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Daily Mass Readings for Sunday, 8 August 2021

 Daily Mass Readings for Sunday, 8 August 2021



First Reading: First Kings 19: 4-8


4 And he went forward, one day’s journey into the desert. And when he was there, and sat under a juniper tree, he requested for his soul that he might die, and said: It is enough for me, Lord, take away my soul: for I am no better than my fathers.

5 And he cast himself down, and slept in the shadow of the juniper tree: and behold an angel of the Lord touched him, and said to him: Arise and eat.

6 He looked, and behold there was at his head a hearth cake, and a vessel of water: and he ate and drank, and he fell asleep again.

7 And the angel of the Lord came again the second time, and touched him, and said to him: Arise, eat: for thou hast yet a great way to go.

8 And he arose, and ate, and drank, and walked in the strength of that food forty days and forty nights, unto the mount of God, Horeb.

Responsorial Psalm: Psalms 34: 2-3, 4-5, 6-7, 8-9


R. (9a) Taste and see the goodness of the Lord.

2 I will bless the Lord at all times, his praise shall be always in my mouth.

3 In the Lord shall my soul be praised: let the meek hear and rejoice.

R. Taste and see the goodness of the Lord.

4 O magnify the Lord with me; and let us extol his name together.

5 I sought the Lord, and he heard me; and he delivered me from all my troubles.

R. Taste and see the goodness of the Lord.

6 Come ye to him and be enlightened: and your faces shall not be confounded.

7 This poor man cried, and the Lord heard him: and saved him out of all his troubles.

R. Taste and see the goodness of the Lord.

8 The angel of the Lord shall encamp round about them that fear him: and shall deliver them.

9 O taste, and see that the Lord is sweet: blessed is the man that hopeth in him.

R. Taste and see the goodness of the Lord.

Second Reading: Ephesians 4: 30 – 5: 2


30 And grieve not the holy Spirit of God: whereby you are sealed unto the day of redemption.

31 Let all bitterness, and anger, and indignation, and clamour, and blasphemy, be put away from you, with all malice.

32 And be ye kind one to another; merciful, forgiving one another, even as God hath forgiven you in Christ.

5:1 Be ye therefore followers of God, as most dear children;

2 And walk in love, as Christ also hath loved us, and hath delivered himself for us, an oblation and a sacrifice to God for an odour of sweetness.

Alleluia: John 6: 51

R. Alleluia, alleluia.

51 I am the living bread that came down from heaven, says the Lord; whoever eats this bread will live forever.

R. Alleluia, alleluia.

Gospel: John 6: 41-51


41 The Jews therefore murmured at him, because he had said: I am the living bread which came down from heaven.

42 And they said: Is not this Jesus, the son of Joseph, whose father and mother we know? How then saith he, I came down from heaven?

43 Jesus therefore answered, and said to them: Murmur not among yourselves.

44 No man can come to me, except the Father, who hath sent me, draw him; and I will raise him up in the last day.

45 It is written in the prophets: And they shall all be taught of God. Every one that hath heard of the Father, and hath learned, cometh to me.

46 Not that any man hath seen the Father; but he who is of God, he hath seen the Father.

47 Amen, amen I say unto you: He that believeth in me, hath everlasting life.

48 I am the bread of life.

49 Your fathers did eat manna in the desert, and are dead.

50 This is the bread which cometh down from heaven; that if any man eat of it, he may not die.

51 I am the living bread which came down from heaven.If any man eat of this bread, he shall live for ever; and the bread that I will give, is my flesh, for the life of the world.

-Br. Biniush Topno




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इतवार, 08 अगस्त, 2021 वर्ष का उन्नीसवाँ सामान्य इतवार

 

इतवार, 08 अगस्त, 2021

वर्ष का उन्नीसवाँ सामान्य इतवार




पहला पाठ : राजाओं का पहला ग्रन्थ 19:4-8


4) और वह मरुभूमि में एक दिन का रास्ता तय कर एक झाड़ी के नीचे बैठ गया और यह कह कर मौत के लिए प्रार्थना करने लगा, ‘‘प्रभु! बहुत हुआ। मुझे उठा ले, क्योंकि मैं अपने पुरखों से अच्छा नहीं हूँ।’’

5) वह झाड़ी के नीचे लेट कर सो गया। किन्तु एक स्वर्गदूत ने उसे जगा कर कहा, ‘‘उठिए और खाइए’’।

6) उसने देखा कि उसके सिरहाने पकायी हुई रोटी और पानी की सुराही रखी हुई है। उसने खाया-पिया और वह फिर लेट गया।

7) किन्तु प्रभु के दूत ने फिर आ उसका स्पर्श किया और कहा, ‘‘उठिए और खाइए, नहीं तो रास्ता आपके लिए अधिक लम्बा हो जायेगा’’।

8) उसने उठ कर खाया-पिया और वह उस भोजन के बल पर चालीस दिन और चालीस रात चल कर ईश्वर के पर्वत होरेब तक पहुँचा।



दूसरा पाठ: एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 4:30-5:2



30) पवित्र आत्मा ने मुक्ति के दिन के लिए आप लोगों पर अपनी मोहर लगा दी है। आप उसे दुःख नहीं दें।

31) आप लोग सब प्रकार की कटुता, उत्तेजना, क्रोध, लड़ाई-झगड़ा, परनिन्दा और हर तरह की बुराई अपने बीच से दूर करें।

32) एक दूसरे के प्रति दयालु तथा सहृदय बनें। जिस तरह ईश्वर ने मसीह के कारण आप लोगों को क्षमा कर दिया, उसी तरह आप भी एक दूसरे को क्षमा करें।

1) आप लोग ईश्वर की प्रिय सन्तान हैं, इसलिए उसका अनुसरण करें

2) और प्रेम के मार्ग पर चलें, जिस तरह मसीह ने आप लोगों को प्यार किया और सुगन्धित भेंट तथा बलि के रूप में ईश्वर के प्रति अपने को हमारे लिए अर्पित कर दिया।

3) जैसा कि सन्तों के लिए उचित है, आप लोगों के बीच किसी प्रकार के व्यभिचार और अशुद्धता अथवा लोभ की चर्चा तक न हो,

4) और न भद्यी, मूर्खतापूर्ण या अश्लील बातचीत; क्योंकि यह अशोभनीय है- बल्कि आप ईश्वर को धन्यवाद दिया करें।

5) आप लोग यह निश्चित रूप से जान लें कि कोई व्यभिचारी, लम्पट या लोभी - जो मूर्तिपूजक के बराबर है- मसीह और ईश्वर के राज्य का अधिकारी नहीं होगा।



सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 6:41-51



41) ईसा ने कहा था, ‘‘स्वर्ग से उतरी हुई रोटी मैं हूँ’’। इस पर यहूदी यह कहते हुए भुनभुनाते थे,

42) ‘‘क्या वह यूसुफ का बेटा ईसा नहीं है? हम इसके माँ-बाप को जानते हैं। तो यह कैसे कह सकता है- मैं स्वर्ग से उतरा हूँ?’’

43) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, ‘‘आपस में मत भुनभुनाओ।

44) कोई मेरे पास तब तक नहीं आ सकता, जब तक कि पिता, जिसने मुझे भेजा, उसे आकर्षित नहीं करता। मैं उसे अन्तिम दिन पुनर्जीवित कर दूंगा।

45) नबियों ने लिखा है, वे सब-के-सब ईश्वर के शिक्षा पायेंगे। जो ईश्वर की शिक्षा सुनता और ग्रहण करता है, वह मेरे पास आता है।

46) ‘‘यह न समझो कि किसी ने पिता को देखा है; जो ईश्वर की ओर से आया है, उसी ने पिता को देखा है

47) मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- जो विश्वास करता है, उसे अनन्त जीवन प्राप्त है।

48) जीवन की रोटी मैं हूँ।

49) तुम्हारे पूर्वजों ने मरुभूमि में मन्ना खाया, फिर भी वे मर गये।

50) मैं जिस रोटी के विषय में कहता हूँ, वह स्वर्ग से उतरती है और जो उसे खाता है, वह नहीं मरता।

51) स्वर्ग से उतरी हुई वह जीवन्त रोटी मैं हूँ। यदि कोई वह रोटी खायेगा, तो वह सदा जीवित रहेगा। जो रोटी में दूँगा, वह संसार के लिए अर्पित मेरा मांस है।’’



📚 मनन-चिंतन


आज येसु हमें बुलाते हैं कि हम उनके पास आएं ताकि वो हमें तृप्त कर सकें। येसु स्वयं को उस रोटी के रूप में वर्णित करते हैं जो स्वर्ग से उतरती है और वे हमें इस रोटी को खाने के लिए बुलाते हैं। जब हम रोटी की बात सुनते हैं तो हम शायद सहज रूप से यूखारिस्त के बारे में सोचते हैं। फिर भी, यह बेहतर होगा कि आज हम यूखारिस्त से थोड़ा हटकर मनन चिंतन करें। प्रभु हमें आमंत्रित करते है कि हम उनके पास आएं और उसकी उपस्थिति का भोजन करें, और विशेष रूप से उनके वचन का भोजन करें। यहूदी शास्त्रों याने पुराने विधान में रोटी अक्सर ईश्वर के वचन का प्रतीक है। हम विधि विवरण ग्रन्थ के इस उद्धरण से परिचित हैं- "इससे उसने तुमको यह समझाना चाहा कि मनुष्य रोटी से ही नहीं जीता है। वह ईश्वर के मुख से निकलने वाले हर एक शब्द से जीता है।" (वि. वि. 8:3) हमें भौतिक रोटी तो की तो ज़रूरत पड़ती ही है, लेकिन हमें ईश्वर के वचन की आत्मिक रोटी भी चाहिए।

हम यीशु के पास उसके वचन से पोषित होने के लिए आते हैं। पिता हमें अपने पुत्र के पास ले जाता है ताकि उनके वचन से हमारा पोषण हो। उसके वचन का भोजन हमें जीवन की हमारी यात्रा में मज़बूत बनाए रखेगा, ठीक वैसे ही जैसे पहले पाठ में, एक पकी हुई रोटी से एलिय्याह अपने गंतव्य, ईश्वर के पर्वत तक पहुँचने तक जीवित रहा। जब हम येसु के पास आते रहेंगे और उसके वचन को खाते रहेंगे, तो वह वचन हमारे जीवन को आकार और एक नया स्वरुप देगा। यह हमें उस तरह का जीवन जीने की शक्ति देता है जो संत पौलुस आज के दूसरे पाठ में हमारे सामने रखते हैं, अनिवार्य रूप से प्रेम का जीवन, एक ऐसा जीवन जिसमें हम एक दूसरे को मसीह के रूप में प्यार करते हैं। संक्षेप में, यह हमारी बपतिस्माँ की बुलाहट है।


📚 REFLECTION




Today, Jesus calls on us to come to him with a view to our feeding on him. The language of the Gospel reading is very graphic. Jesus speaks of himself as the bread that comes down from heaven and calls on us to eat this bread. When we hear that kind of language we probably think instinctively of the Eucharist. Yet, it might be better not to jump to the Eucharist too quickly. The Lord invites us come to him and to feed on his presence, and in particular to feed on his Word. In the Jewish Scriptures bread is often a symbol of the word of God. We may be familiar with the quotation from the Deuteronomy, ‘we do not live on bread alone but on every word that comes from the mouth of God’. We need physical bread, but we also need the spiritual bread of God’s word. We come to Jesus to be nourished by his word. The Father draws us to his Son to be fed by his Word. The food of his Word will sustain us on our journey through life, just as, in the first reading, the baked scones sustained Elijah, until he reached his destination, the mountain of God. When we keep coming to Jesus and feeding on his Word, that Word will shape our lives. It empowers us to live the kind of life that Saint Paul puts before us in this morning’s second reading, a life of love essentially, a life in which we love one another as Christ as loved us, forgive one another as readily as God forgives us. That, in essence, is our baptismal calling.



मनन-चिंतन - 2



राजाओं के दूसरे ग्रंथ में हम नबी एलियस के जीवन की उस घटना के बारे में पढते हैं जब वे शत्रुओं से भाग रहे थे। थकान, भूख और विषम परिस्थितियों के कारण वे अत्याधिक क्षीण होकर सो जाते हैं। इस दौरान स्वर्गदूत उन्हें जगाते तथा रोटी और जल प्रदान करते हैं। इस प्रकार ईश्वर स्वयं नबी को रोटी प्रदान करते हैं। (1राजाओं 19:4-8) धर्मग्रंथ में अनेक अवसरों पर ईश्वर मनुष्यों को रोटी प्रदान करते हैं। मरूभूमि में ईश्वर लोगों को मन्ना अर्थात रोटी प्रदान करते हैं। ’’प्रभु ने मूसा से कहा, मैं तुम लोगों के लिए आकाश से रोटी बरसाऊँगा।...मूसा ने लोगों से कहा, ’’यह वही रोटी है, जिसे प्रभु तुम लोगों को खाने के लिए देता है।’’ (निर्गमन 16:4,15) जब नबी दानिएल को सिंहों के खडड में डाल दिया गया था तो ईश्वर नबी हबक्कूक को दानिएल के लिए भोजन ले जाने को कहते हैं, ’’प्रभु के दूत ने हबक्कूक से कहा, ’अपने पास का यह भोजन बाबुल के सिंहों के खड्ड में दानिएल के पास ले जाओ’’। (दानिएल 14:34) इसी प्रकार प्रभु सरेप्ता की विधवा को भी अकाल के दौरान रोटी प्रदान करते हैं। ’’इस्राएल का प्रभु-ईश्वर यह कहता हैः जिस दिन तक प्रभु पृथ्वी पर पानी न बरसाये, उस दिन तक न तो बर्तन में आटा समाप्त होगा और न तेल की कुप्पी खाली होगी।’’ (1राजाओं 17:14) सुसमाचार में येसु रोटी के चमत्कार के द्वारा लोगों के लिए रोटी का प्रबंध करते हैं, (मत्ती 14:13-21; मारकुस 6:30-44; लूकस 9:10-17; योहन 6:1-15)

योहन 6:41-51 में येसु समझाते हैं कि जो रोटी मरुभूमि में उन्हें प्रदान की गयी थी वह रोटी सचमुच में ईश्वर ने प्रदान की थी किन्तु वह भोजन मात्र था जिसका उद्देश्य शारीरिक भूख मिटाना था। वह रोटी उन्हें अनंत मृत्यु से बचाने में असमर्थ थी। ’’तुम्हारे पूर्वजों ने मरुभूमि में मन्ना खाया; फिर भी वे मर गये।’’ किन्तु येसु आगे कहते हैं ’’स्वर्ग से उतरी हुई वह जीवंत रोटी मैं हूँ। यदि कोई वह रोटी खाये, तो वह सदा जीवित रहेगा।’’

येसु ने शिष्यों के साथ अपने भोज में यूखारिस्त की स्थापना करते हुये पुनः अपने शरीर को रोटी के रूप में घोषित किया, ’’यह मेरा शरीर है, जो तुम्हारे लिए दिया जा रहा है। यह मेरी स्मृति में किया करो’’ (लूकस 22:19) (देखिए मत्ती 26:26; मारकुस 14:22; 1कुरि.11:24) येसु तो उस भोज के दौरान रोटी देते हैं किन्तु कलवारी पर वह अपने शरीर, जिसे उन्होंने रोटी कहा था, को क्रूस पर चढा कर सचमुच में अपने शरीर को वह रोटी बना देते हैं जो हम विश्वासियों को मुक्ति प्रदान करेगी।

जो येसु को रोटी के रूप में ग्रहण करता है वह अपने जीवन में क्रूस की शिक्षा को भी अपनाता है। इसके द्वारा वह सदैव प्रभु में जीवित रहता है तथा प्रभु उसमें। इस विश्वास के द्वारा हम जीवन की सारी अनिश्चिताओं एवं विपत्तियों पर विजयी प्राप्त कर सकते हैं। येसु जो ’स्वर्ग से उतरी जीवंत रोटी’ के रहस्य हैं, उनको समझने के लिए विश्वास की आवश्यकता पडती है जो केवल पिता ही दे सकता है। ’’कोई मेरे पास तक नही आ सकता जब तक कि पिता, जिसने मुझे भेजा है, उसे आकर्षित न करे।’’(योहन 6:44) ’’इसलिए मैंने तुम लोगों से यह कहा कि कोई भी मेरे पास तब तक नहीं आ सकता, जब तक उसे पिता से यह वरदान न मिला हो।’’ (6:65) इसलिए हमें येसु में ईश्वरीयता को पहचानने तथा उसे स्वीकार करने के लिए विश्वास के वरदान के लिए पिता से प्रार्थना करना चाहिए तथा सांसारिक सोच से ऊपर उठकर येसु को अपनाना चाहिए। यहूदी येसु को मात्र मनुष्य समझते और तिरस्कृत करते हुए कहते हैं, ’’क्या यह यूसुफ का बेटा येसु नहीं है? हम इसके मॉ-बाप को जानते हैं। तो यह कैसे कह सकता है-मैं स्वर्ग से उतरा हूँ?’’ ऐसी सांसारिक सोच के विरूद्ध संत पौलुस चेतावनी देते हैं, ’’यदि मसीह पर हमारा भरोसा इस जीवन तक ही सीमित है, तो हम सब मनुष्यों में सब से अधिक दयनीय है। (1 कुरि. 15:19) कई बार हमारी सोच इस नश्वर संसार तक सीमित रहती है। इस कारण हम येसु में अंनत जीवन के महान रहस्य को समझने में विफल होकर भटकते रहते हैं। आईये हम विश्वास के वरदान के लिए प्रार्थना करे तथा येसु जो जीवंत रोटी है को ग्रहण कर अंनत जीवन प्राप्त करे।


-Br. Biniush Topno



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शनिवार, 07 अगस्त, 2021 वर्ष का अठारहवाँ सामान्य सप्ताह

 

शनिवार, 07 अगस्त, 2021

वर्ष का अठारहवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : विधि-विवरण ग्रन्थ 6:4-13



4) इस्राएल सुनो। हमारा प्रभु-ईश्वर एकमात्र प्रभु है।

5) तुम अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा और अपनी सारी शक्ति से प्यार करो।

6) जो शब्द मैं तुम्हें आज सुना रहा हूँ वे तुम्हारे हृदय पर अंकित रहें।

7) तुम उन्हें अपने पुत्रों को अच्छी तरह सिखाओ। घर में बैठते या राह चलते, शाम को लेटते या सुबह उठते समय, उनकी चरचा किया करो।

8) तुम उन्हें निशानी की तरह अपने हाथ पर और तावीज़ की तरह अपने मस्तक पर बाँधे रखो

9) और अपने घरों की चौखट तथा अपने फाटकों पर लिख दो।

10) जब तुम्हारा प्रभु-ईश्वर तुम लोगो को उस देश ले जायेगा, जिसे उसने शपथ खा कर तुम्हारे पूर्वजों - इब्राहीम, इसहाक और याकूब - को देने की प्रतिज्ञा की है; जहाँ बड़े और भव्य नगर है, जिन्हें तुमने नहीं बनाया;

11) जहाँ के घर कीमती चीजों से भरें हैं; जिन्हें तुमने एकत्र नहीं किया; जहाँ पानी के कुण्ड़ है; जिन्हें तुमने नहीं खोदा; जहाँ दाखबारियाँ और जैतून के पेड़ है, जिन्हें तुमने नहीं लगाया; जब तुम वहाँ खा कर तृप्त हो जाओगे,

12) तो सावधान रहो और अपने प्रभु-ईश्वर को मत भूलो, जो तुम लोगों को मिस्र से - गुलामी के घर से - निकाल लाया।

13) "तुम अपने प्रभु-ईश्वर पर श्रद्धा रखोगे, उसी की सेवा करोगे और उसी के नाम पर शपथ खाओगे।



सुसमाचार : मत्ती 17:14-20



14) जब वे जनसमूह के पास पहुँचे, तो एक मनुष्य आया और ईसा के सामने घुटने टेक कर बोला,

15) प्रभु! मेरे बेटे पर दया कीजिए। उसे मिरगी का दौरा पड़ा करता है। उसकी हालत बहुत ख़राब है और वह अक्सर आग या पानी में गिर जाता है।

16) मैं उसे आपके शिष्यों के पास लाया, किन्तु वे उसे चंगा नहीं कर सके।"

17) ईसा ने कहा, "अविश्वासी और दुष्ट पीढ़ी! मैं कब तक तुम्हारे साथ रहूँ? कब तक तुम्हें सहता रहूँ? उस लड़के को यहाँ ले आओ।"

18) ईसा ने अपदूत को डांटा और वह लड़के से निकल गया। वह लड़का उसी घड़ी चंगा हो गया।

19) बाद में शिष्यों ने एकान्त में ईसा के पास आ कर पूछा, "हम लोग उसे क्यों नहीं निकाल सके?

20) ईसा ने उन से कहा, "अपने विश्वास की कमी के कारण। मैं तुम से यह कहता हूँ - यदि तुम्हारा विश्वास राई के दाने के बराबर भी हो और तुम इस पहाड़ से यह कहो, ’यहाँ से वहाँ तक हट जा, तो यह हट जायेगा; और तुम्हारे लिए कुछ भी असम्भव नहीं होगा।



📚 मनन-चिंतन



आज के सुसमाचार में, येसु एक व्यक्ति के गंभीर रूप से बीमार बेटे को चंगा करते हैं। वह येसु के पास मदद के लिए आया क्योंकि यीशु के चेले उसकी मदद करने में असमर्थ थे। जहाँ एक ओर लड़के की हालत देखकर चेले अपने को शक्तिहीन व लाचार पाते हैं वहीं, येसु उसे ठीक करने में सक्षम थे। शिष्यों को अपनी स्वयं की शक्तिहीनता के बारे में पता था, और, येसु के लड़के को ठीक करने के बाद, उन्होंने उनसे पूछा, 'हम इसे बाहर क्यों नहीं निकाल पाए?' मुझे यकीन है कि जब हम कुछ विकट परीस्थितियों का सामना करते हैं, हमने भी अपने जीवन में शक्तिहीनता और लाचारी की भावना का अनुभव किया होगा। हमारे सर्वोत्तम प्रयासों के बावजूद, हम परिस्थितियों को नहीं सुधार पाते। अपने शिष्यों के प्रश्न, 'हम क्यों असमर्थ थे...' के प्रति येसु की प्रतिक्रिया उनके अल्प विश्वास की ओर इशारा करती है। ऐसा नहीं था कि उनमें आस्था नहीं थी, लेकिन उनका विश्वास दृढ़ नहीं था। उन्होंने ईश्वर पर पर्याप्त भरोसा नहीं किया, जिसकी शक्ति से भरकर उन्हें भेजा गया था। शायद हम सभी कभी-कभी खुद को 'अल्पविश्वासी' लोगों के रूप में देख सकते हैं। हां, हमारे पास विश्वास है लेकिन जीवन की वास्तविक कठिन परिस्थितियों का सामना करने पर यह कमजोर हो जाता है। जैसे-जैसे हम आशाहीन बाधाओं के खिलाफ संघर्ष करते हैं, हमारा विश्वास कम होता जाता है। फिर भी, यही वह समय है जब हमें अपने विश्वास में दृढ़ रहने की आवश्यकता है। क्योंकि जो हमारी निगाहों में असंभव है वो ईश्वर की निगाहों में संभव है जैसा की मत्ती अपने सुसमाचार में येसु थोड़ी देर बाद कहेंगे, 'नश्वर लोगों के लिए यह असंभव है, लेकिन ईश्वर के लिए सब कुछ संभव है'।



📚 REFLECTION



In today's Gospel reading, Jesus heals a man’s seriously ill son. He came to Jesus for help because Jesus’ disciples had been unable to help him. Whereas the disciples were powerless before the boy’s condition, Jesus was able to heal it. The disciples were very aware of their own powerlessness, and, after Jesus had cured the boy, they asked him, ‘Why were we unable to cast it out?’ I am sure that we too have experienced a sense of powerlessness, of helplessness, before certain situations that we come up against. In spite of our best efforts, we are not able to put it right. Jesus’ response to his disciples’ question, ‘Why were we unable…?’ points to their little faith. It was not that they had no faith, but their faith was not strong. They didn’t trust sufficiently in the Lord; in whose power they had been sent out. Perhaps we can all see ourselves as people of ‘little faith’ at times. Yes, we have faith but it weakens when faced with the really difficult situations of life. Our faith diminishes as we struggle against seemingly hopeless odds. Yet, that is the very time when we need to be strong in our faith. It is above all in those personally demanding situations of life that we need to renew our trust in the Lord and in his ability to work through us even in the most unpromising of moments. As Jesus will go on to say a little later in Matthew’s gospel, ‘For mortals it is impossible, but for God all things are possible’.


 -Br Biniush topno



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शुक्रवार, 06 अगस्त, 2021 वर्ष का अठारहवाँ सामान्य सप्ताह प्रभु का रूपान्तरण – पर्व

 

शुक्रवार, 06 अगस्त, 2021

वर्ष का अठारहवाँ सामान्य सप्ताह

प्रभु का रूपान्तरण – पर्व

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पहला पाठ : दानिएल 7:9-10, 13-14



9) मैं देख ही रहा था कि सिंहासन रख दिये गये और एक वयोवृद्ध व्यक्ति बैठ गया। उसके वस्त्र हिम की तरह उज्जवल थे और उसके सिर के केश निर्मल ऊन की तरह।

10) उसका सिंहासन ज्वालाओं का समूह था और सिहंासन के पहिये धधकती अग्नि। उसके सामने से आग की धारा बह रही थी। सहस्रों उसकी सेवा कर रहे थे। लाखों उसके सामने खड़े थे। न्याय की कार्यवाही प्रारंभ हो रही थी। और पुस्तकें खोल दी गयीं।

13) तब मैंने रात्रि के दृश्य में देखा कि आकाश के बादलों पर मानवपुत्र-जैसा कोई आया। वह वयोवृद्ध के यहाँ पहुँचा और उसके सामने लाया गया।

14) उसे प्रभुत्व, सम्मान तथा राजत्व दिया गया। सभी देश, राष्ट्र और भिन्न-भिन्न भाषा-भाषी उसकी सेवा करेंगे। उसका प्रभुत्व अनन्त है। वह सदा ही बना रहेगा। उसके राज्य का कभी विनाश नहीं होगा।



अथवा - पहला पाठ :1पेत्रुस 1: 16-19



16) जब हमने आप लोगों को अपने प्रभु ईसा मसीह के सामर्थ्य तथा पुनरागमन के विषय में बताया, तो हमने कपट-कल्पित कथाओं का सहारा नहीं लिया, बल्कि अपनी ही आंखों से उनका प्रताप उस समय देखा,

17) जब उन्हें पिता-परमेश्वर के सम्मान तथा महिमा प्राप्त हुई और भव्य ऐश्वर्य में से उनके प्रति एक वाणी यह कहती हुई सुनाई पड़ी, ’’यह मेरा प्रिय पुत्र है। मैं इस पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ।’’

18) जब हम पवित्र पर्वत पर उनके साथ थे, तो हमने स्वयं स्वर्ग से आती हुई यह वाणी सुनी।

19) इस घटना द्वारा नबियों की वाणी हमारे लिए और भी विश्वसनीय सिद्ध हुई। इस पर ध्यान देने में आप लोगों का कल्याण है, क्योंकि जब तक पौ नहीं फटती और आपके हृदयों में प्रभात का तारा उदित नहीं होता, तब तक नबियों की वाणी अंधेरे में चमकते हुए दीपक के सदृश है।



सुसमाचार : लूकस 9:28ब-36



28) इन बातों के करीब आठ दिन बाद ईसा पेत्रुस, योहन और याकूब को अपने साथ ले गये और प्रार्थना करने के लिए एक पहाड़ पर चढ़े।

29) प्रार्थना करते समय ईसा के मुखमण्डल का रूपान्तरण हो गया और उनके वस्त्र उज्जवल हो कर जगमगा उठे।

30) दो पुरुष उनके साथ बातचीत कर रहे थे। वे मूसा और एलियस थे,

31) जो महिमा-सहित प्रकट हो कर येरूसालेम में होने वाली उनकी मृत्यु के विषय में बातें कर रहे थे।

32) पेत्रुस और उसके साथी, जो ऊँघ रहे थे, अब पूरी तरह जाग गये। उन्होंने ईसा की महिमा को और उनके साथ उन दो पुरुषों को देखा।

33) वे विदा हो ही रहे थे कि पेत्रुस ने ईसा से कहा, "गुरूवर! यहाँ होना हमारे लिए कितना अच्छा है! हम तीन तम्बू खड़ा कर दें- एक आपके लिए, एक मूसा और एक एलियस के लिए।" उसे पता नहीं था कि वह क्या कह रहा है।

34) वह बोल ही रहा था कि बादल आ कर उन पर छा गया और वे बादल से घिर जाने के कारण भयभीत हो गये।

35) बादल में से यह वाणी सुनाई पड़ी, "यह मेरा परमप्रिय पुत्र है। इसकी सुनो।"

36) वाणी समाप्त होने पर ईसा अकेले ही रह गये। शिष्य इस सम्बन्ध में चुप रहे और उन्होंने जो देखा था, उस विषय पर वे उन दिनों किसी से कुछ नहीं बोले।



📚 मनन-चिंतन



आज हम प्रभु येसु के ताबोर पर्वत पर रूपांतरण का पर्व मानते हैं। तीन शिष्यों - पेत्रुस, याकूब और योहन को ताबोर पर्वत पर ईश्वरीय उपस्थिति वाला अनुभव बहुत अच्छा लगा। वे आत्मविभोर हो जाते हैं और उन्हें लगता है कि वहीं ऐसे सुखद अनुभव में ही रह जायें। पेत्रुस प्रभु से कहते हैं कि हम यहीं रह जायें। आप कहे तो तीन तम्बूओं की व्यस्था कर दूं। वे वहां बहुत सुरक्षित व आरामदायक महसूस कर रहे थे। वे पहाड के नीचे जाकर जीवन की सच्चाई से रूबरू होना नहीं कहते थे। प्रभु पेत्रुस के प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया नहीं देते। प्रभु उन्हें लेकर सीधे पहाड के नीचे की ओर चल देते हैं। और उन्हें अपने दुःखभोग मरण एवं पुररूत्थान के बारे में बतलाते हैं। प्रभु यह नहीं चाहते थे कि वे उस ईश्वरीय अनुभव में ही खोए रहें बल्कि जीवन की सच्चाई से भी रूबरू हों।

आज प्रभु हम सबसे यही आह्वान करते हैं कि हम हमारे दैनिक जीवन के क्रूस से दूर न भागें। जिस प्रकार से प्रभु ने उसे अपने जीवन में स्वीकार किया हम भी उसे स्वीकार करें। हमारे जीवन में भी हम कई बार व्यक्तिगत प्रार्थनाओं में मिस्सा बलिदान में, तीर्थ स्थानों में या फिर आध्यात्मिक साधनाओं (रिट्रीट) आदि में कई प्रकार के ईश्वरीय आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त करते हैं। हमें उसी माहौल में रहना अच्छा लगता है। पर हमें यह याद रहे कि प्रभु हमें ऐसे अनुभव इसलिए देते हैं कि हम हमारे इस दुनियाई जीवन की समाप्ति के बाद इसे परिपूर्णता में प्राप्त करें। ये उस स्वर्गीय आनन्द व शांति का एक अंश मात्र है जिसे ईश्वर हमें भरपूरी से देने वाले हैं। उस भरपूर ईश्वरीय अनुभव को प्राप्त करने के लिए हमें पहाड से नीचे उतरकर जीवन की सच्चाई से रूबरू होते हुए, शैतान और उसकी ताकतों से लडते हुए, सब प्रकार के प्रलोभनों व बुराईयों पर विजय पाते हुए प्राप्त करना होगा। इसलिए हम हमारे जीवन में प्रभु के लिए समय निकालें। प्रभु के साथ लीन होकर अपने जीवन की कठानिईयों व चुनौतियों का सामना करने के लिए पर्याप्त शक्ति व कृपा हासिल करें। तथा उस कृपा के साथ हम प्रभु येसु के समान जीवन में आए हर क्रूस को गले लगाते हुए उनका अनुसरण करें। तभी हमें उनके ही समान मुक्ति का मुकूट हासिल होगा।




📚 REFLECTION



Today, we celebrate the feast of the transfiguration of the Lord Jesus on Mount Tabor. The three disciples - Peter, James and John - enjoyed the experience of the divine presence on Mount Tabor. They become self-absorbed and they feel that they should remain there only in such a pleasant experience. Peter tells the Lord that we should stay there. If you say, I will arrange three tents. They felt very safe and comfortable there. But Jesus didn’t react to what he said and took them down the hill and foretold his passion, death and resurrection. The Lord did not want him to be lost in that divine experience but He wants them to o face the reality of life also.

Today, Lord, calls upon all of us not to run away from the crosses of our daily lives. In our lives too, we sometimes have a variety of divine spiritual experience in personal prayers, in Holy Mass, in places of pilgrimage or in spiritual retreats, etc. We love being in that environment. But we must remember that the Lord gives us such experiences so that we can have it in its fullness after the end of our earthly life. It is just a fraction of the heavenly joy and peace that God is going to give us in abundance. In order to have that full divine experience, we have to come down from the mountain and face the reality of life, fighting Satan and his forces, overcoming all kinds of temptations and evil. So let us give time to the Lord in our lives. Get engrossed with GOD and gain enough strength and grace to face the difficulties and challenges of your life. And with that grace, let us embrace every cross that comes in our life, like Lord Jesus and follow Him. Only then will we get the crown of salvation.



 -Br Biniush topno


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गुरुवार, 05 अगस्त, 2021 वर्ष का अठारहवाँ सामान्य सप्ताह

 

गुरुवार, 05 अगस्त, 2021

वर्ष का अठारहवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ : गणना ग्रन्थ 20:1-13



1) इस्राएलियों का सारा समुदाय, पहले महीने, सिन नामक मरूभूमि पहुँचा और कुछ समय तक कादेश में रहा। वहाँ मिरयम की मृत्यु हो गयी और वह दफ़नायी गयी।

2) लोगों को पानी नहीं मिल रहा था, इसलिए वे एकत्र हो कर मूसा और हारून का विरोध करने लगे।

3) उन्होंने यह कहते हुए मूसा से शिकायत की, ''ओह! यदि हम अपने भाई-बन्धुओं के साथ ही प्रभु के हाथ मर गये होते!

4) क्या आप इसलिए प्रभु का समुदाय इस मरूभूमि में ले आये कि हम और हमारे पशु यहाँ मर जायें?

5) आप हमें मिस्र से निकाल कर इस अशुभ स्थान में क्यों ले आये, जहाँ न तो अजान मिलता है, न अंजीर, न अंगूर और न अनार? यहाँ तो पीने का पानी तक नहीं मिलता!''

6) मूसा और हारून सभा को छोड़ कर दर्शन कक्ष के द्वार पर आये। वे मुँह के बल गिर पड़े और उन्हें प्रभु की महिमा दिखाई दी।

7) प्रभु ने मूसा से यह कहा,

8) ''डण्डा ले लो और अपने भाई हारून के साथ समुदाय को एकत्र करो। तुम लोगों के सामने चट्टान को यह आदेश दोगे - हमें अपना पानी दो। इस प्रकार तुम चट्टान से पानी निकालोगे और तुम लोगों और पशुओं को पीने के लिए पानी दोगे।''

9) मूसा ने तम्बू से डण्डा ले लिया, जैसा कि प्रभु ने उसे आदेश दिया था।

10) मूसा और हारून ने चट्टान के सामने लोगों को एकत्र किया और उन से कहा, ''विद्रोहियों! सुनो। क्या हम तुम लोगों के लिए इस चट्टान से पानी निकालें?''

11) मूसा ने हाथ उठा कर दो बार चट्टान पर डण्डा मारा और चट्टान से पानी की धारा फूट निकली। इस प्रकार लोगों और पशुओं को पीने के लिए पानी मिला।

12) इसके बाद प्रभु ने मूसा और हारून से कहा, ''तुमने मुझ में विश्वास नहीं किया और इस्राएलियों की दृष्टि में मेरी पवित्रता को बनाये नहीं रखा ; इसलिए तुम इस समुदाय को उस देश नहीं पहुँचाओंगे, जिसे मैं उन्हें दे दूँगा।''

13) यह मरीबा का पानी है, जहाँ इस्राएलियों ने प्रभु की शिकायत की और प्रभु ने उनके सामने अपनी पवित्रता प्रकट की।



सुसमाचार : मत्ती 16:13-23



13) ईसा ने कैसरिया फि़लिपी प्रदेश पहुँच कर अपने शिष्यों से पूछा, "मानव पुत्र कौन है, इस विषय में लोग क्या कहते हैं?"

14) उन्होंने उत्तर दिया, "कुछ लोग कहते हैं- योहन बपतिस्ता; कुछ कहते हैं- एलियस; और कुछ लोग कहते हैं- येरेमियस अथवा नबियों में से कोई"।

15) ईस पर ईसा ने कहा, "और तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ?

16) सिमोन पुत्रुस ने उत्तर दिया, "आप मसीह हैं, आप जीवन्त ईश्वर के पुत्र हैं"।

17) इस पर ईसा ने उस से कहा, "सिमोन, योनस के पुत्र, तुम धन्य हो, क्योंकि किसी निरे मनुष्य ने नहीं, बल्कि मेरे स्वर्गिक पिता ने तुम पर यह प्रकट किया है।

18) मैं तुम से कहता हूँ कि तुम पेत्रुस अर्थात् चट्टान हो और इस चट्टान पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा और अधोलोक के फाटक इसके सामने टिक नहीं पायेंगे।

19) मैं तुम्हें स्वर्गराज्य की कुंजियाँ प्रदान करूँगा। तुम पृथ्वी पर जिसका निषेध करोगे, स्वर्ग में भी उसका निषेध रहेगा और पृथ्वी पर जिसकी अनुमति दोगे, स्वर्ग में भी उसकी अनुमति रहेगी।"

20) इसके बाद ईसा ने अपने शिष्यों को कड़ी चेतावनी दी कि तुम लोग किसी को भी यह नहीं बताओ कि मैं मसीह हूँ।

21) उस समय से ईसा अपने शिष्यों को यह समझाने लगे कि मुझे येरूसालेम जाना होगा; नेताओं, महायाजकों और शास्त्रियों की ओर से बहुत दुःख उठाना, मार डाला जाना और तीसरे दिन जी उठना होगा।

22) पेत्रुस ईसा को अलग ले गया और उन्हें यह कहते हुए फटकारने लगा, "ईश्वर ऐसा न करे। प्रभु! यह आप पर कभी नहीं बीतेगी।"

23) इस पर ईसा ने मुड़ कर, पेत्रुस से कहा "हट जाओ, शैतान! तुम मेरे रास्ते में बाधा बन रहो हो। तुम ईश्वर की बातें नहीं, बल्कि मनुष्यों की बातें सोचते हो।"



📚 मनन-चिंतन



आज के सुसमाचार में हम पेत्रुस के दो पक्षों को देखते हैं। प्रारंभ में वह येसु में महान अंतर्दृष्टि दिखाता है, उसे जीवित ईश्वर के पुत्र के रूप में पहचानता है, और जवाब में येसु उसे उस चट्टान के रूप में संबोधित करता है जिस पर वह कलीसिया का निर्माण करेगा। हालाँकि, पेत्रुस बाद में येसु को उनके दुःखभोग और मृत्यु के बारे में बोलने के पर फटकार लगाता है, और जवाब में येसु उसे शैतान,और उनके रास्ते की बाधा के रूप में संबोधित करते है। कलीसिया की नीव की चट्टान से ठोकर के पत्थर तक! एक गहरा विरोधाभास छिपा हुआ है। जब प्रभु के साथ हमारे संबंध की बात आती है तो कुछ ऐसा ही विरोधाभास हम सभी में होता है। हमारे जीवन में भी ऐसे क्षण आते हैं जब हम प्रभु की इच्छा के अनुरूप होते हैं और अन्य क्षण हम उनकी इच्छा के विपरीत होते हैं। तौभी प्रभु ने पेत्रुस के पर उसकी असफलताओं के बावजूद विश्वास रखा, और प्रभु हमारे विश्वासघाती हो जाने पर भी हमारे ऊपर अपना विश्वास बनाये रखते हैं।

आज के सुसमाचार पाठ के अनुसार,येसु ने अपनी कलीसिया का निर्माण एक त्रुटिपूर्ण चट्टान पर किया, एक ऐसी चट्टान जो जल्दी ही ठोकर का पत्थर बन सकती थी। पेत्रुस को चट्टान के रूप में संबोधित करते समय येसु ने कलीसिया को 'अपनी कलीसिया' कहा। क्योंकि यह उनकी कलीसिया है, यह तब भी टिकेगी , जब उनकी कलीसिया के चरवाहे अपनी जिम्मेवारी और जवाबदारी में असफल हो जाते हैं। क्योंकि कलीसिया में जीवित प्रभु का वास है, जो युग के अंत तक उसके भीतर मौजूद है (मत्ती 28:20), अधोलोक की, बुराई और मृत्यु की शक्तियाँ, इसके खिलाफ कभी भी टिक नहीं पाएंगी; वे अंततः विजयी नहीं होंगे। पौलुस घोषणा करता है कि येसु ही वह अंतिम नींव है जिस पर कलीसिया बनी है (1 कुरिं 3:11)। येसु के शिष्य के रूप में हमारी कमजोरी में भी जब हम ठोकर के पत्थर बन जाते हैं, तब भी येसु हमारी दृढ चट्टान बने रहते हैं।



📚 REFLECTION



In the Gospel today, we see two sides of Peter. Initially he shows a great insight into Jesus, recognizing him as the Son of the living God, and in response Jesus refers to him as the rock on which he will build the church. However, Peter later rebukes Jesus for speaking about his suffering and death, and in response Jesus addresses him as the devil, and the obstacle in his way.

From the foundation rock of the church to the stumbling stone! a deep contradiction is hidden. Something similar, even a contradiction, happens to all of us when it comes to our relationship with the Lord. There are moments in our life when we are in accordance with the will of the Lord and other moments, we are contrary to His will. Yet the Lord kept faith with Peter in spite of his failures, and the Lord has faith in us, even when we show ourselves to be unfaithful to him.

According to today's the Gospel, Jesus built his church on a flawed rock, a rock that could quickly become a stumbling block. When addressing Peter as a rock, Jesus referred to the church as 'His Church'. Because this is His church, it will last even when the shepherds in their church fail in their responsibility. Because the church is inhabited by the living Lord, who lives in her until the end of the age (Matthew 28:20), The powers of Hades, evil and death, will never be able to stand against it; They won't be victorious in the end. Paul declares that Jesus is the final foundation upon which the church is built (1 Cor. 3:11). Even when we become a stumbling stone in our weakness as disciples of Jesus, he remains our Strong Hold and the Rock.



 - Br. Biniush Topno


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बुधवार, 04 अगस्त, 2021 वर्ष का अठारहवाँ सामान्य सप्ताह

 

बुधवार, 04 अगस्त, 2021

वर्ष का अठारहवाँ सामान्य सप्ताह




पहला पाठ : गणना ग्रन्थ 13:1-2.25-14:1.26-29.34-35



1) प्रभु ने मूसा से कहा,

2) ''जो कनान देश में इस्राएलियों को देने जा रहा हूँ, उसकी टोह लगाने के लिए आदमियों को भेजो - हर एक वंश से एक प्रतिष्ठित व्यक्ति को।''

25) चालीस दिन बाद वे उस देश की टोह लगा कर लौटे।

26) वे पारान की मरुभूमि के कादेश नामक स्थान पर मूसा, हारून और इस्राएल के सारे समुदाय के पास आये। उन्होंने उनके और सारे समुदाय के सामने अपना विवरण प्रस्तुत किया और उन्हें उस देश के फल दिखाये।

27) उन्होंने मूसा से कहा, ''हम उस देश में गये, जहाँ आपने हमें भेजा था। वहाँ दूध और मधू की नदियाँ बहती हैं। ये रहे वहाँ के फल!

28) वहाँ के निवासी बलवान् है। उनके नगर सुरक्षित और बहुत बड़े हैं। हमने वहाँ अनाक के वंशजों को भी देखा है।

29) नेगेब प्रदेश में अमालेकी रहते है ; पहाड़ी प्रदेश में हित्ती, यबूसी और अमोरी; समुद्र के किनारे और यर्दन नदी के तट पर कनानी निवास करते हैं।

30) कालेब ने मूसा के विरुद्ध भुनभुनाने वाले लोगों को शान्त किया और कहा, ''हम वहाँ चलें और उस देश को अपने अधिकार में कर लें। हम उसे जीतने में समर्थ हैं।''

31) किन्तु जो व्यक्ति कालेब के साथ गये थे, वे बोले, ''हम उन लोगों का सामना नहीं कर सकते, क्योंकि वे हम से बलवान् हैं।

32) वे जिस देश की टोह लगा चुके थे, उसकी निन्दा करने लगे और बोले, ''हम जिस देश की टोह लगा चुके हैं, वह एक ऐसा देश है, जो अपने निवासियों को खा जाता है। हमने जिन लोगों का वहाँ देखा है, वे सब बहुत लम्बे कद के हैं।

33) हमने वहाँ भीमकाय लोगों को भी देखा। अनाकी भीमकाय लोगों के वंशज हैं। उनकी तुलना में हम अपने को टिड्डियाँ समझते थे और वे भी हमें यही समझते होंगे।''

1) सारा समुदाय ये बातें सुन कर ज़ोर से चिल्लाने लगा और रात भर विलाप करता रहा।

26) प्रभु ने मूसा और हारून से यह कहा,

27) ''मैं कब तक इस दुष्ट समुदाय की शिकायतें सहन करता रहूँ? मैं इस्राएलियों से अपनी शिकायतें सुन चुका हूँ।

28) उन्हें यह बता दो - प्रभु कहता है, “अपने अस्तित्व की शपथ! मैंने तुम लोगों को जो बातें कहते सुना है, उन्हीं के अनुसार मैं तुम्हारे साथ व्यवहार करूँगा।

29) यहाँ इस मरूभूमि में तुम्हारे शव पड़े रहेंगे, क्योंकि तुम लोगों ने मेरी शिकायत की है। जितने लोगों के नाम जनगणना के समय लिखे गये थे और जिनकी आयु बीस के ऊपर है,

34) तुम लोगों ने चालीस दिन तक उस देश का निरीक्षण किया। उनका हर दिन एक वर्ष गिना जायेगा। इसके अनुसार तुम्हें चालीस वर्ष तक अपने अपराधों का फल भुगतना पड़ेगा और तुम जान जाओगे कि मेरा विरोध करने का फल क्या होता है।

35) मैं प्रभु यह कह चुका हूँ। इस दुष्ट समुदाय ने मेरा विरोध किया है। मैं इसके साथ यही व्यवहार करूँगा। यह इस मरूभूमि में समाप्त हो जायेगा। ये लोग सब-के-सब यहाँ मर जायेंगे।''



सुसमाचार : मत्ती 15:21-28



21) ईसा ने वहाँ से बिदा होकर तीरूस और सिदोन प्रान्तों के लिए प्रस्थान किया।

22) उस प्रदेश की एक कनानी स्त्री आयी और पुकार-पुकार कर कहती रही, ’’प्रभु दाऊद के पुत्र! मुझ पर दया कीजिए। मेरी बेटी एक अपदूत द्वारा बुरी तरह सतायी जा रही है।’’

23) ईसा ने उसे उत्तर नहीं दिया। उनके शिष्यों ने पास आ कर उनसे यह निवेदन किया, ’’उसकी बात मानकर उसे विदा कर दीजिए, क्योंकि वह हमारे पीछे-पीछे चिल्लाती आ रही है’’।

24) ईसा ने उत्तर दिया, ’’मैं केवल इस्राएल के घराने की खोई हुई भेड़ों के पास भेजा गया हूँ।

25) इतने में उस स्त्री ने आ कर ईसा को दण्डवत् किया और कहा, ’’प्रभु! मेरी सहायता कीजिए’’।

26) ईसा ने उत्तर दिया, ’’बच्चों की रोटी ले कर पिल्लों के सामने डालना ठीक नहीं है’’।

27) उसने कहा, ’’जी हाँ, प्रभु! फिर भी स्वामी की मेज़ से गिरा हुआ चूर पिल्ले खाते ही हैं’’।

28) इस पर ईसा ने उत्तर दिया ’’नारी! तुम्हारा विश्वास महान् है। तुम्हारी इच्छा पूरी हो।’’ और उसी क्षण उसकी बेटी अच्छी हो गयी।



📚 मनन-चिंतन



आज जब हम आर्स की चंगाई कहे जाने वाले, सभी पुरोहितों के संरक्षक संत योहन मारिया वियान्नी का पर्व मनाते हैं, तो आइए हम इस छोटे से पर एक महान संत के जूनून और उत्साह को आत्मसात करें। वे कैसे सब प्रकार की नकारात्मक और निराशाजनक परिवेश में रहते हुए भी एक सकारात्मक आध्यात्मिक परिवर्तन लाते हैं ।

उनके पुरोहित अभिषेक तक की चुनितियों से तो हम सब वाकिफ ही हैं कि किस प्रकार से पढाई में कमज़ोर होते हुए भी ईश्वर की कृपा से वे प्रभु की वेदी तक पहुंच पाते हैं। उनके अभिषेक के बाद जब उनकी नियुक्ति आर्स नामक एक ऐसी पल्ली में होती है जहाँ की बदहाली की वजह से वहां कोई भी पुरोहित वहाँ जाना पसंद नहीं करता था। उनके विकार जनरल ने उन्हें वहां भेजते समय उनसे कहा था, "उस पल्ली में ईश्वर प्यार समाप्त हो चूका है; शायद आप उसे लौटा पाएं ” ये शब्द उल्लेखनीय रूप से एक नबूवत के शब्द थे पर उस समय विकार जनरल की मंशा यह नहीं थी। वह तो उस स्थान की बदहाली वाली परिस्थिति से उनको परिचित करा रहे थे।

अगर हम योहन वियान्नी को आर्स की उस पल्ली में पहली सुबह चर्च की घंटी बजाते हुए देखते हैं तो यह याद रहे कि यह एक टूटी हुई इमारत में एक टूटी हुई घंटी थी। आज इस तरह की इमारत, जल्द ही, बंद इमारतों की सूचि में आ जाएगी। कहने का मतलब वो ईमारत शायद रहने और प्रार्थना के लायक नहीं थी। पर उस साधारण लेकिन महान संत ने अपनी प्रार्थना व आध्यात्मिकता के बदोलत सब कुछ बदल के रख दिया। हम उनकी प्रार्थना में उनके साहस की एक झलक पा सकते हैं, एक प्रार्थना जिसे कई पल्ली पुरोहितों को पूरे मन से ईश्वर से पूछने में संकोच होगा: "हे, ईश्वर मेरे पल्ली का रूपांतरण और पल्लीवासियों का मनपरिवर्त कर; इसके बदले मैं जीवन भर आप जो कुछ भी चाहो भुगतने को तैयार हूं।" ईश्वर ने उस प्रार्थना का उत्तर दिया और उस पल्ली का आमूल परिवर्तन दिया और सैकड़ों हजारों ने अंततः पृथ्वी पर उस छोटे से स्थान की यात्रा की। यह एक "नए सुसमाचार प्रचार" की शुरुआत सा प्रतीत होता है।

उनके आत्मविश्वास को समझने के लिए हमें यह जानने के लिए प्रत्येक सुबह पहले उस दृश्य को देखने की आवश्यकता होगी, जहां से यह विश्वास बहता है:पवित्र संदूक के सामने घुटने टेकना, यूखारिस्त में उपस्थित जिन्दा येसु जो धन्य संस्कार में हर दिन की शुरुआत में उनसे मिलता था। आज के बिगड़ते समाज और राह भटकती आज की पीढ़ी को सही मार्ग पर लाने के लिए सिर्फ बड़े -बड़े उपदेश नहीं घुटनों पर आकर रोते हुए की जाने वाली प्रार्थना की ज़रूरत है। आज कलीसिया को हज़ारों वियान्नी की ज़रूरत है। न केवल पुरोहित पर वियान्नी जैसे माता - पिता, धर्म प्रचारक और शिक्षक - शिक्षिकाएं जो वास्तव में अपने परिवार, समाज व दुनिया में आध्यात्मिकता की एक लहर के लिए रोते और बिलखते हुए प्रार्थना करें।



📚 REFLECTION



Today as we celebrate John Maria Vianni, the patron saint of all priests, called the cure of Ars, let us imbibe the passion and enthusiasm of this small yet great saint. How he brings about a positive spiritual transformation even in all kinds of negative and depressing surroundings. We are all aware of the challenges faced up to his priestly ordination and how, despite being weak in studies, by the grace of God, he reached the altar of the Lord. After his ordination, when he is appointed to a parish called Ars, where no priest liked to go, because of the growing evil there. His Vicar General, while sending him there, told him, "There is no love of God left in that parish, perhaps you can revive it." These words were remarkably the words of a prophet, but that was not the intention of the vicar general at the time. It was to introduce him to the dilapidated and disappointing condition of the place.

If we see John Vianni ring the church bell in that parish of Ars on the first morning, remember that it was a broken bell in a broken building. Today such a building will, soon, be on the list of closed buildings. That is to say, that building was probably not worth living and useful for prayer. But that simple but great saint changed everything through his prayer and spirituality. We can see a glimpse of his courage in his prayer, a prayer that many parish priests would hesitate to ask God wholeheartedly: "O God, convert my parish and the parishioners; and for that I am ready to suffer whatever you give me." God answered that prayer and radically changed that parish, and hundreds of thousands eventually travelled to that little place on earth. This appears to be the beginning of a "new evangelism”. To understand His confidence, we need to see the from where every morning his faith, power and energy flow: He used to meet, kneeling before the Holy Tabernacle, the living Jesus present in the Eucharist at the beginning of each day in the Blessed Sacrament.

In order to bring today's deteriorating society and the fallen generation on the right path, not only big-big sermons needed but we need to come on our knees and with tears need to pray for our generation. Today the church needs thousands of Viannis. Not only priests but parents, missionaries and teachers like Vianni who actually weep and pray for a wave of spirituality in their family, society and the world.


 -Br. Biniush Topno



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