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20 मार्च 2022, इतवार चालीसे का तीसरा इतवार


20 मार्च 2022, इतवार

चालीसे का तीसरा इतवार



पहला पाठ : निर्गमन 3:1-8,13-15


1) मूसा अपने ससुर, मिदयान के याजक, यित्रों की भेडें चराया करता था। वह उन्हें बहुत दूर तक उजाड़ प्रदेश में ले जा कर ईश्वर के पर्वत होरेब के पास पहुँचा।

2) वहाँ उसे झाड़ी के बीच में से निकलती हुई आग की लपट के रूप में प्रभु का दूत दिखाई दिया। उसने देखा कि झाड़ी में तो आग लगी है, किन्तु वह भस्म नहीं हो रही है।

3) मूसा ने मन में कहा कि यह अनोखी बात निकट से देखने जाऊँगा और यह पता लगाऊँगा कि झाड़ी भस्म क्यों नहीं हो रही है।

4) निरीक्षण करने के लिए उसे निकट आते देख कर ईश्वर ने झाड़ी के बीच में से पुकार कर उससे कहा, ''मूसा! मूसा!'' उसने उत्तर दिया, ''प्रस्तुत हूँ।''

5) ईश्वर ने कहा, ''पास मत आओ। पैरों से जूते उतार दो, क्योंकि तुम जहाँ खड़े हो, वह पवित्र भूमि है।''

6) ईश्वर ने फिर उस से कहा, ''मैं तुम्हारे पिता का ईश्वर हूँ, इब्राहीम, इसहाक तथा याकूब का ईश्वर।'' इस पर मूसा ने अपना मुख ढक लिया; कहीं ऐसा न हो कि वह ईश्वर को देख ले।

7) प्रभु ने कहा, ''मैंने मिस्र में रहने वाली अपनी प्रजा की दयनीय दशा देखी और अत्याचारियों से मुक्ति के लिए उसकी पुकार सुनी है। मैं उसका दुःख अच्छी तरह जानता हूँ।

8) मैं उसे मिस्रियों के हाथ से छुड़ा कर और इस देश से निकाल कर, एक समृद्ध तथा विशाल देश ले जाऊँगा, जहॉँ दूध तथा मधु की नदियाँ बहती हैं, जहाँ कनानी, हित्ती, अमोरी, परिज्जी, हिव्वी और यबूसी बसते हैं।

13) मूसा ने झाड़ी में से प्रभु की वाणी सुन कर उस से कहा, ''जब मैं इस्राएलियों के पास पहुँच कर उन से यह कहॅूँगा - तुम्हारें पूर्वजों के ईश्वर ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है, और वे मुझ से पूछेंगे कि उसका नाम क्या है, तो मैं उन्हें क्या उत्तर दूँगा?''

14) ईश्वर ने मूसा से कहा, ''मेरा नाम सत् है। उसने फिर कहा, ''तुम इस्राएलियों को यह उत्तर दोगे जिसका नाम "सत्" है, उसी ने मुझे भेजा है।''

15) इसके बाद ईश्वर मूसा से कहा, ''तुम इस्राएलियों से यह कहोगे - प्रभु तुम्हारे पूर्वजों के ईश्वर, इब्राहीम, इसहाक तथा याकूब के ईश्वर ने मुझे तुम लोगों के पास भेजा है। यह सदा के लिए मेरा नाम रहेगा और यही नाम ले कर सब पीढ़ियॉँ मुझ से प्रार्थना करेंगी।



दूसरा पाठ : 1 कुरिन्थियों 10:1-6,10-12



1) भाइयो! मैं आप लोगों को याद दिलाना चाहता हूँ कि हमारे सभी बाप-दादे बादल की छाया में चले, सबों ने समुद्र पार किया,

2) और इस प्रकार बादल और समुद्र का बपतिस्मा ग्रहण कर सब-के-सब मूसा के सहभागी बने।

3) सबों ने एक ही आध्यात्मिक भोजन ग्रहण किया

4) और एक ही आध्यामिक पेय का पान किया; क्योंकि वे एक आध्यात्मिक चट्टान का जल पीते थे, जो उनके साथ-साथ चलती थी और वह चट्टान थी - मसीह।

5) फिर भी उन में अधिकांश लोग ईश्वर के कृपा पात्र नहीं बन सके और मरुभूमि में ढेर हो गये।

6) ये घटनाएँ हम को यह शिक्षा देती हैं कि हमें उनके समान बुरी चीजों का लालच नहीं करना चाहिए।

10) आप लोग नहीं भुनभुनायें, जैसा कि उन में कुछ भुनभुनाये और विनाशक दूत ने उन्हें नष्ट कर दिया।

11) यह सब दृष्टान्त के रूप में उन पर बीता और हमें चेतावनी देने के लिए लिखा गया है, जो युग के अन्त में विद्यमान है।

12) इसलिए जो यह समझता है कि मैं दृढ़ हूँ, वह सावधान रहे। कहीं ऐसा न हो कि वह विचलित हो जाये।



सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 13:1-9



1) उस समय कुछ लोग ईसा को उन गलीलियों के विषय में बताने आये, जिनका रक्त पिलातुस ने उनके बलि-पशुओं के रक्त में मिला दिया था।

2) ईसा ने उन से कहा, "क्या तुम समझते हो कि ये गलीली अन्य सब गलीलियों से अधिक पापी थे, क्योंकि उन पर ही ऐसी विपत्ति पड़ी?

3) मैं तुम से कहता हूँ, ऐसा नहीं है; लेकिन यदि तुम पश्चात्ताप नहीं करोगे, तो सब-के-सब उसी तरह नष्ट हो जाओगे।

4) अथवा क्या तुम समझते हो कि सिल़ोआम की मीनार के गिरने से जो अठारह व्यक्ति दब कऱ मर गये, वे येरुसालेम के सब निवासियों से अधिक अपराधी थे?

5) मैं तुम से कहता हूँ, ऐसा नहीं है; लेकिन यदि तुम पश्चात्ताप नहीं करोगे, तो सब-के-सब उसी तरह नष्ट हो जाओगे।"

6) तब ईसा ने यह दृष्टान्त सुनाया, "किसी मनुष्य की दाखबारी में एक अंजीर का पेड़ था। वह उस में फल खोजने आया, परन्तु उसे एक भी नहीं मिला।

7) तब उसने दाखबारी के माली से कहा, ’देखो, मैं तीन वर्षों से अंजीर के इस पेड़ में फल खोजने आता हूँ, किन्तु मुझे एक भी नहीं मिलता। इसे काट डालो। यह भूमि को क्यों छेंके हुए हैं?’

8) परन्तु माली ने उत्तर दिया, ’मालिक! इस वर्ष भी इसे रहने दीजिए। मैं इसके चारों ओर खोद कर खाद दूँगा।

9) यदि यह अगले वर्ष फल दे, तो अच्छा, नहीं तो इसे काट डालिएगा’।"



📚 मनन-चिंतन


मत्ती 4:17 के अनुसार, येसु ने अपना सार्वजनिक जीवन शुरू करते हुए कहा, “पश्चात्ताप करो। स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है”। जब ईश्वर का राज्य निकट है, हमें उसे पश्चाताप के साथ अपनाना होगा। आज के सुसमाचार में येसु पश्चाताप की तात्कालिकता और आवश्यकता पर जोर देते हैं। प्रभु अपनी दया से हमें अपनी क्षमा प्रदान करते हैं। हमें अपने पश्चाताप के द्वारा ईश्वर की क्षमा को प्राप्त करना चाहिए। वे हमें चेतावनी देते हैं कि अगर हम पश्चात्ताप नहीं करेंगे, तो हमारा सर्वनाश होगा। स्कॉटिश इतिहासकार, आलोचक और समाजशास्त्रीय लेखक थॉमस कार्लाइल कहते हैं, "मनुष्य के सभी कृत्यों में पश्चाताप सबसे दिव्य है। सभी दोषों में सबसे बड़ा दोष किसी के प्रति सचेत न रहना है।" येसु हमें चेतावनी देते हैं कि यदि हम पश्चाताप नहीं करते हैं तो हमारा विनाश होना अनिवार्य है। संत योहन क्रिसोस्टॉम कहते हैं, "क्या आपने अपनी आत्मा को बूढ़ा बना दिया है? निराश न हों, हताश न हों, बल्कि पश्चाताप, और आँसू, और पाप-स्वीकार, और अच्छे कामों के द्वारा अपनी आत्मा को नवीनीकृत करें। और ऐसा करना कभी न छोड़ें।" वे यह भी कहते हैं, "पश्चाताप की बात करना पाप को नज़रअंदाज़ करना पसंद करने वाली आज की दुनिया में फैशन नहीं है, फिर भी हम जो मसीह के हैं, इस बात की गवाही दे सकते हैं कि पश्चाताप - क्षमा और स्वतंत्रता का मार्ग है। यह वह कुंजी है जो ईश्वर की दया को खोल देती है! पश्चात्ताप करने का आह्वान हमेशा पहले स्वयं को संबोधित किया जाता है, क्योंकि हम सभी लोगों को लगातार गहरे परिवर्तन की आवश्यकता होती है।”



📚 REFLECTION



According to Mt 4:17, Jesus began his public ministry preaching, “Repent, for the kingdom of heaven has come near”. While the kingdom of God is near, one has to approach it with repentance. In today’s Gospel, Jesus emphasizes the urgency and necessity of repentance. God in his mercy offers his forgiveness to us. We need to receive this forgiveness by our repentance. He warns, “unless you repent, you will all likewise perish”. The Scottish historian, critic, and sociological writer Thomas Carlyle says, “Of all acts of man repentance is the most divine. The greatest of all faults is to be conscious of none.” Jesus warns us that if we do not repent what awaits us is destruction. St. John Chrysostom says, “Have you made your soul old? Do not despair, do not despond, but renew your soul by repentance, and tears, and Confession, and by doing good things. And never cease doing this.” He also says, “To speak of repentance is not fashionable today in a world that prefers to ignore sin, yet we who belong to Christ can testify that repentance is the way to forgiveness and freedom. It is the key that unlocks the mercy of God! The call to repentance is always addressed to ourselves first, since all of us are continually in need of deeper conversion.”



मनन-चिंतन -2


ईश्वर की इच्छा किसी को भी नष्ट करने की नहीं है। वे सभी से प्रेम करते हैं तथा उन्हें बचाना चाहते हैं क्योंकि सबकुछ का सृष्टिकर्ता ईश्वर ही है। किन्तु यदि मनुष्य अपने पाप के मार्ग पर हठी बन जाता है और अपने जीवन को ईश्वर के इच्छानुसार नहीं सुधार पाता है तो उसका विनाश निश्चित हो जाता है। किन्तु उसके अंत से पहले ईश्वर सभी को सुधरने या सकारात्मक बदलाव लाने का अवसर देते हैं।

आज के सुसमाचार में ईसा विभिन्न घटनाओं द्वारा ईश्वर की चेतावनी तथा बचने के अवसरों को बताते हैं। पिलातुस ने कुछ गलीलियों का रक्त बलि-पशुओं के रक्त के साथ मिला दिया था। इस घटना ने यहूदियों को हिला दिया था। यहूदियों में यह धारणा थी कि यदि किसी के जीवन में कुछ बीमारी, असमय या आकस्मिक मृत्यु, विपत्ति आती थी तो इसका कारण उसके या उसके पूर्वजों के पाप रहे होंगे। यहूदियों की सोच की इस पृष्ठभूमि को समझ कर प्रभु उनसे पूछते हैं, “क्या तुम समझते हो कि ये गलीली अन्य सब गलीलियों से अधिक पापी थे, क्योंकि उन पर ही ऐसी विपत्ति पड़ी? मैं तुम से कहता हूँ, ऐसा नहीं है लेकिन यदि तुम पश्चात्ताप नहीं करोगे, तो सब-के-सब उसी तरह नष्ट हो जाओगे।” इसका तात्पर्य है उन मरे गलीलियों से अधिक पापी लोग भी वहाँ जीवित थे जिन्हें ईश्वर बदलने का अवसर प्रदान करते हैं। अपने इसी सिद्धांत को अधिक स्पष्ट करते हुये येसु आगे सिलोआम की मीनार गिरने की दुर्घटना जिसमें दबकर अठारह व्यक्ति मर गये थे का जिक्र करते हुये भी इसी सच्चाई को दोहराते हैं कि जो मर गये वे अधिक पापी नहीं थे और जो जीवित हैं वे अधिक नेक लोग नहीं है। जीवितों को पश्चाताप का मार्ग अपनाते हुये जीवन बदलना चाहिए अन्यथा उनका अंत भी बुरा होगा। हरेक व्यक्ति अपने जीवन के प्रति उत्तरदायी है तथा उसके कर्मों का परिणाम उसे भी भुगतना पडेगा। संत पौलुस हमें समझाते हैं – “हम सबों को मसीह के न्यायासन के सामने पेश किया जायेगा। प्रत्येक व्यक्ति ने शरीर में रहते समय जो कुछ किया है, चाहे वह भलाई हो या बुराई, उसे उसका बदला चुकाया जायेगा।” (2 कुरिन्थियों 5:10)

कई बार हम भ्रष्ट, अन्यायी, कुकर्मी व्यक्तियों को फलते-फूलते देखते हैं तो सोचते हैं जो वे कर रहे हैं उसका परिणाम उन्हें भुगतना नहीं पडेगा। उनके फलते-फूलते दिन वास्तव में ईश्वर द्वारा प्रदान वह अवधि है जिसमें वे चाहे तो अपने कुकर्मों को त्याग कर सच्चाई का मार्ग अपना सकते हैं। यदि वे ऐसा नहीं करते तो अचानक ही विपति एवं मृत्यु का दिन उन पर आ पडता है और वे नष्ट हो जाते हैं।

कई बार हम दूसरों के जीवन की विपत्ति को देखकर सोचते हैं कि वे अपने कर्मों का फल भोग रहे हैं। यह शायद सच भी हो लेकिन इसी दौरान हमें भी अपने जीवन का अवलोकन करना चाहिये तथा दूसरों की विपत्ति से सीख लेकर अपने जीवन की बुराईयों को हटाना चाहिये।

फलहीन अंजीर को काटने के आदेश पर माली कहता है, “मालिक! इस वर्ष भी इसे रहने दीजिए। मैं इसके चारों ओर खोद कर खाद दूँगा। यदि यह अगले वर्ष फल दे, तो अच्छा, नहीं तो इसे काट डालिएगा’।” माली की इस प्रकार अंजीर के पेड को बचाने की गुहार वास्तव में ईश्वर की सोच है, हर उस व्यक्ति के लिए है जो अपने जीवन को व्यर्थ ही जी रहा है।

यदि हम भी अपने फलहीन जीवन में फल उत्पन्न करना चाहते हैं तो माली के समान हमें भी जीवन को उपजाऊ बनाने के लिये विभिन्न प्रयत्न करने चाहिये। फलदायी बनने के लिए येसु के कहते हैं, “मैं दाखलता हूँ और तुम डालियाँ हो। जो मुझ में रहता है और मैं जिसमें रहता हूँ वही फलता है क्योंकि मुझ से अलग रहकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।” (योहन 15:5) येसु के साथ एक हो जाने से तात्पर्य है हमें येसु की शिक्षाओं से एकमत होकर उनके अनुसार जीवन जीना चाहिये। जो व्यक्ति अपने जीवन को ईश्वचन के अनुसार ढालता है वह अधिक फलताफूलता है। प्रभु स्वयं यह वादा करते हैं – “यदि तुम मुझ में रहो और तुम में मेरी शिक्षा बनी रहती है तो चाहे जो माँगो, वह तुम्हें दिया जायेगा।” आइये हम भी अपने जीवन को फलदायी बनाये तथा येसु की शिक्षा को अपनाये।


✍ -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!

13 मार्च 2022, इतवार चालीसे का दूसरा इतवा

 

13 मार्च 2022, इतवार 

चालीसे का दूसरा इतवार



पहला पाठ : उत्पत्ति 15:5-12, 17-18


5) ईश्वर ने अब्राम को बाहर ले जाकर कहा, ''आकाश की और दृष्टि लगाओ और सम्भव हो, तो तारों की गिनती करो''। उसने उस से यह भी कहा, ''तुम्हारी सन्तति इतनी ही बड़ी होगी''।

6) अब्राम ने ईश्वर में विश्वास किया और इस कारण प्रभु ने उसे धार्मिक माना।

7) प्रभु ने उस से कहा, ''मैं वही प्रभु हूँ, जो तुम्हें इस देश का उत्तराधिकारी बनाने के लिए खल्दैयों के ऊर नामक नगर से निकाल लाया था।''

8) अब्राम ने उत्तर दिया, ''प्रभु! मेरे ईश्वर! मैं यह कैसे जान पाऊँगा कि इस पर मेरा अधिकार हो जायेगा?''

9) प्रभु ने कहा, ''तीन वर्ष की कलोर, तीन वर्ष की बकरी, तीन वर्ष का मेढा, एक पाण्डुक और एक कपोत का बच्चा यहाँ ले आना''।

10) अब्राम ये सब ले आया। उसने उनके दो-दो टुकड़े कर दिये और उन टुकड़ों को आमने-सामने रख दिया, किन्तु पक्षियों के दो-दो टुकड़े नहीं किये।

11) गीध लाशों पर उतर आये, किन्तु अब्राम ने उन्हें भगा दिया।

12) जब सूर्य डूबने पर था, तो अब्राम गहरी नींद में सो गया और उस पर आतंक छा गया।

17) सूर्य डूबने तथा गहरा अन्धकार हो जाने पर एक धुँआती हुई अंगीठी तथा एक जलती हुई मशाल दिखाई पड़ी, जो जानवरों के उन टुकडों के बीच से होते हुए आगे निकल गयीं।

18) उस दिन प्रभु ने यह कह कर अब्राम के लिए विधान प्रकट किया, मैं मिस्त्र की नदी से लेकर महानदी अर्थात् फ़रात नदी तक का यह देश तुम्हारे वंशजों को दे देता हूँ।


दूसरा पाठ : फिलिप्पियो 3:17-4:1


3:17) भाईयो! आप सब मिल कर मेरा अनुसरण करें। मैंने आप लोगों को एक नमूना दिया। इसके अनुसार चलने वालों पर ध्यान देते रहें;

18) क्योंकि जैसा कि मैं आप से बार-बार कह चुका हूँ और अब रोते हुए कहता हूँ, बहुत-से लोग ऐसा आचरण करते हैं कि मसीह के क्रूस के शत्रु बन जाते हैं।

19) उनका सर्वनाश निश्चित है। वे भोजन को अपना ईश्वर बना लेते हैं और ऐसी बातों पर गर्व करते हैं, जिन पर लज्जा करनी चाहिए। उनका मन संसार की चीजों में लगा हुआ है।

20) हमारा स्वदेश तो स्वर्ग है और हम स्वर्ग से आने वाले मुक्तिदाता प्रभु ईसा मसीह की राह देखते रहते हैं।

21) वह जिस सामर्थ्य द्वारा सब कुछ अपने अधीन कर सकते हैं, उसी के द्वारा वह हमारे तुच्छ शरीर का रूपान्तरण करेंगे और उसे अपने महिमामय शरीर के अनुरूप बना देंगे।

4:1) इसीलिए मेरे प्रिय भाइयो, प्रभु में इस तरह दृढ़ रहिए। प्रिय भाइयो! मुझे आप लोगों से मिलने की बड़ी इच्छा है। आप मेरे आनन्द और मेरे मुकुट हैं।


सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 9:28-36


28) इन बातों के करीब आठ दिन बाद ईसा पेत्रुस, योहन और याकूब को अपने साथ ले गये और प्रार्थना करने के लिए एक पहाड़ पर चढ़े।

29) प्रार्थना करते समय ईसा के मुखमण्डल का रूपान्तरण हो गया और उनके वस्त्र उज्जवल हो कर जगमगा उठे।

30) दो पुरुष उनके साथ बातचीत कर रहे थे। वे मूसा और एलियस थे,

31) जो महिमा-सहित प्रकट हो कर येरुसालेम में होने वाली उनकी मृत्यु के विषय में बातें कर रहे थे।

32) पेत्रुस और उसके साथी, जो ऊँघ रहे थे, अब पूरी तरह जाग गये। उन्होंने ईसा की महिमा को और उनके साथ उन दो पुरुषों को देखा।

33) वे विदा हो ही रहे थे कि पेत्रुस ने ईसा से कहा, "गुरूवर! यहाँ होना हमारे लिए कितना अच्छा है! हम तीन तम्बू खड़ा कर दें- एक आपके लिए, एक मूसा और एक एलियस के लिए।" उसे पता नहीं था कि वह क्या कह रहा है।

34) वह बोल ही रहा था कि बादल आ कर उन पर छा गया और वे बादल से घिर जाने के कारण भयभीत हो गये।

35) बादल में से यह वाणी सुनाई पड़ी, "यह मेरा परमप्रिय पुत्र है। इसकी सुनो।"

36) वाणी समाप्त होने पर ईसा अकेले ही रह गये। शिष्य इस सम्बन्ध में चुप रहे और उन्होंने जो देखा था, उस विषय पर वे उन दिनों किसी से कुछ नहीं बोले।


📚 मनन-चिंतन


रूपान्तरण शिष्यों के सबसे मनोरम अनुभवों में से एक था। वर्षों बाद संत पेत्रुस ने कहा, “जब हमने आप लोगों को अपने प्रभु ईसा मसीह के सामर्थ्य तथा पुनरागमन के विषय में बताया, तो हमने कपट-कल्पित कथाओं का सहारा नहीं लिया, बल्कि अपनी ही आंखों से उनका प्रताप उस समय देखा, जब उन्हें पिता-परमेश्वर के सम्मान तथा महिमा प्राप्त हुई और भव्य ऐश्वर्य में से उनके प्रति एक वाणी यह कहती हुई सुनाई पड़ी, "यह मेरा प्रिय पुत्र है। मैं इस पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ।" (2 पेत्रुस 1:16-18)। संत योहन के पत्र में भी इस घटना के स्थायी प्रभाव की एक प्रतिध्वनि है। वे कहते हैं, “हमारा विषय वह शब्द है, जो आदि से विद्यमान था। हमने उसे सुना है। हमने उसे अपनी आंखों से देखा है। हमने उसका अवलोकन किया और अपने हाथों से उसका स्पर्श किया है। वह शब्द जीवन है और यह जीवन प्रकट किया गया है। यह शाश्वत जीवन, जो पिता के यहाँ था और हम पर प्रकट किया गया है- हमने इसे देखा है, हम इसके विषय में साक्ष्य देते ओर तुम्हें इसका सन्देश सुनाते हैं। हमने जो देखा और सुना है, वही हम तुम लोगों को भी बताते हैं, जिससे तुम हमारे साथ पिता और उस के पुत्र ईसा मसीह के जीवन के सहभागी बनो। (1योहन 1:1-3) रूपान्तरण का यह अनुभव चेलों को उन कष्टों का सामना करने हेतु मज़बूत करने के लिए था, जिनसे येसु गुज़रने वाले थे। प्रभु ईश्वर का अनुभव हमें अपनी परेशानियों तथा मुसीबतों के समय सशक्त बनायें।




📚 REFLECTION

Transfiguration was one of the most captivating experiences of the disciples. Years later St. Peter said, “For we did not follow cleverly devised myths when we made known to you the power and coming of our Lord Jesus Christ, but we had been eyewitnesses of his majesty. For he received honor and glory from God the Father when that voice was conveyed to him by the Majestic Glory, saying, “This is my Son, my Beloved, with whom I am well pleased.” We ourselves heard this voice come from heaven, while we were with him on the holy mountain.” (2Pet 1:16-18). In St. John’s writings too we have an echo of the lasting impact of this event. He says, “We declare to you what was from the beginning, what we have heard, what we have seen with our eyes, what we have looked at and touched with our hands, concerning the word of life— this life was revealed, and we have seen it and testify to it, and declare to you the eternal life that was with the Father and was revealed to us— we declare to you what we have seen and heard so that you also may have fellowship with us; and truly our fellowship is with the Father and with his Son Jesus Christ.” (1Jn 1:1-3) This experience of transfiguration was meant to strengthen the disciples on the face of the sufferings Jesus was about to undergo. Let the experience of God strengthen our life especially in our difficulties.


मनन-चिंतन - 2


हम अपने जीवन में आश्वासन चाहते हैं। यदि हमें किसी से कोई आशा है तो उसका कारण हमारा पूर्व का संतोषप्रद अनुभव होगा। कई बार हम आशाहीन भी हो जाते हैं। इसका कारण भी हमारा पूर्व का कटु अनुभव होगा। बैंक जब ऋण देता है तो वह भी वापसी के आशा में गारंटी के रूप में कुछ भरोसेमंद आश्वासन चाहता है। इस प्रकार हम अपने जीवन में आश्वासन चाहते हैं कि कोई हमारे साथ है या जो हम कर रहे हैं वह सही दिशा में उठाये कदम है। आज के पहले पाठ में पिता इब्राहिम भी ईश्वर से उनकी प्रतिज्ञाओं के प्रति कुछ आश्वासन चाहते हैं। ईश्वर ने जो प्रतिज्ञा उन से की थी वह मानव दृष्टिकोण से लगभग असंभव प्रतीत होती है। ’’आकाश की और दृष्टि लगाओ और सम्भव हो, तो तारों की गिनती करो। ....तुम्हारी सन्तति इतनी ही बड़ी होगी।’’ इब्राहिम जो बुढा तथा निसंतान था किन्तु विश्वास का धनी था ईश्वर पर अविश्वास नहीं करता किन्तु केवल आश्वासन चाहता है जिसके बल पर वह प्रतिज्ञा के पूर्ण हो जाने तक विश्वासी तथा दृढ बना रहे। सृष्टिकर्ता ईश्वर जिनके लिये कुछ भी असंभव नहीं है इब्राहिम को आश्वासन के रूप में ’’धुँआती हुई अंगीठी तथा एक जलती हुई मशाल’’ के रूप में इब्राहिम के बलिदान के बीच से होकर गुजरते हैं।

ईश्वर अपने भक्तों को निराश नहीं करते और बाइबिल में अनेक स्थानों पर हम पाते हैं कि वे अपनी उपस्थिति तथा चिन्हों द्वारा उन्हें आश्वांवित कर उनकी हौसला अफजाई करते हैं। निर्गमन ग्रंथ में मूसा भी प्रभु से आश्वासन चाहते हैं। ’’यदि मैं सचमुच तेरा कृपापात्र हूँ, तो मुझे अपना मार्ग दिखला, जिससे मैं तुझे जान सकूँ और तेरा कृपापात्र बना रहूँ। ....हम यह कैसे जान सकेंगे कि मैं और तेरे ये लोग तेरे कृपापात्र हैं? यदि तू हमारे साथ नहीं चलता, तो मैं और तेरे ये लोग पृथ्वी के अन्य सब लोगों से कैसे विशिष्ट समझे जायेंगे?..., ’’मुझे अपनी महिमा दिखाने की कृपा कर।’ मैं अपनी सम्पूर्ण महिमा के साथ तुम्हारे सामने से निकल जाऊँगा और तुम पर अपना ’प्रभु’ नाम प्रकट करूँगा। मैं जिनके प्रति कृपालु हूँ, उन पर कृपा करूँगा और जिनके प्रति दयालू हूँ, उन पर दया करूँगा। .....तुम एक चट्टान पर खड़े हो सकते हो। और जब तक तुम्हारे सामने से मेरी महिमा नहीं निकल जायेगी, तब तक मैं तुम्हें चट्टान की दरार में रखूँगा और तुम्हारे सामने से निकलते समय अपने हाथ से तुम्हारी रक्षा करूँगा।’’ (देखिए निर्गमन 33:13-22) इस प्रकार ईश्वर मूसा को आश्वांवित करते तथा उसके मिशन को प्रमाणित भी करते हैं।

जब ईश्वर का दूत गिदओन से मिदयानियों से युद्ध पर जाने तथा उसे विजय का आश्वासन देता हैं तो गिदओन भी ईश्वर से आश्वासन चाहते हुये निवेदन करता है, ’’यदि मुझ पर आपकी कृपा दृष्टि हो, तो मुझे एक ऐसा चिन्ह दीजिए, जिससे मैं जान सकूँ कि आप ही मुझ से बोल रहे हैं। आप कृपया यहाँ से तब तक न जायें, जब तक मैं आपके पास न लौट आऊँ। मैं अपना चढ़ावा ले कर आऊँगा और आपके सामने रखूँगा।’’ .....प्रभु के दूत ने उस से कहा, ’’मांस और रोटियाँ वहाँ चट्टान पर रखो और उन पर शोरबा उँड़ेल दो’’। उसने यही किया। तब प्रभु के दूत ने अपने हाथ का डण्डा बढ़ा कर उसके सिरे से मांस और बेखमीर रोटियों को स्पर्श किया। इस पर चट्टान से आग निकली, जिसने मांस और बेखमीर रोटियों को भस्म कर दिया और प्रभु का दूत गिदओन की आँख से ओझल हो गया। तब गिदओन समझ गया कि वह प्रभु का दूत था और उसने कहा, ’’हाय! प्रभु-ईश्वर! मैंने प्रभु के दूत को आमने-सामने देखा है।’’ (देखिए न्यायकताओं 6:17-22)

नबी एलियाह शक्तिशाली तथा साहसिक नबी थे। उन्होंने ईश्वर के लिए लोगों के सामने निडर होकर गवाही दी तथा चमत्कारिक कार्य किये। किन्तु एक मोड पर वे थक-हार जाते हैं। वे ईज़ेबेल की मौत की धमकी से डरकर भयभीत हो जाते हैं। ’’इस से एलियाह भयभीत हो गया और अपने प्राण बचाने के लिय यूदा के बएर-शेबा भाग गया। वहाँ उसने अपने सेवक को छोड़ दिया और वह मरुभूमि में एक दिन का रास्ता तय कर एक झाड़ी के नीचे बैठ गया और यह कह कर मौत के लिए प्रार्थना करने लगा, ‘‘प्रभु! बहुत हुआ। मुझे उठा ले, क्योंकि मैं अपने पुरखों से अच्छा नहीं हूँ।’’ (1 राजाओं 19:3-4)

किन्तु ईश्वर अपने सेवक को नहीं भूलता है। वे स्वर्गदूत को भेज कर उन्हें ढाढस बंधाते हुये कहते हैं, ‘‘उठिए और खाइए, नहीं तो रास्ता आपके लिए अधिक लम्बा हो जायेगा’’। एलियाह भोजन कर चालीस दिन और चालीस रात चल कर ईश्वर के पर्वत होरेब पहुँचा। वहॉ पर उसे अंत में ईश्वर के दर्शन हुये। “....तब प्रभु उसके सामने से हो कर आगे बढ़ा। प्रभु के आगे-आगे एक प्रचण्ड आँधी चली - पहाड़ फट गये और चट्टानें टूट गयीं, किन्तु प्रभु आँधी में नहीं था। आँधी के बाद भूकम्प हुआ, किन्तु प्रभु भूकम्प में नहीं था। भूकम्प के बाद अग्नि दिखाई पड़ी, किन्तु प्रभु अग्नि में नहीं था। अग्नि के बाद मन्द समीर की सरसराहट सुनाई पड़ी। एलियाह ने यह सुनकर अपना मुँह चादर से ढक लिया और वह बाहर निकल कर गुफा के द्वार पर खड़ा हो गया। तब उसे एक वाणी यह कहते हुए सुनाई पड़ी, “एलियाह! तुम यहाँ क्या कर रहे हो?“ (1 राजाओं 19:1-13) इस प्रकार ईश्वर के दर्शन पाकर एलियाह पुनः उत्साहित हो जाता है।

इस प्रकार ईश्वर दाऊद, मनोअह (देखिए न्यायकर्ताओं 13:2-23), दानिएल (दानिएल 14:37-39), स्तेफनुस (प्रेरित चरित 7:55-60), संत पौलुस (2 कुरिन्थियों 12:1-10) सुलेमान (1 राजाओं 3:5-12) आदि अनेकानेक भक्तों को अपनी उपस्थिति या चिन्ह द्वारा आश्वासन एवं सहायता प्रदान करता है। आज का सुसमाचार भी येसु तथा उनके शिष्यों पेत्रुस, योहन और याकूब के लिए भावी दुखःभोग के होने तथा उस दौरान साहसी एवं विश्वासी बने रहने का आश्वासन था। पिता परमेश्वर येसु को अपना प्रिय पुत्र घोषित कर उन्हें भी आश्वासन देते हैं तथा येसु इस दृश्य के द्वारा अपने इन तीन शिष्यों को भविष्य के दुःखभोग तथा कू्रसमरण से उदास एवं हताश नहीं होने के लिए आश्वांवित करते हैं।

हमारे जीवन में भी कठिन अवसर आते हैं। ऐसे मौको पर हम निराश एवं हताश हो उठते हैं। हम भी आशा और दिलासे के लिए इधर-उधर देखते हैं। हमारा विश्वास भी शायद हिल जाता है। हमें पवित्र बाइबिल में दिये इन उदाहरणों से सीखना चाहिये तथा ईश्वर से उसके संरक्षण, सानिध्य तथा सामिप्य की गुहार लगाना चाहिये। ईश्वर हमें कभी भी निराश नहीं करेंगे। बाइबिल के आदर्शों एवं उदाहरणों के अनुसार ईश्वर हमें उनकी उपस्थिति की कृपा प्रदान करेंगे। यह प्रभु का वचन है जो कहता है “उनके दुहाई देने से पहले ही, मैं उन्हें उत्तर दूँगा; उनकी प्रार्थना पूरी होने से पहले ही, मैं उसे स्वीकार करूँगा।“ (इसायाह 65:24)


✍ -Br. Biniush Topno


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06 मार्च 2022, इतवार चालीसा काल का पहला इतवार

 

06 मार्च 2022, इतवार

चालीसा काल का पहला इतवार



📒 पहला पाठ : विधि-विवरण 26:4-10


4) "याजक तुम्हारे हाथ से टोकरी ले कर उसे तुम्हारे प्रभु-ईश्वर की वेदी के सामने रख देगा।

5) तब तुम लोग अपने प्रभु-ईश्वर के सामने यह कहोगे, ’हमारे पूर्वज अरामी यायावर थे। जब वे शरण लेने के लिए मिस्र देश में बसने आये, तो थोड़े थे; किन्तु वे वहाँ एक शक्तिशाली बहुसंख्यक तथा महान् राष्ट्र बन गये।

6) मिस्र के लोग हमें सताने, हम पर अत्याचार करने और हम को कठोर बेगार में लगाने लगे।

7) तब हमने प्रभु की, अपने पूर्वजों के ईश्वर की, दुहाई दी। प्रभु ने हमारी दुर्गति, दुःख-तकलीफ़ तथा हम पर किया जाने वाला अत्याचार देख कर हमारी पुकार सुन ली।

8) आतंक फैला कर और चिन्ह तथा चमत्कार दिखा कर प्रभु ने अपने बाहुबल से हमें मिस्र से निकाल लिया।

9) उसने हमें यहाँ ला कर यह देश, जहाँ दूध अैर मधु की नदियाँ बहती हैं, दे दिया।

10) प्रभु! तूने मुझे जो भूमि दी है, उसकी फ़सल के प्रथम फल मैं तुझे चढ़ा रहा हूँ - यह कह कर तुम उन्हें अपने प्रभु-ईश्वर के सामने रखोगे और अपने प्रभु-ईश्वर को दण्डवत् करोगे।



📒 दूसरा पाठ : रोमियों 10:8-13



8) किन्तु धर्मग्रन्थ क्या कहता है?- वचन तुम्हारे पास ही हैं, वह तुम्हारे मुख में और तुम्हारे हृदय में है। यह विश्वास का वह वचन है जिसका हम प्रचार करते हैं।

9) क्योंकि यदि आप लोग मुख से स्वीकार करते हैं कि ईसा प्रभु हैं और हृदय से विश्वास करते हैं कि ईश्वर ने उन्हें मृतकों में से जिलाया, तो आप को मुक्ति प्राप्त होगी।

10) हृदय से विश्वास करने पर मनुष्य धर्मी बनता है और मुख से स्वीकार करने पर उसे मुक्ति प्राप्त होती है।

11) धर्मग्रन्थ कहता है, "जो उस पर विश्वास करता है, उसे लज्जित नहीं होना पड़ेगा"।

12) इसलिए यहूदी और यूनानी और यूनानी में कोई भेद नहीं है- सबों का प्रभु एक ही है। वह उन सबों के प्रति उदार है, जो उसकी दुहाई देते है;

13) क्योंकि जो प्रभु के नाम की दुहाई देगा, उसे मुक्ति प्राप्त होगी।


📒 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 4:1-13


1) ईसा पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो कर यर्दन के तट से लौटे। उस समय आत्मा उन्हें निर्जन प्रदेश ले चला।

2) वह चालीस दिन वहाँ रहे और शैतान ने उनकी परीक्षा ली। ईसा ने उन दिनों कुछ भी नहीं खाया और इसके बाद उन्हें भूख लगी।

3) तब शैतान ने उन से कहा, "यदि आप ईश्वर के पुत्र हैं, तो इस पत्थर से कह दीजिए कि यह रोटी बन जाये"।

4) परन्तु ईसा ने उत्तर दिया, "लिखा है-मनुष्य रोटी से ही नहीं जीता है"।

5) फिर शैतान उन्हें ऊपर उठा ले गया और क्षण भर में संसार के सभी राज्य दिखा कर

6) बोला, "मैं आप को इन सभी राज्यों का अधिकार और इनका वैभव दे दूँगा। यह सब मुझे दे दिया गया है और मैं जिस को चाहता हूँ, उस को यह देता हूँ।

7) यदि आप मेरी आराधना करें, तो यह सब आप को मिल जायेगा।"

8) पर ईसा ने उसे उत्तर दिया, "लिखा है-अपने प्रभु-ईश्वर की आराधना करो और केवल उसी की सेवा करो"।

9) तब शैतान ने उन्हें येरुसालेम ले जा कर मन्दिर के शिखर पर खड़ा कर दिया और कहा, "यदि आप ईश्वर के पुत्र हैं, तो यहाँ से नीचे कूद जाइए;

10) क्योंकि लिखा है-तुम्हारे विषय में वह अपने दूतों को आदेश देगा कि वे तुम्हारी रक्षा करें

11) और वे तुम्हें अपने हाथों पर सँभाल लेंगे कि कहीं तुम्हारे पैरों को पत्थर से चोट न लगे"।

12) ईसा ने उसे उत्तर दिया, "यह भी कहा है-अपने प्रभु-ईश्वर की परीक्षा मत लो"।

13) इस तरह सब प्रकार की परीक्षा लेने के बाद शैतान, निश्चित समय पर लौटने के लिए, ईसा के पास से चला गया।


📚 मनन-चिंतन


येसु अपने स्वर्गिक पिता द्वारा दिए गए कार्य में उतरने ही वाले थे। इसके लिए उन्हें तत्काल तैयारियाँ करने की जरूरत थी। इसलिए वे चालीस दिन और चालीस रात निर्जनस्थान में बिताते हैं। यह उनके लिए एक महत्वपूर्ण समय था। यह जानते हुए कि येसु ईश्वर की योजना का सावधानीपूर्वक पालन करने जा रहे हैं, शैतान उनका ध्यान सांसारिक आकर्षणों की ओर लगाने की कोशिश करता है। वह येसु को वह सब कुछ प्रदान करने का वादा करता है जो संसार दे सकता है - सांसारिक धन, नाम, शक्ति और पद। येसु की पहचान ईश्वर के पुत्र के रूप में है। शैतान परोक्ष रूप से उन्हें ईश्वर के पुत्र होने की पहचान और पिता के साथ उनके संबंध को नकारने के लिए उनके ऊपर दबाव डाल रहा था। हम प्रभु की संतान हैं। हर प्रलोभन में, शैतान इस पहचान और प्रभु के साथ हमारे रिश्ते पर सवाल उठाता है। पाप के द्वारा हम ईश्वर की संतान के रूप में अपनी पहचान को धीरे-धीरे भूल जाते हैं और अंत में छोड़ देते हैं। इस प्रकार हम शैतान की संतान बन जाते हैं। जब येसु प्रत्येक प्रलोभन पर विजय प्राप्त करते हैं, तो वे अपनी पहचान पर भी जोर देते हैं। हमें ईश्वर की सन्तान होने की अपनी पहचान को पुनः स्थापित करने के लिए ईश्वर की सहायता लेना चाहिए।



📚 REFLECTION



Jesus was about to plunge into the task given by His heavenly Father. He needed to make the immediate preparations for it. He therefore spends 40 days and 40 nights in the desert. This was a crucial time for him. Knowing that Jesus was going to meticulously follow the plan of God, devil tries to divert his attention to worldly attractions. He offers Jesus whatever the world can offer – earthly wealth, name, power and position. Jesus has an identity as the Son of God. The devil was indirectly forcing him to deny that identity of being the Son of God and his relationship with the Father. We are the children of God. In every temptation, devil questions this identity and our relationship with God. By sin we gradually forget and forego our identity as the children of God and become children of devil. When Jesus overcomes each temptation, he asserts his identity too. We need to seek the assistance of God to reassert our identity of being the children of God.



📚 मनन-चिंतन-2



प्रवक्ता ग्रंथ अध्याय 2 वाक्य 1 में पवित्र वचन कहता है, “पुत्र! यदि तुम प्रभु की सेवा करना चाहते हो, तो परीक्षा का सामना करने को तैयार हो जाओ।” प्रभु येसु कहते है, “प्रलोभन अनिवार्य है।” (लूकस 17:1) इनसे यह अभिप्राय है कि परीक्षा या प्रलोभन जीवन के अनिवार्य अंग हैं। लेकिन हम किस तरह इन प्रलोभनों का सामना करते हैं हमारे विश्वास की गहराई को अभिव्यक्त करते हैं।

जीवन में हम निर्णय लेते हैं। हम अनेक बातों को ध्यान में रखकर उस बात का चयन करते हैं जो नैतिक तथा आध्यात्मिक दृष्टि से उचित हो। यदि हम नैतिकता का ध्यान नहीं रखेंगे तो हमारे निर्णय तत्कालीन तौर पर शायद लाभदायक प्रतीत हो सकते हैं, किन्तु लम्बे समय में वे हमें दुख देने लगेंगे। इसलिये जीवन में निर्णय लेते समय हमें ईश्वर की शिक्षा या आज्ञाओं का ध्यान रखना चाहिये। पवित्र बाइबिल में प्रथम प्रश्न शैतान ने हेवा से यह कहते हुये किया था, “क्या ईश्वर ने सचमुच तुम को मना किया कि वाटिका के किसी वृक्ष का फल मत खाना”? शैतान के इस प्रकार पूछने से हेवा भी संशय में पड गयी तथा उससे वार्तालाप करने लगी जिसकी परिणिति पाप में होती है। यदि हेवा ने शैतान के धूर्ततापूर्ण प्रश्नों पर ध्यान नहीं दिया होता तो शायद उसकी सोच पाप की ओर नहीं जाती। आज के सुसमाचार में हम पढ़ते हैं कि शैतान येसु से भी प्रश्न करता है। किन्तु हेवा के विपरीत येसु शैतान की बातों के जंजाल में नहीं फंसते बल्कि उसे सटीक उत्तर देकर खाली हाथ लौटा देते हैं। शैतान येसु को तीन प्रलोभन देता है।

“यदि आप ईश्वर के पुत्र हैं, तो इस पत्थर से कह दीजिए कि यह रोटी बन जाये”। इस्राएलियों ने मरूभूमि में रोटी को लेकर ही ईश्वर की परीक्षा ली तथा निंदा की थी, “उन्होंने....इस प्रकार ईश्वर की परीक्षा ली। उन्होंने ईश्वर की निन्दा करते हुए यह कहा, “क्या ईश्वर मरूभूमि में हमारे लिए भोजन का प्रबन्ध कर सकता है?” (स्तोत्र 78:18-19) लेकिन येसु जो आत्मा से परिपूर्ण है अपने जीवन के लिए भौतिक रोटी पर निर्भर नहीं करते बल्कि पिता की इच्छा को अपना भोजन मानते है। ‘‘जिसने मुझे भेजा, उसकी इच्छा पर चलना और उसका कार्य पूरा करना, यही भेरा भोजन है”। (योहन 4:8) इसके अलावा भी येसु को रोटी देने वाले तो उनके पिता है। वे जब चाहे पिता उन्हें यह रोटी प्रदान कर सकते हैं। उन्हें शैतान के कहने या उसे दिखाने के लिए ऐसा करने की आवश्यकता नहीं थी। येसु शैतान को यह कहकर, “लिखा है - मनुष्य रोटी से ही नहीं जीता है।” निरूत्तर कर देते हैं।

इसके बाद “शैतान उन्हें ऊपर उठा ले गया और क्षण भर में संसार के सभी राज्य दिखा कर बोला, ’मैं आप को इन सभी राज्यों का अधिकार और इनका वैभव दे दूँगा। यह सब मुझे दे दिया गया है और मैं जिस को चाहता हूँ, उस को यह देता हूँ। यदि आप मेरी आराधना करें, तो यह सब आप को मिल जायेगा।’ यहूदी केवल एक ही ईश्वर में विश्वास करते थे। ईश्वर की दस आज्ञाओं में प्रथम आज्ञा यही है कि, “मैं प्रभु तुम्हारा ईश्वर हूँ।... मेरे सिवा तुम्हारा कोई ईश्वर नहीं होगा।” (निर्गमन 20:2-3) ईश्वर को छोड किसी अन्य देवता पर विश्वास करना, उसकी आराधना करना इस्राएलियों के लिए घनघोर पाप था। “....क्योंकि मैं प्रभु, तुम्हारा ईश्वर, ऐसी बातें सहन नहीं करता.....मैं तीसरी और चौथी पीढ़ी तक उनकी सन्तति को उनके अपराधों का दण्ड देता हूँ।” (निर्गमन 20:5)

अतीत में जब भी इस्रालिएयों ने इस प्रथम आज्ञा को भंग किया तो ईश्वर ने उन्हें घोर दण्ड भी दिया, यहॉ तक कि उनके देश का विभाजन तथा उनसे उनका निष्काशन भी हो गया। येसु के लिए इस प्रलोभन का कोई मूल्य या महत्व नहीं था क्योंकि वे स्वयं पिलातुस को कहते हैं, “मेरा राज्य इस संसार का नहीं हैं।” (योहन 18:36) येसु के लिए पिता परमेश्वर को छोड और कोई ईश्वर नहीं था इसलिये वचन के माध्यम से वे शैतान को पुनः निरूत्तर कर देते हैं, “लिखा है-अपने प्रभु-ईश्वर की आराधना करो और केवल उसी की सेवा करो।”

शैतान येसु को तीसरी बार उनकी शक्ति-परीक्षण करने का प्रलोभन देता है। “तब शैतान ने उन्हें येरुसालेम ले जा कर मन्दिर के शिखर पर खड़ा कर दिया और कहा, ’यदि आप ईश्वर के पुत्र हैं, तो यहाँ से नीचे कूद जाइए क्योंकि लिखा है - तुम्हारे विषय में वह अपने दूतों को आदेश देगा कि वे तुम्हारी रक्षा करें और वे तुम्हें अपने हाथों पर सँभाल लेंगे कि कहीं तुम्हारे पैरों को पत्थर से चोट न लगे”। कोई भी व्यक्ति पहाड या इमारत से कूदने का इच्छुक नहीं हो सकता तो प्रभु येसु के लिए भी कूदना कोई प्रलोभन नहीं था। लेकिन परीक्षा कूदने की नहीं यह देखने की थी उनका अब्बा पिता जो उनके लिये पूर्व प्रंबध करता हैं उन्हें बचायेगा या नहीं।

कई बार हमारे जीवन में हम कुछ बातों या प्रार्थनाओं को सशर्त करते हैं जैसे यदि ऐसा हो जायेगा तो मैं जान जाऊँगा कि ईश्वर मेरे साथ है या ईश्वर सचमुच मेरी प्रार्थना सुनता है। इस प्रकार की सशर्त प्रार्थना या निवेदन जो ’यदि’, ’अगर’, ’ऐसा हो जाये तो’, ’किन्तु’ ’परन्तु’ आदि योजक-शब्दों पर निर्भर है ईश्वर की परीक्षा लेने के समान ही है।

जब होलोफेरनिस ने बेतूलिया नगर की घेराबंदी की थी तो लोगों में घबराहट एवं हताशा थी तब उज्जीया ने कहा, ’भाइयो! ढारस रखो। हम पाँच दिन और ठहरेंगे। इस बीच प्रभु, हमारा ईश्वर अवश्य ही हम पर दया करेगा, क्योंकि वह हमें अन्त तक नहीं छोड़ेगा। यदि इस अवधि में हमें सहायता प्राप्त नहीं होगी, तो मैं तुम्हारा कहना मानूँगा।” (यूदीत 7:30:31) इस प्रकार ईश्वर के लिए सशर्त समयबद्ध बातें ईश्वर की परीक्षा लेने के समान ही थी। यूदीत उन्हें लताडते हुये कहती है, “बेतूलियावासियों के नेताओ!... आपने प्रभु को साक्षी बना कर शपथ खायी है कि यदि प्रभु, हमारे ईश्वर ने निश्चित अवधि तक हमारी सहायता नहीं की, तो आप नगर हमारे शत्रुओं के हाथ दे देंगे। आप कौन होते हैं, जो आपने आज ईश्वर की परीक्षा ली और जो मनुष्यों के बीच ईश्वर का स्थान लेते हैं?.... यदि वह पाँच दिन के अन्दर हमें सहायता देना नहीं चाहता, तो वह जितने दिनों के अन्दर चाहता है, वह हमारी रक्षा करने में अथवा हमारे शत्रुओं द्वारा हमारा विनाश करवाने में समर्थ है। आप हमारे प्रभु-ईश्वर को निर्णय के लिए बाध्य करने का प्रयत्न मत कीजिए, क्योंकि ईश्वर को मनुष्य की तरह डराया या फुसलाया नहीं जा सकता।” (यूदीत 8:11-12,15-16) यूदीत की बातों से स्पष्ट है कि प्रलोभन की जो प्रक्रिया शैतान अपनाता है वह ईश्वर की परीक्षा लेने की थी इसलिये येसु भी उसे निरूत्तर करते हुये कहते हैं, “यह भी कहा है - अपने प्रभु-ईश्वर की परीक्षा मत लो”।


✍ -Br. Biniush Topno


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27 फरवरी 2022, इतवार

 

27 फरवरी 2022, इतवार

सामान्य काल का आठवाँ इतवार



📒 पहला पाठ : प्रवक्ता-ग्रन्थ 27:4-7


3-4) जो दृढ़तापूर्वक प्रभु पर श्रद्धा नहीं रखता, उसका घर शीघ्र उजड़ जायेगा।

5) छलनी हिलाने से कचरा रह जाता है, बातचीत में मनुष्य के दोष व्यक्त हो जाते हैं।

6) भट्टी में कुम्हार के बरतनों की, और बातचीत में मनुष्य की परख होती है।

7) पेड़ के फल बाग की कसौटी होते हैं और मनुष्य के शब्दों से उसके स्वभाव का पता चलता है।


📒 दूसरा पाठ : 1 कुरिन्थियों 15:54-58



54) जब यह नश्वर शरीर अनश्वरता को धारण करेगा, जब यह मरणशील शरीर अमरता को धारण करेगा, तब धर्मग्रन्थ का यह कथन पूरा हो जायेगा: मृत्यु का विनाश हुआ। विजय प्राप्त हुई।

55) मृत्यु! कहाँ है तेरी विजय? मृत्यु! कहाँ है तेरा दंश?

56) मृत्यु का दंश तो पाप है और पाप को संहिता से बल मिलता है।

57) ईश्वर को धन्यवाद, जो हमारे प्रभु ईसा मसीह द्वारा हमें विजय प्रदान करता है!

58) प्यारे भाइयो! आप दृढ़ तथा अटल बने रहें और यह जान कर कि प्रभु के लिए आपका परिश्रम व्यर्थ नहीं है, आप निरन्तर उनका कार्य करते रहें।


📒 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 6:39-45



39) ईसा ने उन्हें एक दृष्टान्त सुनाया, "क्या अन्धा अन्धे को राह दिखा सकता है? क्या दोनों ही गड्ढे में नहीं गिर पडेंगे?

40) शिष्य गुरू से बड़ा नहीं होता। पूरी-पूरी शिक्षा प्राप्त करने के बाद वह अपने गुरू-जैसा बन सकता है।

41) "जब तुम्हें अपनी ही आँख की धरन का पता नहीं, तो तुम अपने भाई की आँख का तिनका क्यों देखते हो?

42) जब तुम अपनी ही आँख की धरन नहीं देखते हो, तो अपने भाई से कैसे कह सकते हो, ’भाई! मैं तुम्हारी आँख का तिनका निकाल दूँ?’ ढोंगी! पहले अपनी ही आँख की धरन निकालो। तभी तुम अपने भाई की आँख का तिनका निकालने के लिए अच्छी तरह देख सकोगे।

43) "कोई अच्छा पेड़ बुरा फल नहीं देता और न कोई बुरा पेड़ अच्छा फल देता है।

44) हर पेड़ अपने फल से पहचाना जाता है। लोग न तो कँटीली झाडि़यों से अंजीर तोड़ते हैं और न ऊँटकटारों से अंगूर।

45) अच्छा मनुष्य अपने हृदय के अच्छे भण्डार से अच्छी चीजे़ं निकालता है और जो बुरा है, वह अपने बुरे भण्डार से बुरी चीज़ें निकालता है; क्योंकि जो हृदय में भरा है, वहीं तो मुँह से बाहर आता है।



📚 मनन-चिंतन.


सुसमाचार में, येसु अपने समय के सामान्य छवियों के साथ महत्वाकांक्षा, निर्णय और कमजोर चरित्र को संबोधित करते हैं। वह इन पात्रों को दृष्टान्तों के माध्यम से दिखाता है। वे नेतृत्व की शैली का वर्णन करते हैं जिसके लिए प्रत्येक ख्रीस्तीय को बुलाया गया है। दृष्टान्त दो छवियों से शुरू होते हैं: अंधा और छात्र। दोनों नेतृत्व के लिए महत्वाकांक्षा का उल्लेख करते हैं। एक अंधा व्यक्ति किसी का नेतृत्व नहीं कर सकता, दूसरे अंधे व्यक्ति की तो बात ही नहीं। बढ़ईगीरी से ली गई सादृश्यता नेताओं में नकारात्मक, और कभी-कभी उतावले, नैतिक निर्णय लेने के प्रलोभन की ओर इशारा करती है। प्रतिबिंबित करने और सुधार करने के लिए समय लेने की तुलना में इंगित करना और निंदा करना आसान है। येसु ने अपने दृष्टान्तों को फलों के पेड़ों की एक छवि के साथ समाप्त किया। फलों और पेड़ों की गुणवत्ता विनिमेय नहीं थी। एक पौधे की उपज उसके चरित्र की प्राकृतिक वृद्धि होती है। सच्ची परीक्षा जीवित विश्वास और नैतिक आचरण में देखी जाती है। आइए हम ईमानदारी का जीवन जिएं।




📚 REFLECTION



In the Gospel, Jesus addresses ambition, judgement, and weak character with images common to his time. He illustrates these characters with a set of parables. They describe the style of leadership every Christian is called to. The parables begin with two images: the blind and the student. Both refer to the ambition for leadership. A blind person cannot lead anyone, much less another blind person. The analogy taken from the carpentry points to the temptation in leaders to make negative, and sometimes rash, moral judgments. It is easier to point and condemn, than to take time to reflect and reform. Jesus finished his parables with an image of fruit trees. The quality of fruit and trees were not interchangeable. A plant’s produce is the natural outgrowth of its character. True test is seen in lived faith and ethical conduct. Let us live a life of integrity.



📚 मनन-चिंतन - 2



मृदभाषी व्यक्ति को सब लोग पसंद करते हैं। अक्सर ऐसे लोगों को लोग अजात शत्रु (अर्थात जिसका कोई शत्रु न हो) भी कहते हैं। दुकानदार और व्यापारी अपने ग्राहकों से सदैव मधुर वाणी एवं व्यवहार कर उन्हें लुभाते हैं। अच्छा व्यवहार एवं मृदभाषी होना एक कला है। आज का पहला पाठ भी हमें अपनी बातों तथा व्यवहार के प्रति आगाह करते हुये चेताता है। “बातचीत में मनुष्य के दोष व्यक्त हो जाते हैं.... बातचीत में मनुष्य की परख होती है। ...मनुष्य के शब्दों से उसके स्वभाव का पता चलता है। किसी की प्रशंसा मत करो, जब तक वह नहीं बोले, क्योंकि यहीं मनुष्य की कसौटी है।” जीवन की वास्तविकता भी यही है कि हम अपनी मृद वाणी से जीवन को सफल एवं सरल या कठिन एवं जाटिल बना लेते हैं। प्रवक्ता ग्रंथ वाणी के सदुपयोग के बारे में शिक्षा देता है, ’’...दान देते समय कटु शब्द मत बोलो। क्या ओस शीतल नहीं करती? इसी प्रकार उपहार से भी अच्छा एक शब्द हो सकता है। एक मधुर शब्द महंगे उपहार से अच्छा है। स्नेही मनुष्य एक साथ दोनों को देता है। मूर्ख कटु शब्दों से डांटता है ...बोलने से पहले जानकार बनो। .....गप्पी के होंठ बकवाद करते हैं, किन्तु समझदार व्यक्ति के शब्द तराजू पर तौले हुए हैं।’’ (प्रवक्ता 18:15-19, 21:28)

संत याकूब भी वाणी के परिणामों को विस्तृत तथा तुलनात्मक शैली में बताते हुये कहते हैं, ’’यदि हम घोड़ों को वश में रखने के लिए उनके मुंह में लगाम लगाते हैं, तो उनके सारे शरीर को इधर-उधर घुमा सकते हैं। जहाज... कितना ही बड़ा क्यों न हो और तेज हवा से भले ही बहाया जा रहा हो, तब भी वह कर्णधार की इच्छा के अनुसार एक छोटी सी पतवार से चलाया जाता है। इसी प्रकार जीभ शरीर का एक छोटा-सा अंग है, किन्तु वह शक्तिशाली होने का दावा कर सकती है। ....जो हमारे अंगों के बीच हर प्रकार की बुराई का स्रोत है। वह हमारा समस्त शरीर दूषित करती और नरकाग्नि से प्रज्वलित हो कर हमारे पूरे जीवन में आग लगा देती है। ...किन्तु कोई मनुष्य अपनी जीभ को वश में नहीं कर सकता। वह एक ऐसी बुराई है, जो कभी शान्त नहीं रहती और प्राणघातक विष से भरी हुई है।’’ (देखिये याकूब 3:3-8) हम अपनी वाणी से किसी को प्रोत्साहित या हतोत्साहित कर सकते हैं। हम अपने बुरे शब्दों से झगडा शुरू कर सकते हैं, या अच्छे शब्दों से झगडा टाल भी सकते हैं। इसलिए प्रभु का वचन कहता है, “चिनगारी पर फूँक मारो और वह भड़केगी, उस पर थूक दो और वह बुझेगी: दोनों तुम्हारे मुँह से निकलते हैं” (प्रवक्ता 28:14)।

येसु की वाणी में सत्य का तेज था। उनकी शिक्षा अद्वितीय थी लोग उनकी वाणी को सुनकर दंग रह जाते थे, ’’...वे लोगों को उनके सभाग्रह में शिक्षा देते थे। वे अचम्भे में पड़ कर कहते थे, ’’इसे यह ज्ञान और यह सामर्थ्य कहाँ से मिला? (मत्ती 13:54) उनके विरोधी स्वयं स्वीकार करते हुये कहते हैं, ’’गुरुवर! हम यह जानते हैं कि आप सत्य बोलते हैं और सच्चाई से ईश्वर के मार्ग की शिक्षा देते हैं। आप को किसी की परवाह नहीं। आप मुँह-देखी बात नहीं करते।’’ (मत्ती 22:16)

प्रभु येसु अपने शब्दों को खरा-खरा तथा नापतोल के बोलते थे। उनके विरोधी उनकी परीक्षा लेने तथा उनमें दोष ढुंढनें के उद्देश्य से उनसे प्रश्न करते थे, ’’उस समय फरीसियों ने जा कर आपस में परामर्श किया कि हम किस प्रकार ईसा को उनकी अपनी बात के फन्दे में फँसायें।’’ किन्तु कैसर को कर देने के बारे में येसु का उत्तर ’’....सुन कर वे अचम्भे में पड़ गये और ईसा को छोड़ कर चले गये।’’ (देखिये मत्ती 22:15-22) इसी प्रकार जब उन्होंने पुनरूत्थान, विवाह तथा ईश्वर की आज्ञा के बारे में पूछा तो ईसा की वाणी में उन्होंने कोई दोष नहीं पाया तथा वे निरूत्तर रह गये। ’’इसके उत्तर में कोई ईसा से एक शब्द भी नहीं बोल सका और उस दिन से किसी को उन से और प्रश्न करने का साहस नहीं हुआ।’’ (मत्ती 22:46)

अनेक स्थानों पर येसु अपने विरोधियों के प्रति भी कड़े शब्द उनके सामने तथा बिना किसी व्यक्तिगत द्वेष-घृणा से बोलते थे। उनके विरोधी इससे तिलमिला जाते थे किन्तु वे कोई दोष या त्रुटि उनकी वाणी में नहीं पाते थे। हमें येसु के समान सत्य को सीधे, सरल तथा स्पष्ट रूप से बोलना चाहिये इससे लोग तो विरूद्ध हो सकते हैं, किन्तु हमारे वचन दोषरहित होगें। येसु स्वयं इस बारे में कहते हैं, ’’तुम्हारी बात इतनी हो - हाँ की हाँ, नहीं की नहीं। जो इससे अधिक है, वह बुराई से उत्पन्न होता है।’’ (मत्ती 5:37) साथ ही साथ येसु हमें चेतावनी देते हैं कि हमें अपने शब्दों को सोच समझ कर बोलना चाहिये तथा दूसरों के लिए तुच्छ तथा अपशब्दों का उपयोग नहीं करना चाहिये। ’’यदि वह अपने भाई से कहे, ’रे मूर्ख! तो वह महासभा में दण्ड के योग्य ठहराया जायेगा और यदि वह कहे, ’रे नास्तिक! तो वह नरक की आग के योग्य ठहराया जायेगा।’’ (मत्ती 5:22) यदि अपनी वाणी पर हम व्यवहार में गलत बातों का प्रयोग करेंगे तो ईश्वर हम से इन सारी बातों का लेखा-जोखा लेगा। ’’मैं तुम लोगों से कहता हूँ- न्याय के दिन मनुष्यों को अपनी निकम्मी बात का लेखा देना पड़ेगा, क्योंकि तुम अपनी ही बातों से निर्दोष या दोषी ठहराये जाओगे।’’(मत्ती 12:36) आइये हम भी अपनी वाणी पर ध्यान दे जिससे जीवन में मधुरता बनी रहें।


✍ -Br. Biniush Topno


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The Word for the day/ Rev. Fr. Bobby vc


 

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20 फरवरी 2022, रविवा

 

20 फरवरी 2022, रविवार

वर्ष का सातवां सामान्य रविवार



📙 पहला पाठ : समुएल का पहला ग्रन्थ 26:2.7-9.12-13.22-23



2) साऊल इस्राएल के तीन हज़ार चुने हुए योद्धाओं को ले कर ज़ीफ़ के उजाड़खण्ड की ओर चल दिया, जिससे वह ज़ीफ़ के उजाड़खण्ड में दाऊद का पता लगाये।

7) दाऊद और अबीशय रात को उन लोगों के पास पहुँचे। उन्होंने पड़ाव में साऊल को सोया हुआ पाया। उसका भाला उसके सिरहाने जमीन में गड़ा हुआ था। अबनेर और दूसरे योद्धा उसके चारों ओर लेटे हुए थे।

8) तब अबीशय ने दाऊद से कहा, ‘‘ईश्वर ने आज आपके शत्रु को आपके हाथ दे दिया है। मुझे करने दीजिए- मैं उसे उसके अपने भाले के एक ही बार से ज़मीन में जकड दूँगा। मुझे दूसरी बार वार करने की ज़रूरत नहीं पडे़गी।’’

9) दाऊद ने अबीशय को यह उत्तर दिया, ‘‘उसे मत मारो। कौन प्रभु के अभिषिक्त को मार कर दण्ड से बच सकता है?’’

12) दाऊद ने वह भाला और साऊल के सिरहाने के पास रखी हुई पानी की सुराही ले ली और वे चले गये। न किसी ने यह सब देखा, न किसी को इसका पता चला और न कोई जगा। वे सब-के-सब सोये हुए थे; क्योंकि प्रभु की ओर से भेजी हुई गहरी नींद उन पर छायी हुई थी।

13) दाऊद घाट पार कर दूर की पहाड़ी पर खड़ा हो गया- दोनों के बीच बड़ा अन्तर था।

22) दाऊद ने उत्तर दिया, ‘‘यह राजा का भाला है। नवयुवकों में से कोई आ कर इसे ले जाये।

23 (23-24) प्रभु हर एक को उसकी धार्मिकता तथा ईमानदारी का फल देगा। आज प्रभु ने आप को मेरे हाथ दे दिया था, किन्तु मैंने प्रभु के अभिषिक्त पर हाथ उठाना नहीं चाहा; क्योंकि आज आपका जीवन मेरी दृष्टि में मूल्यवान् था। इसलिए मेरा जीवन भी प्रभु की दृष्टि में मूल्यवान हो और वह मुझे सब संकटों से बचाता रहे।"



📙 दूसरा पाठ : कुरिन्थियों के नाम सन्त पौलुस का पहला पत्र 15:45-49



45) धर्मग्रन्थ में लिखा है कि प्रथम मनुष्य आदम जीवन्त प्राणी बन गया और अन्तिम आदम जीवन्तदायक आत्मा।

46) जो पहला है, वह आध्यात्मिक नहीं, बल्कि प्राकृत है। इसके बाद ही आध्यात्मिक आता है।

47) पहला मनुष्य मिट्टी का बना है और पृथ्वी का है, दूसरा स्वर्ग का है।

48) मिट्टी का बना मनुष्य जैसा था, वैसे ही मिट्टी के बने मनुष्य हैं और स्वर्ग का मनुष्य जैसा है, वैसे ही सभी स्वर्गी होंगे;

49) जिस तरह हमने मिट्टी के बने मनुष्य का रूप धारण किया है, उसी तरह हम स्वर्ग के मनुष्य का भी रूप धारण करेंगे।



📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 6:27-38



27) ’’मैं तुम लोगों से, जो मेरी बात सुनते हो, कहता हूँ-अपने शत्रुओं से प्रेम करो। जो तुम से बैर करते हैं, उनकी भलाई करो।

28) जो तुम्हें शाप देते है, उन को आशीर्वाद दो। जो तुम्हारे साथ दुव्र्यवहार करते हैं, उनके लिए प्रार्थना करो।

29) जो तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारता है, दूसरा भी उसके सामने कर दो। जो तुम्हारी चादर छीनता है, उसे अपना कुरता भी ले लेने दो।

30) जो तुम से माँगता है, उसे दे दो और जो तुम से तुम्हारा अपना छीनता है, उसे वापस मत माँगो।

31) दूसरों से अपने प्रति जैसा व्यवहार चाहते हो, तुम भी उनके प्रति वैसा ही किया करो।

32) यदि तुम उन्हीं को प्यार करते हो, जो तुम्हें प्यार करते हैं, तो इस में तुम्हारा पुण्य क्या है? पापी भी अपने प्रेम करने वालों से प्रेम करते हैं।

33) यदि तुम उन्हीं की भलाई करते हो, जो तुम्हारी भलाई करते हैं, तो इस में तुम्हारा पुण्य क्या है? पापी भी ऐसा करते हैं।

34) यदि तुम उन्हीं को उधार देते हो, जिन से वापस पाने की आशा करते हो, तो इस में तुम्हारा पुण्य क्या है? पूरा-पूरा वापस पाने की आशा में पापी भी पापियों को उधार देते हैं।

35) परन्तु अपने शत्रुओं से प्रेम करो, उनकी भलाई करो और वापस पाने की आशा न रख कर उधार दो। तभी तुम्हारा पुरस्कार महान् होगा और तुम सर्वोच्च प्रभु के पुत्र बन जाओगे, क्योंकि वह भी कृतघ्नों और दुष्टों पर दया करता है।

36) ’’अपने स्वर्गिक पिता-जैसे दयालु बनो। दोष न लगाओ और तुम पर भी दोष नहीं लगाया जायेगा।

37) किसी के विरुद्ध निर्णय न दो और तुम्हारे विरुद्ध भी निर्णय नहीं दिया जायेगा। क्षमा करो और तुम्हें भी क्षमा मिल जायेगी।

38) दो और तुम्हें भी दिया जायेगा। दबा-दबा कर, हिला-हिला कर भरी हुई, ऊपर उठी हुई, पूरी-की-पूरी नाप तुम्हारी गोद में डाली जायेगी; क्योंकि जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिए भी नापा जायेगा।

’’

📚 मनन-चिंतन


सुसमाचार में, येसु शत्रु और सताने वालो के प्रति प्रेम प्रकट कर रहे है। यह विशुद्ध रूप से एक गैर-पारस्परिक व्यवहार है। यह येसु की एक सर्व समावेशी दृष्टि है। शत्रुओं से प्रेम करने की क्षमता केवल चाहने मात्र से प्राप्त नहीं होती। यह केवल द्वेष की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि दूसरे व्यक्ति की भलाई के लिए एक दयालु इच्छा है। ईश्वर के समान प्यार करना, अर्थार्त दूसरों पर अधिक ध्यान केंद्रित करना है। यह परिपक्वता का कारक है।यह स्पष्ट रूप से आत्म-ज्ञान, आत्म-स्वीकृति और सहानुभूति की क्षमता से जुड़ा हुआ है। यह ईश्वर के प्रेम की प्रबल भावना से उत्पन्न होता है। येसु अपने शिष्यों को उस प्रेम में भाग लेने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं जो पिता के हृदय में उत्पन्न होता है। यह येसु की तरह बनने के लिए नम्रता का आह्वान करता है। आइए हम ईश्वर से अपने दिलों को दिव्य प्रेम के लिए खोलने के लिए कहें, ताकि हम प्यार कर सकें, अच्छा कर सकें और उदारता से कार्य कर सकें।



📚 REFLECTION


In the Gospel, Jesus is extending love to the enemy and the persecutor. It is purely a non-reciprocal behavior. It is an all inclusive vision of Jesus. The capacity to love enemies is not achieved simply by wishing it. It is not merely the absence of malice, but a compassionate desire for the other person’s good. To love as God loves is to focus more on others. It is a factor of maturity. It is clearly connected to self-knowledge, self-acceptance and the capacity to empathise. It originates from a strong sense of God’s love. Jesus is inviting his disciples to share in the love that originates in the heart of the Father. It calls for humility and an emptying of ourselves to become like Jesus. Lets us ask God to open our hearts to divine love, so that we may love, do good and act generously.




हर इन्सान खुद का मित्र है या शत्रु। अक्सर देखा जाता है कि हमारे विरोधी या शत्रु हमारे दिमाग और मन में ज्यादा समय निवास करते हैं। प्रेम सब कुछ प्रेमपूर्ण बनाता। घृणा सब कुछ घृणित बनाती हैं।

समूएल के पहले ग्रंथ में राजा दाऊद और राजा साऊल की कहानी काफी रोचक है। दाऊद की बालक के सदृश्य प्रगति, असर और प्रभाव और दाऊद के प्रति साऊल की जलन को हम जानते हैं।

राजा साऊल दाऊद का सर्वनाश करना चाहता था और पीछा करता था - एक शत्रु और दुश्मन के तौर पर। दाऊद के हाथ में फंस जाने पर भी उसने साऊल की हत्या नहीं की। क्योंकि वह ईश्वर के द्वारा अभिषिक्त का आदर करता था। यह सच है कि इस्राएलियों की पराम्परा में राजा ईश्वर का प्रतिनिधित्व करता था। इसलिए राजा का तिरस्कार करना अर्थात ईश्वर का तिरस्कार करना था और दाऊद की यह बड़ी उदार, निस्वार्थ सोच, मनोभाव साऊल के जीवन में परिवर्तन लाता है, न सिर्फ परिवर्तन लाता है बल्कि साऊल के नजर में दाऊद आर्शीवाद का पात्र बनता है।

जान लेना पाप है।

ईश्वर की नियुक्ति पर विरोध नहीं करना चाहिये।

दयालुता अर्थात बडे दिल वाला होना है।

प्रेम और क्षमा इन्सान को बदल देती है। प्रेम से सब कुछ पर विजय प्राप्त की जा सकती है।

येसु ख्रीस्त ने एक बहुत ही क्रांतिकारी शिक्षा पेश की और उनकी यह क्रांतिकारी शिक्षा प्रभावशाली इसलिए है कि बहुतों ने उस शिक्षा को अपने जीवन में लागू किया। यह दुनिया की आम सोच से बिल्कुल अलग या हट के है। दुनिया की रीति है कि जो हमें प्यार करते है उन्हीं से हम प्यार करते हैं और जो हमसे बैर रखते उनसे बैर। लेकिन इसके ठीक विपरीत वे कहते हैं अपने शत्रु से प्रेम करो, उनकी शुभ चिंता रखो और उनके लिए प्रार्थना भी करो। हम बदले की भावना या गलती के लिए दण्ड देना सामाजिक दृष्टि से न्याय समझते हैं। लेकिन वे कहते है कि कोई तुम्हें एक गाल पर थापड़ मारे तो दूसरा गाल भी दिखा दो। हमें यह सब इसलिए करना है कि हम उस स्वर्गिक पिता की संतान हैं जो अत्यंत प्रेमी, दयालु, क्षमाशील हैं और यह उचित है कि उनकी संतान, जो येसु में विश्वास करती है उनके सदृश्य बने। ख्रीस्तीयों के लिए येसु मसीह उच्च कोटि का मापदण्ड/जीने का standard प्रस्तुत करते हैं। और यह दुनिया को बदल देता है| जैसे उदाहरण के लिए चोट के बदले प्रतिक्रियात्मक ढंग ये बदला ले तो यह cycle क्रिया चलती ही रहेगी। गैर ख्रीस्तीय और ख्रीस्तीय में फिर क्या फर्क है? इसलिए येसु कहते हैं कि हमें नमक जैसे बन जाना चाहिए, दीपक जैसे बन जाना है ताकि सब कुछ नया हो जाएगा। एक प्रकार से प्रतिक्रिया न करके, दूसरे तरीके से हम हमारे शत्रु पर विजय पाते हैं और उनमें परिवर्तन या बदलाव लाते हैं।

येसु मसीह स्वर्गराज्य का निर्माण करने आये और उस राज्य के नियम, संहिता, सिध्दांत बिल्कुल सर्वोपरि गुणवत्ता quality के हो। ख्रीस्तीय प्रेम इसी में प्रदर्शित होता है और दिखाई देता है अपनी ऑखों के सामने ही स्वयं येसु ने अपने शत्रुओं को मरते समय क्षमा किया। “प्रभु इन्हें क्षमा कर क्योंकि ये नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं”। यदि हर कोई बदला ले तो इस संसार में सब अन्धे, लगड़े, लूले ही मिलेगें।

दूसरे दृष्टिकोण से यह भी बोला जा सकता है कि पड़ोसी-प्रेम का सिंध्दात् यह है कि मेरे प्रेम से, दूसरों की भलाई में कोई भी वंचित न रहें। ईश्वर की शिक्षा का सांराश यही है कि हम पिता के सदृश्य दयालु बने अर्थात् ईश्वर प्रेम में बढ़े, साथ ही साथ येसु के सदृश्य पड़ोसी प्रेम में भी बढ़ते जाएँ अर्थात यह काफी नहीं कि सिर्फ मैं चिंता ही करूँ कि कैसे स्वर्ग पहुँच जाऊँ किन्तु यह भी आवश्यक है कि मैं अकेले नहीं अपने पड़ोसी को भी स्वर्गराज्य का सदृश्य बनाऊँ, साथ ले चलुँ।

क्षमाशीलता ही ख्रीस्तीय धर्म का सारांश है।


✍ -Br. Biniush Topno


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13 फरवरी 2022, रविवार

 

13 फरवरी 2022, रविवार

वर्ष का छठवां सामान्य रविवार


📒 पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 17:5-8


5) प्रभु यह कहता है: “धिक्कार उस मनुय को, जो मनुय पर भरोसा रखता है, जो निरे मनुय का सहारा लेता है और जिसका हृदय प्रभु से विमुख हो जाता है!

6) वह मरुभूमि के पौधे के सदृश है, जो कभी अच्छे दिन नहीं देखता। वह मरुभूमि के उत्तप्त स्थानों में- नुनखरी और निर्जन धरती पर रहता है।

7) धन्य है वह मनुय, जो प्रभु पर भरोसा रखता है, जो प्रभु का सहारा लेता है।

8) वह जलस्रोत के किनारे लगाये हुए वृक्ष के सदृश हैं, जिसकी जड़ें पानी के पास फैली हुई हैं। वह कड़ी धूप से नहीं डरता- उसके पत्ते हरे-भरे बने रहते हैं। सूखे के समय उसे कोई चिंता नहीं होती क्योंकि उस समय भी वह फलता हैं।“.


📒 दूसरा पाठ : कुरिन्थियों के नाम सन्त पौलुस का पहला पत्र 15:12.16-20


12) यदि हमारी शिक्षा यह है कि मसीह मृतकों में से जी उठे, तो आप लोगों में कुछ यह कैसे कहते हैं कि मृतकों का पुनरूत्थान नहीं होता?

16) कारण, यदि मृतकों का पुनरुत्थान नहीं होता, तो मसीह भी नहीं जी उठे।

17) यदि मसीह नहीं जी उठे, तो आप लोगों का विश्वास व्यर्थ है और आप अब तक अपने पापों में फंसे हैं।

18) इतना ही नहीं, जो लोग मसीह में विश्वास करते हुए मरे हैं, उनका भी विनाश हुआ है।

19) यदि मसीह पर हमारा भरोसा इस जीवन तक ही सीमित है, तो हम सब मनुष्यों में सब से अधिक दयनीय हैं।

20) किन्तु मसीह सचमुच मृतकों में से जी उठे। जो लोग मृत्यु में सो गये हैं, उन में वह सब से पहले जी उठे।


📒 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 6:17.20-26

17) ईसा उनके साथ उतर कर एक मैदान में खड़े हो गये। वहाँ उनके बहुत-से शिष्य थे और समस्त यहूदिया तथा येरुसालेम का और समुद्र के किनारे तीरूस तथा सिदोन का एक विशाल

 जनसमूह भी था, जो उनका उपदेश सुनने और अपने रोगों से मुक्त होने के लिए आया था।

20) ईसा ने अपने शिष्यों की ओर देख कर कहा, ’’धन्य हो तुम, जो दरिद्र हो! स्वर्गराज्य तुम लोगों का है।

21) धन्य हो तुम, जो अभी भूखे हो! तुम तृप्त किये जाओगे। धन्य हो तुम, जो अभी रोते हो! तुम हँसोगे।

22) धन्य हो तुम, जब मानव पुत्र के कारण लोग तुम से बैर करेंगे, तुम्हारा बहिष्कार और अपमान करेंगे और तुम्हारा नाम घृणित समझ कर निकाल देंगे!

23) उस दिन उल्लसित हो और आनन्द मनाओ, क्योंकि स्वर्ग में तुम्हें महान् पुरस्कार प्राप्त होगा। उनके पूर्वज नबियों के साथ ऐसा ही किया करते थे।

24) ’’धिक्कार तुम्हें, जो धनी हो! तुम अपना सुख-चैन पा चुके हो।

25) धिक्कार तुम्हें, जो अभी तृप्त हो! तुम भूखे रहोगे। धिक्कार तुम्हें, जो अभी हँसते हो! तुम शोक मनाओगे और रोओगे।

26) धिक्कार तुम्हें, जब सब लोग तुम्हारी प्रशंसा करते हैं! उनके पूर्वज झूठे नबियों के साथ ऐसा ही किया करते थे।


📚 मनन-चिंतन


सुसमाचार में, येसु ईश्वरिय राज्य में जीवन और सांसारिक जीवन के बीच मूलभूत अंतर की व्याख्या करते हैं। ईश्वर के राज्य का एक हिस्सा होने का मतलब है कि दुनिया से अलग तरीके से जीना। जो गरीब हैं, भूखे हैं, रोते हैं, या सताए जाते हैं, वे धन्य कहलाते हैं। यह परिवर्तन का सुसमाचार है। जिन लोगों को अक्सर ईश्वर द्वारा भुला दिया गया माना जाता है उन्हें धन्य कहा जाता है। शापितो की सूची में वे हैं जिन्हें हम साधारणतया धन्य मानते हैं। उनके धन, संपत्ति, हँसी, प्रतिष्ठा के बारे में चेतावनी देते हैं। ये ऐसी चीजें नहीं हैं जिन पर हम शाश्वत सुख के स्रोत के रूप में निर्भर रह सकते हैं। आशीर्वचन को अक्सर ख्रीस्तीय जीवन के लिए एक रूपरेखा के रूप में वर्णित किया जाता है। ख्रीस्तीयों के रूप में हमारा बुलाहट इस दुनिया में प्रथम नहीं होना है, बल्कि ईश्वर की दृष्टि में प्रथम होना है। हमें अपने अंतिम क्षितिज, ईश्वर के राज्य के संदर्भ में अपनी वर्तमान स्थिति की जांच करने की चुनौती है।



📚 REFLECTION


In the Gospel, Jesus explains the radical difference between Kingdom Life and secular life. To be a part of God’s Kingdom means to live differently than the secular world around. Those who are poor, hungry, weeping, or persecuted are called blessed. This is a Gospel of reversals. Those often thought to have been forgotten by God are called blessed. In the list of woes are those whom we might ordinarily describe as blessed. Jesus warns about their riches, possessions, laughter, reputation. These are not things we can depend upon as sources of eternal happiness. The beatitudes are often described as a framework for Christian living. Our vocation as Christians is not to be first in this world, but rather to be first in the eyes of God. We are challenged to examine our present situation in the context of our ultimate horizon, the Kingdom of God.



📚 मनन-चिंतन - 2


धन्य है वह मनुष्य जो ईश्वर पर भरोसा रखता है वह उस पेड़ के सदृश्य है जो सदाबहार और bumper फल पैदा करता है। (येरिमियाह 17:5-8) येसु ख्रीस्त मृतकों में से जी उठे हैं और वे पहला फल हैं। (1 कुरिन्थियों 15:12,16-20)

आज सामान्य काल का छटवाँ रविवार है और मेरा प्रवचन आज के सुसमाचार पर आधारित करना चाहूँगा। आज के सुसमाचार, लूकस 6:17, 20-26, का विषय है - येसु मसीह का पर्वत प्रवचन। इसका उल्लेख संत मत्ती के द्वारा भी किया गया है। अंग्रेजी में इसे beatitudes कहते हैं। यह शब्द लैटिन के beatis शब्द से उद्गम होता है जिसका अर्थ है happy, Blest, fortunate यानि खुश, सुखद्, आनंदित, सौभाग्यशाली, मुदित, संतोषमय इत्यादि। सामान्य रचना के तौर पर इस प्रकार की शैली का प्रयोग पुराने साहित्य में अलंकार के रूप में किया जाता था, और बाईबल की किताबों में भी इसका प्रयोग किया गया है। वर्तमान की या आधुनिक साहित्य में भी यह अलंकार उपयोग में लिया जाता है। परपंरागत वह व्यक्ति धन्य या सुखद माना जाता था, जिससे ईश्वर प्रसन्न हो। संत लूकस के लेख में चार सकारात्मक आर्शीवादपूर्ण और चार धिक्कारपूर्ण पंक्तियाँ मिलती हैं। सांसारिक दृष्टि में सौभाग्यशाली वह व्यक्ति माना जाता है जो आर्थिक दृष्टि में सम्पन्न है, शारीरिक रूप में स्वस्थ है और परिवार में कुशल हैं तथा उसकी ईश्वरभय रखने वाली पत्नी और संतान हो और जिनकी लम्बी उम्र हो।

दुनिया की दृष्टि में उपरोक्त सब कुछ होने के बावजूद भी ईश्वर की दृष्टि में एक व्यक्ति नगण्य तथा धिक्कार के योग्य हो सकता है। येसु अपने शिष्यों को प्रत्यक्ष रूप से संबोधित करते हैं। येसु के दर्शनों में आम आदमी भी सम्मिलित है। जो नज़दीकी शिष्यों को बुलाता है और वे भी शिष्यों की गिनती में आते हैं, और यह भी प्रतीत होता है कि संत लूकस की कलीसिया या समुदाय में अधिकांश लोग आर्थिक रूप से तंगी की हालात में थे और येसु का अनुसरण करने की वजह से उन्हें अत्याचार भी सहना पड़ता था। वे अक्सर तिरस्क्र्त किये जाते थे, घृणित और तुच्छ नजरों से देखे जाते थे। वे दुनिया की दृष्टि में हँसी, अपमान, उपहास के पात्र थे। लेकिन येसु की दृष्टि में वे धन्य, खुशहाल, सौभाग्यशाली थे क्योंकि ईश्वर उनके पक्ष और उनके साथ थे। उनकी खुशी, संतुष्टि, पर्याप्तता का कारण और स्रोत ईश्वर थे। व्यंग और विरोधाभाष भाषा का प्रयोग करते हुए येसु उन्हें धन्य कहते हैं, इसलिए नहीं कि वे गरीब हैं, भूखे हैं, शोकित हैं, घृणित हैं लेकिन इसलिए कि वे स्वर्गराज के उत्तराधिकारी हैं, वे तृप्त किये जाएगें तथा आनन्द के हकद़ार होगें। ईश्वर उन्हें धिक्कारते हैं जो अपनी खुशी, आस्था, चिंता तथा दुनियाई मूल्यों पर केन्द्रित जीवन बिताते हैं। शायद कुछ सीख है। क्या ईश्वर हमारे आनन्द, सौभाग्यशाली होने का कारण है?

क्या ईश्वर हमें और हमारे जीवन को देख के हमें धन्य कहेगें या धिक्कारेगें?

क्या हमारी खुशी क्षणभंगुर है या ईश्वर जैसी चिरस्थायी है?

ईश्वर का राज्य और ईश्वर का मूल्य सांसारिक मूल्यों के विपरीत हैं।

सांसारिक मूल्य ईश्वरीय मूल्यों और ईश्वर के राज्य का विरोध करते हैं।

ईश्वर का राज्य हमें ऊपर की बातों की प्रतिज्ञा करता है।

ख्रीस्त के राज्य की स्थापना करना एक चुनौती है।

ख्रीस्तीय जीवन जीना अर्थात् ईश्वरीय राज्य के मूल्यों के आधारित जीना है।

ईश्वर की दृष्टि में धन्य होना है, मानवीय दृष्टि में नहीं।

येसु की शिक्षा, आधुनिक मानव और समाज के लिए चुनौती है क्योंकि हर एक ख्रीस्तीय एक नबी है; वह कोई पेशा नहीं।

ईश्वर के राज्य का भागी होना अर्थात् फैसला लेना कि ईश्वर के पक्ष में या ईश्वर के विरोध में।


✍ -Br. Biniush Topno


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