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27 सितंबर का पवित्र वचन

 

27 सितंबर 2020
वर्ष का छब्बीसवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार

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📒 पहला पाठ : एज़ेकिएल का ग्रन्थ 18:25-28

25) “तुम लोग कहते हो कि प्रभु का व्यवहार न्यायसंगत नहीं हैं। इस्राएलियो! मेरी बात सुनो। क्या मेरा व्यवहार न्यायसंगत नहीं है? क्या यह सही नहीं है कि तुम्हारा ही व्यवहार न्यायसंगत नहीं हैं।

26) यदि कोई भला मनुय अपनी धार्मिकता त्याग कर अधर्म करने लगता और मर जाता है, तो वह अपने पाप के कारण मरता है।

27) और यदि कोई पापी अपना पापमय जीवन त्याग कर धार्मिकता और न्याय के पथ पर चलने लगता है, तो वह अपने जीवन को सुरक्षित रखेगा।

28) यदि उसने अपने पुराने पापों को छोड़ देने का निश्चय किया है, तो वह अवश्य जीवित रहेगा, मरेगा नहीं।

📕 दूसरा पाठ: फ़िलिप्पियों 2:1-11

1) यदि आप लोगों के लिए मसीह के नाम पर निवेदन तथा प्रेमपूर्ण अनुरोध कुछ महत्व रखता हो और आत्मा में सहभागिता, हार्दिक अनुराग तथा सहानुभूति का कुछ अर्थ हो,

2) तो आप लोग एकचित? एक हृदय तथा एकमत हो कर प्रेम के सूत्र में बंध जायें और इस प्रकार मेरा आनन्द परिपूर्ण कर दें।

3) आप दलबन्दी तथा मिथ्याभिमान से दूर रहें। हर व्यक्ति नम्रतापूर्वक दूसरों को अपने से श्रेष्ठ समझे।

4) कोई केवल अपने हित का नहीं, बल्कि दूसरों के हित का भी ध्यान रखे।

5) आप लोग अपने मनोभावों को ईसा मसीह के मनोभावों के अनुसार बना लें।

6) वह वास्तव में ईश्वर थे और उन को पूरा अधिकार था कि वह ईश्वर की बराबरी करें,

7) फिर भी उन्होंने दास का रूप धारण कर तथा मनुष्यों के समान बन कर अपने को दीन-हीन बना लिया और उन्होंने मनुष्य का रूप धारण करने के बाद

8) मरण तक, हाँ क्रूस पर मरण तक, आज्ञाकारी बन कर अपने को और भी दीन बना लिया।

9) इसलिए ईश्वर ने उन्हें महान् बनाया और उन को वह नाम प्रदान किया, जो सब नामों में श्रेष्ठ है,

10) जिससे ईसा का नाम सुन कर आकाश, पृथ्वी तथा अधोलोक के सब निवासी घुटने टेकें

11) और पिता की महिमा के लिए सब लोग यह स्वीकार करें कि ईसा मसीह प्रभु हैं।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 21:28-32

28) ’’तुम लोगों का क्या विचार है? किसी मनुष्ष्य के दो पुत्र थे। उसने पहले के पास जाकर कहा, ’बेटा जाओ, आज दाखबारी में काम करो’।

29) उसने उत्तर दिया, ’मैं नहीं जाऊँगा’, किन्तु बाद में उसे पश्चात्ताप हुआ और वह गया।

30) पिता ने दूसरे पुत्र के पास जा कर यही कहा। उसने उत्तर दिया, ’जी हाँ पिताजी! किन्तु वह नहीं गया।

31) दोनों में से किसने अपने पिता की इच्छा पूरी की?’’ उन्होंने ईसा को उत्तर दिया, ’’पहले ने’’। इस पर ईसा ने उन से कहा, ’’मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- नाकेदार और वैश्याएँ तुम लोगों से पहले ईश्वर के राज्य में प्रवेश करेंगे।

32) योहन तुम्हें धार्मिकिता का मार्ग दिखाने आया और तुम लोगों ने उस पर विश्वास नहीं किया, परंतु नाकेदारों और वेश्यायों ने उस पर विश्वास किया। यह देख कर तुम्हें बाद में भी पश्चात्ताप नहीं हुआ और तुम लोगों ने उस पर विश्वास नहीं किया।

📚 मनन-चिंतन

हम उन लोगों को महत्व देते हैं जो हमारी बात रखते हैं। हम उन लोगों की सराहना करते हैं जो अपने वादों पर खरे उतरते हैं। प्रभु भी हमारे द्वारा किए गए वादों पर खरा उतरने के हमारे प्रयासों की सराहना करता है। आज के सुसमाचार के दृष्टांत में येसु ने बताते हैं बोला, कि दो पुत्रों मेसे एक ने अपने पिता से किया हुआ वादा नहीं निभाया। उसने दाख की बारी में काम करने का वादा किया था, लेकिन नहीं किया। वह उनके वचन का पक्का नहीं था। दूसरा बेटा विपरीत दिशा में चला गया; उन्होंने शुरू में कहा नहीं, लेकिन फिर इसके बारे में सोच-विचार किया और वही किया जो उनसे पूछा गया था। हम शायद लोगों में उस गुणवत्ता की भी सराहना करते हैं, एक प्रारंभिक निर्णय पर प्रतिबिंबित करने की क्षमता और बेहतर करने के लिए, मन का परिवर्तन, दिल का परिवर्तन। प्रभु हममें उसी गुण की सराहना करते हैं, बेहतरी के लिए मन और हृदय में बदलाव के लिए खुलापन। जब प्रभु कहते हैं और हम उनका कहना नहीं मानते तो प्रभु हमारे मन परिवर्तन तक इंतज़ार करते हैं कि हम मन बदलकर फिर से उनकी बात मानेंगे और उनके आदेशों का पलाउ करेंगे। प्रभु हमें अपनी प्रारंभिक प्रतिक्रिया के बारे में बेहतर सोचने का समय देता है। जब हम हमारे एक नहीं को एक हाँ में बदल देते हैं तो यह ईश्वर को प्रसन्नता प्रदान करता है। हिंदी में एक कहावत है देर आये दुरुस्त आये। यदि हमने आज तक हमारे प्रभु के आदेशों के लिए ना कहा है तो प्रभु हमें याद रहे वो हमारा ईश्वर हमारे ना के हाँ में बदलने का इंतज़ार कर रहा है। हम अपने मनोभाव और विचारों को बदलें व येसु की बातों को हाँ कहना सीखें। आमेन।



📚 REFLECTION

We value those who listen to us. We appreciate those who live up to their promises. The Lord also appreciates our efforts to live up to our promises. In the parable of today's gospel, Jesus states that one of the two sons did not keep the promise made to his father. He promised to work in the vineyard, but did not. He was not sure of his word. The second son went in the opposite direction; He initially said no, but then thought about it and did what he was asked. We probably also appreciate that quality in people, the ability to reflect on an initial decision and, for the better, a change of mind, a change of heart. God appreciates the same quality in us, openness to change in mind and heart for the better. When God says and we do not listen to Him, then He waits till we change our mind and turn back to Him with repentance and once again begin to listen to Him and obey his commands. Let us learn to always turn back to Jesus even if we fail keep our promises and obey his commands, for He always forgives. Amen


मनन-चिंतन : पश्चाताप - एक कदम अमरता की ओर

"मै बलिदान नहीं, बल्कि दया चाहता हूँ। मैं धर्मियों को नहीं पापियों को बुलाने आया हूँ।’’ (मत्ती 9:13) इस वचन के द्वारा प्रभु येसु उन लोगों के लिए द्वार खोलते हैं जो अपने जीवन को अर्थहीन और निराशा पूर्ण समझते हैं। यह वचन उन सभी लोगो के लिए जो पाप के कारण हताश और निराश है, एक आशा का दीप हैं। आज का सुसमाचार हमें इस ओर इंगित भी करता है। आज के सुसमाचार में हम फरीसियों और पापियों पर आधारित एक उत्तम और सुंदर दृष्टांत को पाते हैं। पिता की आज्ञा या इच्छा और उसका पालन - इसके आधार पर यहाँ पर चार प्रतिक्रिया संभव हैं। पहला - जो पिता की आज्ञा सुनता तथा उसका ईमानदारी से पालन करता है, दूसरा - जो सुनता परंतु पालन नहीं करता है, तीसरा - जो नहीं सुनता परंतु बाद में जाकर पालन करता है और चौथा - जो नही सुनता और पालन भी नहीं करता हैं। प्रभु येसु ने महायाजक और जनता के नेताओं के मन की बात जानकर, पापियों के प्रति उनकी भावना, उनकी झूठी धार्मिकता और अपश्चात्तापी हृदय को देखकर दूसरे और तीसरे प्रकार की प्रतिक्रिया को प्रकट किया है।

आइये हम इस दूसरी और तीसरी प्रतिक्रियाओं पर मनन चिंतन करें। बेटा पिता को ’हाँ’ तो कहता है परंतु उसके विपरीत कार्य करता है। आदम और हेवा के विषय में जानते हैं कि ईश्वर ने उनसे कहा था, “'तुम वाटिका के सभी वृक्षों के फल खा सकते हो, किन्तु भले-बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल नहीं खाना; क्योंकि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे, तुम अवश्य मर जाओगे'' (उत्पत्ति 2:16-17)। समूएल के पुत्र योएल और अबीया को न्यायकर्ता के पद पर नियुक्त किया गया था परन्तु वे “अपने पिता के मार्ग का अनुसरण नहीं करते थे। वे लोभ में पड़ कर घूस लेते और न्याय भ्रष्ट कर देते थे’’ (2 समूएल 8:3)। नबी योना को निनीवे जा कर वहाँ के लोगों को उपदेश देने को कहा गया परंतु पहली बार में उसने विपरीत कार्य किया। अनानीयस और सफीरा (प्रेरित-चरित 5) को विश्वासियों के समुदाय के अनुसार अपनी सम्पत्ति बेचकर पूरी कीमत प्रेरितों के चरणों में रखनी थी परंतु उन्होने एक अंश अपने पास रख लिया। इन सभी के जीवन में ईश्वर द्वारा या लोगो के माध्यम से ईश्वर द्वारा आज्ञा मिली थी परंतु लोभ या प्रलोभन या किसी कारणवश वे विपरीत कार्य करते हैं और उनके जीवन में भारी दुःख, संकट या परेशानियाँ आ जाती हैं।

एक बेटा पिता को न कहकर बाद में पश्चात्ताप करता है और उस कार्य को पूरा करता है। बाइबिल में हम निनीवे के लोगो को पाते हैं जिन्होने पश्चात्ताप किया और कुमार्ग छोड़ दिये (योना 3:5-10)। राजा दाउद ने अपने गलत कार्य पर पश्चात्ताप किया। पेत्रुस ने अपने अस्वीकार पर आँसू बहाकर पश्चाताप किया (लूकस 22:62)। येसु के साथ क्रूसित डाकू अपने पापो के प्रति पश्चाताप करता है और अपने लिए स्वर्ग का रास्ता सुनिश्चित कर लेता है (लूकस 23:40-43)। इन सभी ने अपने पापों के प्रति पश्चात्ताप किया और अपने जीवन में बदलाव लाया और इस कार्य के फलस्वरूप इन्हें जीवन में आनंद, शांति और मुक्ति मिली।

पश्चात्ताप हम सभी के लिए एक वरदान है क्योंकि हम सब पापी हैं। ‘‘कोई भी धार्मिक नहीं रहा - एक भी नहीं; कोई भी समझदार नहीं; ईश्वर की खोज में लगा रहने वाला कोई नहीं! सभी भटक गये, सब समान रूप से भ्रष्ट हो गये हैं। कोई भी भलाई नहीं करता - एक भी नहीं।’’ (रोमियो 3:10-12)। पश्चात्ताप प्रभु येसु का अपने मिशन कार्य का सबसे पहला उपदेश है। ‘‘समय पूरा हो चुका है। ईश्वर का राज्य निकठ आ गया है। पश्चात्ताप करो और सुसमाचार में विश्वास करो’’(मारकुस 1:15)। इससे पता चलता है पश्चात्ताप हमारे जीवन में इतना महत्वपूर्ण क्यों हैं। पश्चात्तापी हृदय के फलस्वरूप एक पापी संत बन सकता है तथा उसको एक नया जीवन मिल सकता है, परंतु अपश्चात्तापी ह्दय के कारण एक संत पापी बन सकता है तथा वह मृत्यु की ओर ले जा सकता है। ‘‘यदि कोई भला मनुष्य अपनी धार्मिकता त्याग कर अधर्म करने लगता और मर जाता है, तो वह अपने पाप के कारण मर जाता है। और यदि कोई पापी अपना पापमय जीवन त्याग कर धार्मिकता और न्याय के पथ पर चलने लगता है, तो वह अपने जीवन को सुरक्षित रखेगा।’’ (एज़ेकिएल 18:26-27)

आज का सुसमाचार हमें प्रेरित करता है कि हम सदैव ईश्वर की इच्छा को पूरी करें क्योंकि ‘‘जो लोग मुझे ‘प्रभु! प्रभु! कह कर पुकारते हैं, उन में सब के सब स्वर्ग राज्य में प्रवेश नहीं करेंगे। जो मेरे स्वर्गिक पिता की इच्छा पूरी करता है, वही स्वर्गराज्य में प्रवेश करेगा’’ (मत्ती 7:21)। और यदि हम भटक जाए तो ‘‘प्रभु यह कहता है - अपने वस्त्र फाड़ कर नहीं, बल्कि ह्दय से पश्चात्ताप करो और अपने प्रभु-ईश्वर के पास लौट जाओे’’ (योएल 2:13) क्योकि ‘‘एक पश्चात्तापी पापी के लिए स्वर्ग में अधिक आनन्द मनाया जायेगा’’ (लूकस 15:9)।

26 सितंबर का पवित्र वचन

 

26 सितंबर 2020
वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य सप्ताह, शनिवार

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📒 पहला पाठ : उपदेशक 11:9-12:8

9) युवक! अपनी जवानी में आनन्द मनाओं अपनी युवावस्था में मनोरंजन करो। अपने हृदय और अपनी आँखों की अभिलाषा पूरी करो, किन्तु याद रखो कि ईश्वर तुम्हारे आचरण का लेखा माँगेगा।

10) अपने हृदय से शोक को निकाल दो और अपने शरीर से कष्ट दूर कर दो, क्योंकि जीवन का प्रभात क्षणभंगुर है।

12:1) अपनी जवानी के दिनों में अपने सृष्टिकर्ता को याद रखों: बुरे दिनों के आने से पहले, उन वर्षों के आने से पहले, जिनके विषय में तुम कहोगे- "मुझे उन में कोई सुख नहीं मिला";

2) उस समय से पहले, जब सूर्य, प्रकाश, चन्द्रमा और नक्षत्र अन्धकारमय हो जायेंगे; और वर्षा के बाद बादल छा जायेंगे;

3) उस समय से पहले, जब घर के रक्षक काँपने लगेंगे, बलवानों का शरीर झुक जायेगा, चबाने वाले इतने कम होंगे कि अपना काम बन्द कर देंगे और जो खिड़कियों से झाँकती है वे धुँधली हो जायेगी ;

4) उस समय से पहले, जब बाहरी दरवाजे बन्द होंगे, चक्की की आवाज मन्द होगी, चिड़ियों की चहचहाहट धीमी पड़ जायेगी और सभी गीत मौन हो जायेंगे;

5) उस समय से पहले, जब ऊँचाई पर चढ़ने से डर लगेगा और सड़को पर खतरे-ही-खतरे दिखाई देंगे, जब बादाम का स्वाद फीका पड़ जायेगा, टिड्डियाँ नहीं पचेंगी और चटनी में रूचि नहीं रहेगी, क्योंकि मनुष्य परलोक सिधारने पर है और शोक मनाने वाले सड़क पर आ रहे हैं;

6) उस समय से पहले, जब चाँदी का तार टूट जायेगा और सोने का पात्र गिर पड़ेगा, जब घड़ा झरने के पास फूटेगा और कुएँ का पहिया टुकड़े-टुकड़े हो जायेगा;

7) उस समय से पहले, जब मिट्टी उस पृथ्वी में मिल जायेगी, जहाँ से वह आयी है और आत्मा ईश्वर के पास लौट जायेगी, जिसने उसे भेजा है।

8) उपदेशक कहता है: व्यर्थ ही व्यर्थ; सब कुछ व्यर्थ है।


सुसमाचार :लूकस 9:43b-45

सब लोग ईसा के कार्यों को देख कर अचम्भे में पड़ जाते थे; किन्तु उन्होंने अपने शिष्यों से कहा,

44) "तुम लोग मेरे इस कथन को भली भाँति स्मरण रखो-मानव पुत्र मनुष्यों के हवाले कर दिया जायेगा"।

45) परन्तु यह बात उनकी समझ में नहीं आ सकी। इसका अर्थ उन से छिपा रह गया और वे इसे नहीं समझ पाते थे। इसके विषय में ईसा से प्रश्न करने में उन्हें संकोच होता था।

📚 मनन-चिंतन

जीवन में बहुत कुछ है जो हम पूरी तरह से नहीं समझत पाते । दुख का अनुभव जीवन के उन रहस्यों में से एक है जिनसे हम थाह लेने के लिए कोशिश करते रहते हैं। घातक बीमारी, किसी को भी उनकी उम्र की परवाह किए बिना किसी भी समय अपना शिकार बना सकती है। आये दिन हम त्रासदियों और अनहोनी घटनाओं के बारे में सुनते हैं और यह देख कर हम आवाक रह जाते हैं कि ये सब निर्दोष क्यों बेमौत मारे जाते हैं। मानव दुःख हमारे लिए एक रहस्य बना हुआ है। हमारा कैथोलिक विश्वास हमें अपने दुख या किसी प्रियजन की पीड़ा से निपटने में मदद कर सकता है।

आज के सुसमाचार पाठ में, जब लोग येसु के महान कार्यों को देखकर विस्मित थे उन्हें एक बहुत शक्तिशाली व्यक्ति मानने लगे थे, उसी समय येसु अपने शिष्यों के सामने यह घोषणा करते हैं कि वे मनुष्यों के हवाले कर दिए जायेंगे और वे उन्हें मार डालेंगे। सुसमाचार हमें बतलाता है कि शिष्यों ने येसु की इस बात को समझा नहीं था, और वे उससे पूछने से डरते थे। वे समझ नहीं पा रहे थे कि ईश्वर का यह जन, जो इतने सारे लोगों द्वारा प्रशंसित था, दूसरों के हाथों कैसेअत्याचार सह सकता है। उन्होंने उसके अंतिम मुकाम या लक्ष्य के रहस्य को नहीं समझा, जो दुख और मृत्यु से घनिष्ठता से जुड़ा हुआ था। कोई इतना भला और निर्दोष जो की बहुत ही शक्तिशाली और चमत्कार करने वाला था कैसे वह उन लोगों के अधीन हो सकता है, जो उसे मरना चाहते थे? केवल येसु के पुनरुत्थान के बाद ही शिष्यों ने येसु के दुखभोग की प्रासंगिकता को समझा। उनकी मृत्यु उनके मिशन के प्रति उनकी प्रेममय निष्ठा का परिणाम थी। शायद, हम भी हमारे पुनरुत्थान के बाद के जीवन याने, अनंत काल के जीवन को निगाह में रखकर ही अपने जीवन में और दूसरों के जीवन में आने वाले दुखों के रहस्य को समझेंगे। इस बीच, पहला पाठ हमें विश्वास दिलाता है कि प्रभु हमारे बीच में निवास करने के लिए आए हैं और आग की दीवार की तरह हमारे चारों ओर हैं। हमारे अपने कलवारी अनुभव में, ईश्वर हमारे साथ हैं, जैसे कि ईश्वर येसु के साथ क्रूस पर थे। जब हम खुद को सबसे कमजोर अवस्था में पाते हैं, हमारा ईश्वर हमारे चारों ओर आग की दीवार की तरह उपस्थित रहता और हमारी रक्षा करता है।



📚 REFLECTION

There are many things in life that we do not fully understand. The experience of grief is one of the mysteries of life which we keep trying to fathom. A deadly disease can prey on anyone at any time, regardless of their age. Every day we hear about tragedies and unpleasant incidents and we are left stunned to see why the innocents are killed. Human grief remains a mystery to us. Our Catholic faith can help us deal with our suffering or the suffering of a loved one. In today's Gospel, when people were astonished to see the great works of Jesus, they considered Him to be a very powerful person, at the same time, Jesus announced to his disciples that he would be handed over to humans and that they would kill him. The gospel tells us that the disciples did not understand this, and they were afraid to ask him. They could not understand how this man of God, who was admired by so many people, could bear atrocities at the hands of others. They did not understand the secret of his final goal, which was intimately connected with suffering and death. How can someone so good and innocent who was very powerful and performed miracles be subject to those who wanted him dead? Only after the resurrection of Jesus did the disciples understand the relevance of the suffering of Jesus. His death was the result of his loving loyalty to his mission. Perhaps, we too will understand the mystery of the miseries that come in our lives and in the lives of others, when we understand the meaning of the life after death that is our resurrection. Meanwhile, the first reading assures us that the Lord has come to dwell among us and surround us like a wall of fire. In our own Calvary experience, God is with us, just as God was with Jesus on the cross. When we find ourselves in the weakest state of life, our God is present around us like a wall of fire and protects us.

25 सितंबर का पवित्र वचन

 

25 सितंबर 2020
वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य सप्ताह, शुक्रवार

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📒 पहला पाठ : उपदेशक 3:1-11

1) पृथ्वी पर हर बात का अपना वक्त और हर काम का अपना समय होता है:

2) प्रसव करने का समय और मरने का समय; रोपने का समय और पौधा उखाड़ने का समय;

3) मारने का समय और स्वस्थ करने का समय; गिराने का समय और उठाने का समय;

4) रोने का समय और हँसने का समय; विलाप करने का समय और नाचने का समय;

5) पत्थर बिखेरने का समय और पत्थर एकत्र करने का समय; आलिंगन करने का समय और आलिंगन नहीं करने का समय;

6) खोजने का समय और खोने का समय; अपने पास रखने का समय और फेंक देने का समय;

7 फाड़ने का समय और सीने का समय; चुप रहने का समय और बोलने का समय;

8) प्यार करने का समय और बैर करने का समय; युद्ध का समय और शान्ति का समय।

9) मनुष्य को अपने सारे परिश्रम से क्या लाभ ?

10) ईश्वर ने मनुष्यों को जो कार्य सौंपा है, मैंने उस पर विचार किया।

11) उसने सब कुछ उपयुक्त समय के अनुसार सुन्दर बनाया है। उसने मनुष्य को भूत और भविष्य का विवेक दिया है; किन्तु ईश्वर ने प्रारम्भ से अन्त तक जो कुछ किया, उसे मनुष्य कभी नहीं समझ सका।


सुसमाचार :लूकस 9:18-22

18) ईसा किसी दिन एकान्त में प्रार्थना कर रहे थे और उनके शिष्य उनके साथ थे। ईसा ने उन से पूछा, "मैं कौन हूँ, इस विषय में लोग क्या कहते हैं?"

19) उन्होंने उत्तर दिया, "योहन बपतिस्ता; कुछ लोग कहतें-एलियस; और कुछ लोग कहते हैं-प्राचीन नबियों में से कोई पुनर्जीवित हो गया है"।

20) ईसा ने उन से कहा, "और तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ?" पेत्रुस ने उत्तर दिया, "ईश्वर के मसीह"।

21) उन्होंने अपने शिष्यों को कड़ी चेतावनी दी कि वे यह बात किसी को भी नहीं बतायें।

22) उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, "मानव पुत्र को बहुत दुःख उठाना होगा; नेताओं, महायाजकों और शास्त्रियों द्वारा ठुकराया जाना, मार डाला जाना और तीसरे दिन जी उठना होगा"।

📚 मनन-चिंतन

किसी भी अन्य सुसमाचार लेखक की तुलना में, संत लूकस येसु को एक प्रार्थनामय व्यक्ति के रूप में अधिक चित्रित करता है, जिसने नियमित रूप से प्रार्थना की, विशेष रूप से अपने जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों में। आज के सुसमाचार की शुरुआत में हम येसु को प्रार्थना में पाते हैं। प्रभु येसु ने हमें प्रार्थना करने की न केवल हमें शिक्षा दी पर उन्होंने हमें अपने प्रार्थनामय जीवन द्वारा यह बतलाया कि प्रार्थना के बिना हमें हमारे जीवन में कुछ भी कार्य नहीं करना चाहिए। वे ईश पुत्र थे परन्तु फिर भी उन्होंने बिना प्रार्थना के कुछ भी काम नहीं किया: चाहे वह उनकी सेवकाई हो, प्रेरितों को चुनना हो, कोई चिन्ह अथवा चमत्कार करना हो, दुःख भोगना हो या फिर क्रूस पर मरना हर बार उन्होंने प्रार्थना की। प्रार्थना के बाद किये हर काम में प्रभु येसु को विजय मिली। चाहे वह कोई निर्णय हो, कोई कार्य हो, कोई चमत्कार हो या फिर उनकी मौर ही हो वे हर बार विजय ही रहे।

प्रभु येसु, प्रार्थना की इसी ताकत से हमें रूबरू कराते हैं और हमारा आह्वान करते हैं कि हम हमारे जीवन में उनकी ही तरह प्रार्थना को अपना हथियार और जीवन की ताकत बना लें और प्रार्थना के बिना कुछ की भी शुरुआत न करें। तब हम चीज़ों को बदलते हुए देखेंगे, हमारे जीवन में ईश्वर के सामर्थ्य को देखेंगे और प्रार्थना में ईश्वर हमारे जीवन की अगुवाई अपनी राहों पर करेंगे। आमेन



📚 REFLECTION

Compared to any other gospel writer, St. Luke portrays Jesus as more of a prayerful person who prayed regularly, especially at key moments of his life. At the beginning of today's Gospel we find Jesus in prayer. Lord Jesus not only prayed, but he taught us through his prayerful life that without prayer we should not do anything in our life. He was the son of God, but yet he did nothing without prayer: whether it was his ministry, choosing the Apostles, performing signs or miracles, suffering or dying on the cross each time He prayed. Jesus got victory in everything he did after praying; whether it is a decision, a task, or a miracle.

Jesus, makes us aware of the power of prayer, and invites us to make pray our spiritual weapon and strength of life and do not start anything without prayer. Then we will see things changing, we will see the power of God in our life and in prayer God will lead our life in our own way. Amen.

24 सितंबर का पवित्र वचन

 

24 सितंबर 2020
वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य सप्ताह, गुरुवार

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📒 पहला पाठ : उपदेशक 1:2-11

2) उपदेशक कहता है, "व्यर्थ ही व्यर्थ; व्यर्थ ही व्यर्थ; सब कुछ व्यर्थ है।"

3) मनुष्य को इस पृथ्वी पर के अपने सारे परिश्रम से क्या लाभ?

4) एक पीढ़ी चली जाती है, दूसरी पीढ़ी आती है और पृथ्वी सदा के लिए बनी रहती है।

5) सूर्य उगता है और सूर्य अस्त हो जाता है। वह शीघ्र ही अपने उस स्थान पर जाता है, जहाँ से वह फिर उगता है।

6) हवा दक्षिण की ओर बहती है, वह उत्तर की ओर मुड़ती है; वह घूम-घूम कर पूरा चक्कर लगाती है।

7) सब नदियाँ समुद्र में गिरती हैं; किन्तु समुद्र नहीं भरता। और नदियाँ जिधर बहती है, उधर ही बहती रहती हैं।

8) यह सब इतना नीरस है, कि कोई भी इसका पूरा-पूरा वर्णन नहीं कर पाता। आँखें देखने से कभी तृप्त नहीं होतीं और कान सुनने से कभी नहीं भरते।

9) जो हो चुका है, वह फिर होगा। जो किया जा चुका है, वह फिर किया जायेगा। पृथ्वी भर में कोई भी बात नयी नहीं होती।

10) जिसके विषय में लोग कहते हैं, "देखों, यह तो नयी बात है" वह भी हमारे समय से बहुत पहले हो चुकी है।

11) पहली पीढ़ियों के लोगों की स्मृति मिट गयी है और आने वाली पीढ़ियों की भी स्मृति परवर्ती लोगों मे नहीं बनी रहेगी।


सुसमाचार :लूकस 9:7-9

7) राजा हेरोद उन सब बातों की चर्चा सुन कर असमंजस में पड़ गया, क्योंकि कुछ लोग कहते थे कि योहन मृतकों में से जी उठा है।

8) कुछ कहते थे कि एलियस प्रकट हुआ है और कुछ लोग कहते थे कि पुराने नबियों में से कोई जी उठा है।

9) हरोद ने कहा, "योहन का तो मैंने सिर कटवा दिया। फिर यह कौन है, जिसके विषय में ऐसी बातें सुनता हूँ?" और वह ईसा को देखने के लिए उत्सुक था।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में वर्णित हेरोद, हेरोद एंटिपस है, हेरोद महान का पुत्र है; वह येसु की सेवकाई दौरान गलीलिया में शासन करते थे । लूकस ने उन्हें येसु को लेकर जिज्ञासु व्यक्ति के रूप में उन्हें चित्रित किया है। उसने उन सभी बातों और कार्यों के बारे में सुना है जो येसु द्वारा किए जा रहे हैं और वह हैरान है। वह खुद से पूछता है, यह मैं किसके बारे में ऐसी खबरें सुन रहा हूं? ’वह येसु को देखने के लिए बेचैन है। येसु के बारे में इस तरह की जिज्ञासा और जानने की इच्छा, कुछ लोगों के लिए विश्वास की शुरुआत हो सकती है। फिर भी, यहां तक कि जो लोग जीवन भर विश्वासी रहे हैं, और यीशु के बारे में बहुत कुछ जानते हैं, वे भी हैरान रहेंगे, और यह मौलिक सवाल पूछना जारी रखेंगे , 'यह कौन है?' येसु के रहस्य की गहराई, ऊंचाई चौड़ाई है वह अनंत है इस रहस्य को हम कभी पूरी तरह से समझ नहीं पाएंगे। पर एक विश्वासियों होने के नाते हम उन्हें आधी से अधिक जानने के की साथ करते रहें, प्रयत्न करते रहें, न केवल दिमाग से पर दिल व आत्मा से भी।

संत रिचर्ड की एक छोटी सी प्रार्थना मुझे याद आ रही है - Day by day, day by day, O, dear Lord, three things I pray: to see thee more clearly, love thee more dearly, follow thee more nearly, day by day. हे प्रभु ! दिन-ब-दिन मैं बस तीन चीज़ों के लिए हूँ: कि मैं तुझे और स्पष्टता से देख सकूँ; तुझे और गहराई से प्यार कर सकूँ , और करीबी से तेरा अनुसरण कर सकूँ।



📚 REFLECTION

The Herod, mentioned in today's gospel, is Herod Antipas, the son of Herod the Great; He ruled in Galilee during Jesus’ ministry. Luke portrays him as a curious person about Jesus. He has heard about all the works which were being done by Jesus and he was surprised. He asked himself, ‘who am I hearing such news about? 'He was restless to see Jesus. Such curiosity and desire to know about Jesus may be the beginning of faith for some people. Yet, even those who have been believers for whole life also will not be able to comprehend Jesus fully. They will continue to ask the fundamental question, 'Who is this?’

The depth, height and breadth of the mystery of Jesus is infinite, we will never fully grasp this mystery. But as believers, we keep the process of knowing Jesus on. We keep exploring the height, depth and width of Jesus. We search Him with all our mind, heart and soul.

I am remember a small prayer from Saint Richard - Day by day, day by day, O, dear Lord, three things I pray: to see You more clearly, love You more dearly, follow You more nearly,

23 सितंबर का पवित्र वचन

23 सितंबर 2020
वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य सप्ताह, बुधवार

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📒 पहला पाठ : सुक्ति 30:5-9

5) ईश्वर की प्रत्येक प्रतिज्ञा विश्वसनीय है। ईश्वर अपने शरणार्थियों की ढाल है।

6) उसके वचनों में अपनी और से कुछ मत जोड़ो, कहीं ऐसा न हो कि वह तुम को डाँटे और झूठा प्रमाणित करे।

7) मैं तुझ से दो वरदान माँगता हूँ, उन्हे मेरे जीवनकाल में ही प्रदान कर।

8) मुझ से कपट और झूठ को दूर कर दे। मुझे न तो गरीबी दे और न अमीरी- मुझे आवश्यक भोजन मात्र प्रदान कर।

9) कहीं ऐसा न हो कि मैं धनी बन कर तुझे अस्वीकार करते हुए कहूँ "प्रभु कौन है?" अथवा दरिद्र बन कर चोरी करने लगूँ और अपने ईश्वर का नाम कलंकित कर दूँ।


सुसमाचार :लूकस 9:1-6

1) ईसा ने बारहों को बुला कर उन्हें सब अपदूतों पर सामर्थ्य तथा अधिकार दिया और रोगों को दूर करने की शक्ति प्रदान की।

2) तब ईसा ने उन्हें ईश्वर के राज्य का सुसमाचार सुनाने और बीमारों को चंगा करने भेजा।

3) उन्होंने उन से कहा, "रास्ते के लिए कुछ भी न ले जाओ-न लाठी, न झोली, न रोटी, न रुपया। अपने लिए दो कुरते भी न रखो।

4) जिस घर में ठहरने जाओ, नगर से विदा होने तक वहीं रहो।

5) यदि लोग तुम्हारा स्वागत न करें, तो उनके नगर से निकलने पर उन्हें चेतावनी देने के लिए अपने पैरों की धूल झाड़ दो।"

6) वे चले गये और सुसमाचार सुनाते तथा लोगों को चंगा करते हुए गाँव-गाँव घूमते रहे।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार पाठ में जब येसु अपने शिष्यों मिशन पर भेजते है, तो वे उन्हें कम से कम सामान के साथ की यात्रा करने की हिदायत हैं। ऐसा कहकर वे उन्हें खुद पर ज़्यादा निर्भर न रहकर ईश्वर और उन लोगों के आतिथ्य पर निर्भर रहने के लिए कहते हैं, जिनको सुसमाचार सुनाते हैं। खुद पर अत्यधिक निर्भर होने के बजाय, ईश्वर पर भरोसा करने से हम सांसारिकता से खुद को दूर रखेंगे और अपना मन-ध्यान प्रभु और उनके वचनों पर लगाएंगे। कभी-कभी संसांरिक शक्तियों जैसे धन -दौलत, पद या फिर शारीरिक ताकत लोगों को इस भ्रम में डाल देती है कि वे अपने आप में पूर्ण हैं और उन्हें किसी की ज़रूरत नहीं।

आज का सुसमाचार हमें याद दिलाता है कि हम कभी भी पूरी तरह से खुद पर निर्भर नहीं हो सकते। हमने पाने जीवन के शुरुआत ही पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर रहते हुए शुरू की है, और जैसे-जैसे हम अपने जीवन के अंत की ओर आते हैं हम एक बार फिर खुद को दूसरों पर पूरी तरह से निर्भर पाते हैं। और पूर्ण- निर्भरता के इन दो मुकामों के बीच की ज़िन्दगी में भी, हम कई प्रकार से दूसरों पर निर्भर रहना जारी रखते हैं। अपने पूरे जीवन में हम दूसरों पर निर्भर रहते हैं कि दूसरे लोग हमें वो चीज़ें दे जो हमारे पास नहीं और हम उन चीजों के लिए उनपर निर्भर रहते हैं जो हमारे पास नहीं।

प्रभु हमेशा हमें उस सेवा के लिए खुले रहने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं जो वह हमें, दूसरों के माध्यम से प्रदान करता है। हम में से प्रत्येक को देने के लिए बहुत कुछ है और प्राप्त करने के लिए बहुत कुछ है। जो प्रभु, हमारे माध्यम से दूसरों की सेवा करना चाहता है, वह दूसरों के माध्यम से हमारी भी सेवा करना चाहता है। तो आइये हमारे जीवन में खुद पर ही भरोसा ना करके ईश्वर और ईश्वर द्वारा हमें दिए गए लोगों और संसाधनों पर भरोसा करें और ईश्वर के वचन की सेवा में लगे रहें।



📚 REFLECTION

In today's Gospel, when Jesus sends his disciples on a mission, He instructs them to travel with very little luggage. By saying this, He tells them not to depend too much on themselves but to depend on the providence of God and the hospitality of the people to whom they preach the Gospel. Instead of relying too much on ourselves, trusting in God will keep us away from worldliness and will help to focus our attention on the Lord and His words. Sometimes the worldly powers such as money, position or physical strength mislead people that they are complete in themselves and that they do not need anyone.

Today's gospel reminds us that we can never be completely self-sufficient. We began our life completely depending on others, and as we come to the end of our lives we once again find ourselves completely dependent on others. And even in the life between these two polar positions of complete dependence, we continue to depend on others in many ways. Throughout our lives we depend on others to give us things that we do not have.

The Lord invites us to be open to the service that He provides to us, through others. Each of us has so much to give and so much to receive. The Lord, who wants to serve others through us, also wants to serve us through others. So, instead of trusting arrogantly, on ourselves, let us trust God and the people and resources given to us by God and continue to serve the Word of God with whatever way we can.

Biniush Topno





आत्मिक भोज़न Gospel - (Lk 8:19-21

 .               22nd September- Tuesday

              ‌          आत्मिक भोज़न

                   Gospel - (Lk 8:19-21

     प्रिय दोस्तो! आप सबों को ज़य येसु। आज़ का 

1. सुसमाचार सन्त लुकस का सुसमाचार से लिया गया है। आज़ का मूल विषय है,".कौन हैं येसु का माता-पिता और भाई-बहन? प्रभु येसु कहते हैं, "मेरा माता और मेरा पिता वही लोग हैं जो ईश्वर का वचन को सुनते हैं और उसको पूरा करते हैं और उसके अनुसार जीते हैं (Lk 8:21)। जो लोग वचन के अनुसार जीते हैं वे प्रभु येसु के परिवार का सदस्य बन जाते हैं।  2. जिस वचन नें पृथ्वी कि सृष्टि किया, जिस वचन शरीर बन कर दुनिया में आया और जिस वचन कलवारी पहाड़ में  टुकड़ा-टुकड़ा हुआ, प्रभु येसु ख्रीस्त, हमारे मुक्तिदाता के द्वारा लोगों के बीच में बांटा गया और जो लोग उस वचन को हृदय में ग्रहण करते हैं वे येसु का भाई-बहन हैं। 3. वचन को सुनने का मतलब- येसु को प्यार करना, वचन को सुनना, वचन में विश्वास करना और वचन में विश्वास करके उसके अनुसार जीना,"। 4. जो लोग उन पर विश्वास करते हैं और जो लोग उसके वचन के अनुसार जीते है वे येसु के साथ और आपस में एक परिवार के समान अटुट सम्बन्ध जोड़ते हैं। यही परिवार येसु ख्रीस्त का शरीर है, जिसका सिर येसु है, और परिवार में रहने वाले लोग उसका सदस्य हैं। 5. निष्कलंक माता मरिया इस परिवार में प्रमुख स्थान को ग्रहण की। जैसे सबसे पहले उसने वचन को सुनी और वचन को अपने हृदय में ग्रहण की और वचन के अनुसार जीवन वितायी। परिवार में उसको सबसे उत्तम स्थान मिला। कुवारी मरिया दुनिया में पवित्र आत्मा कि शक्ति से गर्भवती हुई, और शरीर को दुनिया में जन्म देने का सौभाग्य मिला। वही माता मरियम को परिवार में मुख्य स्थान मिला, वह परिवार का मां है।

22 सितंबर का पवित्र वचन

 

22 सितंबर 2020
वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य सप्ताह, मंगलवार

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📒 पहला पाठ : सुक्ति 21:1-6, 10-13

1) राजा का हृदय प्रभु के हाथ में जल धारा की तरह है: वह जिधर चाहता, उसे मोड़ देता है।

2) मनुष्य जो कुछ करता है, उसे ठीक समझता है; किन्तु प्रभु हृदय की थाह लेता है।

3) बलिदान की अपेक्षा सदाचरण और न्याय प्रभु की दृष्टि में कहीं अधिक महत्व रखते हैं।

4) तिरस्कारपूर्ण आँखें और धमण्ड से भरा हुआ हृदय: ये पापी मनुष्य के लक्षण हैं।

5) जो परिश्रम करता है, उसकी योजनाएँ सफल हो जाती हैं। जो उतावली करता है, वह दरिद्र हो जाता है।

6) झूठ से कमाया हुआ धन असार है और वह मृत्यु के पाष में बाँध देता है।

10) दुष्ट बुराई की बातें सोचता रहता है, वह अपने पड़ोसी पर भी दया नहीं करता।

11) अविश्वासी को दण्डित देख कर, अज्ञानी सावधान हो जाता है। जब बुद्धिमान् को शिक्षा दी जाती है, तो उसका ज्ञान बढ़ता है।

12) न्यायप्रिय दुष्ट के घर पर दृष्टि रखता और कुकर्मियों का विनाश करता है।

13) जो दरिद्र का निवेदन ठुकराता है, उसकी दुहाई पर कोई कान नहीं देगा।


सुसमाचार :लूकस 8:19-21

19) ईसा की माता और भाई उन से मिलने आये, किन्तु भीड़ के कारण उनके पास नहीं पहुँच सके।

20) लोगों ने उन से कहा, "आपकी माता और आपके भाई बाहर हैं। वे आप से मिलना चाहते हैं।"

21) उन्होंने उत्तर दिया, "मेरी माता और मेरे भाई वहीं हैं, जो ईश्वर का वचन सुनते और उसका पालन करते हैं"।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार को, ऊपरी तौर पर पढ़ने से, हमें जो समझ में आता है, वह यह है कि येसु अपने मूल परिवार से खुद को दूर कर रहे हैं। उनकी माँ और भाई घर के बाहर थे और वे उनसे मिलना चाहते थे। हालाँकि, जब उन्होंने येसु को बुला भेजा तो वे उनके पास नहीं आते, इसके बजाय, वे अपने परिवार को फिर से परिभाषित करते हैं। उनका नया परिवार व परिवार सदस्य अब वे लोग हैं, जो ईश्वर का वचन सुनते, और उसे बनाए रखते हैं।

इस घटना के पहले येसु ने बोने वाले के दृष्टांत सुनाया था, जिसमें अच्छी मिट्टी पर गिरे हुए बीज की पहचान उन लोगों के रूप में की गई थी, जो ईश्वर का वचन को सुनते, और उसे अपने दिल में उतारते तथा फल उत्पन्न करते हैं । ये ऐसे लोग हैं जो अब येसु के सच्चे परिवार का गठन करते हैं। उनकी माँ और उनके रक्त सम्बन्धी व अन्य सदस्य तभी इस नए परिवार का हिस्सा बन सकते हैं जब वे भी ईश्वर के वचन को सुनें और उस पर चलें ।

जहाँ तक हम ईश्वर के वचन को स्वीकार करते हैं और उसका पालन करते हैं, हम भी येसु के नए विस्तृत, परिवार के सदस्य बन सकते हैं। हमारे बपतिस्मा की बुलाहट यही है कि हम ईश्वर के वचनों को सुनें और इसे व्यवहार में लाएं । हमें अपने जीवन को वह अच्छी भूमि बनाना है जहाँ पर बीज गिरकर फल लाता है। यदि हम ईश्वर के वचन को सुनने के लिए प्रयास करते रहते हैं और उनपर चलते हुए ईश्वर की मर्ज़ी को पूरा करते है तो प्रभु येसु हमें अपने परिवार सदस्य कहने में प्रसन्न होंगे।



📚 REFLECTION

Reading from the periphery, what we understand from the gospel today is that Jesus is distancing himself from his original family. His mother and brothers were outside the house and they wanted to meet him. However, He does not go out to meet them, when they called for him. Instead, He redefines his family and family relations. His new family and family members are now those who listen to, and keep the word of God. Before this event, Jesus narrated the parable of sower, identifying the seed fallen on good soil as those who would listen to the word of God, and keep it in their hearts and produce fruit. These are the people who now constitute the true family of Jesus. His mother and His blood relations and other members can become part of this new family only when they too listen to the word of God and follow it.

When we accept and obey the Word of God, we can also become members of the new extended family of Jesus. The call of our baptism is that we listen to the Words of God and put it into practice. We have to make our life the good and fertile land where the seed falls and brings fruit. If we listen to God's word and do the will of God, then our Lord Jesus will be happy to call us His family members. Amen.