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Daily Mass Readings for Sunday, 10 October 2021

 Daily Mass Readings for Sunday, 10 October 2021

TWENTY-EIGHTH SUNDAY IN ORDINARY TIME

First Reading: Wisdom 7: 7-11
Responsorial Psalm: Psalms 90: 12-13, 14-15, 16-17
Second Reading: Hebrews 4: 12-13
Alleluia: Matthew 5: 3
Gospel: Mark 10: 17-30

First Reading: Wisdom 7: 7-11

7 Wherefore I wished, and understanding was given me: and I called upon God, and the spirit of wisdom came upon me:

8 And I preferred her before kingdoms and thrones, and esteemed riches nothing in comparison of her.

9 Neither did I compare unto her any precious stone: for all gold in comparison of her, is as a little sand, and silver in respect to her shall be counted as clay.

10 I loved her above health and beauty, and chose to have her instead of light: for her light cannot be put out.

11 Now all good things came to me together with her, and innumerable riches through her hands,

Responsorial Psalm: Psalms 90: 12-13, 14-15, 16-17

R. (14) Fill us with your love, O Lord, and we will sing for joy!

12 Can number thy wrath? So make thy right hand known: and men learned in heart, in wisdom.

13 Return, O Lord, how long? and be entreated in favour of thy servants.

R. Fill us with your love, O Lord, and we will sing for joy!

14 We are filled in the morning with thy mercy: and we have rejoiced, and are delighted all our days.

15 We have rejoiced for the days in which thou hast humbled us: for the years in which we have seen evils.

R. Fill us with your love, O Lord, and we will sing for joy!

16 Look upon thy servants and upon their works: and direct their children.

17 And let the brightness of the Lord our God be upon us: and direct thou the works of our hands over us; yea, the work of our hands do thou direct.

R. Fill us with your love, O Lord, and we will sing for joy!

Second Reading: Hebrews 4: 12-13

12 For the word of God is living and effectual, and more piercing than any two edged sword; and reaching unto the division of the soul and the spirit, of the joints also and the marrow, and is a discerner of the thoughts and intents of the heart.

13 Neither is there any creature invisible in his sight: but all things are naked and open to his eyes, to whom our speech is.

Alleluia: Matthew 5: 3

R. Alleluia, alleluia.

3 Blessed are the poor in spirit: for theirs is the kingdom of heaven.

R. Alleluia, alleluia.

Gospel: Mark 10: 17-30

17 And when he was gone forth into the way, a certain man running up and kneeling before him, asked him, Good Master, what shall I do that I may receive life everlasting?

18 And Jesus said to him, Why callest thou me good? None is good but one, that is God.

19 Thou knowest the commandments: Do not commit adultery, do not kill, do not steal, bear not false witness, do no fraud, honour thy father and mother.

20 But he answering, said to him: Master, all these things I have observed from my youth.

21 And Jesus looking on him, loved him, and said to him: One thing is wanting unto thee: go, sell whatsoever thou hast, and give to the poor, and thou shalt have treasure in heaven; and come, follow me.

22 Who being struck sad at that saying, went away sorrowful: for he had great possessions.

23 And Jesus looking round about, saith to his disciples: How hardly shall they that have riches, enter into the kingdom of God!

24 And the disciples were astonished at his words. But Jesus again answering, saith to them: Children, how hard is it for them that trust in riches, to enter into the kingdom of God?

25 It is easier for a camel to pass through the eye of a needle, than for a rich man to enter into the kingdom of God.

26 Who wondered the more, saying among themselves: Who then can be saved?

27 And Jesus looking on them, saith: With men it is impossible; but not with God: for all things are possible with God.

28 And Peter began to say unto him: Behold, we have left all things, and have followed thee.

29 Jesus answering, said: Amen I say to you, there is no man who hath left house or brethren, or sisters, or father, or mother, or children, or lands, for my sake and for the gospel,

30 Who shall not receive an hundred times as much, now in this time; houses, and brethren, and sisters, and mothers, and children, and lands, with persecutions: and in the world to come life everlasting.

✍️ -Br Biniush Topno

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PRAISE THE LORD

इतवार, 10 अक्टूबर, 2021

 

इतवार, 10 अक्टूबर, 2021

वर्ष का अट्ठाईसवाँ सामान्य इतवार

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पहला पाठ : प्रज्ञा-ग्रन्थ 7:7-11



7) मैंने प्रार्थना की और मुझे विवेक मिला। मैंने विनती की और मुझ पर प्रज्ञा का आत्मा उतरा।

8) मैंने उसे राजदण्ड और सिंहासन से ज्यादा पसन्द किया और उसकी तुलना में धन-दौलत को कुछ नहीं समझा।

9) मैंने उसकी तुलना अमूल्य रत्न से भी नहीं करना चाहा; क्योंकि उसके सामने पृथ्वी का समस्त सोना मुट्ठी भर बालू के सदृश है और उसके सामने चाँदी कीच ही समझी जायेगी।

10) मैंने उसे स्वास्थ्य और सौन्दर्य से अधिक प्यार किया और उसे अपनी ज्योति बनाने का निश्चय किया; क्योंकि उसकी दीप्ति कभी नहीं बुझती।

11) मुझे उसके साथ-साथ सब उत्तम वस्तुएँ मिल गयी और उसके हाथों से अपार धन-सम्पत्ति।



दूसरा पाठ: इब्रानियों के नाम पत्र 4:12-13




12) क्योंकि ईश्वर का वचन जीवन्त, सशक्त और किसी भी दुधारी तलवार से तेज है। वह हमारी आत्मा के अन्तरतम तक पहुँचता और हमारे मन के भावों तथा विचारों को प्रकट कर देता है। ईश्वर से कुछ भी छिपा नहीं है।

13) उसी आँखों के सामने सब कुछ निरावरण और खुला है। हमें उसे लेखा देना पड़ेगा।



सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 10:17-30



17) ईसा किसी दिन प्रस्थान कर ही रहे थे कि एक व्यक्ति दौड़ता हुआ आया और उनके सामने घुटने टेक कर उसने यह पूछा, ’’भले गुरु! अनन्त जीवन प्राप्त करने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?’’

18) ईसा ने उस से कहा, ’’मुझे भला क्यों कहते हो? ईश्वर को छोड़ कोई भला नहीं।

19) तुम आज्ञाओं को जानते हो, हत्या मत करो, व्यभिचार मत करो, चोरी मत करो, झूठी गवाही मत दो, किसी को मत ठगो, अपने माता-पिता का आदर करो।’’

20) उसने उत्तर दिया, ’’गुरुवर! इन सब का पालन तो मैं अपने बचपन से करता आया हूँ’’।

21) ईसा ने उसे ध्यानपूर्वक देखा और उनके हृदय में प्रेम उमड़ पड़ा। उन्होंने उस से कहा, ’’तुम में एक बात की कमी है। जाओ, अपना सब कुछ बेच कर ग़रीबों को दे दो और स्वर्ग में तुम्हारे लिए पूँजी रखी रहेगी। तब आ कर मेरा अनुसरण करों।“

22) यह सुनकर उसका चेहरा उतर गया और वह बहुत उदास हो कर चला गया, क्योंकि वह बहुत धनी था।

23) ईसा ने चारों और दृष्टि दौड़ायी और अपने शिष्यों से कहा, ’’धनियों के लिए ईश्वर के राज्य में प्रवेश करना कितना कठिन होगा!

24) शिष्य यह बात सुन कर चकित रह गये। ईसा ने उन से फिर कहा, ’’बच्चों! ईश्वर के राज्य में प्रवेश करना कितना कठिन है!

25) सूई के नाके से हो कर ऊँट निकलना अधिक सहज है, किन्तु धनी का ईश्वर के राज्य में प्रवेश़्ा करना कठिन है?’’

26) शिष्य और भी विस्मित हो गये और एक दूसरे से बोले, ’’तो फिर कौन बच सकता है?’’

27) उन्हें स्थिर दृष्टि से देखते हुए ईसा ने कहा, ’’मनुष्यों के लिए तो यह असम्भव है, ईश्वर के लिए नहीं; क्योंकि ईश्वर के लिए सब कुछ सम्भव है’’।

28) तब पेत्रुस ने यह कहा, ’’देखिए, हम लोग अपना सब कुछ छोड़ कर आपके अनुयायी बन गये हैं।’’

29) ईसा ने कहा, ’’मैं तुम से यह कहता हूँ- ऐसा कोई नहीं, जिसने मेरे और सुसमाचार के लिए घर, भाई-बहनों, माता-पिता, बाल-बच्चों अथवा खेतों को छोड़ दिया हो

30) और जो अब, इस लोक में, सौ गुना न पाये- घर, भाई-बहनें, माताएँ, बाल-बच्चे और खेत, साथ-ही-साथ अत्याचार और परलोक में अनन्त जीवन।




📚 मनन-चिंतन



धनी होना कोई पाप नहीं है। एक धनवान युवक येसु के पास आया और पूछा, "अनन्त जीवन पाने के लिए मुझे क्या करना चाहिए।" यह देखकर बहुत खुशी हुई कि एक धनी, युवा और सफल व्यक्ति आध्यात्मिक मामलों में दिलचस्पी रखता है। आम तौर पर उनकी उम्र के लोग जिंदगी के रोमांच को दूसरी चीजों में ढूंढते हैं। लेकिन यह आदमी वास्तव में भला प्रतीत होता है। वह गंभीर था और उसने येसु का अनुसरण किया है और यही कारण है कि वह इतना गंभीर प्रश्न लेकर उसके पास आया है। इसके अलावा, येसु के बारे में उसकी समझ भी काफी अधिक है। फरीसियों और अन्य कुलीन वर्ग के विपरीत जो मानसिक रूप से आलोचनात्मक थे, इस युवक ने येसु का आदर करते हुये उन्हें 'भला गुरु' कहा। इन सबसे ऊपर, उसने प्रारंभिक परीक्षा उत्तीर्ण की, जब येसु ने उसे सन्हिता का पालन करने के लिए कहा, तो उसने उत्तर दिया कि वह बचपन से ही ऐसा करता रहा है। ईश्वर के कार्यों में इतनी गहराई तक जाने के बाद भी वह अंतिम परीक्षा में असफल रहा क्योंकि वह उस बात को पूरा नहीं कर सका जो प्रभु ने उसे करने के लिए कही थी। वह अपनी संपत्ति से दूर नहीं हो सका। वह अत्याधिक अधिकारों का व्यक्ति था। उसका अपने प्रति और स्वामित्व का मोह होना स्वाभाविक था।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब वह ईश्वर के साथ और अधिक निकट होने का स्वप्न देखने लगता है। ईश्वर के करीब होने के लिए कुछ मांगें शामिल होंगी जिन्हें वह पूरा करने के लिए तैयार नहीं था। हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि निश्चित रूप से उसके दिल में ईश्वर की सेवा करने की इच्छा थी, लेकिन 'नियम और शर्तें’ लागू खंड के साथ। वह लाभप्रद स्थिति से परमेश्वर की सेवा करना चहाता था। अपने साथ धन, संपत्ति, परिवार और दोस्तों के साथ, वह अनन्त जीवन के लिए काम करना चहेगा।

अमीर आदमी की दुखद कहानी उन सभी के लिए आईना रही है जो खुद को और अपनी संपत्ति को ईश्वर से ज्यादा प्यार करते हैं। वास्तव में, वे सभी इस बात को भूल जाते हैं कि धनऔर महिमा ईश्वर की ओर से आती है। और अगर वे ईश्वर के साथ हमारे रिश्ते में बाधा बन जाते हैं तो हमें एक अच्छा संतुलन बनाना चाहिए और ईश्वर को अपने जीवन की प्राथमिकता बनाना चाहिए।

जब ईश्वर ने इब्राहीम को बुलाया, तो उसने उसे महान प्रतिज्ञाओं के भंडार के साथ बुलाया। वह राष्ट्रों का पिता होगा और उसके पास एक अचल भूमि होगी जो ईश्वर उसे देगा। उनकी संतान अपार और अपार धन्य होगी। फिर भी, अब्राहम को सब कुछ पीछे छोड़कर ईश्वर के पीछे चलना पड़ा। ईश्वर के साथ नए रिश्ते के लिए अपने पास जो कुछ भी था उसे त्याग देना महत्वपूर्ण था। अय्यूब की धार्मिकता को साबित करने के लिए, अय्यूब के लिए यह महत्वपूर्ण था कि वह हर उस चीज़ से वंचित हो जाए जो उसके पास थी और जिसे वह प्यार करता था। उसे दिवालिया और बेघर कर दिया गया था। यहां तक ​​कि इस प्रक्रिया में उनका स्वास्थ्य भी खतरे में पड़ गया। परन्तु वह ईश्वर से लिपटा रहता है और सब कुछ छीन लिए जाने पर भी अपने आप को धर्मी ठहराता है।

जब एलियाह ने एलीशा को बुलाया, तब एलीशा बैलों के जोड़े से खेत जोतने में लगा था। उसने जानवरों को मार डाला, लकड़ी से उसने उसे पकाया किया और एलिय्याह का अनुसरण किया। यह प्रतीकात्मक रूप से एक शक्तिशाली प्रस्तुति थी कि किस तरह से व्यक्ति को अपने अतीत को पीछे छोड़कर प्रभु का अनुसरण करना चाहिए। एलीशा ने उसकी सारी संपत्ति को भी नष्ट कर दिया ताकि पुराने पेशे की ओर मुड़कर न देखा जाए।

चेलों ने सब कुछ पीछे छोड़ दिया और येसु के पीछे हो लिए। अमीर आदमी सुरक्षित और सुरक्षित रहने के लिए अपने धन पर निर्भर था। लेकिन यह ईश्वर है जो हमें सुरक्षा प्रदान करता है। येसु का यह कथन कि ऊँट का सूई के नाके में से निकल जाना, किसी धनी के स्वर्ग तक पहुँचने से आसान है।

प्रारंभिक कलीसियाई समुदाय उत्पीड़न के बावजूद सबसे अधिक संतुष्ट समुदाय थे। इसका कारण यह था कि उन्होंने सब कुछ बेच दिया और येसु-मार्ग का अनुसरण किया। जब तक हम सांसारिक चीजों को पकड़ कर रखते हैं, ईश्वर हमेशा हमारे लिए एक दूर की वास्तविकता बने रहते है।

राजा साऊल उसी क्षेत्र में असफल रहा। उसे सब कुछ नष्ट करने के लिए कहा गया लेकिन वह अपने लिए सबसे अच्छे जानवर रखने के लालच का विरोध नहीं कर सका। आईये हम साह्स दिखाये और अपना सबकुछ ईश्वर का अनुसरण करने के लिये छोड दे।




📚 REFLECTION




Being rich is not a sin. A rich young man came to Jesus and asked, “What must I do to have eternal life.” it was quite heartwarming to see that a rich, young, and successful person is interested in spiritual matters. Normally people of his age find the thrill of life in other things. But this man is really good stuff. He had been serious and has followed Jesus and that’s the reason he has come to him with such a serious question. Moreover, his understanding of Jesus is also reasonably high. Unlike the Pharisees and the other elite class who were manically critical. He was respectful of Jesus, he called him, ‘Good Master’. To top it all he passed the initial test, when Jesus asked him to keep the law he replied that he had been doing so from his childhood onwards. After having gone so deep with the works of God yet he failed the ultimate test as he could not fulfill what the Lord asked him to do. He could not do away with his property. He was a man of great possession. It was natural for him to have a belongingness and possessiveness towards it.

The problem arises when he begins to dream to be with God more closely. To be close to God would involve certain demands which he was not ready to fulfill. We can infer that he definitely had a heart and desire to serve God but with the ‘terms and conditions’ applied clause. He would serve God from an advantageous situation. With money, property, family, and friends on his side, he would work for eternal life.

The sad story of the rich man has been a mirror to all those who love themselves and their possession more than God. In fact, they forget all riches and glory comes from God. And if they become a hindrance in our relationship with God then we ought to strike a good balance and make God the priority of our life.

When God called Abraham, he called him with the stock of great promises. He was to be the father of the nations and possess a great land that God would give him. His progeny would be immense and immensely blessed. Nevertheless, Abraham had to leave everything behind and follow the Lord. Giving up everything he had was pivotal for the new venture with God. To prove Job’s righteousness, it was important for Job to be tested by extreme deprivation of everything he possessed and loved. He was rendered bankrupt and homeless. Even his health was jeopardized in the process. But he clings to God and proved himself righteous even when everything was taken away.

When Elijah called Elisha, Elisha was busy plowing the field with the pair of bulls. He killed the animals, with the wood of York he prepared and followed Elijah. It was symbolically a powerful presentation of the way one must leave behind his past and follow the Lord. Elisha even destroys all his possession so that there is no looking back to the old profession.

Disciples left everything behind and followed Jesus. The rich man depended on his riches to be safe and secure. But it is God who provides us security. Jesus’ statement that it is easier for the camel to pass through the eye of the needle than for a rich man to reach heaven.

The initial church communities were the most satisfied communities in spite of the persecution. The reason was they sold off everything and followed the Way. As long as we hold on to the earthly things God would always be a distant reality for us.

King Saul failed in the same area. He was asked to destroy everything but he could not resist the lure of keeping the best animals for himself. Come let us show courage and love God more than anything else.



मनन-चिंतन - 2



ईश्वर ने हम मनुष्यों को अपने प्रतिरूप बनाया है और हमे स्वतंत्रता प्रदान की है जिससे हम बिना किसी बंधन, बिना किसी दबाव के, खुल के जी सके और अपने मन, विवेक और ज्ञान के अनुसार जीवन जी सकें और कार्य कर सकें। विधि-विवरण ग्रंथ 30:19 कहता है, ‘‘मैं आज तुम लोगों के विरुद्ध स्वर्ग और पृथ्वी को साक्षी बनाता हूँ - मैं तुम्हारे सामने जीवन और मृत्यु, भलाई और बुराई रख रहा हूँ। तुम लोग जीवन को चुन लो, जिससे तुम और तुम्हारे वंशज जीवित रह सकें।’’ हमारे समक्ष दोनो हैं जीवन और मृत्यु और हम किसे चुनते हैं यह हम प्रत्येक व्यक्ति पर निर्भर करता है। आज का सुसमाचार हमें इसी चुनाव के विषय में बताता है।

आज के सुसमाचार में हम एक ऐसे व्यक्ति के विषय में जानते हैं जो कि एक गुणवत्ता भरा या उत्कृष्ट जीवन व्यतीत कर रहा था, परंतु उसे अनंत जीवन की आस थी। संत मत्ती के सुसमाचार में इस व्यक्ति को नवयुवक की सन्ज्ञा दी गई हैं जिसके पास आगे का पूरा जीवन हैं। उपदेशक ग्रंथ 12:1 कहता है, ‘‘अपनी जवानी के दिनों में अपने सृष्टिकर्ता को याद रखों’’। अक्सर हम देखते हैं कि मनुष्य ईश्वर की शरण उम्र ढलने पर या कुछ संकट आने पर जाता है परन्तु इस युवक के पास पूरी जिंदगी रहने के बावजूद भी वह प्रभु की शरण में जाने की सोचता है। संत लूकस का सुसमाचार इस व्यक्ति को कुलीन अर्थात् सुशील या उच्च वर्ग के व्यक्ति की संज्ञा देता है, इसका मतलब यह कि वह व्यक्ति अपने आचरण या अपने काबिलियत के कारण किसी उच्च पद में पद्स्थ था। यह व्यक्ति एक धनी व्यक्ति था। अक्सर लोग धन होने का गलत अर्थ निकालते हैं। धनी होना पाप या गलत नहीं। वचन हमें यह नहीं कहता कि धन सभी बुराईयो की जड़ है परंतु कहता है, ‘‘धन का लालच सभी बुराईयों की जड़ है।’’ (1 तिमथी 6:10)। यह व्यक्ति एक नैतिक जीवन जी रहा था, वह आज्ञाओं का पालन करता आ रहा था, जैसे हत्या न करना, व्यभिचार न करना, चोरी न करना, झूठी गवाही न देना, किसी को न ठगना, माता-पिता का आदर करना। यह बताता है कि उस मनुष्य का जीवन एक अच्छा जीवन था और उसके पास वह सब कुछ था जो कि एक साधारण मनुष्य इस जीवन में चाहता है, परंतु यह सब होने के बावजूद भी यह व्यक्ति कुछ कमी महसूस करता है। इसलिए वह येसु के पास अनंत जीवन, अनंत आनंद की तलाश में आता है। अक्सर हम देखते कि लोग अपना सारा समय, उम्र धन कमाने में लगा देते है और जब वे उसे प्राप्त कर लेते हैं तब भी उन्हें उनका जीवन खाली ही लगता है। यही उस धनी व्यक्ति के साथ भी हुआ। इसलिए व येसु के पास आता है।

संत योहन का सुसमाचार 3:16, ‘‘ईश्वर ने संसार को इतना प्यार किया कि उसने इसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उस में विश्वास करता है, उसका सर्वनाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन प्राप्त करें।’’ यह वचन बताता है कि ईश्वर के पुत्र में विश्वास करनें से हम अनंत जीवन प्राप्त कर सकते हैं केवल अच्छें कार्य या अच्छे बने रहकर ही नही। ‘‘ईश्वर ने अपने पुत्र द्वारा हमें अनन्त जीवन प्रदान किया है। जिसे पुत्र प्राप्त है, उसे वह जीवन प्राप्त है और जिसे पुत्र प्राप्त नहीं है, उसे जीवन प्राप्त नहीं (1 योहन 5:11)। ‘‘मैं तुम्हें अनंत जीवन प्रदान करता हूँ।’’(योहन 10:58)। ‘‘जो पुत्र में विश्वास करता है, उसे अनन्त जीवन प्राप्त है’’(योहन 3:38)। ‘‘वे तुझे, एक ही सच्चे ईश्वर को और ईसा मसीह को, जिसे तूने भेजा है जान लें- यही अनन्त जीवन है’’(योहन 17:3)। ये सभी वचन बताते हैं कि प्रभु येसु ही अनंत जीवन है, जो अनंत जीवन प्रदान करतें है, जो उन पर विश्वास करता हैं, अनुसरण करता है उसे अनंत जीवन प्राप्त है।

उस धनी व्यक्ति को मालूम था कि येसु के द्वारा उसे अनंत जीवन प्राप्त हो सकता है, इसलिए वह दौड़कर येसु के पास आता है। प्रभु उस के मन के विचारो और कमी को समझ जाते है। इसलिए वह उन्हें सीधे रूप से नही कहते जैसे कि वह अक्सर कहते थे, ‘‘मेरे पीछे चले आओ’’ या ‘‘मेरा अनुसरण करों’’ परंतु प्रभु ने उस मनुष्य के मन को समझकर उससे कहा, ‘‘जाओ, अपना सब कुछ बेच कर गरीबों को दे दो और स्वर्ग में तुम्हारे लिए पूँजी रखी रहेगी। तब आ कर मेरा अनुसरण करों।’’

प्रभु उसके सामने अनंत जीवन पाने के लिए एक चुनाव रखते हैः धन या ईसा का अनुसरण। वह व्यक्ति ईसा का अनुसरण करना भी चाहता परंतु धन को छोड़ना भी नहीं चाहता था। परंतु वचन कहता है,‘‘कोई भी दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता। वह या तो एक से बैर और दूसरे से प्रेम करेगा, या एक का आदर और दूसरे का तिरस्कार करेगा। तुम ईश्वर और धन- दोनों की सेवा नहीं कर सकते।’’ (मत्ती 6:24)। उस व्यक्ति ने येसु को छोड़ धन का चुनाव किया और उदासीन होकर अनंत जीवन पाने का अवसर को खो दिया। क्योंकि धन का लालच सभी बुराईयों की जड़ है (1 तिमथी 6:10)। ईश्वर धन-सम्पत्ति, आलीशान घर, आधुनिक उपकरण होने के विरुद्ध नहीं अपितु उनके प्रति अत्याधिक लगाव और ईश्वर को छोड़ उन पर निर्भरता के विरुद्ध है। ईश्वर माता-पिता, भाई-बहनों के विरुद्ध में नहीं हैं परन्तु वे ईश्वर से परित्याग या विमुखता के विरुद्ध में है (मारकुस 10:29-30)।

येसु उसे ज्ञात कराना चाहते थे कि उसका मन बँटा हुआ है। वह अपने धन पर आश्रित है। येसु चाहते थे कि वह अपना जीवन ईश्वर को सम्पूर्ण रूप से अर्पित करें और ईश्वर पर आश्रित जीवन बितायें। परंतु उसने धन पर निर्भर होना स्वीकारा। अक्सर हम मनुष्य अपनी धन-सम्पत्ति, कला, ज्ञान, कौशल, बुद्धि, समझदारी पर ज्यादा निर्भर रहते है, जिस कारण हम ईश्वर को समय न देकर ईश्वर से दूर चले जाते है।

आज के सुसमाचार के विपरीत एक और उदाहरण है जो हमें ईश्वर की कृपा का वर्णन बताता है, और वह है विश्वास के पिता इब्राहीम का उदाहरण। हम जानते हैं कि इब्राहीम की कोई संतान नहीं थी। जब इब्राहीम की कोई संतान नहीं थी तो वह अधिकतर समय ईश्वर के साथ व्यतीत करता था- ईश्वर के साथ चलना, बाते करना आदि। परंतु जब उसे ईश्वर द्वारा एक पुत्र प्राप्त होता हैं तो वह उस पुत्र के प्रेम में मुग्ध हो जाता है और धीरे-धीरे वह ईश्वर को छोड़ अपने पुत्र के साथ ज्यादा समय बिताने लगता है। ईश्वर उसके ईश्वरीय प्रेम और विश्वास की परीक्षा लेने हेतु उसे अपने पुत्र की बलि चढ़ाने को कहते हैं। हम जान सकते हैं कि उस पिता की क्या मनोव्यथा रही होगी, जिसे बरसों बाद एक पुत्र प्राप्त हुआ परंतु उसे उसको त्यागना होगा। इस दुविधा भरे क्षण में वह अपने पुत्र को छोड़ ईश्वर की आज्ञा को चुनता है और वह इस चुनाव में ईश्वर को तो पाता ही है परंतु अपने पुत्र को भी पाता हैं।

अक्सर मनुष्य सोचता है कि अगर मैं ईश्वर का अनुसरण करुँगा या उसकी आज्ञाओं पर चलूँगा तो बहुत कुछ खोना पडे़गा परंतु वह यह नही समझता कि ईश्वर को पाने से वह सब कुछ को पा लेता है जैसे कि इब्राहीम ने पाया परंतु उस धनी व्यक्ति ने सब कुछ पाकर भी खो दिया। ‘‘जो अपना जीवन सुरक्षित रखना चाहता है, वह उसे खो देगा और जो मेरे कारण अपना जीवन खो देता है, वह उसे सुरक्षित रखेगा।’’ (मत्ती 16:25) अर्थात् जो इस संसार में ईश्वर के लिए सबकुछ खो देता है वह असलियत में खोता नहीं परंतु उससे कही गुणा ज्यादा और कीमती चीज़ पाता है। ईसा ने कहा, ’’ मैं तुम से यह कहता हूँ- ऐसा कोई नहीं, जिसने मेरे और सुसमाचार के लिए घर, भाई-बहनों, माता-पिता, बाल-बच्चों अथवा खेतों को छोड़ दिया हो और जो अब, इस लोक में, सौ गुना न पाये- घर, भाई-बहनें, माताएँ, बाल-बच्चे और खेत, साथ ही साथ अत्याचार और परलोक में अनन्त जीवन’’ (मारकुस 10:29-30)।


✍-Br Biniush Topno


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Praise the Lord!

शनिवार, 09 अक्टूबर, 2021

शनिवार, 09 अक्टूबर, 2021

वर्ष का सताईसवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ : योएल का ग्रन्थ 4:12-21;.


12) प्रभु-ईश्वर! अपने योद्धओं को भेज। सब राष्ट्रों! जागो, यहोशाफाट की घाटी की राह पर चलो। मैं वहाँ न्याय सिंहासन पर बैठूँगा और चारों ओर के राष्ट्रों का न्याय करूँगा।

13) हँसिया चलाओ, क्योंकि फसल पक चुकी है। आओ और अंगूर रौंदो, क्योंकि कोल्हू परिपूर्ण है। कुण्ड लबालब भरे हुए हैं, क्योंकि राष्ट्रों की दुष्टता अपार है।

14) विचार की घाटी में लोगों की भारी भीड लग रही है, क्योंकि विचार की घाटी में प्रभु का दिन निकट आ गया है।

15) सूर्य और चन्द्रमा अंधकारमय होते जा रहे हैं और नक्षत्रों की ज्योति बुझ रही है।

16) प्रभु-सियोन से गरज रहा है, येरुसालेम से उसकी आवाज ऊँची उठ रही है; स्वर्ग और पृथ्वी कांप रहे हैं। किन्तु प्रभु अपनी प्रजा क ेलिए आश्रय सिद्ध होगा, इस्राएलियों के लिए सुदृढ़ गढ होगा।

17) ’’उस दिन तुम जान जाओगे कि मैं तुम्हारा प्रभु-ईश्वर हूँ, जो अपने पवत्रि पर्वत सियोन पर निवास करता है। येरुसालेम पवत्रि होगा और विदेशी उसे फिर पान नहीं करेंगे।’’

18) उस दिन पर्वतों से अंगूरी टपकेगी, पहाडियों से मधु की धाराएँ फूट निकलेंगी और यहूदियों की सब नदियों में भरूपूर पानी होगा, क्योंकि प्रभु के मंदिर में से एक जलस्रोत बह निकलेगा, जो बाबुल की घाटी को सींचेगा।

19) मिस्र ऊसर हो जायेगा और एदोम मरुभूमि, क्योंकि उन्होंने यूदा के पुत्रों के साथ अत्याचार किया और अपने देश में उनका निर्दोष रक्त बहाया।

20) किन्तु यहूदिया सदैव बसी रहेगी और येरुसालेम युग-युग आबाद रहेगा।

21) ’’मैं उनके रक्त को बदला लूँगा, वह अदण्डित नहीं रहेगा’; क्योंकि प्रभु सियोन में निवास करता रहेगा।



सुसमाचार : सन्त लूकस 11:27-28



27) ईसा ये बातें कह ही रहे थे कि भीड़ में से कोई स्त्री उन्हें सम्बोधित करते हुए ऊँचे स्वर में बोल उठी, ’’धन्य है वह गर्भ, जिसने आप को धारण किया और धन्य हैं वे स्तन, जिनका आपने पान किया है!

28) परन्तु ईसा ने कहा, ’’ठीक है; किन्तु वे कहीं अधिक धन्य हैं, जो ईश्वर का वचन सुनते और उसका पालन करते हैं’’।



📚 मनन-चिंतन



हमारे जीवन का लक्ष्य, जिस लिये हमें बनाया गया है, वह है, ईश्वर के साथ एकता है। ईश्वर के साथ हम अपने जीवन का अर्थ और उद्देश्य पाते हैं। हमारे भटकने का कारण यह है कि हम ईश्वर से दूर कहीं ओर उत्तर की तलाश करते हैं। जब हम ईश्वर के साथ एक होते हैं, तो हमें अपने अस्तित्व के वास्तविक उद्देश्य का एहसास होता है।

ईश्वर के साथ एक होने के सबसे शक्तिशाली तरीकों में से एक है उसकी बात सुनना। हम बाईबल के माध्यम से ईश्वर को सुनते हैं जो ईश्वर का वचन है। जब हम वचन का पालन करने में प्रगति करते हैं तो हम ईश्वर के साथ और अधिक घनिष्ठ हो जाते हैं। जो लोग येसु मसीह का अनुसरण करते हैं और जो ईश्वर की इच्छा की खोज करते हैं वे एक नए परिवार में प्रवेश करते हैं, एक परिवार जो ईश्वर के साथ रिश्ते होने के नाते यहां पृथ्वी और स्वर्ग में है। येसु रिश्तों के क्रम को बदलते हैं और दिखाते हैं कि सच्चा रिश्ता सिर्फ खून का मामला नहीं है। ईश्वर के पुत्र और पुत्रियों के रूप में हमारा बनना हमारे सभी संबंधों को बदल देता है और ईश्वर और उसके राज्य के प्रति निष्ठा की एक नई व्यवस्था की मांग करता है।

जब एक श्रोता ने येसु की माता की स्तुति के द्वारा येसु की प्रशंसा करना चाहा, तो येसु ने उस आशीष की सच्चाई को नकारा नहीं जो मरियम ने अपनी धन्यता में कहा था 'सभी पीढ़ियाँ मुझे धन्य कहेंगी' (लूकस 1:48)। येसु ने अपने शब्दों को जोड़ते हुये, सभी सच्ची आशीषों या सुखों के स्रोत की ओर इशारा करते हुए - परमेश्वर के साथ वचन की एकता पर जोर दिया। मरियम ने विनम्रतापूर्वक अपने इकलौते पुत्र के देहधारण के लिए, यह घोषणा करते हुए, ईश्वर की चमत्कारी योजना के प्रति समर्पण किया, : मैं प्रभु की दासी हूँ; तेरा वचन मुझ में पूरा हो (लूकस १:३८)। मरियम ने स्वर्गदूत द्वारा उनसे कहे गए वचन को सुना और उन्होंने उस पर विश्वास किया। जो लोग परमेश्वर का वचन सुनते हैं वे वास्तव में धन्य हैं क्योंकि वे अपने ईश्वर को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं और वे उसके वचन को सुनने और उसका पालन करने में आनंद पाते हैं।



📚 REFLECTION



The goal of our life, for the very reason we were created is for the union with God. it with God we find the earthly meaning and purpose of our life. the reason for our wandering is that we look for answers away from God. when we are one with God, we realize the true purpose of our being.

One of the most powerful ways to be united with God is to listen to him. we listen to God through the Bible which is the word of God. We become more closely united with God when we make progress in obeying the word. Those who follow Jesus Christ and who seek the will of God enter into a new family, a family of being relatives of God here on earth and in heaven. Jesus changes the order of relationships and shows that true kinship is not just a matter of flesh and blood. Our becoming as sons and daughters of God transforms all our relationships and demands a new order of loyalty to God and his kingdom.

When a listen wished to compliment Jesus by praising his mother, Jesus did not deny the truth of the blessing she pronounced in her Magnificat ‘All generations will call me blessed’ (Luke 1:48). Jesus adds to her words by pointing to the source of all true blessedness or happiness -- union with God. Mary humbly submitted herself to the miraculous plan of God for the incarnation of his only begotten Son, by declaring: I am the handmaid of the Lord; let it be done to me according to your word (Luke 1:38). Mary heard the word spoken to her by the angel and she believed it. people who hear the word of God are truly blessed because they know their God personally and they find joy in hearing and obeying his word.



मनन-चिंतन - 2



भीड़ में से एक महिला प्रभु येसु के कर्मों तथा उनकी शिक्षा की सराहना से भरी उनकी शारीरिक माता की प्रशंसा करने लगती है। शायद उसने आशा की होगी – अगर मेरा येसु जैसा एक बेटा होता! एक माँ की उसकी अवधारणा या संकल्पना शायद केवल शारीरिक और सांसारिक थी - वह जो अपने गर्भ में बच्चों को धारण करती है और उनका पालन-पोषण करती है। येसु चाहते हैं कि वह यह समझे कि उस व्यक्ति की गरिमा "जो परमेश्वर के वचन को सुनता है और रखता है" येसु की शारीरिक माँ बनने से कहीं अधिक है। लूकस 8:21 में वे कहते हैं, “मेरी माता और मेरे भाई वहीं हैं, जो ईश्वर का वचन सुनते और उसका पालन करते हैं"। प्रभु येसु यह नहीं चाहते हैं कोई भी माँ मरियम को उनके केवल शारीरिक माता के रूप में देखे। उच्च स्तर पर माता मरियम महिलाओं में धन्य हैं क्योंकि वे ईश्वर के वचनों को सुन कर उन्हें अपने हृदय में संचित रखती हैं। वे ईश्वर के वचनों को अपने दिल में रखती हैं और उन वचनों को हर दिन अपने कदमों का मार्गदर्शन करने देती है। इसीलिए, केवल उनकी होंठ या जीभ ही नहीं, बल्कि उसकी आत्मा प्रभु का गुणगान करती है (देखें लूकस 1:46)।



SHORT REFLECTION


A lady from the crowd full of appreciation for the deeds and words of Jesus began to praise his physical mother. She probably would have desired to have a son like Jesus. Her concept of a mother probably was purely physical and earthly – she who bears children in her womb and nurses them. Jesus wants her to understand that the dignity of a person “who hears the word of God and keeps it” is greater than that of simply being a physical mother to Jesus. In Lk 8:21 Jesus says, “My mother and My brothers are these who hear the word of God and do it”. Jesus does not want anyone to look at Mary as mere physical mother of Jesus. At a higher level, she is Blessed among women, because she hears the Word of God and keeps it. She keeps the Word in her heart and allows that Word to guide her steps every day. That is why, not just lips or tongue, but her soul magnifies the Lord (cf. Lk 1:46).



✍ -Br Biniush Topno


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शुक्रवार, 08 अक्टूबर, 2021

 

शुक्रवार, 08 अक्टूबर, 2021

वर्ष का सताईसवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ : योएल का ग्रन्थ 1:13-15;


13) याजको! टाट ओढ कर शोक मनाओ। वेदी के सेवको! विलाप करो। मेरी ईश्वर के सेवको, शोक के वस्त्र पहन कर रात बिताओ; क्योंकि तुम्हारे ईश्वर का मन्दिर नैवेद्य और तर्पण से वंचित हो गया है।

14) उपवास की घोषण करो, सभा बुलाओ, बूढों और देश के सभी निवासियों को अपने-प्रभु-ईश्वर के मंदिर में एकत्र करो और प्रभु की दुहाई दो।

15) हाय! वह दिन आ गया है। प्रभु का दिन निकट आ रहा है। वह सर्वशक्तिमान् की विनाश-लीला की तरह आ रहा है।

1) सियोन में तुरही बजाओ। मेरे पवत्रि पर्वत्र पर खतरे का घण्टा बजा दो। देश के सभी निवास काँप उठें, क्योंकि प्रभु का दिन आ रहा है, वह निकट आ गया है।

2) वह अंधकार और विषाद का दिन है। वह बादलों और अन्धेरे का दिन है। एक बहुसंख्यक और शक्तिशाली सेना काले बादल की तरह पर्वतों पर फैल रही है। इस प्रकार की सेना न पहले कभी थी और न अनन्त काल तक फिर कभी होगी।



सुसमाचार : सन्त लूकस 11:15-26



15) परन्तु उन में से कुछ ने कहा, ’’यह अपदूतों के नायक बेलज़ेबुल की सहायता से अपदूतों को निकालता है’’।

16) कुछ लोग ईसा की परीक्षा लेने के लिए उन से स्वर्ग की ओर का कोई चिन्ह माँगते रहे।

17) उनके विचार जान कर ईसा ने उन से कहा, ’’जिस राज्य में फूट पड़ जाती है, वह उजड़ जाता है और घर के घर ढह जाते हैं।

18) यदि शैतान अपने ही विरुद्ध विद्रोह करने लगे, तो उसका राज्य कैसे टिका रहेगा? तुम कहते हो कि मैं बेलजे़बुल की सहायता से अपदूतों को निकालता हूँ।

19) यदि मैं बेलजे़बुल की सहायता से अपदूतों को निकालता हूँ, तो तुम्हारे बेटे किसी सहायता से उन्हें निकालते हैं? इसलिए वे तुम लोगों का न्याय करेंगे।

20) परन्तु यदि मैं ईश्वर के सामर्थ्य से अपदूतों को निकालता हूँ, तो निस्सन्देह ईश्वर का राज्य तुम्हारे बीच आ गया है।

21) ’’जब बलवान् मनुष्य हथियार बाँधकर अपने घर की रखवाली करता है, तो उसकी धन-सम्पत्ति सुरक्षित रहती है।

22) किन्तु यदि कोई उस से भी बलवान् उस पर टूट पड़े और उसे हरा दे, तो जिन हथियारों पर उसे भरोसा था, वह उन्हें उस से छीन लेता और उसका माल लूट कर बाँट देता है।

23) ’’जो मेरे साथ नहीं है, वह मेरा विरोधी है और जो मेरे साथ नहीं बटोरता, वह बिखेरता है।

24) ’’जब अशुद्ध आत्मा किसी मनुष्य से निकलता है, तो वह विश्राम की खोज में निर्जन स्थानों में भटकता फिरता है। विश्राम न मिलने पर वह कहता है, ’जहाँ से निकला हूँ, अपने उसी घर वापस जाऊँगा’।

25) लौटने पर वह उस घर को झाड़ा-बुहारा और सजाया हुआ पाता है।

26) तब वह जा कर अपने से भी बुरे सात अपदूतों को ले आता है और वे उस घर में घुस कर वहीं बस जाते हैं और उस मनुष्य की यह पिछली दशा पहली से भी बुरी हो जाती है।’’



📚 मनन-चिंतन



आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि नेताओं द्वारा येसु के विरुद्ध एक भयानक अभियान चलाया जा रहा है। उन्होंने येसु पर अपदूतों के नायक बेलजेबुल के साथ होने का आरोप लगाया। यह बहुत ही भयावह था लेकिन येसु इससे जरा भी विचलित नहीं हुये और इस बात को लेकर कुछ बिंदुओं को बहुत स्पष्ट कर दिया। संत पापा फ्राँसिस का कहना है कि येसु ने हम सभी के पालन और सुरक्षा के लिए तीन मानदंड निर्धारित किए। सबसे पहले, येसु शैतान से लड़ते है। हमें इस सच्चाई को भ्रमित नहीं करना चाहिए। दूसरी बात कि हमें थोडा इधर थोडा उधर का रवेया का नहीं अपनाना चाहिये। जो येसु के साथ नहीं है, वह येसु के विरुद्ध है। तीसरी और महत्वपूर्ण बात, हमारे दिलों पर सतर्कता होनी चाहिये क्योंकि शैतान चालाक है। उसे हमेशा के लिए बाहर नहीं किया जाता है। केवल अंतिम दिन ऐसा ही होगा।”



📚 REFLECTION



In today’s gospel we find a sinister campaign being run against Jesus by leaders. They blamed Jesus for being in association with the Beelzebul, the prince of demons. It was quite sinister however Jesus remained unfazed and made certain points very clear in this episode. Pope Francis says Jesus set three criteria for all to observe and be guarded. First of all, Jesus fights the devil. We must not confuse this truth. Secondly there is nothing being here or being there. He who is not with Jesus is against Jesus. The third and important thing, the vigilance over our hearts because the devil is astute. He is never cast out forever. It will only be so on the last day.”



मनन-चिंतन - 2



जब प्रभु येसु के ऊपर आरोप लगाया गया कि वे अपदूतों के नायक बेलज़ेबुल की सहायता से अपदूतों को निकालते हैं, तब सब से पहले प्रभु ने उन्हें उस तर्क का मिथ्यात्व दिखाया। उसके बाद उन्होंने अपने कार्यों की सच्चाई प्रस्तुत की। उन्होंने अपने आलोचकों को बताया कि वे ईश्वर की शक्ति और सामर्थ्य से ही अपदूतों को निकाल रहे थे, न कि बेलज़ेबुल की सहायता से। प्रभु ईश्वर शैतान से बहुत अधिक ताकत रखते हैं, वे शैतान के हथियारों को छीन कर उसे हरा कर खाली हाथ भेज सकते हैं। प्रभु येसु इसी सामर्थ्य से ही अपदूतों को निकाल रहे थे। यह ईश्वर के राज्य के आगमन का प्रमाण है। इस अवसर प्रभु यह भी कहते हैं कि जिस व्यक्ति से अशुध्द आत्मा निकलता है उस व्यक्ति को सतर्क रहना चाहिए क्योंकि वह जा कर अपने से भी बुरे सात अपदूतों को ले कर वापस उसी व्यक्ति में निवास करने के लिए आ सकता है और उस मनुष्य की यह पिछली दशा पहली से भी बुरी हो सकती है। संत पेत्रुस कहते हैं, “आप संयम रखें और जागते रहें! आपका शत्रु, शैतान, दहाड़ते हुए सिंह की तरह विचरता है और ढूँढ़ता रहता है कि किसे फाड़ खाये। आप विश्वास में दृढ़ हो कर उसका सामना करें।“ (1पेत्रुस 5:8-9) संत पौलुस कहते हैं, “आप ईश्वर के अस्त्र-शस्त्र धारण करें, जिससे आप शैतान की धूर्तता का सामना करने में समर्थ हों” (एफेसियों 6:11) शैतान के प्रभाव तथा फन्दों से बचे रहने के लिए हम ईश्वर से लिपटे रहें।




SHORT REFLECTION


When some people accused Jesus of using the power of Beelzebul, the chief of the demons, first of all, Jesus showed them the falsity of this accusation. He, then proceeded to show them the truth. He told his critics that he was casting out demons with the power or God rather than of Beelzebul, the prince of the demons. God has much greater power than Beelzebul. God can simply disarm the devil and send him away empty handed. It is this mighty hand of God that was at work in Jesus when he cast out demons. This is a sign also of the advent of the Kingdom of God. Jesus also warns that the one from whom the demon is cast out needs to be alert because the unclean spirit can go and bring “seven other spirits more evil than itself” to enter and live in that person to make the last state of that person worse than the first. St. Peter says, “Discipline yourselves, keep alert. Like a roaring lion your adversary the devil prowls around, looking for someone to devour. Resist him, steadfast in your faith” (1Pet 5:8-9). St. Paul says, “Put on the whole armor of God, so that you may be able to stand against the wiles of the devil” (Eph 6:11). Let us cling on to Jesus to be free from the snares of the devil.


✍ -Br Biniush Topno


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गुरुवार, 07 अक्टूबर, 2021

 गुरुवार, 07 अक्टूबर, 2021

वर्ष का सताईसवाँ सामान्य सप्ताह

धन्य कुँवारी मरियम माला की महारानी : स्मृति

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 1:12-14

12) प्रेरित जैतून नामक पहाड़ से येरुसालेम लौटे। यह पहाड़ येरुसालेम के निकट, विश्राम-दिवस की यात्रा की दूरी पर है।


13) वहाँ पहुँच कर वे अटारी पर चढ़े, जहाँ वे ठहरे हुए थे। वे थे-पेत्रुस तथा योहन, याकूब तथा सिमोन, जो उत्साही कहलाता था और याकूब का पुत्र यूदस।


14) ये सब एकहृदय हो कर नारियों, ईसा की माता मरियम तथा उनके भाइयों के साथ प्रार्थना में लगे रहते थे।


सुसमाचार : सन्त लूकस 01:26-38

26) छठे महीने स्वर्गदूत गब्रिएल, ईश्वर की ओर से, गलीलिया के नाजरेत नामक नगर में एक कुँवारी के पास भेजा गया,


27) जिसकी मँगनी दाऊद के घराने के यूसुफ नामक पुरुष से हुई थी, और उस कुँवारी का नाम था मरियम।


29) वह इन शब्दों से घबरा गयी और मन में सोचती रही कि इस प्रणाम का अभिप्राय क्या है।


30) तब स्वर्गदूत ने उस से कहा, ’’मरियम! डरिए नहीं। आप को ईश्वर की कृपा प्राप्त है।


31) देखिए, आप गर्भवती होंगी, पुत्र प्रसव करेंगी और उनका नाम ईसा रखेंगी।


32) वे महान् होंगे और सर्वोच्च प्रभु के पुत्र कहलायेंगे। प्रभु-ईश्वर उन्हें उनके पिता दाऊद का सिंहासन प्रदान करेगा,


33) वे याकूब के घराने पर सदा-सर्वदा राज्य करेंगे और उनके राज्य का अन्त नहीं होगा।’’


34) पर मरियम ने स्वर्गदूत से कहा, ’’यह कैसे हो सकता है? मेरा तो पुरुष से संसर्ग नहीं है।’’


35) स्वर्गदूत ने उत्तर दिया, ’’पवित्र आत्मा आप पर उतरेगा और सर्वोच्च प्रभु की शक्ति की छाया आप पर पड़ेगी। इसलिए जो आप से उत्पन्न होंगे, वे पवित्र होंगे और ईश्वर के पुत्र कहलायेंगे।


36) देखिए, बुढ़ापे में आपकी कुटुम्बिनी एलीज़बेथ के भी पुत्र होने वाला है। अब उसका, जो बाँझ कहलाती थी, छठा महीना हो रहा है;


37) क्योंकि ईश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है।’’


38) मरियम ने कहा, ’’देखिए, मैं प्रभु की दासी हूँ। आपका कथन मुझ में पूरा हो जाये।’’ और स्वर्गदूत उसके पास से चला गया।


📚 मनन-चिंतन

रोज़री की माता का पर्व कलीसिया के सबसे प्रेरक पर्वों में से एक है। यह तुरंत हमारे विचार को माता मरियम और उनकी सबसे लोकप्रिय आम प्रार्थना माला विनती की ओर ले जाता है। पर्व को इतना लोकप्रिय और शक्तिशाली बनाने के लिए इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। 7 अक्टूबर 1571 को एक समूह की सेना ने तुर्की की नाभि सेना को हराया था। सन्त पापा पायस पान्चवे ने जीत का श्रेय धन्य कुंवारी मरियम की मध्यस्था को दिया, जिसे युद्ध के दिन पूरे यूरोप में माला विनती करने के अभियान के माध्यम से आमंत्रित किया गया था। यह ख्रिस्तीय देशों की एक ऐतिहासिक जीत थी क्योंकि तुर्की साम्राज्य ख्रिस्तीय दुनिया विशेषकर यूरोप के लिए खतरा था। यदि तुर्की सेना को युद्ध जीतती, तो यूरोप का सांस्कृतिक, धार्मिक चेहरा पहले जैसा नहीं होता। तब से, माला विनती के माध्यम से मरियम की भक्ति दूर-दूर तक बढ़ी है। लोगों ने ईश्वर की शक्ति का अनुभव किया है और रोजरी की माता मरियम के माध्यम से चमत्कारी अनुग्रह प्राप्त किया है।



📚 REFLECTION


The feast of Our Lady of Rosary is one of the most inspiring feasts in the church. It immediately takes our thought to blessed Mother Mary and the most common prayer Rosary. The historical background plays an important role for the feast to be so popular and powerful. It was on 7th October 1571 that the army of a league defeated the Turkey navel army. Pope St. Pius V attributed the victory to the intercession of the Blessed Virgin Mary, who was invoked on the day of the battle through a campaign to pray the Rosary throughout Europe. It was a landmark victory of the Christian countries as the Turkey empire was threatening the Christian world especially Europe. If the turkey forces were to win the battle, then the cultural, religious face of Europe would not have been the same.


Since then, the devotion to Mary through the Rosary has grown far and wide. People have experienced the power of God and obtained miraculous favors through the intercession of Our Lady of Rosary



मनन-चिंतन - 2

आज कलीसिया माला-विनती की माता मरिया का त्योहार मनाती है। माला-विनती पवित्र वचन पर मनन-चिंतन की प्रार्थना है। माला-विनती में हम ’प्रणाम मरिया” प्रार्थना बार-बार दोहराते हैं। “प्रणाम मरिया, कृपापूर्ण, प्रभु आपके साथ हैं” - यह लूकस 1:28 का पवित्र वचन है। प्रभु का दूत प्रभु का सन्देश लेकर आता है। अगर वह माता मरियम को प्रणाम करता है, तो वह प्रभु के आदेश के अनुसार ही करता है। अगर वह कहता है कि आप कृपापूर्ण है और प्रभु आपके साथ है, तो वह भी प्रभु की प्रेरणा से ही कहता है। “आप नारियों में धन्य हैं और धन्य हैं आप के गर्भ का फल येसु” – यह लूकस 1:42 का एलिज़बेथ द्वारा घोषित पवित्र वचन है। पवित्र वचन कहता है कि एलिज़बेथ पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर ऊँचे स्वर से बोल उठी (देखें लूकस 1:42)। ’प्रणाम मरिया’ प्रार्थना के दूसरे भाग में हम माता मरियम को ‘ईश्वर की माँ’ कह कर उनसे हम पापियों के लिए अब और हमारी मृत्यु के समय प्रार्थना करने की याचना करते हैं। माता मरियम एक ही समय पिता ईश्वर की बेटी हैं, पुत्र ईश्वर की माता हैं और पवित्र आत्मा की दुल्हन हैं। उनका बेटा येसु ईश्वर हैं, इसलिए येसु की माता होने के कारण उन्हें हम ’ईश्वर की माता’ कहते हैं। लूकस 1:43 में एलिज़बेथ उन्हें “मेरे प्रभु की माता” कहती हैं। परम्परा के अनुसार प्रभु येसु के सार्वजनिक कार्यों के शुरू होने से पहले ही संत यूसुफ़ की मृत्यु हुयी थी। प्रभु येसु की मृत्यु के समय माता मरियम क्रूस के नीचे खडी थी। संत यूसुफ़ और प्रभु येसु की मृत्यु के समय उपस्थित माता मरियम से ही हम अब और हमारी मृत्यु के समय हमारे लिए प्रार्थना करने की याचना करते हैं। इस प्रकार यह प्रार्थना ईशवचन तथा मुक्ति के रहस्यों का मनन-ध्यान है।


Today the Church celebrates the Feast of Our Lady of the Rosary. Rosary is a prayer based on the meditation of the Word of God. During the rosary we repeatedly recite ‘Hail Mary’. “Hail Mary, Full of Grace, the Lord is with you” – these are words from Lk 1:28. The angel of the Lord brings the message of the Lord to Mary. It is at the instruction of the Lord that the angel greets Mary in these words. It is at the inspiration of the Lord that the angel describes her as ‘full of grace’. “Blessed are you among women and blessed is the fruit of your womb Jesus” – these are the Word of the Lord uttered by Elizabeth. The Bible says, “And Elizabeth was filled with the Holy Spirit, and exclaimed with a loud cry” (Lk 1:42). These are, therefore, words inspired by the Spirit of the Lord. In the second part of the prayer we, addressing Mary as Mother of God, beg her to pray for us now and at the hour of our death. Jesus is God and therefore Jesus’ mother is Mother of God. Our Lady is at the same time the daughter of God the Father, mother of God the Son and the spouse of the Holy Spirit. In Lk 1:43 Elizabeth calls her ‘Mother of my Lord’. Thus this prayer is completely a meditation of the inspired Word of God and of the mysteries of our salvation. Who can pray for us now at the hour of our death better than Mary who not only lived with Jesus and Joseph, her husband, but also assisted them at their death?


✍ -Br Biniush Topno




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बुधवार, 06 अक्टूबर, 2021

 

बुधवार, 06 अक्टूबर, 2021

वर्ष का सताईसवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ :योना का ग्रन्थ 4:1-11


1) योना को यह बात बहुत बुरी लगी। वह क्रुद्ध हो गया और उसने यह कह कर प्रभु से निवेदन किया,

2) ’’प्रभु! क्या मैंने यह नहीं कहा था, जब मैं अपने स्वदेश में था? इसलिए तो मैं तरशीश नगर भाग गया। मैं जानता था कि तू करुणामय तथा दयालु ईश्वर है- देर से क्रोध करने वाला, अनुग्रह का धनी और दण्ड देने को अनिच्छुक।

3) प्रभु! अब तू मुझे उठा ले। जीवित रहने की अपेक्षा मेरे लिए मर जाना कहीं अच्छा है।’’

4) प्रभु ने उत्तर दिया, ’’क्या तुम्हारा क्रोध उचित है?’’

5) योना नगर से निकल कर उसके पूर्व में बैठ गया। वहाँ उसने अपने लिए एक छप्पर छा लिया और यह देखने के लिए कि नगर का क्या होगा, वह उसकी छाया में बैठ गया।

6) तब प्रभु ने एक कुंदरू लता लगायी। वह योना के ऊपर फैल गयी और उसके सिर पर छाया कर उसे आराम देने लगी। उस लता से योना बहुत प्रसन्न हुआ।

7) दूसरे दिन, सबेरे, प्रभु ने एक कीडे को लता काटने का आदेश दिया और वह लता सूख गयी।

8) सूर्योंदय के बाद ईश्वर के आदेशानुसार झुलसाने वाली पूर्वी हवा चलने लगी। योना के सिर पर पडने वाली धूप इतनी तेज थी कि वह बेहोश होने लगा और मरने की इच्छा प्रकट करते हुए बोल उठा, ’’जीवित रहने की अपेक्षा मेरे लिए मर जाना कहीं अच्छा है।’’

9) ईश्वर ने योना से कहा, ’’क्य कुँदरू लता के कारण तुम्हारा क्रोध उचित है?’’ उसने उत्तर दिया, ‘‘मेरा क्रोध उचित है। मैं मर जाना चाहता हूँ।’’

10) तब प्रभु ने कहा, ’’तुम तो उस लता की चिन्ता करते हो। तुमने उसके लिए कोई परिश्रम नहीं किया। तुमने उसे नहीं उगाया। वह एक रात में उग गयी और एक रात में नष्ट हो गयी।

11) तो क्या मैं इस महान् नगर निनीवे की चिन्ता नहीं करूँ? उस में एक लाख बीस हज़ार से अधिक ऐसे मनुय रहते हैं, जो अपने दाहिने तथा बायें हाथ का अंतर नहीं जानते, और असंख्य जानवर भी।’’..


सुसमाचार : सन्त लूकस 11:1-4



1) एक दिन ईसा किसी स्थान पर प्रार्थना कर रहे थे। प्रार्थना समाप्त होने पर उनके एक शिष्य ने उन से कहा, ‘‘प्रभु! हमें प्रार्थना करना सिखाइए, जैसे योहन ने भी अपने शिष्यों को सिखाया’’।

2) ईसा ने उन से कहा, ’’इस प्रकार प्रार्थना किया करोः पिता! तेरा नाम पवित्र माना जाये। तेरा राज्य आये।

3) हमें प्रतिदिन हमारा दैनिक आहार दिया कर।

4) हमारे पाप क्षमा कर, क्योंकि हम भी अपने सब अपराधियों को क्षमा करते हैं और हमें परीक्षा में न डाल।’’



📚 मनन-चिंतन


प्रार्थना करने वाला व्यक्ति बहुत आकर्षक व्यक्ति बन जाता है। उसके आकर्षण का इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि हमारे पास उसके समान समझ है कि नहीं। वास्तव में प्रार्थना करने वाले व्यक्ति के चारों ओर एक आभा होती है जो लोगों को मोहित करती है।

प्रार्थना करने वाले व्यक्ति के पास न केवल एक दृश्य आभा होती है बल्कि उसका एक बहुत ही ठोस और रहस्यमय व्यक्तित्व भी होता है। येसु बहुत ही आकर्षक व्यक्तित्व थे। वे एक सुपरमैन की तरह थे। ऐसा प्रतीत होता है कि वह कुछ भी और सब कुछ कर सकते थे। उन्होंने बड़े चमत्कार किए। उनके पास हर बात का जवाब था। उनका ज्ञान गहरा था। इंसान के बारे में उनकी समझ अद्भुत है। करुणा, सत्यनिष्ठा, ऊर्जा और प्रेम जैसे उनके गुण अतुलनीय हैं। येसु के बारे में सब कुछ आकर्षक और मनोरम था। फिर भी, सुसमाचारों में, हमें ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता है जहाँ शिष्यों ने उनसे चमत्कार करने या ज्ञान सिखाने का अनुरोध किया हो। उन्होंने केवल उससे पूछा, “हे प्रभु, हमें प्रार्थना करना सिखाईये।” शिष्य शायद समझ गए थे कि येसु की सभी अद्भुत अच्छाइयों का स्रोत स्वयं ईश्वर हैं। यह पिता के साथ उनकी एकता का नतीजा है कि येसु वह सब करने में सक्षम थे जो उन्होंने किया था। प्रार्थना हमारा ईश्वर से मिलन है। जितना अधिक हम ईश्वर से एकजुट होंगे उतना ही हम दुनिया, उसकी शक्तियों, लोगों और उनको चलाने वाली वैचारिक ताकतों को समझ पाएंगे।

शिष्यों ने येसु से उन्हें प्रार्थना करना सिखाने के लिए कहा क्योंकि योहन बपतिस्मा स्वयं एक भविष्यसूचक, मजबूत व्यक्तित्व और एक प्रार्थनापूर्ण व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे। उन्होंने अपने शिष्यों को प्रार्थना करना सिखाया था। और शायद योहन के चेले अपने सार्वजनिक जीवन में प्रभावशाली थे। यह विचार एक बार फिर इंगित करता है कि योहन बपतिस्मा के बारे में सबसे आकर्षक बात उनका प्रार्थना का जीवन था।



📚 REFLECTION



A praying person becomes a very attractive person. His attraction has nothing to do with the kind of understanding we have about it in the world sense. A truly praying person has an aura around him that fascinates people. A praying person not only has a visible aura but also a very solid and mystifying personality. Jesus was a very captivating personality. He was like a superman. Seemingly he could do anything and everything. He performed great miracles. He had answers for everything. His knowledge was profound. His understanding of the human being marvelous. His virtues such as compassion, integrity, energy, and love are unmatchable. Everything about Jesus was fascinating and captivating. Yet in the gospels, we do not find an instance where disciples requested him to teach performing miracles or teaching wisdom. They merely asked him, “Lord, teach us to pray.” Disciples perhaps understood that the source of all the amazing goodness of Jesus is God himself. And it is in union with the Father that Jesus was able to do all that he did. Prayer is the union with God. The more we are united the more we would understand the world, its powers, people, and the driving philosophy behind them.

The disciples asked Jesus to teach them to pray was because john the Baptism himself a prophetic and robust personality was known to be a prayerful person. He had taught his disciples to pray. And perhaps the disciples of John were impressive in their public life. This yet again points out that the most appealing thing about John the Baptist was his prayer life.



मनन-चिंतन - 2


जब शिष्यों ने प्रभु से कहा कि हमें प्रार्थना करना सिखाइए, तब प्रभु ने उनको ’इस प्रकार प्रार्थाना करो’ कह कर ’हे पिता हमारे’ प्रार्थना सिखायी। ’हे पिता हमारे’ न केवल एक आदर्श प्रार्थना है, बल्कि प्रार्थना करने का तरीका भी है। ‘हे पिता हमारे’ एक उदार व्यक्ति की प्रार्थना है। प्रार्थना करने वाले को ईश्वर को पिता मानना चाहिए। जब हम ईश्वर को पिता मानते हैं, तब हम सारी मानवजाति को ईश्वर की संतान होने के कारण भाइ-बहन मानने लगते हैं। इसलिए हम ईश्वर को ’मेरे पिता’ नहीं, बल्कि ’हमारे पिता’ कह कर संबोधित करते हैं। दुनिया के सभी लोगों को अपने भाइ-बहन मानने के लिए हमें उदार बनना पडता है। जितना ज़्यादा हम उदार बनते हैं, उतना ज़्यादा हम प्रार्थना करने योग्य बनते हैं। कलीसिया में अस्सीसी के संत फ्रांसिस जैसे महान संत भी हैं जिन्होंने न केवल सभी मनुष्यों को, और न ही केवल सभी प्राणियों को बल्कि सभी सृष्ट वस्तुओं को भी भाइ-बहन मानते थे। संत फ्रांसिस ने सूर्य को भाई तथा चन्द्रमा को बहन कह कर संबोधित करते थे। अगर हम उदार नहीं हैं, तो हम यह प्रार्थना नहीं कर सकते हैं।




When the disciples approached Jesus and said, “Lord, teach us to pray”. He told them, “when you pray, this is what to say”. Then he proceeded to teach them ‘our Father’. ‘Our Father’, therefore is not only a model prayer, but also a method of prayer. ‘Our Father’ is a prayer of a generous person. The one who prays, according to Jesus, should consider God to be his/ her father. Evidently, it follows that all human beings are our brothers and sisters, the members of our family, the family of God. Jesus taught us to address God as ‘our Father’ not ‘my father’. To be able to consider all human beings as our brothers and sisters, we need to become generous in our outlook and approach. The more generous we become, more worthy we become to recite this prayer. Humanity has witnessed the splendid testimonies of many great saints including St. Francis of Assisi who considered not only all human beings as his brothers and sisters, not only even all the creatures, but all created things. St. Francis addressed the Sun as ‘brother sun’ and the moon as ‘sister moon. If we are not generous we are not worthy to pray to God.


✍ -Br Biniush Topno


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Praise the Lord!

मंगलवार, 05 अक्टूबर, 2021

 

मंगलवार, 05 अक्टूबर, 2021

वर्ष का सताईसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ :योना का ग्रन्थ 3:1-10


1) प्रभु के वाणी योना को दूसरी बार यह कहते हुए सुनाई पडी,

2) ’’उठो! महानगर निनीवे जा कर वहाँ के लोगों को उपदेश दो, जैसा कि मैंने तुम्हें बताया है’’।

3) इस पर योना उठ खडा हुआ और प्रभु के आज्ञानुसार निनीवे चला गया। निनीवे एक बहुत बड़ा शहर था। उसे पार करने में तीन दिन लगते थे।

4) योना ने उस में प्रवेश किया और एक दिन की यात्रा पूरी करने के बाद वह इस प्रकार उपदेश देने, लगा ’’चालीस दिन के बाद निनीवे का विनाश किया जायेगा’’।

5) निनीवे के लोगों ने ईश्वर की बात पर विश्वास किया। उन्होंने उपवास की घोषणा की और बडों से लेकर छोटों तक सबों ने टाट ओढ लिया।

6) निनीवे के राजा ने यह खबर सुनी। उसने अपना सिंहासन छोड दिया, अपने वस्त्र उतार कर टाट पहन लिया और वह राख पर बैठ गया।

7) इसके बाद उसने निनीवे में यह आदेश घोषित किया, ’’यह राजा तथा उसके सामन्तों का आदेश है: चाहे मनुय हो या पशु, गाय-बैल हो या भेड-बकरी, कोई भी न तो खायेगा, न चरेगा और न पानी पियेगा।

8) सभी व्यक्ति टाट ओढ कर पूरी शक्ति से ईश्वर की दुहाई देंगे। सभी अपना कुमार्ग तथा अपने हाथों से होने वाले हिंसात्मक कार्य छोड दें।

9) क्या जाने ईश्वर द्रवित हो जाये, उसका क्रोध शान्त हो जाये और हमारा विनाश न हो’’।

10) ईश्वर ने देखा कि वे क्या कर रहे हैं और किस प्रकार उन्होंने कुमार्ग छोड दिया है, तो वह द्रवित हो गया और उसने जिस विपत्ति की धमकी दी थी, उसे उन पर नहीं आने दिया।



सुसमाचार : सन्त लूकस 10:38-42


38) ईसा यात्रा करते-करते एक गाँव आये और मरथा नामक महिला ने अपने यहाँ उनका स्वागत किया।

39) उसके मरियम नामक एक बहन थी, जो प्रभु के चरणों में बैठ कर उनकी शिक्षा सुनती रही।

40) परन्तु मरथा सेवा-सत्कार के अनेक कार्यों में व्यस्त थी। उसने पास आ कर कहा, ’’प्रभु! क्या आप यह ठीक समझते हैं कि मेरी बहन ने सेवा-सत्कार का पूरा भार मुझ पर ही छोड़ दिया है? उस से कहिए कि वह मेरी सहायता करे।’’

41) प्रभु ने उसे उत्तर दिया, ’’मरथा! मरथा! तुम बहुत-सी बातों के विषय में चिन्तित और व्यस्त हो;

42) फिर भी एक ही बात आवश्यक है। मरियम ने सब से उत्तम भाग चुन लिया है; वह उस से नहीं लिया जायेगा।’’


📚 मनन-चिंतन


आज का सुसमाचार जीवन के दो अत्यंत महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डालता है। काम और पूजा। मार्था और मरियम दो बहनें हैं जिनका येसु के प्रति बहुत भिन्न प्रकार का दृष्टिकोण था। मार्था येसु के लिए तैयारी करने में व्यस्त थी। वह अपने घर में प्रभु को प्रसन्न करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही थी। हालाँकि, मरियम अपनी बहन के साथ घर के कामों में शामिल नहीं थी। बल्कि उसने येसु के चरणों में बैठना और उनकी बातें सुनना चुना। मार्था येसु को उसकी कठिनाइयों की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए बुलाती है लेकिन हमें मरियम से कुछ भी नहीं सुनाई देता है। हम अच्छी तरह से यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जब आप प्रभु के निकट होते हैं तो आपको और कुछ नहीं चाहिए होता है। यद्यपि हमारे पास कार्य की कमी हो सकती है, परमेश्वर की उपस्थिति जीवन में हमें जो कुछ भी चाहिए, उसका आश्वासन है। व्यस्त जीवन अच्छा है और काम बहुत जरूरी है लेकिन ईश्वर की कीमत पर नहीं। ईश्वर हमारे जीवन की सर्वोच्च और सर्वोच्च प्राथमिकता बनी रहती है।

मार्था की तरह, हम भले ही अद्भुत और न्यायोचित कार्य कर रहे हों, लेकिन अगर यह हमें प्रभु से दूर रख रहा है, तो निश्चित ही जीवन में कुछ असुविधा और शून्यता पैदा होगी। इसलिए जब ईश्वर निकट हो, तो हम उनके साथ रहें। मरियम एक आलसी महिला नहीं थी कि वह काम टालने करने की कोशिश कर रही थी, बल्कि उस समय जब येसु ने घर में प्रवेश किया तो उसने काम करना बंद कर दिया और अपना समय उन्हें समर्पित कर दिया।




📚 REFLECTION



Today’s Gospel throws light on the two very important aspects of life. work and worship. Martha and Mary are two sisters who had a very different types of approaches towards Jesus. Martha was busy in making preparation for Jesus. She was leaving no room in making the Lord comfortable in her house. However, Mary was not involved in the household work with her sister. She rather chose to sit at the feet of Jesus and listen to him. Martha calls out Jesus to draw his attention towards her difficulties but we hear nothing from Mary. We may well conclude that when you are near the Lord there is nothing more you need. Although we may be lacking in action the presence of God is the assurance of everything we need in life. a busy life is good and work is very essential but not at the cost of God. God remains the supreme and the topmost priority of our life.

Like Martha, we may be doing wonderful and justifiable work but if it is keeping us away from the Lord then there is bound to arise some discomfiture and void. Therefore, when the Lord is near let us be with him. Mary was not a lazy woman that she was trying void work but rather at that moment when Jesus entered the house she stopped working and devoted her time to him..



मनन-चिंतन - 2



बेथानिया की मरियम के बारे में प्रभु येसु कहते हैं, “मरियम ने सब से उत्तम भाग चुन लिया है” (लूकस 10:42)। मरियम ने कौन-सा भाग चुन लिया था? पवित्र वचन कहता है कि मरियम “प्रभु के चरणों में बैठ कर उनकी शिक्षा सुनती रही” (लूकस 10:39)। यह एकमात्र वह बात है जो ज़रूरी है। प्रभु के चरणों में बैठ कर उनका वचन सुनना सब से उत्तम भाग है। प्रभु कहते हैं कि मरथा बहुत-सी बातों के बारे में चिन्तित और व्यस्थ थी। क्या हमारे बारे में भी यह सच नहीं है? क्या हम भी बहुत-सी बातों के बारे में चिन्तित और व्यस्थ नहीं हैं? प्रभु कहते हैं, “तुम सब से पहले ईश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज में लगे रहो और ये सब चीजें, तुम्हें यों ही मिल जायेंगी” (मत्ति 6:33)। लूकस 10:23-24 में हम पढ़ते हैं, “प्रभु ने अपने शिष्यों की ओर मुड़ कर एकान्त में उन से कहा, "धन्य हैं वे आँखें, जो वह देखती हैं जिसे तुम देख रहे हो! क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ - तुम जो बातें देख रहे हो, उन्हें कितने ही नबी और राजा देखना चाहते थे, परन्तु उन्होंने उन्हें नहीं देखा और जो बातें तुम सुन रहे हो, वे उन्हें सुनना चाहते थे, परन्तु उन्होंने उन्हें नहीं सुना।" मरियम का यह सौभाग्य था कि वह प्रभु ईश्वर के मुँह से उनकी वाणी सुन सकी। मरथा ने उस अवसर को गँवा दिया।




About Mary of Bethany Jesus says, “Mary has chosen the better part” (Lk 10:42). What did Mary choose? The Bible says, “Mary … sat at the Lord’s feet and listened to what he was saying” (Mt 10:39). Sitting at the Lord’s feet listening to the Word of God is the better part, the only thing that is necessary. About Martha Jesus says that she was worried and troubled about many things. Is this not true about us too? The Lord says, “strive first for the kingdom of God and his righteousness, and all these things will be given to you as well” (Mt 6:33). Once Jesus said to his disciples, “Blessed are the eyes that see what you see! 24 For I tell you that many prophets and kings desired to see what you see, but did not see it, and to hear what you hear, but did not hear it.” (Lk 10:23-24). Mary was fortunate to listen to Word of God from God’s own mouth. Martha wasted that opportunity.


✍ -Br. Biniush Topno


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