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गुरुवार, 26 अगस्त, 2021

 

गुरुवार, 26 अगस्त, 2021

वर्ष का इक्कीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : 1 थेसलनीकियों 3:7-13


7) भाइयो! हमें अपने सब कष्टों और संकटों में आप लोगों के विश्वास से सान्त्वना मिली है।

8) यह जान कर हम में अब नये जीवन का संचार हुआ है कि आप प्रभु में दृढ़ बने हुए हैं।

9) आपने हमें प्रभु के सामने कितना आनन्द प्रदान किया है! हम आप लोगों के विषय में ईश्वर को पर्याप्त धन्यवाद कैसे दे सकते हैं?

10) हम दिन-रात आग्रह के साथ ईश्वर से यह प्रार्थना करते रहते हैं कि हम आप को दुबारा देख सकें और आपके विश्वास में जो कमी रह गयी है, उसे पूरा कर सकें।

11) हमारा पिता ईश्वर और हमारे प्रभु ईसा हमारे लिए आपके पास पहुँचने का मार्ग सुगम बनायें।

12) प्रभु ऐसा करें कि जिस तरह हम आप लोगों को प्यार करते हैं, उसी तरह आपका प्रेम एक दूसरे के प्रति और सबों के प्रति बढ़ता और उमड़ता रहे।

13) इस प्रकार वह उस दिन तक अपने हृदयों को हमारे पिता ईश्वर के सामने पवित्र और निर्दोष बनायें रखें, जब हमारे प्रभु ईसा अपने सब सन्तों के साथ आयेंगे।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 24:42-51


42) "इसलिए जागते रहो, क्योंकि तुम नहीं जानते कि तुम्हारे प्रभु किस दिन आयेंगे।

43) यह अच्छी तरह समझ लो- यदि घर के स्वामी को मालूम होता कि चोर रात के किस पहर आयेगा, तो वह जागता रहता और अपने घर में सेंध लगने नहीं देता।

44) इसलिए तुम लोग भी तैयार रहो, क्योंकि जिस घड़ी तुम उसके आने की नहीं सोचते, उसी घड़ी मानव पुत्र आयेगा।

45) "कौन ऐसा ईमानदार और बुद्धिमान् सेवक है, जिसे उसके स्वामी ने अपने नौकर-चाकरों पर नियुक्त किया है, ताकि वह समय पर उन्हें रसद बाँटा करे?

46) धन्य है वह सेवक, जिसका स्वामी आने पर उसे ऐसा करता हुआ पायेगा!

47) मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ - वह उसे अपनी सारी सम्पत्ति पर नियुक्त करेगा।

48) "परन्तु यदि वह बेईमान सेवक अपने मन में कहे, मेरा स्वामी आने में देर करता है,

49) और वह दूसरे नौकरों को पीटने और शराबियों के साथ खाने-पीने लगे,

50) तो उस सेवक का स्वामी ऐसे दिन आयेगा, जब वह उसकी प्रतिक्षा नहीं कर रहा होगा और ऐसी घड़ी, जिसे वह नहीं जान पायेगा।

51) तब वह स्वामी उसे कोड़े लगवायेगा और ढोंगियों का दण्ड देगा। वहाँ वे लोग रोयेंगे और दाँत पीसते रहेंगे।



📚 मनन-चिंतन


आज के सुसमाचार के दृष्टान्त में हम पाते हैं कि येसु किसी के घर में सेंधमारी करने वाले चोर की छवि का उपयोग कर रहे हैं। येसु चोर की चाल की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं। चोर के आने का पता करने के लिए गृहस्थ के पास एक ही उपाय है कि वह रात भर जागता रहे। सारी रात जागते रहने वाला गृहस्थ येसु के दृष्टांत में उन शिष्यों की छवि बन जाता है जो प्रभु के द्वितीय आगमन के लिए सजग व तैयार रहेंगे।

प्रभु हमारे बारे में निरंतर सजग रहते हैं। उनकी निगाहें सदा हमारे ऊपर बनी रहती है। "मैंने तुम्हें अपनी हथेलियों पर अंकित किया है, तुम्हारी चारदीवारी निरन्तर मेरी आँखों के सामने है।" (इसायाह 49:16) इसके जवाब में हम भी ईश्वर को लेकर हमेशा सजग रहने के लिए बुलाये गए हैं। हमें हर समय प्रभु के प्रति जागरूक रहना कठिन लगता है, क्योंकि बहुत सी अन्य चीजें हमारे मन और हृदय को भर देती हैं। फिर भी, प्रभु हमसे यही चाहते हैं। हमें उनकी निरंतर उपस्थिति के एहसास में जीना है, उनकी उपस्थिति की जागरूकता में रहना है। इसे ही चिन्तनशील दृष्टिकोण कहा जा सकता है। इस दृष्टिकोण में हम हमारे सारे कार्यों, बातों और विचारों में ईश्वर के मापदंड से तौलकर ही कोई कदम उठाते हैं। हमसे ऐसी एक सजगता की उम्मीद की जाती है।



📚 REFLECTION




In today's gospel parable we find that Jesus is using the image of a thief breaking into someone's house. Jesus draws our attention to the trick of the thief. The only way for the householder to find out about the thief's arrival is to stay awake throughout the night. The householder who stays awake all night becomes the image of those disciples in Jesus' parable who will be alert and ready for the second coming of the Lord.

The Lord is constantly aware of us; His eyes are always on us. "See, I have inscribed you on the palms of my hands; your walls are continually before me." (Isaiah 49:16) In response to this, we too are called to be ever vigilant about God. We find it difficult to be aware of the Lord all the time, because so many other things fill our mind and heart. Yet, this is what the Lord wants of us. We have to live in the feeling of His constant presence, to live in the awareness of His presence. This can be called a reflective approach. In this, we take any step by weighing all our actions, things and thoughts according to the criteria of God. We are expected to have such an alertness.


 -Br Biniush Topno


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बुधवार, 25 अगस्त, 2021

बुधवार, 25 अगस्त, 2021

वर्ष का इक्कीसवाँ सामान्य सप्ताह




पहला पाठ : 1 थेसलनीकियों 2:9-13


9) भाइयो! आप को हमारा कठोर परिश्रम याद होगा। आपके बीच सुसमाचार का प्रचार करते समय हम दिन-रात काम करते रहे, जिससे किसी पर भार न डालें।

10) आप, और ईश्वर भी, इस बात के साक्षी हैं कि आप विश्वासियों के साथ हमारा आचरण कितना पवित्र, धार्मिक और निर्दोष था।

11) आप जानते हैं कि हम पिता की तरह आप में प्रत्येक को

12) उपदेश और सान्त्वना देते और अनुरोध करते थे कि आप उस ईश्वर के योग्य जीवन बितायें, जो आप को अपने राज्य की महिमा के लिए बुलाता है।

13) हम इसलिए निरन्तर ईश्वर को धन्यवाद देते हैं कि जब आपने इस से ईश्वर का सन्देश सुना और ग्रहण किया, तो आपने उसे मनुष्यों का वचन नहीं; बल्कि -जैसा कि वह वास्तव में है- ईश्वर का वचन समझकर स्वीकार किया और यह वचन अब आप विश्वासियों में क्रियाशील है।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 23:27-32




27) ’’ढोंगी शास्त्रियों ओर फ़रीसियों! धिक्कार तुम लोगों को! तुम पुती हुई कब्रों के सदृश हो, जो बाहर से तो सुन्दर दीख पड़ती हैं, किन्तु भीतर से मुरदों की हड्डियों और हर तरह की गन्दगी से भरी हुई हैं।

28) इसी तरह तुम भी बाहर से लागों को धार्मिक दीख पड़ते हो, किन्तु भीतर से तुम पाखण्ड और अधर्म से भरे हुए हो।

29) ’’ढोंगी शास्त्रियों और फ़रीसियों! धिक्कार तुम लोगों को! तुम नबियों के मकबरे बनवा कर और धर्मात्माओं के स्मारक सँवार कर

30) कहते हो, ’’यदि हम अपने पुरखों के समय जीवित होते, तो हम नबियों की हत्या करने में उनका साथ नहीं देते’।

31) इस तरह तुम लोग अपने विरुद्ध यह गवाही देते हो कि तुम नबियों के हत्यारों की संतान हो।

32) तो, अपने पुरखों की कसर पूरी कर लो।



📚 मनन-चिंतन



खुद की निजी छवि और बाहरी दिखावट इस समय हमारी संस्कृति में महत्वपूर्ण मूल्य माने जाते हैं। यहाँ अच्छा दिखने पर जोर दिया जाता है, और लोग अच्छा दिखने के लिए बहुत कुछ करते हैं। अच्छा दिखने के लिए संसाधनों का आज पूरा बाजार भरा पड़ा है। सुसमाचार में, येसु बाहर के बजाय जो भीतर है उसके महत्व पर प्रकाश डालते हैं। लोग अंदर से कैसे हैं ये उनके बाहरी प्रकटीकरण से ज़्यादा मायने रखता है।

क्रूस पर से लटकते हुए यीशु सबसे अनाकर्षक व विरूपित रूप में प्रकट हुए। फिर भी, यही वह क्षण था जब उनके भीतर मानव जाती के लिए जो प्रेम था वह अपने चरम पर था। गरीब विधवा जिसने मंदिर के खजाने में तांबे के दो सिक्के डाले थे, वह संसार की निगाहों में एक तुच्छ व्यक्ति लग रही थी जो एक तुच्छ राशि का योगदान कर रही थी। तौभी यीशु ने इस स्त्री के भीतर के उदार हृदय, को असाधारण रूप से देखा, और उसने अपने शिष्यों को बुलाया और इस सचाई को उनको बताया की बहार से उस विधवा ने न के बराबर दान दिया है परन्तु भीतर से उसने अपना सब कुछ दान कर दिया है।

आज का सुसमाचार हमें अपने दिखावे के बजाये हमारे हृदय में प्रेम की गुणवत्ता पर अधिक काम करने के लिए प्रोत्साहित करता है।



📚 REFLECTION




Image and appearance are important values in our culture at the moment. There is an emphasis on looking well, and people can go to great lengths to look well. In the gospel reading, Jesus highlights the importance of what is within rather than what is without. How people are within themselves rather than how they appear to others is what matters. Jesus himself appeared at his most unattractive as he hung dying from the cross. Yet, that was the moment when the love that was within him was at its most intense.

The poor widow who put two copper coins into the Temple treasury looked an insignificant figure contributing an insignificant amount of money. Yet Jesus saw through the unexceptional appearance of this woman to the generous heart within, a heart like his own, and he called over his disciples so that they could learn from her. Appearances can be deceptive. In the case of the scribes and Pharisees in today’s gospel reading there was less there than met the eye. In the case of the widow and Christ crucified there was more than met the eye. The gospel reading this morning encourages us not to work so much on our appearances as on what is within, the quality of the love in our heart.



 -Br Biniush Topno


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मंगलवार, 24 अगस्त, 2021 प्रेरित सन्त बर्थोलोमी

 

मंगलवार, 24 अगस्त, 2021

प्रेरित सन्त बर्थोलोमी




पहला पाठ : प्रकाशना ग्रन्थ 21:9b-14



9) "आइए, मैं आप को दुल्हन, मेमने की पत्नी के दर्शन कराऊँगा।’’

10) मैं आत्मा से आविष्ट हो गया और स्वर्गदूत ने मुझे एक विशाल तथा ऊँचे पर्वत पर ले जा कर पवित्र नगर येरुसालेम दिखाया। वह ईश्वर के यहाँ से आकाश में उतर रहा था।

11) वह ईश्वर की महिमा से विभूषित था और बहुमूल्य रत्न तथा उज्ज्वल सूर्यकान्त की तरह चमकता था।

12) उसके चारों ओर एक बड़ी और उँची दीवार थी, जिस में बारह फाटक थे और हर एक फाटक के सामने एक स्वर्गदूत खड़ा था। फाटकों पर इस्राएल के बारह वंशों के नाम अंकित थे।

13) पूर्व की आरे तीन, उत्तर की और तीन, पश्चिम की आरे तीन और दक्षिण की ओर तीन फाटक थे।

14) नगर की दीवार नींव के बारह पत्थरों पर खड़ी थी और उन पर मेमने के बारह प्रेरितों के नाम अंकित थे।



सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 1:45-51




45) फिलिप नथानाएल से मिला और बोला, ‘‘मूसा ने संहिता में और नबियों ने जिनके विषय में लिखा है, वही हमें मिल गये हैं। वह नाज़रेत-निवासी, यूसुफ के पुत्र ईसा हैं।’’

46) नथानाएल ने उत्तर दिया, ‘‘क्या नाज़रेत से भी कोई अच्छी चीज़ आ सकती है?’’ फिलिप ने कहा, ‘‘आओ और स्वयं देख लो’’।

47) ईसा ने नथानाएल को अपने पास आते देखा और उसके विषय में कहा, ‘‘देखो, यह एक सच्चा इस्राएली है। इस में कोई कपट नहीं।’’

48) नथानाएल ने उन से कहा, ‘‘आप मुझे कैसे जानते हैं?’’ ईसा ने उत्तर दिया, ‘‘फिलिप द्वारा तुम्हारे बुलाये जाने से पहले ही मैंने तुम को अंजीर के पेड़ के नीचे देखा’’।

49) नथानाएल ने उन से कहा, ‘‘गुरुवर! आप ईश्वर के पुत्र हैं, आप इस्राएल के राजा हैं’’।

50) ईसा ने उत्तर दिया, ‘‘मैंने तुम से कहा, मैंने तुम्हें अंजीर के पेड़ के नीचे देखा, इसीलिए तुम विश्वास करते हो। तुम इस से भी महान् चमत्कार देखोगे।’’

51) ईसा ने उस से यह भी कहा, ‘‘मैं तुम से यह कहता हूँ- तुम स्वर्ग को खुला हुआ और ईश्वर के दूतों को मानव पुत्र के ऊपर उतरते-चढ़ते हुए देखोगे’’।



📚 मनन-चिंतन



बार्थोलोम्यू की पहचान पारंपरिक रूप से ननाथानिएल से की गई है जिनका आज हम पर्व मना रहे हैं , वे बारह प्रेरितों में से एक हैं। येसु आज के सुसमाचार में उसकी तारीफ करते हुए कहते हैं - यह एक सच्चा इसरायली है इसमें कोई कपट नहीं है। नासरत के बारे में उनकी नकारात्मक राय कि 'क्या नासरत से कुछ अच्छा आ सकता है?', कम से कम, एक ईमानदार राय थी; यह वही मत था जो वह वास्तव में वह मानता था। नतनएल ने येसु से मिलकर यह स्वीकार किया कि नासरत के बारे में उसकी राय गलत थी। उसने देखा कि नासरत का येसु कोई और नहीं बल्कि खुद ईश्वर का पुत्र और इस्राएल का राजा है।

किसी व्यक्ति या स्थान के बारे में हमारी राय वास्तविकता के बजाय हमारे पूर्वाग्रहों से बनी है, यह पहचानने के लिए दिल और आत्मा की उदारता की आवश्यकता होती है। नतनएल की ईमानदारी और हृदय की उदारता उनके इस पर्व के दिन हमें प्रेरणा देती है। आज के सुसमाचार के अंत में येसु ने उससे एक बड़ा वादा किया - 'तुम इससे भी बड़ी चीजें देखोगे ... तुम स्वर्ग को खुला हुआ और मनुष्य के पुत्र के पर, ईश्वर के स्वर्गदूतों को ऊपर चढ़ते उतरते हुए देखोगे'। हम हमारी प्रार्थनाओं और अपनी आध्यात्मिक गतिविधियों में येसु के करीबीपन का एहसास कर सकते हैं। लेकिन यीशु हमें आश्वासन देते है कि देखने और अनुभव करने के लिए और भी बहुत कुछ है। हम जितने हमारी आध्यात्मिकता में गहरे होते जायेंगे येसु उतने ही अधिक हमें अपने दिव्य व स्वर्गिक अनुभव प्रदान करेंगे।



📚 REFLECTION




Bartholomew has been traditionally identified with Nathanael who features in our gospel reading this morning. Jesus pays him a lovely compliment, ‘Here is an Israelite, incapable of deceit’ or ‘in whom there is no deceit’. Jesus admired his openness and honesty. Even his dusty opinion about Nazareth, ‘Can anything good come out of Nazareth?’ was, at least, an honest opinion; it was what he believed. Nathanael went on to recognize that his honest opinion about Nazareth was a mistaken one. He came to see that Jesus from Nazareth was none other than the Son of God and the King of Israel.

It takes a generosity of heart and spirit to recognize when we have got it wrong, to recognize that our opinion of some person or place has been shaped by our prejudices rather than by reality. Nathanael’s honesty and generosity of heart can be an inspired to us on this his feast day. The final word of the gospel reading, however, is given to Jesus, not to Nathanael. It takes the form of that wonderful promise Jesus makes to him, ‘You will see greater things… You will see heaven laid open and, above the Son of Man, the angels of God ascending and descending’. We may have a certain insight into Jesus, a certain appreciation of him, like Nathanael, but Jesus assures us that there is so much more to see and appreciate. In our relationship with Jesus, we are always only towards the beginning of our journey. There are always ‘greater things’ to see.



 -Br Biniush Topno


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सोमवार, 23 अगस्त, 2021 वर्ष का इक्कीसवाँ सामान्य सप्ताह

 

सोमवार, 23 अगस्त, 2021

वर्ष का इक्कीसवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ : 1 थेसलनीकियों 1:1-5, 8b-10


1) पिता-परमेश्वर और प्रभु ईसा मसीह पर आधारित थेसलनीकियों की कलीसिया के नाम पौलुस, सिल्वानुस और तिमथी का पत्र। आप लोगों को अनुग्रह तथा शान्ति!

2 (2-3) जब-जब हम आप लोगों को अपनी प्रार्थनाओं में याद करते हैं, तो हम हमेशा आप सब के कारण ईश्वर को धन्यवाद देते है। आपका सक्रिय विश्वास, प्रेम से प्रेरित आपका परिश्रम तथा हमारे प्रभु ईसा मसीह पर आपका अटल भरोसा- यह सब हम अपने ईश्वर और पिता के सामने निरन्तर स्मरण करते हैं।

4) भाइयो! ईश्वर आप को प्यार करता है। हम जानते हैं कि ईश्वर ने आप को चुना है,

5) क्योंकि हमने निरे शब्दों द्वारा नहीं, बल्कि सामर्थ्य, पवित्र आत्मा तथा दृढ़ विश्वास के साथ आप लोगों के बीच सुसमाचार का प्रचार किया। आप लोग जानते हैं कि आपके कल्याण के लिए हमारा आचरण आपके यहाँ कैसा था।

8) हमें कुछ नहीं कहना है।

9) लोग स्वयं हमें बताते है। कि आपके यहाँ हमारा कैसा स्वागत हुआ और आप किस प्रकार देवमूर्तियाँ छोड़ कर ईश्वर की ओर अभिमुख हुए,

10) जिससे आप सच्चे तथा जीवन्त ईश्वर के सेवक बनें और उसके पुत्र ईसा की प्रतीक्षा करें, जिन्हें ईश्वर ने मृतकों में से जिलाया। यही ईसा स्वर्ग से उतरेंगे और हमें आने वाले प्रकोप से बचायेंगे।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 23:13-22



13) ’’ढोंगी शास्त्रियों और फरीसियों! धिक्कार तुम लोगों को! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग का राज्य बन्द कर देते हो।

14) तुम स्वय प्रवेश नहीं करते और जो प्रवेश करना चाहते हैं, उन्हें रोक देते हो।

15) ’’ढोंगी शास्त्रियों और फरीसियों! धिक्कार तुम लोगों को! एक चेला बनाने के लिए तुम जल और थल लाँघ जाते हो और जब वह चेला बन जाता है, तो उसे अपने से दुगुना नारकी बना देते हो।

16) ’’अन्धे नेताओं! धिक्कार तुम लोगों को! तुम कहते हो- यदि कोई मन्दिर की शपथ खाता है, तो इसका कोई महत्व नही; परन्तु यदि कोई मन्दिर के सोने की शपथ खाता है, तो वह बँध जाता है।

17) मूर्खों और अन्धों! कौन बडा है- सोना अथवा मन्दिर, जिस से वह सोना पवित्र हो जाता है?

18) तुम यह भी कहते हो- यदि कोई वेदी की शपथ खाता है, तो इसका कोई महत्व नही; परन्तु यदि कोई वेदी पर रखे हुए दान की शपथ खाता है, तो वह बँध जाता है?

19) अन्धा ! कौन बडा है- दान अथवा वेदी, जिस से वह दान पवित्र हो जाता है?

20) इसलिय जो वेदी की शपथ खाता है, वह उसकी और उस पर रखी हुई चीजों की शपथ खाता है।

21) जो मन्दिर की शपथ खता है, वह उसकी और उस में निवास करने वाले की शपथ खाता है।

22) और जो स्वर्ग की शपथ खाता है, वह ईश्वर के सिंहासन और उस पर बैठने वाले की शपत खाता है।


📚 मनन-चिंतन


आज के सुसमाचार में यीशु ने फरीसियों की निंदा की क्योंकि उन्होंने लोगों के के लिए स्वर्ग राज्य को बंद कर दिया दूसरे शब्दों में, वे लोगों को स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने से रोकते थे, सुसमाचार से हमें पता चलता है कि येसु उन लोगों की आलोचना कर रहे थे जो उन पर विश्वास करने वाले लोगों के लिए एक बाधा थे। जब माता पिता अपने बच्चों को येसु के पास उनकी आशीष पाने के लिए ला रहे थे और शिष्यों ने उन्हें रोकना चाहा तो येसु ने उन्हें भी टोका था। लोगों के लिए स्वर्ग के राज्य को बंद करने के बजाय, येसु चाहते कि हम स्वर्ग के राज्य को एक दूसरे के लिए खोल दें. हमें एक दूसरे को प्रभु के पास लाना है, प्रभु को एक दूसरे के सामने प्रकट करना है,और ऐसा करते हुए, स्वर्ग के राज्य की ओर अपनी यात्रा में एक दूसरे का समर्थन व सहयोग करना है।

सुसमाचार में ऐसे बहुत से लोग हैं जो दूसरों को येसु के पास लाए और वे आज हमारे लिए एक प्रेरणा के स्रोत हैं।योहन बपतिस्ता के जीवन को ही ले ले लीजिये उनके तो जीवन का मकसद ही लोगों को येसु के पास ले जाना व स्वर्ग राज्य के द्वार दूसरों के लिए खोलना था। हमारी इस जीवन यात्रा में हमें अकेले ही उस पार नहीं जाना है। हमारे बपतिस्मा की बुलाहट यह है कि हम हमारे साथ अनेकों को स्वर्ग राज्य में जाने में मदद करें।



📚 REFLECTION



In today's gospel reading Jesus condemns the Pharisees because they shut up the kingdom of heaven in people's faces. In other words, they hinder people from entering the kingdom of heaven, possibly by trying to keep people from following Jesus who came to proclaim the nearness of the kingdom of heaven. The gospels suggest that Jesus was critical of those who were an obstacle to people coming to believe in him. He was critical of his own disciples for trying to prevent children drawing near to him, in spite of the wishes of the children's parents for Jesus to bless their children. Rather than shutting up the kingdom of heaven in people's faces, Jesus wants us to open up the kingdom of heaven to each other. We are to bring each other to the Lord, to reveal the Lord to each other, and, in so doing, to support one another on our journey towards the kingdom of heaven.

There are many people in the gospels who brought others to Jesus and who can be an inspiration to us. We only have to think of John the Baptist, whose life mission was to lead people to Jesus, to open up the kingdom of heaven to others. We need the support of each other's faith, each other's witness, as we journey on our pilgrim way through life.


 -Br Biniush Topno


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इतवार, 22 अगस्त, 2021 वर्ष का इक्कीसवाँ सामान्य इतवार

 

इतवार, 22 अगस्त, 2021

वर्ष का इक्कीसवाँ सामान्य इतवार

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पहला पाठ : योशुआ का ग्रन्थ 24:1-2a,15-17,18b


1) योशुआ ने सिखेम में सब इस्राएली वंशों को इकट्टा कर लिया। इसके बाद उसने इस्राएल के वयोवृद्ध नेताओ, न्यायकर्ताओं और शास्त्रियों को बुला भेजा और वे सब ईश्वर के सामने उपस्थित हो गये।

2) तब योशुआ ने समस्त लोगों से कहा, इस्राएल का प्रभु ईश्वर यह कहता है प्राचीन काल में तुम लोगों के पूर्वज, इब्राहीम और नाहोर का पिता तेरह, फरात नदी के उस पार निवास करते थे।

15) यदि तुम ईश्वर की उपासना नहीं करना चाहते, तो आज ही यह कर लो कि तुम किसकी उपासना करना चाहते हो- उन देवताओं की, जिनकी उपासना तुम्हारे पूर्वज नदी के उस पार करते थे अथवा अमोरियों के देवताओं की, जिनके देश में तुम रहते हो। मैं और मेरा परिवार, हम सब प्रभु की उपासना करना चाहते हैं।

16) लोगों ने उत्तर दिया, ’’प्रभु के छोड़ कर अन्य देवताओं की उपासना करने का विचार हम से कोसों दूर है।

17) हमारे प्रभु-ईश्वर ने हमें और हमारे पूर्वजों को दासता के घर से, मिस्र देश से निकाल लिया है। उसी ने हमारे सामने महान् चमत्कार दिखाये हैं। हम बहुत लम्बा रास्ता तय कर चुके हैं, बहुत से राष्ट्रों से हो कर यहाँ तक आये हैं और सर्वत्र उसी ने हमारी रक्षा की है।

18) हम भी प्रभु की उपासना करना चाहते हैं, क्योंकि वही हमारा ईश्वर है।



दूसरा पाठ: एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 5:21-32



21) हम मसीह के प्रति श्रद्धा रखने के कारण एक दूसरे के अधीन रहें।

22) पत्नी प्रभु जैसे अपने पति के अधनी रहे।

23) पति उसी तरह पत्नी का शीर्ष है, जिस तरह मसीह कलीसिया के शीर्ष हैं और उसके शरीर के मुक्तिदाता।

24) जिस तरह कलीसिया मसीह के अधीन रहती है, उसी तरह पत्नी को भी सब बातों में अपने पति के अधीन रहना चाहिए।

25) पतियो! अपनी पत्नी को उसी तरह प्यार करो, जिस तरह मसीह ने कलीसिया को प्यार किया। उन्होंने उसके लिए अपने को अर्पित किया,

26) जिससे वह उसे पवित्र कर सकें और वचन तथा जल के स्नान द्वारा शुद्ध कर सकें;

27) क्योंकि वह एक ऐसी कलीसिया अपने सामने उपस्थित करना चाहते थे, जो महिमामय हो, जिस में न दाग हो, न झुर्री और न कोई दूसरा दोष, जो पवित्र और निष्कलंक हो।

28) पति अपनी पत्नी को इस तरह प्यार करे, मानो वह उसका अपना शरीर हो।

29) कोई अपने शरीर से बैर नहीं करता। उल्टे, वह उसका पालन-पोषण करता और उसकी देख-भाल करता रहता है। मसीह कलीसिया के साथ ऐसा करते हैं,

30) क्योंकि हम उनके शरीर के अंग हैं।

31) धर्मग्रन्थ में लिखा है- पुरुष अपने माता-पिता को छोड़ेगा और अपनी पत्नी के साथ रहेगा और वे दोनों एक शरीर हो जायेंगे।

32) यह एक महान रहस्य है। मैं समझता हूँ कि यह मसीह और कलीसिया के सम्बन्ध की ओर संकेत करता है।



सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 6:60-69



60) उनके बहुत-से शिष्यों ने सुना और कहा, ‘‘यह तो कठोर शिक्षा है। इसे कौन मान सकता है?’’

61) यह जान कर कि मेरे शिष्य इस पर भुनभुना रहे हैं, ईसा ने उन से कहा, ‘‘क्या तुम इसी से विचलित हो रहे हो?

62) जब तुम मानव पूत्र को वहाँ आरोहण करते देखोगे, जहाँ वह पहले था, तो क्या कहोगे?

63) आत्मा ही जीवन प्रदान करता है, मांस से कुछ लाभ नहीं होता। मैंने तुम्हे जो शिक्षा दी है, वह आत्मा और जीवन है।

64) फिर भी तुम लोगों में से अनेक विश्वास नहीं करते।’’ ईसा तो प्रारम्भ से ही यह जानते थे कि कौन विश्वास नहीं करते और कौन मेरे साथ विश्वासघात करेगा।

65) उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए मैंने तुम लोगों से यह कहा कि कोई मेरे पास तब तक नहीं आ सकता, जब तक उसे पिता से यह बरदान न मिला हो’’।

66) इसके बाद बहुत-से शिष्य अलग हो गये और उन्होंने उनका साथ छोड़ दिया।

67) इसलिए ईसा ने बारहों से कहा, ‘‘कया तुम लोग भी चले जाना चाहते हो?’’

68) सिमोन पेत्रुस ने उन्हें उत्तर दिया, ‘‘प्रभु! हम किसके पास जायें! आपके ही शब्दों में अनन्त जीवन का सन्देश है।

69) हम विश्वास करते और जानते हैं कि आप ईश्वर के भेजे हुए परमपावन पुरुष हैं।’’



📚 मनन-चिंतन



प्रभु येसु अपने अनुयायों को एक बहुत ही महत्वपूर्ण शिक्षा देते हैं। वे लोगों के सामने खुद के जीवन व मकसद को लोगों के सामने उजागर कर देते हैं। वो यह है की वे इस संसार में स्वर्ग से उतरी हुई वह रोटी है जो मनुष्यों को अनंत जीवन देती है। अनंत जीवन में प्रवेश करने के लिए येसु के शरीर और रक्त का पान करना आवश्यक है। अपने इस शरीर और रक्त को कलवारी पर सबों के लिए अर्पित कर येसु ने संसार को जीवन दिया। यही उनके इस दुनिया में आने का उद्देश्य था।

येसु की इस महान घोषणा व महान रहस्य के प्रकटीकरण के बाद उम्मीद की जा रही थी होगी की लोग और भी अधिक संख्या में उनके पास आएंगे। क्योंकि उन्होंने अनंत जीवन का सन्देश सुनाया था। पर लोगों की प्रतिक्रिया इसके बिलकुल विपरीत थी। वे एक-एक करके वहां से जाने लगे। तब येसु ने जो सवाल पूछा वो बहुत ही मार्मिक है। ऐसा लगता है कि येसु बहुत अधिक निराश व हतोत्साहित हो गए थे। कितनी उम्मीद व उत्साह से भरकर उन्होंने लोगों को अनंत जीवन का सन्देश दिया पर लोग सिर्फ भौतिक भूख मिटाकर ही संतुष्ट थे। ऐसे में पेत्रुस का जवाब येसु को बहुत सुकून देता है। "हम कहाँ जाएँ, आपके ही शब्दों में अनंत जीवन का सन्देश है। "

हो सकता है पेत्रुस ने येसु से जो कहा उसका वे पूरा अर्थ नहीं समझ रहे होंगे लेकिन उन्हें इतना ज़रूर पता था कि इस जीवन में सबसे आवश्यक है अनंत जीवन का सन्देश: ईश्वर का वचन और वो सिर्फ येसु के पास ही है। मनुष्य सिर्फ रोटी से ही नहीं जीता वह ईश्वर के मुख से निकलने वाले हर एक शब्द से जीता है। पेत्रुस ने इस बात को समझ लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाये पर, 'अनन्त जीवन के वचन तो सिर्फ येसु के पास ही हैं और जीवन में अगर यह मिल गया तो फिर और किसी चीज़ की कमी न सताएगी।




📚 REFLECTION




Lord Jesus gives a very important teaching to his followers. He exposes his life and purpose to the people that He is the Bread that came down from heaven in this world that gives eternal life to humans. It is necessary to be nourished by His Body and Blood in order to enter into eternal life. Jesus gave life to the world by offering his body and blood for all on Calvary. This was the purpose of his coming into this world.

After this great announcement of Jesus and the revelation of the great secret, it was expected that people would come to him in greater numbers. For he preached the message of eternal life. But the reaction of the people was quite the opposite. They started leaving from there one by one. Then the question that Jesus asked is very touching. It seems that Jesus had become very discouraged disappointed. Filled with so much hope and enthusiasm, he gave the message of eternal life to the people, but people were satisfied only with material food. In such a situation, the answer of Peter gives great comfort to Jesus. "Where we go, in your own words is the message of eternal life." Peter may not have understood the full meaning of what he said to Jesus, but he did know that what is most important in this life is the message of eternal life: the word of God and that is only found in Jesus. Man does not live by bread alone; he lives by every word that comes the mouth of God. Peter had understood that no matter what happens, 'the word of eternal life is in Jesus only and if on finds it in life, that’s more than enough for the fulfilment of one’s earthly life



मनन-चिंतन - 2



येसु ने बहत्तर शिष्यों को नियुक्त कर उन्हें चंगाई, सुसमाचार सुनाने एवं विभिन्न शक्तियों से सम्पन्न कर भेजा। (देखिए लूकस 10:1-20) इन शिष्यों ने जगह-जगह जाकर महान कार्य किये। "बहत्तर शिष्य सानन्द लौटे और बोले, "प्रभु! आपके नाम के कारण अपदूत भी हमारे अधीन होते हैं"। (लूकस 10:17) इस प्रकार ये शिष्य प्रभु के साथ रहकर बहुत खुश थे। किन्तु संत योहन के सुसमाचार 6:60 में हम पाते हैं कि प्रभु येसु को सुनने वालों में से बहुत से लोग उन्हें छोड़ कर चले जाते हैं। शायद उन बहत्तर शिष्यों में से बहुतों ने यह कहकर कि "ये तो कठोर शिक्षा है इसे कौन मान सकता है?" येसु के विरूद्ध लगभग विद्रोह किया। येसु की शिक्षा इतनी कठोर क्यों महसूस होती है? शिष्यों की ऐसी तीव्र प्रतिक्रिया को हम सहज ही समझ सकते हंक क्योंकि येसु की शिक्षा का पालन करना इतना आसान नहीं है जितना की सुनना एवं सुनाना। हम उनकी शिक्षा को सुनकर आनन्द विभोर तो हो सकते हैं किन्तु जब उसे जीवन में लागू करने की बारी आती है तो हम कतराने लगते हैं। यहॉ तक कि हेरोद भी योहन बपतिस्ता के प्रवचनों को सुनकर आनन्दित होता था तथा उसकी सराहना करता था, "हेरोद योहन को धर्मात्मा और सन्त जान कर उस पर श्रद्धा रखता और उसकी रक्षा करता था। हेरोद उसके उपदेश सुन कर बड़े असमंजस में पड़ जाता था। फिर भी, वह उसकी बातें सुनना पसन्द करता था।" (मारकुस 6:20) योहन के प्रति इतनी प्रशंसा एवं श्रद्धा के बावजूद भी हेरोद योहन को जेल में डलवा देता है तथा अनिच्छा से ही सही मगर उसे मरवा डालता है। हेरोद सुसमाचार के प्रति आकर्षित तो हुये पर उसकी शिक्षानुसार नहीं चल पाये।

राज्यपाल फेलिक्स भी पौलुस को सुनना पंसद करता था तथा ईसा मसीह के बारे में सुनना चाहता था। किन्तु जब "पौलुस न्याय, आत्मसंयम तथा भावी विचार के विषय में बोलने लगा, तो फेलिक्स पर भय छा गया और उसने कहा, ’’तुम इस समय जा सकते हो। अवकाश मिलने पर मैं तुम को फिर बुलाऊँगा।’’ (प्रेरित चरित 24:25) इस प्रकार जब पौलुस ने फेलिक्स के जीवन के उन संदेहास्पद पहलुओं को इंगित किया तो उसने पौलुस को वापस भेज दिया।

पुराने विधान में हम पाते हैं कि योशुआ लोगों को ईश्वर को अपनाने या छोडने का विकल्प देते हुए कहते हैं, ’’यदि तुम ईश्वर की उपासना नहीं करना चाहते, तो आज ही तय कर लो कि तुम किसकी उपासना करना चाहते हो- .....मैं और मेरा परिवार, हम सब प्रभु की उपासना करना चाहते हैं।’’ इसके उत्तर में लोग तुरन्त ईश्वर को चुनते है, ’’लोगों ने उत्तर दिया, ’’प्रभु के छोड़ कर अन्य देवताओं की उपासना करने का विचार हम से कोसों दूर है।’’ (योशुआ 24:15-16) किन्तु हम जानते हैं कि पराजय एवं विषम परिस्थितियों में वे लोग शीघ्र ही प्रभु की शिक्षाओं त्याग कर कुढकुढाने लगते थे। इस प्रकार वे अपनी शपथ पर कायम नहीं रह सके तथा भटक गये। उनकी समस्या भी प्रभु की शिक्षाओं का पालन थी।

एक धनी युवक येसु का अनुसरण करना चाहता था किन्तु प्रभु की शिक्षा, ’’अपनी सारी सम्पत्ति बेच कर गरीबों को दे दो और स्वर्ग में तुम्हारे लिए पूंजी रखी रहेगी’’ (मत्ती 19:21) को सुनकर वह निराश होकर चला जाता है। उसके लिये येसु का अनुसरण करना एक अंशकालीन क्रिया मात्र थी किन्तु जब येसु उसे जीवनपर्यन्त प्रतिबद्धता के लिए बुलाते हैं तो वह इस बुलाहट को कठोर पाकर पीछे हट जाता है।

धर्मग्रंथ में हमें ऐसे अनेकों उदाहरण मिलेंगे जब लोगों ने ईश्वर की शिक्षा को कठोर मानकर त्याग दिया। हमें संत पेत्रुस के कथन एवं विश्वास ’’प्रभु हम किसके पास जाये! आपके ही शब्दों में अनन्त जीवन का संदेश है’’ से प्रेरणा एवं सीख ग्रहण करना चाहिए। पेत्रुस ने येसु को मुक्ति का एकमात्र स्रोत एवं उनकी शिक्षा को मुक्ति का एकमात्र साधन माना। दानिएल के ग्रंथ में शद्रक, मेशक और अबेदनगो ने मौत के मुँह में पहुँचकर भी ईश्वर की शिक्षा को नहीं त्यागा और कहा, ’’यदि कोई ईश्वर है, जो ऐसा कर सकता है, तो वह हमारा ही ईश्वर है, जिसकी हम सेवा करते हैं। वह हमें प्रज्वलित भट्टी से बचाने में समर्थ है और हमें आपके हाथों से छुडायेगा।’’ (दानिएल 3:17) उसके आगे के वचन उनके विश्वास की गहराई से हमारा परिचय कराते हैं। वे आगे कहते हैं, “यदि वह ऐसा नहीं करेगा, तो राजा! यह जान लें कि हम न तो आपके देवताओं की सेवा करेंगे और न आपके द्वारा संस्थापित स्वर्ण-मूर्ति की आराधना ही।’’

इब्राहिम ने भी अपनी सभी विपत्तियों में ईश्वर पर भरोसा रखा यहॉ तक कि अपने एकलौते पुत्र इसहाक को चढाने से पीछे नहीं हटे। (देखिस उत्पति 22:15-19) आइये हम भी अपने विश्वास में दृढ़ बने तथा स्तोत्रकार की तरह प्रभु से प्रार्थना करे, ’’प्रभु! मुझे अपना मार्ग दिखा, जिससे मैं तेरे सत्य के प्रति ईमानदार रहूँ। मेरे मन को प्रेरणा दे, जिससे मैं तेरे नाम पर श्रद्धा रखूँ।’’ (स्तोत्र 86:11)

जब प्रभु ने कहा, "जीवन की रोटी मैं हूँ। ....स्वर्ग से उतरी हुई वह जीवन्त रोटी मैं हूँ। यदि कोई वह रोटी खायेगा, तो वह सदा जीवित रहेगा। जो रोटी में दूँगा, वह संसार के लिए अर्पित मेरा मांस है।" जो मेरा मांस खाता और मेरा रक्त पीता है, उसे अनन्त जीवन प्राप्त है और मैं उसे अन्तिम दिन पुनर्जीवित कर दूँगा," (योहन 6०:48,51,54) तो शिष्य एवं अन्य उपस्थित लोग उनकी बातें समझ नहीं पाये। येसु का कथन यूखारिस्त की पूर्वसूचना थी जिसमें येसु लोगों के लिए जीवंत शरीर और रक्त बन जाते हैं। लोग इस महान रहस्य एवं सच्चाई को समझ नहीं पाये इसलिए वे ऐसी तीव्र प्रतिक्रिया देते हैं। येसु ने इससे पहले भी अनेक बार कठोर शब्दों में शिक्षा दी थी जैसे उन्होंने फरीसियों और शास्त्रियों को ढोंगी कहा, शत्रुओं से प्रेम करना सिखलाया, विवाह को अटूट बंधन बताया, संकरे द्वार और विस्तृत द्वार के भेद को समझाया, वेश्याओं और नाकेदारों को बुलाया, शिष्यों के पैर धौये, नगरों को धिक्कारा, विश्राम के दिन चंगाई के कार्य किये, आत्मत्याग पर बल दिया, क्षमाशीलता का नया पाठ पढाया, स्वयं को संसार की ज्योति तथा भला चरवाहा बताया आदि। किन्तु उन्होंने कभी भी विद्रोह जैसी बातें नहीं की। लोगों के लिए यह समझना असंभव था कि कैसे ईश्वर मनुष्य बन सकता है तथा वहीं ईश्वर कैसे उनके लिए उनका भोजन बन जायेगा। वे ईश्वर के इस महान प्रेम को यूखारिस्त में परिणीत होता नहीं देख सके। उनके लिए ईश्वर की धारणा शायद दूसरी रही हो किन्तु वे येसु की रोटी और रक्त की शिक्षा को सिरे से नकार देते हैं। लोगों की इस प्रतिक्रिया को हम संत पौलुस के कथन से समझ सकते हैं, ’’प्राकृत मनुष्य ईष्वर के आत्मा की शिक्षा स्वीकार नहीं करता। वह उसे मूर्खता मानता और उसे समझने में असमर्थ है, क्योंकि आत्मा की सहायता से ही उस शिक्षा की परख हो सकती है।’’ (1 कुरि. 2:14) इस कारण बहुत से शिष्य अलग हो गये और उन्होंने उनका साथ छोड़ दिया। यूखारिस्त एक महान रहस्य है और इसे हम ईश्वर की कृपा के बिना समझ नहीं पायेंगे, स्वीकार नहीं कर पायेंगे।

जब येसु ने बचे हुये अपने बारह शिष्यों से पूछा कि ’’क्या तुम लोग भी चले जाना चाहते हो? तो पेत्रुस ने भावपूर्वक एक प्रेरणादायक तथा अंतदृष्टि से परिपूर्ण उत्तर दिया, ’’प्रभु! हम किसके पास जाये! आपके ही शब्दों में अनन्त जीवन का संदेश है।’’ पेत्रुस भले ही यूखारिस्त के रहस्य एवं सच्चाई को नहीं समझा हो किन्तु वह अपने येसु को त्यागना नहीं चाहता था। ईश्वर की कृपा से वह अब जानने लगा था कि प्रभु येसु मसीह हैं और ईश्वर के पुत्र हैं और इसलिए उनके वचनों पर उसे विश्वास करना चाहिए। इसलिए वह येसु के साथ बना रहता है तथा समय आने पर कालांतर में वह इस सच्चाई एवं रहस्य को भलीभांति समझ जाता है।


-Br Biniush Topno


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शनिवार, 21 अगस्त, 2021

 

शनिवार, 21 अगस्त, 2021

वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : रूत 2:1-3,8-11; 4:13-17



1) अपने पति की तरफ़ से नोमी के बोअज़ नामक एक सम्बन्धी था। वह एलीमेलेक के कुल का बहुत धनी मनुष्य था।

2) मोआबिन रूत ने नोमी से कहा, "मुझे खेतों में जाने दीजिए। जो मुझ पर कृपा करेगा, उसी के पीछे-पीछे सिल्ला बीनना चाहती हूँ।" उसने उत्तर दिया, "बेटी, जाओ।"

3) वह गयी और खेतों में फ़सल काटने वालों के पीछे-पीछे सिल्ला बीनने लगी। सौभाग्य से वह जिस खेत पर पहुँची, वह एलीमेलेक के कुल के बोअज़ का ही था।

8) बोअज़ ने रूत से कहा, "बेटी! सुनो। दूसरे खेत में सिल्ला बीनने मत जाओ। यहाँ रहो। मेरी नौकरानियों के साथ रहो।

9) इसका ध्यान रखा करो कि किस खेत में फ़सल कट रही है और उनके पीछे-पीछे चलो। मैं अपने नौकरों को आदेश दे चुका हूँ कि वे तुम को तंग न करें। यदि तुम्हें प्यास लगे, तो नौकरों द्वारा भरे हुए घड़ों में से पानी पीने जाओ।"

10) रूत ने साष्टांग प्रणाम किया और कहा, "मुझे आपकी कृपादृष्टि कैसे प्राप्त हुई? मैं तो परदेशिनी हूँ और आप मेरी सुधि लेते हैं।"

11) बोअज़ ने उत्तर दिया, "लोगों ने मुझे बताया कि तुमने अपने पति की मृत्यु के बाद अपनी सास के लिए क्या-क्या किया है। तुम अपने माता-पिता और अपनी जन्मभूमि को छोड़ कर, ऐसे लोगों के यहाँ चली आयी हो, जिन्हें तुम पहले नहीं जानती थी।

4:13) बोअज़ ने रूत को अपनी पत्नी के रूप में अपनाया। बोअज़ का उस से संसर्ग हुआ। प्रभु की कृपा से रूत गर्भवती हो गयी और उसने पुत्र प्रसव किया।

14) स्त्रियों ने नोमी से कहा, "धन्य हैं प्रभु! उसने अब आप को एक उत्तराधिकारी दिया है और उसका नाम इस्राएल में बना रहेगा।

15) वह आप को नया जीवन प्रदान करेगा और बुढ़ापे में आपका सहारा होगा, क्योंकि आपकी बहू ने उसे जन्म दिया है। वह आप को प्यार करती है और आपके लिए सात पुत्रों से भी बढ़ कर है।"

16) नोमी ने शिशु को अपनी छाती से लगा लिया और उसका पालन-पोषण किया।

17) पड़ोस की स्त्रियों ने यह कहते हुए शिशु का नाम रखा, "नोमी को पुत्र उत्पन्न हुआ है।" उन्होंने उसका नाम ओबेद रखा वही दाऊद के पिता यिषय का पिता है।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 23:1-12



1) उस समय ईसा ने जनसमूह तथा अपने शिष्यों से कहा,

2) "शास्त्री और फरीसी मूसा की गद्दी पर बैठे हैं,

3) इसलिए वे तुम लोगों से जो कुछ कहें, वह करते और मानते रहो; परन्तु उनके कर्मों का अनुसरण न करो,

4) क्योंकि वे कहते तो हैं, पर करते नहीं। वे बहुत-से भारी बोझ बाँध कर लोगों के कन्धों पर लाद देते हैं, परन्तु स्वंय उँगली से भी उन्हें उठाना नहीं चाहते।

5) वे हर काम लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए करते हैं। वे अपने तावीज चैडे़ और अपने कपड़ों के झब्बे लम्बे कर देते हैं।

6) भोजों में प्रमुख स्थानों पर और सभागृहों में प्रथम आसनों पर विराजमान होना,

7) बाज़ारों में प्रणाम-प्रणाम सुनना और जनता द्वारा गुरुवर कहलाना- यह सब उन्हें बहुत पसन्द है।

8) "तुम लोग ’गुरुवर’ कहलाना स्वीकार न करो, क्योंकि एक ही गुरू है और तुम सब-के-सब भाई हो।

9) पृथ्वी पर किसी को अपना ’पिता’ न कहो, क्योंकि तुम्हारा एक ही पिता है, जो स्वर्ग में है।

10 ’आचार्य’ कहलाना भी स्वीकार न करो, क्योंकि तुम्हारा एक ही आचार्य है अर्थात् मसीह।

11) जो तुम लोगों में से सब से बड़ा है, वह तुम्हारा सेवक बने।

12) जो अपने को बडा मानता है, वह छोटा बनाया जायेगा। और जो अपने को छोटा मानता है, वह बडा बनाया जायेगा।



📚 मनन-चिंतन



फरीसियों को येसु से एक बड़ी चुनौती मिलती थी, क्योंकि वे उन्हें छोटी-छोटी बातों से परे एक गहरी आध्यात्मिकता की और ले जाने की कोशिश कर रहे थे जो की जीवित ईश्वर के साथ एक जीवंत संबंध में निहित थी। फरीसी ऊपरी तौर पर अपनी धार्मिकता के प्रदर्शन मात्र से संतुष्ट थे। क्या मुझ में फरीसी का कुछ अंश है? क्या मैं दिखावे के लिए जीता हूं,? हमेशा इस बात की चिंता करता हूं कि दूसरे मेरे बारे में क्या सोचते हैं? क्या मैं एक उथली अध्यत्मिता में जी रहा हूँ? एक चीज़ से दूसरी चीज़ की ओर भटक रहा हूँ? क्या मैं अपने हृदय की गहराई में ईश्वर की पुकारों को नज़रअंदाज़ कर रहा हूँ, जो कि अपने आप में अधिक समृद्ध और अधिक संतोषजनक है?

प्रभु, मुझे आपका एक बेहतर अनुयायी बनने में मदद कर, और जो आप मुझे बताने की कोशिश कर रहे हैं उसे सुनने के लिए मुझे पवित्र आत्मा प्रदान कर। आपके साथ मेरी दैनिक व्यक्तिगत प्रार्थना चुपचाप मुझे बदल दें। शिचेस्टर के संत रिचर्ड की सुन्दर प्रार्थना को मैं आज दोहराना चाहता हूँ - प्रभु यह वर दे कि मैं आपको और अधिक स्पष्ट रूप से देख सकूँ, आपको और अधिक गहरे प्यार से प्रेम कर सकूँ, और आपका और अधिक करीबी से अनुसरण कर सकूँ। आमेन



📚 REFLECTION


The Pharisees get a hard time from Jesus, because he is trying to draw them away from trivialities to something deeper—a dynamic relationship with the living God. Is there anything of the Pharisee in me? Do I live for show, always worried about what others think of me? Am I superficial, flitting from one thing to the next, while ignoring the calls of God in the depth of my heart to something richer and more satisfying?

Lord, help me to be a better follower of yours, and to listen for what you are trying to tell me. May my daily meetings with you quietly transform me. In the words of the beautiful prayer, ‘may I see you more clearly, love you more dearly, and follow you more nearly’ (Saint Richard of Chichester).



 -Br Biniush Topno


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शुक्रवार, 20 अगस्त, 2021 वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह

 

शुक्रवार, 20 अगस्त, 2021

वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : रूत 1:1.3-6.14b-16.22



1) न्यायकर्ताओं के समय देश में अकाल पड़ा, इसलिए यूदा के बेथलेहेम का एक व्यक्ति अपनी पत्नी और अपने दोनों पुत्रों के साथ मोआब के मैदान में बसने आया।

3) नोमी का पति एलीमेलेक मर गया और वह अपने दोनों पुत्रों के साथ रह गयी।

4) उन्होंने मोआबी स्त्रियों के साथ विवाह किया - एक ओर्पा कहलाती थी और दूसरी रूत। उन्होंने दस वर्ष तक वहाँ निवास किया।

5) इसके बाद महलोन और किल्योन भी मर गये और नोमी अपने दोनों पुत्रों और अपने पति से वंचित हो गयी।

6) तब उसने अपनी बहुओं के साथ मोआब के मैदान से चल देने का निश्चय किया; क्योंकि उसने सुना था कि प्रभु ने अपनी प्रजा की सुधि ली और उसे खाने के लिए रोटी दी थी।

14) दोनों बहुएँ फिर फूट-फूट कर रोने लगीं। ओर्पा अपनी सास को गले लगा कर अपने लोगों के यहाँ लौट गयी, किन्तु रूत अपनी सास से लिपट गयी।

15) नोमी ने उस से कहा, ‘‘देखो, तुम्हारी जेठानी अपने लोगों और अपने देवताओं के पास लौट गयी है। तुम भी अपनी जेठानी की तरह लौट जाओ।’’

16) किन्तु रूत ने उत्तर दिया, ‘‘इसके लिए अनुरोध न कीजिए कि मैं आप को छोड़ दूँ और लौट कर आप से दूर हो जाऊँ। आप जहाँ जायेंगी, वहाँ मैं भी जाऊँगी और आप जहाँ रहेंगी, वहाँ मैं भी रहूँगी। आपकी जाति मेरी भी जाति होगी और आपका ईश्वर मेरा भी ईश्वर होगा।

22) इस प्रकार नोमी अपनी मोआबी बहू रूत के साथ मोआब के मैदान से लौटी। वे जौ की कटनी के प्रारम्भ में बेथलेहेम पहॅुँची।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 22:34-40




34) जब फरीसियों ने यह सुना कि ईसा ने सदूकियों का मुँह बन्द कर दिया था, तो वे इकट्ठे हो गये।

35) और उन में से एक शास्त्री ने ईसा की परीक्षा लेने के लिए उन से पूछा,

36) गुरुवर! संहिता में सब से बड़ी आज्ञा कौन-सी है?’’

37) ईसा ने उस से कहा, ’’अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो।

38) यह सब से बड़ी और पहली आज्ञा है।

39) दूसरी आज्ञा इसी के सदृश है- अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो।

40) इन्हीं दो आज्ञायों पर समस्त संहिता और नबियों की शिक्षा अवलम्बित हैं।’’



📚 मनन-चिंतन



यद्यपि आज के सुसमाचार में येसु से पूछा गया प्रश्न उतने अच्छे उद्देष्य से नहीं पूछा गया था परन्तु वह प्र्श्न अपने आप में एक बहुत ही अच्छा प्रश्न है। येसु के समय यहूदी कानून में याने तोराह में 600 से अधिक आज्ञाएँ मानी जाती थीं। लोगों ने सवाल पूछा, 'क्या कोई एक आज्ञा थी जो अन्य सभी के ऊपर हो ?' फरीसियों के प्रश्न के उत्तर में यीशु ने जितना पूछा गया था उससे अधिक गहरा उत्तर दिया। उन्होंने न केवल सबसे महत्वपूर्ण आज्ञा दी, बल्कि जिसे वे स्वयं दो सबसे महत्वपूर्ण आज्ञा मानते थे।

दोनों आज्ञाओं में जो समान है वह है 'प्रेम' शब्द। ईश्वर के प्रति प्रेम हमारा प्राथमिक उद्देश्य होना चाहिए; केवल ईश्वर को ही हमारे पूरे अस्तित्व, हमें हमारे पूरे दिल, आत्मा और बुद्धि से प्यार करना है। येसु इस प्रथम आज्ञा को दूसरी महत्वपूर्ण आज्ञा से जोड़ते हैं और वो है, पड़ोसी के प्रति प्रेम। ऐसा लगता है कि येसु कह रहे हैं कि जो लोग पूरी तरह से ईश्वर से सच्चा प्रेम करते हैं, वे दूसरों के प्रति ईश्वर के प्रेम में बरबस ही बंध जाएंगे। वे दूसरों से उसी प्रकार प्रेम करेंगे जैसे ईश्वर उनसे प्रेम करता है। येसु अपने जीवन में प्रेम के इन दोनों पहलुओं को साकार करते हैं। इन दिनों में जब संसार में ईश्वर के नाम पर दूसरों को इतना कष्ट दिया जाता है, तो इन दो अविभाज्य आज्ञाओं को याद रखना अच्छा है। ये हमारे बपतिस्मा की बुलाहट का सार हैं तथा एक ही सिक्के के दो पहलु हैं। हम ईश्वर और एक दूसरे के प्रति प्यार में निरंतर बढ़ते रहें।



📚 REFLECTION




The motivation underpinning the question that the Pharisees ask Jesus in today's gospel reading left a lot to be desired. Yet, even though the motive for asking the question was suspect, the question itself was a very good one. There were considered to be over 600 commandments in the Jewish Law at the time of Jesus. Devout people asked the question, ‘Was there any one commandment that should stand above all the others?’ In answer to the question of the Pharisees Jesus gave more than he was asked for. He not only gave the most important commandment but what he considered to be the two most important commandments.

What is common to both commandments is the word ‘love’. God is to be the primary object of our love; God alone is to be loved with all our being, all our heart, soul and mind. Jesus seems to have been unique in linking this primary commandment with another commandment which was found in a different place in the Scriptures to that first commandment, the love of the neighbour. Jesus seems to be saying that those who truly love God with all their being will be caught up into God’s love of others, will love others in the way God loves them. Jesus is the one human being who fully embodies the two-fold love. His love for God was so total, his loving communion with God was so complete, that he became the perfect expression of God’s love for others. In these days when so much suffering can be inflicted on others in the name of God, it is good to be reminded of these two inseparable commandments. They are the essence of our baptismal calling.


 -Br Biniush Topno



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