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Mass Readings for Sunday, 11 July 2021

Mass ReadingDaily Mass Readings for Sunday, 11 July 2021

Daily Mass Readings for Sunday, 11 July 2021



First Reading: Amos 7: 12-15

12 And Amasias said to Amos: Thou seer, go, flee away into the land of Juda: and eat bread there, and prophesy there.


c13t prophesy not again any more in Bethel: because it is the king’s sanctuary, and it is the house of the kingdom.

14 And Amos answered and said to Amasias: I am not a prophet, nor am I the son of a prophet: but I am a herdsman plucking wild figs.

15 And the Lord took me when I followed the flock, and the Lord said to me: Go, prophesy to my people Israel.

Responsorial Psalm: Psalms 85: 9-10, 11-12, 13-14

R. (8) Lord, let us see your kindness, and grant us your salvation.

9 I will hear what the Lord God will speak in me: for he will speak peace unto his people: And unto his saints: and unto them that are converted to the heart.

10 Surely his salvation is near to them that fear him: that glory may dwell in our land.

R. Lord, let us see your kindness, and grant us your salvation.

11 Mercy and truth have met each other: justice and peace have kissed.

12 Truth is sprung out of the earth: and justice hath looked down from heaven.

R. Lord, let us see your kindness, and grant us your salvation.

13 For the Lord will give goodness: and our earth shall yield her fruit.

14 Justice shall walk before him: and shall set his steps in the way.

R. Lord, let us see your kindness, and grant us your salvation.

Second Reading: Ephesians 1: 3-14

3 Blessed be the God and Father of our Lord Jesus Christ, who hath blessed us with spiritual blessings in heavenly places, in Christ:

4 As he chose us in him before the foundation of the world, that we should be holy and unspotted in his sight in charity.

5 Who hath predestinated us unto the adoption of children through Jesus Christ unto himself: according to the purpose of his will:

6 Unto the praise of the glory of his grace, in which he hath graced us in his beloved son.

7 In whom we have redemption through his blood, the remission of sins, according to the riches of his grace,

8 Which hath superabounded in us in all wisdom and prudence,

9 That he might make known unto us the mystery of his will, according to his good pleasure, which he hath purposed in him,

10 In the dispensation of the fulness of times, to re-establish all things in Christ, that are in heaven and on earth, in him.

11 In whom we also are called by lot, being predestinated according to the purpose of him who worketh all things according to the counsel of his will.

12 That we may be unto the praise of his glory, we who before hoped Christ:

13 In whom you also, after you had heard the word of truth, (the gospel of your salvation;) in whom also believing, you were signed with the holy Spirit of promise,

14 Who is the pledge of our inheritance, unto the redemption of acquisition, unto the praise of his glory.

Alleluia: Ephesians 1: 17-18

R. Alleluia, alleluia.

17-18 May the Father of our Lord Jesus Christ enlighten the eyes of our hearts, that we may know what is the hope that belongs to our call.

R. Alleluia, alleluia.

Gospel: Mark 6: 7-13

7 And he called the twelve; and began to send them two and two, and gave them power over unclean spirits.

8 And he commanded them that they should take nothing for the way, but a staff only: no scrip, no bread, nor money in their purse,

9 But to be shod with sandals, and that they should not put on two coats.

10 And he said to them: Wheresoever you shall enter into an house, there abide till you depart from that place.

11 And whosoever shall not receive you, nor hear you; going forth from thence, shake off the dust from your feet for a testimony to them.

12 And going forth they preached that men should do penance:

13 And they cast out many devils, and anointed with oil many that were sick, and healed them.

🙏Praise the lord


आज का पवित्र वचन इतवार, 11 जुलाई, 2021 वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य इतवार

 

इतवार, 11 जुलाई, 2021

वर्ष का पन्द्रहवाँ सामान्य इतवार



पहला पाठ : आमोस का ग्रन्थ 7:12-15



12) बेतेल के याजक अमस्या ने आमोस से कहा, ‘‘नबी! यहाँ से चले जाओ। यूदा के देश भाग जाओ। वहाँ भवियवाणी करते हुए अपनी जीविका चलाओ।

13) बेतेल में भवियवाणी करना बन्द करो; क्योंकि यह तो राजकीय पुण्य-स्थान है, यह राज मन्दिर है।’’

14) आमेास ने अमस्या को यह उत्तर दिया, ‘‘मैं न तो नबी था और न नबी की सन्तान। मैं चरवाहा था और गूलर के पेड़ छाँटने वाला।

15) मैं झुण्ड चरा ही रहा था कि प्रभु ने मुझे बुलाया मुझ से यह कहा, ‘जाओ! मेरी प्रजा इस्राएल के लिए भवियवाणी करो’।



दूसरा पाठ: एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 1:3-14



3) धन्य है हमारे प्रभु ईसा मसीह का ईश्वर और पिता! उसने मसीह द्वारा हम लोगों को स्वर्ग के हर प्रकार के आध्यात्मिक वरदान प्रदान किये हैं।

4) उसने संसार की सृष्टि से पहले मसीह में हम को चुना, जिससे हम मसीह से संयुक्त हो कर उसकी दृष्टि में पवित्र तथा निष्कलंक बनें।

5) उसने प्रेम से प्रेरित हो कर आदि में ही निर्धारित किया कि हम ईसा मसीह द्वारा उसके दत्तक पुत्र बनेंगे। इस प्रकार उसने अपनी मंगलमय इच्छा के अनुसार

6) अपने अनुग्रह की महिमा प्रकट की है। वह अनुग्रह हमें उसके प्रिय पुत्र द्वारा मिला है,

7) जो अपने रक्त द्वारा हमें मुक्ति अर्थात् अपराधों की क्षमा दिलाते हैं। यह ईश्वर की अपार कृपा का परिणाम है,

8) जिसके द्वारा वह हमें प्रज्ञा तथा बुद्धि प्रदान करता रहता है।

9 (9-10) उसने अपनी मंगलमय इच्छा के अनुसार निश्चय किया था कि वह समय पूरा हो जाने पर स्वर्ग तथा पृथ्वी में जो कुछ है, वह सब मसीह के अधीन कर एकता में बाँध देगा। उसने अपने संकल्प का यह रहस्य हम पर प्रकट किया है।

11 (11-12) ईश्वर सब बातों में अपने मन की योजना पूरी करता है। उसके अनुसार उसने निर्धारित किया है कि हम (यहूदी) मसीह द्वारा बुलाये जायें और हम लोगों के कारण उसकी महिमा की स्तुति हो। हम लोगों ने तो सब से पहले मसीह पर भरोसा रखा था।

13) आप लोगों ने भी सत्य का वचन, अपनी मुक्ति का सुसमाचार, सुनने के बाद मसीह में विश्वास किया है और आप पर उस पवित्र आत्मा की मुहर लग गयी, जिसकी प्रतिज्ञा की गयी थी।

14) वह हमारी विरासत का आश्वासन है और ईश्वर की प्रजा की मुक्ति की तैयारी, जिससे उसकी महिमा की स्तुति हो।



सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 6:7-13



7) ईसा शिक्षा देते हुए गाँव-गाँव घूमते थे। वे बारहों को अपने पास बुला कर और उन्हें अपदूतों पर अधिकार दे कर, दो-दो करके, भेजने लगे।

8) ईसा ने आदेश दिया कि वे लाठी के सिवा रास्ते के लिए कुछ भी नहीं ले जायें- न रोटी, न झोली, न फेंटे में पैसा।

9) वे पैरों में चप्पल बाँधें और दो कुरते नहीं पहनें

10) उन्होंने उन से कहा, ’’जिस घर में ठहरने जाओ, नगर से विदा होने तक वहीं रहो!

11) यदि किसी स्थान पर लोग तुम्हारा स्वागत न करें और तुम्हारी बातें न सुनें, तो वहाँ से निकलने पर उन्हें चेतावनी देने के लिए अपने पैरों की धूल झाड़ दो।’’

12) वे चले गये। उन्होंने लोगों को पश्चात्ताप का उपदेश दिया,

13) बहुत-से अपदूतों को निकाला और बहुत-से रोगियों पर तेल लगा कर उन्हें चंगा किया।



📚 मनन-चिंतन



क्या कभी आपने खुद से गहराई से पूछा है, कि आपके जीवन का उद्देश्य क्या है? आपको ईश्वर ने इस दुनिया में क्यों भेजा है? जब तक हमें इन दोनों सवालों के जवाब नहीं मिलेंगे तब तक हम यह नहीं जान पायेंगे कि हम सही रास्ते पर चल रहे हैं, या सही रास्ते से भटक गये हैं. अक्सर कई बार हम अपने जीवन का उद्देश्य जाने बगैर जीवन की भाग-दौड़ में लगे रहते हैं, जब तक कि ईश्वर हमें कुछ घटनाओं के द्वारा या कुछ लोगों के द्वारा झकझोर कर हमें अपनी ईश्वरीय योजना और इच्छा का आभास न करा दे. ऐसा ही हुआ नबी आमोस के जीवन में. आज के पहले पाठ में हम देखते हैं कि वह न तो कोई नबी थे न उनके बाप-दादा नबी थे, वह गूलर काटते थे और भेड़ चराते थे, लेकिन ईश्वर ने उन्हें चुना, बुलाया और नबी नियुक्त किया. गूलर के पेड़ों और भेड़ों से बढ़कर भी उनके लिए कुछ और था.

हमारी धर्मशिक्षा हमें सिखाती है कि हम अपने बप्तिस्मा संस्कार द्वारा एक नबी, पुरोहित और राजा के रूप में नियुक्त होते हैं. नबी यानि कि हमें ईश्वर ज़िम्मेदारी देते हैं कि हमें उनकी बात दुनिया तक पहुँचानी है, उनकी आवाज़ बनना है. जब भी हमारे आस-पास कुछ गलत होता है, लोग ईश्वर के रास्ते से भटक कर गलत रास्ते पर चले जाते हैं तो हमें धर्मग्रन्थ के नबियों की भांति उन्हें ईश्वर का प्यार याद दिलाना है, ईश्वर की इच्छा याद दिलानी है. ज़रूरी नहीं है, कि लोग हमारी सुनेंगे, हो सकता है प्रभु येसु कि भांति हमारा तिरस्कार भी करेंगे, हम पर अत्याचार भी करेंगे, लेकिन इससे हमारी ज़िम्मेदारी ख़त्म नहीं हो जाती. प्रभु येसु आज के सुसमाचार में हमें याद दिलाते हैं कि यदि लोग तुम्हारा स्वागत ना करें तो वहाँ से आगे बढ़ जाओ. प्रभु येसु के आगमन तक हमारा काम जारी रहना चाहिए.

ईश्वर हमें एक पुरोहित भी बनने के लिए बुलाते हैं. ज़रूरी नहीं है कि कई वर्षों की शिक्षा और प्रशिक्षण से ही हम पुरोहित बन सकते हैं, हमारे बप्तिस्मा के द्वारा ईश्वर हम में से हरेक व्यक्ति को एक पुरोहित की ज़िम्मेदारी सौंपते हैं. एक पुरोहित का क्या काम है? एक पुरोहित लोगों की तरफ से ईश्वर तक उनकी प्रार्थनाएं पहुंचाता है और ईश्वर की तरफ लोगों के लिए मध्यस्थ बनता है. वह लोगों के पापों के लिए और खुद के पापों के लिए बलिदान चढ़ाता है. अक्सर हम दूसरों के पापों को देखकर उनसे घृणा करने लगते हैं, उनके परिवर्तन के लिए कुछ भी नहीं करते. प्रभु येसु धर्मियों की अपेक्षा पापियों को बचाने आये हैं (मारकुस 2:17). क्या कभी हमने पापियों के मन परिवर्तन के लिए प्रार्थना की है, मिस्सा बलिदान चढ़वाया है? दूसरों को छोडिये, कभी-कभी हम अपने पापों के लिए भी पश्चाताप नहीं करते बल्कि उन्हें नज़र-अंदाज़ कर देते हैं. प्रभु येसु ने जब सुसमाचार प्रचार की शुरुआत की तो पश्चाताप के आह्वान के साथ की.

सन्त पौलुस हमें याद दिलाते हैं कि यदि हम प्रभु येसु के दुःख-भोग में भागी बनते हैं तो उनकी महिमा में भी सहभागी होंगे. अगर हम उनकी मृत्यु के सहभागी होते हैं तो उनके साथ अनन्त जीवन के सहभागी भी होंगे. (रोमियों 6:8). हम जानते हैं कि प्रभु येसु को सब कुछ के ऊपर अधिकार मिला है, स्वर्ग और सारी सृष्टि पर अधिकार मिला है (मत्ती 28:18). यह अधिकार उन्हें सारी मानव जाति के लिये दुःख उठाने के कारण मिला है. यदि हम एक नबी और पुरोहित होने के कारण कष्ट उठाते हैं, प्रभु येसु के नाम में विश्वास करने के कारण सताये जाते हैं तो निश्चय ही हम सारी सृष्टि के राजा अधिराज के साथ राज भी करेंगे. इसलिए ईश्वर हमें राजा होने का अधिकार देते हैं. आईये हम प्रार्थना करें कि ईश्वर हमें हमारे जीवन के वास्तविक उद्देश्य की याद दिलाये, और अपने जीवन में उसकी इच्छा पूरी करने की शक्ति दे. आमेन.



📚 REFLECTION




Have your deeply reflected about the purpose of your life in this world? Why God has sent you in this world? Till we discover the answers to these questions, we wouldn’t know whether we are on the right path or have lost the way. Very often we forget our real purpose in this world and keep ourselves busy in the ways of the world till God intervenes in our life through various incidences or persons and reminds us His purpose of sending us into this world. We have several such examples of God intervening in people’s lives. Such an example can be seen in the first reading of today. Prophet Amos says he was not a prophet nor was his father. He was a dresser of sycamore trees and a herdsman but God called him for His work. There was something beyond the sycamore trees and herding the sheep for prophet Amos.

Our Catechism teaches us that our Baptism makes us a prophet, a king and a priest (CCC 783). The role of a prophet is to listen to God and reach His message to the people; he is called to be the voice of God to the people. Whenever there is something immoral or wrong taking place around us, when we see people loosing God’s path and going astray, in such situation we need to remind them of God’s love for them like prophets of old, we need to remind them God’s purpose and will or them. It is not necessary that people will welcome and accept us and listen to us; it is possible and sure that we will be rejected like Jesus our Lord, even persecuted but our obligation to share the mission of Jesus does not end here. Jesus reminds us in the gospel today, if people do not welcome you, then move on to next place. The mission must continue without interruption till our Lord comes again.

God has called us to be priests, a holy nation. We share in the universal priesthood of Jesus hence Jesus gives us the same mission as given to his own disciples. What does a priest do? A priest mediates people to God and works as mediator from God to the people. He offers sacrifice for the sins of the people and also for his own sins. Very often when we see others sinning we start hating them and condemning them, doing nothing for their conversion of heart. More than righteous, Jesus came to call sinners (cf Mark 2:17). Did we ever pray for the repentance of the sins of others, offered a mass for the conversion of the sinners? Forget about others, we don’t even bother to think and repent for our sins, we close our eyes towards our own sins. In fact Jesus began his ministry with a call to repent.

St. Paul reminds us about our share in the sufferings and glory of Christ. If we have died with him, then we shall also reign with him (cf Romans 6:8). We know that everything has been handed over to Christ, he says, “All authority in heaven and on earth has been given to me.” (Matthew 28:18). This authority has been given after the suffering of Jesus for whole humanity. Glorification or authority comes only after suffering and giving up oneself. If we face sufferings and persecutions because of being a prophet and a priest and because of the name of Jesus, then we will certainly reign with the most high king of the universe. God gives us a share in His kingship. Let us pray to God to give us the grace to discover the real purpose of our life and seek to do His will in everything. Amen.




मनन-चिंतन



पिछले इतवार के सुसमाचार में हमने प्रभु को लोगों द्वारा तिरस्कृत हुए पाया। इसलिए हम आज के सुसमाचार में प्रभु को अपनी रणनीति बदलते हुए देखते है। प्रभु अपने शिष्यों को स्वर्गराज्य के रह्स्यों की शिक्षा दे कर दो दो करके भेजते हैं। इससे प्रभु हमें एक सीख जरूर देते हैं कि जब भी हम कुछ कार्य करने निकलते हैं तो हमारे पास एक वैकल्पिक योजना होनी चाहिए। एक नहीं चले तो दूसरा चलेगा। अपने शिष्यों को भेजते समय प्रभु द्वारा दिये गये अनुदेशों या हिदायतों पर हम आज मनन चिन्तन करेंगे।

1. साधारण जीवन शैली

2. अच्छे लोगों की संगति

3. तिरस्कृति में धूल झाडना

4. लोगों को चंगा करना

1. साधारण जीवन शैली :- एक बार एक व्यक्ति एक ऋषि के दर्शन करने आया और वह उस संत का कमरा देख कर चकित हो गया। उसके कमरें में एक भी फर्नीचर नहीं था। उसने ऋषि से पूछा कि यह बहुत बुरी बात है कि आपके घर में मेहमान को बिठाने के लिए एक कुर्सी तक नहीं है। तो साधू ने उनसे पूछा आपकी कुर्सी कहाँ है? उसने कहा कि मुझे कुर्सी की ज़रूरत नहीं है क्योंकि मैं एक मुसाफिर हूँ। तब ऋषि ने उनसे कहा कि मैं भी इस संसार में एक मुसाफिर हूँ।

रेल गाडी के डिब्बे में कई जगह हम यह लिखा हुआ पाते हैं – Less luggage, more comfort - जितना कम वजन उतना आराम। आज के सुसमाचार में प्रभु यही बात अपने शिष्यों को समझाते हैं कि सुसमाचार प्रचार करते समय हम अपने आप को जितना विमुक्त रखते हैं, वह काम उतना ज़्यादा आसान बनता है। प्रभु अपने शिष्यों को मौलिक या बुनियादी आवश्यकताओं से भी वंचित कर देते हैं। उनका मतलब यह था कि एक सुसमाचार प्रचारक का मन और हृदय हमेशा प्रभु पर और केवल प्रभु पर निर्भर रहना चाहिए।

2. अच्छे लोगों की संगति :- हम तारामंडल में काले छेद के बारे में ये पढ़ते हैं। उनके पास इतनी ताकत होती है कि आस पास से गुजरने वाले हर तारे को अपनी ओर आकर्षित करके एक चक्की की तरह काम करते हुए उसे काला कर देता है। इसी प्रकार जब हम बुरे या गलत लोगों की संगति में आते है तब हम भी उसके जैसे बदल सकते हैं। इसीलिए प्रभु उन्हें चेतावनी देते हुए कहते हैं कि गाँव छोडने तक उन्हें अच्छे लोगों की संगति में रहना है।

3. धूल झाडना :- यहूदी लोग दूसरे गैरयहूदियों के देश घूमकर वापस आते समय उनके पैर और कपडे से धूल झाडने की एक प्रथा प्रचलित थी। इसी परंपरा को याद दिलाते हुए प्रभु अपने शिष्यों से कहते हैं कि जो उनका प्रवचन को अस्वीकार करते हैं, जो उनकी निन्दा करते हैं, जो उन पर विश्वास नहीं करते हैं, उनके वहाँ ठहरने की ज़रूरत नहीं है। आज के पहले पाठ में हम देखते हैं कि इस्राएल के राजा येरोबाम यहूदियों को आराधना के लिए येरूसलेम नहीं भेजता है बल्कि अपने देश में बाल देवता के लिए मंदिर बना कर लोगों को बाल देवता की आराधना करने के लिए बाध्य करता है। ना नबी आमोस ने इसके विरुध्द आवाज उठायी और न ही बतेल मंदिर के अमासिया ने उनकी निन्दा की। ईश्वरीय कार्य में निन्दा या तिरस्कार हमें मिलते रहेंगे लेकिन लोगों को चेतावनी देना हमारा कर्तव्य है। धूल झाडना एक प्रकार का चेतावनी है।

4. लोगों को चंगा करना :- आज की दुनिया को चंगाई की जरूरत है क्योंकि लोग विभिन्न प्रकार की बीमारियों से गुजर रहे हैं। शारीरिक और मानसिक बीमारियों की चंगाई के अतिरिक्त आज समाज के हर क्षेत्र में फैल रही सामाजिक बीमारियों को भी चंगाई की आवश्यकता है। समाज में एक दूसरे के प्रति नफरत भेदभाव के व्यवहार, असहिष्णुता, नैतिक मूल्यों का उडेल, धोखेबाजी और अस्वस्थ प्रतियोगिता आदि इसके कुछ उदाहरण है। प्रभु ने हमें सबको इन बीमारियों से चंगाई प्रदान करने का माध्यम बनाया हैं।

हमें अपनी इस बुलाहट को पहचानना जरूरी है। हम प्रभु के इस मिशन-कार्य को गंभीरता से लें। लोगों की निन्दा से हताश न होते हुए अच्छे लोगों की संगति में रहते हुए प्रभु की योजना के अनुसार हम काम करते रहें, लोगों को और समाज को चंगाई देते रहें। प्रभु आज हम से यही अपेक्षा करते हैं।


-Br. Biniush Topno

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शनिवार, 10 जुलाई, 2021 वर्ष का चौदहवाँ सामान्य सप्ताह

 

शनिवार, 10 जुलाई, 2021

वर्ष का चौदहवाँ सामान्य सप्ताह

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ : उत्पत्ति 49:29-32, 50:15-26a



29) याकूब ने अपने पुत्रों को यह आदेश दिया, ''मैं शीघ्र ही अपने पितरों में सम्मिलित हो जाऊँगा। मुझे मेरे पूर्वजों के साथ एफ्रोन नामक हित्ती के खेत की गुफा में दफ़नाओ।

30) वह गुफा कनान देश में मामरे के पूर्व मकपेला के खेत में हैं।

31) इब्राहीम ने उसे निजी मक़बरे के लिए एफ्रोन हित्ती से ख़रीदा था।

32) वहाँ इब्राहीम और उनकी पत्नी दफ़नाये गये, वहाँ इसहाक और उनकी पत्नी रिबेका दफ़नाये गये और वहाँ मैंने लेआ को दफ़नाया।''

15) यूसुफ़ के भाई अपने पिता के देहान्त के बाद आपस में कहने लगे, ''हो सकता हैं कि यूसुफ़ हम से बैर करे और हमने उसके साथ जो बुराई की है, उसका बदला चुकाये।''

16) इसलिए उन्होंने यूसुफ़ के पास यह सन्देश भेजा,

17) ''मरने से पहले आपके पिताजी ने आप को यह सन्देश कहला भेजा था - ''तुम्हारे भाइयों ने तुम्हारे साथ अन्याय किया है। मेरा निवेदन है कि तुम अपने भाइयों का अपराध और पाप क्षमा कर दो।'' इसलिए आप अपने पिता के ईश्वर के सेवकों के अपराध क्षमा कर दीजिए।'' उनकी ये बातें सुन कर यूसुफ़ फूट-फूट कर रोने लगा।

18) यूसुफ़ के भाइयों ने स्वयं आ कर उसे दण्डवत् किया और कहा, ''आप जैसा चाहें, हमारे साथ वैसा करें। हम आपके दास हैं।''

19) यूसुफ़ ने कहा, ''डरिए नहीं। क्या मैं ईश्वर का स्थान ले सकता हूँ?

20) आपने हमारे साथ बुराई करनी चाही, किन्तु ईश्वर ने उसे भलाई में परिणत कर दिया और इस प्रकार बहुत-से लोगों के प्राण बचाये, जैसा कि आजकल हो रहा है।

21) इसलिए डरिए नहीं। मैं आपके और आपके बच्चों के जीवन-निर्वाह का प्रबन्ध करूँगा।'' इस प्रकार यूसुफ़ ने अपनी प्रेम पूर्ण बातों से उनकी आशंका दूर कर दी।

22) यूसुफ़ और उसके पिता का परिवार मिस्र में निवास करता रहा। यूसुफ़ एक सौ दस वर्ष की उमर तक जीता रहा।

23) और उसने तीसरी पीढ़ी तक एफ्रईम के बाल-बच्चों को देखा और मनस्से के पुत्र माकीर के बाल-बच्चों को भी अपनी गोद में खिलाया।

24) अन्त में यूसुफ़ ने अपने भाइयों से कहा, मैं मरने पर हूँ। ईश्वर अवश्य ही तुम लोगों की सुध लेगा और तुम्हें इस देश से निकाल कर उस देश ले जायेगा, जिसे उसने शपथ खा कर इब्राहीम, इसहाक और याकूब को देने की प्रतिज्ञा की हैं।''

25) यूसुफ़ ने इस्राएल के पुत्रों को यह शपथ दिलायी कि जब ईश्वर तुम लोगों की सुध लेगा, तो यहाँ से मेरी हड्डियाँ अपने साथ ले जाना।

26) इसके बाद यूसुफ़ का देहान्त एक सौ दस वर्ष की उमर में हो गया। उसका शव मसालों से संलिप्त कर मिस्र में ही एक शव-मंजूषा में रख दिया गया।



सुसमाचार : मत्ती 10:24-33



24) ’’न शिष्य गुरू से बड़ा होता है और न सेवक अपने स्वामी से।

25) शिष्य के लिए अपने गुरू जैसा और सेवक के लिए अपने स्वामी जैसा बन जाना ही बहुत है। यदि लोगों ने घर के स्वामी को बेलज़ेबुल कहा है, तो वे उसके घर वालों को क्या नहीं कहेंगे?

26) ’’इसलिए उन से नहीं डरो। ऐसा कुछ भी गुप्त नहीं है, जो प्रकाश में नहीं लाया जायेगा और ऐसा कुछ भी छिपा हुआ नहीं है, जो प्रकट नहीं किया जावेगा।

27) मैं जो तुम से अंधेरे में कहता हूँ, उसे तुम उजाले में सुनाओ। जो तुम्हें फुस-फुसाहटों में कहा जाता है, उसे तुम पुकार-पुकार कर कह दो।

28) उन से नहीं डरो, जो शरीर को मार डालते हैं, किन्तु आत्मा को नहीं मार सकते, बल्कि उससे डरो, जो शरीर और आत्मा दोनों का नरक में सर्वनाश कर सकता है।

29) ’’क्या एक पैसे में दो गौरैयाँ नहीं बिकतीं? फिर भी तुम्हारे पिता के अनजाने में उन में से एक भी धरती पर नहीं गिरती।

30) हाँ, तुम्हारे सिर का बाल बाल गिना हुआ है।

31) इसलिए नहीं डरो। तुम बहुतेरी गौरैयों से बढ़ कर हो।

32) ’’जो मुझे मनुष्यों के सामने स्वीकार करेगा, उसे मैं भी अपने स्वर्गिक पिता के सामने स्वीकार करूँगा।

33) जो मुझे मनुष्यों के सामने अस्वीकार करेगा, उसे मैं भी अपने स्वर्गिक पिता के सामने अस्वीकार करूँगा।


📚 मनन-चिंतन



मिशन कार्य की चुनौतियों और कठिनाइयों का वर्णन करने के बाद आज का सुसमाचार हमें हिम्मत और आशा की नई किरण देता है. और वह आशा यह है कि चाहे प्रभु के नाम के कारण हम पर कितने भी कष्ट और विपत्तियाँ आयें, उन सब में ईश्वर हमारे साथ है. झूठ, अन्याय और अत्याचार के इस युद्ध में प्रभु हमारे साथ लड़ता है, और अंत में हमें विजय दिलाएगा. प्रभु हमसे वादा करते हैं कि कोई भी तुम्हारे सिर का बाल भी बाँका नहीं कर सकता. जब ईश्वर गौरैया जैसे छोटे-छोटे पक्षियों और जीवों का इतना ख्याल रखता है, घास-फूँस को भी सुन्दर फूलों से सजाता है, तो सोचो तुम्हारा कितना ख्याल रखेगा, जिसे उसने अपने ही प्रतिरूप में बनाया है, जिसे सारी सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ बनाया है. उसने हमें अपनी हथेली पर खोद रखा है, (इसायाह 49:16), हम उसकी आँखों की पुतली के समान हैं.

प्रभु जब कहते हैं कि मेरा अनुसरण करो, इसका मतलब यही नहीं कि मैंने जो कहा है, उसका पालन करो, बल्कि यह भी कि जैसा जीवन मैंने जिया है, वैसा ही तुम भी जियो. अर्थात् अगर प्रभु येसु ने सत्य के लिए, न्याय के लिए दूसरों के पापों के लिए कष्ट उठाया है, मौत को गले लगाया है, तो निश्चय ही अगर हम प्रभु येसु के शिष्य हैं तो हमें भी उन्हीं हालातों से गुजरना पड़ेगा. गुरु कभी भी शिष्य से बड़ा नहीं हो सकता. अगर गुरु ने कष्ट उठाया है, अगर हमारे गुरु को क्रूस की कष्टकारी मृत्यु इस संसार ने दी है, तो हमें वही संसार कैसे अपना सकता है? लेकिन प्रभु येसु हमें याद दिलाते हैं कि ये सिर्फ शरीर को मार सकते हैं, लेकिन आत्मा को नहीं. न्याय के दिन सबको हिसाब देना होगा. प्रभु से कृपा माँगें कि हम अपने जीवन में प्रभु येसु का सच्चा अनुकरण कर सकें. आमेन.




📚 REFLECTION



After describing the challenges and hurdles in the Mission, today’s gospel gives us a ray of hope and courage. And that hope and courage is this – Whatever difficulties and persecutions we face on account of the gospel, God is with us. God is with us in this our battle against darkness, injustice and persecutions, and He only will grant us victory. Jesus assures us that no one touch even the hair of head. If God cares for insignificant sparrow, If He can dress the insignificant grass and plants with beautiful flowers, then why would He not care for us, whom He has created us in His own image, who has created us as best of His creation. He has inscribed each one of us on the palm of His hands (Isaiah 49:16), He takes care of us like the apple of His eyes.

When Jesus says, ‘follow me’ it does not only means that we need to obey the teachings that he gives us, but also live the life that he lived. If Jesus suffered for Justice and truth and died to save others, then we are to follow the same, we are to face the same. Jesus says, a disciple is not greater than the teacher. If our teacher and guru has suffered, if he was given a painful death on the cross, then how can the world accept us? Jesus also assures us that they can only harm us bodily but cannot do anything to the soul. Everyone will be accountable on the day of judgement. Let us pray to God to give us the grace to truly follow Jesus our Guru.



 -Br Biniush Topno


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शुक्रवार, 09 जुलाई, 2021 वर्ष का चौदहवाँ सामान्य सप्ताह

 

शुक्रवार, 09 जुलाई, 2021

वर्ष का चौदहवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : उत्पत्ति 46:1-7, 28-30



1) इस्राएल ने अपनी समस्त सम्पत्ति के साथ प्रस्थान किया और बएर-शेबा पहँुच कर अपने पिता इसहाक के ईश्वर को बलि चढ़ायी।

2) ईश्वर ने रात को एक दिव्य दर्शन में इस्राएल से कहा, ''याकूब! याकूब!'' और उसने उत्तर दिया, ''मैं प्रस्तुत हूँ।''

3) तब ईश्वर ने कहा, ''मैं ईश्वर, तुम्हारे पिता का ईश्वर हूँ। मिस्र देश जाने से मत डरो, क्योंकि मैं वहाँ तुम्हारे द्वारा एक महान् राष्ट्र उत्पन्न करूँगा।

4) मैं स्वयं तुम्हारे साथ मिस्र देश जाऊँगा और तुम को फिर वहाँ से निकाल लाऊँगा। यूसुफ़ तुम्हारे मरने पर तुम्हारी आँखें बन्द कर देगा।''

5) याकूब बएर-शेबा से चला गया। इस्राएल के पुत्रों ने अपने पिता याकूब, अपने छोटे बच्चों और अपनी पत्नियों को उन रथों पर चढ़ाया, जिन्हें फिराउन ने उन्हें ले आने के लिए भेजा था।

6) वे अपना पशुधन और जो कुछ उन्होंने कनान में एकत्र किया था, वह सब अपने साथ ले गये। याकूब अपने सब वंशजों के साथ मिस्र देश पहुँचा।

7) वह अपने पुत्रों और पौत्रों, अपनी पुत्रियाँ और अपनी पौत्रियों, अपने सब वंशजों को मिस्र ले आया।

28) याकूब ने यूदा को अपने आगे भेज कर यूसुफ़ से निवेदन किया कि वह गोशेन में उस से मिलने आये।

29) जब वे गोशेन पहुँचे, तो यूसुफ़ आपना रथ माँगा कर अपने पिता इस्राएल से मिलने के लिए गोशेन गया। अपने पिता से मिल कर उसने उसे गले लगा लिया और उस से लिपट कर वह देर तक रोता रहा।

30) इस्राएल ने यूसुफ़ से कहा, ''अब तो मैं सुखपूर्वक मृत्यु की प्रतीक्षा करूँगा, क्योंकि मैं फिर तुम्हारे दर्शन कर सका और जान गया हूँ कि तुम जीवित हो।''



सुसमाचार : मत्ती 10:16-23



16) ’’देखो, मैं तुम्हें भेडि़यों के बीच भेड़ों क़ी तरह भेजता हूँ। इसलिए साँप की तरह चतुर और कपोत की तरह निष्कपट बनो।

17) ’’मनुष्यों से सावधान रहो। वे तुम्हें अदालतों के हवाले करदेंगे और अपने सभागृहों में तुम्हें कोडे़ लगायेंगे।

18) तुम मेरे कारण शासकों और राजाओं के सामने पेश किये जाओगे, जिससे मेरे विषय में तुम उन्हें और गै़र-यहूदियों को साक्ष्य दे सको।

19) ’’जब वे तुम्हें अदालत के हवाले कर रहे हों, तो यह चिन्ता नहीं करोगे कि हम कैसे बोलेंगे और क्या कहेंगे। समय आने पर तुम्हें बोलने को शब्द दिये जायेंगे,

20) क्योंकि बोलने वाले तुम नहीं हो, बल्कि पिता का आत्मा है, जो तुम्हारे द्वारा बोलता है।

21) भाई अपने भाई को मृत्यु के हवाले कर देगा और पिता अपने पुत्र को। संतान अपने माता पिता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और उन्हें मरवा डालेगी।

22) मेरे नाम के कारण सब लोग तुम से बैर करेंगे, किन्तु जो अन्त तक धीर बना रहेगा, उसे मुक्ति मिलेगी।

23) ’’यदि वे तुम्हें एक नगर से निकाल देते हैं, तो दूसरे नगर भाग जाओ। मैं तुम से कहता हूँ तुम इस्रालय के नगरों काचक्कर पूरा भी नहीं कर पाओगे कि मानव पुत्र आ जायेगा।


📚 मनन-चिंतन




कल के सुसमाचार में हमने मनन-चिंतन किया था कि जब प्रभु येसु के शिष्य सुसमाचार का प्रचार करने जायेंगे तो उन्हें किस तरह अपने जीवन के द्वारा साक्ष्य देना है. आज प्रभु येसु हमारे सामने सुसमाचार के लिए जो कर्मभूमि है उसकी डरावनी तस्वीर पेश करते हैं. सुसमाचार का प्रचार करना एक तो इसलिए कठिन है क्योंकि यह मुख से नहीं अपने जीवन और कार्यों से करना है, उससे भी कठिन वह परिस्थितियाँ हैं जिनमें हमें सुसमाचार का साक्ष्य देना है. प्रभु येसु चेतावनी देते हैं कि उनके सुसमाचार का प्रचार करने वाले लोग बहुत सी कठिनाइयों का सामना करेंगे, वे भेड़ों के समान भेडियों के बीच भेजे जा रहे हैं, लोग प्रभु येसु के नाम के कारण उनसे नफरत करेंगे, उन पर अत्याचार करेंगे, उन पर मुकदमा चलायेंगे, उन्हें शासकों के समक्ष पेश किया जायेगा. ये सारी परिस्थितियाँ सुसमाचार के सन्देश के महत्त्व की ओर इशारा करती हैं. अगर यह कोई साधारण सन्देश या मनुष्य के दिमाग की उपज होता तो कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन यह तो हृदयों को विचलित करने वाले शाश्वत सत्य ईश्वर के जीवन्त वचन हैं.

जिन परिस्थितियों का प्रभु येसु ने उल्लेख किया है, कुछ ऐसी ही परिस्थतियों का हम आज भी सामना करते हैं. हमको फादर स्टेन स्वामी याद हैं, किस तरह से उन्होंने जेल में यातनाएं सहीं थी. हमें कंधमाल में मरने वाले विश्वासियों की याद है, किस तरह से वे सुसमाचार और ख्रीस्तीय विश्वास के लिए हँसते-हँसते शहीद हो गये. अगर हम किसी गरीब के जीवन में खुशियाँ लाने की कोशिश करें या मानवता की सेवा करें, दूसरे शब्दों में कहें तो, यदि हम प्रभु येसु की शिक्षाओं पर चलें तो बिना किसी सबूत के बेवजह हम पर धर्मं-परिवर्तन के झूठे आरोप लगा दिये जाते हैं, हमारा पुण्य कार्य रोक दिया जाता है. लेकिन ईश्वर का कार्य कभी नहीं रुकेगा. अगर ईश्वर हमारे साथ है तो कोई भी मानवीय ताकत ईश्वर के कार्य को रोक सकती. आमेन.



📚 REFLECTION




Yesterday we reflected about how the disciples of Jesus were to proclaim the Good News of the Kingdom. Today Jesus presents a scary picture of the soil on which the seeds of Gospel are to sprout. Proclaiming the Gospel is difficult because we have to proclaim it not just with our words but more than that with our life. What makes it more challenging is the situation and environment in which this Good News is to be proclaimed. Jesus warns about the imminent hurdles and challenges to those who accept his call to proclaim his message. They are sent lambs amidst the wolves, they will be hated because of Jesus, they will be persecuted, falsely accused and even their own people will disown them. These all challenges and trials indicate the importance of the message of the Gospel. If this Good News was ordinary message or product of human mind, it would go unnoticed, but these are words of eternal life that stir the hearts of many, they disturb the conscience of many, therefore they are opposed.

We live in a world with similar situations today. We recall Fr. Stan Swami, how he endured the unjust imprisonment for serving God among the under privileged ones. We remember the faithful believers in Kandhmal, how happily and courageously they offered their lives for the sake of faith and God News. Whenever we try to serve the poor, try to bring happiness in the lives of the needy, or in other words, whenever we try to live the message of Christ sincerely and wholeheartedly, we accused unjustly and baselessly of religious conversions, our good work is hindered. But the work of God cannot be stopped. If it is God’s work and if God is with us, no human force can stop this work. Amen.



 -Br Biniush Topno


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गुरुवार, 08 जुलाई, 2021 वर्ष का चौदहवाँ सामान्य सप्ताह

 

गुरुवार, 08 जुलाई, 2021

वर्ष का चौदहवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ : उत्पत्ति 44:18-21, 23-29; 45:1-5



18) इस पर यूदा ने यूसुफ़ के पास जा कर कहा, ''महोदय! मुझे आज्ञा दें। मैं आप से एक निवेदन करना चाहता हूँ। आप मुझ पर क्रोध न करें। आप तो फिराउन के सदृश हैं।

19) महोदय ने हम लोगों से यह प्रश्न किया था कि 'क्या तुम लोगों के पिता और भाई भी है?'

20) और हमने उत्तर दिया था, 'हम लोगों के एक वृद्ध पिताजी हैं और उनके एक किशोर पुत्र है, जिसका जन्म उनकी वृद्धावस्था में हुआ है। उस लड़के का सगा भाई मर गया है; वह अपनी माता की एकमात्र जीवित सन्तान है और उसके पिता उसे प्यार करते हैं।'

21) आपने हम से कहा था, 'उसे मेरे पास ले आओ; मैं उसे देखना चाहता हूँ'।

23) तब आपने हम, अपने दासों, से कहा, 'यदि तुम्हारा कनिष्ठ भाई तुम्हारे साथ नहीं आयेगा, तो तुम्हें मुझ से फिर मिलने की अनुमति नहीं मिलेगी'।

24) इसलिए हमने आपके दास, अपने पिता, के पास जाकर उन्हें ये बातें बतायीं

25) जब हमारे पिता ने हम से कहा, 'फिर अनाज खरीदने जाओ',

26) तो हमने उत्तर दिया, 'हम नहीं जा सकते। जब तक हमारा कनिष्ठ भाई हमारे साथ नहीं हो, तब तक हम नहीं जायेंगे; क्योंकि यदि हमारा कनिष्ठ भाई हमारे साथ नहीं होगा, तो हमें उस मनुष्य से मिलने की अनुमति नहीं मिलेगी।'

27) इस पर आपके दास हमारे पिता ने हम से कहा, 'तुम जानते ही हो कि अपनी पत्नी से मुझे दो ही पुत्र हुए हैं।

28) एक मुझे छोड़ कर चला गया और मेरा अनुमान है कि किसी जानवर ने उसे टुकडे-टुकड़े कर दिया है; क्योंकि आज तक मैंने उसे फिर कभी नहीं देखा।

29) यदि तुम इसे भी मुझ से ले जाओगे और यह किसी विपत्ति का शिकार होगा, तो तुम मुझ पके बाल वाले को शोक से मार कर अधोलोक पहुँचा दोगे।'

45:1) अब यूसुफ़ अपने परिचरों के सामने अपने को वश में नहीं रख सका और पुकार कर उन से बोला, ''सब-के-सब बाहर जाओ''। तो वहाँ कोई और व्यक्ति नहीं था जब यूसुफ़ ने अपने भाइयों को अपना परिचय दिया।

2) किन्तु वह इतने जोर से रोने लगा कि मिस्रियों ने उसका रोना सुन लिया और फिराउन के महल में भी इसकी ख़बर पहुँच गयी।

3) यूसुफ़ ने अपने भाइयों से कहा, मैं यूसुफ़ हूँ। क्या मेरे पिताजी अब तक जीवित हैं?'' उसके भाई यूसुफ़ को देख कर इतने घबरा गये कि वह उत्तर में एक शब्द भी नहीं बोल सके।

4) यूसुफ़ ने अपने भाइयों से कहा, ''मेरे और निकट आ जाओ'' और वे उसके पास आये उसने कहा, ''मैं तुम्हारा भाई यूसुफ़ हूँ, जिसे तुमने मिस्र में बेच दिया था।

5) अब तुम इसलिए न तो शोक करो और न अपने को धिक्कारो कि तुमने मुझे यहाँ बेच दिया; क्योंकि ईश्वर ने तुम्हारे प्राण बचाने के लिए मुझे तुम से पहले यहाँ भेजा।



सुसमाचार : मत्ती 10:7-15



7) राह चलते यह उपदेश दिया करो- स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।

8) रोगियों को चंगा करो, मुरदों को जिलाओ, कोढि़यों को शुद्ध करो, नरकदूतों को निकालो। तुम्हें मुफ़्त में मिला है, मुफ़्त में दे दो।

9) अपने फेंटे में सोना, चाँदी या पैसा नहीं रखो।

10) रास्ते के लिए न झोली, न दो कुरते, न जूते, न लाठी ले जाओ; क्योंकि मज़दूर को भोजन का अधिकार है।

11) "किसी नगर या गाँव में पहुँचने पर एक सम्मानित व्यक्ति का पता लगा लो और नगर से विदा होने तक उसी के यहाँ ठहरो।

12) उस घर में प्रवेश करते समय उसे शांति की आशिष दो।

13) यदि वह घर योग्य होगा, तो तुम्हारी शान्ति उस पर उतरेगी। यदि वह घर योग्य नहीं होगा, तो तुम्हारी शान्ति तुम्हारे पास लौट आयेगी।

14) यदि कोई तुम्हारा स्वागत न करे और तुम्हारी बातें न सुने तो उस घर या उस नगर से निकलने पर अपने पैरों की धूल झाड़ दो।

15) मैं तुम से यह कहता हूँ - न्याय के दिन उस नगर की दशा की अपेक्षा सोदोम और गोमोरा की दशा कहीं अधिक सहनीय होगी।



📚 मनन-चिंतन



प्रभु येसु आज के सुसमाचार में शिष्यों के चुनने के बाद उन्हें उनका काम समझाते हैं और साथ ही उन्हें इस बात का संकेत भी देते हैं कि उन्हें उनके मिशन कार्य में कैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है. प्रभु येसु के निर्देशों का सार यह है कि शिष्यों को स्वर्ग राज्य की घोषणा करनी है, लेकिन कैसे करनी है, उसका तरीका थोडा अलग है. प्रभु येसु न केवल उन्हें समझाते हैं कि उन्हें क्या बोलना है, बल्कि उन्हें कैसे रहना है. बोलने से ज्यादा उनके जीने के ढंग के बारे में उन्हें समझाते हैं. क्या पहनना है, क्या साथ लेना है, क्या साथ नहीं लेना है, धन-दौलत की क्या भूमिका है इत्यादि. यानि कि शिष्यों को प्रभु येसु सुसमाचार सुनाने का एक मिशन कार्य सौंपते हैं, और उस सुसमाचार की घोषणा शिष्यों को अपने वचनों से बढ़कर अपने कर्मों से करनी है. उन्हें अपने कर्मों से ईश्वर के राज्य का साक्ष्य देना है.

अंग्रेजी में एक कहावत है, ‘तुम्हारे कार्य तुम्हारे शब्दों से अधिक शोर करते हैं.’ हम क्या बोल रहे हैं, उससे अधिक लोग इस बात पर ध्यान देते हैं कि हम क्या कर रहे हैं, और कैसे कर रहे हैं. हमारी कथनी और करनी के अन्तर को लोग तुरन्त पहचान लेते हैं. ईश्वर के वचन अगर हमारे जीवन के द्वारा हमारे कर्म नहीं बन जाते तो उनका उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता. ईश्वर के वचन अपना उद्देश्य पूरा करने के लिए ही हमें दिये गये हैं. हमारे बप्तिस्मा संस्कार द्वारा हमें भी ईश्वर के उसी मिशन कार्य में सहभागी होने का सौभाग्य मिला है. क्या हम अपने जीवन द्वारा, अपने कर्मों द्वारा ईश्वर के वचन को दूसरों तक पहुँचा सकते हैं? क्या हमारा जीवन प्रभु येसु के सुसमाचार का जीवन्त साक्ष्य दे सकता है? इसके लिए ईश्वर से हम कृपा माँगें. आमेन.



📚 REFLECTION



Jesus explains the mission to his disciples after choosing them, and also he hints them about the environment and situation they may face while taking the gospel to the world. The instruction given by Jesus to his disciples could be summed up that they have to proclaim the good news but in a unique way. Jesus, not only instructs them as to what they have to speak, moreover how they have to living. He explains them what they have to carry with them, and what they are not supposed to carry with them, what they have to wear etc. This all consists of their way of living. The mission that Jesus entrusts to his disciples, has to be preached by their life more than their word. They had to bear witness to the kingdom of God through their actions and lives.

We are familiar with the saying, ‘Your actions speak louder than your words.’ People notice our actions and behaviour more than what we say. They notice the difference between our words and actions. If Word of God is not expressed through our cons, then its real purpose is not fulfilled. It comes down to fulfil its purpose in our lives. We share in the mission of God through our Baptism. Can we take the Word of God to others through our lives, through our actions? Can we translate God’s word in our life? Can we become living witnesses to the Gospel values? Let us implore the Lord for this grace.


 -Br Biniush Topno


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बुधवार, 07 जुलाई, 2021 वर्ष का चौदहवाँ सामान्य सप्ताह

बुधवार, 07 जुलाई, 2021

वर्ष का चौदहवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ : उत्पत्ति 41:55-57; 42:5-7a, 17-24a



55) समस्त मिस्र देश में अकाल पड़ने लगा और लोग फिराउन से रोटी माँगने आये। फिराउन ने सभी मिस्रियों से कहा, ''यूसुफ के पास जाओ और वह जो कहें, वही करो''।

56) हर प्रदेश में अकाल था और यूसुफ़ ने सभी गोदामों को खुलवा कर मिस्रियों को अनाज बेच दिया। मिस्र देश में अकाल बढ़ता जा रहा था।

57) सभी देशों के लोग यूसुफ़ से अनाज ख़रीदने आये, क्योंकि पृथ्वी पर घोर अकाल पड़ने लगा था।

6) उस समय यूसुफ़ समस्त मिस्र का शासन करता था और सभी निवासियों को अनाज बेचता था। यूसुफ़ के भाई उसके पास आये और उन्होंने उसे दण्डवत् किया।

7) यूसुफ़ ने उन्हें देखते ही पहचान लिया, किन्तु उसने उनसे अपरिचित होने का स्वाँग भर कर कठोर स्वर में पूछा, ''तुम लोग कहाँ से आये हो?'' उन्होंने उत्तर दिया, ''कनान देश से; अनाज खरीदने के लिए''।

17) यूसुफ़ ने उन्हें तीन दिन तक कैद में डाल दिया।

18) तीसरे दिन उसने उन से कहा, ''यदि तुम जीवित रहना चाहते हो, तो मैं तुम से जो कहने जा रहा हूँ, वही करो; क्योंकि मैं ईश्वर पर श्रद्धा रखता हूँ।

19) यदि तुम सच्चे हो, तो तुम में से एक भाई यहाँ कैद में रहेगा। दूसरे अपने भूखे परिवारों के लिए अनाज ले कर जा सकते हैं,

20) लेकिन तुम्हें अपने कनिष्ठ भाई को मेरे पास ले आना होगा। तभी तुम्हारी बात सच निकलेगी और तुम लोग जीवित रहोगे।'' उन्होंने ऐसा ही किया और

21) एक दूसरे से कहा, ''हमने अपने भाई के साथ जो अन्याय किया, उसका दण्ड हम भोग रहे है। उसने हम से दया की याचना की और हमने उसकी दुर्गति देख कर भी उसे ठुकराया। इसी से हम यह विपत्ति भोग रहे हैं।''

22) रूबेन ने उन से कहा, ''मैने तुम लोगों को कितना समझाया कि बच्चे के साथ अन्याय मत करो; किन्तु तुमने मेरी एक भी नहीं मानी और अब हमसे उसके खून का बदला लिया जा रहा है''।

23) उन्होंने एक दुभाषिये का उपयोग किया था, इसलिए उन्हें मालूम नहीं था कि यूसुफ़ उनकी बातें समझ रहा है।

24) यूसुफ़ उन से अलग हो गया और रोने लगा।



सुसमाचार : मत्ती 10:1-7



1) ईसा ने अपने बारह शिष्यों को अपने पास बुला कर उन्हें अशुद्ध आत्माओं को निकालने तथा हर तरह की बीमारी और दुर्बलता दूर करने का अधिकार प्रदान किया।

2) बारह प्रेरितों के नाम इस प्रकार हैं- पहला, सिमोन, जो पेत्रुस कहलाता है, और उसका भाई अन्द्रेयस; जेबेदी का पुत्र याकूब और उसका भाई योहन;

3) फिलिप और बरथोलोमी; थोमस और नाकेदार मत्ती; अलफ़ाई का पुत्र याकुब और थद्देयुस;

4) सिमोन कनानी और यूदस इसकारियोती, जिसने ईसा को पकड़वाया।

5) ईसा ने इन बारहों को यह अनुदेश दे कर भेजा, ’’अन्य राष्ट्रों के यहाँ मत जाओ और समारियों के नगरों में प्रवेश मत करो,

6) बल्कि इस्राएल के घराने की खोयी हुई भेड़ों के यहाँ जाओ।

7) राह चलते यह उपदेश दिया करो- स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।



📚 मनन-चिंतन



प्रभु येसु द्वारा 12 शिष्यों को चुना जाना हमारे जीवन के लिए एक बड़ा सन्देश देता है. आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि प्रभु येसु 12 शिष्यों को बुलाते हैं, और उन्हें अधिकार तथा सामर्थ्य प्रदान करते हैं, ताकि वे ईश्वरीय राज्य के लिए कार्य करें. उन्होंने किसी को बाध्य नहीं किया था, प्रभु येसु के बुलावे को स्वीकार करना या ठुकराना उनके ऊपर था. लेकिन वे जानते थे कि उनके जीवन का सबसे बड़ा लाभ उस बुलावे को स्वीकार करने में है या ठुकराने में है. शायद वे इस बात को अच्छी तरह जानते थे, ‘मनुष्य को इससे क्या लाभ यदि वह सारा संसार तो प्राप्त कर ले लेकिन अपना जीवन ही गँवा दे?’ (मारकुस 8:36). जब हम इन बारहों शिष्यों के नाम देखते हैं तो सवाल उठता है कि आखिर इनमें ऐसा क्या था जो प्रभु येसु ने उन्हें चुना? ईश्वर द्वारा चुने जाने की शर्त हम प्रेरित-चरित 1:21 में देखते हैं, जिसमें शिष्य मथियस को चुनते हैं, यानि कि सदा से प्रभु के साथ था.

जो सदा ईश्वर से अपने सम्बन्ध को बनाये रखता है, ईश्वर उसे बड़े-बड़े कार्यों के लिए चुनता है. हम पुराने व्यवस्थान में देखते हैं, प्रभु ने इब्राहीम को चुना, याकूब को चुना, युसूफ को चुना, मूसा को चुना, योशुआ को चुना, उनके बाद बहुत से न्यायकर्ताओं को चुना, राजाओं को चुना. उन सब की खासियत यही थी कि वे बहुत मामूली व्यक्ति थे, लेकिन वे हमेशा ईश्वर की बात सुनते और मानते थे. प्रभु येसु के 12 शिष्य भी कोई खास व्यक्ति या समाज में बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं थे, लेकिन प्रभु येसु उन्हें बहुत महत्वपूर्ण बना देते हैं; इतने महत्वपूर्ण कि स्वर्ग की कुंजियाँ उनके पास दे देते हैं (मत्ती 16:19). हम भी अपने जीवन में बहुत साधारण व्यक्ति होंगे, लेकिन ईश्वर के राज्य के लिए, हम ईश्वर की नज़रों में अति मूल्यवान हैं. बस हमें ईश्वर के प्रति अपना ह्रदय खुला रखना है, हो सकता है ईश्वर को अपने मिशन कार्य के लिए हमारी ज़रूरत हो.



📚 REFLECTION




The calling of twelve disciples is very much related with our lives as well. We see Jesus calling the twelve disciples in the gospel today, and giving them power and authority to work for the kingdom of God. He did not oblige anyone but called them freely. They had a free choice to accept or reject the invitation of Jesus. But perhaps they knew where lies the greatest profit, in accepting the call or rejecting it. They were well aware of the fact that ‘...what will it profit them to gain the whole world and forfeit their life?” (Mark 6:36). When we come across the names of these chosen disciples, we may ask, what was special in them? Why did Jesus choose them? The criteria to choose, can be seen in Acts 1:21, and that criteria is that they were always with Jesus.

One who keeps up his relationship with God, God will surely choose him for great works. We can see this all through the Old Testament. God chose Abraham, Jacob, Joseph, Moses, Joshua, later on Judges and kings etc. They all had a common speciality and that was that they always kept their hearts open to the Lord and obeyed Him. The twelve disciples of Jesus were not very prominent figures socially or financially or religiously, they were very insignificant persons, but Jesus makes them significant, so much significant that they were to hold the keys to the kingdom of God (cf Matt 16:19). We may be very insignificant persons in our lives, but for the kingdom of God we are precious in the eyes of God. Only condition is that we keep our hearts open to the Lord and obey His commandments. May be God needs us for His mission. Amen.



 -Br Biniush Topno



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