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21 अगस्त 2022 वर्ष का इक्कीसवाँ इतवा

 

21 अगस्त 2022

वर्ष का इक्कीसवाँ इतवार



📒 पहला पाठ : इसायाह का ग्रन्थ 66:18-21

18) “मैं सभी भाषाओं के राष्ट्रों को एकत्र करूँगा। वे मेरी महिमा के दर्शन करने आयेंगे।

19) मैं उन में एक चिन्ह प्रकट करूँगा। जो बच गये होंगे, उन में से कुछ लोगों को मैं राष्ट्रों के बीच भेजूँगा- तरशीश, पूट, धनुर्धारी लूद, तूबल, यूनान और उन सुदूर द्वीपों को, जिन्होंने अब तक न तो मेरे विषय में सुना है और न मेरी महिमा देखी है। उन राष्ट्रों में वे मेरी महिमा प्रकट करेंगे।

20) वे प्रभु की भेंटस्वरूप सभी राष्ट्रों में से तुम्हारे सब भाइयों को ले आयेंगे।“ प्रभु कहता है, “जिस तरह इस्राएली शुद्ध पात्रों में चढ़ावा लिये प्रभु के मन्दिर आते हैं, उसी तरह वे उन्हें घोड़ों, रथों, पालकियों, खच्चरों और साँड़नियों पर बैठा कर मेरे

21) मैं उन मे से कुछ को याजक बनाऊँगा और कुछ लोगों को लेवी।“ यह प्रभु का कहना है।

📒 दूसरा पाठ : इब्रानियों 12:5-7,11-13

5) क्या आप लोग धर्मग्रन्थ का यह उपदेश भूल गये हैं, जिस में आप को पुत्र कह कर सम्बोधित किया गया है? -मेरे पुत्र! प्रभु के अनुशासन की उपेक्षा मत करो और उसकी फटकार से हिम्मत मत हारो;

6) क्योंकि प्रभु जिसे प्यार करता है, उसे दण्ड देता है और जिसे पुत्र मानता है, उसे कोड़े लगाता है।

7) आप जो कष्ट सहते हैं, उसे पिता का दण्ड समझें, क्योंकि वह इसका प्रमाण है, कि ईश्वर आप को पुत्र समझ कर आपके साथ व्यवहार करता है। और कौन पुत्र ऐसा है, जिसे पिता दण्ड नहीं देता?

11) जब दण्ड मिल रहा है, तो वह सुखद नहीं, दुःखद प्रतीत होता है; किन्तु जो दण्ड द्वारा प्रशिक्षित होते हैं, वे बाद में धार्मिकता का शान्तिप्रद फल प्राप्त करते हैं।

12) इसलिए ढीले हाथों तथा शिथिल घुटनों को सबल बना लें।

13) और सीधे पथ पर आगे बढ़ते जायें, जिससे लंगड़ा भटके नहीं, बल्कि चंगा हो जाये।

📙 सुसमाचार : लूकस 13:22-30

22) ईसा नगर-नगर, गाँव-गाँव, उपदेश देते हुए येरूसालेम के मार्ग पर आगे बढ़ रहे थे।

23) किसी ने उन से पूछा, "प्रभु! क्या थोड़े ही लोग मुक्ति पाते हैं?’ इस पर ईसा ने उन से कहा,

24) "सँकरे द्वार से प्रवेश करने का पूरा-पूरा प्रयत्न करो, क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ - प्रयत्न करने पर भी बहुत-से लोग प्रवेश नहीं कर पायेंगे।

25) जब घर का स्वामी उठ कर द्वार बन्द कर चुका होगा और तुम बाहर रह कर द्वार खटखटाने और कहने लगोगे, ’प्रभु! हमारे लिए खोल दीजिए’, तो वह तुम्हें उत्तर देगा, ’मैं नहीं जानता कि तुम कहाँ के हो’।

26) तब तुम कहने लगोगे, ’हमने आपके सामने खाया-पीया और आपने हमारे बाज़ारों में उपदेश दिया’।

27) परन्तु वह तुम से कहेगा, ’मैं नहीं जानता कि तुम कहाँ के हो। कुकर्मियो! तुम सब मुझ से दूर हटो।’

28) जब तुम इब्राहीम, इसहाक, याकूब और सभी नबियों को ईश्वर के राज्य में देखोगे, परन्तु अपने को बहिष्कृत पाओगे, तो तुम रोओगे और दाँत पीसते रहोगे।

29) पूर्व तथा पश्चिम से और उत्तर तथा दक्षिण से लोग आयेंगे और ईश्वर के राज्य में भोज में सम्मिलित होंगे।

30) देखो, कुछ जो पिछले हैं, अगले हो जायेंगे और कुछ जो अगले हैं, पिछले हो जायेंगे।"

📚 मनन-चिंतन

हम में से अधिकांश लोग धार्मिकता के फल को पसंद तो करते हैं लेकिन अनुशासन के दर्द के बिना। फिर भी धर्मग्रंत कहता है कि हमें ईश्वर और दूसरों से प्रेम करने के लिए अनुशासन सीखना चाहिए। यह केवल अनुशासन जो ईश्वर के प्रति वफादार रहने की कोशिश में मददगार है। यह हमें उन दर्दों को गले लगाने में मदद करेगा जो अंततः आनंद की ओर ले जाते हैं। हमारे अच्छे इरादे मायने नहीं रखते। यहूदी धार्मिक नेताओं ने बाहरी कृत्यों पर जोर दिया। दूसरी ओर, येसु ने आंतरिक विश्वास पर बल दिया। यहूदी धर्मगुरुओं ने कर्म पर जोर दिया जबकि येसु ने विश्वास करने पर जोर दिया। जबकि मुक्ति ईश्वर का एक उपहार है, इसके लिए हमारे गंभीर प्रयास, हमारे तत्काल ध्यान और हमारी सावधानीपूर्वक आत्मचिंतन की आवश्यकता होती है। येसु के अनुसार, आत्मिक मामलों में आत्मप्रबंचना लोगों को ईश्वर के राज्य से बंचित रखता है। इस रविवार का संदेश हमें स्वयं की विफलताओं को देखने और जानने के बावजूद ईश्वर के प्रति वफादार रहने का प्रयास जारी रखने के लिए एक प्रोत्साहन है।



📚 REFLECTION


Most of us prefer the fruit of righteousness but without the pain of discipline. Yet the Scripture tells that we must learn discipline in order to love God and others. It is only discipline learned in trying to be faithful to God that will help us embrace the pains that ultimately lead to joy. Our good intentions don’t count. The Jewish religious leaders emphasized outward acts. Jesus, on the other hand, emphasized inward faith. The Jewish religious leaders emphasized doing while Jesus emphasized believing. While salvation is a gift of God, it requires our earnest effort, our urgent attention, and our careful self-examination. According to Jesus, self-deception in spiritual matters has the potential to exclude people from God’s Kingdom. The message of this Sunday is an encouragement to keep on striving to be faithful to God, even when we can see and know our own failures.


📙 मनन-चिंतन -2


नये व्यवस्थान के चारों सुसमाचारों में से दो सुसमाचारों में प्रभु येसु की वंशावली का वर्णन है, जिसमें सन्त लूकस आदम से लेकर प्रभु येसु तक की वंशावली का वर्णन करते हैं (लूकस 3:23-38) जबकि सन्त मत्ती प्रभु येसु की वंशावली को धर्म-पिता इब्राहीम से प्रारम्भ करते हैं (मत्ती 1:1-16)। इसमें कोई दो राय नहीं कि इब्राहीम को हम अपने विश्वास के पिता के रूप में मानते हैं क्योंकि ईश्वर ने उनके उनके देश, कुटुम्ब आदि को छोड़कर बुलाया और वे अपना सब कुछ छोड़कर ईश्वर के बुलाबे के अनुसार सब कुछ छोड़कर प्रतिज्ञात देश के लिए रवाना हुए। (देखें इब्रानियों के नाम पत्र 11:8-19)। ईश्वर ने इब्राहीम से प्रतिज्ञा की कि वह इब्राहीम को राष्ट्रों का पिता बनाएगा और उसके द्वारा पृथ्वी भर के वंश आशीर्वाद प्राप्त करेंगे (उत्पत्ति 12:4)। ईश्वर ने उसके साथ एक विधान ठहराया, और वही विधान बाद में इसहाक, याकूब व आने वाली पीढ़ियों के साथ भी दुहराया और वह विधान यह था कि ईश्वर सदा उनका ईश्वर बना रहेगा और वे उसकी प्रिय प्रजा बने रहेंगे, ईश्वर सदा उनकी रक्षा करेगा और उन्हें संभालेगा, बदले में उनकी चुनी हुई प्रजा सदा ईश्वर को ही अपना प्रभु मानेंगे और उसकी आज्ञाओं का पालन करेंगे। मानव इतिहास और मुक्ति इतिहास इस बात के साक्षी हैं कि ईश्वर ने कभी अपने विधान की प्रतिज्ञाओं को नहीं तोडा, बल्कि मनुष्य ने ही ईश्वर की आज्ञाओं की अवेहलना की और ईश्वर के रास्ते से भटक गया। पुराने व्यवस्थान में प्रभु ने इस्राएल को अपनी चुनी हुई प्रजा बनाया था, और नये व्यवस्थान में ईश्वर की वही चुनी हुई प्रजा नया इस्राएल अर्थात् प्रभु येसु में विश्वास करने वाले उनके अनुयायी हैं।

हमारी धर्मशिक्षा हमें सिखाती है कि जब हम प्रभु येसु में बप्तिस्मा ग्रहण करते हैं तो हम उसी ईश्वरीय प्रजा के सदस्य बन जाते हैं; हम चुने हुए लोगों में सम्मिलित हो जाते हैं। हम प्रभु येसु के कलवारी के बलिदान के फल के सहभागी बन जाते हैं, इसी सहभागिता पर हम गर्व करते हैं। लेकिन अगर हम प्रभु येसु की मुक्ति के सहभागी बनते हैं तो हमारी भी कुछ जिम्मेदारी बनती है। ईश्वर द्वारा ठहराये हुए विधान में दो पक्षकार हैं- एक स्वयं ईश्वर और दूसरा उनकी चुनी हुई प्रजा। दोनों ही पक्षों को अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभानी है, तभी वह विधान सफल माना जायेगा। नये विधान की शर्ते पुराने विधान की शर्तों से अलग नहीं हैं, लेकिन क्या हम ईश्वर के उस विधान की शर्तों का पालन कर पाते हैं?

भले ही प्रभु येसु ने क्रूस पर पूरी दुनिया के लिए अपने प्राण न्यौछावर किये हों, और संसार के सब लोगों को मुक्ति प्रदान की है, लेकिन आज की दुनिया में हम अगर नज़र दौडायें तो हम भी आज के सुसमाचार में शिष्यों की तरह प्रभु से पूछ उठेंगे, “प्रभु क्या थोड़े ही लोग मुक्ति पाते हैं?” जब तक हम प्रभु को अपना मुक्तिदाता नहीं स्वीकार करेंगे तब तक कैसे हम उस मुक्ति के सहभागी होंगे? जब तक हम ईश्वर के विधान की शर्तों के अनुसार व्यवहार नहीं करेंगे तो ईश्वर की चुनी हुई प्रजा कैसे बनेंगे? क्या कभी ताली एक हाथ से बज सकती है? हमारा ध्यान संकरे मार्ग की ओर नहीं बल्कि चौड़े मार्ग की ओर है क्योंकि सँकरे मार्ग पर चलना कठिन और चुनौतीपूर्ण है।

चूंकि बप्तिस्मा के द्वारा हम ईश्वर की चुनी हुई प्रजा हैं, और मुक्ति के बारे में निश्चिन्त हो जाते हैं और कभी-कभी ये गर्व हमारे लिए घमण्ड बन जाता है और मुक्ति से वंचित होने का कारण भी बन सकता है। हम ख्रीस्तीय हैं, बचपन से ही प्रभु के बारे में बहुत कुछ जानते हैं, प्रभु येसु कौन हैं, उनका जन्म कहाँ हुआ, उन्होंने क्या-क्या चमत्कार किये, और उनकी मृत्यु और पुनुरुत्थान कैसे हुआ इत्यादि। लेकिन क्या ईश्वर के साथ हमारा व्यक्तिगत सम्बन्ध है? क्या हम प्रभु येसु से व्यक्तिगत रूप से जुड़े हैं? कभी-कभी हम सोचते हैं कि हम तो ख्रीस्तीय हैं, बस इतना ही काफी है, इसी से हम स्वर्ग में प्रवेश पा लेंगे। अगर एक बच्चे के माता-पिता शिक्षक हैं, तो इसका मतलब ये नहीं कि वह बच्चा बिना मेहनत किये ही होशियार हो जायेगा। उसे अगर अपने माता-पिता का नाम रोशन करना है और होशियार (बुद्धिमान) बनना है तो इसके लिए उसे मेहनत करनी होगी। उसी तरह यदि हम स्वर्गीय पिता की संताने हैं, तो उसके योग्य बनने के लिए हमें मेहनत करनी पड़ेगी, “पूरा-पूरा प्रयत्न” करना पड़ेगा। पिता ईश्वर की योग्य संतानें बनने के लिए हमें उनकी आज्ञाओं का पालन करना पड़ेगा, ईश्वरीय विधान की शर्तों को पूरा करना पड़ेगा। ईश्वर की राह कठिन है, लेकिन जो लगन के साथ इस पर डटे रहते हैं, वही ईश्वर को जान लेते हैं, और ईश्वर उन्हें पहचान लेते हैं।

 -Br. Biniush Topno


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मै और मेरा परिचय

 मै और मेरा परिचय 

मैं बिनिऊष तोपनो डिब्रूगढ़ असम का रहने वाला हूं आज में मेरे पापा के लिए कुछ लिखने जा रहा हूं। जो आज  हमलोगो के बीच नहीं  रहे ।में एक छोटा परिवार से हूं और मेरे पापा का बढ़ा बेटा,  में छोटे से पढ़ाई करते आ रहा हूं और  अभी हॉयर स्टडीज पढ़ रहा हूं मुझे तभी से पढ़ाई में सहायता करते आया है हरेक कमियी में पूरा करता था ।  आज जो पाप ने मेरे लिए किया । आज में पढ़ाई करके कुछ पापा का नाम रोशन करने जा रहा हूं ताकि लोग कह पाए कि आपका लडका को आप बहुत अच्छा बनाया और आप जैसा पापा। पाप कहते थे कि  मैं खुदको बेचकर भी सपने पुरे करूँगा तेरे । बस तू सपने जरा बड़े देखना । मित्रों हमारे संसार की शुरुआत माता पिता से ही होती हैं. अतः हमारा सर्वस्व जीवन उन्ही देवता को समर्पित रहना चाहिए. जीवन में एक पिता का महत्व एवं किरदार क्या होता हैं.बेटे और बेटी पर बाप का छाया होता हैं।दिल  से लौटू तो ऐसा लगता हैं कि कोई बुला रहा है,, घर के अन्दर से निकलकर जैसे कोई मेरे पास आ रहा है। लगता हैं कि वो डाँटेगा और कहेगा कि मास्क लगाया नहीं तूने, अरे ये बाईक और मोबाईल भी आज सेनेटाइज किया नहीं तूने। महामारी फैली हुई हैं और तू बेपरवाह होता जा रहा है, हेलमेट भी नही लगाया कितना लापरवाह होता जा रहा है। हर रोज की तरह आज भी तू मुझको बताकर नही गया, तेरी माँ सुबह से परेशान है कि तू खाना खाकर नही गया। सोचता हूँ कि ये सब घर पर सुनूंगा और सहम जाऊंगा मैं, मगर ये क्या पता कि अब ये सिर्फ एक वहम पाऊंगा मैं। अब घर लौटते ही दरवाज़े पर खड़े पिताजी नहीं मिलते, मेरी जीवन नौका तारणहार मेरे वो माझी नहीं मिलते। अब क्या गलत है और क्या सही है ये बताने वाला कोई नहीं, बार बार डांटकर फटकार कर अब समझाने वाला कोई नहीं। आज सब कुछ पाकर जब अपने पैरों पर खड़ा हो चुका हूं मैं, पर पापा मेरी गलती नहीं बताते क्या इतना बड़ा हो चुका हूं मैं। आज सुख चैन है, खुशियां है मेरे पास मगर आप नहीं, ये मकान सशरीर खड़ा है मगर इसमें शायद प्राण नहीं। धैर्य, त्याग, स्नेह, समर्पण, परिश्रम और अनुशासन है, पिताजी परिवार रूपी देश पर एक लोकतांत्रिक शासन है।वो, जो मेरी ख़ुशी केे लिए अपनी ख़ुशी भूल जाते हैं | वो जो मेरी एक हसीं केे लिए कुछ भी कर जाते हैं | आने लगे जो कोई ग़म मेरी ज़िंदगी में, वो आने से पहले ही उससे लड़ जाते हैं | आँसू ना आये मेरी आँखों से इसका वो पूरा ख्याल रखते है, अपने दर्द को मेरे सामने वो अक्सर छुपाया करते हैं | जो मुझे चाहिए , वो वक़्त से पहले ला देते हैं, इस क़दर वो अपना निस्वार्थ प्रेम जताया करते हैं | मेरे नाम से जाने सब उन्हें , ये सपना है उनका , पूरा करना है ये सपना , यही है मकसद ज़िंदगी का | उनके गुस्से में भी प्यार छुपा होता है , उनकी डाट में भी दुलार भरा होता है , और उसी शख्स का नाम पापा होता हैं | अभी जो कुछ कम कर रहा हूं पापा वह आपको प्रिया लगे । मेरी हर मुश्किल में मेरे साथ मेरी ख़ुशी में मेरे गम में मेरे साथ जिसने कभी टूटने दिया नहीं रास्ते में कभी तनहा किया नहीं एक वहीं ! जिसने अपने जीवन की पूंजी लगा दी मुझे संवारने में अपने संस्कारों से.. अपने तजूर्बे से... जिसने दिन को दिन न समझा जिसने रात को रात न समझा जिसने मुझे ये ज़िन्दगी दी ! एक वहीं (मेरे पिता) हम पानी से नहाते हैं वो पसीने से नहाता है देखकर मुस्कान हमारे चेहरे की वो अपना हर दर्द भूल जाता है मुकम्मल हो हमारे सपने इसलिए वो हर रोज़ काम पे जाता है वो हस्ती कोई आम नहीं जो पिता कहलाता है जीवन की कहानी कितनी ही लंबी क्यूँ ना हो जाये ... लेकिन इस कहानी का सारांश हमेशा आप ही रहोगें ... पिता जी /पापा ?लिखने की बुनियाद कलम है, और ये कलम मुझे मेरे पिता ने दिलाई. बस इतना लिख के समाप्त करता हूं पापा कहने तो बहुत है। पर कभी मौका मिलने से फिर खत लिखूंगा बहुत याद आ रहा है पापा 

✍️आपका बेटा अल्बिनिऊष तोपनो 💞❣️




14 अगस्त 2022 वर्ष का बीसवाँ सामान्य रविवार

 

14 अगस्त 2022

वर्ष का बीसवाँ सामान्य रविवार




📒पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 38:4-6,8-10



4) पदाधिकारियों ने राजा से कहा, “यिरमियाह को मार डाला जाये। वह येरूासालेम की हार की भवियवाणी करता है और इस प्रकार शहर में रहने वाले सौनिकों और सारी जनता की हिम्मत तोड़ता है। वह प्रजा का हित नहीं, बल्कि अहित चाहता है“।

5) राजा सिदकीया ने उत्तर दिया, “वह आप लोगों के वश में है। राजा आप लोगों के विरुद्ध कुछ नहीं कर सकता।“

6) इस पर वे यिरमियाह को ले गये और उन्होंने उस को रक्षादल के प्रांगण में स्थित राजकुमार मलकीया के कुएँ में डाल दिया। उन्होंने यिरमियाह को रस्सी से उतार दिया। कुएँ में पानी नहीं था, उस में केवल कीच था और यिरमियाह कीच में धँस गया।

8) एबेद-मेलेक ने राजमहल से निकल कर राजा से कहा,

9) “राजा! मेरे स्वामी! उन लोगों ने नबी यिरमियाह के साथ बहुत बुरा व्यवहार किया- उन्होंने उन को कुएँ में डाल दिया। वह वहाँ भूखे मर जायेंगे, क्योंकि नगर में रोटी नहीं बची है।“

10) इस पर राजा ने कूशी एबेद-मेलेक को यह आदेश दिया, “यहाँ के तीन आदमियों को अपने साथ ले जाओ और इस से पहले कि यिरमियाह मर जाये, उसे कुएँ में से खींच निकालो।“


📒दूसरा पाठ : इब्रानियों 12:1-4


1) जब विश्वास के साक्षी इतनी बड़ी संख्या में हमारे चारों ओर विद्यमान हैं, तो हम हर प्रकार की बाधा दूर कर अपने को उलझाने वाले पाप को छोड़ कर और ईसा पर अपनी दृष्टि लगा कर, धैर्य के साथ उस दौड़ में आगे बढ़ते जायें, जिस में हमारा नाम लिखा गया है।

2) ईसा हमारे विश्वास के प्रवर्तक हैं और उसे पूर्णता तक पहुँचाते हैं। उन्होंने भविष्य में प्राप्त होने वाले आनन्द के लिए क्रूस पर कष्ट स्वीकार किया और उसके कलंक की कोई परवाह नहीं की। अब वह ईश्वर के सिंहासन के दाहिने विराजमान हैं।

3) कहीं ऐसा न हो कि आप लोग निरूत्साह हो कर हिम्मत हार जायें, इसलिए आप उनका स्मरण करते रहें, जिन्होंने पापियों का इतना अत्याचार सहा।

4) अब तक आप को पाप से संघर्ष करने में अपना रक्त नहीं बहाना पड़ा।


📒सुसमाचार : लूकस 12:49-53


49) "मैं पृथ्वी पर आग ले कर आया हूँ और मेरी कितनी अभिलाषा है कि यह अभी धधक उठे!

50) मुझे एक बपतिस्मा लेना है और जब तक वह नहीं हो जाता, मैं कितना व्याकुल हूँ!

51) "क्या तुम लोग समझते हो कि मैं पृथ्वी पर शान्ति ले कर आया हूँ? मैं तुम से कहता हूँ, ऐसा नहीं है। मैं फूट डालने आया हूँ।

52) क्योंकि अब से यदि एक घर में पाँच व्यक्ति होंगे, तो उन में फूट होगी। तीन दो के विरुद्ध होंगे और दो तीन के विरुद्ध।

53) पिता अपने पुत्र के विरुद्ध और पुत्र अपने पिता के विरुद्व। माता अपनी पुत्री के विरुद्ध होगी और पुत्री अपनी माता के विरुद्ध। सास अपनी बहू के विरुद्ध होगी और बहू अपनी सास के विरुद्ध।"


📚 मनन-चिंतन


आज के पाठ, समाज में ईश्वर के प्रतिनिधि की उपस्थिति के कारण, गहरी विभाजन के तीन उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। यह दर्शाता है कि ईश्वर के प्रति आज्ञाकारिता अक्सर विभाजन लाती है। नबी येरेमियस का संदेश विभाजनकारी था क्योंकि वह सशस्त्र विद्रोह का कड़ा विरोध करता था और ईश्वर की ओर लौटने के लिए लोगों को आदेश देता था। इब्रानियों के नाम पत्र के लेखक ने जोर देकर कहा कि - ईसाई धर्म और नैतिक मानदंडों के पालन के द्वारा ईसाइयों को दुनिया की सोच से अलग होना चाहिए। येसु शांति देने आए थे, हालांकि, उनका संदेश और उनकी उपस्थिति परिवार और समाज में विभाजन का कारण बन गई। येसु का संदेश हमारे अंतरतम का परीक्षण करता है, इस प्रकार हमारे दृष्टिकोण और उद्देश्यों को प्रकट करता है। शुद्ध करने वाली आग एक शोधन प्रक्रिया है। इसी प्रकार ईश्वर द्वारा भेजे गए संदेशवाहकों के कारण, हुए विभाजन का मुक्तिदायी प्रभाव होता है।



📚 REFLECTION


Today’s readings present three examples of deep divisions caused by the presence of God’s representative in the society. It shows that obedience to God often brings divisions. Jeremiah’s message was divisive because of his firm opposition to armed rebellion and his advocacy for the return to God. The author of the Hebrews insisted that Christians must be separated from the world by their adherence to the Christian faith and moral norms. Jesus did come to bring peace, however, his message and his presence became a cause of divisions in the family and society. The message of Jesus tests our deep inner self, thus revealing our attitudes and motives. The purifying fire is a refining process. Thus, the division caused by God’s messengers has salvific effect.



📙 मनन-चिंतन - 2


साधारणतः हम देखते हैं कि प्रभु येसु की छवि एक शांतिप्रिय एवं परहित की भावना से ओत-प्रोत की छवि है। जो भी निराश, परेशान व्यक्ति प्रभु येसु के पास आया, उनका हृदय उसके प्रति करुणा से भर गया। उन्होंने दूसरों की बीमारियों को दूर किया, उनके दुःख-दर्द और कष्टों को मिटाया और आपसी प्रेम और भाईचारे का सन्देश दिया। लेकिन आज के सुसमाचार में हम प्रभु येसु के मुख से बड़े अजीब शब्द सुनते हैं। प्रभु येसु कहते हैं,- “मैं पृथ्वी पर आग लेकर आया हूँ, और मेरी कितनी अभिलाषा है कि यह अभी धधक उठे” (लूकस 12:49)। उसके बाद के शब्द और भी अधिक डरावने हैं - “क्या तुम लोग समझते हो कि मैं पृथ्वी पर शान्ति लेकर आया हूँ? मैं तुमसे कहता हूँ, ऐसा नहीं है। मैं फूट डालने आया हूँ।” (लूकस 12:51) क्या ऐसे भड़काऊ शब्द प्रभु येसु के मुख से शोभा देते हैं? यदि हम प्रभु के इन शब्दों को गहराई से नहीं समझेंगे तो हम भ्रमित और गुमराह हो सकते हैं।

सन्त मत्ती के सुसमाचार 13:24-30 में हम जंगली बीज का दृष्टान्त सुनते हैं, जिसमें फसल का स्वामी चाहता है और आदेश देता है कि ‘कटनी तक दोनों तरह बीजों, अर्थात् अच्छे और जंगली बीजों को साथ-साथ बढ़ने देना है। (देखें मत्ती 13:29) और इसी अध्याय के पद संख्या 36-43 में हम उपरोक्त दृष्टान्त का अर्थ स्वयं प्रभु येसु से सुनते हैं, जिसमें प्रभु येसु अपने शिष्यों को समझाते हुए कहते हैं कि “खेत संसार है; अच्छा बीज राज्य की प्रजा है; जंगली बीज दुष्टात्मा की प्रजा है; बोने वाला बैरी शैतान है...” (मत्ती 13:38-39अ)। अर्थात् ईश्वरीय राज्य की प्रजा और दुष्टात्मा या शैतान की प्रजा, इस संसार में दोनों साथ-साथ बढ़ते हैं। अथवा सीधे-सीधे शब्दों में कहें तो इस संसार में दोनों तरह के लोग- अच्छे और बुरे, साथ-साथ आगे बढ़ते हैं, लेकिन समय आने पर ईश्वर उन्हें अलग-अलग करेंगे, और उनका एक दूसरे से अलग-अलग होना बहुत ज़रूरी है।

हम आज की दुनिया में देखते हैं कि लोगों के मन में अच्छाई और बुराई का अन्तर बहुत कम होता जा रहा है। अक्सर लोग अच्छाई और बुराई में अंतर नहीं कर पाते हैं, और अच्छाई को छोड़कर बुराई का साथ देने लग जाते हैं। आप कल्पना कीजिए कि आपके ऊपर दुनिया के सारे लोगों को बुराई से बचाने की जिम्मेदारी है, और ऐसे में आप पाते हैं कि अच्छे लोग बुरे लोगों में शामिल होते जा रहे हैं। जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है, वैसे-वैसे अच्छाई और बुराई का अंतर ख़त्म होता जा रहा है, तो ज़रूर आपको लगेगा कि आप जल्द से जल्द अच्छे लोगों को बुरे लोगों से अलग कर दें। प्रभु येसु भी इस दुनिया में वही करने आये हैं - अच्छे और बुरे लोगों को एक दूसरे के विरुद्ध करने।

सन्त लूकस के सुसमाचार 3:16 में हम पढ़ते हैं, सन्त योहन बप्तिस्ता कहते हैं कि “मैं तो तुम लोगों को जल से बप्तिस्मा देता हूँ; परन्तु एक आने वाले हैं जो मुझसे अधिक शक्तिशाली हैं... वह तुम लोगों को पवित्र आत्मा और आग से बप्तिस्मा देंगे।” प्रभु येसु पवित्र आत्मा और आग के द्वारा इस संसार को शुद्ध करना चाहते हैं। आगे सन्त योहन इंगित करते हैं कि “वह हाथ में सूप ले चुके हैं, जिससे वह अपना खलिहान ओसा कर साफ करें, और अपना गेहूँ अपने बखार में जमा करें...”(लूकस 3:17)। इसलिए प्रभु येसु हमसे कहते हैं कि “मैं पृथ्वी पर आग लेकर आया हूँ”। यही आग हमें शुद्ध करती है, यही आग अच्छे और बुरे लोगों को अलग-अलग करती है, तीन को दो के विरुद्ध और दो को तीन के विरुद्ध, पिता को पुत्र के विरुद्ध और पुत्र को पिता के विरुद्ध, माता, पुत्री, सास-बहु आदि को एक दूसरे के विरुद्ध करती है, क्योंकि अच्छे बीज और बुरे बीज हमेशा एक साथ नहीं रह सकते।

हम अपने मन में झाँककर देखें, क्या हम उस आग से पवित्र किये जाने के लिये तैयार हैं? क्या हमारे मन में बुराई और अच्छाई के प्रति स्पष्ट अन्तर है या नहीं? क्या प्रभु येसु के इस कार्य में हमारी कोई भूमिका हो सकती है? क्या हम प्रभु येसु के साथ हैं या संसार के साथ हैं? इन सब बातों को समझने के लिए प्रभु हमें आशीष दें। आमेन।

 -Br. Biniush Topno



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07 अगस्त 2022 वर्ष का उन्नीसवाँ इतवार

 

07 अगस्त 2022

वर्ष का उन्नीसवाँ इतवार



📒 पहला पाठ : प्रज्ञा ग्रन्थ 18:6-9


6) उस रात के विषय में हमारे पूर्वजों को पहले से इसलिए बताया गया था कि वे यह जानकर हिम्मत बाँधे कि हमने किस प्रकार की शपथों पर विश्वास किया है।

7) तेरी प्रजा धर्मियों की रक्षा तथा अपने शत्रुओं के विनाश की प्रतीक्षा करती थी।

8) तूने हमारे शत्रुओं को दण्ड दिया और हमें अपने पास बुला कर गौरवान्वित किया है।

9) धर्मियों की भक्त सन्तान से छिप कर बलि चढ़ायी और पूर्वजों के भजन गाने के बाद उसने एकमत हो कर यह ईश्वरीय विधान स्वीकार किया कि सन्त-जन साथ रह कर भलाई और बुराई, दोनों समान रूप से भोगेंगे।



📕 दूसरा पाठ : इब्रानियों 11:1-2,8-19



1) विश्वास उन बातों की स्थिर प्रतीक्षा है, जिनकी हम आशा करते हैं और उन वस्तुओं के अस्तित्व के विषय में दृढ़ धारणा है, जिन्हें हम नहीं देखते।

2) विश्वास के कारण हमारे पूर्वज ईश्वर के कृपापात्र बने।

8) विश्वास के कारण इब्राहीम ने ईश्वर का बुलावा स्वीकार किया और यह न जानते हुए भी कि वह कहाँ जा रहे हैं, उन्होंने उस देश के लिए प्र्रस्थान किया, जिसका वह उत्तराधिकारी बनने वाले थे।

9) विश्वास के कारण वह परदेशी की तरह प्रतिज्ञात देश में बस गये और वहाँ इसहाक तथा याकूब के साथ, जो एक ही प्रतिज्ञा के उत्तराधिकारी थे, तम्बुओं में रहने लगे।

10) इब्राहीम ने ऐसा किया, क्योंकि वह उस पक्की नींव वाले नगर की प्रतीक्षा में थे, जिसका वास्तुकार तथा निर्माता ईश्वर है।

11) विश्वास के कारण उमर ढ़ल जाने पर भी सारा गर्भवती हो सकीं; क्योंकि उनका विचार यह था जिसने प्रतिज्ञा की है, वह सच्चा है

12) और इसलिए एक मरणासन्न व्यक्ति से वह सन्तति उत्पन्न हुई, जो आकाश के तारों की तरह असंख्य है और सागर-तट के बालू के कणों की तरह अगणित।

13) प्रतिज्ञा का फल पाये बिना वे सब विश्वास करते हुए मर गये। उन्होंने उसे दूर से देखा और उसका स्वागत किया। वे अपने को पृथ्वी पर परदेशी तथा प्रवासी मानते थे।

14) जो इस तरह की बातें कहते हैं, वे यह स्पष्ट कर देते हैं कि वे स्वदेश की खोज में लगे हुए हैं।

15) वे उस देश की बात नहीं सोचते थे, जहाँ से वे चले गए थे; क्योंकि वे वहाँ लौट सकते थे।

16) वे तो एक उत्तम स्वदेश अर्थात् स्वर्ग की खोज में लगे हुए थे; इसलिए ईश्वर को उन लोगों का ईश्वर कहलाने में लज्जा नहीं होती। उसने तो उनके लिए एक नगर का निर्माण किया है।

17) जब ईश्वर इब्राहीम की परीक्षा ले रहा था, तब विश्वास के कारण उन्होंने इसहास को अर्पित किया। वह अपने एकलौते पुत्र को बलि चढ़ाने तैयार हो गये थे,

18) यद्यपि उन से यह प्रतिज्ञा की गयी थी, कि इसहाक से तेरा वंश चलेगा।

19) इब्राहीम का विचार यह था कि ईश्वर मृतकों को भी जिला सकता है, इसलिए उन्होंने अपने पुत्र को फिर प्राप्त किया। यह भविष्य के लिए प्रतीक था।



📙 सुसमाचार : लूकस 12:32-48



32) छोटे झुण्ड! डरो मत, क्योंकि तुम्हारे पिता ने तुम्हें राज्य देने की कृपा की है।

33) "अपनी सम्पत्ति बेच दो और दान कर दो। अपने लिए ऐसी थैलियाँ तैयार करो, जो कभी छीजती नहीं। स्वर्ग में एक अक्षय पूँजी जमा करो। वहाँ न तो चोर पहुँचता है और न कीड़े खाते हैं;

34) क्योंकि जहाँ तुम्हारी पूँजी है, वहीं तुम्हारा हृदय भी होगा।

35) "तुम्हारी कमर कसी रहे और तुम्हारे दीपक जलते रहें।

36) तुम उन लोगों के सदृश बन जाओ, जो अपने स्वामी की राह देखते रहते हैं कि वह बारात से कब लौटेगा, ताकि जब स्वामी आ कर द्वार खटखटाये, तो वे तुरन्त ही उसके लिए द्वार खोल दें।

37) धन्य हैं वे सेवक, जिन्हें स्वामी आने पर जागता हुआ पायेगा! मैं तुम से यह कहता हूँः वह अपनी कमर कसेगा, उन्हें भोजन के लिए बैठायेगा और एक-एक को खाना परोसेगा।

38) और धन्य हैं वे सेवक, जिन्हें स्वामी रात के दूसरे या तीसरे पहर आने पर उसी प्रकार जागता हुआ पायेगा!

39) यह अच्छी तरह समझ लो-यदि घर के स्वामी को मालूम होता कि चोर किस घड़ी आयेगा, तो वह अपने घर में सेंध लगने नहीं देता।

40) तुम भी तैयार रहो, क्योंकि जिस घड़ी तुम उसके आने की नहीं सोचते, उसी घड़ी मानव पुत्र आयेगा।"

41) पेत्रुस ने उन से कहा, "प्रभु! क्या आप यह दृष्टान्त हमारे लिए कहते हैं या सबों के लिए?"

42) प्रभु ने कहा, "कौन ऐसा ईमानदार और बुद्धिमान् कारिन्दा है, जिसे उसका स्वामी अपने नौकर-चाकरों पर नियुक्त करेगा ताकि वह समय पर उन्हें रसद बाँटा करे?

43) धन्य हैं वह सेवक, जिसका स्वामी आने पर उसे ऐसा करता हुआ पायेगा!

44) मैं तुम से यह कहता हूँ, वह उसे अपनी सारी सम्पत्ति पर नियुक्त करेगा।

45) परन्तु यदि वह सेवक अपने मन में कहे, ’मेरा स्वामी आने में देर करता है’ और वह दासदासियों को पीटने, खाने-पीने और नशेबाजी करने लगे,

46) तो उस सेवक का स्वामी ऐसे दिन आयेगा, जब वह उसकी प्रतीक्षा नहीं कर रहा होगा और ऐसी घड़ी जिसे वह जान नहीं पायेगा। तब स्वामी उसे कोड़े लगवायेगा और विश्वासघातियों का दण्ड देगा।

47) "अपने स्वामी की इच्छा जान कर भी जिस सेवक ने कुछ तैयार नहीं किया और न उसकी इच्छा के अनुसार काम किया, वह बहुत मार खायेगा।

48) जिसने अनजाने ही मार खाने का काम किया, वह थोड़ी मार खायेगा। जिसे बहुत दिया गया है, उस से बहुत माँगा जायेगा और जिसे बहुत सौंपा गया है, उस से अधिक माँगा जायेगा।

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📚 मनन-चिंतन - 2



सुसमाचार में येसु आने वाले न्याय के दिन के लिए तैयार रहने का निर्देश देता है। हमें उस लालची अमीर की तरह नहीं बनना है जो अपनी सारे उपज को बाँटने के बजाय भण्डार में रखने की योजना बनाता है। बल्कि, हमें अपने धन जरूरतमंदों के साथ बांटना है। आने वाले न्याय के दिन के लिए तैयार रहने का दूसरा प्रमुख तरीका सतर्क रहना है।अच्छे सेवक के तीन विशिष्ट लक्षण होते हैं। १) तैयारी- "कपड़े पहनकर तैयार रहना" २) रखरखाव- "दीपक जला कर" ३) अपेक्षा- "स्वामी के लौटने की प्रतीक्षा करता है।" तो प्रश्न यह है कि हम प्रभु के आगमन की तैयारी कैसे कर सकते हैं? हम हमेशा जागते हुए नहीं, बल्कि हमेशा वफादार रहकर तैयारी कर सकते हैं। दूसरा पाठ यात्रा की बात करता है।यह यात्रा हमारे जीवन शैली, गुणवत्ता और दिशा के बारे में है। इसमें हमारा हर अनुभव शामिल है और उस अनुभव के प्रति, हमारी प्रतिक्रिया भी। प्यार और सेवा में जिया गया एक वफादार जीवन ही हमारी असली संपत्ति है।


📚 REFLECTION



In the gospel Jesus instructs on how to be ready for the coming judgment. We are not to be like the greedy rich man who plans to store his great harvest in barns rather than share it. We are, rather, to share our wealth with those in need. The other major way to be ready for the coming judgment is to be watchful. There are three distinct characteristics of the good servant. a) Preparation- “dressed and ready” b) maintenance- “keeps the lamp burning” c) expectation- “waits for the master to return.” The question, then, is how can we prepare for the Lord’s coming? We can prepare, not by being always awake, but by being always faithful. The second reading speaks of journey. This journey is about the style and quality and direction of our living. It includes every experience we will have and how we respond to each one. A faithful life lived in love and service is our real wealth.


📚 मनन-चिंतन - 2



नबी इसायाह के ग्रन्थ 44:24 द्वारा प्रभु हमसे कहते हैं, “जिसने तुम्हारा उद्धार किया और माता के गर्भ में गढ़ा है, वही प्रभु यह कहता है: मैं प्रभु हूँ। मैंने सब कुछ बनाया है...” हम चाहे ईश्वर में विश्वास करें या न करें लेकिन सच्चाई यही है कि प्रभु ईश्वर ने ही सब कुछ की श्रृष्टि की है। उसी के अधिकार में सब कुछ है और सब कुछ उसी का दिया हुआ है, हमारा जीवन, हमारा परिवार, विभिन्न वरदान आदि, सब कुछ प्रभु का ही दिया हुआ है। इसलिए वही हमारा प्रभु और स्वामी है और हम उसके सेवक मात्र हैं। हमारा अपना कुछ भी नहीं है, और इसलिए हमें हर पल, हर क्षण उसी के लिए जीना है, उसी की इच्छा पूरी करनी है। इस बात को बहुत कम लोग गम्भीरता से लेते हैं, और यही कारण है कि ऐसे लोग प्रभु से दूर भटक जाते हैं।

आज का सुसमाचार हमें इसी ओर इंगित करता है कि हम ईश्वर के सेवक मात्र हैं और जो कार्य हमें प्रभु ने सौंपा है उसे हमें पूर्ण ईमानदारी से पूरा करना है, और जो सेवक अपने कार्य में सजग और ईमानदार पाया जायेगा, प्रभु उसे उसका उचित फल देगा। आखिर एक आम इन्सान जो अपनी नौकरी करता है, अपने परिवार की देख-भाल करता है, हर इतवार गिरजा जाता है आदि, वह व्यक्ति कैसे ईश्वर का सेवक हुआ और उसे प्रभु ने क्या जिम्मेदारी सौंपी है, और प्रभु के आने पर किस सौंपी हुई जिम्मेदारी का मूल्यांकन किया जायेगा? ईश्वर ने हमें इस दुनिया में ज़रुर कुछ न कुछ योजना पूरी करने के लिए भेजा है। ईश्वर ने हमें भेजा है ताकि हम उसका साक्ष्य दें, उसकी महानता का बखान करें। इसी के लिए उसने हमें यह जीवन प्रदान किया है।

मान लीजिये एक साधारण सा व्यक्ति एक साधारण जीवन व्यतीत करता है। उस व्यक्ति का अपना परिवार है। वह परिवार उसे किसने उसे सौंपा है? उस व्यक्ति के बाल-बच्चे हैं, वे बच्चे किसका वरदान हैं? वह व्यक्ति कोई नौकरी करके अपनी रोजी-रोटी कमाता है, वह नौकरी किसकी कृपा से मिली है? अगर विश्वासी ह्रदय से इन सवालों का जवाब दें तो यह सब ईश्वर की देन है, वास्तव में हर सवाल का जवाब ही ईश्वर में है। जो व्यक्ति ईश्वर में विश्वास नहीं करता है, उसे अपने जीवन का उद्देश्य कभी भी समझ में नहीं आयेगा। जब हमारा प्रभु आयेगा तो इन सभी चीजों के आधार पर ही हमारा मूल्यांकन होगा।

अगर एक व्यक्ति को एक परिवार को सँभालने की जिम्मेदारी ईश्वर ने दी है, लेकिन वह ईमानदारी के साथ अपने परिवार के प्रति अपना कर्तव्य नहीं निभाता है तो क्या उसे वफादार सेवक कहा जा सकता है? एक माता-पिता अपने बच्चों के प्रति जो जिम्मेदारी है, जैसे उनका उचित रीति से लालन-पालन करना, उचित शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था करना, धर्म की शिक्षाओं को उनके ह्रदय में बोना आदि, जब इन जिम्मेदारियों को ईमानदारी से नहीं निभाएंगे तो क्या वे भले और ईमानदार सेवक कहला सकते हैं? एक पति अपनी पत्नी के प्रति वफादार नहीं है, या पत्नी अपना पति धर्म पूरी ईमानदारी से नहीं निभाती है तो क्या ऐसे पति-पत्नि भले और ईमानदार सेवक कहलाये जा सकते हैं? अगर बच्चे अपने माता-पिता का आदर नहीं करते, उनके प्रति अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करते, अपने उज्जवल भविष्य के बारे में बड़ों की बातें नहीं मानते, तो क्या वे प्रभु के ईमानदार सेवक बन जायेंगे। एक नौकरी वाला व्यक्ति अपना काम ठीक से नहीं करता, उचित परिश्रम नहीं करता, काम करने के लिए घूष लेता है, भ्रष्टाचार करता है, तो क्या इस दुनिया का स्वामी उसे सज़ा नहीं देगा?

हम जीवन में चाहे जो कुछ भी हों, माता-पिता हों, बच्चे हों, विद्यार्थी हों, डाक्टर, इंजिनियर, सरकारी कर्मचारी, शिक्षक, नर्स, ड्राइवर, चपरासी कुछ भी हों, उसी जिम्मेदारी को पूरी ईमानदारी से निभाना ही हमारा कर्तव्य है, वही हमारे जीवन का उद्देश्य है, उसी के प्रति पूर्ण रूप से वफादार बने रहने में ही हमारे जीवन की सार्थकता है। अगर हम ऐसा करेंगे तो हमारा स्वामी चाहे जिस घड़ी आयेगा, हमें तैयार और सजग पायेगा। ईश्वर हमें भले, सजग, ईमानदार और वफादार सेवक बनने में मदद करे। आमेन।


 -Br. Biniush Toono


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Praise the Lord!

वर्ष का अठारहवाँ इतवार 31 जुलाई 2022, इतवार

 

31 जुलाई 2022, इतवार

वर्ष का अठारहवाँ इतवार



पहला पाठ : उपदेशक ग्रन्थ 1:2;2:21-23


2) उपदेशक कहता है, "व्यर्थ ही व्यर्थ; व्यर्थ ही व्यर्थ; सब कुछ व्यर्थ है।"

2:21) मनुष्य समझदारी, कौशल और सफलता से काम करने के बाद जो कुछ एकत्र कर लेता है, उसे वह सब ऐसे व्यक्ति के लिए छोड़ देना पड़ता है, जिसने उसके लिए कोई परिश्रम नहीं किया है। यह भी व्यर्थ और बड़े दुर्भाग्य की बात है;

22) क्योंकि मनुष्य को कड़ी धूप में कठिन परिश्रम करने के बदले क्या मिलता है ?

23) उसके सभी दिन सचमुच दुःखमय हैं और उसका सारा कार्यकलाप कष्टदायक। रात को उसके मन को शान्ति नहीं मिलती। यह भी व्यर्थ है।


दूसरा पाठ : कलोसियों 3:1-5,9-11


1) यदि आप लोग मसीह के साथ ही जी उठे हैं- जो ईश्वर के दाहिने विराजमान हैं- तो ऊपर की चीजें खोजते रहें।

2) आप पृथ्वी पर की नहीं, ऊपर की चीजों की चिन्ता किया करें।

3) आप तो मर चुके हैं, आपका जीवन मसीह के साथ ईश्वर में छिपा हुआ है।

4) मसीह ही आपका जीवन हैं। जब मसीह प्रकट होंगे, तब आप भी उनके साथ महिमान्वित हो कर प्रकट हो जायेंगे।

5) इसलिए आप लोग अपने शरीर में इन बातों का दमन करें, जो पृथ्वी की हैं, अर्थात् व्यभिचार, अशुद्धता, कामुकता, विषयवासना और लोभ का, जो मूर्तिपूजा के सदृश है।

9) कभी एक दूसरे से झूठ नहीं बोलें। आप लोगों ने अपना पुराना स्वभाव और उसके कर्मों को उतार कर

10) एक नया स्वभाव धारण किया है। वह स्वभाव अपने सृष्टिकर्ता का प्रतिरूप बन कर नवीन होता रहता और सत्य के ज्ञान की ओर आगे बढ़ता है, जहाँ पहुँच कर कोई भेद नहीं रहता,

11) जहाँ न यूनानी है या यहूदी, न ख़तना है या ख़तने का अभाव, न बर्बर है, न स्कूती, न दास और न स्वतन्त्र। वहाँ केवल मसीह हैं, जो सब कुछ और सब में हैं।


सुसमाचार : लूकस 12:13-21



13) भीड़ में से किसी ने ईसा से कहा, "गुरूवर! मेरे भाई से कहिए कि वह मेरे लिए पैतृक सम्पत्ति का बँटवारा कर दें"।

14) उन्होंने उसे उत्तर दिया, "भाई! किसने मुझे तुम्हारा पंच या बँटवारा करने वाला नियुक्त किया?"

15) तब ईसा ने लोगों से कहा, "सावधान रहो और हर प्रकार के लोभ से बचे रहो; क्योंकि किसी के पास कितनी ही सम्पत्ति क्यों न हो, उस सम्पत्ति से उसके जीवन की रक्षा नहीं होती"।

16) फिर ईसा ने उन को यह दृष्टान्त सुनाया, "किसी धनवान् की ज़मीन में बहुत फ़सल हुई थी।

17) वह अपने मन में इस प्रकार विचार करता रहा, ’मैं क्या करूँ? मेरे यहाँ जगह नहीं रही, जहाँ अपनी फ़सल रख दूँ।

18) तब उसने कहा, ’मैं यह करूँगा। अपने भण्डार तोड़ कर उन से और बड़े भण्डार बनवाऊँगा, उन में अपनी सारी उपज और अपना माल इकट्ठा करूँगा

19) और अपनी आत्मा से कहूँगा-भाई! तुम्हारे पास बरसों के लिए बहुत-सा माल इकट्ठा है, इसलिए विश्राम करो, खाओ-पिओ और मौज उड़ाओ।’

20) परन्तु ईश्वर ने उस से कहा, ’मूर्ख! इसी रात तेरे प्राण तुझ से ले लिये जायेंगे और तूने जो इकट्ठा किया है, वह अब किसका ह़ोगा?’

21) यही दशा उसकी होती है जो अपने लिए तो धन एकत्र करता है, किन्तु ईश्वर की दृष्टि में धनी नहीं है।"


📚 मनन-चिंतन


संपत्ति के बिना एक जीवन

मूर्ख धनी का दृष्टांत के दो प्रारूप हैं। सबसे पहले हमें अपना जीवन धन के संचय के लिए समर्पित नहीं करना है। दूसरा तथ्य यह है कि, धन को अधिक मात्रा में एकत्र करना कोई ईश्वर का आशीर्वाद नहीं है। हम दूसरों के जीवन में एक आशीष बनकर धन्य हैं और हम ईश्वर के राज्य का निर्माण करने के लिए धन्य है। स्तोत्रकार कहता है कि, यदि हमारा धन बढ़ता है, तो हमें उस पर अपना मन नहीं लगाना चाहिये। वचन कहता है अपनी वृद्धि के पहले फल के साथ ईश्वर का सम्मान करो।





📚 REFLECTION



A Life without Possessions

The meaning of Parable of the Rich Fool is twofold. First, we are not to devote our lives to the accumulation of wealth. The second is the fact that we are not blessed by God to hoard our wealth to ourselves. We are blessed to be a blessing in the lives of others and we are blessed to build the kingdom of God. The Psalmist says that if our riches increase, we are not to set our hearts upon them (Psalm 62:10). The Bible says that the one who gives freely grows all the richer (Proverbs 11:24). Finally, the Bible says we are to honour God with the first fruits of our increase (Proverbs 3:9–10). The point is clear: if we honour God with what He has given us, He will bless us with more so that we can honour Him with more. So, if God has blessed you with material wealth “set not your heart on it” and “be rich towards God”.




मनन-चिंतन - 2



आज के पाठों पर अगर हम गहराई से मनन-चिंतन करें तो ये बहुतों के ह्रदय में खटकने वाले पाठ हैं। विशेष रूप। से आज के पहले पाठ और सुसमाचार का सन्देश हमें हिलाकर रख देता है। मनुष्य अपने आप को पूर्ण बनाने के लिये शुरू से ही बहुत मेहनत करता है। जब बच्चे का जन्म होता है तो उसके माता-पिता चाहते हैं कि उसकी परवरिश सर्वश्रेष्ठ तरीके से हो। अच्छे से अच्छे और महँगे से महँगे स्कूल में उसका दाखिला करायेंगे। उसके लिए बचपन में ही यह फ़ैसला हो जाता है कि बड़ा होकर उनका बेटा या उनकी बेटी क्या बनेगी। स्कूल के कार्य-कलाप के अलावा और भी तरह-तरह के क्लासें जैसे डांस, कराटे, संगीत, कला इत्यादि का भी कोर्स करवाते हैं। इतना ही नहीं रेगुलर कोचिंग भी भेजते हैं। और आजकल कोचिंग वाले इतवार के दिन भी क्लास लगाते हैं, और उतना ही नहीं इतवार के दिन ही विशेष टेस्ट होता है। माता-पिता भी चाहते हैं कि उनका बच्चा जितना हो सके आगे बढ़े, जितना हो सके उतना ज्ञान ग्रहण करे, इसके चाहे उन्हें कितना भी कष्ट उठाना पड़े और कितने भी त्याग करने पड़ें। आखिर ज़माना ही कम्पटीशन का है। और इसलिए वे अक्सर भूल जाते हैं कि इतवार का दिन प्रभु का दिन है, प्रभु के लिए है।

आगे चलकर वही बच्चा अपने माता-पिता को हर चीज में पीछे छोड़ देता है, ज्ञान में, आत्मविश्वास में, सम्मान में, आर्थिक दशा में। और माता-पिता को अपने बच्चों से ‘पिछड़ने’ पर गर्व होता है। उनको लगता है कि अगर उनके बच्चे ने कुछ हासिल कर लिया तो उनकी साधना सफल हुई। लेकिन ऐसे में कोई “उपेदशक ग्रन्थ” के शब्दों में उनसे कहे ““व्यर्थ ही व्यर्थ; व्यर्थ ही व्यर्थ; सब कुछ व्यर्थ है”।” (उपदेशक 1:2) या फिर सुसमाचार के शब्दों में उनसे कहे “”मूर्ख! इसी रात तेरे प्राण तुझसे ले लिये जायेंगे, और तूने जो इकठ्ठा किया है, वह अब किसका होगा?”” (लूकस 12:20)। उन जैसे माता-पिता के लिए प्रभु के ये वचन ज़रूर खटकेंगे, ह्रदय में ज़रूर चुभेंगे। आखिर कौन अपने जीवनभर की तपस्या और त्याग को व्यर्थ जाने देगा?

मनुष्य का स्वभाव यही है कि वह इस जीवन को जितना हो सके महान बनाना चाहता है। अधिक से अधिक सुविधाएँ जुटाना चाहता है, और मनुष्य के इस स्वभाव को समझने के लिए बहुत से विचारकों ने अपने विचार रखे और अध्ययन किया है और इसे समझाने की कोशिश की है, लेकिन कोई भी, मनुष्य के इस स्वभाव को यथोचित रूप से नहीं समझा पाया है। पवित्र बाइबिल हमें समझाती है कि ईश्वर ने हमें अपने प्रतिरूप में बनाया है, (उत्पत्ति 1:27), और पाप के कारण हमने ईश्वर की उस छवि को धूमिल कर लिया है। तो हमारे जीवन का जो मुख्य उद्देश्य होना चाहिए वो यह कि हम उन्हें ईश्वर के प्रतिरूप में बनायें। वास्तव में हमारे हर प्रयास, हर साधना, हर तपस्या का उद्देश्य यही होना चाहिए। लेकिन जब हमारा उद्देश्य इसे छोड़कर संसारिकता में आगे बढ़ना हो जाता है, तो हम भटक जाते हैं, और ऐसी स्तिथि में अगर यह कहा जाये कि हम जो भी कर रहे हैं, वह व्यर्थ है, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि हमारा वास्तविक जीवन सांसारिक जीवन नहीं बल्कि स्वर्गीय जीवन है। सांसारिक जीवन अस्थाई है। (देखें मत्ती 6:19)।

बप्तिस्मा के द्वारा हमारा नया जन्म हुआ है और इसलिए हम संसार से अलग हैं (देखें योहन 15:19)। प्रभु येसु ने हमें संसार में से चुन लिया है। और अगर हमें अपने जीवन को सार्थक बनाना है तो स्वर्गीय चीजों की खोज में लगे रहना है, पृथ्वी पर की नहीं। (कलोसियों 3:2)। कोई भी व्यक्ति अगर अपना जीवन ईश्वर के लिए, दूसरों की सेवा के लिए जीता है उसका जीवन कभी व्यर्थ नहीं जाता, अनेकों संतों का जीवन इस बात का जीता-जागता उदाहरण है। हम ईश्वर से प्रार्थना करें कि ईश्वर हमें सार्थक जीवन जीने में मदद करे और आशीष प्रदान करे। आमेन.


 -Br. Biniush Topno


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24 जुलाई 2022, इतवार वर्ष का सत्रहवाँ इतवार

 

24 जुलाई 2022, इतवार

वर्ष का सत्रहवाँ इतवार




पहला पाठ : उतपत्ति 18:20-32


20) इसलिए प्रभु ने कहा, ''सोदोम और गोमोरा के विरुद्ध बहुत ऊँची आवाज़ उठ रही है और उनका पाप बहुत भारी हो गया है।

21) मैं उतर कर देखना और जानना चाहता हूँ कि मेरे पास जैसी आवाज़ पहुँची है, उन्होंने वैसा किया अथवा नहीं।''

22) वे दो पुरुष वहाँ से विदा हो कर सोदोम की ओर चले गये। प्रभु इब्राहीम के साथ रह गया और

23) इब्राहीम ने उसके निकट आ कर कहा, ''क्या तू सचमुच पापियों के साथ-साथ धर्मियों को भी नष्ट करेगा?

24) नगर में शायद पचास धर्मी हैं। क्या तू उन पचास धर्मियों के कारण, जो नगर में बसते हैं, उसे नहीं बचायेगा?

25) क्या तू पापी के साथ-साथ धर्मी को मार सकता है? क्या तू धर्मी और पापी, दोनों के साथ एक-सा व्यवहार कर सकता है? क्या समस्त पृथ्वी का न्यायकर्ता अन्याय कर सकता है?''

26) प्रभु ने उत्तर दिया, ''यदि मुझे नगर में पचास धर्मी भी मिलें, तो मैं उनके लिए पूरा नगर बचाये रखूँगा''।

27) इस पर इब्राहीम ने कहा, ''मैं तो मिट्ठी और राख हूँ; फिर भी क्या मैं अपने प्रभु से कुछ कह सकता हूँ?

28) हो सकता है कि पचास में पाँच कम हों। क्या तू पाँच की कमी के कारण नगर नष्ट करेगा?'' उसने उत्तर दिया, ''यदि मुझे नगर में पैंतालीस धर्मी भी मिलें, तो मैं उसे नष्ट नहीं करूँगा''।

29) इब्राहीम ने फिर उस से कहा, ''हो सकता है कि वहाँ केवल चालीस मिलें''। प्रभु ने उत्तर दिया, ''चालीस के लिए मैं उसे नष्ट नहीं करूँगा''।

30) तब इब्राहीम ने कहा, ''मेरा प्रभु क्रोध न करें और मुझे बोलने दें। हो सकता है कि वहाँ केवल तीस मिलें।'' उसने उत्तर दिया, ''यदि मुझे वहाँ तीस भी मिलें, तो मैं उसे नष्ट नहीं करूँगा''।

31) इब्राहीम ने कहा, ''तू मेरी धृष्टता क्षमा कर - हो सकता है कि केवल बीस मिले'' और उसने उत्तर दिया, ''बीस के लिए मैं उसे नष्ट नहीं करूँगा''।

32) इब्राहिम ने कहा, ''मेरा प्रभु बुरा न माने तो में एक बार और निवेदन करूँगा - हो सकता है कि केवल दस मिलें'' और उसने उत्तर दिया, ''दस के लिए भी में उसे नष्ट नहीं करूँगा।



दुसरा पाठ : कलोसियों 2:12-14



12) आप लोग बपतिस्मा के समय मसीह के साथ दफ़नाये गये और उन्हीं के साथ पुनर्जीवित भी किये गये हैं, क्योंकि आप लोगों ने ईश्वर के सामर्थ्य में विश्वास किया, जिसने उन्हें मृतकों में से पुनर्जीवित किया।

13) आप लोग पापों के कारण और अपने स्वभाव के ख़तने के अभाव के कारण मर गये थे। ईश्वर ने आप लोगों को मसीह के साथ पुनर्जीवित किया है और हमारे सब अपराधों को क्षमा किया है।

14) उसने नियमों का वह बन्धपत्र, जो हमारे विरुद्ध था, रद्द कर दिया और उसे क्रूस पर ठोंक कर उठा दिया है।



सुसमाचार : लुकस 11:1-13



1) एक दिन ईसा किसी स्थान पर प्रार्थना कर रहे थे। प्रार्थना समाप्त होने पर उनके एक शिष्य ने उन से कहा, "प्रभु! हमें प्रार्थना करना सिखाइए, जैसे योहन ने भी अपने शिष्यों को सिखाया"।

2) ईसा ने उन से कहा, "इस प्रकार प्रार्थना किया करोः पिता! तेरा नाम पवित्र माना जाये। तेरा राज्य आये।

3) हमें प्रतिदिन हमारा दैनिक आहार दिया कर।

4) हमारे पाप क्षमा कर, क्योंकि हम भी अपने सब अपराधियों को क्षमा करते हैं और हमें परीक्षा में न डाल।"

5) फिर ईसा ने उन से कहा, "मान लो कि तुम में कोई आधी रात को अपने किसी मित्र के पास जा कर कहे, ’दोस्त, मुझे तीन रोटियाँ उधार दो,

6) क्योंकि मेरा एक मित्र सफ़र में मेरे यहाँ पहुँचा है और उसे खिलाने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है’

7) और वह भीतर से उत्तर दे, ’मुझे तंग न करो। अब तो द्वार बन्द हो चुका है। मेरे बाल-बच्चे और मैं, हम सब बिस्तर पर हैं। मैं उठ कर तुम को नहीं दे सकता।’

8) मैं तुम से कहता हूँ - वह मित्रता के नाते भले ही उठ कर उसे कुछ न दे, किन्तु उसके आग्रह के कारण वह उठेगा और उसकी आवश्यकता पूरी कर देगा।

9) "मैं तुम से कहता हूँ - माँगो और तुम्हें दिया जायेगा; ढूँढ़ो और तुम्हें मिल जायेगा; खटखटाओ और तुम्हारे लिए खोला जायेगा।

10) क्योंकि जो माँगता है, उसे दिया जाता है; जो ढूँढ़ता है, उसे मिल जाता है और जो खटखटाता है, उसके लिए खोला जाता है।

11) "यदि तुम्हारा पुत्र तुम से रोटी माँगे, तो तुम में ऐसा कौन है, जो उसे पत्थर देगा? अथवा मछली माँगे, तो मछली के बदले उसे साँप देगा?

12) अथवा अण्डा माँगे, तो उसे बिच्छू देगा?

13) बुरे होने पर भी यदि तुम लोग अपने बच्चों को सहज ही अच्छी चीज़ें देते हो, तो तुम्हारा स्वर्गिक पिता माँगने वालों को पवित्र आत्मा क्यों नहीं देगा?"



📚 मनन-चिंतन



प्रभु, हमें प्रार्थना करना सिखाएँ!

प्रभु की प्रार्थना में पांच याचिकाएँ हैं- पहली दो, ईश्वर संबंधी और तीन हमारी आवश्यकताओं से जुड़ी है। उन तीनों में से प्रत्येक बहुवचन हैं। (हमें दे दो- हमें माफ कर दो-हमें बचाओ) जो विश्वासी समुदाय पर जोर देता है जिसका हम भी हिस्सा हैं। परन्तु मत्त्ती की इस प्रार्थना के संस्करण (मत्ती 6ः9-13) में सात याचिकाएँ सम्मिलित है। येसु सिखाते हैं कि, प्रार्थना में शब्द इतने महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि, ईश्वर की दया और अनुकंपा पर हमारा भरोसा। सच्ची प्रार्थना अंततः ईश्वर के प्रति विश्वास और समर्पण के संदर्भ में है। हम पूरी श्रृद्धा और भक्ति से प्रार्थना करें और प्रभु अवश्य हमारी प्रार्थना सुनेंगे और उसका उत्तर देंगे।



📚 REFLECTION



Lord Teach us to Pray!

The Lord’s prayer has five petitions. The first two, have to do with God. The last three, have to do with the fulfillment of our needs. Each of those three is plural (“give us—forgive us—bring us”), emphasizing the community of faith of which we are part. It is interesting that the first two petitions involve adoration and the last three supplication. But Matthew’s version of this prayer (Matthew 6:9-13) includes seven petitions. Jesus teaches that words are not so important in prayer as our trust in the goodness of God. Jesus intended that the words should be taken as a template for prayer, a framework on which one can build a life of conversion and dependence on God. True prayer is ultimately about trust and surrender to God. We trust in his perfect plan and surrender to it. When we do this, we can be assured that the Lord will hear and answer our prayers.





आज के पहले पाठ में हम देखते हैं कि सोदोम और गोमोरा का पाप बहुत भारी हो गया। फलस्वरूप प्रभु ईश्वर उन नगरों पर आकाश से गन्धक और आग बरसा कर उनको नष्ट करना चाह रहे थे। लेकिन वे इस बात को इब्राहीम से छिपाना नहीं चाहते थे। जब प्रभु ने इब्राहीम को इस निर्णय के बारे में बताया, तब इब्राहीम उन नगरों की ओर से ईश्वर के समक्ष उन्हें बचाने के लिए मध्यस्थता करने लगे। ईश्वर से इब्राहीम का सवाल था, “क्या तू सचमुच पापियों के साथ-साथ धर्मियों को भी नष्ट करेगा?” लेकिन वहाँ पर दस धर्मी भी नहीं पाये गये। इस पर इब्राहीम ने भी उनके लिए मध्यस्थता करना छोड दिया।

इब्राहीम एक धर्मी मनुष्य थे। संत याकूब कहते हैं, “धर्मात्मा की भक्तिमय प्रार्थना बहुत प्रभावशाली होती है” (याकूब 5:16) संत पेत्रुस कहते हैं, “प्रभु की कृपादृष्ष्टि धर्मियों पर बनी रहती है और उसके कान उनकी प्रार्थना सुनते हैं, किन्तु प्रभु कुकर्मियों से मुंह फेर लेता है” (1 पेत्रुस 3:12)। सूक्ति ग्रन्थ बताता है, “प्रभु दुष्टों से दूर रहता, किन्तु वह धर्मियों की प्रार्थना सुनता है” (सूक्ति 15:29)। संत योहन का कहना है – “हमें ईश्वर पर यह भरोसा है कि यदि हम उसकी इच्छानुसार उस से कुछ भी मांगते हैं, तो वह हमारी सुनता है” (1योहन 5:14)। प्रभु ईश्वर बार-बार इब्राहीम की प्रार्थना सुनते हैं लेकिन इब्राहीम सोदोम और गोमोरा में कम से कम दस धर्मी पाये जाने की जिस संभावना को अपनी प्रार्थना सुनी जाने के शर्त के रूप में रखा था, वह निराधार पाया गया। तत्पश्चात्‍ इब्राहीम उन नगरों के लिए मध्यस्थता करना ही छोड देते हैं।

एक धर्मी व्यक्ति न केवल अपने लिए बल्कि दूसरों के लिए भी प्रार्थना करता है। धर्मी होने के कारण वह निस्वार्थ प्रेम रखता है तथा दूसरों का ख्याल करता है। कभी-कभी लोगों का अधर्म इतना बढ़ जाता है कि ऐसे लोगों के लिए मध्यस्थता करना भी मुश्किल हो जाता है। प्रभु नबी यिरमियाह से कहते हैं, “तुम अब इस प्रजा के लिए प्रार्थना मत करो। इसके लिए न तो क्षमा-याचना करो और न अनुनय-विनय। मुझ से अनुरोध मत करो, मैं नहीं सुनूँगा। क्या तुम नहीं देखते कि लोग यूदा के नगरों और येरुसालेम की गलियों में क्या कर रहे हैं? बच्चे लकड़ियाँ बटोरते, पिता आग सुलगाते और स्त्रियाँ आटा गूँधती हैं, जिससे ये आकाश की देवी के लिए पूरियाँ पकायें। ये अन्य देवताओं को अर्घ चढ़ाते हैं और इस तरह मेरा क्रोध भड़काते हैं।” (यिरमियाह 7:16-18) “तुम उन लोगों के लिए न तो प्रार्थना करो, न विलाप और न अनुनय-विनय; क्योंकि यदि ये संकट के समय मेरी दुहाई देंगें, तो मैं नहीं सुनूँगा” (यिरमियाह 11:14)। “यदि मूसा और समूएल भी मेरे सामने खड़े हो जाते, तो मेरा हृदय इन लोगों पर तरस न खाता। इन्हें मेरे सामने से हटा दो। ये चले जायें।“ (यिरमियाह 15:1) इस प्रकार कभी-कभी लोग ईश्वर की क्षमा के योग्य नहीं बनते हैं हालांकि प्रभु दयालू और दयासागर हैं।

प्रभु येसु निर्जन स्थानों तथा एकान्त में जाकर प्रार्थना में अपने पिता के साथ समय बिताते हैं। अपने दायित्व तथा अनुभवों के बारे में पिता के साथ परामर्श करने के साथ-साथ वे अपने शिष्यों के लिए विशेष प्रार्थना भी करते हैं। अपने स्वर्गिक पिता को संबोधित करते हुए वे कहते हैं, “मैं उनके लिये विनती करता हूँ। मैं ससार के लिये नहीं, बल्कि उनके लिये विनती करता हूँ, जिन्हें तूने मुझे सौंपा है; क्योंकि वे तेरे ही हैं” (योहन 17:9)। “मैं न केवल उनके लिये विनती करता हूँ, बल्कि उनके लिये भी जो, उनकी शिक्षा सुनकर मुझ में विश्वास करेंगे। सब-के-सब एक हो जायें। पिता! जिस तरह तू मुझ में है और मैं तुझ में, उसी तरह वे भी हम में एक हो जायें, जिससे संसार यह विश्वास करे कि तूने मुझे भेजा। (योहन 17:20-21)

प्रभु येसु जानते थे कि पेत्रुस उनका अस्वीकार करेंगे, फिर भी प्रभु ने उनके लिए प्रार्थना की। “सिमोन! सिमोन! शैतान को तुम लोगों को गेहूँ की तरह फटकने की अनुमति मिली है। परन्तु मैंने तुम्हारे लिए प्रार्थना की है, जिससे तुम्हारा विश्वास नष्ट न हो। जब तुम फिर सही रास्ते पर आ जाओगे, तो अपने भाइयों को भी सँभालोगे।" लेकिन शायद यूदस प्रभु की प्रार्थना के लिए भी योग्य नहीं पाये गये। प्रभु कहते हैं, “तूने जिन्हें मुझे सौंपा है, जब तक मैं उनके साथ रहा, मैंने उन्हें तेरे नाम के सामर्थ्य से सुरक्षित रखा। मैंने उनकी रक्षा की। उनमें किसी का भी सर्वनाश नहीं हुआ है। विनाश का पुत्र इसका एक मात्र अपवाद है, क्योंकि धर्मग्रन्थ का पूरा हो जाना अनिवार्य था।” यह बहुत ही दर्दनाक दशा है कि कोई संतों या धर्मियों की मध्यस्थता के भी क़ाबिल नहीं है।

आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि यह जान कर कि प्रभु की प्रार्थना का उनके तथा दूसरों के ऊपर कितना प्रभाव है, एक दिन उनकी प्रार्थना समाप्त होने पर उनके एक शिष्य ने उन से कहा, "प्रभु! हमें प्रार्थना करना सिखाइए, जैसे योहन ने भी अपने शिष्यों को सिखाया" (लूकस 11:1) जवाब में प्रभु येसु सारे शिष्यगणों को ’पिता हमारे’ प्रार्थना सिखाते हैं। यह एक आदर्श प्रार्थना है जिस से हम जान सकते हैं कि हमें किस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए। जब तक हम सारी मानवजाति को प्रभु ईश्वर के बृहत परिवार के रूप में देख नहीं सकते हैं, तब तक हम यह प्रार्थना नहीं कर सकते हैं। क्योंकि इस प्रार्थना में हम सारी मानवजाति के साथ मिल कर ईश्वर को ’हमारे पिता’ कह कर संबोधित करते हैं। फिर प्रार्थना में हमें ईश्वर के नाम की स्तुति तथा उनके राज्य का स्वागत करते हुए ईश्वर की मर्जी को स्वीकार करना चाहिए। तत्पश्चात हमें दैनिक जीवन के लिए पर्याप्त कृपा की याचना करनी चाहिए। हम सब पापी है। इस प्रार्थाना में हमें यह शिक्षा भी मिलती है कि प्रभु ईश्वर से हमारे अपराधों की क्षमा प्राप्त करने हेतु हमें हमारे अपराधियों को क्षमा करना होगा। इस प्रकार यह उत्कृष्ट प्रार्थना हमारे लिए एक आदर्श प्रार्थना बनती है, सथा ही महत्वपूर्ण शिक्षा भी। आईए, हम इस प्रार्थना को अपनाएं और अर्थपूर्ण ढ़ंग से बोलना सीखें।


 -Br. Biniush Topno


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