं, तो क्या हमारे लिए उनकी इच्छा के आगे आत्मसमर्पण करना बुद्धिमानी नहीं है?



📚 REFLECTION


In today’s Gospel we find one of the best prayers one can make. The leper tells Jesus, “If you choose, you can make me clean”. In an ideal prayer we surrender to the will of God. In the garden of Gethsemane, Jesus prayed, “My Father, if it is possible, let this cup pass from me; yet not what I want but what you want” (Mt 26:39). Our lady too surrendered before the will of God and said, “Here am I, the servant of the Lord; let it be with me according to your word” (Lk 1:38). The Lord knows what we need most. He knows us more than we ourselves do. In Jer 29:11 we read, “For surely I know the plans I have for you, says the Lord, plans for your welfare and not for harm, to give you a future with hope”. When our omniscient God has such great welfare plans for us, is it not wise for us to surrender to his will?


 -Br. Biniush Topno


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12 जनवरी 2022, बुधवार

 

12 जनवरी 2022, बुधवार

सामान्य काल का पहला सप्ताह

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📒 पहला पाठ: समुएल का पहला ग्रन्थ 3 :1-10,19-20


1) युवक समूएल एली के निरीक्षण में प्रभु की सेवा करता था। उस समय प्रभु की वाणी बहुत कम सुनाई पड़ती थी और उसके दर्शन भी दुर्लभ थे।

2) किसी दिन ऐसा हुआ कि एली अपने कमरे में लेटा हुआ था उसकी आँखें इतनी कमज़ोर हो गयी थीं कि वह देख नहीं सकता था।

3) प्रभु का दीपवृक्ष उस समय तक बुझा नहीं था और समूएल प्रभु के मन्दिर में, जहाँ ईश्वर की मंजूषा रखी हुई थी, सो रहा था।

4) प्रभु ने समूएल को पुकारा। उसने उत्तर दिया, ‘‘मैं प्रस्तुत हूँ’’

5) और एली के पास दौड़ कर कहा, ‘‘आपने मुझे बुलाया है, इसलिए आया हूँ।’’ एली ने कहा, ‘‘मैंने तुम को नहीं बुलाया। जा कर सो जाओ।’’ वह लौट कर लेट गया।

6) प्रभु ने फिर समूएल को पुकारा। उसने एली के पास जा कर कहा, ‘‘आपने मुझे बुलाया है, इसलिए आया हूँ।’’ एली ने उत्तर दिया, ‘‘बेटा! मैंने तुम को नहीं बुलाया। जा कर सो जाओ।’’

7) समूएल प्रभु से परिचित नहीं था - प्रभु कभी उस से नहीं बोला था।

8) प्रभु ने तीसरी बार समूएल को पुकारा। वह उठ कर एली के पास गया और उसने कहा, ‘‘आपने मुझे बुलाया, इसलिए आया हूँ।’’ तब एली समझ गया कि प्रभु युवक को बुला रहा है। 9) एली ने समूएल से कहा, ‘‘जा कर सो जाओ। यदि तुम को फिर बुलाया जायेगा, तो यह कहना, ‘प्रभु! बोल तेरा सेवक सुन रहा है।’ समूएल गया और अपनी जगह लेट गया।

10) प्रभु उसके पास आया और पहले की तरह उसने पुकारा, ‘‘समूएल! समूएल!’’ समूएल ने उत्तर दिया, ‘‘बोल, तेरा सेवक सुन रहा है।’’

19) समूएल बढ़ता गया, प्रभु उसके साथ रहा और उसने समूएल को जो वचन दिया थे, उन में से एक को भी मिट्टी में नहीं मिलने दिया

20) और दान से ले कर बएर-षेबा तक समस्त इस्राएल यह जान गया कि समूएल प्रभु का नबी प्रमाणित हो गया है।


📙 सुसमाचार : सन्त मारकुस 1:29-39


29) वे सभागृह से निकल कर याकूब और योहन के साथ सीधे सिमोन और अन्द्रेयस के घर गये।

30) सिमोन की सास बुख़ार में पड़ी हुई थी। लोगों ने तुरन्त उसके विषय में उन्हें बताया।

31) ईसा उसके पास आये और उन्होंने हाथ पकड़ कर उसे उठाया। उसका बुख़ार जाता रहा और वह उन लोगों के सेवा-सत्कार में लग गयी।

32) सन्ध्या समय, सूरज डूबने के बाद, लोग सभी रोगियों और अपदूतग्रस्तों को उनके पास ले आये।

33) सारा नगर द्वार पर एकत्र हो गया।

34) ईसा ने नाना प्रकार की बीमारियों से पीडि़त बहुत-से रोगियों को चंगा किया और बहुत-से अपदूतों को निकाला। वे अपदूतों को बोलने से रोकते थे, क्योंकि वे जानते थे कि वह कौन हैं।

35) दूसरे दिन ईसा बहुत सबेरे उठ कर घर से निकले और किसी एकान्त स्थान जा कर प्रार्थना करते रहे।

36) सिमोन और उसके साथी उनकी खोज में निकले

37) और उन्हें पाते ही यह बोले, ’’सब लोग आप को खोज रहे हैं’’।

38) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, ’’हम आसपास के कस्बों में चलें। मुझे वहाँ भी उपदेश देना है- इसीलिए तो आया हूँ।’’

39) और वे उनके सभागृहों में उपदेश देते और अपदूतों को निकलाते हुए सारी गलीलिया में घूमते रहते थे।


📚 मनन-चिंतन



येसु चापलूसी से कभी प्रभावित नहीं हुए। न ही वह नकारात्मक आलोचना से निरुत्साहित हुए। उनकी चिंता हमेशा स्वर्गीय पिता की इच्छा पूरी करने की थी। उन्होंने लोकप्रियता की परवाह नहीं की। जब येसु के सामने भीड़ के साथ ही रहने की मांग उठी, तो उन्होंने कहा, “हम आसपास के कस्बों में चलें। मुझे वहाँ भी उपदेश देना है- इसीलिए तो आया हूँ।” उनके पास पिता द्वारा सौंपा गया एक अधूरा काम था। हमें अपने लिए ईश्वर की योजना को समझने और उसके अनुसार कार्य करने की आवश्यकता है। हमें चापलूसी या सार्वजनिक हंगामे से नहीं बहलाना चाहिए। हमें स्वर्ग की ओर देखते रहना चाहिए।



📚 REFLECTION



Jesus was never moved by flattery. Nor was he pulled down by negative criticism. His concern was to do the will of the Heavenly Father. He did not bother about popularity. When there was a popular demand before Jesus to remain with the crowd, he said, “Let us go on to the neighboring towns, so that I may proclaim the message there also; for that is what I came out to do.” He had an unfinished task entrusted by the Father. We need to discern the plan of God for us and act accordingly. We should not be carried away by flattery or public uproar. We should keep moving gazing at heaven.



📚 मनन-चिंतन - 02



आज का सुसमाचार येसु के सार्वजनिक कार्यों के दौरान एक दिन को दर्शाता है। सुबह-सुबह वे प्रार्थना करने के लिए एकांत स्थान पर जाते हैं। वहाँ वे स्वर्गिक पिता के प्रेम का अनुभव करते हैं और उनकी योजना को समझ लेते हैं। अपनी प्रार्थना के दौरान उन्हें अपने सार्वजनिक कार्यों के लिए अनुदेश, दिशानिर्देश और शक्ति प्राप्त होती है। वे सार्वजनिक मांगों और लोकप्रियता की मांग के सामने अपने मार्ग से कभी विचलित नहीं होते हैं। वे बस अपने पिता द्वारा बताए गए मार्ग का अनुसरण करते हैं। वे कभी भी अपने सामने निर्धारित लक्ष्य से नहीं भटकते हैं। इसीलिए जब उन्हें बताया गया कि सभी लोग उन्हें ढूंढ रहे हैं, उन्हें देखने के लिए खोज रहे हैं, तब उन्होंने कहा, “हम आसपास के कस्बों में चलें। मुझे वहाँ भी उपदेश देना है- इसीलिए तो आया हूँ"। वे देर शाम तक कड़ी मेहनत करते हैं। वे पूरे दिन व्यस्त रहते हैं। वे आगे बढ़ते जाते हैं। वे एक के बाद एक काम हाथ में लेते हैं। फिर भी वे काम के पीछे अपने पिता को नहीं भूलते हैं, लेकिन वे स्वर्गिक पिता की इच्छा को पूरा करता है। आइए हम ईश्वर की बात सुनने और उनकी आज्ञा मानने में येसु का अनुकरण करें।


📚 REFLECTION


Today’s Gospel depicts a typical day during the public ministry of Jesus. Early in the morning he goes off to a lonely place to pray. There he experiences the love of the Heavenly Father and discerns his plan for him. During his prayer he receives directions, guidelines and strength to perform his ministry. He does not get diverted by public demands and popularity seeking. He simply follows the path marked out by his Father. He never goes astray from the goal set before him. That is why when he was told that all people were searching for him, instead of going to see them, he said, “Let us go elsewhere to the neighbouring country towns so that I can proclaim the message there too, because that is why I came”. He works hard until late evenings. His days are hectic. He moves on and on. He takes up one task after another. Yet he is not workaholic, but he simply fulfills the will of the Heavenly Father. Let us imitate Jesus in this – by listening to and obeying God.


 -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!

09 जनवरी 2022, इतवा

 

09 जनवरी 2022, इतवार

प्रभु येसु का बपतिस्मा



📒 पहला पाठ : इसायाह 42:1-4, 6-7


1) “यह मेरा सेवक है। मैं इसे सँभालता हूँ। मैंने इसे चुना है। मैं इस पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ। मैंने इसे अपना आत्मा प्रदान किया है, जिससे यह राष्ट्रों में धार्मिकता का प्रचार करे।

2) यह न तो चिल्लायेगा और न शोर मचायेगा, बाजारों में कोई भी इसकी आवाज नहीं सुनेगा।

3) यह न तो कुचला हुआ सरकण्डा ही तोड़ेगा और न धुआँती हुई बत्ती ही बुझायेगा। यह ईमानदारी से धार्मिकता का प्रचार करेगा।

4) यह न तो थकेगा और न हिम्मत हारेगा, जब तक यह पृथ्वी पर धार्मिकता की स्थापना न करे; क्योंकि समस्त द्वीप इसी शिक्षा की प्रतीक्षा करेंगे।“

6) “मैं प्रभु, ने तुम को न्याय के लिए बुलाया और तुम्हारा हाथ पकड़ कर तुम को सँभाला है। मैंने तुम्हारे द्वारा अपनी प्रजा को एक विधान दिया और तुम्हें राष्ट्रों की ज्योति बनाया है,

7) जिससे तुम अन्धों की दृष्टि दो, बन्दियों को मुक्त करो। और अन्धकार में रहने वालों को ज्योति प्रदान करो।



📕 अथवा - पहला पाठ : इसायाह 40:1-5, 9-11


1) तुम्हारा ईश्वर यह कहता है, “मेरी प्रजा को सान्त्वना दो, सान्त्वना दो।

2) यरुसालेम को ढारस बँधओ और पुकार कर उस से यह कहो कि उसकी विपत्ति के दिन समाप्त हो गये हैं और उसके पाप का प्रायश्चित हो चुका है। प्रभु-ईश्वर के हाथ से उसे सभी अपराधों का पूरा-पूरा दण्ड मिल चुका हैं।“

3) यह आवाज़ आ रही है, “निर्जन प्रदेश में प्रभु का मार्ग तैयार करो। हमारे ईश्वर के लिए मैदान में रास्ता सीधा कर दो।

4) हर एक घाटी भर दी जाये। हर एक पहाड़ और पहाड़ी समतल की जाये, खड़ी चट्ठान को मैदान और कगार को घाटी बना दिया जाये।

5) तब प्रभु-ईश्वर की महिमा प्रकट हो जायेगी और सब शरीरधारी उसे देखेंगे; क्योंकि प्रभु ने ऐसा ही कहा है।“

9) सियोन को शुभ सन्देश सुनाने वाले! ऊँचे पहाड़ पर चढ़ो। यरुसालेम को शुभ सन्देश सुनाने वाले! अपनी आवाज़ ऊँची कर दो। निडर हो कर यूदा के नगरों से पुकार कर यह कहोः “यही तुम्हारा ईश्वर है।“

10) देखो प्रभु-ईश्वर सामध्र्य के साथ आ रहा है। वह सब कुछ अपने अधीन कर लेगा। वह अपना पुरस्कार अपने साथ ला रहा है और उसका विजयोपहार भी उसके साथ है।

11) वह गड़ेरिये की तरह अपना रेवड़ चराता है। वह मेमने को उठा कर अपनी छाती से लगा लेता और दूध पिलाने वाली भेडें धीरे-धीरे ले चलता है।



📕 दूसरा पाठ : प्रेरित-चरित 10:34-38


34) पेत्रुस ने कहा, "मैं अब अच्छी तरह समझ गया हूँ कि ईश्वर किसी के साथ पक्ष-पात नहीं करता।

35) मनुष्य किसी भी राष्ट्र का क्यों न हो, यदि वह ईश्वर पर श्रद्धा रख कर धर्माचरण करता है, तो वह ईश्वर का कृपापात्र बन जाता हैं।

36) ईश्वर ने इस्राएलियों को अपना संदेश भेजा और हमें ईसा मसीह द्वारा, जो सबों के प्रभु हैं, शांति का सुसमाचार सुनाया।

37) नाज़रेत के ईसा के विषय में यहूदिया भर में जो हुआ हैं, उसे आप लोग जानते हैं। वह सब गलीलिया में प्रारंभ हुआ-उस बपतिस्मा के बाद, जिसका प्रचार योहन किया था।

38) ईश्वर ने ईसा को पवित्र आत्मा और सामर्थ्य से विभूषित किया और वह चारों ओर घूम-घूम कर भलाई करते रहें और शैतान के वश में आये हुए लोगों को चंगा करते रहें, क्योंकि ईश्वर उनके साथ था


📕 अथवा - दूसरा पाठ : तीतुस 2:11-14, 3:4-7


11) क्योंकि ईश्वर की कृपा सभी मनुष्यों की मुक्ति के लिए प्रकट हो गयी है।

12) वह हमें यह शिक्षा देती है कि अधार्मिकता तथा विषयवासना त्याग कर हम इस पृथ्वी पर संयम, न्याय तथा भक्ति का जीवन बितायें

13) और उस दिन की प्रतीक्षा करें, जब हमारी आशाएं पूरी हो जायेंगी और हमारे महान् ईश्वर एवं मुक्तिदाता ईसा मसीह की महिमा प्रकट होगी।

14) उन्होंने हमारे लिए अपने को बलि चढ़ाया, जिससे वह हमें हर प्रकार की बुराई से मुक्त करें और हमें एक ऐसी प्रजा बनायें जो शुद्ध हो, जो उनकी अपनी हो और जो भलाई करने के लिए उत्सुक हो।

3:4) किन्तु हमारे मुक्तिदाता ईश्वर की कृपालुता तथा मनुष्यों के प्रति उसका प्रेम पृथ्वी पर प्रकट हो गया।

5) उसने नवजीवन के जल और पवित्र आत्मा की संजीवन शक्ति द्वारा हमारा उद्धार किया। उसने हमारे किसी पुण्य कर्म के कारण ऐसा नहीं किया, बल्कि इसलिए कि वह दयालु है।

6) उसने हमारे मुक्तिदाता ईसा मसीह द्वारा हमें प्रचुर मात्रा में पवित्र आत्मा का वरदान दिया,

7) जिससे हम उसकी कृपा की सहायता से धर्मी बन कर अनन्त जीवन के उत्तराधिकारी बनने की आशा कर सकें।



📕 सुसमाचार : लूकस 3:15-16,21-22


15) जनता में उत्सुकता बढ़ती जा रही थी और योहन के विषय में सब मन-ही-मन सोच रहे थे कि कहीं यही तो मसीह नहीं है।

16) इसलिए योहन ने सबों से कहा, "मैं तो तुम लोगों को जल से बपतिस्मा देता हूँ; परन्तु एक आने वाले हैं, जो मुझ से अधिक शक्तिशाली हैं। मैं उनके जूते का फ़ीता खोलने योग्य नहीं हूँ। वह तुम लोगों को पवित्र आत्मा और आग से बपतिस्मा देंगे।

21) सारी जनता को बपतिस्मा मिल जाने के बाद ईसा ने भी बपतिस्मा ग्रहण किया। इसे ग्रहण करने के अनन्तर वह प्रार्थना कर ही रहे थे कि स्वर्ग खुल गया।

22) पवित्र आत्मा कपोत-जैसे शरीर के रूप में उन पर उतरा और स्वर्ग से यह वाणी सुनाई दी, "तू मेरा प्रिय पुत्र है। मैं तुझ पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ।"


📚 मनन-चिंतन


संत योहन बपतिस्ता ने स्वीकार किया कि येसु उनसे अधिक महान है। उन्होंने इस बात की गवाही भी दी कि प्रभु येसु लोगों को पवित्र आत्मा और आग से बपतिस्मा देंगे। फिर भी येसु संत योहन बपतिस्ता से बपतिस्मा प्राप्त करना चाहते थे। संत योहन बपतिस्ता का बपतिस्मा पश्चाताप और मसीह के स्वागत की तैयारी का प्रतीक था। फिर भी येसु पापी मानवता के प्रतिनिधि के रूप में बपतिस्मा लेने के लिए संत योहन के पास पहुंचे। जब वह पश्चाताप के बपतिस्मा को स्वीकार कर रहे थे तो वह हमारे पापी मानव-स्वभाव को धारण कर रहे थे। येसु ने यर्दन नदी में हर इंसान का प्रतिनिधित्व किया और ईश्वर की ओर मुड़ने के लिए मानवता की इच्छा व्यक्त की। त्रिएक ईश्वर यर्दन में उपस्थित थे। पिता की आवाज ने येसु को अपना प्रिय पुत्र घोषित किया। पवित्र आत्मा उन पर कबूतर के रूप में उतरे। हमारे बपतिस्मा में हमें पवित्र त्रिएक ईश्वर की संगति में शामिल होने के लिए बुलाया जाता है। आइए हम हमेशा उनमें बने रहें और उज्ज्वल रहें।



📚 REFLECTION

St. John the Baptist acknowledged Jesus to be much greater than himself. He testified to the fact that Jesus was the one who was to baptize people with Holy Spirit and fire. Yet Jesus wanted to receive baptism from St. John. The baptism of St. John the Baptist was one of repentance and preparation to receive the Messiah. Yet Jesus as a representative of sinful humanity approached St. John to receive baptism. He was carrying our sinful nature as he approached the baptism of repentance. Jesus represented every human being at the Jordan expressing the willingness of humanity to turn to God. The whole Holy Trinity was present at the Jordan. There was the Father’s voice acknowledging Jesus to be His beloved Son. The Holy Spirit descended on him in the form of a dove. At our baptism we are called into the communion of the Holy Trinity. Let us always remain in him and be radiant.


📚 मनन-चिंतन -02


संत योहन बपतिस्ता द्वारा दिया गया बपतिस्मा पश्चाताप का बपतिस्मा था। योहन बपतिस्ता के उपदेश सुनने के बाद अपने पापों के लिए पश्चात्ताप महसूस करने वाले पापियों ने अपने जीवन की दिशा बदलने का निर्णय व्यक्त किया। उनके पश्चाताप के संकेत के रूप में उन्हें यर्दन नदी में बपतिस्मा दिया गया था। अब सवाल उठता है कि योहन द्वारा येसु को बपतिस्मा क्यों दिया गया था। क्या वे पापी थे कि उन्हें पश्चात्ताप करना तथा बपतिस्मा लेना पड़ा? धर्मग्रन्थ कहता है, "तुम जानते हो कि मसीह पाप हरने के लिए प्रकट हुए। उन में कोई पाप नहीं है।“ (1योहन 3: 5)। संत पेत्रुस कहते हैं, "उन्होंने कोई पाप नहीं किया और उनके मुख से कभी छल-कपट की बात नहीं निकली" (1पेत्रुस 2:22)। वास्तव में, येसु ने यर्दन नदी में अपने आप को संत योहन बपतिस्ता के सामने प्रस्तुत कर पापी मानवजाति का प्रतिनिधित्व किया। संत पौलुस यह स्पष्ट करते हैं, "मसीह का कोई पाप नहीं था। फिर भी ईश्वर ने हमारे कल्याण के लिए उन्हें पाप का भागी बनाया, जिससे हम उनके द्वारा ईश्वर की पवित्रता के भागी बन सकें।" (2कुरिन्थियों 5:21)। नबी इसायाह ने इस बारे में भविष्यवाणी की थी, “वह हमारे ही रोगों को अपने ऊपर लेता था और हमारे ही दुःखों से लदा हुआ था और हम उसे दण्डित, ईश्वर का मारा हुआ और तिरस्कृत समझते थे। हमारे पापों के कारण वह छेदित किया गया है। हमारे कूकर्मों के कारण वह कुचल दिया गया है। जो दण्ड वह भोगता था, उसके द्वारा हमें शान्ति मिली है और उसके घावों द्वारा हम भले-चंगे हो गये हैं। हम सब अपना-अपना रास्ता पकड़ कर भेड़ों की तरह भटक रहे थे। उसी पर प्रभु ने हम सब के पापों का भार डाला है।“ (इसायाह 53: 4-6) येसु ने संत योहन बपतिस्ता के सामने यर्दन नदी में खड़े होकर मेरा और आपका प्रतिनिधित्व किया। आइए हम उनके सामने सिर झुकायें और हमें शुध्द करने के लिए धन्यवाद दें।


📚 REFLECTION


The Baptism administered by St. John the Baptist was one of repentance. The sinners, who felt sorry for their sins after listening to the preaching of John, expressed their decision to change the course of their lives. As a sign of their repentance they were baptized in the river Jordan. Now the question arises as to why Jesus was baptized by John. Was he sinful that he had to repent and receive Baptism? The Scripture says, “You know that he was revealed to take away sins, and in him there is no sin” (1Jn 3:5). St. Peter says, “He committed no sin, and no deceit was found in his mouth” (1Pet 2:22). In fact, Jesus represented the sinful humanity at the river Jordan when he presented himself before John to be baptized by him. St. Paul makes this clear when he says, “For our sake he made him to be sin who knew no sin, so that in him we might become the righteousness of God” (2Cor 5:21). Isaiah had prophesied about this, “Surely he has borne our infirmities and carried our diseases; yet we accounted him stricken, struck down by God, and afflicted. But he was wounded for our transgressions, crushed for our iniquities; upon him was the punishment that made us whole, and by his bruises we are healed. All we like sheep have gone astray; we have all turned to our own way, and the Lord has laid on him the iniquity of us all.” (Is 53:4-6) Jesus stood in the river in front of St. John the Baptist representing me and you. Let us bow before him and thank him for cleansing us in himself.



प्रवचन

ख्रीस्त में प्यारे भाइयों-बहनों आज माता कलीसिया प्रभु के बपतिस्मा का त्यौहार मना रही है। आज के प्रथम पाठ में नबी इसायस प्रभु येसु के बारे भविष्यवाणी करते हैं। बाइबिल में नबी ईश्वर के प्रवक्ता थे। अतः ईश्वर नबियों के जरिये मनुष्यों तक अपना संदेश पहुचाते थे। जब नबी यह कहते हैं- ‘‘यह मेरा सेवक है। मैं इसे सॅंभालता हॅूं। मैंने इसे चुना है। मैं इस पर अत्यंत प्रसन्न हॅू। मैंने इसे अपना आत्मा प्रदान किया है ....’’ यह वचन स्वयं नबी का नहीं अपितु यह वचन ईश्वर का है जिसे आज के सुसमाचार में पुनः दुहराया जाता है। इस प्रकार नबी इसायस के जरिये ईश्वर ने जो येसु के संबंध में कहा था, पूर्ण होता है। योहन पाप क्षमा का उपदेश देकर लोगों को बपतिस्मा दे रहा था। येसु ने कोई पाप नहीं किया था। येसु निषपाप थे। अतः उन्हें बपतिस्मा लेने की आवश्यकता नहीं थी। फिर भी येसु बपतिस्मा लेते हैं। क्यों? येसु बपतिस्मा ग्रहण कर हमारी मानवीयता में भाग लेते हैं। हमारे पापों को अपने ऊपर लेते हैं। सुसमाचार के अन्य जगहों में हम येसु को यह कहते हुए पाते हैं कि उन्हें एक और बपतिस्मा लेना है। वह बपतिस्मा उनका सूली पर मरना है। इस प्रकार येसु हमारे पापों के लिए पश्चाताप करते हैं, हमारे पापों के लिए दुःख सहते हैं। हमारे पापों के कारण उन्हें मृत्यु सहना पड़ता है। इस प्रकार वे हमें हमारे पापों से मुक्ति देते हैं।

येसु के बपतिस्मा के बाद स्वर्ग खुल गया और ईश्वर का आत्मा कपोत के रूप में उतरा और येसु के ऊपर ठहर गया। येसु ने पवित्र आत्मा को ग्रहण किया। उन पर पवित्र आत्मा की मोहर लग गयी।

कलीफोर्निया पुलिस एवं अदालत ने किशोरों में एक ऐसी गोदन (टैटू) पायी है जो कि कॉंस्मेटिक सजावट से बढ़कर है। कुछ वर्ष पहले किशोर अपराध न्यायालय के न्यायाधीश ने कलीफोर्निया में यह पाया कि किशोरों की बहुत बड़ी संख्या जो उनके समक्ष पेश की जा रही थी उनके हाथों, उंगलियों एवं चेहरों में गोदन थी। उन्हें बाद में पता चला कि यह गोदन उनके किसी विशेष गिरोह में होने की पहचान थी जो कि अधिकतम किसी ड्रग के उपभोगकर्ता थे। ऐसी बहुत सी गोदन युवाओं द्वारा ही की गयी थी जो कि इसके सदस्य होने को बेकरार थे। न्यायधीश ने बाद में यह भी पता किया कि जिन किशोरों में यह गोदन प्रत्यक्ष थे वे वास्तव में नौकरी से निकाले गये थे क्योंकि संभावित नियोक्ता गोदन को अपराध एंव अक्षमता समझते थे और इन्हे नौकरी देने से इन्कार कर देते थे। न्यायाधीश ने लोस एन्जेल्स प्रदेश के चिकित्सा संघ के सदस्यों से पूछा - यदि कोई प्लास्टिक सर्जन बिना पैसा लिए बाल-अपराधियों के गोदन को मिटा सकता है। डाक्टर कार्ल स्टेन एक लोस एन्जेल्स के बहुत मशहूर प्लास्टीक सर्जन स्वेच्छा से आगे आये। 1981 ई. से इन्होंने सैकड़ों युवा रोगियों के गोदन कोष्शल्यचिकित्सा द्वारा उच्छेदनकर, रगड़कर, लेज़र से और लगभग सभी जाने गये तरीकों से मिटाया था।

हमारी बपतिस्मा एक गोदन है। पवित्र आत्मा द्वारा अमिट रूप से मुद्रित किया गया है जो हमारे येसु के शिष्य होने की पहचान है। कोई भी सर्जन इसे न मिटा सकता है और न ही हटा सकता है। यह मोहर या गोदन भले ही हमारे बुरे कर्मो, वचनों एंव सोचों से धूमिल हो सकता है, पाप रूप गन्दगी उसे भले ही दबा सकती है। परन्तु यह न कभी धुलेगा न मिटगा और न ही हटेगा।

सुसमाचार कहता है-‘‘स्वर्ग में यह वाणी सुनाई दी -यह मेरा प्रिय पुत्र है। मैं इस पर अत्यन्त प्रसन्न हॅू।’’ येसु के बपतिस्मा के पशचात स्वर्ग से पवित्र आत्मा कपोत के रूप में उतरा। इसके बाद ही ‘‘यह मेरा प्रिय पुत्र है।’’ वाणी सुनाई दी। याने कि हमारे बपतिस्मा में जब हम पर पवित्र आत्मा की मोहर लगायी गयी है, हम येसु के शिष्य और ईश्वर के पुत्र-पुत्रियां बन गये। पर क्या हमारे पड़ोसी या लोग पवित्र आत्मा की मोहर जो हमारी येसु के शिष्य व ईश्वर के पुत्र होने का पहचान है देख पाते हैं? जब-जब हम लोगों को निःस्वार्थ भाव से प्रेम करते हैं यह मोहर या गोदन लोगों को नजर आता है। जब-जब लोग हमें दुःख पहुंचाते हैं और हम बदला लेने के बजाय क्षमा करते हैं तो पवित्र आत्मा की मोहर को लोग महसूस करते हैं। जब-जब हम अपने अत्याचारियों व दुश्मनों के लिए प्रार्थना करते हैं, हमारे दुश्मन व अत्याचारी हम पर पवित्र आत्मा की मोहर को देख सकते हैं। जब-जब हम भूखों को खिलाते, प्यासें को पिलाते, नगों को कपड़ा पहनाते और बंदियों से मिलने जाते हैं तो ये लोग हम पर पवित्र आत्मा की मोहर को देख सकते हैं। जब-जब हम दीन-दुखियों की सेवा करते हैं तब दीन-दुखी हम पर लगी पवित्र आत्मा की मोहर क अहसास कर सकते हैं। जब-जब हम अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करते है तो हमारे पड़ोसी हम पर लगी पवित्र आत्मा की मोहर को देख सकते हैं। जब हम येसु के शिष्य व ईश्वर के पुत्र-पुत्री के भॉंति जीवन जीते हैं तो लोग हम पर पवित्र आत्मा की मोहर को देख सकते हैं। संक्षिप्त में, जब हम ईश्वर की इच्छा व योजना या ईश्वर के वचन के अनुसार जीवन जीते हैं तो लोग हम पर लगे पवित्र आत्मा की मोहर को देख सकते हैं।

तो ख्रीस्त में प्यारे भाइयो-बहनों आइये आज जब हम प्रभु येसु के बपतिस्मा का त्योहार मना रहें हैं तो हम ईश्वर से इस कृपा के लिए प्रार्थना करें कि हम ऐसा जीवन जीयें ताकि हमारे अड़ोस-पड़ोस के लोग, समाज व संसार हम पर लगी पवित्र आत्मा की मोहर को देख सके, महसूस कर सके।


 -Br. Biniush Topno


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08 जनवरी 2022, शनिवार

 

08 जनवरी 2022, शनिवार

प्रभु-प्रकाश पर्व के बाद का शनिवार

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पहला पाठ : 1 योहन 5:14-21

14) हमें ईश्वर पर यह भरोसा है कि यदि हम उसकी इच्छानुसार उस से कुछ भी मांगते हैं, तो वह हमारी सुनता है।

15) यदि हम यह जानते हैं कि हम जो भी मांगे, वह हमारी सुनता है, तो हम यह भी जानते हैं कि हमने जो कुछ मांगा है, वह हमें मिल गया है।

16) यदि कोई अपने भाई को ऐसा पाप करते देखता है, जो प्राणघातक न हो, तो वह उसके लिए प्रार्थना करे और ईश्वर उसका जीवन सुरक्षित रखेगा। यह उन लोगों पर लागू है, जिनका पाप प्राणघातक नहीं है; क्योंकि एक पाप ऐसा भी होता है जो प्राणघातक है। उसके विषय में मैं नहीं कहता कि प्रार्थना करनी चाहिए।

17) हर अधर्म पाप है, किन्तु हर पाप प्राणघातक नहीं है।

18) हम जानते हैं कि ईश्वर की सन्तान पाप नहीं करती। ईश्वर का पुत्र उसकी रक्षा करता है और वह दुष्ट के वंश में नहीं आती।

19) हम जानते हैं कि हम ईश्वर के हैं, जबकि समस्त संसार दुष्ट के वश में है।

20) हम जानते हैं कि ईश्वर का पुत्र आया है और उसने हमें सच्चे ईश्वर को पहचानने का विवेक दिया है। हम सच्चे ईश्वर में निवास करते हैं; क्योंकि हम उसके पुत्र ईसा मसीह में निवास करते हैं। यही सच्चा ईश्वर और अनन्त जीवन है।

21) बच्चो! असत्य देवताओं से अपने को बचाये रखो।


सुसमाचार : योहन 3:22-30


22) इसके बाद ईसा अपने शिष्यों के साथ यहूदिया प्रदेश आये और वहाँ उनके साथ रहे। वे बपतिस्मा देते थे।

23) योहन भी सलीम के निकट एनोन में बपतिस्मा दे रहा था, क्योंकि वहाँ बहुत पानी था। लोग वहाँ आ कर बपतिस्मा ग्रहण करते थे।

24) योहन उस समय तक गिरफ़्तार नहीं हुआ था।

25) योहन के शिष्यों और यहूदियों में शुद्धीकरण के विषय में विवाद छिड़ गया।

26) उन्होंने योहन के पास जा कर कहा, "गुरुवर! देखिए, जो यर्दन के उस पार आपके साथ थे और जिनके विषय में आपने साक्ष्य दिया, वह बपतिस्मा देते हैं और सब लोग उनके पास जाते हैं"।

27) योहन ने उत्तर दिया, "मनुष्य को वही प्राप्त हो सकता हे, जो उसे स्वर्ग की ओर से दिया जाये।

28) तुम लोग स्वयं साक्षी हो कि मैंने यह कहा, ‘मैं मसीह नहीं हूँ’। मैं तो उनका अग्रदूत हूँ।

29) वधू वर की ही होती है; परन्तु वर का मित्र, जो साथ रह कर वर को सुनता है, उसकी वाणी पर आनन्दित हो उठता है। मेरा आनन्द ऐसा ही है और अब वह परिपूर्ण है।

30) यह उचित है कि वे बढ़ते जायें और मैं घटता जाऊँ।"


📚 मनन-चिंतन


जब संत योहन बपतिस्ता ने येसु की बढ़ती हुई प्रसिद्धि के बारे में सुना, तो उन्होंने कहा, "वह बढ़ता जाये और मैं घटता जाऊँ”। उनके इस बयान में उनकी विनम्रता झलकती है। विनम्रता महानों का गुण है। कोई आश्चर्य नहीं कि येसु ने योहन बपतिस्ता के बारे में कहा, "मैं तुम से कहता हूँ, मनुष्यों में योहन बपतिस्ता से बड़ा कोई नहीं।" (लूकस 7:28)। हम मरियम, जोसेफ, मूसा, दाऊद और उन सभी में नम्रता का गुण देख सकते हैं जिन्होंने ईमानदारी से प्रभु की सेवा की। प्रवक्ता 3:17 में सभी लोगों के लिए एक सलाह है, "पुत्र! नम्रता से अपना व्यवसाय करो और लोग तुम्हें दानशील व्यक्ति से भी अधिक प्यार करेंगे।।” संत पौलुस कहते हैं, "आप दलबन्दी तथा मिथ्याभिमान से दूर रहें। हर व्यक्ति नम्रतापूर्वक दूसरों को अपने से श्रेष्ठ समझे।" (फिलिप्पियों 2:3)



📚 REFLECTION



When John the Baptist heard about the increasing fame of Jesus, he said, “He must increase, but I must decrease”. His humility becomes evident in this statement. Humility is a quality of the great. No wonder Jesus said about him, “I tell you, among those born of women no one is greater than John” (Lk 7:28). We can see the virtue of humility in Mary, Joseph, Moses, David and all who served the Lord faithfully. In Sir 3:17 we have an advice for everyone, “My child, perform your tasks with humility; then you will be loved by those whom God accepts.” St. Paul says, “Do nothing from selfish ambition or conceit, but in humility regard others as better than yourselves.” (Phil 2:3)


📚 मनन-चिंतन -02


आज का सुसमाचार हमारे समक्ष योहन बप्तिस्ता की विनम्रता का चित्र प्रस्तुत करता है। वह ऐसे स्थान पर बपतिस्मा दे रहे थे जहाँ बहुत सारे लोगों का आना-जाना लगा रहता था, इसलिए उनके पास बहुत सारे लोग बपतिस्मा ग्रहण करने के लिए आते थे। वह उनके ज्वलंत शब्दों को सुनकर बेचैन हो जाते थे। ना केवल सन्त योहन के वचनों से बल्कि उनके सादा जीवन से भी बहुत अधिक प्रभावित होते थे। वह जो प्रवचन देते थे उसका अपने जीवन में पालन भी करते थे, इसलिए बहुत सारे लोग उनके वचन सुनने के लिए उमड़ पड़ते थे। उनके भी अनेक शिष्य थे, और कुछ लोगों ने तो उन्हें गुरुवर कहकर पुकारना भी शुरू कर दिया था। किसी भी व्यक्ति को इतना सम्मान और उपलब्धि मिलने के बाद उसके मन में घमण्ड और अहंकार का जन्म लेना स्वाभाविक है, जो बाद में घृणा एवं ईर्ष्या जैसी नकारात्मक भावनाओं को जन्म देते हैं।

लेकिन हम देखते हैं कि योहन बप्तिस्ता इस तरह की नकारात्मक शक्तियों से अछूते रहते हैं, उन्हें अपनी वास्तविक पहचान मालूम है। लोग उन्हें चाहे जैसे भी बुलाएँ या कैसा भी सम्मान दें, उन्हें यह अच्छी तरह मालूम था कि वह केवल ईश्वर के मेमने की ओर इंगित करने वाला चिन्ह मात्र था। लोग चिन्ह अथवा संकेत को ही अपनी मंज़िल ना समझ लें। इसलिए वह उन्हें याद दिलाते हैं, “मैं मसीह नहीं हूँ लेकिन उनके आगे भेजा हुआ दूत हूँ,,,वह बढ़ते जाएँ और मैं घटता जाऊँ।” क्या मैं स्वयं के सम्मान के लिए कार्य करता हूँ या ईश्वर की महिमा के लिए? क्या मैं चाहता हूँ कि मुझमें और मेरे परिवार में ईश्वर बढ़ता जाए?



📚 REFLECTION


Today’s gospel witnesses before us about the humility of the John the Baptist. He was baptising in a place where lots of people could come, and so many people came to him and were baptised. They listened to his burning words that could stir their hearts. They were deeply impressed not only by his bold words but also by his life style. He practised what he preached and had always people around him to listen to him. He had a circle of disciples, some people even gave him the title of Rabbi. After getting such honour and achievement, pride and ego can creep in easily, which can give birth to other negative feelings like hatred and jealousy.

But we see John is untouched by these negative forces, he is well aware of his identity. Whatever people call him or in whichever way they treat him, he was well aware that he was only sign which indicated towards the lamb of God. People should not confuse the sign or indicator with the destination. So he reminds them “I am not messiah but I have been sent ahead of him…he must increase but I must decrease.” Do I seek self glory or glory of God? Do I want God to increase in me and my family?


 -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!