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सोमवार, 10 मई, 2021 पास्का का छठवाँ सप्ताह

 

सोमवार, 10 मई, 2021

पास्का का छठवाँ ससप्ताह



पहला पाठ : प्रेरित-चरित 16:11-15


11) त्रोआस से चल कर हम नाव पर सीधे समाथ्राके, दूसरे दिन नेआपोलिस

12) और वहाँ से फिलिप्पी पहुँचे। फिलिप्पी मकेदूनिया प्रान्त का मुख्य नगर और रोमन उपनिवेश है। हम कुछ दिन वहाँ रहे।

13) विश्राम के दिन हम यह समझ कर शहर के बाहर नदी के तट आये कि वहाँ कोई प्रार्थनागृह होगा। हम बैठ गये और वहाँ एकत्र स्त्रियों से बातचीत करते रहे।

14) सुनने वाली महिलाओं में एक का नाम लुदिया था और वह थुआतिरा नगर की रहने वाली थी। वह बैंगनी कपड़ों का व्यापार करती और ईश्वर पर श्रद्धा रखती थी। प्रभु ने उसके हृदय का द्वार खोल दिया और उसने पौलुस की शिक्षा स्वीकार कर ली।

15) सपरिवार बपतिस्मा ग्रहण करने के बाद लुदिया ने हम से यह अनुरोध किया, ’’आप लोगों ने माना है कि मैं सचमुच प्रभु में विश्वास करती हूँ, तो आइए, मेरे यहाँ ठहरिए’’। और उसने इसके लिए बहुत आग्रह किया।


सुसमाचार : योहन 15:26-16:4


15:26) जब वह सहायक, पिता के यहाँ से आने वाला वह सत्य का आत्मा आयेगा, जिसे मैं पिता के यहाँ से तुम लोगो के पास भेजूगाँ तो वह मेरे विषय में साक्ष्य देगा।

27) और तुम लोग भी साक्ष्य दोगे, क्योंकि तुम प्रारंभ से मेरे साथ रहे हो।

16:1) मैंने तुम लोगो से यह इसीलिये कहा है कि तुम विचलित नहीं हो।

2) वे तुम्हें सभागृहों से निकाल देंगे। इतना ही नहीं, वह समय आ रहा है, जब तुम्हारी हत्या करने वाला यह समझेगा कि वह ईश्वर की सेवा कर रहा है।

3) वे यह सब इसीलिये करेंगे कि उन्होंने न तो पिता को पहचाना है और न मुझ को।

4) मैंने तुम लोगों से यह इसलिये कहा है कि समय आने पर तुम्हें यह स्मरण रहे कि मैंने तुम्हें पहले ही सचेत किया था।


📚 मनन-चिंतन


प्रभु येसु ने इस संसार से जाने से पूर्व अपने शिष्यों को एक सहायक भेजने की प्रतीज्ञा की थी। वह सहायक कोई ओर नहीं परंतु पवित्र आत्मा है, सत्य का आत्मा जो प्रभु येसु के विषय में साक्ष्य देता है।

पवित्र आत्मा हम सभी के लिए एक सहायक के रूप में दिया गया है परंतु हममें से अधिकतर लोग उस सहायक को अपने जीवन में कार्य करने नहीं देते इस कारण हम येसु को पहचान नहीं पाते और उनको अपने जीवन में साक्ष्य नहीं दे पाते। पवित्र आत्मा उतरने से पूर्व शिष्य डरें हुए थे, प्रभु के वचनों को सहीं तरह से नहीं समझ पाते थे, पवित्र आत्मा के आगमन के बाद हीं शिष्यों ने प्रभु की कहीं हुई हर बात को समझा तथा निडरता पूर्वक येसु का साक्ष्य लोंगों के सामने प्रकट किया।

आज के युग में कलीसिया हर प्रकार से सम्पन्न है परंतु कमी है तो सिर्फ पवित्र आत्मा को कार्यांवित करने की। आईये हम ईश्वर से प्रार्थना करें कि जो पवित्र आत्मा का वरदान हमने दृढकरण संस्कार द्वारा ग्रहण किया है हम उनको पूर्ण रीति से समझें और पवित्र आत्मा को अपने जीवन में कार्य करने दें। आमेन!



📚 REFLECTION



Before leaving, Jesus assured the disciples of sending the helper to them. That helper is none other but Holy Spirit himself, the Spirit of truth who witnesses Lord Jesus.

We have received the Holy Spirit as a helper but many of us do not allow the Holy Spirit to work in our lives that is the reason we do not recognize Jesus and couldn’t be able to give his witness through our lives. Before descending of the Holy Spirit the disciples were afraid, were not able to understand Jesus’ words fully; it is after the coming of the Holy Spirit the disciples understood the meaning of every word spoken by Jesus and gave the witness of Jesus with boldness.

In present time the Church is affluent with many things but only thing which she lacks is allowing the Holy Spirit to work. Let’s pray to the Lord the gift of Holy Spirit which we received during the time of Sacrament of Confirmation, we may understand the mystery of it in fuller sense and allow the Holy Spirit to work in our lives. Amen!


 -Br. Biniush Topno



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आज का पवित्र वचनइतवार, 9 मई, 2021 पास्का का छठवाँ इतवार

 

इतवार, 9 मई, 2021

पास्का का छठवाँ इतवार

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 10:25-26,34-35,44-48


25) जब पेत्रुस उनके यहाँ आया, तो करनेलियुस उस से मिला और उसने पेत्रुस के चरणों पर गिर कर उसे प्रणाम किया।

26) किंतु पेत्रुस ने उसे यह कहते हुए उठाया, ’’खड़े हो जाइए, मैं भी तो मनुष्य हूँ’’

34) पेत्रुस ने कहा, ’’मैं अब अच्छी तरह समझ गया हूँ कि ईश्वर किसी के साथ पक्ष-पात नहीं करता।

35) मनुष्य किसी भी राष्ट्र का क्यों न हो, यदि वह ईश्वर पर श्रद्धा रख कर धर्माचरण करता है, तो वह ईश्वर का कृपापात्र बन जाता हैं।

44) पेत्रुस बोल ही रहा था कि पवित्र आत्मा सब सुनने वालों पर उतरा।

45) पेत्रुस के साथ आये हुए यहूदी विश्वासी यह देख कर चकित रह गये कि गैर-यहूदियों को भी पवित्र आत्मा का वरदान मिला है;

46) क्योंकि वे गैर-यहूदियों को भिन्न-भिन्न भाषाएँ बोलते और ईश्वर की स्तुति करते सुन रहे थे। तब पेत्रुस ने कहा,

47) ’’इन लोगों को हमारे ही समान पवित्र आत्मा का वरदान मिला है, तो क्या कोई इन्हें बपतिस्मा का जल देने से इंकार कर सकता है?

48) और उसने उन्हें ईसा मसीह के नाम पर बपतिस्मा देने का आदेश दिया। तब उन्होंने पेत्रुस से यह कहते अनुरोध किया, ’’आप कुछ दिन हमारे यहाँ रहिए’’।


दूसरा पाठ : योहन का पहला पत्र 4:7-10


7) प्रिय भाइयो! हम एक दूसरे को प्यार करें, क्योंकि प्रेम ईश्वर से उत्पन्न होता है।

8) जौ प्यार करता है, वह ईश्वर की सन्तान है और ईश्वर को जानता है। जो प्यार नहीं करता, वह ईश्वर को नहीं जानता; क्येोंकि ईश्वर प्रेम है।

9) ईश्वर हम को प्यार करता है। यह इस से प्रकट हुआ है कि ईश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को संसार में भेजा, जिससे हम उसके द्वारा जीवन प्राप्त करें।

10) ईश्वर के प्रेम की पहचान इस में है कि पहले हमने ईश्वर को नहीं, बल्कि ईश्वर ने हम को प्यार किया और हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए अपने पुत्र को भेजा।


सुसमाचार : सन्त योहन 15:9-17


9) जिस प्रकार पिता ने मुझ को प्यार किया है, उसी प्रकार मैंने भी तुम लोगों को प्यार किया है। तुम मेरे प्रेम से दृढ बने रहो।

10) यदि तुम मेरी आज्ञओं का पालन करोगे तो मेरे प्रेम में दृढ बने रहोगे। मैंने भी अपने पिता की आज्ञाओं का पालन किया है और उसके प्रेम में दृढ बना रहता हूँ।

11) मैंने तुम लोगों से यह इसलिये कहा है कि तुम मेरे आनंद के भागी बनो और तुम्हारा आनंद परिपूर्ण हो।

12) मेरी आज्ञाा यह है जिस प्रकार मैंने तुम लोगो को प्यार किया, उसी प्रकार तुम भी एक दूसरे को प्यार करो।

13) इस से बडा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिये अपने प्राण अर्पित कर दे।

14) यदि तुम लोग मेरी आज्ञाओं का पालन करते हो, तो तुम मेरे मित्र हो।

15) अब से मैं तुम्हें सेवक नहीं कहूँगा। सेवक नहीं जानता कि उसका स्वामी क्या करने वाला है। मैंने तुम्हें मित्र कहा है क्योंकि मैने अपने पिता से जो कुछ सुना वह सब तुम्हें बता दिया है।

16) तुमने मुझे नहीं चुना बल्कि मैंने तुम्हें इसलिये चुना और नियुक्त किया कि तुम जा कर फल उत्पन्न करो, तुम्हारा फल बना रहे और तुम मेरा नाम लेकर पिता से जो कुछ माँगो, वह तुम्हें वही प्रदान करे।

17) मैं तुम लोगों को यह आज्ञा देता हूँ एक दूसरे को प्यार करो।


📚 मनन-चिंतन


प्रेम या प्यार एक ऐसा शब्द है जिसे हम कई बार सुनते और पढ़ते आये है परंतु यह शब्द पढ़ने या सुनने से समझ में नहीं आता परंतु यह शब्द अनुभव करने से ही समझ में आता है। इस प्रेम का कुछ अंश हम अपने परिवारों में अनुभव करते है, रिश्तेदारों में अनुभव करते है या दोस्ती में अनुभव करते है। उस सम्पूर्ण प्रेम का अनुभव हम तब कर पाते है जब हम प्रभु को पूर्ण रूप से जान जाते है। क्योंकि ईश्वर कोई और नहीं परंतु प्रेम है। ईश्वर ने इस संसार को प्रेम से बनाया, मनुष्यों को प्रेम से बनाया। उसी प्रेम से मनुष्य को आगे बढ़ाया और उसी प्रेम के कारण अपने इकलौते पुत्र को इस संसार के लिए अर्पित कर दिया।

अब तक हमने माता-पिता, भाई-बहन, दोस्तों के ही प्यार को अनुभव किया है परंतु इस सबसे ऊपर ईश्वर का प्रेम है जिसमें न तो कोई भेदभाव है न ईर्ष्या, न जलन। यह एक शुद्ध प्रेम है। जो प्रभु के प्रेम का अनुभव करता है वह अपने आप दूसरो को प्रेम करने लगता है। क्योकि प्रभु का प्रेम एक जल स्रोत की तरह है जो बहता रहता है।

प्रभु के प्रेम का अनुभव करने के लिए हमंे प्रभु को जानना होगा, प्रभु के वचनों को समझना होगा और उनकी आज्ञाआंे पर चलना होगा।

इस संसार में हम पाते है कि कुछ लोग अपने माता-पिता के बुजुर्ग हो जाने पर उनका ध्यान नहीं रखते या उन्हें वृद्धाआश्रम में छोड़ देते है। ये वे लोग होते है जिन्हांेने अपने माता-पिता के प्यार, उनके त्याग, बलिदान को कभी नहीं समझा। अगर हम भी प्रभु के त्याग, बलिदान और प्यार को नहीं समझेंगे तो हम भी प्रभु और दूसरों से केवल मतलबी या दिखावटी प्रेम ही करेंगे।

प्रभु के प्रेम ने बहुतों को बदल दिया। प्रभु के प्रेम ने समाज में तिरस्कृत लेवी और जकेयुस को नया जीवन दिया, प्रभु के प्रेम ने समारी स्त्री और पाप में पकड़ी गई स्त्री को बदल कर रख दिया, प्रभु के प्रेम ने पेत्रुस को पश्चाताप से भर कर उसके ह्दय को प्रेम से भर दिया। प्रभु के प्रेम ने शिष्यों और कई संतो को चुना और नियुक्त किया कि वे जा कर फल उत्पन्न करें।

हम प्रभु से अपने जरूरतों के लिए बहुत से चीजें मॉंगते है आज हम ईश्वर से प्रार्थना करें कि प्रभु हमें अपना प्रेम का अनुभव देे। यह प्रेम हमारे जीवन में एक नया बदलाव और परिवर्तन लायें। आमेन


📚 REFLECTION



Love is the word which we might have heard and read about many times but we may not understand it by merely reading and hearing but it can be understood only by experiencing. We experience some fraction of love in our families, in relationships or in friendship. We experience the fullness of love when we recognize the Lord in fullness because God is none other than love itself. God has created this world, the humans with love; with that same love lead the human and with that same love gave his only begotten Son to the world.

Till now we have experienced only the love of our parents, brothers-sisters, friends and relatives but the love of God is above all this in which there is no partiality, no envy and jealousy. This is the real love. One who experience the love of God, he/she himelf/herself start loving others, because the love of God is like the water souce which keeps on flowing.

To experience the love of God we have to recognize the Lord, understand his words and have to live according to his commandments.

We see in this world that many do not take care of their parents when they become old or they leave them to oldage home. These are the people who have never understood the love, pain and sacrifices of their parents. If we too also do not understand the sacrifice, pain and love of the Lord then we will love God and others only superficially or for the benefits.

The love of God has changed many. Love of God has given new life to socially-rejected Levi and Zaccheaus, love of God has changed the Samaritan woman and the woman caught in adultery, love of God made Peter to realize his mistake and filled his heart with love, love of God has chosen the disciples and many saints and appointed them so that they can go and bear fruit.

We ask the Lord many things according to our needs; let’s ask today that we may experience His unconditional love. May the love of God bring new changes in our lives. Amen!



मनन-चिंतन-2


आज के पाठों का सार और न केवल आज के पाठों का बल्कि ईश्वर के पूरे मुक्तिविधान का सार है ईश्वर का प्रेम। प्रेम, ईश्वर के हर कार्य एवं प्रत्येक व्यक्ति के लिए ईश्वर द्वारा निर्धारित जीवन की हर योजना का आधार है। सारी सृष्टि का ही आधार प्रेम है। लेकिन प्रभु येसु ने ईश्वर के इस प्रेम की नई व्याख्या की है। एक नया रूप दिया है, नया चेहरा दिया है

पुराने व्यवस्थान की पहली पुस्तक के प्रारम्भ में हम पूरी दुनिया के सृजन का विवरण पढ़ते हैं। इसमें हम पढ़ते हैं कि कैसे ईश्वर ने मनुष्य को पूरी सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ स्थान प्रदान किया। सम्पूर्ण पुराने व्यवस्थान में हम मनुष्यों के प्रति ईश्वर के प्रेम का वर्णन सुनते हैं। मनुष्य बार-बार गलती करता जाता है, और ईश्वर बार-बार उसे अपने पास लाने की कोशिश करते हैं। चूँकि मनुष्य ईश्वर से दूर भागता है अतः वह ईश्वर को जान नहीं पाता है। अगर हमें ईश्वर को जानना और समझना है तो हमें उससे दूर भागना बंद करना और चैन से ईश्वर को खोजना चाहिये क्योंकि ईश्वर कहते हैं, “शान्त हो और जान लो कि मैं ही ईश्वर हूँ...” (स्तोत्र 46:10) ईश्वर को न जानना और उससे दूर भागना न केवल प्राचीनकाल के लोगों के अन्दर विद्यमान था बल्कि आधुनिक लोगों में भी विद्यमान है। बल्कि वर्तमान में ईश्वर से दूर भागने की प्रवृत्ति आज के युग में और भी अधिक तेज है।

जब हम किसी व्यक्ति के सीधे संपर्क में नहीं रहते और उससे दूर भागते हैं, तो कई बार इस बात की सम्भावना होती है कि हम उस व्यक्ति के बारे में गलतफमियां भी पाल लेते हैं। यही बात ईश्वर के बारे में भी शत-प्रतिशत सच है। पुराने व्यवस्थान में और साथ ही नए व्यवस्थान में भी ऐसे बहुत से लोग हैं जो ईश्वर को अच्छी तरह से नहीं जानते थे, ईश्वर के प्रेम को भलीभांति नहीं जानते थे और इसलिए न केवल अंधकार में रहते थे बल्कि उसके विरुद्ध भी कार्य करते थे। (उदा. सन्त पौलुस जो पहले साउल थे) बाद में जब उन्हें अपनी गलती का अहसास होता था तो वे पूरी तरह बदल जाते थे।

उदाहरण के लिए हम अपने आदि माता-पिता आदम और हेवा को देखते हैं। जब उन्होंने शैतान के बहकावे में आकर ईश्वर के विरुद्ध कार्य किया तो वे छुप गए। वे ईश्वर से डर गए (देखें उत्पत्ति ग्रन्थ 3:9-10)। जब हम ईश्वर के वास्तविक स्वभाव को नहीं जानते तो उन से डर जाते हैं और उनसे छुपने की कोशिश करते हैं। हालाँकि इससे हमारे प्रति ईश्वर के प्रेम में कोई कमी नहीं आती।

ईश्वर को गहराई से न जानने के कारण मनुष्यों के डरने की पुराने व्यवस्थान में अनेक घटनाएँ हैं। निर्गमन ग्रन्थ के २०वें अध्याय में हम पढ़ते हैं कि जब ईश्वर लोगों से बात करना चाहते थे तो लोग डर रहे थे। वे मूसा से कहने लगे “...आप हमसे बोलिए और हम आपकी बात सुनेंगे, किन्तु ईश्वर हमसे नहीं बोले, नहीं तो हम मर जायेंगे।” (निर्गमन 20:19) आगे राजाओं के पहले ग्रन्थ के 19 वें अध्याय में हम पढ़ते हैं की नबी एलियाह ने सोचा कि प्रभु प्रचण्ड आंधी में, या भूकम्प में, या अग्नि में था लेकिन प्रभु मन्द समीर में था (देखें 1 राजाओं 19:11-13)। कई बार हमारे मन में प्रभु की तस्वीर कुछ और होती है और वास्तविकता में कुछ और। यह एक प्रकार की गलतफहमी है और प्रभु के बारे में हमारी अज्ञानता है।

पिता ईश्वर के बारे में मानव जाति के मन में जो गलत छवि बनी हुई है, उसी को प्रभु येसु सुधारने आये हैं। प्रभु येसु ने अपने वचनों, अपने कार्यों एवं अपने चमत्कारों द्वारा हमें यही बताया कि पिता ईश्वर क्रोधी नहीं दयालु हैं, पिता ईश्वर भयाभय नहीं प्यारे पिता हैं। वे आज के सुसमाचार में हमे बताते हैं कि पिता ईश्वर उन्हें प्यार करते हैं, और जिस तरह पिता ईश्वर प्रभु येसु को प्यार करते हैं उसी तरह प्रभु येसु हमें प्यार करते हैं। जितनी गहराई से प्रभु येसु पिता ईश्वर को जानते हैं, उतनी गहराई से और कोई पिता ईश्वर को नहीं जानता। “...इसी तरह पिता को कोई भी नहीं जानता, केवल पुत्र जानता है, और वही जिस पर पुत्र उसे प्रकट करने की कृपा करे।” (मत्ती11:27) “यह न समझो कि किसी ने पिता को देखा है, जो ईश्वर की ओर से आया है, उसी ने पिता को देखा है।” (योहन 6:46)। जिस तरह पिता ईश्वर प्रभु येसु को प्यार करते हैं उसी तरह प्रभु येसु हमें प्यार करते हैं और वे चाहते हैं कि हम भी उसी तरह एक दूसरे को प्यार करें, तभी हम प्रभु येसु को भली भांति जानेंगे और प्रभु येसु के द्वारा पिता ईश्वर की वास्तविक छवि के दर्शन कर पाएंगे। पवित्र आत्मा इसके लिए हमारा मार्गदर्शन करे। आमेन|


 Br. Biniush Topno


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8 मई, 2021 शनिवार - पास्का का पाँचवाँ सप्ताह

 

8 मई, 2021

शनिवार - पास्का का पाँचवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 16:1-10

1) इसके बाद वह देरबे और लुस्त्रा पहुँचा। वहाँ तिमथी नामक एक शिष्य था, जो ईसाई यहूदी माता तथा यूनानी पिता का पुत्र था।

2) लुस्त्रा और इकोनियुम के भाइयों में उसका अच्छा नाम था।

3) पौलुस चाहता था कि वह यात्रा में उसका साथी बने। उस प्रदेश में रहने वाले यहूदियों के कारण उसने तिमथी का ख़तना कराया, क्योंकि सब जानते थे कि उसका पिता यूनानी है।

4) वे नगर-नगर जा कर येरुसालेम में प्रेरितों तथा उनके पालन का आदेश देते थे।

5) इस प्रकार कलीसियाओं का विश्वास दृढ़ होता जा रहा था और उनकी संख्या दिन-दिन बढ़ रही थी।

6) जब पवित्र आत्मा ने उन्हें एशिया में वचन का प्रचार करने से मना किया, तो उन्होंने फ्रुगिया तथा गलातिया का दौरा किया।

7) मुसिया के सीमान्तों पर पहुँच कर वे बिथुनिया जाने की तैयारी कर रहे थे कि ईसा के आत्मा ने उन्हें अनुमति नहीं दी।

8) इसलिए वे मुसिया पार कर त्रोआस आये।

9) वहाँ पौलुस ने रात को एक दिव्य दर्शन देखा। एक मकेदूनी उसके सामने खड़ा हो कर यह अनुरोध कर रहा था, ’’आप समुद्र पार कर मकेदूनिया आइए और हमारी सहायता कीजिए’’।

10) इस दर्शन के बाद हमने यह समझ कर तुरन्त मकेदूनिया जाने का प्रयत्न किया कि ईश्वर ने वहाँ सुसमाचार का प्रचार करने के लिए हमें बुलाया है।


सुसमाचार : योहन 15:18-21


18) यदि संसार तुम लोगों से बैर करे, तो याद रखो कि तुम से पहले उसने मुझ से बैर किया।

19) यदि तुम संसार के होते, तो संसार तुम्हें अपना समझ कर प्यार करता। परन्तु तुम संसार के नहीं हो, क्योंकि मैंने तुम्हें संसार में से चुन लिया हैं। इसीलिये संसार तुम से बैर करता है।

20) मैंनें तुम से जो बात कही, उसे याद रखो- सेवक अपने स्वामी से बडा नहीं होता। यदि उन्होंने मुझे सताया, तो वे तुम्हें भी सतायेंगे। यदि उन्होंने मेरी शिक्षा का पालन किया तो वे तुम्हारी शिक्षा का भी पालन करेंगे।

21) वे यह सब मेरे नाम के कारण तुम लोगो के साथ करेंगे क्योंकि जिसने मुझे भेजा, उसे वे नहीं जानते।


📚 मनन-चिंतन


प्रभु येसु ने अपने कार्यों और विशेष करके स्वर्गराज्य के फैलाव के लिए शिष्यों को चुनते है। वे उनके कार्य, रंग, रूप या धन दौलत को देखकर नहीं अपितु उनका ह्दय और उनके सरल जीवन का देखकर उन्हें चुनते है। आज के सुसमाचार में प्रभु येसु कहते है कि ‘मैने तुम्हें संसार से चुन लिया है’। सभी शिष्यगण अपने अपने कार्यो और जीवन में जी रहें थे। जब येसु उन्हें बुलाते है तो वे अपने कार्यों को छोड़कर उनके पीछे हो लेते है, येसु उन्हे उनके संसारिक कार्यो से छुड़ाकर एक नयें आध्यात्मिक कार्य के लिए चुनता है।

परंतु जब वे उन्हें चुनते है और स्वर्गराज्य के कार्यो में आगे लगाने की बात कहते है तो वे बताते है कि वे इस संसार के होते हुए भी इस संसार के नहीं होंगे अर्थात् उनका मन, विचार, बातचीत, रहन सहन इस संसार से परे हो जाएगा और इस कारण उन्हें संसार से घृणा और बैर सहना पड़ेगा।

प्रभु का संसार से लोगों का चुनना आज भी जारी है, वे सरल ह्दय और अपना जीवन उनको समर्पित करने वाले व्यक्तियों को चुनते है जिससे वे ईश्वर के कार्य में अपना जीवन दे सकें। हम प्रार्थना करें कि अधिक से अधिक लोग ईश्वर के द्वारा चुने जायें जिससे संसार में ईश्वर राज्य निरंतर फैलता जाये। आमेन!



📚 REFLECTION



In order to carry forward his work especially the spreading of God’s Kingdom Jesus chooses the disciples. He doesn’t choose them by seeing their work, colour, stature or wealth but he chose them by seeing their hearts and simple lives. In today’s gospel Jesus says, “I have chosen you out of the world.” All the disciples were living in their own world doing their own works. When Jesus calls them they leave their works and start following him. Jesus chooses them for the new spiritual work by making them to leave the worldly works.

But when he chooses and leads them for the work of Kingdom of heaven, he tells them that they being of this world will not be of this world, in other words their mind, thoughts, conversation, livelihood will be different from the others and because of this they have to bear the hostility and enemity from this world.

God continue to choose people even today, He chooses the people with simple hearts and lives so that they can surrender their lives for the work of God. Let’s pray that more and more people may be chosen by God so that God’s Kingdom may continue to spread in the world. Amen!


 -Br. Biniush Topno



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7 मई, 2021 शुक्रवार - पास्का का पाँचवाँ सप्ताह

 

7 मई, 2021

शुक्रवार - पास्का का पाँचवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 15:22-31


22) तब सारी कलीसिया की सहमति से प्रेरितों तथा अध्यक्षों ने निश्चय किया कि हम में कुछ लोगों को चुन कर पौलुस तथा बरनाबस के साथ अन्ताखि़या भेजा जाये। उन्होंने दो व्यक्तियों को चुना, जो भाइयों में प्रमुख थे, अर्थात् यूदस को, जो बरसब्बास कहलाता था, तथा सीलस को,

23) और उनके हाथ यह पत्र भेजा: ’’प्रेरित तथा अध्यक्ष, आप लोगों के भाई, अन्ताखि़या, सीरिया तथा किलिकिया के ग़ैर-यहूदी भाइयों को नमस्कार करते हैं।

24) हमने सुना है कि हमारे यहाँ के कुछ लोगों ने, जिन्हें हमने कोई अधिकार नहीं दिया था, अपनी बातों से आप लोगों में घबराहट उत्पन्न की और आपके मन को उलझन में डाल दिया है।

25) इसलिए हमने सर्वसम्मति से निर्णय किया है कि प्रतिनिधियों का चुनाव करें और उन को अपने प्रिय भाई बरनाबस और पौलुस के साथ,

26) जिन्होंने हमारे प्रभु ईसा मसीह के नाम पर अपना जीवन अर्पित किया है, आप लोगों के पास भेजें।

27) इसलिए हम यूदस तथा सीलस को भेज रहे हैं। वे भी आप लोगों को यह सब मौखिक रूप से बता देंगे।

28) पवित्र आत्मा को और हमें यह उचित जान पड़ा कि इन आवश्यक बातों के सिवा आप लोगों पर कोई और भार न डाला जाये।

29) आप लोग देवमूर्तियों पर चढ़ाये हुए मांस से, रक्त, गला घोंटे हुए पशुओं के मांस और व्यभिचार से परहेज़ करें। इन से अपने को बचाये रखने में आप लोगों का कल्याण है। अलविदा!’’

30) वे विदा हो कर अन्ताखि़या चल दिये और वहाँ पहुँच कर उन्होंने भाइयों को एकत्र कर वह पत्र दिया।

31) पत्र की सान्त्वनापूर्ण बातें पढ़ने के बाद लोगों को बड़ा आनन्द हुआ।


सुसमाचार : योहन 15:12-17


12) मेरी आज्ञा यह है जिस प्रकार मैंने तुम लोगो को प्यार किया, उसी प्रकार तुम भी एक दूसरे को प्यार करो।

13) इस से बडा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिये अपने प्राण अर्पित कर दे।

14) यदि तुम लोग मेरी आज्ञाओं का पालन करते हो, तो तुम मेरे मित्र हो।

15) अब से मैं तुम्हें सेवक नहीं कहूँगा। सेवक नहीं जानता कि उसका स्वामी क्या करने वाला है। मैंने तुम्हें मित्र कहा है क्योंकि मैने अपने पिता से जो कुछ सुना वह सब तुम्हें बता दिया है।

16) तुमने मुझे नहीं चुना बल्कि मैंने तुम्हें इसलिये चुना और नियुक्त किया कि तुम जा कर फल उत्पन्न करो, तुम्हारा फल बना रहे और तुम मेरा नाम लेकर पिता से जो कुछ माँगो, वह तुम्हें वही प्रदान करे।

17) मैं तुम लोगों को यह आज्ञा देता हूँ एक दूसरे को प्यार करो।


📚 मनन-चिंतन


इस संसार में हम कई लोगो सें मिलते है और कई लोगों से जान पहचान बनाते है। कुछ हमें बहुुत पसंद आते है और हम उनसे अपनी दोस्ती के रिश्ते की शुरुआत करते है। इस संसार में कई दोस्त हमें मिल जाते है परंतु सच्चा दोस्त वही होता है जो बुरे वक्त में हमारी सहायता करें। ईश्वर की हम पूजा करते है, आराधना करते है, सेवा करते है उसे एक परम शक्तिशाली, परम पवित्र के रूप में देखते है। पर क्या वह परम पवित्र, परम शक्तिशाली ईश्वर के दोस्त बन सकते है? आज प्रभु येसु स्वामि और सेवक के रिश्ते से आगे बढ़कर हम सब के सामने दोस्ती का, मित्रता का हाथ बढ़ाते है।

मित्रता का रिश्ता प्रभु येसु ने अपना प्राण देकर निभाया क्योकि वह हम सबसे बहुत ही प्रेम करते है। हम किस प्रकार प्रभु येसु के मित्र बन सकते है? प्रभु कहते है, ‘‘यदि तुम लोग मेरी आज्ञाओं का पालन करते हो, तो तुम मेरे मित्र हो।’’ प्रभु हमको सेवक नहीं परंतु अपना मित्र बनाना चाहते है। जब मित्रता का रिश्ता घनिष्ट होता है तो दो मित्र एक दूसरे को बहुत अच्छी तरह जानते है तथा अपने व्यक्तिगत जीवन को एक दूसरे से साझा करते हैं। जो मित्र एक दूसरे को प्यार करते है वह उनके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहते है, इसलिए लोग मित्रता की मिसाल दिया करते हैं।

आज हम सबके पास एक अवसर है कि हम भी उस प्रभु येसु के मित्र कहलाये जो हम सब से मित्रता बनाये रखता है। हम उनकी आज्ञाओं का पालन करें और उनके मित्र बने रहें।



📚 REFLECTION



In this world we meet lots of people and become familiarize with many. With the people we like we start the relationship of friendship with them. In this world we get many friends but the true friend is one who helps us in bad times.We worship, adore, serve God and we see Him as an Almighty and All Holy God. But can the Holy, Almighty God become our friend? Today Lord Jesus rising above the relationship of Owner and servant extends the hand of friendship towards us.

Jesus kept the relationship of friendship by sacrificing his life because of his steadfast love towards us. How can we become the friend of God? Jesus says, “You are my friends if you do what I command you.” Jesus doesn’t call us servants but he wants us to be his friends. When the relationship of friendship is deep then the two friends know each other very well and even share the personal life to each other. The friends who love each other are ready to do anything for each other that is why people give the example of friendship.

Today we have an opportunity to be called Jesus’ friends who keeps friendship with us.Obeying his commandments let’s remain to be called his friends.


 -Br. Biniush Topno


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6 मई, 2021 गुरुवार - पास्का का पाँचवाँ सप्ताह

 

6 मई, 2021

गुरुवार - पास्का का पाँचवाँ सप्ताह



पहला पाठ : प्रेरित-चरित 15:7-21


7) जब बहुत वाद-विवाद हो चुका था, तो पेत्रुस ने उठ कर यह कहा: ’’भाइयो! आप जानते हैं कि ईश्वर ने प्रारम्भ से ही आप लोगों में से मुझे चुन कर निश्चय किया कि गै़र-यहूदी मेरे मुख से सुसमाचार का वचन सुनें और विश्वास करें।

8) ईश्वर मनुष्य का हृदय जानता है। उसने उन लोगों को हमारे ही समान पवित्र आत्मा प्रदान किया।

9) इस प्रकार उसने उनके पक्ष में साक्ष्य दिया और विश्वास द्वारा उसका हृदय शुद्ध कर हम में और उन में कोई भेद नहीं किया।

10) जो जूआ न तो हमारे पूर्वज ढोने में समर्थ थे और न हम, उसे शिष्यों के कन्धों पर लाद कर आप लोग अब ईश्वर की परीक्षा क्यों लेते हैं?

11) हमारा विश्वास तो यह है कि हम, और वे भी, प्रभु ईसा की कृपा द्वारा ही मुक्ति प्राप्त करेंगे।’’

12) सब चुप हो गये और वे बरनाबास तथा पौलुस की बातें सुनते रहे, जो उन चिन्हों तथा चमत्कारों के विषय में बता रहे थे, जिन्हें ईश्वर ने उनके द्वारा ग़ैर-यहूदियों के बीच दिखाया था।

13) जब वे बोल चुके थे, तो याकूब ने कहा, ’’भाइयो! मेरी बात सुनिए।

14) सिमोन ने हमें बताया कि प्रारम्भ से ही ईश्वर ने किस प्रकार ग़ैर-यहूदियों में अपने लिए एक प्रजा चुनने की कृपा की।

15) यह नबियों की शिक्षा के अनुसार ही है; क्योंकि लिखा है:

16) इसके बाद में लौट कर दाऊद का गिरा हुआ घर फिर ऊपर उठाऊँगा। मैं उसके खँड़हरों का पुननिर्माण करूँगा और उसे फिर खडा़ करूँगा,

17) जिससे मानव जाति के अन्य लोग- अर्थात् सभी राष्ट्र, जिन्हें मैंने अपनाया है- प्रभु की खोज में लगे रहें। यह कथन उस प्रभु का है, जो ये कार्य सम्पन्न करता है।

18) ये कार्य प्राचीन काल से ज्ञात हैं।

19) ’’इसलिए मेरा विचार यह है कि जो ग़ैर-यहूदी ईश्वर की ओर अभिमुख होते हैं, उन पर अनावश्यक भार न डाला जाये,

20) बल्कि पत्र लिख कर उन्हें आदेश दिया जाये कि वे देवमूर्तियों पर चढ़ाये हुए माँस से, व्यभिचार, गला घोंटे हुए पशुओं के माँस और रक्त से परहेज़ करें;

21) क्योंकि प्राचीनकाल से नगर-नगर में मूसा के प्रचारक विद्यमान हैं और उनकी संहिता प्रत्येक विश्राम-दिवस को सभागृहों में पढ़ कर सुनायी जाती है।


सुसमाचार : योहन 15:9-11


9) जिस प्रकार पिता ने मुझ को प्यार किया है, उसी प्रकार मैंने भी तुम लोगों को प्यार किया है। तुम मेरे प्रेम से दृढ बने रहो।

10) यदि तुम मेरी आज्ञओं का पालन करोगे तो मेरे प्रेम में दृढ बने रहोगे। मैंने भी अपने पिता की आज्ञाओं का पालन किया है और उसके प्रेम में दृढ बना रहता हूँ।

11) मैंने तुम लोगों से यह इसलिये कहा है कि तुम मेरे आनंद के भागी बनो और तुम्हारा आनंद परिपूर्ण हो।


📚 मनन-चिंतन


संहिता की सबसे बड़ी आज्ञा है अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे ह्दय, अपनी सारी आत्मा और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो। प्यार दो लोगों के बीच में होता है। अगर प्रेम एक ही जन करें तो वह एकतरफा प्रेम हो जाता है। प्रभु ईश्वर ने अपना प्रेम अपने पुत्र को इस संसार के लिए अर्पित कर दर्शाया तथा प्रभु येसु ने अपने प्राण को हमारे लिए बलिदान देते हुए हमरे प्रति अपने प्रेम को प्रकट किया। ईश्वर निरंतर हमसे प्रेम करता आया है और निरंतर हम से प्रेम करता रहेगा क्योंकि वह सत्यप्रतिज्ञ ईश्वर है।

इस संसार में प्रभु ने हमारे लिए सबकुछ दे डाला और हमारे लिए अपने प्रेम को प्रदर्शित किया है। हमारा प्रेम प्रभु के प्रति किस प्रकार का है? क्या हम उनको उसी प्रकार प्यार करते है जैसे वह हम से करता है? शायद नहीं, इस संसार में रहते समय शायद हम इस संसार से इतने प्रभावित हो जाते है कि हम ईश्वर के प्रेम को नहीं पहचान पाते और हम ईश्वर को छोड़ संसारिक चिजों से प्यार करने लग जाते है।

आज प्रभु हम सबसे आहवान कर रहा है कि हम उसके प्रेम में दृढ़ बने रहे। जिस प्रकार प्रभु ने हमसे प्यार किया है हम भी उसी के समान दूसरों को प्यार कर सकें। आईये आज के वचनों के द्वारा हम ईश्वर से यहीं आशिष के लिए प्रार्थना करें। आमेन!



📚 REFLECTION



Greatest commandment of the law is to Love the Lord your God with all your heart, and with all your soul, and with all your mind. Love happens between the two persons. If only one person loves then it remains as one-sided love. Lord God has shown is love by giving his only Son to the world and Lord Jesus expressed his love by giving his life for us. God has been continually loving us and will continue to love us because he is the truthful God and his love is steadfast.

God has given everything for us and showed his love to us. What kind of love do we have towards God? Do we love Him as He loves us? May be not, living in this world we are so fascinated by the world that we are unable to recognize his love and we start loving the worldly things instead of God.

Today God is calling us to abide in his love. As God has loved us similarly we may be also able to love others. Let’s seek this blessing of God through today’s word. Amen!

 -Br. Biniush Topno 


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Praise the Lord!

5 मई, 2021 बुधवार - पास्का का पाँचवाँ सप्ताह

 

5 मई, 2021

बुधवार - पास्का का पाँचवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 15:1-6


1) कुछ लोग यहूदिया से अन्ताखि़या आये और भाइयों को यह शिक्षा देते रहे कि यदि मूसा से चली आयी हुई प्रथा के अनुसार आप लोगों का ख़तना नहीं होगा, तो आप को मुक्ति नहीं मिलेगी।

2) इस विषय पर पौलुस और बरनाबस तथा उन लोगों के बीच तीव्र मतभेद और वाद-विवाद छिड़ गया, और यह निश्चय किया गया कि पौलुस तथा बरनाबस अन्ताखि़या के कुछ लोगों के साथ येरुसालेम जायेंगे और इस समस्या पर प्रेरितों तथा अध्यक्षों से परामर्श करेंगे।

3) अन्ताखि़या की कलीसिया ने उन्हें विदा किया। वे फ़ेनिसिया तथा समरिया हो कर यात्रा करते हुए वहाँ के सब भाइयों को ग़ैर-यहूदियों के धर्म-परिवर्तन के विषय में बता कर बड़ा आनन्द प्रदान करते थे।

4) जब वे येरुसालेम पहुँचे, तो कलीसिया, प्रेरितों तथा अध्यक्षों ने उनका स्वागत किया और उन्होंने बताया कि ईश्वर ने उनके द्वारा क्या-क्या कर दिखाया है।

5 फ़रीसी सम्प्रदाय के कुछ सदस्य, जो विश्वासी हो गये थे, यह कहते हुए उठ खड़े हुए कि ऐसे लोगों का ख़तना करना चाहिए और उन्हें आदेश देना चाहिए कि वे मूसा-संहिता का पालन करें।

6) प्रेरित और अध्यक्ष इस समस्या पर विचार करने के लिए एकत्र हुए।


सुसमाचार : योहन 15:1-8


1) मैं सच्ची दाखलता हूँ और मेरा पिता बागवान है।

2) वह उस डाली को, जो मुझ में नहीं फलती, काट देता है और उस डाली को जो फलती है, छाँटता है। जिससे वह और भी अधिक फल उत्पन्न करें।

3) मैंने तुम लोगो को जो शिक्षा दी है, उसके कारण तुम शुद्ध हो गये हो।

4) तुम मुझ में रहो और मैं तुम में रहूँगा। जिस तरह दाखलता में रहे बिना डाली स्वयं नहीं फल सकती, उसी तरह मुझ में रहे बिना तुम भी नहीं फल सकते।

5) मैं दाखलता हूँ और तुम डालियाँ हो। जो मुझ में रहता है और मैं जिसमें रहता हूँ वही फलता है क्योंकि मुझ से अलग रहकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।

6) यदि कोई मुझ में नहीं रहता तो वह सूखी डाली की तरह फेंक दिया जाता है। लोग ऐसी डालियाँ बटोर लेते हैं और आग में झोंक कर जला देते हैं।

7) यदि तुम मुझ में रहो और तुम में मेरी शिक्षा बनी रहती है तो चाहे जो माँगो, वह तुम्हें दिया जायेगा।

8) मेरे पिता की महिमा इस से प्रकट होगी कि तुम लोग बहुत फल उत्पन्न करो और मेरे शिष्य बने रहो।


📚 मनन-चिंतन


आज हमारे समक्ष मनन चिंतन के लिए दाखलता और डालियॉं का विवरण है। जहॉं प्रभु हम सबको दाखलता और डालियॉं का संबंध बताते हुए उनमें बने रहनें के लिए आहवान कर रहे है। प्रभु में बने रहने से क्या फायदा है? प्रभु में बने रहने से हम कभी नहीं मुरझायेंगे, हम जो कुछ प्रभु से प्रार्थना में मॉंगेंगे वह हमें मिल जायेगी तथा हमारे लिए कुछ भी असंभव नहीं होगा, जिस प्रकार संत पौलुस कहते है, ‘‘जो मुझे बल प्रदान करते हैं, मै उनकी सहायता से सब कुछ कर सकता हॅूं’’ (फिल्लपि. 4:13)।

प्रभु में बने रहने का तात्पर्य क्या है? प्रभु में बने रहने का तात्पर्य है कि उनकी शिक्षा में बने रहना यह हमें बताता है कि हम केवल उनके वचनों को पढ़े, सुने या याद ही नहीं करें परंतु उन वचनों को जिये, उन वचनों को हमारे जीवन में झलकने दे जिससे जो कोई हमें देंखे या सम्पर्क करें तो उन्हे जीता जागता, चलता फिरता सुसमाचार के दर्शन हो या अनुभव हो। जिस प्रकार संत याकूब अपने पत्र 1ः27-25 में कहते है, ‘‘वचन के श्रोता ही नहीं, बल्कि उसके पालनकर्ता भी बनें। जो व्यक्ति वचन सुनता है, किन्तु उसके अनुसार आचरण नही करता, उस मनुष्य के सदृश है, जो दर्पण में अपना चेहरा देखता है। वह अपने को देख कर चला जाता है और उसे याद नहीं रहता कि उसका अपना स्वरूप कैसा है। किन्तु जो व्यक्ति उस संहिता को, जो पूर्ण है और हमें स्वतन्त्रता प्रदान करती है, ध्यान से देखता और उसका पालन करता है। वह उस श्रोता के सदृश नहीं, जो तुरंत भूल जाता है, बल्कि वह कर्ता बन जाता और उस संहिता को अपने जीवन में चरितार्थ करता है।’’

इसलिए हम श्रोता ही नहीं परंतु वचन के पालनकर्ता के लिए बुलाये गये है। अगर येसु का वचन कहता है कि हमें अपने पड़ोसियों को अपने समान प्रेम करना चाहिए तो ‘‘हम वचन से नहीं, कर्म से, मुख से नहीं, ह्दय सेे एक दूसरे को प्यार करें’’ (1योहन 3:18)।

प्रभु में बने रहने से प्रभु का जीवन हमारे जीवन में संचार होने लग जाता है और हम प्रभु में एक हो जाते है और जो कार्य प्रभु इस संसार में करना चाहता है वह हमारे जीवन द्वारा पूर्ण होता है। प्रभु इस संसार में बहुत फल उत्पन्न करना चाहता है परंतु उसको पूर्ण होने के लिए हम सभी को उनसे जुड़े रहने की जरूरत है। आईये आज के दिन हम प्रार्थना करें कि हम निरंतर प्रभु से जुड़े जिस प्रकार संत पौलुस जुड़े हुए थे। वे रोमियों के नाम पत्र में कहते हैं, ‘‘कौन हम को मसीह के प्रेम से वंचित कर सकता है? मुझे दृढ़ विश्वास है कि न तो मरण या जीवन, न स्वर्गदूत या नरकदूत, न वर्तमान या भविष्य, न आकाश या पाताल की कोई शक्ति और न समस्त सृष्टि में कोई या कुछ हमें ईश्वर के उस प्रेम से वंचित कर सकता है, जो हमें हमारे प्रभु ईश्वर मसीह द्वारा मिला है’’ (रोमियो 8ः35,38-39)।



📚 REFLECTION



In the entire bible we find God trying to establish a relationship with the humans and for this time to time God makes a covenant with the peope so that He may be our Lord and we be his people. Today’s Gospel tells us about the connection about that relationship.

In today’s gospel Jesus with a beautiful parable sets before us the connection between God and human.

Today we have the description of vine and the branches for our reflection, where telling the connection between vine and the branches Lord invites us to remain or abide in him. Let’s see what are the benefits of remaining or abiding in him- By Remaining in the Lord we will never fade, what ever we ask Lord in prayer we will receive, all the more nothing will be impossible for us as St. Paul says, “I can do all things with the help of him who strengthens me.” (Philipp.4:13).

What is the meaning of abiding in the Lord? It means to remain/abide in his teachings which tells us that we not only have to read, listen and memorize his words but to live those words, those words should reflect in our lives so that whoever comes in contact with us they may experience the living gospel. As St. James says in his letter 1:22-25, “Be doers of the word, andnotmeely hearers who deceive themselves. For if any are hearers of the word and not doers, they are like those wholook at themselvesin a mirror; for they look at themselves and, on going away, immediately forget what they were like. But those who look into the perfect law, the law of liberty, and persevere, become not hearers who forget but doers who act.”

That’s why we are called not merely for hearers but to be the doers of the word. If the word of God says love your neibhours as yourself then “let us love, not in word or speech, but in truth and action.” (1Jn 3:18)

By abiding in God, the life of God start generating in us and we become one in the Lord; and the work that God wants in this world reaches to its fulfillment through our lives. God wants to bear much fruits in this world but for that to happen in its fulfillment we all need to remain in him. Let’s pray today that we may always remain united with him as St. Paul remained. St. Paul says in his letter, “Who will separate us from the love of Christ? Will hardship, or distress, or persecution, or famine, or nakedness, or peril, or sword? For I am convinced that neither death, nor life, nor angels, nor rulers, nor things present, nor things to come, nor powers, nor height, nor depth, nor anything else in all creation, will be able to separate us from the love of God in Christ Jesus our Lord. (Romans 8:35, 38-39).


 -Br. Biniush Topno


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आज का पवित्र वचन 4 मई, 2021 मंगलवार - पास्का का पाँचवाँ सप्ताह

 

4 मई, 2021

मंगलवार - पास्का का पाँचवाँ सप्ताह




पहला पाठ : प्रेरित-चरित 14:19-28


19) इसके बाद कुछ यहूदियों ने अन्ताखिया तथा इकोनियुम से आ कर लोगों को अपने पक्ष में मिला लिया। वे पौलुस को पत्थरों से मार कर और मरा समझ कर नगर के बाहर घसीट ले गये;

20) किन्तु जब शिष्य पौलुस के चारों ओर एकत्र हो गये, तो वह उठ खड़ा हुआ और नगर लौट आया। दूसरे दिन वह बरनाबस के साथ देरबे चल दिया।

21) उन्होंने उस नगर में सुसमाचार का प्रचार किया और बहुत शिष्य बनाये। इसके बाद वे लुस्त्रा और इकोनियुम हो कर अन्ताखिया लौटे।

22) वे शिष्यों को ढारस बँधाते और यह कहते हुए विश्वास में दृढ़ रहने के लिए अनुरोध करते कि हमें बहुत से कष्ट सह कर ईश्वर के राज्य में प्रवेश करना है।

23) उन्होंने हर एक कलीसिया में अध्यक्षों को नियुक्त किया और प्रार्थना तथा उपवास करने के बाद उन लोगों को प्रभु के हाथों सौंप दिया, जिस में वे लोग विश्वास कर चुके थे।

24) वे पिसिदिया पार कर पम्फुलिया पहुँचे

25) और पेरगे में सुसमाचार का प्रचार करने के बाद अत्तालिया आये।

26) वहाँ से वे नाव पर सवार हो कर अन्ताखिया चल दिये, जहाँ से वे चले गये थे और जहाँ लोगों ने उस कार्य के लिए ईश्वर की कृपा माँगी थी, जिसे उन्होंने अब पूरा किया था।

27) वहाँ पहुँचकर और कलसिया की सभा बुला कर वे बताते रहे कि ईश्वर ने उनके द्वारा क्या-क्या किया और कैसे गै़र-यहूदियों के लिए विश्वास का द्वार खोला।

28) वे बहुत समय तक वहाँ शिष्यों के साथ रहे।


सुसमाचार : योहन 14:27-31


27) मैं तुम्हारे लिये शांति छोड जाता हूँ। अपनी शांति तुम्हें प्रदान करता हूँ। वह संसार की शांति-जैसी नहीं है। तुम्हारा जी घबराये नहीं। भीरु मत बनो।

28) तुमने मुझ को यह कहते सुना- मैं जा रहा हूँ और फिर तुम्हारे पास आऊँगा। यदि तुम मुझे प्यार करते, तो आनन्दित होते कि मैं पिता के पास जा रहा हूँ, क्योंकि पिता मुझ से महान है।

29) मैंने पहले ही तुम लोगों को यह बताया, जिससे ऐसा हो जाने पर तुम विश्वास करो।

30) अब मैं तुम लोगों से अधिक बातें नहीं करूँगा क्योंकि इस संसार का नायक आ रहा है। वह मेरा कुछ नहीं बिगाड सकता,

31) किन्तु यह आवश्यक है कि संसार जान जाये कि मैं पिता को प्यार करता हूँ और पिता ने मुझे जैसा आदेश दिया है मैं वैसा ही करता हूँ। उठो! हम यहाँ से चलें।’’


📚 मनन-चिंतन


जब जीवन में सब अस्त वयस्त हो और ह्दय व्याकुल हो तो केवल शांति ही हमें उस अवस्था से उबार सकता है। प्रभु येसु शांति के राजा है, तथा पुनरुत्थान के बाद जब वे शिष्यों को बंद कमरे में दर्शन देते है तो सबसे पहले यही आशिष देते है कि तुम्हें शांति मिले।

आज का सुसमाचार हमारे बीच में येसु और शिष्यों के बीच में उस वार्तालाप को रखता है जो प्रभु येसु ने पवित्र आत्मा के आने के विषय बताने के बाद कही थी। प्रभु येसु को ज्ञात था कि उनके मरण के बाद पेंतेकोस्त तक शिष्य व्याकुल हो जायेगंे, घबरा जायेंगे इसलिये प्रभु उन से कहते है, ‘‘मैं तुम्हारे लिये शांति छोड़ जाता हूॅं। अपनी शांति तुम्हें प्रदान करता हॅूं। वह संसार की शांति जैसी नहीं है। तुम्हारा जी घबराये नहीं। भीरु मन बनों।’’

मैं तुम्हारे लिये शांति छोड़ जाता हॅूं। अपनी शांति तुम्हें प्रदान करता हॅूं - प्रभु येसु जाते जाते यह आश्वसन देते जाते हैं वह जाते जाते अपनी शांति देकर जाऐंगे। प्रभु की शांति किस प्रकार की है? प्रभु की शांति इस संसार की शांति से परे है। जब शिष्यगण येसु के साथ झील पार कर रहे थे तब अचानक झंझावट उठा और नाव पानी से भरी जा रही थी। येसु दुम्बाल में तकिया लगाकर सो रहे थे तब शिष्यों ने उन्हे जगाया और प्रभु ने वायु को डॉंटा और पूर्ण शांति छा गई (मत्ती 8ः23-27)। शिष्य उस घटना के समय बहुत डर गये थे क्योकि झंझावट केवल बाहर ही नहीं परंतु उनके भीतर उनके ह्दय में भी था। प्रभु येसु उस झंझावट भरी घटना में जहॉं बहुत शोरगुल था, लहरो का नाव से टकराव था ऐसी स्थिति में भी वे शांत भाव से सो रहे थे क्योकि प्रभु के भीतर झंझावट नहीं परंतु शांति था। प्रभु की शांति का राज-पिता ईश्वर के प्रति पूर्ण रूप से समर्पण तथा विश्वास होना। अर्थात् भले ही मेरे चारों ओर तबाही हो हाहाकार हो फिर भी विश्वास होना कि प्रभु मेरे साथ है, मेरे भीतर है वह मेरा कुछ भी अनिष्ठ नहीं होने देगा। यह विश्वास और शांति केवल येसु ही हमें प्रदान कर सकते है।

आइये हम प्रभु की शांति को ग्रहण करने उसको महसूस करने के लिए आज के वचन के द्वारा प्रार्थना करें।



📚 REFLECTION



When there is turmoil in the life and heart is anxious then only peace can overcome that situation. Jesus is the Prince of Peace, and after the Resurrection when he meets the disciples in the closed room he first and foremost gives the blessing of peace.

Today’s Gospel keeps before us the conversation between Jesus and the disciples about the situation after telling about coming of Holy Spirit. Lord Jesus knew that after his death till the Pentecost disciples will be disturbed, frighten that’s why Lord says to them, “Peace I leave with you; my peace I give to you. I do not give to you as the world gives. Do not let your hearts be troubled, and do not let them be afraid.”

Peace I leave with you; my peace I give to you- Before leaving Jesus gives the assurance of his peace. What kind is the Peace of the Lord? Peace of God is different from the peace of the world. When disciples were crossing the sea along with Jesus, suddenly a windstorm arose on the sea, so great that the boat was being swamped by the waves. Jesus was sleeping and the disciples woke him and Jesus rebuked the winds and the sea; and there was a dead calm (Mt 8:23-27). Disciples were very frightened of that incident because the storm was not only outside but also inside of them, in their hearts. Jesus in that incident full of storm where there was lot of alarm and excursions, boat was being swamped by the waves; even in this situation Jesus was sleeping peacefully because the inside Jesus there was peace not the storm. The secret of Jesus’ peace is the full trust and surrender in the Abba Father. That means to say even if I am surrounded by the destruction or outcry then also having strong believe that God is with me, inside me and he will never allow anything to harm me. This kind of trust and peace only Jesus can give us.

Let’s pray through today’s word that we may receive and experience Lord’s peace.


 -Br. Biniush Topno


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