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गुरुवार, 05 अगस्त, 2021 वर्ष का अठारहवाँ सामान्य सप्ताह

 

गुरुवार, 05 अगस्त, 2021

वर्ष का अठारहवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ : गणना ग्रन्थ 20:1-13



1) इस्राएलियों का सारा समुदाय, पहले महीने, सिन नामक मरूभूमि पहुँचा और कुछ समय तक कादेश में रहा। वहाँ मिरयम की मृत्यु हो गयी और वह दफ़नायी गयी।

2) लोगों को पानी नहीं मिल रहा था, इसलिए वे एकत्र हो कर मूसा और हारून का विरोध करने लगे।

3) उन्होंने यह कहते हुए मूसा से शिकायत की, ''ओह! यदि हम अपने भाई-बन्धुओं के साथ ही प्रभु के हाथ मर गये होते!

4) क्या आप इसलिए प्रभु का समुदाय इस मरूभूमि में ले आये कि हम और हमारे पशु यहाँ मर जायें?

5) आप हमें मिस्र से निकाल कर इस अशुभ स्थान में क्यों ले आये, जहाँ न तो अजान मिलता है, न अंजीर, न अंगूर और न अनार? यहाँ तो पीने का पानी तक नहीं मिलता!''

6) मूसा और हारून सभा को छोड़ कर दर्शन कक्ष के द्वार पर आये। वे मुँह के बल गिर पड़े और उन्हें प्रभु की महिमा दिखाई दी।

7) प्रभु ने मूसा से यह कहा,

8) ''डण्डा ले लो और अपने भाई हारून के साथ समुदाय को एकत्र करो। तुम लोगों के सामने चट्टान को यह आदेश दोगे - हमें अपना पानी दो। इस प्रकार तुम चट्टान से पानी निकालोगे और तुम लोगों और पशुओं को पीने के लिए पानी दोगे।''

9) मूसा ने तम्बू से डण्डा ले लिया, जैसा कि प्रभु ने उसे आदेश दिया था।

10) मूसा और हारून ने चट्टान के सामने लोगों को एकत्र किया और उन से कहा, ''विद्रोहियों! सुनो। क्या हम तुम लोगों के लिए इस चट्टान से पानी निकालें?''

11) मूसा ने हाथ उठा कर दो बार चट्टान पर डण्डा मारा और चट्टान से पानी की धारा फूट निकली। इस प्रकार लोगों और पशुओं को पीने के लिए पानी मिला।

12) इसके बाद प्रभु ने मूसा और हारून से कहा, ''तुमने मुझ में विश्वास नहीं किया और इस्राएलियों की दृष्टि में मेरी पवित्रता को बनाये नहीं रखा ; इसलिए तुम इस समुदाय को उस देश नहीं पहुँचाओंगे, जिसे मैं उन्हें दे दूँगा।''

13) यह मरीबा का पानी है, जहाँ इस्राएलियों ने प्रभु की शिकायत की और प्रभु ने उनके सामने अपनी पवित्रता प्रकट की।



सुसमाचार : मत्ती 16:13-23



13) ईसा ने कैसरिया फि़लिपी प्रदेश पहुँच कर अपने शिष्यों से पूछा, "मानव पुत्र कौन है, इस विषय में लोग क्या कहते हैं?"

14) उन्होंने उत्तर दिया, "कुछ लोग कहते हैं- योहन बपतिस्ता; कुछ कहते हैं- एलियस; और कुछ लोग कहते हैं- येरेमियस अथवा नबियों में से कोई"।

15) ईस पर ईसा ने कहा, "और तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ?

16) सिमोन पुत्रुस ने उत्तर दिया, "आप मसीह हैं, आप जीवन्त ईश्वर के पुत्र हैं"।

17) इस पर ईसा ने उस से कहा, "सिमोन, योनस के पुत्र, तुम धन्य हो, क्योंकि किसी निरे मनुष्य ने नहीं, बल्कि मेरे स्वर्गिक पिता ने तुम पर यह प्रकट किया है।

18) मैं तुम से कहता हूँ कि तुम पेत्रुस अर्थात् चट्टान हो और इस चट्टान पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा और अधोलोक के फाटक इसके सामने टिक नहीं पायेंगे।

19) मैं तुम्हें स्वर्गराज्य की कुंजियाँ प्रदान करूँगा। तुम पृथ्वी पर जिसका निषेध करोगे, स्वर्ग में भी उसका निषेध रहेगा और पृथ्वी पर जिसकी अनुमति दोगे, स्वर्ग में भी उसकी अनुमति रहेगी।"

20) इसके बाद ईसा ने अपने शिष्यों को कड़ी चेतावनी दी कि तुम लोग किसी को भी यह नहीं बताओ कि मैं मसीह हूँ।

21) उस समय से ईसा अपने शिष्यों को यह समझाने लगे कि मुझे येरूसालेम जाना होगा; नेताओं, महायाजकों और शास्त्रियों की ओर से बहुत दुःख उठाना, मार डाला जाना और तीसरे दिन जी उठना होगा।

22) पेत्रुस ईसा को अलग ले गया और उन्हें यह कहते हुए फटकारने लगा, "ईश्वर ऐसा न करे। प्रभु! यह आप पर कभी नहीं बीतेगी।"

23) इस पर ईसा ने मुड़ कर, पेत्रुस से कहा "हट जाओ, शैतान! तुम मेरे रास्ते में बाधा बन रहो हो। तुम ईश्वर की बातें नहीं, बल्कि मनुष्यों की बातें सोचते हो।"



📚 मनन-चिंतन



आज के सुसमाचार में हम पेत्रुस के दो पक्षों को देखते हैं। प्रारंभ में वह येसु में महान अंतर्दृष्टि दिखाता है, उसे जीवित ईश्वर के पुत्र के रूप में पहचानता है, और जवाब में येसु उसे उस चट्टान के रूप में संबोधित करता है जिस पर वह कलीसिया का निर्माण करेगा। हालाँकि, पेत्रुस बाद में येसु को उनके दुःखभोग और मृत्यु के बारे में बोलने के पर फटकार लगाता है, और जवाब में येसु उसे शैतान,और उनके रास्ते की बाधा के रूप में संबोधित करते है। कलीसिया की नीव की चट्टान से ठोकर के पत्थर तक! एक गहरा विरोधाभास छिपा हुआ है। जब प्रभु के साथ हमारे संबंध की बात आती है तो कुछ ऐसा ही विरोधाभास हम सभी में होता है। हमारे जीवन में भी ऐसे क्षण आते हैं जब हम प्रभु की इच्छा के अनुरूप होते हैं और अन्य क्षण हम उनकी इच्छा के विपरीत होते हैं। तौभी प्रभु ने पेत्रुस के पर उसकी असफलताओं के बावजूद विश्वास रखा, और प्रभु हमारे विश्वासघाती हो जाने पर भी हमारे ऊपर अपना विश्वास बनाये रखते हैं।

आज के सुसमाचार पाठ के अनुसार,येसु ने अपनी कलीसिया का निर्माण एक त्रुटिपूर्ण चट्टान पर किया, एक ऐसी चट्टान जो जल्दी ही ठोकर का पत्थर बन सकती थी। पेत्रुस को चट्टान के रूप में संबोधित करते समय येसु ने कलीसिया को 'अपनी कलीसिया' कहा। क्योंकि यह उनकी कलीसिया है, यह तब भी टिकेगी , जब उनकी कलीसिया के चरवाहे अपनी जिम्मेवारी और जवाबदारी में असफल हो जाते हैं। क्योंकि कलीसिया में जीवित प्रभु का वास है, जो युग के अंत तक उसके भीतर मौजूद है (मत्ती 28:20), अधोलोक की, बुराई और मृत्यु की शक्तियाँ, इसके खिलाफ कभी भी टिक नहीं पाएंगी; वे अंततः विजयी नहीं होंगे। पौलुस घोषणा करता है कि येसु ही वह अंतिम नींव है जिस पर कलीसिया बनी है (1 कुरिं 3:11)। येसु के शिष्य के रूप में हमारी कमजोरी में भी जब हम ठोकर के पत्थर बन जाते हैं, तब भी येसु हमारी दृढ चट्टान बने रहते हैं।



📚 REFLECTION



In the Gospel today, we see two sides of Peter. Initially he shows a great insight into Jesus, recognizing him as the Son of the living God, and in response Jesus refers to him as the rock on which he will build the church. However, Peter later rebukes Jesus for speaking about his suffering and death, and in response Jesus addresses him as the devil, and the obstacle in his way.

From the foundation rock of the church to the stumbling stone! a deep contradiction is hidden. Something similar, even a contradiction, happens to all of us when it comes to our relationship with the Lord. There are moments in our life when we are in accordance with the will of the Lord and other moments, we are contrary to His will. Yet the Lord kept faith with Peter in spite of his failures, and the Lord has faith in us, even when we show ourselves to be unfaithful to him.

According to today's the Gospel, Jesus built his church on a flawed rock, a rock that could quickly become a stumbling block. When addressing Peter as a rock, Jesus referred to the church as 'His Church'. Because this is His church, it will last even when the shepherds in their church fail in their responsibility. Because the church is inhabited by the living Lord, who lives in her until the end of the age (Matthew 28:20), The powers of Hades, evil and death, will never be able to stand against it; They won't be victorious in the end. Paul declares that Jesus is the final foundation upon which the church is built (1 Cor. 3:11). Even when we become a stumbling stone in our weakness as disciples of Jesus, he remains our Strong Hold and the Rock.



 - Br. Biniush Topno


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बुधवार, 04 अगस्त, 2021 वर्ष का अठारहवाँ सामान्य सप्ताह

 

बुधवार, 04 अगस्त, 2021

वर्ष का अठारहवाँ सामान्य सप्ताह




पहला पाठ : गणना ग्रन्थ 13:1-2.25-14:1.26-29.34-35



1) प्रभु ने मूसा से कहा,

2) ''जो कनान देश में इस्राएलियों को देने जा रहा हूँ, उसकी टोह लगाने के लिए आदमियों को भेजो - हर एक वंश से एक प्रतिष्ठित व्यक्ति को।''

25) चालीस दिन बाद वे उस देश की टोह लगा कर लौटे।

26) वे पारान की मरुभूमि के कादेश नामक स्थान पर मूसा, हारून और इस्राएल के सारे समुदाय के पास आये। उन्होंने उनके और सारे समुदाय के सामने अपना विवरण प्रस्तुत किया और उन्हें उस देश के फल दिखाये।

27) उन्होंने मूसा से कहा, ''हम उस देश में गये, जहाँ आपने हमें भेजा था। वहाँ दूध और मधू की नदियाँ बहती हैं। ये रहे वहाँ के फल!

28) वहाँ के निवासी बलवान् है। उनके नगर सुरक्षित और बहुत बड़े हैं। हमने वहाँ अनाक के वंशजों को भी देखा है।

29) नेगेब प्रदेश में अमालेकी रहते है ; पहाड़ी प्रदेश में हित्ती, यबूसी और अमोरी; समुद्र के किनारे और यर्दन नदी के तट पर कनानी निवास करते हैं।

30) कालेब ने मूसा के विरुद्ध भुनभुनाने वाले लोगों को शान्त किया और कहा, ''हम वहाँ चलें और उस देश को अपने अधिकार में कर लें। हम उसे जीतने में समर्थ हैं।''

31) किन्तु जो व्यक्ति कालेब के साथ गये थे, वे बोले, ''हम उन लोगों का सामना नहीं कर सकते, क्योंकि वे हम से बलवान् हैं।

32) वे जिस देश की टोह लगा चुके थे, उसकी निन्दा करने लगे और बोले, ''हम जिस देश की टोह लगा चुके हैं, वह एक ऐसा देश है, जो अपने निवासियों को खा जाता है। हमने जिन लोगों का वहाँ देखा है, वे सब बहुत लम्बे कद के हैं।

33) हमने वहाँ भीमकाय लोगों को भी देखा। अनाकी भीमकाय लोगों के वंशज हैं। उनकी तुलना में हम अपने को टिड्डियाँ समझते थे और वे भी हमें यही समझते होंगे।''

1) सारा समुदाय ये बातें सुन कर ज़ोर से चिल्लाने लगा और रात भर विलाप करता रहा।

26) प्रभु ने मूसा और हारून से यह कहा,

27) ''मैं कब तक इस दुष्ट समुदाय की शिकायतें सहन करता रहूँ? मैं इस्राएलियों से अपनी शिकायतें सुन चुका हूँ।

28) उन्हें यह बता दो - प्रभु कहता है, “अपने अस्तित्व की शपथ! मैंने तुम लोगों को जो बातें कहते सुना है, उन्हीं के अनुसार मैं तुम्हारे साथ व्यवहार करूँगा।

29) यहाँ इस मरूभूमि में तुम्हारे शव पड़े रहेंगे, क्योंकि तुम लोगों ने मेरी शिकायत की है। जितने लोगों के नाम जनगणना के समय लिखे गये थे और जिनकी आयु बीस के ऊपर है,

34) तुम लोगों ने चालीस दिन तक उस देश का निरीक्षण किया। उनका हर दिन एक वर्ष गिना जायेगा। इसके अनुसार तुम्हें चालीस वर्ष तक अपने अपराधों का फल भुगतना पड़ेगा और तुम जान जाओगे कि मेरा विरोध करने का फल क्या होता है।

35) मैं प्रभु यह कह चुका हूँ। इस दुष्ट समुदाय ने मेरा विरोध किया है। मैं इसके साथ यही व्यवहार करूँगा। यह इस मरूभूमि में समाप्त हो जायेगा। ये लोग सब-के-सब यहाँ मर जायेंगे।''



सुसमाचार : मत्ती 15:21-28



21) ईसा ने वहाँ से बिदा होकर तीरूस और सिदोन प्रान्तों के लिए प्रस्थान किया।

22) उस प्रदेश की एक कनानी स्त्री आयी और पुकार-पुकार कर कहती रही, ’’प्रभु दाऊद के पुत्र! मुझ पर दया कीजिए। मेरी बेटी एक अपदूत द्वारा बुरी तरह सतायी जा रही है।’’

23) ईसा ने उसे उत्तर नहीं दिया। उनके शिष्यों ने पास आ कर उनसे यह निवेदन किया, ’’उसकी बात मानकर उसे विदा कर दीजिए, क्योंकि वह हमारे पीछे-पीछे चिल्लाती आ रही है’’।

24) ईसा ने उत्तर दिया, ’’मैं केवल इस्राएल के घराने की खोई हुई भेड़ों के पास भेजा गया हूँ।

25) इतने में उस स्त्री ने आ कर ईसा को दण्डवत् किया और कहा, ’’प्रभु! मेरी सहायता कीजिए’’।

26) ईसा ने उत्तर दिया, ’’बच्चों की रोटी ले कर पिल्लों के सामने डालना ठीक नहीं है’’।

27) उसने कहा, ’’जी हाँ, प्रभु! फिर भी स्वामी की मेज़ से गिरा हुआ चूर पिल्ले खाते ही हैं’’।

28) इस पर ईसा ने उत्तर दिया ’’नारी! तुम्हारा विश्वास महान् है। तुम्हारी इच्छा पूरी हो।’’ और उसी क्षण उसकी बेटी अच्छी हो गयी।



📚 मनन-चिंतन



आज जब हम आर्स की चंगाई कहे जाने वाले, सभी पुरोहितों के संरक्षक संत योहन मारिया वियान्नी का पर्व मनाते हैं, तो आइए हम इस छोटे से पर एक महान संत के जूनून और उत्साह को आत्मसात करें। वे कैसे सब प्रकार की नकारात्मक और निराशाजनक परिवेश में रहते हुए भी एक सकारात्मक आध्यात्मिक परिवर्तन लाते हैं ।

उनके पुरोहित अभिषेक तक की चुनितियों से तो हम सब वाकिफ ही हैं कि किस प्रकार से पढाई में कमज़ोर होते हुए भी ईश्वर की कृपा से वे प्रभु की वेदी तक पहुंच पाते हैं। उनके अभिषेक के बाद जब उनकी नियुक्ति आर्स नामक एक ऐसी पल्ली में होती है जहाँ की बदहाली की वजह से वहां कोई भी पुरोहित वहाँ जाना पसंद नहीं करता था। उनके विकार जनरल ने उन्हें वहां भेजते समय उनसे कहा था, "उस पल्ली में ईश्वर प्यार समाप्त हो चूका है; शायद आप उसे लौटा पाएं ” ये शब्द उल्लेखनीय रूप से एक नबूवत के शब्द थे पर उस समय विकार जनरल की मंशा यह नहीं थी। वह तो उस स्थान की बदहाली वाली परिस्थिति से उनको परिचित करा रहे थे।

अगर हम योहन वियान्नी को आर्स की उस पल्ली में पहली सुबह चर्च की घंटी बजाते हुए देखते हैं तो यह याद रहे कि यह एक टूटी हुई इमारत में एक टूटी हुई घंटी थी। आज इस तरह की इमारत, जल्द ही, बंद इमारतों की सूचि में आ जाएगी। कहने का मतलब वो ईमारत शायद रहने और प्रार्थना के लायक नहीं थी। पर उस साधारण लेकिन महान संत ने अपनी प्रार्थना व आध्यात्मिकता के बदोलत सब कुछ बदल के रख दिया। हम उनकी प्रार्थना में उनके साहस की एक झलक पा सकते हैं, एक प्रार्थना जिसे कई पल्ली पुरोहितों को पूरे मन से ईश्वर से पूछने में संकोच होगा: "हे, ईश्वर मेरे पल्ली का रूपांतरण और पल्लीवासियों का मनपरिवर्त कर; इसके बदले मैं जीवन भर आप जो कुछ भी चाहो भुगतने को तैयार हूं।" ईश्वर ने उस प्रार्थना का उत्तर दिया और उस पल्ली का आमूल परिवर्तन दिया और सैकड़ों हजारों ने अंततः पृथ्वी पर उस छोटे से स्थान की यात्रा की। यह एक "नए सुसमाचार प्रचार" की शुरुआत सा प्रतीत होता है।

उनके आत्मविश्वास को समझने के लिए हमें यह जानने के लिए प्रत्येक सुबह पहले उस दृश्य को देखने की आवश्यकता होगी, जहां से यह विश्वास बहता है:पवित्र संदूक के सामने घुटने टेकना, यूखारिस्त में उपस्थित जिन्दा येसु जो धन्य संस्कार में हर दिन की शुरुआत में उनसे मिलता था। आज के बिगड़ते समाज और राह भटकती आज की पीढ़ी को सही मार्ग पर लाने के लिए सिर्फ बड़े -बड़े उपदेश नहीं घुटनों पर आकर रोते हुए की जाने वाली प्रार्थना की ज़रूरत है। आज कलीसिया को हज़ारों वियान्नी की ज़रूरत है। न केवल पुरोहित पर वियान्नी जैसे माता - पिता, धर्म प्रचारक और शिक्षक - शिक्षिकाएं जो वास्तव में अपने परिवार, समाज व दुनिया में आध्यात्मिकता की एक लहर के लिए रोते और बिलखते हुए प्रार्थना करें।



📚 REFLECTION



Today as we celebrate John Maria Vianni, the patron saint of all priests, called the cure of Ars, let us imbibe the passion and enthusiasm of this small yet great saint. How he brings about a positive spiritual transformation even in all kinds of negative and depressing surroundings. We are all aware of the challenges faced up to his priestly ordination and how, despite being weak in studies, by the grace of God, he reached the altar of the Lord. After his ordination, when he is appointed to a parish called Ars, where no priest liked to go, because of the growing evil there. His Vicar General, while sending him there, told him, "There is no love of God left in that parish, perhaps you can revive it." These words were remarkably the words of a prophet, but that was not the intention of the vicar general at the time. It was to introduce him to the dilapidated and disappointing condition of the place.

If we see John Vianni ring the church bell in that parish of Ars on the first morning, remember that it was a broken bell in a broken building. Today such a building will, soon, be on the list of closed buildings. That is to say, that building was probably not worth living and useful for prayer. But that simple but great saint changed everything through his prayer and spirituality. We can see a glimpse of his courage in his prayer, a prayer that many parish priests would hesitate to ask God wholeheartedly: "O God, convert my parish and the parishioners; and for that I am ready to suffer whatever you give me." God answered that prayer and radically changed that parish, and hundreds of thousands eventually travelled to that little place on earth. This appears to be the beginning of a "new evangelism”. To understand His confidence, we need to see the from where every morning his faith, power and energy flow: He used to meet, kneeling before the Holy Tabernacle, the living Jesus present in the Eucharist at the beginning of each day in the Blessed Sacrament.

In order to bring today's deteriorating society and the fallen generation on the right path, not only big-big sermons needed but we need to come on our knees and with tears need to pray for our generation. Today the church needs thousands of Viannis. Not only priests but parents, missionaries and teachers like Vianni who actually weep and pray for a wave of spirituality in their family, society and the world.


 -Br. Biniush Topno



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मंगलवार, 03 अगस्त, 2021 वर्ष का अठारहवाँ सामान्य सप्ताह

 

मंगलवार, 03 अगस्त, 2021

वर्ष का अठारहवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : गणना ग्रन्थ 12:1-13



1) मूसा ने एक इथोपियाई स्त्री से विवाह किया था। इस इथोपियाई पत्नी के कारण मिरयम और हारून मूसा की निन्दा करने लगे।

2) उन्होंने कहा, ''क्या प्रभु केवल मूसा के द्वारा बोला है? क्या वह हमारे द्वारा भी नहीं बोला है?'' प्रभु ने यह सुना।

3) मूसा अत्यन्त विनम्र था। वह पृथ्वी के सब मनुष्यों में सब से अधिक विनम्र था।

4) प्रभु ने तुरन्त मूसा, हारून और मिरयम से कहा, ''तुम तीनों दर्शन-कक्ष जाओ''। तीनों वहाँ गये।

5) तब प्रभु बादल के खम्भे के रूप में उतर कर तम्बू के पास खड़ा हो गया। उसने हारून और मिरयम को बुलाया। दोनों आगे बढ़े

6) और प्रभु ने उन से कहा, ''मेरी बात ध्यान से सुनो। मैं तुम्हारे नबियों को दिव्य दर्षनों में दिखाई देता हूँ और स्वप्नों में उन से बातें करता हूँ।

7) मैं अपने सेवक मूसा के साथ ऐसा नहीं करता। मेरी सारी प्रजा में वही विश्वसनीय है।

8) मैं उसे पहेली नहीं बुझाता, बल्कि आमने-सामने स्पष्ट रूप से बातें करता हूँ। वह प्रभु का स्वरूप देखता है। मेरे सेवक मूसा की निन्दा करने में तुम्हें डर क्यों नहीं लगा?''

9) प्रभु का क्रोध उन पर भड़क उठा और वह उन्हें छोड़ कर चला गया।

10) तब बादल तम्बू पर से हट गया और मिरयम का शरीर कोढ़ से बर्फ़ की तरह सफ़ेद हो गया। हारून ने मिरयम की ओर मुड़ कर देखा कि वह कोढ़िन हो गयी है।

11) हारून ने मूसा से कहा, ''महोदय! हमने मूर्खतावष पाप किया है। कृपया हमें उसका दण्ड न दिलायें।

12) मिरयम को उस मृतजात शिषु के सदृष न रहने दें, जिसका शरीर जन्म के समय आधा गला हुआ है।''

13) मूसा ने यह कहते हुए प्रभु से प्रार्थना की, ''ईश्वर! इसका रोग दूर करने की कृपा कर।''



सुसमाचार : मत्ती 14:22-36



22) इसके तुरन्त बाद ईसा ने अपने शिष्यों को इसके लिए बाध्य किया कि वे नाव पर चढ़ कर उन से पहले उस पार चले जायें; इतने में वे स्वयं लोगों को विदा कर देंगे।

23) ईसा लोगों को विदा कर एकान्त में प्रार्थना करने पहाड़ी पर चढे़। सन्ध्या होने पर वे वहाँ अकेले थे।

24) नाव उस समय तट से दूर जा चुकी थी। वह लहरों से डगमगा रही थी, क्योंकि वायु प्रतिकूल थी।

25) रात के चैथे पहर ईसा समुद्र पर चलते हुए शिष्यों की ओर आये।

26) जब उन्होंने ईसा को समुद्र पर चलते हुए देखा, तो वे बहुत घबरा गये और यह कहते हुए, "यह कोई प्रेत है", डर के मारे चिल्ला उठे।

27) ईसा ने तुरन्त उन से कहा, "ढारस रखो; मैं ही हूँ। डरो मत।"

28) पेत्रुस ने उत्तर दिया, "प्रभु! यदि आप ही हैं, तो मुझे पानी पर अपने पास आने की अज्ञा दीजिए"।

29) ईसा ने कहा, "आ जाओ"। पेत्रुस नाव से उतरा और पानी पर चलते हुए ईसा की ओर बढ़ा;

30) किन्तु वह प्रचण्ड वायु देख कर डर गया और जब डूबने लगा तो चिल्ला उठा, "प्रभु! मुझे बचाइए"।

31) ईसा ने तुरन्त हाथ बढ़ा कर उसे थाम लिया और कहा, "अल़्पविश्वासी! तुम्हें संदेह क्यों हुआ?"

32) वे नाव पर चढे और वायु थम गयी।

33) जो नाव में थे, उन्होंने यह कहते हुए ईसा को दण्डवत् किया "आप सचमुच ईश्वर के पुत्र हैं"।

34) वे पार उतर कर गेनेसरेत पहुँचे।

35) वहाँ के लोगों ने ईसा को पहचान लिया और आसपास के गाँवों में इसकी ख़बर फैला दी। वे सब रोगियों को ईसा के पास ले आ कर

36) उन से अनुनय-विनय करते थे कि वे उन्हें अपने कपड़े का पल्ला भर छूने दें। जितनों ने उसका स्पर्श किया, वे सब-के-सब अच्छे हो गये।



अथवा सुसमाचार : मत्ती 15:1-2, 10-14



1) येरूसालेम के कुछ फ़रीसी और शास्त्री किसी दिन ईसा के पास आये।

2) और यह बोले, "आपके शिष्य पुरखों की परम्परा क्यों तोड़ते हैं? वे तो बिना हाथ धोये रोटी खाते हैं।"

10) इसके बाद ईसा ने लोगों को पास बुला कर कहा, "तुम लोग मेरी बात सुनो और समझो।

11) जो मुहँ में आता है, वह मनुष्य को अशुद्ध करता है; बल्कि जो मुँह से निकलता है, वही मनुष्य को अशुद्ध करता है;

12) बाद में शिष्य आ कर ईसा से बोले, "क्या आप जानते हैं कि फ़रीसी आपकी बात सुन कर बहुत बुरा मान गये हैं?"

13) ईसा ने उत्तर दिया, "जो पौधा मेरे स्वर्गिक पिता ने नहीं रोपा है, वह उखाड़ा जायेगा।

14) उन्हें रहने दो; वे अन्धों के अंधे पथप्रदर्शक हैं। यदि अन्धा अन्धे को ले चले, तो दोनों ही गड्ढे में गिर जायेंगे।"



📚 मनन-चिंतन


आज के सुसमाचार में , पेत्रुस नाव की असुरक्षा से बाहर निकलने की चाहत में अन्य शिष्यों से अलग खड़ा होता है ताकि प्रभु की ओर यात्रा की जा सके, जो स्वयं, नाव में बैठे अपने शिष्यों की ओर पानी पर चलकर यात्रा कर रहे थे। पेत्रुस की अनिश्चित यात्रा तब तक अच्छी रही जब तक कि उसने प्रभु से अपनी आँखें नहीं हटा लीं और इसके बजाय हवा की शक्ति की को देखना शुरू कर दिया; उसी समय वह डूबने लगा। आज का सुसमाचार हमें याद दिलाता है कि हमारी आंखें प्रभु पर टिकी हुई होनी चाहिए, खासकर जब परिस्थियाँ हमारे खिलाफ हों। हमारे जीवन में ऐसा समय आता हैं जब हवा की ताकत हमें डुबाने की धमकी देती है और जब हमारे पैर लड़खड़ाने लगते हैं। ऐसे क्षणों में यह सर्वोपरी है कि हमें अपनी निगाह प्रभु पर टिकाये रखें जो हमेशा हमारे सामने यह कहते हुए खड़े रहते हैं, 'साहस रखो ! मैं ही हूं! मत डरो!' भले ही हम अपनी आँखें प्रभु से हटा लें और अपने आप को डूबते हुए पाएं, हमें केवल पेत्रुस की तरह प्रभु को पुकारना होगा, 'प्रभु! मुझे बचाइये' और वह हमें पकड़ने और हमें डूबने से बचाने के लिए अपना हाथ बढ़ाएंगे और हमें थाम लेंगे । प्रभु इमैनुएल है, ईश्वर हमारे साथ है, और वह हमेशा उस चीज से अधिक शक्तिशाली है जो हमें भयभीत करने की धमकी देती है।



📚 REFLECTION




In the Gospel reading today, Peter stands out from the other disciples in wanting to step out of the unsafety of the boat so as to journey towards the Lord who, himself, had journeyed towards the disciples in the boat. Peter’s precarious journey went well until he took his eyes off the Lord and began to notice the force of the wind instead; at that point he began to sink. Matthew the evangelist may be reminding the church of the importance of keeping our eyes fixed on the Lord especially when the elements are against us. There are times in our lives when the force of the wind threatens to overwhelm us and when our feet do not seek to stand on firm ground. It is above all in such moments that we need to keep our gaze fixed on the Lord who always stands before us saying, ‘Courage! It is I! Do not be afraid!’ Even if we do take our eyes off the Lord and find ourselves going down, we have only to cry out to the Lord like Peter, ‘Lord! Save me’ and he will reach out to hold us and keep us from sinking. The Lord is Emmanuel, God-with-us, and he is always stronger than whatever threatens to overwhelm us.


 -Br. Biniush Topno


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सोमवार, 02 अगस्त, 2021 वर्ष का अठारहवाँ सामान्य सप्ताह

 

सोमवार, 02 अगस्त, 2021

वर्ष का अठारहवाँ सामान्य सप्ताह


 

पहला पाठ : गणना ग्रन्थ 11:4-15



4) इस्राएली भी विलाप करने लगे। उन्होंने यह कहा, ''कौन हमें खाने के लिए मांस देगा?

5) हाय! हमें याद आता है कि हम मिस्र में मुफ्त मछली खाते थे, साथ ही खीरा, तरबूज, गन्दना प्याज और लहसुन।

6) अब तो हम भूखों मर रहे हैं - हमें कुछ भी नहीं मिलता। मन्ना के सिवा हमें और कुछ दिखाई नहीं देता।''

7) मन्ना धनिया के बीज-जैसा था। उसका रूप-रंग गुग्गुल के सदृष था।

8) लोग उसे बटोरने जाते थे, चक्की में पीसते या ओखली में कूटते थे, और बरतनों में उबाल कर उसकी रोटियाँ पकाते थे। उसका स्वाद तेल में तली हुई पूरी-जैसा था

9) जब रात को ओस शिविर पर उतरती थी, तो मन्ना भी गिरता था।

10) मूसा ने लोगों को, हर परिवार को अपने-अपने तम्बू के द्वार पर विलाप करते सुना। प्रभु का क्रोध भड़क उठा। मूसा को यह बहुत बुरा लगा

11) और उसने प्रभु से यह कहा, ''तू अपने दास को इतना दुख क्यों दे रहा है? तू मुझ पर इतना अप्रसन्न क्यों है कि तूने इस प्रजा का पूरा भार मुझ पर ही डाल दिया है?

12) क्या मैंने इसे उत्पन्न किया है, जो तू मुझसे कहता है - जिस तरह दायी दूध-पीते बच्चे को सँभालती है, तुम इसे गोद में उठाकर उस देश ले जाओ, जिसे मैंने इसके पूर्वजों को देने की शपथ खाई है।

13) मैं इन सब लोगों के लिए कहाँ से माँस ले आऊँ। वे विलाप करते हुए मुझ से कहते है, “हमें खाने के लिए माँस दीजिए।”

14) मैं अकेले ही इस प्रजा को नहीं सँभाल सकता, मैं यह भार उठाने में असमर्थ हूँ।

15) यदि मेरे साथ तेरा यही व्यवहार हो, तो यह अच्छा होता कि तू मुझे मार डालता। यह संकट मुझ से दूर करने की कृपा कर।''



सुसमाचार : मत्ती 14:13-21



13) ईसा यह समाचार सुन कर वहाँ से हट गये और नाव पर चढ़ कर एक निर्जन स्थान की ओर चल दिऐ। जब लोगों को इसका पता चला, तो वे नगर-नगर से निकल कर पैदल ही उनकी खोज में चल पड़े।

14) नाव से उतर कर ईसा ने एक विशाल जनसमूह देखा। उन्हें उन लोगों पर तरस आया और उन्होंने उनके रोगियों को अच्छा किया।

15) सन्ध्या होने पर शिष्य उनके पास आ कर बोले, ’’यह स्थान निर्जन है और दिन ढल चुका है। लोगों को विदा कीजिए, जिससे वे गाँवों में जा कर अपने लिए खाना खरीद लें।‘‘

16) ईसा ने उत्तर दिया, ’’उन्हें जाने की ज़रूरत नहीं। तुम लोग ही उन्हें खाना दे दो।‘‘

17) इस पर शिष्यों ने कहा ’’पाँच रोटियों और दो मछलियों के सिवा यहाँ हमारे पास कुछ नहीं है‘‘।

18) ईसा ने कहा, उन्हें यहाँ मेरे पास ले आओ’’।

19) ईसा ने लोगों को घास पर बैठा देने का आदेश दे कर, वे पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ ले ली़। उन्होंने स्वर्ग की और आँखें उठा कर आशिष की प्रार्थना पढ़ी और रोटियाँ तोड़-तोड़ कर शिष्यों को दीं और शिष्यों ने लोगों को।

20) सबों ने खाया और खा कर तृप्त हो गये, और बचे हुए टुकड़ों से बारह टोकरे भर गये।

21) भोजन करने वालों में स्त्रिीयों और बच्चों के अतिरिक्त लगभग पाँच हज़ार पुरुष थे।



📚 मनन-चिंतन



परिवार की उस विपदा की स्थिति को हर माँ जानती है जब लोक डाउन लग जाता है और दुकानें बंद हो जाती हैं और दैनिक आवश्यक आपूर्ति रुक सी जाती है। येसु और उनके शिष्यों की इस मिशन यात्रा के लगातार तीन दिन हो गए हैं, और कुछ भी नहीं बचा होगा। परन्तु येसु लोगों की उस विशाल भीड़ के लिए खाने को कुछ नहीं है वाले संकट को एक पार्टी में बदल देते हैं। हम अपने संसाधनों पर छोड़ दें तो हम असहाय हैं, लेकिन येसु इससे निपट सकते हैं। वास्तव वहाँ लोग में कितने थे? हम नहीं जानते, क्योंकि संख्याएँ प्रतीकात्मक हैं। बाइबिल में 'बारह' हमें इज़राइल की जनजातियों की और संकेत करता है। तो टुकड़ों की बारह टोकरियाँ दिखाती हैं कि वो भीड़ यीशु के नए इस्राएल के बारह गोत्र हैं। जिस तरह से येसु रोटी लेते हैं और आशीर्वाद की प्रार्थना करते हैं। यह किसी भी ईसाई को पवित्र यूखारिस्त की याद दिलाना चाहिए। तो यह विशाल पार्टी एक प्रकार का यूखारिस्त था, भीड़ का केंद्र येसु थे जो उन्हें तृप्त कर रहे थे. निर्जन प्रदेश का यह भोज लोगों के लिए उत्साह उंमग ख़ुशी का समारोह बन गया। हर ख्रीस्तीय के लिए पवित्र यूखारिस्तभी ऐसे ही उत्साह, उंमग और आनंद का एक उत्सव होना चाहिए।



📚 REFLECTION




Every mother knows the disaster-situation of the family, day out when the shops turn out to be closed and the emergency supplies were left at home due to lock down. It had been three days now since Jesus had begun his mission with his disciples, and there must have been nothing left at all. Jesus turns the disaster into a party for that huge crowd of people. Left to our own resources we are helpless, but Jesus can deal with that. How many were there? We don’t know, for the numbers are symbolic. In the Bible ‘twelve’ alerts us to the tribes of Israel. So, the twelve baskets of scraps show that the crowd is the twelve tribes of Jesus’ new Israel. The way Jesus takes the bread and says the blessing must remind any Christian of the Eucharist. So, this gigantic field-party was a sort of Eucharist, Jesus is at the centre of his people, entertaining them and cheering them. It probably wasn’t very orderly. There would have been children enjoying the food and then running around and tripping up themselves and others as they sat on the grass. An African Mass is often like that, with lots of singing and dancing and celebration. That is why the Sunday Mass is so important: meet your friends and celebrate Christ together!


 -Br. Biniush Topno



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Praise the Lord!

Sunday, 1 August 2021 Mass Reading


Daily Mass Readings for Sunday, 1 August 2021

 New: Download Mass Readings in PDF – August 2021.


First Reading: Exodus 16: 2-4, 12-15


2 And all the congregation of the children of Israel murmured against Moses and Aaron in the wilderness.

3 And the children of Israel said to them: Would to God we had died by the hand of the Lord in the land of Egypt, when we sat over the flesh pots, and ate bread to the full. Why have you brought us into this desert, that you might destroy all the multitude with famine?

4 And the Lord said to Moses: Behold I will rain bread from heaven for you: let the people go forth, and gather what is sufficient for every day: that I may prove them whether they will walk in my law, or not.

12 I have heard the murmuring of the children of Israel: say to them: In the evening you shall eat flesh, and in the morning you shall have your fill of bread: and you shall know that I am the Lord your God.

13 So it came to pass in the evening, that quails coming up, covered the camp: and in the morning, a dew lay round about the camp.

14 And when it had covered the face of the earth, it appeared in the wilderness small, and as it were beaten with a pestle, like unto the hoar frost on the ground.

15 And when the children of Israel saw it, they said one to another: Manhu! which signifieth: What is this! for they knew not what it was. And Moses said to them: This is the bread, which the Lord hath given you to eat.


Responsorial Psalm: Psalms 78: 3-4, 23-24, 25, 54


R. (24b) The Lord gave them bread from heaven.

3 How great things have we heard and known, and our fathers have told us.

4 They have not been hidden from their children, in another generation. Declaring the praises of the Lord, and his powers, and his wonders which he hath done.

R. The Lord gave them bread from heaven.

23 And he had commanded the clouds from above, and had opened the doors of heaven.

24 And had rained down manna upon them to eat, and had given them the bread of heaven.

R. The Lord gave them bread from heaven.

25 Man ate the bread of angels: he sent them provisions in abundance.

54 And he brought them into the mountain of his sanctuary: the mountain which his right hand had purchased.

R. The Lord gave them bread from heaven.


Second Reading: Ephesians 4: 17, 20-24


17 This then I say and testify in the Lord: That henceforward you walk not as also the Gentiles walk in the vanity of their mind,

20 But you have not so learned Christ;

21 If so be that you have heard him, and have been taught in him, as the truth is in Jesus:

22 To put off, according to former conversation, the old man, who is corrupted according to the desire of error.

23 And be renewed in the spirit of your mind:

24 And put on the new man, who according to God is created in justice and holiness of truth.

Alleluia: Matthew 4: 4b

R. Alleluia, alleluia.

4b One does not live on bread alone, but by every word that comes forth from the mouth of God.

R. Alleluia, alleluia.

Gospel: John 6: 24-35


24 When therefore the multitude saw that Jesus was not there, nor his disciples, they took shipping, and came to Capharnaum, seeking for Jesus.

25 And when they had found him on the other side of the sea, they said to him: Rabbi, when camest thou hither?

26 Jesus answered them, and said: Amen, amen I say to you, you seek me, not because you have seen miracles, but because you did eat of the loaves, and were filled.

27 Labour not for the meat which perisheth, but for that which endureth unto life everlasting, which the Son of man will give you. For him hath God, the Father, sealed.

28 They said therefore unto him: What shall we do, that we may work the works of God?

29 Jesus answered, and said to them: This is the work of God, that you believe in him whom he hath sent.

30 They said therefore to him: What sign therefore dost thou shew, that we may see, and may believe thee? What dost thou work?

31 Our fathers did eat manna in the desert, as it is written: He gave them bread from heaven to eat.

32 Then Jesus said to them: Amen, amen I say to you; Moses gave you not bread from heaven, but my Father giveth you the true bread from heaven.

33 For the bread of God is that which cometh down from heaven, and giveth life to the world.

34 They said therefore unto him: Lord, give us always this bread.

35 And Jesus said to them: I am the bread of life: he that cometh to me shall not hunger: and he that believeth in me shall never thirst.


✍️Br. Biniush Topno

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Jai yesu 

इतवार, 01 अगस्त, 2021 वर्ष का अठारहवाँ सामान्य इतवार

 

इतवार, 01 अगस्त, 2021

वर्ष का अठारहवाँ सामान्य इतवार

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पहला पाठ : निर्गमन ग्रन्थ 16:2-4,12-15



2) इस्राएलियों का सारा समुदाय मरूभूमि में मूसा और हारून के विरुद्ध भुनभुनाने लगा।

3) इस्राएलियों ने उन से कहा, ''हम जिस समय मिस्र देश में मांस की हड्डियों के सामने बैठते थे और इच्छा-भर रोटी खाते थे, यदि हम उस समय प्रभु के हाथ मर गये होते, तो कितना अच्छा होता! आप हम को इस मरूभूमि में इसलिए ले आये हैं कि हम सब-के-सब भूखों मर जायें।''

4) प्रभु ने मूसा से कहा, ''मैं तुम लोगों के लिए आकाश से रोटी बरसाऊँगा। लोग बाहर निकल कर प्रतिदिन एक-एक दिन का भोजन बटोर लिया करेंगे। मैं इस तरह उनकी परीक्षा लूँगा और देखूँगा कि वे मेरी संहिता का पालन करते हैं या नहीं।

12) ''मैं इस्राएलियों का भुनभुनाना सुन चुका हूँ। तुम उन से यह कहना शाम को तुम लोग मांस खा सकोगे और सुबह इच्छा भर रोटी। तब तुम जान जाओगे कि मैं प्रभु तुम लोगों का ईश्वर हूँ।''

13) उसी शाम को बटेरों का झुण्डा उड़ता हुआ आया और छावनी पर बैठ गया और सुबह छावनी के चारों और कुहरा छाया रहा।

14) कुहरा दूर हो जाने पर मरुभूमि की जमीन पर पाले की तरह एक पतली दानेदार तह दिखाई पड़ी।

15) इस्राएली यह देखकर आपस में कहने लगे, ''मानहू'' अर्थात् ''यह क्या है?'' क्योंकि उन्हें मालूम नहीं था कि यह क्या था। मूसा ने उस से कहा, ''यह वही रोटी है, जिसे प्रभु तुम लोगों को खाने के लिए देता है।



दूसरा पाठ: एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 4:17,20-24



17) मैं आप लोगों से यह कहता हूँ और प्रभु के नाम पर यह अनुरोध करता हूँ कि आप अब से गैर-यहूदियों-जैसा आचरण नहीं करें,

20) आप लोगों को मसीह से ऐसी शिक्षा नहीं मिली।

21) यदि आप लोगों ने उनके विषय में सुना और उस सत्य के अनुसार शिक्षा ग्रहण की है, जो ईसा में प्रकट हुई,

22) तो आप लोगों को अपना पहला आचरण और पुराना स्वभाव त्याग देना चाहिए, क्योंकि वह बहकाने वाली दुर्वासनाओं के कारण बिगड़ता जा रहा है।

23) आप लोग पूर्ण रूप से नवीन आध्यात्मिक विचारधारा अपनायें

24) और एक नवीन स्वभाव धारण करें, जिसकी सृष्टि ईश्वर के अनुसार हुई है और जो धार्मिकता तथा सच्ची पवित्रता में व्यक्त होता है।




सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 6:24-35



24) जब उन्होंने देखा कि वहाँ न तो ईसा हैं और न उनके शिष्य ही, तो वे नावों पर सवार हुए और ईसा की खोज में कफरनाहूम चले गये।

25) उन्होंने समुद्र पार किया और ईसा को वहाँ पा कर उन से कहा, ‘‘गुरुवर! आप यहाँ कब आये?’’

26) ईसा ने उत्तर दिया, ‘‘मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- तुम चमत्कार देखने के कारण मुझे नहीं खोजते, बल्कि इसलिए कि तुम रोटियाँ खा कर तृप्त हो गये हो।

27) नश्वर भोजन के लिए नहीं, बल्कि उस भोजन के लिए परिश्रम करो, जो अनन्त जीवन तक बना रहता है और जिसे मानव पुत्र तुन्हें देगा ; क्योंकि पिता परमेश्वर ने मानव पुत्र को यह अधिकार दिया है।’’

28) लोगों ने उन से कहा, ‘‘ईश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए हमें क्या करना चाहिए?’’

29) ईसा ने उत्तर दिया, ‘‘ईश्वर की इच्छा यह है- उसने जिसे भेजा है, उस में विश्वास करो’’।

30) लोगों ने उन से कहा, ‘‘आप हमें कौन सा चमत्कार दिखा सकते हैं, जिसे देख कर हम आप में विश्वास करें? आप क्या कर सकते हैं?

31) हमारे पुरखों ने मरुभूमि में मन्ना खाया था, जैसा कि लिखा है- उसने खाने के लिए उन्हें स्वर्ग से रोटी दी।’’

32) ईसा ने उत्तर दिया, ‘‘मै तुम लोगों से यह कहता हूँ- मूसा ने तुम्हें जो दिया था, वह स्वर्ग की रोटी नहीं थी। मेरा पिता तुम्हें स्वर्ग की सच्ची रोटी देता है।

33) ईश्वर की रोटी तो वह है, जो स्वर्ग से उतर कर संसार को जीवन प्रदान करती है।’’

34) लोगों ने ईसा से कहा, ‘‘प्रभु! आप हमें सदा वही रोटी दिया करें’’।

35) उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘जीवन की रोटी मैं हूँ। जो मेरे पास आता है, उसे कभी भूख नहीं लगेगी और जो मुझ में विश्वास करता है, उसे कभी प्यास नहीं लगेगी।



📚 मनन-चिंतन



येसु आज के सुसमाचार में जब कहते हैं, 'उस भोजन के लिए परिश्रम करो जो अनन्त जीवन तक बना रहता है', तो भीड़ बहुत ही अच्छा एक सवाल उनसे करती है - आपने हमें अनन्त जीवन तक बने रहने वाले भोजन के लिए काम करने के लिए कहा है तो "ईश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए हमें क्या करना चाहिए?" यह उन लोगों का सवाल है जो एक गहरी आध्यात्मिकता की खोज कर रहे हैं। अक्सर हमारा अपना सवाल होता है, 'हमें क्या करना है? वे कौन से काम हैं जो ईश्वर हमें करने को कह रहे हैं?' प्रश्नों के उत्तर में, येसु एक बहुत ही आधारभूत उत्तर देते हैं, 'ईश्वर का कार्य यह है - जिसे उस ने भेजा है उस पर विश्वास करना। पहली बात यीशु हमसे कहते हैं वो है कि हम उन पर विश्वास करें, याने हम उनके साथ एक रिश्ता कायम करें; यही एक काम है जो ईश्वर हमसे चाहता है। आज के सुसमाचार के अंत में, यीशु सम्बोधित करे हैं - 'जो कोई मेरे पास आता है...' ऐसा कह कर वे हमें अपने साथ एक व्यक्तिगत मित्रता के बंधन में आमंत्रित करते हैं। यह वही व्यक्तिगत सम्बन्ध है जो वास्तव में हमारी गहरी इच्छाओं को पूरा करेगा। यदि हमने येसु पे ईमान रखा और उनसे दोस्ती कर ली तो हमारे अच्छे काम स्वतः ही हमारे येसु के साथ इस रिश्ते फुट निकलेंगे निकलेंगे। आज के सुसमाचार में, येसु ने हम सभी को उनके साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों पर अमल करने, उनके पास आने और उनमें विश्वास करने के लिए, आमंत्रित किया है। येसु के इस आमंत्रण के प्रति मेरा क्या जवाब है ?




📚 REFLECTION


When Jesus says in today's gospel, 'Work hard for the food that lasts for eternal life', the crowd asks him a very good question - you have made us work for the food that lasts eternal life, so - “What must we do to do the will of God?" This is a question for those who are searching for a deeper spirituality. Often, we have our own question, 'What are we supposed to do? What are the things that God is asking us to do?' In answer to that question, Jesus gives the very basic answer, 'This is the work of God; Believe in the one whom he sent. The first thing Jesus asks of us is to trust Him, and enter into a peronal relationship with Him; This is the only thing God wants us to do. At the end of today's gospel, Jesus addresses - 'Whoever comes to me..."

By saying this, he invites us to a personal friendship with him. It is this personal relationship that will truly satisfy our deepest desires. once we have this personal relationship with the Lord our good deeds will automatically follow from this relationship. In today's gospel, Jesus invites all of us to be bound with him in our personal relationship with Him, to come to Him, and to believe in Him. What is my answer to this invitation from Jesus?



मनन-चिंतन - 2



आज के सुसमाचार में लोग येसु से पूछते है कि ईश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए हमें क्या करना चाहिए?’’ तो वे उत्तर देते हैं, ’’ईश्वर की इच्छा यह है, उसने जिसे भेजा है उस में विश्वास करो।’’ संत पौलुस हमें समझाते हैं कि विश्वास सुनने से उत्पन्न होता है और जो सुनाया जाता है, वह मसीह का वचन है। (देखिए रोमियों 10:17) यानि ईश्वर का वचन सुनने से विश्वास उत्पन्न होता है। संत लूकस के सुसमाचार हम यह पाते हैं कि प्रभु येसु के रूपान्तरण के समय पिता ईश्वर की आवाज सुनाई देती है, “यह मेरा परमप्रिय पुत्र है। इसकी सुनो।’’ (लूकस 9:35) प्रभु में विश्वास करने के लिए हमें उनके वचनों को सुनना एवं उनका पालन करना पडता है। बपतिस्मा संस्कार या कलीसिया के अन्य संस्कारों को ग्रहण करना ईसा में विश्वास की निशानी है। लेकिन येसु में हमारे विश्वास की यह अभिव्यक्ति तभी वास्तविकता बनेगी जब हम इन संस्कारों की प्रतिज्ञाओं को हमारे जीवन में जीने की कोशिश करेंगे।

यह हमारे विश्वास की अनिवार्यता है कि हम ’’अपने मनोभावों को ईसा के मनोभावों के अनुसार बना ले।’’ (फिलिप्पियों 2:5) ख्रीस्तीय विश्वास की अभिन्नता को एफेसियों के नाम पत्र में समझाते हुए संत पौलुस कहते हैं, ’’तो आप लोगों को अपना पहला आचरण और पुराना स्वभाव त्याग देना चाहिए, क्योंकि वह बहकाने वाली दुर्वासनाओं के कारण बिगड़ता जा रहा है। आप लोग पूर्ण रूप से नवीन आध्यात्मिक विचारधारा अपनायें और एक नवीन स्वभाव धारण करें, जिसकी सृष्टि ईश्वर के अनुसार हुई है और जो धार्मिकता तथा सच्ची पवित्रता में व्यक्त होता है।’’(एफेसियों 4:22-24)

हमारा पुराना आचरण क्या है? मसीह में विश्वास के पूर्व शायद हम हमारे जीवन को सांसारिक समझ कर या भोग-विलास के अनुसार जी रहे थे। हमारे उस जीवन का एकमात्र उद्देश्य सुख प्राप्ति था। सच्चाई, नैतिकता, ईमानदारी, त्याग, क्षमा, आत्मसंयम, प्रेम आदि ईश्वरीय गुण हमारे लिए दूर की बातें थी। हमारे पुराने आचरण से केवल दुर्वासना एवं दुख उत्पन्न होती थी। यदि हम अपने पापमय जीवन की आदतों को जारी रखे और अपने को ख्रीस्त विश्वासी भी कहें तो यह गलत बात होगी। साथ ही साथ ऐसे विश्वास से हमारे जीवन में ज्यादा सकारात्मक असर नहीं पडेगा। हमें मसीह की उस शिक्षा के अनुसार जीवन ढालना चाहिए जिसकी शिक्षा हमें सुसमाचार में मिलती है। यदि हम ऐसा करेंगे तो अवश्य ही हम ईश्वर की इच्छा को भी पूरी करेंगे।

जकेयुस के जीवन में हम पुराने स्वाभाव को त्याग कर नवीन स्वाभाव धारण करने के जीवंत उदाहरण को पाते हैं। नाकेदार जकेयुस धन के लोभ में लोगों के साथ धोखाधडी कर सम्पत्ति अर्जित किया करता था। पैसा उसके लिए सबकुछ था। किन्तु येसु के सम्पर्क में आने तथा उनमें अपने विश्वास के कारण वह अपने पुराने स्वाभाव को त्यागते हुए कहता है, ’’प्रभु! देखिए मैं अपनी आधी सम्पत्ति गरीबों को दूँगा और जिन लोगों के साथ बेईमानी की है उन्हें उसका चौगुना लौटा दूँगा।’’ (लूकस 19:8) इसके विपरीत जब धनी युवक से कहा जाता कि ’’अपना सबकुछ बेचकर गरीबों में बांट दो और...तब आकर मेरा अनुसरण करो’’ (लूकस 18:22) तो वह ऐसा नहीं करता। धनी युवक अपने जीवन को येसु में विश्वास के अनुसार नही बदल पाता है। इसलिए वह अपने विश्वास की पूर्णता नहीं पहुँच पाता है। प्रभु की शिक्षा को सुनकर उनके अनेक अनुयायी कहते हैं, ’’यह तो कठोर शिक्षा है। इसे कौन मान सकता है?’’.....इसके बाद बहुत-से शिष्य अलग हो गये और उन्होंने उनका साथ छोड़ दिया।’’ (योहन 6:60,66) उनके इस कथन का अर्थ स्पष्ट है कि वे उनके जीवन को येसु की शिक्षा के अनुसार नहीं जी सकते।

कई बार हम सोचते हैं कि हम येसु में विश्वास करते हैं तथा हमारी मुक्ति के लिये यही काफी है। किन्तु हमें इस बात की विवेचना करना चाहिए कि क्या मेरा ख्रीस्तीय विश्वास जींवत विश्वास है जो मेरे दैनिक आचरण पर प्रभाव डालता है। हमें सोचना चाहिए कि क्या हम अपने दैनिक जीवन के निर्णयों को येसु की इच्छानुसार करने का प्रयास करते हैं? क्या हम हमारे सोच-विचारों में ईश्वर की बातों पर मनन करते हैं? हमारे आपसी संबंधों को क्या हम ईश्वर की दृष्टि से देखते हैं? पेत्रुस जब येसु को दुखभोग से दूर रहने की सलाह देते हैं तो येसु कहते हैं, ’’तुम ईश्वर की बातें नहीं, बल्कि मनुष्यों की बातें सोचते हो।’’ (मत्ती 16:23) पेत्रुस शायद हमारी तरह इस सोच में था कि उसके विचार ईश्वर की इच्छा है किन्तु येसु पेत्रुस को ईश्वर की इच्छा के अनुसार सोचने की सीख देते हैं। आज शायद कलीसिया भी हमसे पूछती हैं, ’क्या हमारा जीवन ख्रीस्तीय विश्वास के अनुरूप है’।


Br. Biniush Topno


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