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08 अप्रैल 2021 पास्का अठवारा - गुरुवार

 

08 अप्रैल 2021
पास्का अठवारा - गुरुवार

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 3:11-26


11) वह मनुष्य पेत्रुस और योहन के साथ लगा हुआ था, इसलिए सब लोग आश्चर्यचकित हो कर सुलेमान नामक मण्डप में उनके पास दौड़े आये।

12) पेत्रुस ने यह देख कर उन से कहा, ‘‘इस्राएली भाइयो! आप लोग इस पर आश्चर्य क्यों कर रहे हैं और हमारी ओर से इस प्रकार क्यों ताक रहे हैं, मानों हमने अपने सामर्थ्य या सिद्धि से इस मनुष्य को चलने-फिरने योग्य बना दिया है?

13) इब्राहीम, इसहाक और याकूब के ईश्वर ने, हमारे पूर्वजों के ईश्वर ने अपने सेवक ईसा को महिमान्वित किया है। आप लोगों ने उन्हें पिलातुस के हवाले कर दिया और जब पिलातुस उन्हें छोड़ कर देने का निर्णय कर चुका था, तो आप लोगों ने उन्हें अस्वीकार किया।

14) आप लोगों ने सन्त तथा धर्मात्मा को अस्वीकार कर हत्यारे की रिहाई की माँग की।

15) जीवन के अधिपति को आप लोगों ने मार डाला; किन्तु ईश्वर ने उन्हें मृतकों में से जिलाया। हम इस बात के साक्षी हैं।

16) ईसा के नाम में विश्वास के कारण उसी नाम ने इस मनुष्य को, जिसे आप देखते और जानते हैं, बल प्रदान किया है। उसी विश्वास ने इसे आप सबों के सामने पूर्ण रूप से स्वस्थ किया है।

17) भाइयो! मैं जानता हूँ कि आप लोग, और आपके शासक भी, यह नहीं जानते थे कि वे क्या कर रहे हैं।

18) ईश्वर ने इस प्रकार अपना वह कथन पूरा किया जिसके अनुसार उसके मसीह को दुःख भोगना था और जिसे उसने सब नबियों के मुख से घोषित किया था।

19) आप लोग पश्चात्ताप करें और ईश्वर के पास लौट आयें, जिससे आपके पाप मिट जायें

20) और प्रभु आप को विश्रान्ति का समय प्रदान करे। तब वह पूर्वनिर्धारित मसीह को, अर्थात् ईसा को आप लोगों के पास भेजेगा।

21) यह आवश्यक है कि वह उस विश्वव्यापी पुनरूत्थान के समय तक स्वर्ग में रहें, जिसके विषय में ईश्वर प्राचीन काल से अपने पवित्र नबियों के मुख से बोला।

22) मूसा ने तो कहा, प्रभु-ईश्वर तुम्हारे भाइयों में से तुम्हारे लिए मुझ-जैसा एक नबी उत्पन्न करेगा वह जो कुछ तुम लोगों से कहेगा तुम उस पर ध्यान देना।

23) जो उस नबी की बात नहीं सुनेगा, वह प्रजा में से निकाल दिया जायेगा।

24) समूएल और सभी परवर्ती नबियों ने इन दिनों की भविष्यवाणी की है।

25) ‘‘आप लोग नबियों की सन्तति और उस विधान के भागीदार हैं, जिसे ईश्वर ने आपके पूर्वजों के लिए उस समय निर्धारित किया, जब उसने इब्राहिम से कहा, तुम्हारी सन्तति द्वारा पृथ्वी भर के वंश आशीर्वाद प्राप्त करेंगे।

26) ईश्वर ने सब से पहले आप लोगों के लिए अपने पुत्र ईसा को पुनर्जीवित किया और आपके पास भेजा, जिससे वह आप लोगों में हर एक को कुमार्ग से विमुख कर आशीर्वाद प्रदान करें।’’


सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 24:35-48


35) तब उन्होंने भी बताया कि रास्ते में क्या-क्या हुआ और उन्होंने ईसा को रोटी तोड़ते समय कैसे पहचान लिया।

36) वे इन सब घटनाओं पर बातचीत कर ही रहे थे कि ईसा उनके बीच आ कर खड़े हो गये। उन्होंने उन से कहा, ‘‘तुम्हें शान्ति मिले!’’

37) परन्तु वे विस्मित और भयभीत हो कर यह समझ रहे थे कि वे कोई प्रेत देख रहे हैं।

38) ईसा ने उन से कहा, ‘‘तुम लोग घबराते क्यों हो? तुम्हारे मन में सन्देह क्यों होता है?

39) मेरे हाथ और मेरे पैर देखो- मैं ही हूँ। मुझे स्पर्श कर देख लो- प्रेत के मेरे-जैसा हाड़-मांस नहीं होता।’’

40) उन्होंने यह कह कर उन को अपने हाथ और पैर दिखाये।

41) जब इस पर भी शिष्यों को आनन्द के मारे विश्वास नहीं हो रहा था और वे आश्चर्यचकित बने हुए थे, तो ईसा ने कहा, ‘‘क्या वहाँ तुम्हारे पास खाने को कुछ है?’’

42) उन्होंने ईसा को भुनी मछली का एक टुकड़ा दिया।

43) उन्होंने उसे लिया और उनके सामने खाया।

44) ईसा ने उन से कहा, ‘‘मैंने तुम्हारे साथ रहते समय तुम लोगों से कहा था कि जो कुछ मूसा की संहिता में और नबियों में तथा भजनों में मेरे विषय में लिखा है, सब का पूरा हो जाना आवश्यक है’’।

45) तब उन्होंने उनके मन का अन्धकार दूर करते हुए उन्हें धर्मग्रन्थ का मर्म समझाया

46) और उन से कहा, ‘‘ऐसा ही लिखा है कि मसीह दुःख भोगेंगे, तीसरे दिन मृतकों में से जी उठेंगे

47) और उनके नाम पर येरुसालेम से ले कर सभी राष्ट्रों को पापक्षमा के लिए पश्चात्ताप का उपदेश दिया जायेगा।

48) तुम इन बातों के साक्षी हो।


📚 मनन-चिंतन


पेत्रुस और योहन अत्यत साधारण लोग थे। वे अशिक्षित मछुआरे थे। (देखिये प्रेरित चरित 3:13) प्रभु येसु ने उनको चुनकर तथा लंगडे व्यक्ति को उनके द्वारा चंगाई दिलाकर उन्हें आकर्षण का केन्द्र बना दिया था। अचानक लोगों की प्रंशसा तथा सरहना ने उनको घेर लिया था। उस क्षण के लिये वे ’सुपर हीरो’ बन गये थे। लेकिन उन्होंने व्यक्तिगत प्रशंसा और गलत आत्म-धारणा के प्रलोभन से बचकर इस बात को घोषित किया कि ईश्वर के सामर्थ्य ने लंगडे व्यक्ति को चंगा किया है। पेत्रुस जानता था कि वे कमजोर, पापी येसु जिन्होंने उस लंगडे का चंगा किया पर निर्भर रहने वाले व्यक्ति थे। वे कहते हैं, ’’ईसा के नाम में विश्वास के कारण उसी नाम ने इस मनुष्य को, जिसे आप देखते और जानते हैं, बल प्रदान किया है। उसी विश्वास ने इसे आप सबों के सामने पूर्ण रूप से स्वस्थ किया है।’’ (प्रेरित चरित 3:16)

इस की सेवा में कार्यरत लोगों को अत्यंत विनम्र होना चाहिये। ईश्वर के सेवकों को ईश्वर के श्रेय को चुराना नहीं चाहिये। स्तोत्रकार कहते हैं, ’’हम को नहीं, हम को नहीं, बल्कि अपना नाम महिमान्वित कर।’’ (स्तोत्र 115:1) जो लोग ईश्वर की सेवा में विनम्र बने रहते हैं वे स्वयं पर बडा उपकार करते हैं। ईश्वर उनकी इस विनम्रता के कारण उनका उपयोग अपने कार्यों में करता है किन्तु जो घमण्डी बन जाता है वे स्वयं के विनाश को आमंत्रित करते हैं।

दाउद ने ईश्वर की मंजूषा के सामने हर्ष-उल्लास में सुधबुध खोकर नाच किया था तथा इस बात के लिये उसकी पत्नी मीकल ने उन्हें फटकारा था। राजा दाउद ने अपनी विनम्रता का कारण बताते हुये कहा, ’’दाऊद ने मीकल से कहाए ष्प्रभु ने तुम्हारे पिता और तुम्हारे सारे घराने की अपेक्षा मुझे चुना है और मुझे प्रभु की प्रजा इस्राएल का शासक बनाया है। मैं उसी प्रभु के सामने नाचता रहा और नाचूँगा। मैं इस से अधिक अशोभनीय आचरण करूँगा और अपनी दृष्टि में अपने को और नीचा दिखाऊँगा।’’ (2 समूएल 6:21-22) दाउद ईश्वर के समक्ष अपनी विनम्रता के कारण धनी माने जाते हैं। दाउद ने धार्मिक भावना से प्रेरित होकर ईश्वर का मंदिर बनाने का निर्णय लिया। उसने इसके लिये विस्तृत योजना बनायी तथा तैयारी की। लेकिन जब ईश्वर ने दाउद की योजना को नकार दिया तो दाउद ने ईश्वर की इच्छा का विरोध नहीं किया वरन उसे स्वीकारा।

संत पौलुस इस सच्चाई को स्पष्ट करते हुये कहते हैं, ’’इसका अर्थ यह नहीं कि हमारी कोई अपनी योग्यता है। हम अपने को किसी बात का श्रेय नहीं दे सकते। हमारी योग्यता का स्त्रोत ईश्वर है। उसने हमें एक नये विधान के सेवक होने के योग्य बनाया है।’’ (2 कुरि.3:6) एक व्यक्ति यदि अपनी उपलब्धियों के लिये यदि स्वयं को ही महिमांवित करता है, तो वह अपना ही नुकसान करता है। हम मन सांसारिक मोहमाया, लोगों की वाहवाही के गर्व में आसानी से पड जाता है। लेकिन संत पेत्रुस एवं प्रेरितगण हमें सिखाते हैं कि यदि हम ईश्वर को महिमा प्रदान करेंगे तो ईश्वर निरंतर हमारा उपयोग उनके साधनों के रूप में करते रहेंगे।




📚 REFLECTION



Peter and John were very ordinary people. They were illiterate and fishermen. (See Acts 3:13)However it was the Lord Jesus who by his choice and now by the curing of the lame man had made them the centre of attraction. They were suddenly surrounded by awe and admiration of the people. They had become ‘supermen’ at least for a while. Nevertheless, brushing aside all temptation of self-glory and self-assumption they maintained a steadfast stance that it was the Lord whose power was at work. Peter refused to take any honour to himself but gave it to the Lord who had used them as instruments. Peter knew that they were weak, sinful and dependent for everything on Jesus whose power effected the cure of the man. He said, “And by faith in his name, his name itself has made this man strong, whom you see and know; and the faith that is through Jesus has given him this perfect health in the presence of all of you.” (3:16)

Useful man must be very humble. God’s servants do not rob the Lord of his credit. Palmist would aptly plead, “Not to us, O Lord, not to us, but to your name give glory.” (Psalm 115:1) All those who remain humble in the service of God do to themselves a great favour. God continues to use them for his mission on the contrary when someone becomes proud and draws credit for himself, lives in vain glory and propels his own downward journey.

David danced before the ark of God with great joy and for doing so he was chastised by his wife Michal for not maintaining the decorum befitting a king. However, David remained humble and spoke, “It was before the Lord, who chose me in place of your father and all his household, to appoint me as prince over Israel, the people of the Lord, that I have danced before the Lord. I will make myself yet more contemptible than this, and I will be abased in my own eyes.” (2 Samuel 6:21-22) David is always exalted for his humility before God. David had all the good intentions and wanted to build the temple. He made elaborate plans and preparation for it, however, when the Lord denies him the permission David does resist or resents but accepts Lord’s will.

St. Paul clearly state this fact, “Not that we are competent of ourselves to claim anything as coming from us; our competence is from God, who has made us competent to be ministers of a new covenant, (2 Cor. 3:6)

A person breaks his ownfortunes when he exalts himself and seek glory and credit to his own human skill. Too often, the heart is easily led astray by the attention, attraction and success we receive for our good deeds, but Peter and apostles teachus to give honour to God not to themselves so that God’s grace continue to flow abundantly and flawlessly.

 -Br. Biniush Topno


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07 अप्रैल 2021 पास्का अठवारा - बुधवार

 

07 अप्रैल 2021
पास्का अठवारा - बुधवार

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 3:1-10


1) पेत्रुस और योहन तीसरे पहर की प्रार्थना के समय मन्दिर जा रहे थे।

2) लोग एक मनुष्य को ले जा रहे थे, जो जन्म से लँगड़ा था। वे उसे प्रतिदिन ला कर मन्दिर के ‘सुन्दर’ नामक फाटक के पास रखा करते थे, जिससे वह मन्दिर के अन्दर जाने वालों से भीख माँग सके।

3) जब उसने पेत्रुस और योहन को मन्दिर में प्रवेश करते देखा, तो उन से भीख माँगी।

4) पेत्रुस और योहन ने उसे ध्यान से देखा। पेत्रुस ने कहा, ‘‘हमारी ओर देखो’’

5) और वह कुछ पाने की आशा से उनकी ओर देखता रहा।

6) किन्तु पेत्रुस ने कहा, ‘मेरे पास न तो चाँदी है और न सोना; बल्कि मेरे पास जो, वही तुम्हें देखा हूँ- ईसा मसीह नाज़री के नाम पर चलो’’

7) और उनसे उसका दाहिना हाथ पकड़ कर उसे उठाया। उसी क्षण लँगड़े के पैरों और टखनों में बल आ गया।

8) वह उछल कर खड़ा हो गया और चलने-फिरने लगा। वह चलते, उछलते तथा ईश्वर की स्तुति करते हुए उनके साथ मन्दिर आया।

9) सारी जनता ने उस को चलते-फिरते तथा ईश्वर की स्तुति करते हुए देखा।

10) लोग उसे पहचानते थे। यह वही था, जो मन्दिर के ‘सुन्दर’ फाटक के पास बैठ कर भीख माँगा करता था और यह देख कर कि उसे क्या हुआ है, वे अचम्भे में पड़ कर चकित थे।


सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 24:13-35


13) उसी दिन दो शिष्य इन सब घटनाओं पर बातें करते हुए एम्माउस नामक गाँव जा रहे थे। वह येरुसालेम से कोई चार कोस दूर है।

14) वे आपस में बातचीत और विचार-विमर्श कर ही रहे थे

15) कि ईसा स्वयं आ कर उनके साथ हो लिये,

16) परन्त शिष्यों की आँखें उन्हें पहचानने में असमर्थ रहीं।

17) ईसा ने उन से कहा, ‘‘आप लोग राह चलते किस विषय पर बातचीत कर रहे हैं?’’ वे रूक गये। उनके मुख मलिन थे।

18) उन में एक क्लेओपस-ने उत्तर दिया, ‘‘येरुसालेम में रहने वालों में आप ही एक ऐसे हैं, जो यह नहीं जानते कि वहाँ इन दिनों क्या-क्या हुआ है’।

19) ईसा ने उन से कहा, ‘‘क्या हुआ है?’’ उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘बात ईसा नाज़री की है वे ईश्वर और समस्त जनता की दृष्टि में कर्म और वचन के शक्तिशाली नबी थे।

20) हमारे महायाजकों और शासकों ने उन्हें प्राणदण्ड दिलाया और क्रूस पर चढ़वाया।

21) हम तो आशा करते थे कि वही इस्राएल का उद्धार करने वाले थे। यह आज से तीन दिन पहले की बात है।

22) यह सच है कि हम में से कुछ स्त्रियों ने हमें बड़े अचम्भे में डाल दिया है। वे बड़े सबेरे क़ब्र के पास गयीं

23) और उन्हें ईसा का शव नहीं मिला। उन्होंने लौट कर कहा कि उन्हें स्वर्गदूत दिखाई दिये, जिन्होंने यह बताया कि ईसा जीवित हैं।

24) इस पर हमारे कुछ साथी क़ब्र के पास गये और उन्होंने सब कुछ वैसा ही पाया, जैसा स्त्रियों ने कहा था; परन्तु उन्होंने ईसा को नहीं देखा।’’

25) तब ईसा ने उन से कहा, ‘‘निर्बुद्धियों! नबियों ने जो कुछ कहा है, तुम उस पर विश्वास करने में कितने मन्दमति हो !

26) क्या यह आवश्यक नहीं था कि मसीह वह सब सहें और इस प्रकार अपनी महिमा में प्रवेश करें?’’

27) तब ईसा ने मूसा से ले कर अन्य सब नबियों का हवाला देते हुए, अपने विषय में जो कुछ धर्मग्रन्थ में लिखा है, वह सब उन्हें समझाया।

28) इतने में वे उस गाँव के पास पहुँच गये, जहाँ वे जा रहे थे। लग रहा था, जैसे ईसा आगे बढ़ना चाहते हैं।

29) शिष्यों ने यह कह कर उन से आग्रह किया, ‘‘हमारे साथ रह जाइए। साँझ हो रही है और अब दिन ढल चुका है’’ और वह उनके साथ रहने भीतर गये।

30) ईसा ने उनके साथ भोजन पर बैठ कर रोटी ली, आशिष की प्रार्थना पढ़ी और उसे तोड़ कर उन्हें दे दिया।

31) इस पर शिष्यों की आँखे खुल गयीं और उन्होंने ईसा को पहचान लिया ... किन्तु ईसा उनकी दृष्टि से ओझल हो गये।

32) तब शिष्यों ने एक दूसरे से कहा, हमारे हृदय कितने उद्दीप्त हो रहे थे, जब वे रास्ते में हम से बातें कर रहे थे और हमारे लिए धर्मग्रन्थ की व्याख्या कर रहे थे!’’

33) वे उसी घड़ी उठ कर येरुसालेम लौट गये। वहाँ उन्होंने ग्यारहों और उनके साथियों को एकत्र पाया,

34) जो यह कह रहे थे, ‘‘प्रभु सचमुच जी उठे हैं और सिमोन को दिखाई दिये हैं’’।

35) तब उन्होंने भी बताया कि रास्ते में क्या-क्या हुआ और उन्होंने ईसा को रोटी तोड़ते समय कैसे पहचान लिया।


📚 मनन-चिंतन


जब मंदिर के ’सुन्दर’ नामक फाटक के पास बैठा लॅगडे व्यक्ति ने पेत्रुस और योहन के ओर भीख मांगने के लिये हाथ फैलाये तो उसने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि कुछ अप्रत्याशित और दिव्य घटना उसके जीवन में होने जा रही है। पेत्रुस और योहन ने उसकी ओर ध्यान से देखा जो इस बात की निशानी थे कि वे उसे कुछ देना चाहते थे अन्यथा लोग जो भिखारियों से आंखे चुराया करते हैं।

पेत्रुस ने कहा, मेरे पास न तो चांदी है और न सोना; बल्कि जो मेरे पास है वही तुम्हें देता हूं।’’ पेत्रुस और योहन के पैसे नहीं थे इसलिये उन्होंने वह ढुंढा जो उनके पास था। पेत्रुस के पास येसु का नाम तथा चंगाई की शक्ति थी जो उसे प्रभु ने दी थी। पेत्रुस ने उस लंगडे व्यक्ति को चंगा किया क्योंकि उसके पास येसु का नाम था। लातीनी भाषा में एक खूबसूरत कहावत है, ’’जो चीज किसी के पास नहीं है वह उसे नहीं दे सकता।’’ पेत्रुस को येसु का नाम एवं उसका सामर्थ्य दिया गया था इसलिये वह उसे लंगडे को दे सका।

आज हमें स्वयं से पूछना चाहिये, ’’मेरे पास क्या है?’ क्या इस बात का दावा कर सकते हैं कि ईश्वर का नाम मेरे साथ है? शायद हमारे पास सोना और चांदी हो सकता है किन्तु येसु का नाम न हो। पैसे और सम्पदा में हमारा विश्वास ईश्वर में हमारे विश्वास को कमजोर करता है। हम अंजाने में ही पैसे की खरीदने की शक्ति पर विश्वास अधिक विश्वास करने लगते हैं।

पेत्रुस और प्रेरितों इस बात से वाकिफ थे इसलिये उन्होंने सांसारिक बातों से दूर ही रहना, भले ही वे लोगों के आंशिक लाभ के लिये क्यों न हो, हितकर समझा। जब यूनानियों इस बात की शिकायत की भोजन सामग्री के वितरण में भेदभाव हो रहा है तो प्रेरितों ने स्पष्ट कहा, यह उचित नहीं है कि हम भोजन परोसने के लिये ईश्वर का वचन छोड दे।....और यह बात सभी को अच्छी लगी।.....ईश्वर का वचन फैलता गया।’’ (प्रेरित चरित 6:2-7) प्रेरितों न सिर्फ येसु का नाम और उसका सामर्थ्य ईश्वर से वरदान स्वरूप पाया बल्कि उसे उन्होंने बडे ही जतन और सतर्कता से संरक्षित भी रखा। जब उन्होंने ऐसा किया तो लोगों ने इसकी प्रशंसा की तथा इसके परिणामस्वरूप ईश्वर का वचन फैलता गया।

हमारी समस्याएं बहुतरफा हो सकती है। लेकिन इन सबसे उपर हमें सर्वप्रथम उचें तथा आध्यात्मिक वरदानों की अभिलाषा करनी तथा उनके सुरक्षा भी करनी चाहिये। लोग हमारे इस दृष्टिकोण का समर्थन करेंगे तथा ईश्वर की आशीष हमारे कार्यों पर बनी रहेगी।




📚 REFLECTION



When the lame man lying at the Beautiful Gate extended his hands towards Peter and John for alms,never he could have imagined that something so unexpected, dramatic and sublime would happen to him. Peter and John looked at him intently this was the sign that they wanted to give something otherwise mostly people like to avoid an eye contact with the beggars.

Peter said, “Silver and gold I have none but I give you what I have”. Peter and John literally didn’t have money to give so he looked for what he had. Peter had the name of Jesus and powers of healing the Lord had bestowed upon him. Peter heals that man because he had the name of Jesus with him. There is a beautiful saying in Latin, Nemo dat quod non habet, literally meaning "no one gives what they do not have”. Peter had been given it so he could give it.

Today we need to introspect and ask ourselves ‘What do we have?’ Can we claim to have the name of Jesus with us? Perhaps we may have silver and gold but the power of the name of Jesus is yet away from us. Faith in the wealth deteriorates the depth of faith in us. We unknowingly begin to rely on the purchasing power of the money.

Peter and the apostles were greatly aware of this fact and never let them be drawn into anything worldly even if it meant temporal good. When the Greeks complained about the partiality being done in the distribution of the food the apostles categorically said, “It is not right that we should neglect the word of God in order to wait at tables…for our part, will devote ourselves to prayer and to serving the word.’ What they said pleased the whole community. The word of God continued to spread;” (See Acts 6:2-7) It was not just the apostles received the power in the name of Jesus they also tried to preserve it deliberately and cautiously. When they preserved it, people liked it and appreciated and as a result the Word of God spread far and wide.

So, our problems are manifold. First of all, we need to ask for the higher and spiritual gifts from Jesus and preserves them with dutifully. People would love this dedication and the God would bless our ministries.

 -Br. Biniush Topno


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05 अप्रैल 2021 पास्का अठवारा - सोमवार

 

05 अप्रैल 2021
पास्का अठवारा - सोमवार

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पहला पाठ :प्रेरित-चरित 2:14,22-33


14) पेत्रुस ने ग्यारहो के साथ खड़े हो कर लोगों को सम्बोधित करते हुए ऊँचे स्वर से कहा, "यहूदी भाइयो और येरुसालेम के सब निवासियो! आप मेरी बात ध्यान से सुनें और यह जान लें कि

22) इस्राएली भाइयो! मेरी बातें ध्यान से सुनें! आप लोग स्वयं जानते हैं कि ईश्वर ने ईसा नाज़री के द्वारा आप लोगों के बीच कितने महान् कार्य, चमत्कार एवं चिन्ह दिखाये हैं। इस से यह प्रमाणित हुआ कि ईसा ईश्वर की ओर से आप लोगों के पास भेजे गये थे।

23) वह ईश्वर के विधान तथा पूर्वज्ञान के अनुसार पकड़वाये गये और आप लोगों ने विधर्मियों के हाथों उन्हें क्रूस पर चढ़वाया और मरवा डाला है।

24) किन्तु ईश्वर ने मृत्यु के बन्धन खोल कर उन्हें पुनर्जीवित किया। यह असम्भव था कि वह मृत्यु के वश में रह जायें,

25) क्योंकि उनके विषय में दाऊद यह कहते हैं - प्रभु सदा मेरी आँखों के सामने रहता है। वह मेरे दाहिने विराजमान है, इसलिए मैं दृढ़ बना रहता हूँ।

26) मेरा हृदय आनन्दित है, मेरी आत्मा प्रफुल्लित है और मेरा शरीर भी सुरक्षित रहेगा;

27) क्योंकि तू मेरी आत्मा को अधोलोक में नहीं छोड़ेगा, तू अपने भक्त को क़ब्र में गलने नहीं देगा।

28) तूने मुझे जीवन का मार्ग दिखाया है। तेरे पास रह कर मुझे परिपूर्ण आनन्द प्राप्त होगा।

29) भाइयो! मैं कुलपति दाऊद के विषय में। आप लोगों से निस्संकोच यह कह सकता हूँ कि वह मर गये और कब्र में रखे गये। उनकी कब्र आज तक हमारे बीच विद्यमान है।

30) दाऊद जानते थे कि ईश्वर ने शपथ खा कर उन से यह कहा था कि मैं तुम्हारे वंशजों में एक व्यक्ति को तुम्हारे सिंहासन पर बैठाऊँगा;

31) इसलिये नबी होने के नाते भविष्य में होने वाला मसीह का पुनरुत्थान देखा और इनके विषय में कहा कि वह अधोलोक में नहीं छोड़े गये और उनका शरीर गलने नहीं दिया गया।

32) ईश्वर ने इन्हीं ईसा नामक मनुष्य को पुनर्जीवित किया है-हम इस बात के साक्षी हैं।

33) अब वह ईश्वर के दाहिने विराजमान हैं। उन्हें प्रतिज्ञात आत्मा पिता से प्राप्त हुआ और उन्होंने उसे हम लोगों को प्रदान किया, जैसा कि आप देख और सुन रहे हैं।


सुसमाचार : मत्ती 28:8-15


8) स्त्रियाँ शीघ्र ही कब्र के पास से चली गयीं और विस्मय तथा आनन्द के साथ उनके शिष्यों को यह समाचार सुनाने दौड़ीं।

9) ईसा एकाएक मार्ग में स्त्रियों के सामने आ कर खड़े हो गये और उन्हें नमस्कार किया। वे आगे बढ़ आयीं और उन्हें दण्डवत् कर उनके चरणों से लिपट़ गयीं।

10) ईसा ने उनसे कहा, "डरो नहीं। जाओ और मेरे भाइयों को यह सन्देश दो कि वे गलीलिया जायें। वहाँ वे मेरे दर्शन करेंगे।"

11) स्त्रियाँ जा ही रही थीं कि कुछ पहरेदार नगर आये। उन्होंने महायाजकों को सारा हाल कह सुनाया।

12) महायाजकों ने नेताओं से मिल कर परामर्श किया और सैनिकों को एक मोटी रकम दे कर

13) इस प्रकार समझाया, "तम लोग यही कहो कि रात को जब हम लोग सोये हुये थे, तो ईसा के शिष्य आये और उसे चुरा ले गये।

14) यदि यह बात राज्यपाल के कान में पड़ गयी, तो हम उन्हें समझा कर तुम लोगों को बचा लेंगे।"

15) पहरेदारों ने रुपया ले लिया और वैसा ही किया, जैसा उन्हें सिखाया गया था। यही कहानी फैल गयी और अब तक यहूदियों में प्रचलित है।


📚 मनन-चिंतन


आज के सुसमाचार में हम दो प्रकार के लोगों को पाते हैं जो प्रभु के पुनरूत्थान की घटना पर दो अलग-अलग विपरीत प्रतिक्रियाएं देते हैं। पहले समूह में मरियम मेगदलेना तथा दूसरी महिलायें है जो येसु के पुनरूत्थान के कारण विस्मित तथा हर्ष से भर गयी है। येसु उन्हें दर्शन देकर बताते है कि उन्हें उनके पुनरूत्थान का साक्षी बनना है तथा शिष्यों को बताना है कि येसु उन्हें कहॉ मिलेंगे। दूसरी ओर पहरदारों का समूह है जो इस वास्तविकता से परिचित है कि येसु जी उठे है। वे यह बात जब महापुरोहितों को बताते तो वे उन्हें रिश्वत देकर न सिर्फ इस बात को दबाना चाहते हैं बल्कि उन्हें झूठी गवाही देने के लिये भी कहते हैं। पहरेदार पुनरूत्थान की सच्चाई को लोगों के प्रभाव एवं पैसे के बदले में नकार देते हैं। वे इस घटना को अफवाह बताकर भी लोगों को इस सच्चाई से दूर रखना चाहते हैं।

हम जीवन में अनेक बार इस घटना की पुनरावृर्ति होते देखते हैं जब लोग येसु के पुनरूत्थान में विश्वास करने के बावजूद भी सांसारिक दबाव, प्रभाव, लाभ एवं पैसे के लिये अपने व्यवहार के द्वारा इस सच्चाई को नकार देते हैं। इन पहरेदारों के समान हम न सिर्फ स्वयं येसु की कृपा से दूर रहते बल्कि दूसरों को भी इस वास्तविक सच्चाई से दूर रखते हैं। जब हम इस पुनरूत्थान को स्वीकारते है तो दूसरों को भी इस सच्चाई के प्रति आकर्षित करते है। शिष्यों के जीवन को देखकर अनेकों ने येसु में विश्वास किया तथा ख्राीस्तीय होना स्वीकारा। जब पेत्रुस और योहन को जब कोडो से मारा जाता है तथा आदेश दिया जाता है येुस का नाम लेकर शिक्षा न दे तो वे कहते हैं, ’’आप लोग स्वयं निर्णय करें-क्या ईश्वर की दृष्टि में यह उचित होगा कि हम ईश्वर की नहीं, बल्कि आप लोगों की बात मानें? क्योंकि हमने जो देखा और सुना है, उसके विषय में नहीं बोलना हमारे लिए सम्भव नहीं।’’ (प्रेरित चरित 4:19-20) हमें भी अपने जीवन में सांसारिक लाभ एवं लोभ से परे जाकर ईश्वर की बात मानकर पुनरूत्थान की सच्चाई का साक्ष्य देना चाहिये।




📚 REFLECTION



In today’s Gospel we find two type of people or reactions to the truth of the resurrection. In the first group we have Mary Magdalen and the other woman who are overwhelmed by resurrection of the Lord. They are told by the Lord himself not to be panicked and inform the disciples to go to Galilee. On the contrary we have the soldiers who were guarding the tomb. They are aware of the fact that Jesus is risen. When they reported this matter to the high priests, they not only bribed them but also prepare them to bear false witness to the happening. For the greed of money, they not only refuse the truth but also agree to spread it as a lie.

Quite often we witness such scenario being played out time and again when people know the reality of the resurrection yet due to worldly pressure, influence, greed and money deny it in their behaviour. We not only keep ourselves away from the grace and gift of the Lord but also deny others an opportunity to experience it. when we accept it we open the doors for others too. Seeing the life of disciples hundreds of people were attracted to Christianity and accepted Jesus. When Peter and John were beaten and threatened not to preached in the name of Jesus they unlike soldiers refused to buckle under pressured said, “Whether it is right in God’s sight to listen to you rather than to God, you must judge; 20for we cannot keep from speaking about what we have seen and heard.’ (Acts 4:19-20) Like the apostles we too ought too look beyond the safety and security, gains and loses of this world and accept and live the truth of the resurrection in our life.


 -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!

आज का पवित्र वचन



प्रभात का मिस्सा बलिदान

पहला पाठ : प्रेरित-चरित 10:34a. 37-43

34) पेत्रुस ने कहा, "मैं अब अच्छी तरह समझ गया हूँ कि ईश्वर किसी के साथ पक्ष-पात नहीं करता।

37) नाज़रेत के ईसा के विषय में यहूदिया भर में जो हुआ हैं, उसे आप लोग जानते हैं। वह सब गलीलिया में प्रारंभ हुआ-उस बपतिस्मा के बाद, जिसका प्रचार योहन किया था।

38) ईश्वर ने ईसा को पवित्र आत्मा और सामर्थ्य से विभूषित किया और वह चारों ओर घूम-घूम कर भलाई करते रहें और शैतान के वश में आये हुए लोगों को चंगा करते रहें, क्योंकि ईश्वर उनके साथ था

39) उन्होंने जो कुछ यहूदिया देश और येरुसालेम में किया, उसके साक्षी हम हैं। उन को लोगों ने क्रूस के काठ पर चढ़ा कर मार डाला;

40) परंतु ईश्वर ने उन्हें तीसरे दिन जिलाया और प्रकट होने दिया-

41) सारी जनता के सामने नहीं, बल्कि उन साक्षियों के सामने, जिन्हें ईश्वर ने पहले ही से चुन लिया था। वे साक्षी हम हैं। मृतकों में से उनके जी उठने के बाद हम लोगों ने उनके साथ खाया-पिया

42) और उन्होंने हमें आदेश दिया कि हम जनता को उपदेश दे कर घोषित करें कि ईश्वर ने उन्हें जीवितों और मृतकों का न्यायकर्ता नियुक्त किया हैं।

43) उन्हीं के विषय में सब नबी घोषित करते है कि जो उन में विश्वास करेगा, उसे उनके नाम द्वारा पापों की क्षमा मिलेगी।"

दूसरा पाठ : कलोसियों 3:1-4

1) यदि आप लोग मसीह के साथ ही जी उठे हैं- जो ईश्वर के दाहिने विराजमान हैं- तो ऊपर की चीजें खोजते रहें।

2) आप पृथ्वी पर की नहीं, ऊपर की चीजों की चिन्ता किया करें।

3) आप तो मर चुके हैं, आपका जीवन मसीह के साथ ईश्वर में छिपा हुआ है।

4) मसीह ही आपका जीवन हैं। जब मसीह प्रकट होंगे, तब आप भी उनके साथ महिमान्वित हो कर प्रकट हो जायेंगे।

अथवा दूसरा पाठ : 1 कुरिन्थियों 5: 6b-8.

6) आप लोगों का आत्मसन्तोष आप को शोभा नहीं देता। क्या आप यह नहीं जानते कि थोड़ा-सा ख़मीर सारे सने हुए आटे को ख़मीर बना देता है?

7) आप पुराना ख़मीर निकाल कर शुद्ध हो जायें, जिससे आप नया सना हुआ आटा बन जायें। आप को बेख़मीर रोटी-जैसा बनना चाहिए क्योंकि हमारा पास्का का मेमना अर्थात् मसीह बलि चढ़ाये जा चुके हैं।

8) इसलिए हमें न तो पुराने खमीर से और न बुराई और दुष्टता के खमीर से बल्कि शुद्धता और सच्चाई की बेख़मीर रोटी से पर्व मनाना चाहिए।


सुसमाचार योहन 20:1-9


1) मरियम मगदलेना सप्ताह के प्रथम दिन, तडके मुँह अँधेरे ही कब्र के पास पहुँची। उसने देखा कि कब्र पर से पत्थर हटा दिया गया है।

2) उसने सिमोन पेत्रुस तथा उस दूसरे शिष्य के पास, जिसे ईसा प्यार करते थे, दौडती हुई आकर कहा, "वे प्रभु को कब्र में से उठा ले गये हैं और हमें पता नहीं कि उन्होंने उन को कहाँ रखा है।"

3) पेत्रुस और वह दूसरा शिष्य कब्र की ओर चल पडे।

4) वे दोनों साथ-साथ दौडे। दूसरा शिष्य पेत्रुस को पिछेल कर पहले कब्र पर पहुँचा।

5) उसने झुककर यह देखा कि छालटी की पट्टियाँ पडी हुई हैं, किन्तु वह भीतर नहीं गया।

6) सिमोन पेत्रुस उसके पीछे-पीछे चलकर आया और कब्र के अन्दर गया। उसने देखा कि पट्टियाँ पडी हुई हैं।

7) और ईसा के सिर पर जो अँगोछा बँधा था वह पट्टियों के साथ नहीं बल्कि दूसरी जगह तह किया हुआ अलग पडा हुआ है।

8) तब वह दूसरा शिष्य भी जो कब्र के पास पहले आया था भीतर गया। उसने देखा और विश्वास किया,

9) क्योंकि वे अब तक धर्मग्रन्थ का वह लेख नहीं समझ पाये थे कि जिसके अनुसार उनका जी उठना अनिवार्य था।


अथवा मारकुस 16:1-7.


1) विश्राम-दिवस के बाद मरियम और सलोमी ने सुगन्धित द्रव्य खरीदा, ताकि जा कर ईसा के शरीर का विलोपन करें।

2) वे सप्ताह के प्रथम दिन बहुत सबेरे, सूर्योदय होते ही, कब्र पर पहुंचीं।

3) वे आपस में यह कह रही थीं, "कौन हमारे लिए कब्र के द्वार पर से पत्थर लुढ़का कर हटा देगा?"

4) किन्तु जब उन्होंनं आंखें ऊपर उठा कर देखा, तो पता चला कि वह पत्थर, जो बहुत बड़ा था, अलग लुढ़काया हुआ है।

5) वे कब्र में अन्दर गयीं और यह देख कर चकित-सी रह गयीं कि लम्बा श्वेत वस्त्र पहने एक नवयुवक दाहिने बैठा हुआ है।

6) उसने उन से कहा, "डरिए नहीं। आप लोग ईसा नाज़री को ढूँढ़ रहीं हैं, जो क्रूस पर चढ़ाये गये थे। वे जी उठे हैं- वे यहाँ नहीं हैं। देखिए, यही जगह है, जहाँ उन्होंने उन को रखा था।

7) जा कर उनके शिष्यों और पेत्रुस से कहिए कि वे आप लोगों से पहले गलीलिया जायेंगे। वहां आप लोग उनके दर्शन करेंगे, जैसा कि उन्होंने आप लोगों से कहा था।"


📚 मनन-चिंतन


बिल विलसन एक अमेरिकन सैनिक था जिसने यूरोप में अपनी नियुक्ति के दौरान शराब पीने की आदत डाल ली थी। अमेरिका वापस आने पर भी उसकी शराब की लत बनी रही। वह लगभग 2 दशकों तक वह निरंतर शराब पीता रहा। इस दौरान इस वजह से उसकी आर्थिक स्थिति बर्बाद हो गयी। उसका पारिवारिक जीवन तथा स्वास्थ्य भी टूटने की कगार पर था। इस बीच उसकी मुलाकात उसके पुराने पियक्कड दोस्त से होती है जो उसे बताता की येसु ने उसे चंगा कर दिया है तथा उसने शराब पीना छोड दिया है। बिल का उसकी बात हास्यास्पद लगी। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि कोई शराब पीना छोड सकता है। इस घटना के कुछ ही महीने बाद दिसंबर 1934 में बिल को एक दिव्य अनुभव हुआ। वह मेनहटन के पुर्नवास क्रेन्द में अपना इलाज करवा रहा था। वह अत्यत पीडा में था। ’’वह कई दिनों तक अपने होशोहवास में नहीं था। शराब न मिलने के कारण उसे ऐसा लग रहा था मानो कीडे उसके खून में दौड रहे हो। दर्द के कारण वह अपने हाथ-पैर भी नहीं चला पा रहा था। अपनी इस पीडा में वह कहता है, ’’अगर ईश्वर है तो वह आये। मैं सबकुछ करने को तैयार हूं।’’ उसी समय उसका कमरा एक सफेद रोशनी से भर गया, उसका दर्द खत्म हो गया। उसे ऐसा महसूस हो रहा था मानो वह किसी पहाड की उचाई पर हो जहॉ आत्मा हवा में बह रहा हो। वह एकदम से मुक्त हो गया।

इसके बाद बिल विलसन ने कभी शराब नहीं पी। अगले छत्तीस साल बिल लोगों की शराब-मुक्ति के पुर्नावास के कार्यों में लगा रहा। उसने अल्कोहल अनोनिमस की स्थापना की जिससे लगभग एक करोड लोगों की शराब मुक्ति में सहायता की।

येसु से एक भेंट या उनके इस अनुभव ने एक शराबी को शराब के विरूद्ध चलाने वाला आंदोलनकारी बना दिया। यह उस परिवर्तन का अद्वितीय उदाहरण है जो पुनरूत्थित येसु के बाद होता है। येसु का पुनरूत्थान हमारे विश्वास की धूरी है। संत पौलुस कुरिंथियों के नाम अपने पहले पत्र में इस सत्य के बारे में लिखते हैं, ’’यदि मसीह नहीं जी उठे, तो हमारा धर्मप्रचार व्यर्थ है और आप लोगों का विश्वास भी व्यर्थ है। (1 कुरि.15:14) पुनरूत्थान सारी मानवजाति के लिये एक मोड है। यह मोड है क्योंकि हमारा विश्वास मात्र मृत्यु उपरांत जीवन में नहीं बल्कि उस जीवन में हैं जो हमें मसीह में विश्वास, उनकी मृत्यु तथा पुन जी उठने से प्राप्त होता है। पुनरूत्थान के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है जो मनुष्य इसमें विश्वास एवं अनुभव करता है उसका जीवन मूल रूप से बदल जाता है।

संत पौलुस के लिये पुनर्जीवित येसु से भेंट एक परिवर्तनकारी घटना थी। वे कलीसिया तथा ख्राीस्तीयों पर अत्याचार करते थे। किन्तु जब वे दमिश्क जा रहे थे तो रास्ते में उन्हें, येसु नाजरी, जिन पर वे अब तक अत्याचार कर रहे थे, के दर्शन होते हैं। इस घटना के बाद पौलुस का जीवन तथा उसका लक्ष्य एकदम से बदल गया। अब वह जिस येसु पर अत्याचार किया करता था का सबसे निष्ठावान अनुयायी बन गया था। वह उसके जीवन की सभी उपलब्धियों को तुच्छ तथा मसीह के ज्ञान को ही श्रेष्ठ समझने लगा। ’’इतना ही नहीं, मैं प्रभु ईसा मसीह को जानना सर्वश्रेष्ठ लाभ मानता हूँ और इस ज्ञान की तुलना में हर वस्तु को हानि ही मानता हूँ। उन्हीं के लिए मैंने सब कुछ छोड़ दिया है और उसे कूड़ा समझता हूँ,....मैं यह चाहता हूँ कि मसीह को जान लूँ, उनके पुनरूत्थान के सामर्थ्य का अनुभव करूँ और मृत्यु में उनके सदृश बन कर उनके दुःखभोग का सहभागी बन जाऊँ, जिससे मैं किसी तरह मृतकों के पुनरूत्थान तक पहुँच सकूँ।’’ (फिल्लिपियों 3:8,10-11)

शिष्यों के जीवन में भी पुनरूत्थान के बाद आमूलचूल परिवर्तन आये। वे अनपढ मछुआरे थे। उन्हें येसु के दुखभोग, मृत्यु तथा पुनरूत्थान को समझने के लिये साहस तथा व्यापक समझ की कमी थी। येसु के गिरफ्तार होते ही वे उन्हें छोडकर तितर-बितर हो गये। पेत्रुस ने तो उन्हें पहचानने से भी इंकार कर दिया था। वे इतने डर गये थे कि उन्हें कुछ पर भी विश्वास करना मुश्किल लग रहा था। लेकिन येसु ने पुनरूत्थान का साक्ष्य कई बार अपने दर्शनों के द्वारा दिये। जिससे शिष्यों का येसु के पुनरूत्थान में विश्वास पक्का हो गया था। अब वे साहस के साथ उसका साक्ष्य दे रहे थे। उनका विश्वास एवं साहस देखकर सभी विस्मित हो गये थे, ’’पेत्रुस और योहन का आत्मविश्वास देखकर और इन्हें अशिक्षित तथा अज्ञानी जान कर, महासभा के सदस्य अचम्भे में पड़ गये। फिर, वे पहचान गये कि ये ईसा के साथ रह चुके हैं,’’ (प्रेरित चरित 4:13) अब वे येसु के नाम के कारण दुख भोगने को भी तैयार थे, ’’इस पर पेत्रुस और अन्य प्रेरितों ने यह उत्तर दिया, ष्मनुष्यों की अपेक्षा ईश्वर की आज्ञा का पालन करना कहीं अधिक उचित है। इन बातों के साक्षी हम हैं और पवित्र आत्मा भी, जिसे ईश्वर ने उन लोगों को प्रदान किया है, जो उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। प्रेरित इसलिए आनन्दित हो कर महासभा के भवन से निकले कि वे {ईसा के} नाम के कारण अपमानित होने योग्य समझे गये।’’ (प्रेरित चरित 5:29-32,41)

प्रेरितगण प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भी हर जगह बडे साहस और निडरता के साथ सुसमाचार का प्रचार करने लगे थे। इनमें से कईयों ने तो मरने से पूर्व घोर यातनायें सही किन्तु हार नहीं मानी। उनका विश्वास तथा आस्था बहुत गहरा था। यह सब उनका प्रभु के जीवित होने में विश्वास के कारण था। हम भी प्रभु के पुनरूत्थान में विश्वास करते हैं किन्तु शायद उसका रूपांतरित करने वाला अनुभव हम से दूर है। हम प्रार्थना करे कि प्रभु की दया से हम भी उनके पुनरूत्थान का अनुभव कर सकें।




📚 REFLECTION



Bill Wilson was an American soldier who picked up drinking habit during his days on duty to Europe. After returning from the military, he continued drinking and with the passage of time became completely observed in it. His drinking continued for almost two decades. During this period, he was financially completely ruined. His family life tattered and health on the cusp collapse. He was told by his alcoholic friend that God had healed him and consequently completely given up drinking. Bill Wilson laughed at the thought of being sobriety. But a few months later, in December 1934, Wilson had a revelatory experience while in a Manhattan rehab centre. The only thing, he found, that would relieve his pain from the detox drug was prayer.

“For days he hallucinated. The withdrawal pains made it feel as if insects were crawling across his skin. He was so nauseous he could hardly move, but the pain was too intense to stay still. “If there is a God, let Him show Himself!” I am ready to do anything. Anything!” At that moment a white light filled his room, the pain ceased and he felt as if he were on a mountaintop and that a wind not of air but of spirit was blowing. I was free man.

Bill Wilson would never have another drink. For next thirty-six years he would devote himself to founding, building and spreading Alcoholics Anonymous until it became the largest, most well-known and successful habit changing organization in the world. Since then, Alcoholics Anonymous has helped an estimated 10 million people get sober.

An encounter with Jesus turned an alcoholic into in to a crusader against the alcohol. It is just an example of the transformation one has when encounter the risen Lord. The resurrection of Jesus has been the axis of our faith. St. Paul’s points out, “In vain is our faith if Christ has not been risen.” (1 Cor.15:14)

Resurrection has been the turning point for the whole humanity. Our faith not merely in life after death but a life with God which we gain through the death and resurrection of the Christ. A life in risen-Christ is eternal which we gain through our faith in Christ and his death and resurrection.

One of the most significant things about resurrection is the transformation it brings about in the life of people who accept this truth and live in their life.

For St. Paul encountering the Lord Jesus was a transforming reality. He was a persecutor of the Church and he could go on to any extend to persecute the Christians. However, on the way to Damascus he encountered Jesus of Nazareth whom he was persecuting. This encounter completely turned about the life and its purposes for him. Now Paul becomes one of the staunchest supporters of Jesus. He would count everything as a thrash in comparing with the knowing the Christ, “I regard everything as loss because of the surpassing value of knowing Christ Jesus my Lord… I want to know Christ and the power of his resurrection and the sharing of his sufferings by becoming like him in his death, if somehow I may attain the resurrection from the dead.” (Philippians 3:8,10-11) So far the only ambition of Paul was to persecute any attempt of proclaiming Jesus as risen but now is the champion of this cause.

The change in the life of the apostles too had been exceptionally great. They were illiterate fishermen. They lacked courage and understanding of the Jesus’ passion, death and resurrection. They run away as soon as Jesus was arrested. Peter even refused to recognise him. they were freight to the point of disbelieve. However, after meeting the risen Jesus they became bold and irresistible. They were no longer in hiding but rather in open preaching and performing miracles. Their new found courage and wisdom baffled the authorities, “Now when they saw the boldness of Peter and John and realized that they were uneducated and ordinary men, they were amazed and recognized them as companions of Jesus. (Acts 3:13) They were willing to suffer and to die. They responded, “We must obey God rather than any human authority. The God of our ancestors raised up Jesus, whom you had killed by hanging him on a tree…And we are witnesses to these things, and so is the Holy Spirit whom God has given to those who obey him.’…As they left the council, they rejoiced that they were considered worthy to suffer dishonour for the sake of the name. (Acts 5:29-32,41)

The Apostles went about everywhere daring the inclement and hostile conditions preaching the risen Lord. Most of them before being martyred suffered a great pain and torture. Their conviction and faith were of astronomical heights. It was due to the experience of the risen Lord. We too perhaps believe in the resurrection but lack the transforming experience of risen Lord. Let us Pray and earnestly seek the risen Lord for God would not hold back anything good from us.



- चिं  -2


मसीह का पुनरूत्थान मानवीय इतिहास की अविश्वसनीय घटना थी। इस प्रकार किसी मनुष्य का सार्वजनिक तौर पर मर जाना तथा उसका पूर्वघोषित तरीके से तीसरे दिन जी उठना अप्रत्याशित बात थी। हरेक व्यक्ति की इस बात को लेकर अपनी-अपनी धारणा तथा प्रतिक्रिया थी। येसु ने अपने जीवनकाल में ही शिष्यों को अनेक बार अपने दुःखभोग एवं पुनरूत्थान के बारे में आगाह किया था किन्तु शिष्य इस बात को समझने में नाकाम रहे। येसु के गिरफ्तार होते ही वे तितर-बितर हो गये तथा पेत्रुस ने तो उन्हें पहचानने से ही इनकार कर दिया था। येसु के भयावह दुःखभोग एवं दर्दनाक मृत्यु ने उनका मनोबल तोड दिया था। ऐसी मनोदशा में उनका पुनरूत्थान पर विश्वास करना संभव नहीं था। प्रभु के शव को कब्र में नहीं पाये जाने की सूचना सर्वप्रथम मरियम मगदलेना द्वारा पेत्रुस एवं योहन को इस प्रकार दी गयी, “वे प्रभु को कब्र में से उठा ले गये हैं और हमें पता नहीं कि उन्होंने उन को कहाँ रखा है।” इस खबर पर पेत्रुस एवं योहन कब्र की ओर दौड पडते हैं। पेत्रुस सर्वप्रथम कब्र के अंदर जाता है और देखता है कि, ”पट्टियाँ पडी हुई हैं। और ईसा के सिर पर जो अँगोछा बँधा था वह पट्टियों के साथ नहीं बल्कि दूसरी जगह तह किया हुआ अलग पडा हुआ है।” इसके बाद योहन कब्र में प्रवेश करता है किन्तु योहन वह दृश्य देखकर विश्वास करता है कि प्रभु सचमुच में जी उठे हैं। मरियम मगदलेना एवं पेत्रुस के विपरीत, योहन ने खाली कब्र को देख कर विश्वास किया कि प्रभु ने जैसा कहा था वैसे ही वे जीवन उठे होंगे।

योहन के अनुसार अन्यों का पुनरूत्थान में विश्वास न कर पाने का कारण उनका धर्मग्रंथ को नहीं समझ पाना था। शिष्यों को पुनरूत्थान में विश्वास दिलाने के लिए येसु को उन्हें न सिर्फ अपने दर्शन कराने पडे बल्कि उन्हें धर्मग्रंथ के द्वारा भी यह समझाना तथा विश्वास दिलाना पडा। संत लूकस के सुसमाचार में एम्माउस जाने वाले दो शिष्यों को येसु इसी प्रकार समझाते हैं, ”तब ईसा ने उन से कहा, ‘‘निर्बुद्धियों! नबियों ने जो कुछ कहा है, तुम उस पर विश्वास करने में कितने मन्दमति हो! क्या यह आवश्यक नहीं था कि मसीह वह सब सहें और इस प्रकार अपनी महिमा में प्रवेश करें?” तब ईसा ने मूसा से ले कर अन्य सब नबियों का हवाला देते हुए, अपने विषय में जो कुछ धर्मग्रन्थ में लिखा है, वह सब उन्हें समझाया।” (लूकस 24:25-27) येसु उनको धर्मग्रंथ का हवाला देकर ही अपने पुनरूत्थान की सच्चाई पर विश्वास करना सिखलाते हैं। येसु की यह शैली शिष्यों के लिए प्रभावशाली सिद्ध हुयी तथा वे कह उठे, ”हमारे हृदय कितने उद्दीप्त हो रहे थे, जब वे रास्ते में हम से बातें कर रहे थे और हमारे लिए धर्मग्रन्थ की व्याख्या कर रहे थे!” (लूकस 24:32) बाद में येसु ने प्रेरितों के समूह पर स्वयं को प्रकट किया तथा उनको अपनी शिक्षा का स्मरण दिलाते हुये कहा, ”मैंने तुम्हारे साथ रहते समय तुम लोगों से कहा था कि जो कुछ मूसा की संहिता में और नबियों में तथा भजनों में मेरे विषय में लिखा है, सब का पूरा हो जाना आवश्यक है”। तब उन्होंने उनके मन का अन्धकार दूर करते हुए उन्हें धर्मग्रन्थ का मर्म समझाया”। (लूकस 24:44-45)

इस प्रकार बाद में अपने प्रेरिताई के कार्यों के दौरान शिष्य भी दूसरों को धर्मग्रंथ की सहायता से येसु के पुनरूत्थान पर विश्वास करने के लिए प्रेरित करते हैं। संत पेत्रुस अपने प्रथम प्रेरिताई संबोधन में राजा दाउद के स्तोत्र 16 को आधार बनाते हुये उपस्थित जनसमूह को पुनरूत्थान की सच्चाई से अवगत कराने का प्रयास करते हैं। वे कहते हैं, ”उन्होंने नबी होने के नाते भविष्य में होने वाला मसीह का पुनरूत्थान देखा और इसके विषय में कहा कि, ’वह अधोलोक में नहीं छोडे गये और उनका शरीर गलने नहीं दिया गया।’ ईश्वर ने इन्ही ईसा नामक मनुष्य को पुनर्जीवित किया है - हम इस बात के साक्षी हैं। अब वह ईश्वर के दाहिने विराजमान हैं।”(प्रेरित चरित 2:31-33) अन्य स्थानों जैसे प्रेरित चरित 3:22-26; 4:11 पर भी संत पेत्रुस धर्मग्रंथ की व्याख्या द्वारा येसु के पुनरूत्थान को सच तथा ईश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित प्रमाणित करते हैं। संत पौलुस भी कुरिन्थियों के नाम प्रथम पत्र में धर्मग्रंथ के लेखों के द्वारा पुनरूत्थान के सच को प्रतिपादित करते हैं। (1 कुरि. 15:25,27,32,45,54)

धर्मग्रंथ के द्वारा हम भी पुनरूत्थान पर विश्वास करना सीखते हैं। हमने प्रभु को नहीं देखा और न ही हम पुनरूत्थान के प्रत्यक्ष साक्षी हैं किन्तु येसु के पुनरूत्थान पर हमारा विश्वास सच्चा एवं दृढ है। हमें यह विश्वास धर्मग्रंथ के वचनों द्वारा ही प्राप्त होता है। धर्मग्रंथ हमें सिखलाता है कि येसु ही वह प्रतिज्ञात मसीहा है तथा उनका दुःखभोगना तथा पुनरूत्थित होना ईश्वर की इच्छा एवं सामर्थ्य का परिणाम था। धर्मग्रंथ के द्वारा ईश्वर हम से बात करते हैं तथा अपने ईश्वरीय रहस्यों को प्रकट करते हैं। यदि हम धर्मग्रंथ के लेखों को पढते नहीं हैं तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि हम ईश्वर और उनके मार्गों के बारे में भी कम ही जानते होंगे। संत पौलुस भी इसी तथ्य को समझाते हुये कहते हैं कि ”...यदि उन्होंने उसके विषय में कभी सुना नहीं, तो उस में विश्वास कैसे कर सकते हैं?..... सुनने से विश्वास उत्पन्न होता है और जो सुना जाता है, वह मसीह का वचन है।” (रोमियों 10:14,17) मसीह में विश्वास करने के लिए धर्मग्रंथ को जानना तथा उसमें विश्वास करना हमारे खीस्तीय विश्वास की धुरी है। विश्वास के लिए यह भी अत्यंत आवश्यक है कि हम वचन को ईश्वर का वचन मानें, ”..... जब आपने ईश्वर का सन्देश सुना और ग्रहण किया, तो आपने उसे मनुष्यों का वचन नहीं बल्कि -जैसा कि वह वास्तव में है- ईश्वर का वचन समझकर स्वीकार किया और यह वचन अब आप विश्वासियों में क्रियाशील है।” (1 थेसलनीकियों. 2:13) इस विश्वास के साथ वचन को ग्रहण करना हमें पुनरूत्थान में विश्वास की ओर ले जाता है। पवित्र आत्मा हमें वचन को समझने तथा उसमें विश्वास करने की ओर ले जाता है। आज येसु अपने वचन के द्वारा हमें पुनरूत्थान में विश्वास करने का निमंत्रण देते हैं। जब हम उनके इस संदेश को पूर्ण भक्ति एवं विश्वास के साथ ग्रहण करते हैं तो पुनरूत्थान की यह घटना हमारे लिए जीवंत घटना बन जाती है तथा हम भी यह कह सकते हैं, ”मैंने प्रभु को देखा है और उन्होंने मुझे यह संदेश दिया।” (योहन 20:18)

 BR. BINIUSH TOPNO

HAPPY EASTER TO YOU ALL



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पुण्य शुक्रवार 02 अप्रैल 2021 पुण्य सप्ताह

 

पुण्य शुक्रवार 02 अप्रैल 2021

पुण्य सप्ताह

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पहला पाठ : इसायाह का ग्रन्थ 52:13-53:12

13) देखो! मेरा सेवक फलेगा-फूलेगा। वह महिमान्वित किया जायेगा और अत्यन्त महान् होगा।

14) उसकी आकृति इतनी विरूपित की गयी थी कि वह मनुय नही जान पड़ता था; लोग देख कर दंग रह गये थे।

15) उसकी ओर बहुत-से राष्ट्र आश्चर्यचकित हो कर देखेंगे और उसके सामने राजा मौन रहेंगे; क्योंकि उनके सामने एक अपूर्व दृश्य प्रकट होगा और जो बात कभी सुनने में नहीं आयी, वे उसे अपनी आँखों से देखेंगे।

1) किसने हमारे सन्देश पर विश्वास किया? प्रभु का सामर्थ्य किस पर प्रकट हुआ है?

2) वह हमारे सामने एक छोटे-से पौधे की तरह, सूखी भूमि की जड़ की तरह बढ़ा। हमने उसे देखा था; उसमें न तो सुन्दरता थी, न तेज और न कोई आकर्षण ही।

3) वह मनुयों द्वारा निन्दित और तिरस्कृत था, शोक का मारा और अत्यन्त दुःखी था। लोग जिन्हें देख कर मुँह फेर लेते हैं, उनकी तरह ही वह तिरस्कृत और तुच्छ समझा जाता था।

4) परन्तु वह हमारे ही रोगों का अपने ऊपर लेता था और हमारे ही दुःखों से लदा हुआ था और हम उसे दण्डित, ईश्वर का मारा हुआ और तिरस्कृत समझते थे।

5) हमारे पापों के कारण वह छेदित किया गया है। हमारे कूकर्मों के कारण वह कुचल दिया गया है। जो दण्ड वह भोगता था, उसके द्वारा हमें शान्ति मिली है और उसके घावों द्वारा हम भले-चंगे हो गये हैं।

6) हम सब अपना-अपना रास्ता पकड़ कर भेड़ों की तरह भटक रहे थे। उसी पर प्रभु ने हम सब के पापों का भार डाला है।

7) वह अपने पर किया हुआ अत्याचार धैर्य से सहता गया और चुप रहा। वध के लिए ले जाये जाने वाले मेमने की तरह और ऊन कतरने वाले के सामने चुप रहने वाली भेड़ की तरह उसने अपना मुँह नहीं खोला।

8) वे उसे बन्दीगृह और अदालत ले गये; कोई उसकी परवाह नहीं करता था। वह जीवितों के बीच में से उठा लिया गया है और वह अपने लोगों के पापों के कारण मारा गया है।

9) यद्यपि उसने कोई अन्याय नहीं किया था और उसके मुँह से कभी छल-कपट की बात नहीं निकली थी, फिर भी उसकी कब्र विधर्मियों के बीच बनायी गयी और वह धनियों के साथ दफ़नाया गया है।

10) प्रभु ने चाहा कि वह दुःख से रौंदा जाये। उसने प्रायश्चित के रूप में अपना जीवन अर्पित किया; इसलिए उसका वंश बहुत दिनों तक बना रहेगा और उसके द्वारा प्रभु की इच्छा पूरी होगी।

11) उसे दुःखभोग के कारण ज्योति और पूर्ण ज्ञान प्राप्त होगा। उसने दुःख सह कर जिन लोगों का अधर्म अपने ऊपर लिया था, वह उन्हें उनके पापों से मुक्त करेगा।

12) इसलिए मैं उसका भाग महान् लोगों के बीच बाँटूँगा और वह शक्तिशाली राजाओं के साथ लूट का माल बाँटेगा; क्योंकि उसने बहुतों के अपराध अपने ऊपर लेते हुए और पापियों के लिए प्रार्थना करते हुए अपने को बलि चढ़ा दिया और उसकी गिनती कुकर्मियों में हुई।

दूसरा पाठ : इब्रानियों के नाम पत्र 4:14-16;5:7-9

14) हमारे अपने एक महान् प्रधानयाजक हैं, अर्थात् ईश्वर के पुत्र ईसा, जो आकाश पार कर चुके हैं। इसलिए हम अपने विश्वास में सुदृढ़ रहें।

15) हमारे प्रधानयाजक हमारी दुर्बलताओं में हम से सहानुभूति रख सकते हैं, क्योंकि पाप के अतिरिक्त अन्य सभी बातों में उनकी परीक्षा हमारी ही तरह ली गयी है।

16) इसलिए हम भरोसे के साथ अनुग्रह के सिंहासन के पास जायें, जिससे हमें दया मिले और हम वह कृपा प्राप्त करें, जो हमारी आवश्यकताओं में हमारी सहायता करेगी।

7) मसीह ने इस पृथ्वी पर रहते समय पुकार-पुकार कर और आँसू बहा कर ईश्वर से, जो उन्हें मृत्यु से बचा सकता था, प्रार्थना और अनुनय-विनय की। श्रद्धालुता के कारण उनकी प्रार्थना सुनी गयी।

8) ईश्वर का पुत्र होने पर भी उन्होंने दुःख सह कर आज्ञापालन सीखा।

9 (9-10) वह पूर्ण रूप से सिद्ध बन कर और ईश्वर से मेलखि़सेदेक की तरह प्रधानयाजक की उपाधि प्राप्त कर उन सबों के लिए मुक्ति के स्रोत बन गये, जो उनकी आज्ञाओं का पालन करते हैं।

सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 18:1-19:42

1) यह सब कहने के बाद ईसा अपने शिष्यों के साथ केद्रेान नाले के उस पार गये। वहाँ एक बारी थी। उन्होंने अपने शिष्यों के साथ उस में प्रवेश किया।

2) उनके विश्वासघाती यूदस को भी वह जगह मालूम थी, क्योंकि ईसा अक्सर अपने शिष्यों के साथ वहाँ गये थे।

3) इसलिये यूदस पलटन और महायाजकों तथा फ़रीसियों के भेजे हुये प्यादों के साथ वहाँ आ पहुँचा। वे लोग लालटेनें मशालें और हथियार लिये थे।

4) ईसा, यह जान कर कि मुझ पर क्या-क्या बीतेगी आगे बढे और उन से बोले, ’’किसे ढूढतें हो?’’

5) उन्होंने उत्तर दिया, ’’ईसा नाज़री को’’। ईसा ने उन से कहा, ’’मैं वही हूँ’’। वहाँ उनका विश्वासघाती यूदस भी उन लोगों के साथ खडा था।

6) जब ईसा ने उन से कहा, ’मैं वही हूँ’ तो वे पीछे हटकर भूमि पर गिर पडे।

7) ईसा ने उन से फि़र पूछा, ’’किसे ढूढते हो?’’ वे बोले, ’’ईसा नाजरी को’’।

8) इस पर ईसा ने कहा, ’’मैं तुम लोगों से कह चुका हूँ कि मैं वही हूँ। यदि तुम मुझे ढूँढ़ते हो तो इन्हें जाने दो।’’

9) यह इसलिये हुआ कि उनका यह कथन पूरा हो जाये- तूने मुझ को जिन्हें सौंपा, मैंने उन में से एक का भी सर्वनाश नहीं होने दिया।

10) उस समय सिमोन पेत्रुस ने अपनी तलवार खींच ली और प्रधानयाजक के नौकर पर चलाकर उसका दाहिना कान उडा दिया। उस नौकर का नाम मलखुस था।

11) ईसा ने पेत्रुस से कहा, ’’तलवार म्यान में कर लो। जो प्याला पिता ने मुझे दिया है क्या मैं उसे नहीं पिऊँ?’’

12) तब पलटन, कप्तान और यहूदियों के प्यादों ने ईसा को पकड कर बाँध लिया।

13) वे उन्हें पहले अन्नस के यहाँ ले गये; क्योंकि वह उस वर्ष के प्रधानयाजक कैफस का ससुर था।

14) यह वही कैफस था जिसने यहूदियों को यह परामर्श दिया था- अच्छा यही है कि राष्ट्र के लिये एक ही मनुष्य मरे।

15) सिमोन पेत्रुस और एक दूसरा शिष्य ईसा के पीछे-पीछे चले। यह शिष्य प्रधानयाजक का परिचित था और ईसा के साथ प्रधानयाजक के प्रांगण में गया,

16) किन्तु पेत्रुस फाटक के पास बाहर खडा रहा। इसलिये वह दूसरा शिष्य जो प्रधानयाजक का परिचित था, फि़र बाहर गया और द्वारपाली से कहकर पेत्रुस को भीतर ले आया।

17) द्वारपाली ने पेत्रुस से कहा, ’’कहीं तुम भी तो उस मनुष्य के शिष्य नहीं हो?’’ उसने उत्तर दिया, ’’नहीं हूँ’’।

18) जाड़े के कारण नौकर और प्यादे आग सुलगा कर ताप रहे थे। पेत्रुस भी उनके साथ आग तापता रहा।

19) प्रधानयाजक ने ईसा से उनके शिष्यों और उनकी शिक्षा के विषय में पूछा।

20) ईसा ने उत्तर दिया, ’’मैं संसार के सामने प्रकट रूप से बोला हूँ। मैंने सदा सभागृह और मन्दिर में जहाँ सब यहूदी एकत्र हुआ करते हैं, शिक्षा दी है। मैंने गुप्त रूप से कुछ नहीं कहा।

21) यह आप मुझ से क्यों पूछते हैं? उन से पूछिये जिन्होंने मेरी शिक्षा सुनी है। वे जानते हैं कि मैंने क्या-क्या कहा।’’

22) इस पर पास खडे प्यादों में से एक ने ईसा को थप्पड मार कर कहा, “तुम प्रधानयाजक को इस तरह जवाब देते हो?“

23) ईसा ने उस से कहा, ’’यदि मैंने गलत कहा, तो गलती बता दो और यदि ठीक कहा तो, मुझे क्यों मारते हो?’’

24) इसके बाद अन्नस ने बाँधें हुये ईसा को प्रधानयाजक कैफस के पास भेजा।

25) सिमोन पेत्रुस उस समय आग ताप रहा था। कुछ लोगों ने उस से कहा, ’’कहीं तुम भी तो उसके शिष्य नहीं हो?’’ उसने अस्वीकार करते हुये कहा, ’’नहीं हूँ’’।

26) प्रधानयाजक का एक नौकर उस व्यक्ति का सम्बन्धी था जिसका कान पेत्रुस ने उडा दिया था। उसने कहा, ’’क्या मैंने तुम को उसके साथ बारी में नहीं देखा था?

27) पेत्रुस ने फिर अस्वीकार किया और उसी क्षण मुर्गे ने बाँग दी।

28) तब वे ईसा को कैफस के यहाँ से राज्य पाल के भवन ले गये। अब भोर हो गया था। वे भवन के अन्दर इसलिये नहीं गये कि अशुद्व न हो जायें, बल्कि पास्का का मेमना खा सकें।

29) पिलातुस बाहर आकर उन से मिला और बोला, ’’आप लोग इस मनुष्य पर कौन सा अभियोग लगाते हैं?’’

30) उन्होने उत्तर दिया, ’’यदि यह कुकर्मी नहीं होता, तो हमने इसे आपके हवाले नहीं किया होता’’।

31) पिलातुस ने उन से कहा, ’’आप लोग इसे ले जाइए और अपनी संहिता के अनुसार इसका न्याय कीजिये।’’ यहूदियों ने उत्तर दिया, ’’हमें किसी को प्राणदंण्ड देने का अधिकार नहीं है’’।

32) यह इसलिये हुआ कि ईसा का वह कथन पूरा हो जाये, जिसके द्वारा उन्होने संकेत किया था कि उनकी मृत्यु किस प्रकार की होगी। 33) तब पिलातुस ने फिर भवन में जा कर ईसा को बुला भेजा और उन से कहा, ’’क्या तुम यहूदियों के राजा हो?’’

34) ईसा ने उत्तर दिया, ’’क्या आप यह अपनी ओर से कहते हैं या दूसरों ने आप से मेरे विषय में यह कहा है?’’

35) पिलातुस ने कहा, ’’क्या मैं यहूदी हूँ? तुम्हारे ही लोगों और महायाजकों ने तुम्हें मेरे हवाले किया। तुमने क्या किया है।’’

36) ईसा ने उत्तर दिया, ’’मेरा राज्य इस संसार का नहीं है। यदि मेरा राज्य इस संसार का होता तो मेरे अनुयायी लडते और मैं यहूदियों के हवाले नहीं किया जाता। परन्तु मेरा राज्य यहाँ का नहीं है।’’

37) इस पर पिलातुस ने उन से कहा, ’’तो तुम राजा हो?’’ ईसा ने उत्तर दिया, ’’आप ठीक ही कहते हैं। मैं राजा हूँ। मैं इसलिये जन्मा और इसलिये संसार में आया हूँ कि सत्य के विषय में साक्ष्य पेश कर सकूँ। जो सत्य के पक्ष में है, वह मेरी सुनता है।’’

38) पिलातुस ने उन से कहा, ’’सत्य क्या है?’’ वह यह कहकर फिर बाहर गया और यहूदियों के पास आ कर बोला, ’’मैं तो उस में कोई दोष नहीं पाता हूँ,

39) लेकिन तुम्हारे लिये पास्का के अवसर पर एक बन्दी को रिहा करने का रिवाज है। क्या तुम लोग चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिये यहूदियों के राजा को रिहा कर दूँ?’’

40) इस पर वे चिल्ला उठे, ’’इसे नहीं, बराब्बस को’’। बराब्बस डाकू था।

1) तब पिलातुस ने ईसा को ले जा कर कोडे लगाने का आदेश दिया।

2) सैनिकेां ने काँटों का मुकुट गूँथ कर उनके सिर पर रख दिया और उन्हें बैंगनी कपडा पहनाया।

3) फिर वे उनके पास आ-आ कर कहते थे, ’’यहूदियों के राजा प्रणाम!’’ और वे उन्हें थप्पड मारते जाते थे।

4) पिलातुस ने फिर बाहर जा कर लोगों से कहा, ’’देखो मैं उसे तुम लोगों के सामने बाहर ले आता हूँ, जिससे तुम यह जान लो कि मैं उस में कोई दोष नहीं पाता’’।

5) तब ईसा काँटों का मुकुट और बैगनी कपडा पहने बाहर आये। पिलातुस ने लोगों से कहा, ’’यही है वह मनुष्य!’’

6) महायाजक और प्यादे उन्हें देखते ही चिल्ला उठे, ’’इसे क्रूस दीजिये! इसे क्रूस दीजिये!’’ पिलातुस ने उन से कहा, ’’इसे तुम्हीं ले जाओ और क्रूस पर चढाओ। मैं तो इस में कोई दोष नहीं पाता।’’

7) यहूदियों ने उत्तर दिया, ’’हमारी एक संहिता है और उस संहिता के अनुसार यह प्राणदंण्ड के योग्य है, क्योंकि इसने ईश्वर का पुत्र होने का दावा किया है।’’

8) पिलातुस यह सुनकर और भी डर गया।

9) उसने फिर भवन के अन्दर जा कर ईसा से पूछा, ’’तुम कहाँ के हो?’’ किन्तु ईसा ने उसे उत्तर नहीं दिया।

10) इस पर पिलातुस ने उन से कहा, ’’तुम मुझ से क्यों नहीं बोलते? क्या तुम यह नहीं जानते कि मुझे तुम को रिहा करने का भी अधिकार है और तुम को क्रूस पर चढ़वाने का भी?

11) ईसा ने उत्तर दिया, ’’यदि आप को ऊपर से अधिकार न दिया गया होता तो आपका मुझ पर कोई अधिकार नहीं होता। इसलिये जिसने मुझे आपके हवाले किया, वह अधिक दोषी है।’’

12) इसके बाद पिलातुस ईसा को मुक्त करने का उपाय ढूँढ़ता रहा, परन्तु यहूदी यह कहते हुये चिल्लाते रहे, ’’यदि आप इसे रिहा करते हैं, तो आप कैसर के हितेषी नहीं हैं। जो अपने को राजा कहता है वह कैसर का विरोध करता है।’’

13) यह सुनकर पिलातुस ने ईसा को बाहर ले आने का आदेश दिया। वह अपने न्यायासन पर उस जगह, जो लिथोस-त्रोतोस, और इब्रानी में गबूबथा, कहलाती है, बैठ गया।

14) पास्का की तैयारी का दिन था। लगभग दोपहर का समय था। पिलातुस ने यहूदियों से कहा, ’’यही ही तुम्हारा राजा!’’

15) इस पर वे चिल्ला उठे, ’’ले जाइये! ले जाइए! इसे क्रूस दीजिये!’’ पिलातुस ने उन से कहा क्या, ’’मैं तुम्हारे राजा को क्रूस पर चढवा दूँ?’’ महायाजकों ने उत्तर दिया, ’’कैसर के सिवा हमारा कोई राजा नहीं’’।

16) तब पिलातुस ने ईसा को कू्रस पर चढाने के लिये उनके हवाले कर दिया।

17) वे ईसा को ले गये और वह अपना कू्रस ढोते हुये खोपडी की जगह नामक स्थान गये। इब्रानी में उसका नाम गोलगोथा है।

18) वहाँ उन्होंने ईसा को और उनके साथ और दो व्यक्तियों को कू्रस पर चढाया- एक को इस ओर, दूसरे को उस ओर और बीच में ईसा को।

19) पिलातुस ने एक दोषपत्र भी लिखवा कर क्रूस पर लगवा दिया। वह इस प्रकार था- ’’ईसा नाज़री यहूदियों का राजा।’’

20) बहुत-से यहूदियों ने यह दोषपत्र पढा क्योंकि वह स्थान जहाँ ईसा कू्स पर चढाये गय थे, शहर के पास ही था और दोष पत्र इब्रानी, लातीनी और यूनानी भाषा में लिखा हुआ था।

21) इसलिये यहूदियों के महायाजकों ने पिलातुस से कहा, ’’आप यह नहीं लिखिये- यहूदियों का राजा; बल्कि- इसने कहा कि मैं यहूदियों का राजा हूँ’’।

22) पिलातुस ने उत्तर दिया, ’’मैंने जो लिख दिया, सो लिख दिया।’’

23) ईसा को कू्रस पर चढाने के बाद सैनिकों ने उनके कपडे ले लिये और कुरते के सिवा उन कपडों के चार भाग कर दिये- हर सैनिक के लिये एक-एक भाग। उस कुरते में सीवन नहीं था, वह ऊपर से नीचे तक पूरा-का-पूरा बुना हुआ था।

24) उन्होंने आपस में कहा, ’’हम इसे नहीं फाडें। चिट्ठी डालकर देख लें कि यह किसे मिलता है। यह इसलिये हुआ कि धर्मग्रंथ का यह कथन पूरा हो जाये- उन्होंने मेरे कपडे आपस में बाँट लिये और मेरे वस्त्र पर चिट्ठी डाली। सैनिकेां ने ऐसा ही किया।

25) ईसा की माता, उसकी बहिन, क्लोपस की पत्नि मरियम और मरियम मगदलेना उनके कू्रस के पास खडी थीं।

26) ईसा ने अपनी माता को और उनके पास अपने उस शिष्य को, जिसे वह प्यार करते थे देखा। उन्होंने अपनी माता से कहा, ’’भद्रे! यह आपका पुत्र है’’।

27) इसके बाद उन्होंने उस शिष्य से कहा, ’’यह तुम्हारी माता है’’। उस समय से उस शिष्य ने उसे अपने यहाँ आश्रय दिया।

28) तब ईसा ने यह जान कर कि अब सब कुछ पूरा हो चुका है, धर्मग्रन्थ का लेख पूरा करने के उद्देश्य से कहा, ’’मैं प्यासा हूँ’’।

29) वहाँ खट्ठी अंगूरी से भरा एक पात्र रखा हुआ था। लेागों ने उस में एक पनसोख्ता डुबाया और उसे जूफ़े की डण्डी पर रख कर ईसा के मुख से लगा दिया।

30) ईसा ने खट्ठी अंगूरी चखकर कहा, ’’सब पूरा हो चुका है’’। और सिर झुकाकर प्राण त्याग दिये।

31) वह तैयारी का दिन था। यहूदी यह नहीं चाहते थे कि शव विश्राम के दिन कू्रस पर रह जाये क्योंकि उस विश्राम के दिन बड़ा त्यौहार पडता था। उन्होंने पिलातुस से निवेदन किया कि उनकी टाँगें तोड दी जाये और शव हटा दिये जायें।

32) इसलिये सैनिकेां ने आकर ईसा के साथ क्रूस पर चढाये हुये पहले व्यक्ति की टाँगें तोड दी, फिर दूसरे की।

33) जब उन्होंने ईसा के पास आकर देखा कि वह मर चुके हैं तो उन्होंने उनकी टाँगें नहीं तोडी;

34) लेकिन एक सैनिक ने उनकी बगल में भाला मारा और उस में से तुरन्त रक्त और जल बह निकला।

35) जिसने यह देखा है, वही इसका साक्ष्य देता है, और उसका साक्ष्य सच्चा है। वह जानता है कि वह सच बोलता है, जिससे आप लोग भी विश्वास करें।

36) यह इसलिये हुआ कि धर्मग्रंथ का यह कथन पूरा हो जाये- उसकी एक भी हड्डी नहीं तोडी जायेगी;

37) फिर धर्मग्रन्थ का एक दूसरा कथन इस प्रकार है- उन्होंने जिसे छेदा, वे उसी की ओर देखेगें।

38) इसके बाद अरिमथिया के यूसुफ ने जो यहूदियों के भय के कारण ईसा का गुप्त शिष्य था, पिलातुस से ईसा का शब ले जाने की अनुमति माँगी। पिलातुस ने अनुमति दे दी। इसलिये यूसुफ आ कर ईसा का शव ले गया।

39) निकोदेमुस भी पहुँचा, जो पहले रात को ईसा से मिलने आया था। वह लगभग पचास सेर का गंधरस और अगरू का सम्मिश्रण लाया।

40) उन्होंने ईसा का शव लिया और यहूदियों की दफन की प्रथा के अनुसार उसे सुगंधित द्रव्यों के साथ छालटी की पट्टियों में लपेटा।

41) जहाँ ईसा कू्रस पर चढाये गये थे, वहाँ एक बारी थी और उस बारी में एक नयी कब्र, जिस में अब तक कोई नहीं रखा गया था।

42) उन्होंने ईसा को वहीं रख दिया, क्योंकि वह यहूदियों के लिये तेयारी का दिन था और वह कब्र निकट ही थी।


📚 मनन-चिंतन


दुख-तकलीफ मानव जीवन का अभिन्न हिस्सा है। किन्तु फिर भी मनुष्य मुख्यतः यही प्रयास करता है कि वह दुख से बचकर सुख और आराम पाता रहें। ट्रेन, होटलों आदि में यात्रा करने या ठहरने की श्रेणीयॉ या वर्ग होते है। उच्च श्रेणीयों में यात्रा करने से हमें अधिक सुविधा और आराम मिलता है जिसके एवज में हमें ज्यादा पैसा खर्च करना पडता है। हांलाकि साधारण श्रेणी के टिकट से भी हम उसी जगह पहुंचते जहॉ उच्च श्रेणी के लोग लेकिन हम अधिकांशः सुविधाजनक एवं आरामदेह यात्रा को ही प्राथमिकता देते हैं। लेकिन प्रभु येसु दुख से बचने के लिये हमें कोई शिक्षा या मार्ग नहीं दिखाते है। उन्होंने दुखभोग एवं क्रूस-मरण को ही जीवन की प्राथमिकता तथा उददेश्य बताया। उन्होंने अपने दुखःभोग एवं मरण के द्वारा ही मानव-जाति की मुक्ति का द्वार खोला।

गेथसेमनी की बारी में येसु ने पिता से प्रार्थना की वे इस भावी प्राणा पीडा का प्याला उनसे हटा ले किन्तु उन्होंने पिता की इच्छा को पूरी करने में ही अपना सुख समझा फिर चाहे वह भले ही दुखभोग एवं मरण ही क्यों न हो। जीवन में स्थायी बने रहने वाले सुख और शांति तब आती है जब हम सही काम करे। ऐसा करने से भले ही कष्ट क्यों न हो किन्तु भलाई और सत्य के काम ही सच्ची और स्थायी शांति प्रदान करते हैं। जीवन में सांसारिक सुख के लिये हमें कई बार समझौते करने पडते हैं। हम चारों ओर से खतरे तथा असुरक्षा की भावना से घेरे रहते हैं। इसलिये हमारी कोशिश सुख सुनिश्चित करने की होती है तथा इसे हासिल करने के लिये हम अनेक बार नैतिक मूल्यों के साथ समझौता करते हैं। किन्तु अपनी नासमझी में हम यह भूल जाते ही सच्चा एवं स्थायी सुख तो ईश्वर का जीवन जी कर आता है उसके लिये चाहे हमें कष्ट ही क्यों न झेलना पडे।

येसु निर्दोष थे। उन्होंने कोई पाप नहीं किया था। उन्होंने सदैव वहीं किया जो सही था तथा अपने भलाई के कार्यों के द्वारा लोगों के स्वास्थ्य और जीवन को पुनः लौटाया। उन्होंने खुले तौर पर सच्ची शिक्षा दी किन्तु फिर भी उन पर साजिश, ईशनिंदा आदि जैसे मनगणंत आरोप मढे गये। किन्तु येसु जानते थे कि उनका दुखभोग और मरण पिता की योजना का हिस्सा है। कोई भी उनका जीवन उनसे नहीं ले सकता था। जब पिलासुन ने उनसे कहा, ’’तुम मुझ से क्यों नहीं बोलते? क्या तुम यह नहीं जानते कि मुझे तुम को रिहा करने का भी अधिकार है और तुम को क्रूस पर चढ़वाने का भी? ईसा ने उत्तर दिया, ’’यदि आप को ऊपर से अधिकार न दिया गया होता तो आपका मुझ पर कोई अधिकार नहीं होता।’’ (योहन 19:10-11) और यहूदियों को उन्होंने और भी स्पष्ट रूप से कहा, ’’मैं अपना जीवन अर्पित करता हूँ, बाद में मैं उसे फिर ग्रहण करूँगा। कोई मुझ से मेरा जीवन नहीं हर सकता, मैं स्वयं उसे अर्पित करता हूँ। मुझे अपना जीवन अर्पित करने और उसे फिर ग्रहण करने का अधिकार है। मुझे अपने पिता की ओर से यह आदेश मिला है।’’ (योहन 10:17-18)

इस प्रकार येसु के दुखभोग में कुडवाहट एवं खेद की भावना नहीं। उनका दुखभोग कठिन है किन्तु वह उन्हें स्वीकार्य है क्योंकि यह पिता को प्रिय है। पुण्य शुक्रवार जीवन के दुख से भागने या बचने का कोई झूठा एवं छदम् सब्जबाग नहीं दिखाता है। वह जो सही और सच्चा है उसे अपनाकर, सबकुछ पिता की इच्छा पर छोडकर, बहादुरी के साथ आगे बढने का प्रस्ताव रखता है। हम हमारे दुख को किसी पुरस्कार से जोडकर देखते हैं। लोग दुख उठाने को तैयार हो जाते हैं किन्तु किसके एवज में। वह जानना चाहते है कि इससे क्या लाभ होगा। किन्तु धर्मग्रंथ हमें बताता है कि धर्मी के दुखभोग का पुरस्कार स्वयं ईश्वर होता है।

योब के दुख का कारण उसकी धार्मिकता थी। शैतान उसे दुख पहुंचाता है ताकि वह अपनी धार्मिकता त्याग दे। योब ने अत्याधिक दुख और हानि उठायी किन्तु उसने ईश्वर को और उसकी धार्मिकता को नहीं त्यागा। ईश्वर स्वयं उसका पुरस्कार था। कई नबियों ने भी धार्मिकता के कारण दुख उठाये वह पुरस्कार जो स्वयं ईश्वर होगा उस पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। इसी प्रकार हमारे जीवन में भी दुखभोग आता है। हमें इससे घबरा कर भागना नहीं चाहिये और झूठी सुरक्षा के पीछे नहीं भागना चाहिये। इसके विपरीत जो भी हम अपनी मानवीय क्षमता के अनुसार कर सकते वही करना चाहिये बाकि जो भी हो उसे ईश्वर की इच्छा मानकर सहना चाहिये। हमें नहीं भूलना चाहिये कि पिता की इच्छा के बिना हमारे सिर का बाल भी नहीं गिरता तो फिर पिता के लिये हमारा जीवन कहीं अधिक मूल्यवान है। हमारे कष्ट और पीडा उससे छिपे हुये नहीं है। वह हमें न सिर्फ सहनशक्ति प्रदान करता है बल्कि जो ख्राीस्तीय साहस के साथ अपने दुःखों को वहन करते हैं उन्हें पुरस्कार भी उन्हें प्रदान करता है।




📚 REFLECTION


Suffering is the integral part of human life. Yet most common attempts of human beings have been to avoid suffering and gain comfort. In the trains, hotels etc. we have classes and categories to be availed while travelling and If we want more comfort then we must pay more. The general class will serve the same purpose and take you to same destination as the first-class but it won’t be comfortable. To avoid any inconvenience, we must take a premium class ticket or reservation. This has been the tendency in all ages. But Jesus does not offer a way out of suffering but a way to go through it. It was Cross that brought the salvation and eternal comfort.

In the Garden of Gethsemane Jesus prayed to have the cup of suffering be taken away yet he found comfort in doing the will of God. Lasting peace and happiness come when we do what is right even if it causes up pain and loss. To gain the worldly comfort and to prolong it we make a lot of compromises in life. We are surrounded by the threat of danger and insecurity. So, we try to ensure our safety and comfort by the worldly means even if they are unethical and corrupt. But when we stand for the right and even suffer for it we experience and gain God’s favour and lasting peace and happiness.

Jesus was innocent. He committed no sin. He did what was right and brought restoration of health and life to the people. He taught them the right things in the open, yet he was unjustly condemned of crimes which were far-fetched and flimsy. But Jesus already knew that no one can take away his life or do any harm to him. In response to Pilot’s exclamation, “Do you not know that I have power to release you, and power to crucify you?’ Jesus answered, “You would have no power over me unless it had been given you from above;” (John 19:10-11) and to the Jews he said even more clearly, “I lay down my life in order to take it up again. No one takes it from me, but I lay it down of my own accord. I have power to lay it down, and I have power to take it up again. I have received this command from my Father.’ (John 10:17-18)

So in Jesus’ suffering there are no grudges and force. It is difficult but it is acceptable because this is what pleases God. Good Friday offers no short cuts and false promises but a stark truth to accept life and its suffering and pain with a brave heart. Often suffering is related with a reward. People are ready to undergo suffering but for what. They would like to know the package. God himself is the reward of the suffering of the righteous. The reason of Job’s suffering was his righteousness. Devil wanted to trouble him so that he may forfeit his righteousness. He underwent extreme suffering but remained righteous. God was his reward. So therefore, in our life too there difficult and painful moments. We do not have get panicked and take all safety measure to avoid pain. But rather do all that in normal human capacity and rest accept it as the will of the father, without his knowledge not even the hair of your heads falls. Our pain and difficulties are not hidden from him. He provides endurance as well the reward to those who bravely take it upon himself.


मनन-चिंतन - 2


एक गैरख्रीस्तीय व्यक्ति अपनी पत्नी को लेकर ख्रीस्तीय मिशनरियों द्वारा संचालित एक अस्पताल गया। उसकी पत्नी गंभीर रूप से बीमार थी। इसलिए वह बहुत चिंतित और बेचैन था। उसने वहाँ एक प्रार्थनालय देखा। उसने सोचा कि मन को शान्त करने के लिए थोडी देर प्रार्थनालय में बैठ जाता हूँ। उसने प्रार्थनालय में प्रवेश किया। उसने क्रूसित प्रभु की मूर्ति की ओर देखा और सोचने लगा कि यह तो मुझ से भी ज़्यादा परेशान दिख रहा है, यह मेरी मदद कैसे कर सकता है? परन्तु, कुछ ही क्षण में उसकी सोच बदल गयी। उसे लगा कि यह मुझ से भी ज़्यादा परेशान है, इसने मुझ से भी ज़्यादा दुख-दर्द का अनुभव किया। इसलिए यह मेरी परेशानी को आसानी से समझेगा, यह मेरे दुख-दर्द को ठीक से जानता है। फिर वह जोर-जोर से चिल्ला-चिल्ला कर अपनी समस्याओं को क्रूसित प्रभु के सामने रखने लगा। उसे एक प्रकार की शांति महसूस हुयी। उसे लगा कि उसका बोझ हलका हो गया।

पवित्र वचन कहता है, “हमारे प्रधानयाजक हमारी दुर्बलताओं में हम से सहानुभूति रख सकते हैं, क्योंकि पाप के अतिरिक्त अन्य सभी बातों में उनकी परीक्षा हमारी ही तरह ली गयी है। इसलिए हम भरोसे के साथ अनुग्रह के सिंहासन के पास जायें, जिससे हमें दया मिले और हम वह कृपा प्राप्त करें, जो हमारी आवश्यकताओं में हमारी सहायता करेगी।” (इब्रानियों 4:15-16)

यह सच है कि इतिहास में प्रभु येसु के समान किसी ने इतना दुख-दर्द नहीं सहा। कई धर्मों के देवी-देवताएं शारीरिक रीति से ही बहुत शक्तिशाली दिखते हैं। किसी के कई हाथ होते हैं, किसी के कई सिर और कई देवताओं के हाथों में भाले या तलवार जैसे हथियार भी होते हैं। अगर कोई वर्तमान युग में देवी-देवताओं की कल्पना करता है तो वे शायद ए.के-47 राइफल लेकर खडे होते नजर आयेंगे। यह सच नहीं है कि हमारे प्रभु ईश्वर के पास कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं हैं। उनके पास एक अन्य प्रकार के अस्त्र शस्त्र हैं। हमारे प्रभु येसु ख्रीस्त के अस्त्र-शस्त्र आध्यात्मिक जीवन के अस्त्र-शस्त्र होते हैं। वे हमारे पास प्यार, दया और अनुकम्पा लेकर आते हैं। संत पौलुस हमें बताते हैं कि प्रभु येसु के अनुयायियों को किस प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण करना चाहिए। “आप ईश्वर के अस्त्र-शस्त्र धारण करें, जिससे आप दुर्दिन में शत्रु का सामना करने में समर्थ हों और अन्त तक अपना कर्तव्य पूरा कर विजय प्राप्त करें। आप सत्य का कमरबन्द कस कर, धार्मिकता का कवच धारण कर और शान्ति-सुसमाचार के उत्साह के जूते पहन कर खड़े हों। साथ ही विश्वास की ढाल धारण किये रहें। उस से आप दुष्ट के सब अग्निमय बाण बुझा सकेंगे। इसके अतिरिक्त मुक्ति का टोप पहन लें और आत्मा की तलवार - अर्थात् ईश्वर का वचन - ग्रहण करें।” (एफेसियों 6:13-17)

क्रूस पर टंगे प्रभु येसु हमारे लिए केवल एक आदर्श नहीं हैं। वह हमारे ईश्वर है जो हमारे सामने हमारे अपने जीवन के रहस्यों को प्रकट करते हैं। जो जीवन हमने उनसे पाया है, उस जीवन को हमें किस प्रकार निभाना चाहिए – यह भी प्रभु हमें बताते हैं। क्रूस विश्वासियों के दैनिक जीवन का अभिन्न अंग है। इसी कारण प्रभु ने अपने शिष्यों से अपने प्रतिदिन के क्रूस उठा कर उनके पीछे चलने को कहा है (देखिए लूकस 9:23)। क्रूस हमारी मुक्ति का मार्ग है। प्रवक्ता ग्रन्थ, अध्याय 4 इस बात पर प्रकाश डालता है कि ईश्वर की प्रज्ञा की खोज में निकलने वालों के साथ क्या होता है। ईश्वर उन्हें प्यार करते हैं, उन्हें आशीर्वाद और सुरक्षा प्रदान करते हैं। लेकिन यह सब प्रदान करने की प्रक्रिया उतनी सरल नहीं है। पवित्र वचन कहता है, “प्रारम्भ में प्रज्ञा उसे टेढ़े-मेढ़े रास्ते पर ले चलेगी और उसकी परीक्षा लेगी। वह उस में भय तथा आतंक उत्पन्न करेगी। वह अपने अनुशासन से उसे उत्पीड़ित करेगी और तब तक अपने नियमों से उसकी परीक्षा करती रहेगी, जब तक वह उस पूर्णतया विश्वास नहीं करती। इसके बाद वह उसे सीधे मार्ग पर ले जा कर आनन्दित कर देगी और उस पर अपने रहस्य प्रकट करेगी। वह उसे ज्ञान और न्याय का विवेक प्रदान करेगी।” (प्रवक्ता 4:18-21) अगर हम इन वचनों पर ध्यान देंगे तो हमें पता चलेगा कि मुक्ति का मार्ग क्रूस का मार्ग है और क्रूस के बिना हमें मुक्ति नहीं मिल सकती। जो ईश्वर की प्रज्ञा की इस प्रक्रिया में सकारात्मक रवैया नहीं अपनायेगा, वह मुक्ति से वंचित रह जायेगा। इसलिए पवित्र वचन आगे कहता है, “किन्तु यदि वह भटक जायेगा, तो वह उसका त्याग करेगी और उसे विनाश के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए छोड़ देगी” (प्रवक्ता 4:22)। यही प्रभु येसु की शिक्षा का सारांश भी है। प्रभु येसु कहते हैं, “सॅकरे द्वार से प्रवेश करो। चौड़ा है वह फाटक और विस्तृत है वह मार्ग, जो विनाश की ओर ले जाता है। उस पर चलने वालों की संख्या बड़ी है। किन्तु सॅकरा है वह द्वार और संकीर्ण है वह मार्ग, जो जीवन की ओर ले जाता है। जो उसे पाते हैं, उनकी संख्या थोड़ी है।” (मत्ती 7:13-14)

आईए, आज के दिन हम अपने क्रूस के लिए ईश्वर को धन्यवाद दें, क्योंकि वह हमारी मुक्ति का मार्ग है। हम पिता ईश्वर से निवेदन करें कि वे हमें अपने क्रूस को ढोने की शक्ति प्रदान करें।

 -Br. Biniush Topno


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