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23 अक्टूबर 2022 वर्ष का तीसवाँ सामान्य इतवार

 

23 अक्टूबर 2022

वर्ष का तीसवाँ सामान्य इतवार




पहला पाठ : प्रवक्ता 35:12-14; 16-18



12) जिस प्रकार सर्वोच्च ईश्वर ने तुम्हें दिया है, उसकी प्रकार तुम भी उसे सामर्थ्य के अनुसार उदारतापूर्वक दो;

13) क्योंकि प्रभु प्रतिदान करता है, वह तुम्हें सात गुना लौटायेगा।

14) उसे घूस मत दो, वह उसे स्वीकार नहीं करता।

16) वह दरिद्र के साथ अन्याय नहीं करता और पद्दलित की पुकार सुनता है।

17) वह विनय करने वाले अनाथ अथवा अपना दुःखड़ा रोने वाली विधवा का तिरस्कार नहीं करता।

18) उसके आँसू उसके चेहरे पर झरते हैं और उसकी आह उत्याचारी पर अभियोग लगाती है।



दूसरा पाठ : 2तिमथी 4:6-8,16-18



6) मैं प्रभु को अर्पित किया जा रहा हूँ। मेरे चले जाने का समय आ गया है।

7) मैं अच्छी लड़ाई लड़ चुका हूँ, अपनी दौड़ पूरी कर चुका हूँ और पूर्ण रूप से ईमानदार रहा हूँ।

8) अब मेरे लिए धार्मिकता का वह मुकुट तैयार है, जिसे न्यायी विचारपति प्रभु मुझे उस दिन प्रदान करेंगे - मुझ को ही नहीं, बल्कि उन सब को, जिन्होंने प्रेम के साथ उनके प्रकट होने के दिन की प्रतीक्षा की है।

16) जब मुझे पहली बार कचहरी में अपनी सफाई देनी पड़ी, तो किसी ने मेरा साथ नहीं दिया -सब ने मुझे छोड़ दिया। आशा है, उन्हें इसका लेखा देना नहीं पड़ेगा।

17) परन्तु प्रभु ने मेरी सहायता की और मुझे बल प्रदान किया, जिससे मैं सुसमाचार का प्रचार कर सकूँ और सभी राष्ट्र उसे सुन सकें। मैं सिंह के मुँह से बच निकला।

18) प्रभु मुझे दुष्टों के हर फन्दे से छुड़ायेगा। वह मुझे सुरक्षित रखेगा और अपने स्वर्गराज्य तक पहुँचा देगा। उसी को अनन्त काल तक महिमा! आमेन!



सुसमाचार : सन्त लूकस 18:9-14



9) कुछ लोग बड़े आत्मविश्वास के साथ अपने को धर्मी मानते और दूसरों को तुच्छ समझते थे। ईसा ने ऐसे लोगों के लिए यह दृष्टान्त सुनाया,

10) "दो मनुष्य प्रार्थना करने मन्दिर गये, एक फ़रीसी और दूसरा नाकेदार।

11) फ़रीसी तन कर खड़ा हो गया और मन-ही-मन इस प्रकार प्रार्थना करता रहा, ’ईश्वर! मैं तुझे धन्यवाद देता हूँ कि मैं दूसरे लोगों की तरह लोभी, अन्यायी, व्यभिचारी नहीं हूँ और न इस नाकेदार की तरह ही।

12) मैं सप्ताह में दो बार उपवास करता हूँ और अपनी सारी आय का दशमांश चुका देता हूँ।’

13) नाकेदार कुछ दूरी पर खड़ा रहा। उसे स्वर्ग की ओर आँख उठाने तक का साहस नहीं हो रहा था। वह अपनी छाती पीट-पीट कर यह कह रहा था, ‘ईश्वर! मुझ पापी पर दया कर’।

14) मैं तुम से कहता हूँ - वह नहीं, बल्कि यही पापमुक्त हो कर अपने घर गया। क्योंकि जो अपने को बड़ा मानता है, वह छोटा बनाया जायेगा; परन्तु जो अपने को छोटा मानता है, वह बड़ा बनाया जायेगा।"



📚 मनन-चिंतन



आज के इस रविवार को माता कलीसिया मिशन रविवार के रूप में मनाती है। यह एक ऐसा दिन है (या कुछ ऐसे दिन हैं) जिनमें हम मिशन के लिए विशेष प्रार्थना करते हैं और उदारतापूर्वक मिशन के विकास और जारी रखने के लिए दान देते हैं। आज की पूजन विधि हमें दरिद्रों, विधवाओं एवं पापियों के लिए ईश्वर के विशेष प्रेम की याद दिलाती है। जब दरिद्र, निराश्रित और अनाथ प्रभु को पुकारते हैं तो उनकी आह भरी पुकार बादलों को चीरकर प्रभु के कानों तक पहुँच जाती है। ईश्वर उनकी पुकार को अनसुना नहीं करता, वह तुरन्त उस पर ध्यान देता है। यदि हमारा स्वर्गीय पिता दरिद्रों और दिन-हीनों का इतना ख़्याल रखते हैं तो हमें, उनकी प्रिय सन्तानों को उनका कितना ख़्याल रखना चाहिए?

आज का दूसरा पाठ हमें सन्त पौलुस के मिशन एवं उनकी चुनौतियों तथा कठिनाइयों का वर्णन करता है। वह कलिसिया के अगुआ लोगों को प्रेरित करते हैं कि वे जो भी करें प्रभु के मिशन को ध्यान में रखकर करें और निरंतर उसी की सफलता के लिए अथक प्रयास करते रहें। आज का यह रविवार हमें हमारे मिशन की भी याद दिलाता है, ईश्वर ने हममें से प्रत्येक व्यक्ति को भी एक-एक मिशन सौंपा है, और वह मिशन है, संसार के कौने-कौने में सुसमाचार का प्रचार करना। दुनिया में ऐसे अनेक लोग हैं जिन्हें आधारभूत सुविधाएँ भी नसीब नहीं होतीं। हमारे देश में ही ऐसे गाँव हैं जहाँ शिक्षा का उजाला अभी तक नहीं पहुँच पाया है।

ऐसे लोग हैं जिन्हें पीने का स्वच्छ जल नहीं मिल पाता है, उचित स्वास्थ्य सुविधाएँ नहीं मिल पाती हैं, ऐसे गाँव हैं जो बरसात के मौसम में मुख्य धारा से कट जाते हैं क्योंकि वहाँ उचित सड़क नहीं है। कई गाँव में बिजली तक नहीं पहुँची है। ऐसे लोग हैं जो कमजोर और गरीब हैं, जिनका शक्तिशाली और धनवान लोगों द्वारा शोषण किया जाता है, ग़रीबों के साथ तरह-तरह से अन्याय किया जाता है। उनका हृदय मदद के लिए ईश्वर को पुकारता है। ईश्वर आज आपसे और मुझसे पूछते हैं - “मेरी प्रजा की करुण पुकार मेरे कानों तक पहुँची है, उनकी मदद के लिए मैं किसे भेजूँ?” क्या ईश्वर के इस सवाल का जवाब देने की हिम्मत है मुझमें?

क्या मुझमें हिम्मत है कि मैं कह सकूँ, “प्रभु मैं तैयार हूँ, अपने मिशन के लिए मुझे भेज?” हो सकता है मैं नौकरी करता हूँ, देख-भाल करने के लिए एक परिवार है, ऐसे लोग हैं मेरे जीवन में जिनकी ज़िम्मेदारी मेरे ही कंधों पर है, मैं अपने जीवन बहुत ज़्यादा व्यस्त हूँ। मैं दूर दराज स्थानों पर मिशन कार्य के लिए कैसे जा सकता हूँ? भले ही आप मिशन कार्य के लिए अपने घर से दूर नहीं जा सकते, लेकिन आप फिर भी मिशन के विकास के लिए अपना सहयोग दे सकते हैं। आप मिशन के लिए प्रार्थना करने के लिए अपना समय दे सकते हैं। प्रत्येक ख्रिस्तिय को अपनी कमाई का दशमांश कलिसिया के कार्यों के लिए देना चाहिए, लेकिन हम में से कितने लोग ऐसा करते हैं? मिशन के लिए और जो मिशन की ख़ातिर अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं, उन सब की ख़ातिर उदारतापूर्वक दान दें। याद रखिए ईश्वर के कार्य के लिए दिल से दिया हुआ छोटा सा दान भी ईश्वर की नज़र से नहीं छुपेगा।




📚 REFLECTION



Today the Mother Church celebrates the mission Sunday. It is a day (or few days together) specially meant for praying for missions and generously contributing for the growth and sustenance of the missions. Today's liturgy of the word reminds us about special love of God for poor, widows and sinners. When the poor, the orphan, the widows call upon the name of the Lord, their cry pierces the clouds and reaches straight to God, and God does not ignore their cries, He hears and attends to them immediately. If God our father is so concerned about the weak and the poor, how much more we, his beloved children, should be concerned about them all?

The second reading reminds us about the mission that St. Paul completes after so many hardships and rejections and persecutions. He encourages and inspires other church leaders to keep the mission in the mind and work tirelessly for the mission of the Lord. This Sunday reminds each one of us of the mission that is entrusted to us, to carry the good news to the ends of the world. There are innumerable people who are deprived of even the basic amenities. Even in our own country, there are places and people to whom the light of education has not reached yet.

There are people who have no access to clean water, no access to proper medical facilities, there are villages which are totally cut off from mainstream and rainy season, because of lack of proper roads, no electricity in many villages. There are poor people who are exploited by the rich and powerful, there is a lot of injustice done to the weak. Their heart cries out to God for help. And we know God will not leave them without help. Today God asks you and me - "I hear the cry of my people, whom shall I send?” Do I have an answer to God’s calling?

Do I have courage to say, Lord I am ready, send me for your mission? Maybe I have a job, a family to take care of, people around me who are depending on me, I am too busy in my life. How can I go for missions to far away places? Even though you cannot go to far away places for missions, you can still contribute in the growth of the mission. You can spend time in praying for the missions. Every Christian is expected to give 1/10 of the income to the church for works of charity. Contribute generously for the mission, for people who have given their life for the missions. Remember, the generous donations given for God’s mission, will not go unrewarded.



मनन-चिंतन -2




फरीसी और नाकेदार का दृष्टांत बताता है कि हम छोटे से छोटे से वरदान को खरीद नहीं सकते हैं। अनुग्रह मुफ़्त है; हम उसके लिए भुगतान नहीं कर सकते, न ही हम उसका हकदार बनने का दावा कर सकते हैं। स्वयं को धार्मिक मानने वाला व्यवहार हमें सब कुछ खोने के खतरे में डाल सकता है। धार्मिक प्रथाओं तथा अनुष्ठानों से हम ईश्वर के अनुग्रहों के लिए भुगतान नहीं कर सकते है। सभी धार्मिक अनुष्ठान हमें अपने महान और दयालु ईश्वर द्वारा हम पर बरसाने वाले अनुग्रहों की प्राप्ति के योग्य बना सकते हैं। नाकेदार स्तोत्रकार के साथ मिल कर सवाल करते हैं, "प्रभु! यदि तू हमारे अपराधों को याद रखेगा, तो कौन टिका रहेगा?" (स्तोत्र 130: 3) उसके पास दावा करने के लिए कुछ भी नहीं है। वह बस ईश्वर की दया के लिए खुद को प्रस्तुत करता है। केवल विनम्रता ही हमारी प्रार्थना को ईश्वर के समक्ष स्वीकृति के योग्य बनाती है। विनम्रता हमें दूसरों को स्वीकार करने और उनकी सराहना करने में सक्षम भी बनाती है। संत पौलुस कहते हैं, "आप दलबन्दी तथा मिथ्याभिमान से दूर रहें। हर व्यक्ति नम्रतापूर्वक दूसरों को अपने से श्रेष्ठ समझे।" (फिलिप्पियों 2: 3)।




SHORT REFLECTION



The parable of the Pharisee and the tax collector tells us that we cannot pay for even the smallest of graces. Grace is gratuitous; we cannot pay for it, nor can we claim it. Self-righteous behavior can place us in danger of losing everything. Religious practices are not meant to be payments for graces. They are meant to create an adequate disposition to receive graces that are freely lavished upon us by our great and merciful God. The tax collector seems to join the psalmist in asking, “If you, O Lord, should mark iniquities, Lord, who could stand?” (Ps 130:3) He has nothing to claim for. He simply submits himself to the mercy of God. Only humility makes our prayer worthy of acceptance before God. It is humility that enables us to accept and appreciate others. St. Paul says, “Do nothing from selfish ambition or conceit, but in humility regard others as better than yourselves” (Phil 2:3).



प्रवचन


प्रार्थना मनुष्य को ईश्वर से जोडती है। प्रार्थना के माध्यम से हम ईश्वर से वह सबकुछ प्राप्त कर सकते हैं जो हम ईश्वर से प्रार्थना में मांगते हैं। प्रार्थना को अत्यंत शुद्ध तथा स्वच्छ मन से करना चाहिये। दिखावटीपन, आडंबर, अहं, डींग आदि बातें प्रार्थना के लिये दीमक की तरह होती है। यह हमारी प्रार्थनाओं को सार्वजनिक प्रदर्शन में बदल देता है। इस प्रकार से की गयी प्रार्थनाओं से कोई लाभ नहीं होता है। ऐसी गलत प्रवृत्तियों के प्रति आगाह करते हुये येसु कहते हैं, ’’ढोंगियों की तरह प्रार्थना नहीं करो। वे सभागृहों में और चौकों पर खड़ा होकर प्रार्थना करना पसंद करते हैं, जिससे लोग उन्हें देखें।’’ (मत्ती 6:5) सुसमाचार में प्रभु दो व्यक्तियों को प्रार्थना करते प्रस्तुत करते हैं। दोनों की प्रार्थना में जमीन-आसमान का फर्क है। एक अपनी स्वघोषित धार्मिकता के दंभ में चूर है। उसे ईश्वर की क्षमा या कृपा की आवश्यकता नहीं। वह यह भी मानता है कि वह दूसरों के समान पापी नहीं हैं।

दूसरी ओर नाकेदार अपने पाप और पश्चाताप के बोध के कारण ईश्वर की ओर ऑखें भी नहीं उठा पा रहा था। ईश्वर उसके पश्चातापी एवं विनम्रता के भाव को स्वीकार करते हैं। धर्मग्रंथ हमें सिखाता तथा आशवासन देता है कि जब भी हम विनम्रता एवं पश्चाताप के सच्चे भाव के साथ प्रार्थना करते हैं तो ईश्वर हमारी सुनता है। ’’यदि मेरी अपनी प्रजा विनयपूर्वक प्रार्थना करेगी, मेरे दर्शन चाहेगी और अपना कुमार्ग छोड़ देगी, तो मैं स्वर्ग से उसकी सुनूँगा, उसके पाप क्षमा करूँगा और उसके देश का कल्याण करूँगा। इस स्थान पर जो प्रार्थना की जाये, उसे मेरी आँखें, देखती रहेंगी और मेरे कान सुनते रहेंगे।’’ (2 इतिहास 7:14-15)

जब राजा दाऊद ने व्यभिचार और हत्या जैसा अपराधों को स्वीकारा, ’’मैंने प्रभु के विरूद्ध पाप किया है’’ तो प्रभु ने उनकी प्रार्थनाओं पर ध्यान दिया तथा उसका पश्चाताप स्वीकारा, ’’प्रभु ने आपका यह पाप क्षमा कर दिया है। आप नहीं मरेंगे। (2समूएल 12:13) जब अहाब ने अपनी पत्नी के साथ मिलकर नाबोत को मरवा कर उसकी दाखबारी हथिया ली तो ईश्वर ने उनके लिये घोर सजा निर्धारित की। ’’अहाब ने ये शब्द सुन कर अपने वस्त्र फाड़ डाले और अपने शरीर पर टाट ओढ़ कर उपवास किया। वह टाट के कपड़े में सोता था और उदास हो कर इधर-उधर टहलता था।’’ जब अहाब ने प्रभु का भय खाकर, विनम्र तथा पश्चातापी हृदय से ईश्वर से इस प्रकार प्रार्थना की तो ईश्वर ने उनके घोर अपराधों को भी क्षमा करते हुये कहा, ’’क्या तुमने देखा है कि अहाब ने किस तरह अपने को मेरे सामने दीन बना लिया है? चूँकि उसने अपने को मेरे सामने दीन बना लिया, इसलिए मैं उसके जीवनकाल में उसके घराने पर विपत्ति नहीं ढाऊँगा।’’ (1 राजाओं 21:27,29) इसी प्रकार प्रभु के क्रूस-मरण के दौरान जब उनकी बगल में लटका डाकू उनसे कहता है, ’’ईसा, जब आप अपने राज्य में आयेंगे, तो मुझे याद कीजिएगा’’ तो ईसा उसे तुरंत पुरस्कृत करते हुये कहते हैं, ’’मैं तुम से यह कहता हूँ, तुम आज ही परलोक में मेरे साथ होगे।’’ (लूकस 23:42-43)

खोये हुये लडके के दृष्टांत के माध्यम से प्रभु इसी बात को रेखांकित करते है कि यदि पापी अपना भटका मार्ग छोड पश्चातापी हृदय से ईश्वर के पास लौटेगा तो ईश्वर उसे बेझिझक अपना लेंगे। (देखिये लूकस 15:11-32) जब जकेयुस प्रभु से कहता है, ’’प्रभु! देखिए, मैं अपनी आधी सम्पत्ति गरीबों को दूँगा और मैंने जिन लोगों के साथ किसी बात में बेईमानी की है, उन्हें उसका चौगुना लौटा दूँगा’ तब ईसा उसे तथा उसके परिवार को मुक्ति प्रदान करते हुये कहते हैं, ’’आज इस घर में मुक्ति का आगमन हुआ है, क्योंकि यह भी इब्राहीम का बेटा है। जो खो गया था, मानव पुत्र उसी को खोजने और बचाने आया है।’’ (लूकस 19:8-10)

इस प्रकार की विनम्रता एवं पश्चाताप के साथ की गयी प्रार्थनायें ईश्वर कभी नहीं ठुकराते हैं। हमें ईश्वर के सामने अपनी अयोग्यता को कभी नहीं भूलना चाहिये। हम अपनी योग्यता के बल पर नहीं बल्कि ईश्वर की दया से मुक्ति पाते हैं। येसु स्वयं ऐसे लोगों को बुलाने एवं बचाने आये थे जो स्वयं के पापों को जानते, स्वयं को अयोग्य समझते तथा पापमय जीवन से छुटकारा पाना चाहते थे। ’’निरोगियों को नहीं, रोगियों को वैद्य की जरूरत होती है। मैं धर्मियों को नहीं, पापियों को पश्चाताप के लिए बुलाने आया हूँ।’’ (लूकस 5:31-32) हमें भी इन्हीं मनोभावों को अपना कर ईश्वर से पूरे विश्वास के साथ प्रार्थना करना चाहिये।


 -Br. Biniush Topno


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09 अक्टूबर 2022 ववर्ष का अट्ठाइसवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार09 अक्टूबर 2022 ववर्ष का अट्ठाइसवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार

 

09 अक्टूबर 2022

ववर्ष का अट्ठाइसवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार

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📒 पहला पाठ : 2राजाओं 5:14-17


14) इसलिए जैसा कि एलीशा ने उस से कहा था, उसने जा कर यर्दन नदी में सात बार डुबकी लगायी और उसका शरीर फिर छोटे बालक के शरीर-जैसा स्वच्छ हो गया।

15) वह अपने सब परिजनों के साथ एलीशा के यहाँ लौटा। वह भीतर जा कर उसके सामने खड़ा हो गया और बोला, "अब मैं जान गया हूँ कि इस्राएल को छोड़ कर और कहीं पृथ्वी पर कोई देवता नहीं है। अब मेरा निवेदन है कि आप अपने सेवक से कोई उपहार स्वीकार करें।"

16) एलीशा ने उत्तर दिया, "उस प्रभु की शपथ, जिसकी मैं सेवा करता हूँ! मैं कुछ भी स्वीकार नहीं करूँगा"। नामान के अनुरोध करने पर भी उसने स्वीकार नहीं किया।

17) तब नामान ने कहा, "जैसी आपकी इच्छा। आज्ञा दीजिए कि मुझे दो खच्चरों का बोझ मिट्टी मिल जाये, क्योंकि मैं अब से प्रभु को छोड़ कर किसी और देवता को होम अथवा बलि नहीं चढ़ाऊँगा।



📒 दूसरा पाठ : 2तिमथी 2:8-3



8) दाऊद के वंश में उत्पन्न, मृतकों में से पुनर्जीवित ईसा मसीह को बराबर याद रखो- यह मेरे सुसमाचार का विषय है।

9) मैं इस सुसमाचार की सेवा में कष्ट पाता हूँ और अपराधी की तरह बन्दी हूँ;

10) मैं चुने हुए लोगों के लिए सब कुछ सहता हूँ, जिससे वे भी ईसा मसीह द्वारा मुक्ति तथा सदा बनी रहने वाली महिमा प्राप्त करें।

11) यह कथन सुनिश्चित है- यदि हम उनके साथ मर गये, तो हम उनके साथ जीवन भी प्राप्त करेंगे।

12) यदि हम दृढ़ रहे, तो उनके साथ राज्य करेंगे। यदि हम उन्हें अस्वीकार करेंगे, तो वह भी हमें अस्वीकार करेंगे।

13) यदि हम मुकर जाते हैं, तो भी वह सत्य प्रतिज्ञ बने रहेंगे; क्योंकि वह अपने स्वभाव के विरुद्ध नहीं जा सकते।


📙सुसमाचार : सन्त लूकस 17:11-19



11) ईसा येरूसालेम की यात्रा करते हुए समारिया और गलीलिया के सीमा-क्षेत्रों से हो कर जा रहे थे।

12) किसी गाँव में प्रवेश करने पर उन्हें दस कोढ़ी मिले,

13) जो दूर खड़े हो गये और ऊँचे स्वर से बोले, "ईसा! गुरूवर! हम पर दया कीजिए"।

14) ईसा ने उन्हें देख कर कहा, "जाओ और अपने को याजकों को दिखलाओ", और ऐसा हुआ कि वे रास्ते में ही नीरोग हो गये।

15) तब उन में से एक यह देख कर कि वह नीरोग हो गया है, ऊँचे स्वर से ईश्वर की स्तुति करते हुए लौटा।

16) वह ईसा को धन्यवाद देते हुए उनके चरणों पर मुँह के बल गिर पड़ा, और वह समारी था।

17) ईसा ने कहा, "क्या दसों नीरोग नहीं हुए? तो बाक़ी नौ कहाँ हैं?

18) क्या इस परदेशी को छोड़ और कोई नहीं मिला, जो लौट कर ईश्वर की स्तुति करे?"

19) तब उन्होंने उस से कहा, "उठो, जाओ। तुम्हारे विश्वास ने तुम्हारा उद्धार किया है।"



📚 मनन-चिंतन


आज की पूजनविधि हमें ईश्वर की भलाई और उदारता को पहचानने और उसके प्रति कृतज्ञ बने रहकर संसार के सामने उसकी घोषणा करनी है, जैसे कि माता मरियम पवित्र बाइबल में बहुत सी महान हस्तियों ने किया। पहले पाठ में हम देखते हैं कि किस प्रकार नामान सिरियन अपने जीवन में हुए चमत्कार के लिए ईश्वर के प्रति कृतज्ञ था और लौटकर प्रभु के नबी को धन्यवाद देने के लिए आया। आज का सुसमाचार भी हमें ईश्वर के महान कार्यों के लिए कृतज्ञता प्रकट करने का आह्वान करता है। दस कोढ़ियों में से सिर्फ़ ही कोढ़ी चंगा होने पर वापस लौटकर प्रभु येसु को धन्यवाद देने आया, अन्य नौ कोढ़ियों ने ईश्वर के प्रति धन्यवाद प्रकट करना उचित भी नहीं समझा।

हम जानते हैं कि हमें ईश्वर से इतने वरदान और कृपाएँ मिलीं हैं जिनके हम योग्य भी नहीं हैं। ईश्वर ने ही हमें जीवन दिया है, जिसने अपने प्राण हम में फूंक दिए हैं ताकि हम जीवित रह सकें। वह हमारी रक्षा करता है और उसी ने इस पृथ्वी को हमें अपने निवास स्थान के रूप में दिया है। वह हम पर नज़र रखता है ताकि हम ठोकर खाकर गिर ना पड़ें। जब हम बीमारी में कमजोर हो जाते हैं तो ईश्वर हमें शक्ति और चंगाई प्रदान करता है, जब हम जीवन में भटक जाते हैं, तो ईश्वर हमें सही राह दिखाता है, नई आशा प्रदान करता है और हमारा मार्ग, सत्य और जीवन बन जाता है। पवित्र बाइबल हमें सिखाती है कि ईश्वर सदा से हमें अपने मार्ग पर ले जाना चाहता है। मुक्ति विधान ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है जो ईश्वर के अपार प्रेम को दर्शाते हैं और यह बताते हैं कि ईश्वर हमारी देख-भाल करता है।

अंततः उसने इस दुनिया में अपने एकलौते पुत्र को भेज दिया जो हमारे प्रति ईश्वर के असीम प्रेम का अचूक प्रमाण है। प्रभु येसु ने हमें पिता ईश्वर के दर्शन कराए। उन्होंने बीमारों को चंगा किया, मुर्दों को जिलाया, पापियों को क्षमा दिलायी एवं मानवता को ईश्वर की ओर उन्मुख किया। उसने हमारे पापों को अपने ऊपर ले लिया और स्वयं क्रूस की कष्टकारी मृत्यु को अपनाया। ये सब किसके लिए? हमारे लिए! अगर हमने प्रभु में बपतिस्मा लिया है, तो हम उनके उत्तराधिकारी बन गए हैं, क्रूस पर मृत्यु के फल के सहभागी बन गए हैं। आज भी वह हमें हमारे भोजन के रूप में अपना शरीर और रक्त प्रदान करते हैं। क्या मैं अपने प्रति ईश्वर की उदारता एवं प्रेम के लिए कृतज्ञ हूँ?

यदि मैं अपने प्रति ईश्वर के प्रेम के लिए कृतज्ञ हूँ तो उस असीम प्रेम को मुझे दूसरों के साथ बाँटना है। हर वह व्यक्ति जिसने प्रभु येसु को मुक्तिदाता के रूप में स्वीकार किया है, उसके लिए यह अनिवार्य है कि वह संसार के लिए ईश्वर की ओर से मिले मुक्ति रूपी उपहार की घोषणा करे। आज यदि हम संसार के सामने प्रभु येसु को अपना मुक्तिदाता स्वीकार करते हैं तो प्रभु येसु भी अपने स्वर्गीय पिता और स्वर्गदूतों के समक्ष अपने प्रिय शिष्यों के रूप में स्वीकार करेंगे। इससे बढ़कर आनंद की बात हमारे लिए और क्या हो सकती है हम पिता ईश्वर और प्रभु येसु की नज़रों में उनके प्रेम के योग्य पाए जाएँ! यदि मैं ईश्वर के प्रति कृतज्ञ हूँ तो मुझे उसके प्रेम की घोषणा भी करनी है। ईश्वर हमें कृपा प्रदान करे कि हम उसके वरदानों के प्रति कृतज्ञ बनें और उसके असीम प्रेम की घोषणा संसार के सामने कर सकें।




📚 REFLECTION


Today’s liturgy of the word invites us to acknowledge God’s goodness and generosity towards us and express our gratitude, proclaim his kindness to whole world as mother Mary and many other Biblical personalities proclaimed it. The first reading describes about how Naaman the Syrian was grateful to God of Israel and came back to thank the prophet. The gospel of the day also gives us a similar message of expressing the gratitude. Only one leper out of 10 came to thank Jesus for getting healed.

We know we have received from God much more than we deserve. God is the one who has given us life, who has breathed his spirit within us, so that we can live. He protects us and has given us the Earth as our home. He watches over us so that we do not fall. When we are sick, God gives us strength and healing, when we are lost in life God shows us new path, gives us new hope and becomes our way, truth and life. The holy Bible teaches us that God has been always trying to call us to his paths. The salvation history is full of innumerable proofs that God loves us unconditionally and takes care of us.

Finally he sent his only son into this world as the greatest proof of his love. Jesus showed us the true face of God. He healed the sick, raised the dead, forgave the sinners, and turned the face of humanity towards God. He took all our iniquities upon himself and died a painful and shameful death on the cross. All for us! If we have been baptised in him, then we have become his heirs, we have become the beneficiaries of his sacrifice on the cross. Even today he nourishes us with his own body and blood. Am I grateful to God for all his goodness and love to me?

If I am grateful towards God’s love for me, then I must share it with others. Every Christian who has accepted Jesus as the saviour, also has the obligation to proclaim the great gift of salvation to the whole world. Today if we proclaim Jesus as our saviour before the world, then he also will proclaim us as his loving disciples before the heavenly father, and imagine what is more joyful than to be loved and accepted by Father and the son in heaven! If I am grateful to God then I must proclaim him. May God grant us strength to express our gratitude to him and proclaim it before the world.




 -Br. Biniush Topno


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रविवार, 02 अक्टूबर 2022 वर्ष का सत्ताईसवाँ सामान्य रविवार

 

रविवार, 02 अक्टूबर 2022

वर्ष का सत्ताईसवाँ सामान्य रविवार



📒 पहला पाठ : हबक्कूक 1:2-3;2:2-4


2) प्रभु! मैं कब तक पुकारता रहूँगा और तू अनसुनी करता रहेगा? मैं कब तक तेरी दुहाई देता रहूँगा और तू बचाने नहीं आयेगा?

3) तू क्यों मुझे पापाचार दिखाता है? क्यों मुझे अत्याचार देखना पडता है? लूटपात और हिंसा मेरे सामने हैं। चारों ओर लडाई-झगडे होते रहते हैं।

2:2) प्रभु ने उत्तर में मुझ से यह कहा, "जो दृश्य तुम देखने वाले हो, उसे स्पष्ट रूप से पाटियों पर लिखो, जिससे सब उसे सुगमता से पढ सकें;

3) क्योंकि वह भविय का दृश्य है, जो निश्चित समय पर पूरा होने वाला है। यदि उस में देर हो जाये, तो उसकी प्रतीक्षा करते रहो, क्योंकि वह अवश्य ही पूरा हो जायेगा। जो दृष्ट है, वह नष्ट हो जायेगा।

4) जो धर्मी है, वह अपनी धार्मिकता के कारण सुरक्षित रहेगा।


📒 दूसरा पाठ : 2तिमथी 1:6-8,13-14


6) मैं तुम से अनुरोध करता हूँ कि तुम ईश्वरीय वरदान की वह ज्वाला प्रज्वलित बनाये रखो, जो मेरे हाथों के आरोपण से तुम में विद्यमान है।

7) ईश्वर ने हमें भीरुता का नहीं, बल्कि सामर्थ्य, प्रेम तथा आत्मसंयम का मनोभाव प्रदान किया।

8) तुम न तो हमारे प्रभु का साक्ष्य देने में लज्जा अनुभव करो और न मुझ से, जो उनके लिए बन्दी हूँ, बल्कि ईश्वर के सामर्थ्य पर भरोसा रख कर तुम मेरे साथ सुसमाचार के लिए कष्ट सहते रहो।

13) जो प्रामाणिक शिक्षा तुम को मुझ से मिली, उसे अपना मापदण्ड मान लो और ईसा मसीह के प्रति विश्वास तथा प्रेम से दृढ़ बने रहो।

14) जो निधि तुम्हें सौंपी गयी, उसे हम में निवास करने वाले पवित्र आत्मा की सहायता से सुरक्षित रखो।


📚 सुसमाचार : सन्त लूकस 17:5-10


5) प्रेरितों ने प्रभु से कहा, "हमारा विश्वास बढ़ाइए"।

6) प्रभु ने उत्तर दिया, "यदि तुम्हारा विश्वास राई के दाने के बराबर भी होता और तुम शहतूत के इस पेड़ से कहते, ‘उखड़ कर समुद्र में लग जा’, तो वह तुम्हारी बात मान लेता।

7) "यदि तुम्हारा सेवक हल जोत कर या ढोर चरा कर खेत से लौटता है, तो तुम में ऐसा कौन है, जो उससे कहेगा, "आओ, तुरन्त भोजन करने बैठ जाओ’?

8) क्या वह उस से यह नहीं कहेगा, ‘मेरा भोजन तैयार करो। जब तक मेरा खाना-पीना न हो जाये, कमर कस कर परोसते रहो। बाद में तुम भी खा-पी लेना’?

9) क्या स्वामी को उस नौकर को इसीलिए धन्यवाद देना चाहिए कि उसने उसकी आज्ञा का पालन किया है?

10) तुम भी ऐसे ही हो। सभी आज्ञाओं का पालन करने के बाद तुम को कहना चाहिए, ‘हम अयोग्य सेवक भर हैं, हमने अपना कर्तव्य मात्र पूरा किया है’।"


📚 मनन-चिंतन



आज की पूजन विधि के मनन-चिन्तन का मुख्य विषय है- ईश्वर में हमारा विश्वास। पहले पाठ में नबी हबक्कूक अपने चारों ओर हो रहे अत्याचार और हिंसा की ओर प्रभु का ध्यान खींचते हैं, और अन्त में यही सन्देश मिलता है कि अपने विश्वास द्वारा ही धर्मी विजय पाता है। सन्त पौलुस आज के दूसरे पाठ में हमें आगे समझाते हैं कि हमारे विश्वास के कारण हमें बहुत कष्ट उठाने हैं लेकिन अपने उन कष्टों और परेशानियों को प्रभु येसु के दुःख भोग के नज़रिए से देखना है। हमारे कष्टों के द्वारा ही हमारे विश्वास की परीक्षा ली जाती है, यही कष्ट हमारे विश्वास को मज़बूती प्रदान करते हैं। आज के सुसमाचार में भी प्रेरित लोग प्रभु से उनका विश्वास बढ़ाने का निवेदन करते हैं। प्रभु उन्हें विश्वास के बारे में दृष्टांतों द्वारा समझाते हैं।

आख़िर हमारे विश्वास का अर्थ क्या है? हम जानते हैं कि हमारी सृष्टि ईश्वर ने की है, ईश्वर ने हमें अपने प्रतिरूप में बनाया है। वह हमारी देख-भाल करता है, और जब भी हमें उसकी विशेष कृपा और आशीष की ज़रूरत पड़ती है, वह हमारे जीवन में हस्तक्षेप करता है। दर असल ईश्वर हर पल, हर क्षण हम पर नज़र रखते हैं। हम कहीं भी उनकी नज़रों से नहीं बच सकते। उसने हमारा नाम अपनी हथेली पर लिख रखा है (इसा 49:16)। वह हमें अपनी आँखों की पुतली के समान सम्भाल कर रखता है। और यही कारण है कि ईश्वर हमारे जीवन में अनेक चिन्ह और चमत्कार दिखाता है और अपनी उपस्थिति को प्रकट करता है। प्रभु के चिन्हों और चमत्कारों एवं हमारे जीवन में उसकी उपस्थिति के प्रति हमारा जो प्रत्युत्तर है वही हमारा विश्वास कहलाता है।

उदाहरण के लिए जब हम सुबह उठते हैं तो हमें एक नई सुबह और नया दिन देखने को मिलता है। अगर हम ईश्वर में विश्वास करते हैं तो प्रातः काल हमारे लिए ईश्वर को धन्यवाद देने का समय है, प्रार्थना के साथ शुरुआत करने का अवसर है। और यदि हम ईश्वर में विश्वास नहीं करते हैं तो हर सुबह हमारे लिए सामान्य होगी, और हम ईश्वर को याद नहीं करेंगे। उसी तरह से जब हम यात्रा करते हैं, एक स्थान से दूसरे स्थान जाते हैं और सुरक्षित पहुँचते हैं, तो हम विश्वास करते हैं कि ईश्वर ने हमारी रक्षा की और हमें सुरक्षित पहुँचाया है। लेकिन यदि हम ईश्वर में विश्वास नहीं करते हैं तो यह हमारे लिए एक सामान्य सी घटना होगी।

ईश्वर में विश्वास करना और उस विश्वास के अनुसार जीना बहुत मुश्किल ज़िम्मेदारी है। अगर हम ईश्वर में विश्वास करते हैं, उन्हें प्यार करते हैं, तो हमें उनकी आज्ञाओं को मानना पड़ेगा, उनके बताये मार्ग पर चलना पड़ेगा, जो कि बहुत कठिन है। आज की दुनिया में विश्वास का जीवन जीना और अपने जीवन द्वारा अपने विश्वास का साक्ष्य देना बहुत बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य है। हमारे विश्वास के कारण हमारे साथ भेद-भाव किया जाता है, हम पर अत्याचार होता है, झूठे मुक़दमों में फँसाया जाता है। लेकिन प्रभु येसु ने हमसे वादा किया है, कि हमें विकट परिस्थितियों में घबराना नहीं है, बल्कि अपने विश्वास में अड़िग बने रहना है क्योंकि प्रभु संसार के अन्त तक सदा हमारे साथ हैं। ईश्वर हमें हमारे विश्वास में अड़िग और अटल बने रहने की कृपा प्रदान करे। आमेन।



📚 REFLECTION


The main theme for our reflection is - our faith in God. Prophet Habakkuk in the first reading of today puts forward the violence and pathetic condition around him, that God may pay heed. Ultimately we get the message that the righteous will endure through their faith. In the second reading of today, St. Paul explains further that we will have to undergo many sufferings and trials on account of our faith, but we have to look at those sufferings from the perspective of the sufferings of Christ. Our faith is tested amidst these sufferings and trials and they strengthen and purify our faith. The apostles in today’s gospel, request Jesus to increase their faith, and Jesus explains to them with the help of parables.

What does it mean by faith? We know that God has created us out of his own free will and in his own image and likeness. He cares for us, and whenever we are in great need of his love and protection, he intervenes in our lives. In fact God watches over us every moment of our life. There no place where we can hide away from his sight. He has inscribed us on the palm of his hand (Isa. 49:16). He protects us like the apple of his eyes. He shows many signs and miracles because he loves us want us to experience his presence in our lives. Our response towards God’s miracles and his presence in our lives, is called our faith in him.

For example when we open our eyes in the morning, we find a new fresh morning and a new day. If we have faith in God, then that beautiful morning becomes an opportunity for us to thank and praise God and begin the day with prayer. But if we have no faith in God than every morning will be ordinary morning and we may never remember God for it. Similarly when we travel from one place to another and we rach safely to our destination, we believe that God has brought us safely and protected us on the way. But without faith this is an ordinary thing.

Having faith in God and living our life according to that faith, is indeed a very difficult task. If we believe in God and love him, then we are obliged to obey his commandments and walk on the path that he shows us, which is very difficult. It's very challenging in today's world to believe and to live according to that faith. We may face discrimination because of our faith we may be persecuted, be led to the courts and falls cases. But Jesus has assured us that we need not to be afraid of such situations rather we have to be strong in our faith cause the Lord is with us to the end of the world. May God grant us the grace to stand strong in our faith and live according to our faith. Amen.



📚 मनन-चिंतन - 2


जब प्रेरितों ने प्रभु से कहा, "हमारा विश्वास बढ़ाइए", तब प्रभु ने उत्तर दिया, "यदि तुम्हारा विश्वास राई के दाने के बराबर भी होता और तुम शहतूत के इस पेड़ से कहते, ‘उखड़ कर समुद्र में लग जा’, तो वह तुम्हारी बात मान लेता।“ ऐसा लगता है कि येसु उनसे कह रहे थे कि जब तुम्हारे पास विश्वास ही नहीं है, तो उसे बढ़ाने की बात कैसे कर रहे हो? जब गाडी चालू ही नहीं है, तो उसकी स्पीड बढ़ाने को कैसे कह सकते हो? थोड़ा-सा विश्वास भी कितने बडे चमत्कार कर सकता है! वास्तव में हमें प्रभु से विश्वास की कृपा मिलने के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। विश्चास ईश्वर की कृपा है। पवित्र बाइबिल कहती है, “सुनने से विश्वास उत्पन्न होता है और जो सुना जाता है, वह मसीह का वचन है”। जब हम प्रभु ईश्वर का वचन सुनते हैं, तब ईश्वर हमारे हृदय में स्वर्गराज का बीज बोता है। वह बीज हमारे हृदय में अंकुरित होता है, बढ़ता है और बहुत फल लाता है। आज के दिन हम यह जाँच करें कि क्या मेरे अन्दर थोड़ा-सा भी विश्वास है, मेरा विश्वास कितना पक्का है, क्या विश्वास की शक्ति को मैं परखता हूँ। लूकस 18:7-8 में प्रभु कहते हैं, “क्या ईश्वर अपने चुने हुए लोगों के लिए न्याय की व्यवस्था नहीं करेगा, जो दिन-रात उसकी दुहाई देते रहते हैं? क्या वह उनके विषय में देर करेगा? मैं तुम से कहता हूँ - वह शीघ्र ही उनके लिए न्याय करेगा। परन्तु जब मानव पुत्र आयेगा, तो क्या वह पृथ्वी पर विश्वास बचा हुआ पायेगा?" मैं यह समझता हूँ कि प्रभु येसु उस बात की ओर संकेत रहे हैं कि आज दुनिया में विश्वास बढ़ नहीं रहा है, बल्कि घट रहा है। यह हमारे लिए चिंता का विषय है।




When the apostles said to Jesus, “Increase our faith” Jesus responded saying, “If you had faith like a mustard seed you could say to this mulberry tree, “Be uprooted and planted in the sea,” it would obey you”. In other words, Jesus seems to say that there is no real basis for asking for an ‘increase’ of faith, when there is no faith at all (not even like a mustard seed). You can ask for an ‘increase’ only when there is something, some base. When a vehicle is still parked in the garage, how can we speak of increasing the speed. In fact, they are supposed to pray for obtaining faith from sources available. Faith is a free gift of God. The Bible says, “So faith comes from what is heard, and what is heard comes through the word of Christ” (Rom 10:17). When we listen to the Word of God, the Lord sows the seed of faith in us. That seed remains in us to grow and produce fruits. In Lk 19:7-8, the Lord says, “And will not God grant justice to his chosen ones who cry to him day and night? Will he delay long in helping them? I tell you, he will quickly grant justice to them. And yet, when the Son of Man comes, will he find faith on earth?” Is there not an indication in the word of the Lord that in today’s society faith is not increasing, but decreasing? We should be concerned about this indication from the Lord.



प्रवचन


हिन्दी में कहावत है, ’’कर्म किये जा फल की चिंता मत कर।’’ लगभग यही बात येसु अपने शिष्यों के निवेदन में बताते है जब वे निवेदन करते हैं, ’’प्रभु हमारा विश्वास बढाईये।’’ येसु इसका सीधा उत्तर न देते हुये उन्हें कर्मठ एवं वफादार सेवक का दृष्टांत सुनाते हैं। इसके द्वारा प्रभु बताते है जब हम अपने उत्तरदायित्व को पूरी तत्परता एवं वफादारी के साथ बिना फल की आशा किये करते हैं तो हमारा विश्वास स्वतः बढता जाता है। विश्वास में किये गये कर्म ही हमारा विश्वास बढाते हैं।

’अशर्फियों का दृष्टांत’ तीन सेवकों की उनके स्वामी द्वारा दी गयी राशि के प्रति प्रतिक्रिया को दर्शाता है। इसमें प्रथम दो सेवकों ने तो दी गयी अशर्फियों से व्यापार कर दुगुना कमाया किन्तु तीसरे ने अपनी निधि को जमीन में गाढ़ कर छिपा दिया था। यह तीसरा सेवक स्वामी द्वारा दी गयी निधि के प्रति ईमानदार है। वह इस अशर्फी का दुरूपयोग नहीं करता और न ही कोई हानि पहुँचाता है। किन्तु यह सदभावना उसे सही ठहाराने के लिये नाकाफी है। स्वामी उसे उसकी इसी अकर्मण्यता के लिये उसे ’निकम्मे सेवक’ कह कर बुलाता है। ’निकम्मे’ शब्द का भावार्थ होता है, ’निष्कर्म’ वह जो कुछ काम न करे। यदि हमारा विश्वास अकर्मण्य हो तो हम भी ’निकम्मे सेवक’ ही माने जायेंगे।

यदि उस तीसरे सेवक को अपनी सदभावना का उचित इस्तेमाल करना था तो उसे भी उसे दी गयी निधि से व्यापार करना चाहिये था। हमारा विश्वास यदि तीसरे सेवक के समान हो तो क्या लाभ! इससे न तो विश्वास बढता है और न ही ऐसे विश्वास से किसी को कोई लाभ ही होता है। बिना अनुकूल कार्यों के विश्वास नगण्य है। ऐसा सुप्त विश्वास हमें बचा नहीं सकता। संत याकूब कहते हैं, ’’यदि कोई यह कहता है कि मैं विश्वास करता हूँ किन्तु उसके अनुसार आचरण नहीं करता, तो इस से क्या लाभ? क्या विश्वास ही उसका उद्धार कर सकता है?... कर्मों के अभाव में विश्वास पूर्ण रूप से निर्जीव होता है।... जिस तरह आत्मा के बिना शरीर निर्जीव है, उसी तरह कर्मों के अभाव में विश्वास निर्जीव है। (याकूब 2:14,17) कार्यों के द्वारा विश्वास को बढाने के हेतु संत पेत्रुस कहते हैं, “जिसे जो वरदान मिला है, वह ईश्वर के बहुविध अनुग्रह के सुयोग्य भण्डारी की तरह दूसरों की सेवा में उसका उपयोग करे। जो प्रवचन देता है, उसे स्मरण रहे कि वह ईश्वर के शब्द बोल रहा है। जो धर्मसेवा करता है वह जान ले कि ईश्वर ही उसे बल प्रदान करता है।” (1 पेत्रुस 4:10-11) इस प्रकार अपने कार्यों को ईश्वर की सेवा में समर्पित करने से हमारा विश्वास नित्य बढता जाता है।

संत लूकस के सुसमाचार में शिष्यगण रातभर मेहनत करने के बाद भी कुछ नहीं पाते हैं। तब येसु उनसे कहते हैं, “नाव को गहरे पानी में ले चलो।” शिष्यों के लिये तो यह आश्चर्य की बात थी। वे थके हुये थे तथा अभी-अभी समुद्र से लौटे थे। ऐसे में प्रभु उनसे दुबारा जाने के लिये कहते हैं। जो भी उनके भाव रहे हो लेकिन वे येसु की बात टाल नहीं सकते थे। नाव को बीच समुद्र में ले जाने पर येसु उनसे एक और अजीब बात कहते हैं, “दायी ओर अपना जाल डालो”। यह सुनकर शायद पेत्रुस का धैर्य जबाव दे गया हो, इसलिये वे कहते हैं, “प्रभु रातभर मेहनत करने पर भी हमें कुछ नहीं मिला, किन्तु आप के कहने पर मैं जाल डालूँगा।” पेत्रुस के प्रभु के अनुदेशनुसार कार्य करने पर उनका जाल मछलियों से भर जाता है। इस प्रकार के परिणाम से शिष्यों में भय छा जाता है वे येसु की प्रभुता को पहचान जाते हैं। पेत्रुस कह उठता है, “प्रभु आप मेरे पास से चले जाइये क्योंकि मैं पापी मनुष्य हूँ।” कार्य करने से विश्वास बढता है। यही बात पेत्रुस और उनके साथियों के साथ भी होती है।

राजाओं के दूसरे ग्रंथ में हम कोढी नामान के बारे में पढते हैं। जब नामान नबी एलीशा के पास चंगाई के लिये जाते हैं तो अपनी पूरी तैयारी के साथ जाते हैं। किन्तु एलीशा उन्हें संदेश के द्वारा केवल कहते हैं, “आप जाकर यर्दन नदी में सात बार स्नान कीजिए। आपका शरीर स्वच्छ हो जायेगा और आप शुद्ध हो जायेंगे।” (2 राजाओं 5:10) किन्तु नामान इस कार्य को तुच्छ समझकर लौटने लगता है। किन्तु सेवकों से समझाने पर वह नबी एलीशा द्वारा निर्देशित कार्य कर शुद्धता प्राप्त करता है। नामान का ईश्वर में विश्वास जब होता तब वह उनके द्वारा निर्देशित कार्य करता है। नामान का इस प्रकार का कार्य उसके विश्वास की अभिव्यक्ति था जो चंगाई के बाद ठोस विश्वास में परिणीत हो जाता है। इस कार्य के बिना न तो उसका विश्वास पनपता और न ही परिपूर्णता तक पहुँचता।

स्कूलों में भी बच्चों को अभ्यास कार्य स्वयं करने के लिए दिया जाता है। जब बच्चा उन कार्यों को स्वयं करता है तो उसमें आत्मविश्वास आता है तथा जितना अधिक वह अभ्यास के कार्यों को करता जाता है उतना अधिक उसमें विश्वास बढता है। यही बात हमारे आध्यात्मिक विश्वास पर भी लागू होती है। जितनी बार हम येसु में विश्वास कर सुसमाचार के अनुसार अपने कार्यों को ढालते हैं उतना ही हम विश्वास में परिपक्व होते जाते हैं। ऐसा निरंतर करने से हम में भी ईश्वर के सेवक होने का भाव आता है। हम अपने जीवन को ईश्वर को समर्पित सेवा में जीकर विनम्र बनते और आगे बढते हैं।


 -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!

25 सितंबर 2022 वर्ष का छ्ब्बीसवाँ इतवार

वर्ष का छ्ब्बीसवाँ इतवार



📒 पहला पाठ : आमोस 6:1,4-7


1) "धिक्कार उन लोगों को, जो सियोन में भोग-विलास का जीवन बितातें हैं! धिक्कार उन्हें, जो समारिया के पर्वत पर अपने को सुरक्षित समझते हैं! तुम, उत्तम राष्ट्र के गण्यमान्य नेताओ! तुम्हारे ही पास इस्त्राएली जनता न्याय के लिए आती है।

2) कलने जा कर देखो तो सही, और फिर वहाँ से महानगर हमात भी चले जाओ; उसके बाद फिलिस्तियों के गत नगर भी जा कर देखो। क्या तुम इन राज्यों से श्रेष्ठतर हो? क्या तुम्हारा देश इनके देश के बड़ा है?

3) अरे, तुम दुर्दिन टालना चाहते हो; टालना तो दूर रहे, तुम हिंसा का शासन समीप ला रहे हो।

4) वे हाथीदांत के पलंगो पर सोते और आराम-कुर्सियों पर पैर फैलाये पडे रहते हैं। वे झुण्ड के मेमरे और बाड़े के बछड़े चट कर जाते हैं।

5) वे सारंगी की ध्वनि पर ऊँचे स्वर में गाते और दाऊद की तरह नये वाद्यों का आविष्कार करते हैं।

6) वे प्याले-पर-प्याला मदिरा पीते और उत्तम सुगन्धित तेल से अपने शरीर का विलेपन करते हैं; किन्तु उन्हें यूसुफ़ के विनाश की चिंता नहीं है।

7) इसलिए उन्हें सब से पहले निर्वासित किया जायेगा।" और उनके भोग-विलास का अन्त हो जायेगा।"



📒 दूसरा पाठ : 1तिमथि 6:11-16


11) ईश्वर का सेवक होने के नाते तुम इन सब बातों से अलग रह कर धार्मिकता, भक्ति, विश्वास, प्रेम, धैर्य तथा विनम्रता की साधना करो।

12) विश्वास के लिए निरन्तर संघर्ष करते रहो और उस अनन्त जीवन पर अधिकार प्राप्त करो, जिसके लिए तुम बुलाये गये हो और जिसके विषय में तुमने बहुत से लोगों के सामने अपने विश्वास का उत्तम साक्ष्य दिया।

13) ईश्वर जो सब को जीवन प्रदान करता है और ईसा मसीह, जिन्होंने पोंतियुस पिलातुस के सम्मुख अपना उत्तम साक्ष्य दिया, दोनों को साक्षी बना कर मैं तुम को यह आदेश देता हूँ।

14) कि हमारे प्रभु ईसा मसीह की अभिव्यक्ति के दिन तक अपना धर्म निष्कलंक तथा निर्दोष बनाये रखो।

15) यह अभिव्यक्ति यथासमय परमधन्य तथा एक मात्र अधीश्वर के द्वारा हो जायेगी। वह राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु है,

16) जो अमरता का एकमात्र स्रोत है, जो अगम्य ज्योति में निवास करता है, जिसे न तो किसी मनुष्य ने कभी देखा है और न कोई देख सकता है। उसे सम्मान तथा अनन्त काल तक बना रहने वाला सामर्थ्य! आमेन!


📒 सुसमाचार : सन्त लूकस 16:19-31


19) "एक अमीर था, जो बैंगनी वस्त्र और मलमल पहन कर प्रतिदिन दावत उड़ाया करता था।

20) उसके फाटक पर लाज़रूस नामक कंगाल पड़ा रहता था, जिसका शरीर फोड़ों से भरा हुआ था।

21) वह अमीर की मेज़ की जूठन से अपनी भूख मिटाने के लिए तरसता था और कुत्ते आ कर उसके फोड़े चाटा करते थे।

22) वह कंगाल एक दिन मर गया और स्वर्गदूतों ने उसे ले जा कर इब्राहीम की गोद में रख दिया। अमीर भी मरा और दफ़नाया गया।

23) उसने अधोलोक में यन्त्रणाएँ सहते हुए अपनी आँखें ऊपर उठा कर दूर ही से इब्राहीम को देखा और उसकी गोद में लाज़रूस को भी।

24) उसने पुकार कर कहा, ‘पिता इब्राहीम! मुझ पर दया कीजिए और लाज़रुस को भेजिए, जिससे वह अपनी उँगली का सिरा पानी में भिगो कर मेरी जीभ ठंडी करे, क्योंकि मैं इस ज्वाला में तड़प रहा हूँ’।

25) इब्राहीम ने उस से कहा, ‘बेटा, याद करो कि तुम्हें जीवन में सुख-ही-सुख मिला था और लाज़रुस को दुःख-ही-दुःख। अब उसे यहाँ सान्त्वना मिल रही है और तुम्हें यन्त्रणा।

26) इसके अतिरिक्त हमारे और तुम्हारे बीच एक भारी गत्र्त अवस्थित है; इसलिए यदि कोई तुम्हारे पास जाना भी चाहे, तो वह नहीं जा सकता और कोई भ़ी वहाँ से इस पार नहीं आ सकता।’

27) उसने उत्तर दिया, ’पिता! आप से एक निवेदन है। आप लाज़रुस को मेरे पिता के घर भेजिए,

28) क्योंकि मेरे पाँच भाई हैं। लाज़रुस उन्हें चेतावनी दे। कहीं ऐसा न हो कि वे भी यन्त्रणा के इस स्थान में आ जायें।’

29) इब्राहीम ने उस से कहा, ‘मूसा और नबियों की पुस्तकें उनके पास है, वे उनकी सुनें‘।

30) अमीर ने कहा, ‘पिता इब्राहीम! वे कहाँ सुनते हैं! परन्तु यदि मुरदों में से कोई उनके पास जाये, तो वे पश्चात्ताप करेंगे।’

31) पर इब्राहीम ने उस से कहा, ‘जब वे मूसा और नबियों की नहीं सुनते, तब यदि मुरदों में से कोई जी उठे, तो वे उसकी बात भी नहीं मानेंगे’।’



📚 मनन-चिंतन


हमारा समय, ध्यान और दिल किन बातो के बारे में सबसे ज्यादा सोचता है? लाजरूस और अमीर आदमी के दृष्टांत में येसु ने जीवन के दर्दनाक, नाटकीय पहलुओं और इसके विरोधाभासों को इंगित किया है - धन और गरीबी, स्वर्ग और नरक, करुणा और उदासीनता, समावेश और बहिष्कार।

इन दोनों के जीवन में अचानक और नाटकीय उलटफेर भी होता है। लाजरूस न केवल गरीब था बल्कि अक्षम भी था। ऐसा कहा जाता है कि उन्हें अमीर आदमी के घर के द्वार पर "लेटा" दिया जाता था। जो कुत्ते उसके घावों को चाटते थे, वे शायद अपने लिए मिली छोटी-सी रोटी भी उससे छीन कर खा लेते थे। वह बहुत ही दयनीय जीवन व्यतीत कर रहा था। अमीर आदमी का भिखारी के प्रति रवैया तब तक उदासीन रहा जब तक कि उसने अपनी किस्मत को उलट नहीं पाया! दुर्भाग्य और पीड़ा के जीवन के बावजूद, लाजरूस ने परमेश्वर में आशा नहीं खोई। उसकी नज़र स्वर्ग में उसके लिए जमा किए गए ख़ज़ाने पर टिकी थी। हालाँकि, धनी व्यक्ति अपने सांसारिक खजाने से आगे नहीं देख सकता था। उसके पास न केवल वह सब कुछ था जिसकी उसे आवश्यकता थी, बल्कि वह अपने एशो आराम में भी लिप्त था। वह अपनी विलासिता की पार्टियों में इतना अधिक व्यस्त था कि उसने अपने आसपास के लोगों की जरूरतों पर कभी ध्यान नहीं दिया। उसने ईश्वर और स्वर्ग के खजाने पर से अपनी दृष्टि खो दी क्योंकि वह भौतिक चीजों में खुशी तलाशने में व्यस्त था। उसने ईश्वर के बजाय धन की सेवा की। आखिर में अमीर भिखारी बन गया ! क्या हम ईश्वर को अपने एकमात्र खजाने के रूप में रखने के आनंद और स्वतंत्रता को जानते हैं? भला प्रभु उनके लिए और उनकी खुशी के तरीकों के लिए हमारी भूख को बढ़ाए। वह हमें स्वर्ग की वस्तुओं में धनी बना दे और हमें एक उदार हृदय प्रदान करे कि हम उस खजाने को दूसरों के साथ स्वतंत्र रूप से साझा कर सकें जो उसने हमें दिया है।




📚 REFLECTION


What most occupies our time, attention, and our heart? In the parable of Lazarus and the rich man Jesus points out painful yet dramatic aspects of life and its contrasts -- riches and poverty, heaven and hell, compassion and indifference, inclusion and exclusion.

There also comes an abrupt and dramatic reversal of fortune. Lazarus was not only poor but incapacitated. It is said that he was "laid" at the gates of the rich man's house. The dogs which licked his sores probably also stole the little bread he got for himself. He was living in a very miserable state of life. The rich man’s attitude towards the beggar was indifferent until he found his fortunes reversed! Despite a life of misfortune and suffering, Lazarus did not lose hope in God. His eyes were set on a treasure stored up for him in heaven. The rich man, however, could not see beyond his material treasure. He not only had everything he needed, but he also indulged in his wealth. He was too much preoccupied with his pleasure parties that he never noticed the needs of those around him. He lost sight of God and the treasure of heaven because he was preoccupied with seeking happiness in material things. He served wealth rather than God. In the end, the rich man became a beggar! Do we know the joy and freedom of possessing God as our only treasure? May the good Lord increase our hunger for him and for his ways of happiness. May he make us rich in the things of heaven and give us a generous heart that we may freely share with others the treasure he has given to us



📚 मनन-चिंतन-2


इस दुनिया में हमारा जीवन 70 या 80 साल का होता है (देखें स्तोत्र 90:10)। अगर कोई 100 वर्ष पार करता है तो हम उसे आश्चर्यजनक मानते हैं। पवित्र ग्रन्थ कहता है, “यदि मनुष्य की आयु एक सौ वर्ष है, तो वह बहुत मानी जाती है; किन्तु अनन्त काल की तुलना में ये थोड़े वर्ष समुद्र में बूँद की तरह, रेतकण की तरह हैं” (प्रवक्ता 18:8)। इस दुनिया में हमारे जीवन-काल की तुलना परलोक में हमारे जीवन-काल से करते हुए पवित्र वचन हमें बताता है कि परलोक में हमारा जीवन-काल समुद्र के समान है जबकि इस दुनिया में हमारा जीवन-काल पानी की एक बूँद के समान है। गौरतलब है, हमें परलोक के जीवन पर ज़्यादा ध्यान देना चाहिए। इस दुनिया में हमारा जीवन-काल परलोक के जीवन की तैयारी का समय है। इसलिए हमें सतर्कता तथा ईमानदारी से परलोक के जीवन की तैयारी करनी चाहिए। अमीर और लाज़रूस के दृष्टान्त में अमीर व्यक्ति इस लोक में रहते समय बैंगनी व मलमल के वस्त्र, स्वादिष्ट भोजन, विशाल तथा सुन्दर घर और अपने मनोरंजन पर ध्यान देते हुए एक आलीशान ज़िन्दगी बिताता है। वह परलोक को भूल कर इस दुनिया की सुख-सुविधाओं पर ही ध्यान देता है। उसे मार्गदर्शन देने के लिए पवित्र ग्रन्थ भी उपल्ब्ध था, परन्तु उसने उस पर भी ध्यान नहीं दिया। मरने के बाद ही उसे अपनी बेवकूफ़ी का एहसास हुआ, तब तक तो वह अस्सहाय बन जाता है। वह न तो अपनी और न ही अपनों की मदद कर पाता है। इस लोक में रहते समय परलोक के जीवन के लिए तैयारी करना ही समझदारी है।




Our life-span is 70 to 80 years (cf. Ps 90:10). If, by chance, we cross 100 years, it is considered as something amazing. The Word of God tells us, “The number of a man’s days is great if he reaches a hundred years. Like a drop of water from the sea and a grain of sand so are a few years in the day of eternity” (Sir 18:9-10). Our eternal life-span is compared to an ocean while our earthly life-span is like a drop of water. In the parable of the rich man and Lazarus (Lk 16:19-31), we find the rich man caring for sumptuous meals, luxurious clothing and material pleasures and he is thus engrossed in this world losing sight of the eternal life. He has the Scriptures to guide him to his destination, but he does not bother to pay attention to the guidance given by the Word of God. Only after his death his folly is revealed and he realizes that he has caused irreparable damage to himself. Now, he is not able to rectify the situation, nor is he capable of coming to the aid of those whom he loves. The wisdom of the Word of God reminds us to be wise while living in the world and prepare for the life to come.



📚 प्रवचन


पवित्र बाइबिल में उपस्थित चारों पवित्र सुसमाचार ही अनौखे हैं| प्रत्येक सुसमाचार की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं| सन्त लूकस के अनुसार सुसमाचार में हमें कुछ ऐसे दृष्टान्त मिलते हैं जो दूसरे सुसमाचारों में नहीं मिलते| उन्हीं में से एक है धनी व्यक्ति और दरिद्र लाजरुस का दृष्टान्त| यह दृष्टान्त विभिन्न संदेशों से भरा हुआ है| इस दृष्टान्त का प्रत्येक पात्र, प्रत्येक घटना, प्रत्येक दृश्य बहुत कुछ सन्देश देता है| पिछले रविवार को हमने प्रभु येसु के इन शब्दों पर मनन-चिंतन किया था कि झूठे धन से अपने लिये मित्र बना लो ताकि वे परलोक में तुम्हारा स्वागत करें| हममें से किसी ने भी परलोक के दर्शन नहीं किये हैं, क्योंकि जो परलोक जाता है वह वापस लौटकर नहीं आता, लेकिन प्रभु येसु हमें उस लोक की झलक दिखाते हैं| आज के सुसमाचार से हमें पता चलता है कि ईश्वर सबका हिसाब चुकाते हैं| आईये आज के इस दृष्टान्त को एवं उसके सन्देश को हम गहराई से समझें|

यह दृष्टान्त एक अमीर व्यक्ति के उल्लेख से शुरू होता है जो बैंगनी वस्त्र और मलमल पहनकर प्रतिदिन दावत बुलाया करता था| बैंगनी वस्त्र शाही अंदाज़ को बयाँ करता है| जब सैनिक लोग प्रभु येसु को राजा बनाकर उनका उपहास करते थे तो उन्हें बैंगनी वस्त्र पहना देते थे| (मारकुस 15:17)| यह बैंगनी वस्त्र कोई साधारण लोगों का वस्त्र नहीं था| सामान्य लोग सस्ते, सूती वस्त्र पहनते थे, लेकिन जो महँगे वस्त्र खरीद सकते थे, वे ही बैंगनी और मलमल के कपड़े पहनते थे| यानि कि वह व्यक्ति बहुत धनी था, क्योंकि वह प्रतिदिन दावत बुलाया करता था| आश्चर्यजनक बात यह है कि उस धनी व्यक्ति का कोई नाम तक नहीं बताया गया है जबकि पवित्र बाइबिल के अनुसार किसी के नाम का बहुत महत्व है| इस व्यक्ति का नाम शायद इसलिए नहीं बताया गया कि स्वर्ग में नामी-गिरामी लोग भी गुमनाम हो जाते हैं, और पृथ्वी पर गुमनाम लोग भी स्वर्ग में नामी-गिरामी लोग हो जाते हैं|

इस कहानी का दूसरा पात्र लाज़रुस नामक कंगाल व्यक्ति है जो उस धनी व्यक्ति के फाटक पर पड़ा रहता था| एक कंगाल का नाम बताया गया है लेकिन एक धनी का नाम तक कोई मायने नहीं रखता| वह कंगाल भूख से तडपता था, फोड़ों के कारण कष्ट में था, और कुत्ते उसके घावों को चाटते थे, यानि कि वे घाव सूखकर भरने, या ठीक होने की बजाय हमेशा ताज़ा बने रहते थे, और उसका दर्द कभी कम नहीं होता था| वहीँ दूसरी ओर धनी व्यक्ति के साथ एकदम उल्टा था, वह रोज दावत उड़ाया करता था, उसके शरीर को अपार सुख था, कोई चिंता, दुःख या परेशानी नहीं थी| ना लाज़रुस को उससे कोई शिकायत थी और न उसे लाज़रुस से कोई लेना-देना बल्कि वह तो उस कंगाल को अपने फाटक पर पड़े रहने देता था| लेकिन जब दोनों परलोक जाते हैं, तो लाज़रुस को आराम मिलता है और धनी को कष्ट| आखिर लाज़रुस को किस कारण पिता इब्राहीम की गोद में बैठने का सौभाग्य मिला और धनी व्यक्ति को किस बात की सज़ा मिली?

पवित्र कलीसिया हमें सिखाती है कि पाप के अनेक प्रकारों में से दो प्रकार ये भी हैं – हमारे आचरण से होने वाले पाप और हमारे अनाचरण से होने वाले पाप (Sins of commission and sins of omission)| यानि कि एक वे पाप जो हमारे कुछ गलत करने के कारण होते हैं और दूसरे वे पाप जो हमारे कुछ भला नहीं करने के कारण होते हैं| हमें न केवल अपने आप को गलत करने से रोकना है बल्कि हमें भला भी करते रहना है| कभी-कभी हम सोचते हैं कि हम तो कुछ गलत नहीं कर रहे इसलिए ईश्वर हमें दण्ड नहीं देंगे। लेकिन हम भूल जाते हैं कि हमें जो भला करना चाहिए अगर वह नहीं करते हैं तो भी हम पाप करते हैं| उस अमीर व्यक्ति को इसी बात की सज़ा मिली कि उसने अपनी ज़िन्दगी में अपने धन-दौलत और ऐशो-आराम का भरपूर मज़ा लिया लेकिन एक दरिद्र, दुखी और लाचार के बारे में कोई परवाह नहीं की| अगर ईश्वर ने हमें धन-दौलत और आरामदायक जीवन दिया है तो न केवल हमें उसके लिए ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए बल्कि दीन-दुखियों के लिए भी उस धन-दौलत का उपयोग करना चाहिए|

लाज़रुस ने कष्ट उठाया इसलिए उसे परलोक में सांत्वना मिली| प्रभु येसु ने स्वयं वादा किया है - “धन्य हैं वे जो शोक करते हैं, उन्हें सांत्वना मिलेगी| (मत्ती 5:5)| इस दृष्टान्त के दोनों पात्रों में से मैं कौन हूँ- वह धनी व्यक्ति जिसे ईश्वर ने सुखमय जीवन दिया है और जो दूसरों की परवाह नहीं करता या वह कंगाल जो अपने कष्ट और परेशानी में भी ईश्वर पर भरोसा रखता है और परलोक में सांत्वना पाने का पात्र बन जाता है?


 -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!

18 सितंबर 2022 वर्ष का पच्चीसवाँ इतवार

 

18 सितंबर 2022

वर्ष का पच्चीसवाँ इतवार



📒 पहला पाठ : आमोस 8:4-7


4) तुम लोग मेरी यह बात सुनो, तुम जो दीन-हीन को रौंदते हो और देश के गरीबों को समाप्त कर देना चाहते हो।

5) तुम कहते हो, "अमावस का पर्व कब बीतेगा, जिससे हम अपना अनाज बेच सकें ? विश्राम का दिन कब बीतेगा, जिससे हम अपना गेहूँ बेच सकें? हम अनाज की नाप छोटी कर देंगे, रुपये का वजन बढ़ायेंगे और तराजू को खोटा बनायेंगे।

6) हम चाँदी के सिक्के से दरिद्र को खरीद लेंगे और जूतों की जोड़ी के दाम पर कंगाल को। हम गेहूँ का कचरा तक बेच देंगे।"

7) प्रभु याकूब के अहँ का शपथ खा कर कहता है- "तुम लोगों ने जो कुछ किया, मैं वह सब याद रखूँगा।

8) क्या यह सुन कर धरती नहीं काँप उठेगी? क्या उसके सब निवासी विलाप नहीं करेंगे? सारी पृथ्वी नील नदी की बाढ़ की तरह हिलोरित हो उठेगी और फिर मिस्र की नील नदी की तरह शान्त हो जायेगी।"


📒 दूसरा पाठ : 1 तिमथि 2:1-8


1 (1-2) मैं सब से पहले यह अनुरोध करता हूँ कि सभी मनुष्यों के लिए, विशेष रूप से राजाओं और अधिकारियों के लिए, अनुनय-विनय, प्रार्थना निवेदन तथा धन्यवाद अर्पित किया जाये, जिससे हम भक्ति तथा मर्यादा के साथ निर्विघ्न तथा शान्त जीवन बिता सकें।

3) यह उचित भी है और हमारे मुक्तिदाता ईश्वर को प्रिय भी,

4) क्योंकि वह चाहता है कि सभी मनुष्य मुक्ति प्राप्त करें और सत्य को जानें।

5) क्योंकि केवल एक ही ईश्वर है और ईश्वर तथा मनुष्यों के केवल एक ही मध्यस्थ हैं, अर्थात् ईसा मसीह,

6) जो स्वयं मनुष्य हैं और जिन्होंने सब के उद्धार के लिए अपने को अर्पित किया। उन्होंने उपयुक्त समय पर इसके सम्बन्ध में अपना साक्ष्य दिया।

7) मैं सच कहता हूँ, झूठ नहीं बोलता। मैं इसी का प्रचारक तथा प्रेरित, गैर-यहूदियों के लिए विश्वास तथा सत्य का उपदेशक नियुक्त हुआ हूँ।

8) मैं चाहता हूँ कि सब जगह पुरुष, बैर तथा विवाद छोड़ कर, श्रद्धापूर्वक हाथ ऊपर उठा कर प्रार्थना करें।


📒सुसमाचार : सन्त लूकस 16:1-13


1) ईसा ने अपने शिष्यों से यह भी कहा, "किसी धनवान् का एक कारिन्दा था। लोगों ने उसके पास जा कर कारिन्दा पर यह दोष लगाया कि वह आपकी सम्पत्ति उड़ा रहा है।

2) इस पर स्वामी ने उसे बुला कर कहा, ‘यह मैं तुम्हारे विषय में क्या सुन रहा हूँ? अपनी कारिन्दगरी का हिसाब दो, क्योंकि तुम अब से कारिन्दा नहीं रह सकते।’

3) तब कारिन्दा ने मन-ही-मन यह कहा, ‘मै क्या करूँ? मेरा स्वामी मुझे कारिन्दगरी से हटा रहा है। मिट्टी खोदने का मुझ में बल नहीं; भीख माँगने में मुझे लज्जा आती है।

4) हाँ, अब समझ में आया कि मुझे क्या करना चाहिए, जिससे कारिन्दगरी से हटाये जाने के बाद लोग अपने घरों में मेरा स्वागत करें।’

5) उसने अपने मालिक के कर्ज़दारों को एक-एक कर बुला कर पहले से कहा, ’तुम पर मेरे स्वामी का कितना ऋण है?’

6) उसने उत्तर दिया, ‘सौ मन तेल’। कारिन्दा ने कहा, ‘अपना रुक्का लो और बैठ कर जल्दी पचास लिख दो’।

7) फिर उसने दूसरे से पूछा, ‘तुम पर कितना ऋण है?’ उसने कहा, ‘सौ मन गेंहूँ। कारिन्दा ने उस से कहा, ‘अपना रुक्का लो और अस्सी लिख दो’।

8) स्वामी ने बेईमान कारिन्दा को इसलिए सराहा कि उसने चतुराई से काम किया; क्योंकि इस संसार की सन्तान आपसी लेन-देन में ज्योति की सन्तान से अधिक चतुर है।

9) "और मैं तुम लोगों से कहता हूँ, झूठे धन से अपने लिए मित्र बना लो, जिससे उसके समाप्त हो जाने पर वे परलोक में तुम्हारा स्वागत करें।

10) "जो छोटी-से-छोटी बातों में ईमानदार है, वह बड़ी बातों में भी ईमानदार है और जो छोटी-से-छोटी बातों बेईमान है, वह बड़ी बातों में भी बेईमान है।

11) यदि तुम झूठे धन में ईमानदार नहीं ठहरे, तो तुम्हें सच्चा धन कौन सौंपेगा?

12) और यदि तुम पराये धन में ईमानदार नहीं ठहरे, तो तुम्हें तुम्हारा अपना धन कौन देगा?

13) "क़ोई भी सेवक दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता; क्योंकि वह या तो एक से बैर और दूसरे से प्रेम करेगा, या एक का आदर और दूसरे का तिरस्कार करेगा। तुम ईश्वर और धन-दोनों क़ी सेवा नहीं कर सकते।"


📒मनन-चिंतन


सन 258 ईस्वी में जब सन्त पापा सिक्स्तुस द्वितीय सन्त पापा थे तो उस समय उपयाजक सन्त लॉरेंस कलीसिया की धन-सम्पत्ति के प्रबन्धक थे। अगस्त 258 में रोमी सम्राट वेलेरियन ने राजाज्ञा निकाली कि समस्त धर्माध्यक्षों, पुरोहितों, उपयाजकों एवं कलीसिया के अधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया जाये और कलीसिया की सारी संपत्ति को राजकोष में शामिल कर लिया जाये। कलीसिया की सारी संपत्ति के प्रबन्धक होने के कारण सन्त लॉरेंस को सम्राट के समक्ष हाजिर किया गया। सन्त लॉरेंस ने सम्राट से कहा, “हुजुर, मुझे तीन दिन का समय दीजिये, मैं कलीसिया की सारी सम्पत्ति आपको सौंप दूंगा।” राजा ने समय दे दिया। सन्त लॉरेंस ने कलीसिया की सारी धन सम्पत्ति दरिद्रों, अनाथों, विधवाओं, बूढ़े, लाचार-बीमारों में बाँट दी। तीन दिन बाद वे उन सभी के साथ फिर राजा के दरबार में प्रस्तुत हुए, और दरिद्रों, अनाथों, विधवाओं, बूढ़े, लाचार-बीमारों को आगे करते हुए कहा, “ले लीजिये, यही है कलीसिया की सारी धन-सम्पत्ति।”

यह बात हमें भले ही थोड़ी सी अटपटी लगे, लेकिन ईश्वर के राज्य में सच्ची धन-संपत्ति यही निराश्रित, दरिद्र, अनाथ आदि हैं। आज की दुनिया में हम देखते हैं कि मनुष्य जीवन की भाग-दौड़ में बड़ा व्यस्त है। उसकी इच्छाएं असीम हैं। अगर उसने दो पैसे कमाये हैं तो वह उसे बढ़ा कर चार पैसे करना चाहेगा। उसी तरह अगर किसी ने एक लाख रूपये कमाये हों, और ये उसके लिए पर्याप्त हों लेकिन फिर भी उसे और अधिक कमाने की ललक रहती है। इन्सान के लालची स्वभाव का जीता-जागता उदाहरण हमें इसी बात में मिलता है कि अगर एक व्यक्ति अच्छी सरकारी नौकरी करता है, और 35-40 हज़ार तक वेतन लेता है, सारी सरकारी सुविधाएँ लेता है, उसके बावजूद कई बार ऐसी घटनाएँ देखने को मिलती हैं जब वही व्यक्ति 5-7 हजार तनख्वाह पाने वाले व्यक्ति का काम करवाने के एवज में हज़ार-दो हज़ार रूपये ऐंठ लेता है। क्या उसकी तनख्वाह उसके लिए पर्याप्त नहीं है? लेकिन फिर भी वह लालची और भ्रष्ट क्यों है? क्योंकि जब तक हमारी एक इच्छा पूरी नहीं होती तब तक दूसरी जन्म ले लेती है। और इन्ही इच्छाओ की पूर्ती करते-करते एक दिन हम मर जाते हैं। उपदेशक ग्रन्थ हमें बताता है- “जिसे पैसा प्रिय है, वह हमेशा और (अधिक) पैसा चाहता है। जिसे सम्पत्ति प्रिय है, वह कभी अपनी आमदनी से संतुष्ट नहीं होता है। यह भी व्यर्थ है।” (उपदेशक-ग्रन्थ 5:9)। क्या यह सब धन-दौलत हमारे साथ जायेगा? वास्तव में सच्चाई यही है कि यह सब इस पृथ्वी पर मूल्यवान होगा लेकिन स्वर्ग में इसका कोई मोल नहीं है।

जब हम विदेश जाते हैं, तो उस देश की मुद्रा की हमें ज़रूरत पड़ती है। उदाहरण के लिए यदि एक व्यक्ति भारत से अमरीका जाता है तो उसे अमरीका में उपयोग करने के लिए वहाँ की मुद्रा चाहिए, इसके लिए भारत की मुद्रा ‘रूपये’ को अमरीका की मुद्रा ‘डॉलर’ में परिवर्तित करना पड़ेगा। वहाँ रूपये का कोई उपयोग नहीं। हम पृथ्वी पर कुछ ही समय के लिए आते हैं, हमारा वास्तविक निवास, स्थायी स्वदेश स्वर्ग ही है। स्वर्ग की मुद्रा यहाँ पृथ्वी की मुद्रा से भिन्न है। स्वर्ग में हमारा पुण्य, हमारी भलाई, हमारी अच्छाई वहाँ की मुद्रा बन जाते हैं। हमें यहाँ की धन-दौलत को स्वर्ग की धन-दौलत में बदलना होगा। इसलिए प्रभु येसु कहते हैं, “...झूठे धन से अपने लिये मित्र बना लो, जिससे उसके समाप्त हो जाने पर वे परलोक में तुम्हारा स्वागत करें।” (लूकस 16:9)। इस पृथ्वी का धन झूठा है, सच्ची दौलत तो स्वर्ग की दौलत है। हमारी भलाई और उद्दार इसी में है कि हम उसी दौलत को कमायें और स्वर्ग में जमा करें। “स्वर्ग में अपने लिए पूँजी जमा करो, जहाँ न तो मोरचा लगता है, न कीड़े खाते हैं और न चोर सेंध लगाकर चुराते हैं।” (मत्ती 6:20)।

अब मन में सवाल उठेगा कि स्वर्ग में हम अपने लिए धन-दौलत कैसे जमा कर सकते हैं? छोटी-छोटी बातों में इमानदार रहकर भूखों को भोजन खिलाकर, प्यासे को पानी पिलाकर, निराश्रितों को आश्रय देकर, जिनके पास कपड़े नहीं हैं, उन्हें कपड़े पहनाकर, बीमारों से भेंट कर एवं उनकी सेवा करके, बंदियों से मिलकर उनकी हिम्मत बंधा कर, क्योंकि इसी आधार पर हमारी स्वर्गीय पूँजी का मूल्यांकन होगा। (देखें मत्ती 25:35)। या अगर सीधे-सीधे बोलें तो दुनिया की धन-दौलत को दूसरों की भलाई में लगाकर पुण्य कमायें वही हमारी सबसे बड़ी पूँजी होगी। हम चाहे कितने भी धनवान हों लेकिन यदि उस धन का उपयोग हम स्वर्गीय दौलत कमाने के लिए नहीं करते तो वह व्यर्थ है। धनी युवक की कहानी (मत्ती 19:16-22) भी हमें यही सिखाती है। उस धनी युवक के साथ-साथ प्रभु येसु हमसे भी यही कहते हैं, “यदि तुम पूर्ण होना चाहते हो, तो जाओ, अपनी सारी संपत्ति बेचकर गरीबों को दे दो और स्वर्ग में तुम्हारे लिए पूँजी रखी रहेगी। तब आकर मेरा अनुसरण करो।” (मत्ती 19:21)।



 -Br. Biniush Topno


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