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शुक्रवार, 09 जुलाई, 2021 वर्ष का चौदहवाँ सामान्य सप्ताह

 

शुक्रवार, 09 जुलाई, 2021

वर्ष का चौदहवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : उत्पत्ति 46:1-7, 28-30



1) इस्राएल ने अपनी समस्त सम्पत्ति के साथ प्रस्थान किया और बएर-शेबा पहँुच कर अपने पिता इसहाक के ईश्वर को बलि चढ़ायी।

2) ईश्वर ने रात को एक दिव्य दर्शन में इस्राएल से कहा, ''याकूब! याकूब!'' और उसने उत्तर दिया, ''मैं प्रस्तुत हूँ।''

3) तब ईश्वर ने कहा, ''मैं ईश्वर, तुम्हारे पिता का ईश्वर हूँ। मिस्र देश जाने से मत डरो, क्योंकि मैं वहाँ तुम्हारे द्वारा एक महान् राष्ट्र उत्पन्न करूँगा।

4) मैं स्वयं तुम्हारे साथ मिस्र देश जाऊँगा और तुम को फिर वहाँ से निकाल लाऊँगा। यूसुफ़ तुम्हारे मरने पर तुम्हारी आँखें बन्द कर देगा।''

5) याकूब बएर-शेबा से चला गया। इस्राएल के पुत्रों ने अपने पिता याकूब, अपने छोटे बच्चों और अपनी पत्नियों को उन रथों पर चढ़ाया, जिन्हें फिराउन ने उन्हें ले आने के लिए भेजा था।

6) वे अपना पशुधन और जो कुछ उन्होंने कनान में एकत्र किया था, वह सब अपने साथ ले गये। याकूब अपने सब वंशजों के साथ मिस्र देश पहुँचा।

7) वह अपने पुत्रों और पौत्रों, अपनी पुत्रियाँ और अपनी पौत्रियों, अपने सब वंशजों को मिस्र ले आया।

28) याकूब ने यूदा को अपने आगे भेज कर यूसुफ़ से निवेदन किया कि वह गोशेन में उस से मिलने आये।

29) जब वे गोशेन पहुँचे, तो यूसुफ़ आपना रथ माँगा कर अपने पिता इस्राएल से मिलने के लिए गोशेन गया। अपने पिता से मिल कर उसने उसे गले लगा लिया और उस से लिपट कर वह देर तक रोता रहा।

30) इस्राएल ने यूसुफ़ से कहा, ''अब तो मैं सुखपूर्वक मृत्यु की प्रतीक्षा करूँगा, क्योंकि मैं फिर तुम्हारे दर्शन कर सका और जान गया हूँ कि तुम जीवित हो।''



सुसमाचार : मत्ती 10:16-23



16) ’’देखो, मैं तुम्हें भेडि़यों के बीच भेड़ों क़ी तरह भेजता हूँ। इसलिए साँप की तरह चतुर और कपोत की तरह निष्कपट बनो।

17) ’’मनुष्यों से सावधान रहो। वे तुम्हें अदालतों के हवाले करदेंगे और अपने सभागृहों में तुम्हें कोडे़ लगायेंगे।

18) तुम मेरे कारण शासकों और राजाओं के सामने पेश किये जाओगे, जिससे मेरे विषय में तुम उन्हें और गै़र-यहूदियों को साक्ष्य दे सको।

19) ’’जब वे तुम्हें अदालत के हवाले कर रहे हों, तो यह चिन्ता नहीं करोगे कि हम कैसे बोलेंगे और क्या कहेंगे। समय आने पर तुम्हें बोलने को शब्द दिये जायेंगे,

20) क्योंकि बोलने वाले तुम नहीं हो, बल्कि पिता का आत्मा है, जो तुम्हारे द्वारा बोलता है।

21) भाई अपने भाई को मृत्यु के हवाले कर देगा और पिता अपने पुत्र को। संतान अपने माता पिता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और उन्हें मरवा डालेगी।

22) मेरे नाम के कारण सब लोग तुम से बैर करेंगे, किन्तु जो अन्त तक धीर बना रहेगा, उसे मुक्ति मिलेगी।

23) ’’यदि वे तुम्हें एक नगर से निकाल देते हैं, तो दूसरे नगर भाग जाओ। मैं तुम से कहता हूँ तुम इस्रालय के नगरों काचक्कर पूरा भी नहीं कर पाओगे कि मानव पुत्र आ जायेगा।


📚 मनन-चिंतन




कल के सुसमाचार में हमने मनन-चिंतन किया था कि जब प्रभु येसु के शिष्य सुसमाचार का प्रचार करने जायेंगे तो उन्हें किस तरह अपने जीवन के द्वारा साक्ष्य देना है. आज प्रभु येसु हमारे सामने सुसमाचार के लिए जो कर्मभूमि है उसकी डरावनी तस्वीर पेश करते हैं. सुसमाचार का प्रचार करना एक तो इसलिए कठिन है क्योंकि यह मुख से नहीं अपने जीवन और कार्यों से करना है, उससे भी कठिन वह परिस्थितियाँ हैं जिनमें हमें सुसमाचार का साक्ष्य देना है. प्रभु येसु चेतावनी देते हैं कि उनके सुसमाचार का प्रचार करने वाले लोग बहुत सी कठिनाइयों का सामना करेंगे, वे भेड़ों के समान भेडियों के बीच भेजे जा रहे हैं, लोग प्रभु येसु के नाम के कारण उनसे नफरत करेंगे, उन पर अत्याचार करेंगे, उन पर मुकदमा चलायेंगे, उन्हें शासकों के समक्ष पेश किया जायेगा. ये सारी परिस्थितियाँ सुसमाचार के सन्देश के महत्त्व की ओर इशारा करती हैं. अगर यह कोई साधारण सन्देश या मनुष्य के दिमाग की उपज होता तो कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन यह तो हृदयों को विचलित करने वाले शाश्वत सत्य ईश्वर के जीवन्त वचन हैं.

जिन परिस्थितियों का प्रभु येसु ने उल्लेख किया है, कुछ ऐसी ही परिस्थतियों का हम आज भी सामना करते हैं. हमको फादर स्टेन स्वामी याद हैं, किस तरह से उन्होंने जेल में यातनाएं सहीं थी. हमें कंधमाल में मरने वाले विश्वासियों की याद है, किस तरह से वे सुसमाचार और ख्रीस्तीय विश्वास के लिए हँसते-हँसते शहीद हो गये. अगर हम किसी गरीब के जीवन में खुशियाँ लाने की कोशिश करें या मानवता की सेवा करें, दूसरे शब्दों में कहें तो, यदि हम प्रभु येसु की शिक्षाओं पर चलें तो बिना किसी सबूत के बेवजह हम पर धर्मं-परिवर्तन के झूठे आरोप लगा दिये जाते हैं, हमारा पुण्य कार्य रोक दिया जाता है. लेकिन ईश्वर का कार्य कभी नहीं रुकेगा. अगर ईश्वर हमारे साथ है तो कोई भी मानवीय ताकत ईश्वर के कार्य को रोक सकती. आमेन.



📚 REFLECTION




Yesterday we reflected about how the disciples of Jesus were to proclaim the Good News of the Kingdom. Today Jesus presents a scary picture of the soil on which the seeds of Gospel are to sprout. Proclaiming the Gospel is difficult because we have to proclaim it not just with our words but more than that with our life. What makes it more challenging is the situation and environment in which this Good News is to be proclaimed. Jesus warns about the imminent hurdles and challenges to those who accept his call to proclaim his message. They are sent lambs amidst the wolves, they will be hated because of Jesus, they will be persecuted, falsely accused and even their own people will disown them. These all challenges and trials indicate the importance of the message of the Gospel. If this Good News was ordinary message or product of human mind, it would go unnoticed, but these are words of eternal life that stir the hearts of many, they disturb the conscience of many, therefore they are opposed.

We live in a world with similar situations today. We recall Fr. Stan Swami, how he endured the unjust imprisonment for serving God among the under privileged ones. We remember the faithful believers in Kandhmal, how happily and courageously they offered their lives for the sake of faith and God News. Whenever we try to serve the poor, try to bring happiness in the lives of the needy, or in other words, whenever we try to live the message of Christ sincerely and wholeheartedly, we accused unjustly and baselessly of religious conversions, our good work is hindered. But the work of God cannot be stopped. If it is God’s work and if God is with us, no human force can stop this work. Amen.



 -Br Biniush Topno


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गुरुवार, 08 जुलाई, 2021 वर्ष का चौदहवाँ सामान्य सप्ताह

 

गुरुवार, 08 जुलाई, 2021

वर्ष का चौदहवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ : उत्पत्ति 44:18-21, 23-29; 45:1-5



18) इस पर यूदा ने यूसुफ़ के पास जा कर कहा, ''महोदय! मुझे आज्ञा दें। मैं आप से एक निवेदन करना चाहता हूँ। आप मुझ पर क्रोध न करें। आप तो फिराउन के सदृश हैं।

19) महोदय ने हम लोगों से यह प्रश्न किया था कि 'क्या तुम लोगों के पिता और भाई भी है?'

20) और हमने उत्तर दिया था, 'हम लोगों के एक वृद्ध पिताजी हैं और उनके एक किशोर पुत्र है, जिसका जन्म उनकी वृद्धावस्था में हुआ है। उस लड़के का सगा भाई मर गया है; वह अपनी माता की एकमात्र जीवित सन्तान है और उसके पिता उसे प्यार करते हैं।'

21) आपने हम से कहा था, 'उसे मेरे पास ले आओ; मैं उसे देखना चाहता हूँ'।

23) तब आपने हम, अपने दासों, से कहा, 'यदि तुम्हारा कनिष्ठ भाई तुम्हारे साथ नहीं आयेगा, तो तुम्हें मुझ से फिर मिलने की अनुमति नहीं मिलेगी'।

24) इसलिए हमने आपके दास, अपने पिता, के पास जाकर उन्हें ये बातें बतायीं

25) जब हमारे पिता ने हम से कहा, 'फिर अनाज खरीदने जाओ',

26) तो हमने उत्तर दिया, 'हम नहीं जा सकते। जब तक हमारा कनिष्ठ भाई हमारे साथ नहीं हो, तब तक हम नहीं जायेंगे; क्योंकि यदि हमारा कनिष्ठ भाई हमारे साथ नहीं होगा, तो हमें उस मनुष्य से मिलने की अनुमति नहीं मिलेगी।'

27) इस पर आपके दास हमारे पिता ने हम से कहा, 'तुम जानते ही हो कि अपनी पत्नी से मुझे दो ही पुत्र हुए हैं।

28) एक मुझे छोड़ कर चला गया और मेरा अनुमान है कि किसी जानवर ने उसे टुकडे-टुकड़े कर दिया है; क्योंकि आज तक मैंने उसे फिर कभी नहीं देखा।

29) यदि तुम इसे भी मुझ से ले जाओगे और यह किसी विपत्ति का शिकार होगा, तो तुम मुझ पके बाल वाले को शोक से मार कर अधोलोक पहुँचा दोगे।'

45:1) अब यूसुफ़ अपने परिचरों के सामने अपने को वश में नहीं रख सका और पुकार कर उन से बोला, ''सब-के-सब बाहर जाओ''। तो वहाँ कोई और व्यक्ति नहीं था जब यूसुफ़ ने अपने भाइयों को अपना परिचय दिया।

2) किन्तु वह इतने जोर से रोने लगा कि मिस्रियों ने उसका रोना सुन लिया और फिराउन के महल में भी इसकी ख़बर पहुँच गयी।

3) यूसुफ़ ने अपने भाइयों से कहा, मैं यूसुफ़ हूँ। क्या मेरे पिताजी अब तक जीवित हैं?'' उसके भाई यूसुफ़ को देख कर इतने घबरा गये कि वह उत्तर में एक शब्द भी नहीं बोल सके।

4) यूसुफ़ ने अपने भाइयों से कहा, ''मेरे और निकट आ जाओ'' और वे उसके पास आये उसने कहा, ''मैं तुम्हारा भाई यूसुफ़ हूँ, जिसे तुमने मिस्र में बेच दिया था।

5) अब तुम इसलिए न तो शोक करो और न अपने को धिक्कारो कि तुमने मुझे यहाँ बेच दिया; क्योंकि ईश्वर ने तुम्हारे प्राण बचाने के लिए मुझे तुम से पहले यहाँ भेजा।



सुसमाचार : मत्ती 10:7-15



7) राह चलते यह उपदेश दिया करो- स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।

8) रोगियों को चंगा करो, मुरदों को जिलाओ, कोढि़यों को शुद्ध करो, नरकदूतों को निकालो। तुम्हें मुफ़्त में मिला है, मुफ़्त में दे दो।

9) अपने फेंटे में सोना, चाँदी या पैसा नहीं रखो।

10) रास्ते के लिए न झोली, न दो कुरते, न जूते, न लाठी ले जाओ; क्योंकि मज़दूर को भोजन का अधिकार है।

11) "किसी नगर या गाँव में पहुँचने पर एक सम्मानित व्यक्ति का पता लगा लो और नगर से विदा होने तक उसी के यहाँ ठहरो।

12) उस घर में प्रवेश करते समय उसे शांति की आशिष दो।

13) यदि वह घर योग्य होगा, तो तुम्हारी शान्ति उस पर उतरेगी। यदि वह घर योग्य नहीं होगा, तो तुम्हारी शान्ति तुम्हारे पास लौट आयेगी।

14) यदि कोई तुम्हारा स्वागत न करे और तुम्हारी बातें न सुने तो उस घर या उस नगर से निकलने पर अपने पैरों की धूल झाड़ दो।

15) मैं तुम से यह कहता हूँ - न्याय के दिन उस नगर की दशा की अपेक्षा सोदोम और गोमोरा की दशा कहीं अधिक सहनीय होगी।



📚 मनन-चिंतन



प्रभु येसु आज के सुसमाचार में शिष्यों के चुनने के बाद उन्हें उनका काम समझाते हैं और साथ ही उन्हें इस बात का संकेत भी देते हैं कि उन्हें उनके मिशन कार्य में कैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है. प्रभु येसु के निर्देशों का सार यह है कि शिष्यों को स्वर्ग राज्य की घोषणा करनी है, लेकिन कैसे करनी है, उसका तरीका थोडा अलग है. प्रभु येसु न केवल उन्हें समझाते हैं कि उन्हें क्या बोलना है, बल्कि उन्हें कैसे रहना है. बोलने से ज्यादा उनके जीने के ढंग के बारे में उन्हें समझाते हैं. क्या पहनना है, क्या साथ लेना है, क्या साथ नहीं लेना है, धन-दौलत की क्या भूमिका है इत्यादि. यानि कि शिष्यों को प्रभु येसु सुसमाचार सुनाने का एक मिशन कार्य सौंपते हैं, और उस सुसमाचार की घोषणा शिष्यों को अपने वचनों से बढ़कर अपने कर्मों से करनी है. उन्हें अपने कर्मों से ईश्वर के राज्य का साक्ष्य देना है.

अंग्रेजी में एक कहावत है, ‘तुम्हारे कार्य तुम्हारे शब्दों से अधिक शोर करते हैं.’ हम क्या बोल रहे हैं, उससे अधिक लोग इस बात पर ध्यान देते हैं कि हम क्या कर रहे हैं, और कैसे कर रहे हैं. हमारी कथनी और करनी के अन्तर को लोग तुरन्त पहचान लेते हैं. ईश्वर के वचन अगर हमारे जीवन के द्वारा हमारे कर्म नहीं बन जाते तो उनका उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता. ईश्वर के वचन अपना उद्देश्य पूरा करने के लिए ही हमें दिये गये हैं. हमारे बप्तिस्मा संस्कार द्वारा हमें भी ईश्वर के उसी मिशन कार्य में सहभागी होने का सौभाग्य मिला है. क्या हम अपने जीवन द्वारा, अपने कर्मों द्वारा ईश्वर के वचन को दूसरों तक पहुँचा सकते हैं? क्या हमारा जीवन प्रभु येसु के सुसमाचार का जीवन्त साक्ष्य दे सकता है? इसके लिए ईश्वर से हम कृपा माँगें. आमेन.



📚 REFLECTION



Jesus explains the mission to his disciples after choosing them, and also he hints them about the environment and situation they may face while taking the gospel to the world. The instruction given by Jesus to his disciples could be summed up that they have to proclaim the good news but in a unique way. Jesus, not only instructs them as to what they have to speak, moreover how they have to living. He explains them what they have to carry with them, and what they are not supposed to carry with them, what they have to wear etc. This all consists of their way of living. The mission that Jesus entrusts to his disciples, has to be preached by their life more than their word. They had to bear witness to the kingdom of God through their actions and lives.

We are familiar with the saying, ‘Your actions speak louder than your words.’ People notice our actions and behaviour more than what we say. They notice the difference between our words and actions. If Word of God is not expressed through our cons, then its real purpose is not fulfilled. It comes down to fulfil its purpose in our lives. We share in the mission of God through our Baptism. Can we take the Word of God to others through our lives, through our actions? Can we translate God’s word in our life? Can we become living witnesses to the Gospel values? Let us implore the Lord for this grace.


 -Br Biniush Topno


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बुधवार, 07 जुलाई, 2021 वर्ष का चौदहवाँ सामान्य सप्ताह

बुधवार, 07 जुलाई, 2021

वर्ष का चौदहवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ : उत्पत्ति 41:55-57; 42:5-7a, 17-24a



55) समस्त मिस्र देश में अकाल पड़ने लगा और लोग फिराउन से रोटी माँगने आये। फिराउन ने सभी मिस्रियों से कहा, ''यूसुफ के पास जाओ और वह जो कहें, वही करो''।

56) हर प्रदेश में अकाल था और यूसुफ़ ने सभी गोदामों को खुलवा कर मिस्रियों को अनाज बेच दिया। मिस्र देश में अकाल बढ़ता जा रहा था।

57) सभी देशों के लोग यूसुफ़ से अनाज ख़रीदने आये, क्योंकि पृथ्वी पर घोर अकाल पड़ने लगा था।

6) उस समय यूसुफ़ समस्त मिस्र का शासन करता था और सभी निवासियों को अनाज बेचता था। यूसुफ़ के भाई उसके पास आये और उन्होंने उसे दण्डवत् किया।

7) यूसुफ़ ने उन्हें देखते ही पहचान लिया, किन्तु उसने उनसे अपरिचित होने का स्वाँग भर कर कठोर स्वर में पूछा, ''तुम लोग कहाँ से आये हो?'' उन्होंने उत्तर दिया, ''कनान देश से; अनाज खरीदने के लिए''।

17) यूसुफ़ ने उन्हें तीन दिन तक कैद में डाल दिया।

18) तीसरे दिन उसने उन से कहा, ''यदि तुम जीवित रहना चाहते हो, तो मैं तुम से जो कहने जा रहा हूँ, वही करो; क्योंकि मैं ईश्वर पर श्रद्धा रखता हूँ।

19) यदि तुम सच्चे हो, तो तुम में से एक भाई यहाँ कैद में रहेगा। दूसरे अपने भूखे परिवारों के लिए अनाज ले कर जा सकते हैं,

20) लेकिन तुम्हें अपने कनिष्ठ भाई को मेरे पास ले आना होगा। तभी तुम्हारी बात सच निकलेगी और तुम लोग जीवित रहोगे।'' उन्होंने ऐसा ही किया और

21) एक दूसरे से कहा, ''हमने अपने भाई के साथ जो अन्याय किया, उसका दण्ड हम भोग रहे है। उसने हम से दया की याचना की और हमने उसकी दुर्गति देख कर भी उसे ठुकराया। इसी से हम यह विपत्ति भोग रहे हैं।''

22) रूबेन ने उन से कहा, ''मैने तुम लोगों को कितना समझाया कि बच्चे के साथ अन्याय मत करो; किन्तु तुमने मेरी एक भी नहीं मानी और अब हमसे उसके खून का बदला लिया जा रहा है''।

23) उन्होंने एक दुभाषिये का उपयोग किया था, इसलिए उन्हें मालूम नहीं था कि यूसुफ़ उनकी बातें समझ रहा है।

24) यूसुफ़ उन से अलग हो गया और रोने लगा।



सुसमाचार : मत्ती 10:1-7



1) ईसा ने अपने बारह शिष्यों को अपने पास बुला कर उन्हें अशुद्ध आत्माओं को निकालने तथा हर तरह की बीमारी और दुर्बलता दूर करने का अधिकार प्रदान किया।

2) बारह प्रेरितों के नाम इस प्रकार हैं- पहला, सिमोन, जो पेत्रुस कहलाता है, और उसका भाई अन्द्रेयस; जेबेदी का पुत्र याकूब और उसका भाई योहन;

3) फिलिप और बरथोलोमी; थोमस और नाकेदार मत्ती; अलफ़ाई का पुत्र याकुब और थद्देयुस;

4) सिमोन कनानी और यूदस इसकारियोती, जिसने ईसा को पकड़वाया।

5) ईसा ने इन बारहों को यह अनुदेश दे कर भेजा, ’’अन्य राष्ट्रों के यहाँ मत जाओ और समारियों के नगरों में प्रवेश मत करो,

6) बल्कि इस्राएल के घराने की खोयी हुई भेड़ों के यहाँ जाओ।

7) राह चलते यह उपदेश दिया करो- स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है।



📚 मनन-चिंतन



प्रभु येसु द्वारा 12 शिष्यों को चुना जाना हमारे जीवन के लिए एक बड़ा सन्देश देता है. आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि प्रभु येसु 12 शिष्यों को बुलाते हैं, और उन्हें अधिकार तथा सामर्थ्य प्रदान करते हैं, ताकि वे ईश्वरीय राज्य के लिए कार्य करें. उन्होंने किसी को बाध्य नहीं किया था, प्रभु येसु के बुलावे को स्वीकार करना या ठुकराना उनके ऊपर था. लेकिन वे जानते थे कि उनके जीवन का सबसे बड़ा लाभ उस बुलावे को स्वीकार करने में है या ठुकराने में है. शायद वे इस बात को अच्छी तरह जानते थे, ‘मनुष्य को इससे क्या लाभ यदि वह सारा संसार तो प्राप्त कर ले लेकिन अपना जीवन ही गँवा दे?’ (मारकुस 8:36). जब हम इन बारहों शिष्यों के नाम देखते हैं तो सवाल उठता है कि आखिर इनमें ऐसा क्या था जो प्रभु येसु ने उन्हें चुना? ईश्वर द्वारा चुने जाने की शर्त हम प्रेरित-चरित 1:21 में देखते हैं, जिसमें शिष्य मथियस को चुनते हैं, यानि कि सदा से प्रभु के साथ था.

जो सदा ईश्वर से अपने सम्बन्ध को बनाये रखता है, ईश्वर उसे बड़े-बड़े कार्यों के लिए चुनता है. हम पुराने व्यवस्थान में देखते हैं, प्रभु ने इब्राहीम को चुना, याकूब को चुना, युसूफ को चुना, मूसा को चुना, योशुआ को चुना, उनके बाद बहुत से न्यायकर्ताओं को चुना, राजाओं को चुना. उन सब की खासियत यही थी कि वे बहुत मामूली व्यक्ति थे, लेकिन वे हमेशा ईश्वर की बात सुनते और मानते थे. प्रभु येसु के 12 शिष्य भी कोई खास व्यक्ति या समाज में बहुत महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं थे, लेकिन प्रभु येसु उन्हें बहुत महत्वपूर्ण बना देते हैं; इतने महत्वपूर्ण कि स्वर्ग की कुंजियाँ उनके पास दे देते हैं (मत्ती 16:19). हम भी अपने जीवन में बहुत साधारण व्यक्ति होंगे, लेकिन ईश्वर के राज्य के लिए, हम ईश्वर की नज़रों में अति मूल्यवान हैं. बस हमें ईश्वर के प्रति अपना ह्रदय खुला रखना है, हो सकता है ईश्वर को अपने मिशन कार्य के लिए हमारी ज़रूरत हो.



📚 REFLECTION




The calling of twelve disciples is very much related with our lives as well. We see Jesus calling the twelve disciples in the gospel today, and giving them power and authority to work for the kingdom of God. He did not oblige anyone but called them freely. They had a free choice to accept or reject the invitation of Jesus. But perhaps they knew where lies the greatest profit, in accepting the call or rejecting it. They were well aware of the fact that ‘...what will it profit them to gain the whole world and forfeit their life?” (Mark 6:36). When we come across the names of these chosen disciples, we may ask, what was special in them? Why did Jesus choose them? The criteria to choose, can be seen in Acts 1:21, and that criteria is that they were always with Jesus.

One who keeps up his relationship with God, God will surely choose him for great works. We can see this all through the Old Testament. God chose Abraham, Jacob, Joseph, Moses, Joshua, later on Judges and kings etc. They all had a common speciality and that was that they always kept their hearts open to the Lord and obeyed Him. The twelve disciples of Jesus were not very prominent figures socially or financially or religiously, they were very insignificant persons, but Jesus makes them significant, so much significant that they were to hold the keys to the kingdom of God (cf Matt 16:19). We may be very insignificant persons in our lives, but for the kingdom of God we are precious in the eyes of God. Only condition is that we keep our hearts open to the Lord and obey His commandments. May be God needs us for His mission. Amen.



 -Br Biniush Topno



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मंगलवार, 06 जुलाई, 2021 वर्ष का चौदहवाँ सामान्य सप्ताह

 

मंगलवार, 06 जुलाई, 2021

वर्ष का चौदहवाँ सामान्य सप्ताह


पहला पाठ : उत्पत्ति 32:23-33a



23) याकूब उसी रात को उठा और अपनी दो पत्नियों, दो दासियों और ग्यारह पुत्रों के साथ यब्बोक नामक नदी के उस पार गया।

24) वह उन्हें और अपनी सारी सम्पत्ति नदी के उस पार ले गया और

25) इस पार अकेला ही रह गया। एक पुरुष भोर तक उसके साथ कुश्ती लड़ता रहा।

26) जब उसने देखा कि वह याकूब को पछाड़ नहीं सका, तो उसने उसकी जाँघ की नस पर प्रहार किया और लड़ते-लड़ते याकूब की जाँघ का जोड़ उखड़ गया।

27) उसने कहा, ''मुझे जाने दो, क्योंकि भोर हो गया है''। याकूब ने उत्तर दिया, ''जब तक तुम मुझे आशीर्वाद नहीं दोगे, तब तक मैं तुम्हें नहीं जाने दूँगा''।

28) उसने पूछा, ''तुम्हारा नाम क्या है?'' उसने उत्तर दिया, ''मेरा नाम याकूब है''।

29) इस पर उसने कहा, ''अब से तुम याकूब नहीं, बल्कि इस्राएल कहलाओगे; क्योंकि तुम ईश्वर और मनुष्यों के साथ लड़ कर विजयी हो गये हो''

30) तब याकूब ने पूछा, ''मुझे अपना नाम बता दो''। उसने उत्तर दिया ''तुम मेरा नाम क्यों जानना चाहते हो?''

31) और उसने वहाँ याकूब को आशीर्वाद दिया। याकूब ने उस स्थान को नाम 'पनुएल' रखा, क्योंकि उसने यह कहा, ''ईश्वर को आमने-सामने देखने पर भी मैं जीवित रह गया''।

32) जब उसने पनुएल पार किया, तो सूर्य उग रहा था। उस समय से जाँघ का जोड़ उखड़ जाने के कारण वह लँगड़ाता रहा।

33) इस कारण इस्राएली आज तक जाँघ की नस नहीं खाते, क्योंकि उस मनुष्य ने याकूब की उस नस पर प्रहार किया था।



सुसमाचार : मत्ती 9:32-38


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32) वे बाहर निकल ही रहे थे कि कुछ लोग एक गॅूगे अपदूत ग्रस्त मनुष्य को ईसा के पास ले आये।

33) ईसा ने अपदूत को निकला और वह गूँगा बोलने लगा। लोग अचम्भे में पड़ कर बोल उठे, ’’इस्राएल में ऐसा चमत्कार कभी नहीं देखा गया है’’।

34) परन्तु फ़रीसी कहते थे, ’’यह नरकदूतों के नायक की सहायता से अपदूतों को निकलता है’’।

35) ईसा सभागृहों में शिक्षा देते, राज्य के सुसमाचार का प्रचार करते, हर तरह की बीमारी और दुबर्लता दूर करते हुए, सब नगरों और गाँवों में घूमते थे।

36) लोगों को देखकर ईसा को उन पर तरस आया, क्योंकि वे बिना चरवाहे की भेड़ों की तरह थके माँदे पड़े हुए थे।

37) उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, ’’फसल तो बहुत है, परन्तु मज़दूर थोड़े हैं।

38) इसलिए फ़सल के स्वामी से विनती करो कि वह अपनी फ़सल काटने के लिए मज़दूरों को भेजे।’’



📚 मनन-चिंतन



आज का सुसमाचार हमें याद दिलाता है कि हम आज की इस दुनिया में ख्रीस्तीय होते हुए निष्क्रिय नहीं बैठे रह सकते. ईश्वर के राज्य के लिए हमें अपनी भूमिका निभानी है, साथ ही हमारा ऐसे लोगों से सामना भी होगा, जो हमारे भलाई करने के बावजूद हमारे पुण्य कार्य में कुछ न कुछ बुराई ढूंढ ही लेते हैं. आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि प्रभु येसु लोगों को चंगा करते हैं, लोगों के दुःख-दर्द दूर करते हैं और ईश्वरीय राज्य का सन्देश सुनाते हैं. वे गॉंव-गॉंव और नगर-नगर घूम-घूम कर ईश्वर के राज्य का प्रचार करते हैं और चमत्कार करते हैं. जहाँ भी प्रभु येसु जाते हैं, वहीँ उनका सन्देश सुनने के लिए लोग तरसते हुए मिलते हैं. हर जगह ऐसे लोग मिल जाते हैं जिनको प्रभु येसु की ज़रूरत है. वे उन्हें बिना चरवाहे की भेड़ों के समान प्रतीत होते हैं, और इसलिए वह हम में से प्रत्येक व्यक्ति को ईश्वरीय कार्य के लिए आगे आने का आह्वान करते हैं.

प्रभु येसु कहते हैं, ‘फसल तो बहुत है, लेकिन मजदूर थोड़े हैं, इसलिए फसल के स्वामी से विनती करो कि वह अपनी फसल काटने के लिए मजदूर भेजे.’ (9:37-38). अगर हम प्रभु येसु की नज़रों से देखें तो आज भी हमें वही नज़ारा दिखेगा, बल्कि उससे भी दयनीय नज़ारा. हमारे आस-पास ऐसा कौन सा व्यक्ति है, जो सौ प्रतिशत खुश है, जिसे कोई दुःख-दर्द नहीं है, जो अपने पापों के कारण ईश्वर के दण्ड का भागी नहीं है? ऐसा कौन सा व्यक्ति नहीं जिसे ईश्वर की, उसके प्रेम की ज़रूरत नहीं? आज हमारे आस-पास ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो ना केवल बिना चरवाहे की भेड़ों के समान हैं, बल्कि भटकी हुई भेड़ों के समान हैं. उन्हें इन्तजार है मेरा, आपका, हर ख्रीस्तीय का कि वह उन्हें सुसमाचार सुनायेगा, ईश्वर का प्रेम उन तक पहुँचायेगा. हम ईश्वर के दिये हुए अपने इस जीवन पर नज़र डालें और खुद से पूछें कि मैंने ईश्वर के लिए क्या योगदान दिया है? आमेन.



📚 REFLECTION



Today’s gospel passage reminds us that being a Christian, we cannot remain inactive in today’s world. We have to do our lot for the coming of God’s kingdom. We must not forget at the same time that there will be always people who will misunderstand our good works, criticise us and find fault in all good works. We see a busy Jesus in the gospel today. He heals people, casts away evil spirits and preaches about the kingdom of God. He restlessly moves from one place to another, seeking the lost sheep and give them new life. Wherever he goes, he finds people anxiously waiting to listen to his words of life. Everywhere people are found who were in need of God’s love and compassion. They seem like sheep without shepherd, and Jesus calls each one of us to come forward to help him in his mission.

Jesus says, “The harvest is plentiful, but the labourers are few; therefore ask the Lord of harvest to send out labourers into his harvest.” (Matt. 9:37-38). If we see today’s world through the eyes of Jesus, we will see the same situation, even more pitiful. Who is around us who is completely happy, who has nothing to grieve, who does not deserve God’s wrath due to his sins? Who is there around us who does not need God and His compassionate love? Today there are innumerable people around us who are not only like sheep without shepherd but also sheep who are lost. They wait for me, for you, for every Christian that we would take gospel to them, we would take God’s love to them. Let us evaluate our life which is a free gift of God ask within, what have I done for God, for his kingdom? Amen.



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सोमवार, 05 जुलाई, 2021 वर्ष का चौदहवाँ सामान्य सप्त

 

सोमवार, 05 जुलाई, 2021

वर्ष का चौदहवाँ सामान्य सप्ताह




पहला पाठ : उत्पत्ति 28:10-22a



10) याकूब ने बएर-शेबा छोड़ कर हारान के लिए प्रस्थान किया।

11) वह किसी तीर्थ-स्थान जा पहुँचा और वहाँ रात भर ठहर गया, क्योंकि सूर्यास्त हो गया था। उसने वहाँ पड़े हुए पत्थरों में से एक को उठा लिया और उसे तकिया बना कर वहाँ सो गया।

12) उसने यह स्वप्न देखा : एक सीढ़ी धरती पर खड़ी थी; उसका सिरा स्वर्ग तक पहुँचता था और ईश्वर के दूत उस पर उतरते-चढ़ते थे।

13) ईश्वर याकूब के पास खड़ा हो गया और बोला, ''मैं प्रभु, तुम्हारे पिता इब्राहीम का ईश्वर तथा इसहाक का ईश्वर हूँ। मैं तुम्हें और तुम्हारे वंशजों को यह धरती दे दूँगा, जिस पर तुम लेट रहे हो।

14) तुम्हारे वंशज भूमि के रजकणों की तरह असंख्य हो जायेंगे और पश्चिम तथा पूर्व, उत्तर तथा दक्षिण में फैल जायेंगे। तुम्हारे और तुम्हारे वंश द्वारा पृथ्वी भर के राष्ट्र आशीर्वाद प्राप्त करेंगे।

15) मैं तुम्हारे साथ रहूँगा। तुम जहाँ कहीं भी जाओगे, मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा और तुम्हें इस प्रदेश वापस ले जाऊँगा, क्योंकि मैं तुम्हें तब तक नहीं छोडूँगा, जब तक तुम से जो कहा, उसे पूरा न कर दूँ।''

16) याकूब नींद से जाग उठा और बोला, ''निश्चय ही प्रभु इस स्थान पर विद्यमान है और यह मुझे मालूम नहीं था''।

17) वह भयभीत हो गया और बोला, ''यह स्थान कितना श्रद्धाजनक है! यह तो ईश्वर का निवास है, यह स्वर्ग का द्वार है!''

18) उसने बहुत सबेरे उठ कर सिरहाने का वह पत्थर उठाया, उसे स्मारक के रूप में खड़ा किया और उसके सिरे पर तेल उँड़ेल दिया।

19) उसने स्थान का नाम बेतेल रखा। वह नगर पहले लूज कहलाता था।

20) याकूब ने यह प्रतिज्ञा की, ''यदि ईश्वर मेरे साथ रहेगा और मेरी इस यात्रा में मेरी रक्षा करेगा, यदि वह मुझे खाने के लिए भोजन और पहनने के लिए कपड़े देगा और

21) यदि मैं सकुशल अपने पिता के घर लौटूँगा, तो प्रभु ही मेरा ईश्वर होगा और जो पत्थर मैंने स्मारक के रूप में खड़ा किया, वह ईश्वर का मन्दिर होगा।

22) जो कुछ तू मुझे प्रदान करेगा, मैं उसका दशमांश तुझे दिया करूँगा।''



सुसमाचार : मत्ती 9:18-23




18) ईसा उन से ये बातें कह ही रहे थे कि एक अधिकारी आया। उसने यह कहते हुए उन्हें दण्डवत् किया, ’’मेरी बेटी अभी-अभी मर गयी है। आइए, उस पर हाथ रखिए और वह जी जायेगी।’’

19) ईसा उठ कर अपने शिष्यों के साथ उसके पीछे हो लिये।

20) उस समय एक स्त्री ने, जो बारह बरस से रक्तस्राव से पीडि़त थी, पीछे से आ कर ईसा के कपडे़ का पल्ला छू लिया;

21) क्योंकि वह मन-ही-मन कहती थी- यदि मैं उनका कपड़ा भर छूने पाऊँ, तो चंगी हो जाऊॅंगी।

22) ईसा ने मुड़ कर उसे देख लिया और कहा ’’बेटी, ढारस रखो। तुम्हारे विश्वास ने तुम्हें चंगा कर दिया है।’’ और वह स्त्री उसी क्षण चंगी हो गई।

23) ईसा ने अधिकारी के घर पहुँच कर बाँसुरी बजाने वालों और लोगों को रोते-पीटते देखा और

24) कहा, ’’हट जाओ। लड़की नहीं मरी है, सो रही है।’’ इस पर वे उनकी हॅंसी उड़ाते रहे।

25) भीड़ बाहर कर दी गयी। तब ईसा ने भीतर जा कर लड़की का हाथ पकड़ा और वह उठ खड़ी हुई।

26) इस बात की चरचा उस इलाक़े के कोने-कोने में फैल गयी।


📚 मनन-चिंतन



आज के सुसमाचार में एक चमत्कार के अन्दर एक दूसरा चमत्कार बुना हुआ है. एक अधिकारी की 12 बरस की बेटी को जिलाने का चमत्कार और 12 बरस से रक्तस्राव से पीड़ित स्त्री को चंगाई का चमत्कार एक दूसरे में बुने हुए हैं. ये दोनों घटनाएँ पहले तीनों सुसमाचारों में पाई जाती हैं, और सन्त मरकुस और लूकस के सुसमाचार में तो अधिकारी का नाम भी दिया हुआ है - जैरुस. प्रभु येसु लोगों के जीवन में जो भी चमत्कार करते थे, उन सब में एक बहुत ही सामान्य और ज़रूरी एक बात होती थी, वह थी चमत्कार पाने वाले का विश्वास. प्रभु येसु किसी भी चमत्कार का श्रेय उस व्यक्ति के विश्वास को देते हैं, जैसा व्यक्ति का विश्वास वैसा ही प्रभु येसु का प्रत्युत्तर.

बिना विश्वास के प्रभु येसु कोई चमत्कार नहीं करना चाहते थे. जब वे अपने गृह नगर आये तो लोगों के अविश्वास के कारण वहाँ उन्होंने बहुत कम चमत्कार दिखाए.(मत्ती 13:57-58). आज के सुसमाचार के दोनों चमत्कारों में उन दोनों व्यक्तियों, सभागृह का अधिकारी और रक्तस्राव पीडिता, का विश्वास अनुकरणीय है. वह एक अधिकारी होते हुए भी प्रभु येसु के सामने घुटने टेककर मिन्नत करता है. यह उसके विश्वास का प्रकटीकरण है. उसे मालूम है, प्रभु येसु ईश्वर हैं. हम जितना ईश्वर में विश्वास करेंगे उतना ही उनका सम्मान करेंगे, और जितना हम सम्मान करेंगे उतना ही ईश्वर हमको आशीष देंगे. यही प्रभु येसु का हमसे वादा है. आईये हम प्रभु से कृपा माँगें कि हमारा विश्वास प्रभु में और गहरा हो, कि हम अपने जीवन में ईश्वर के बहुत से चमत्कार देखें. आमेन.



📚 REFLECTION



In the gospel today, we see two miracles, one nested into the other. Both miracles, one of raising the 12 year old daughter of the ruler of synagogue and other the woman with discharge of blood for 12 years. These both miracles are found in all three synoptic gospels, out of which two gospels (Mark and Luke) give even the name of the ruler as Jairus. Whenever Jesus performed a miracle for the people, there was a very common factor in each miracle, and that was the faith of the person concerned. Jesus gave the credit of the miracle to the faith of the person, very often saying, ‘your faith has healed you.’ He always appreciated the deep faith of the person.

Jesus wouldn’t want to perform a miracle in the absence of faith. Where there is no faith, there is no miracle. When he came to his own place, people could not believe in him, hence it is written due to lack of faith among the people, he did not perform many miracles there. (cf Matthew 13:57-58). The faith of the ruler and the woman in need of healing is worth emulating. He was a ruler, an officer, yet he falls on his knees, pleading Jesus. This gesture was the expression of his faith in Jesus. He believed, Jesus was son of God. The more faith we have in God, the more we will honour Him, the more we will honour him, the more he will bless us, that is the assurance given by Jesus himself. Let us ask the Lord to strengthen and deepen our faith in Him, so that we may witness more and more miracles in our life.



 -Br Biniush Topno



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FOURTEENTH SUNDAY IN ORDINARY TIME, Independence Day

FOURTEENTH SUNDAY IN ORDINARY TIME, Independence Day




First Reading: Ezekiel 2: 2-5

2 And the spirit entered into me after that he spoke to me, and he set me upon my feet: and I heard him speaking to me,

3 And saying: Son of man, I send thee to the children of Israel, to a rebellious people, that hath revolted from me, they, and their fathers, have transgressed my covenant even unto this day.

4 And they to whom I send thee are children of a hard face, and of an obstinate heart: and thou shalt say to them: Thus saith the Lord God:

5 If so be they at least will hear, and if so be they will forbear, for they are a provoking house: and they shall know that there hath been a prophet in the midst of them.

Responsorial Psalm: Psalms 123: 1-2, 2, 3-4

R. (2cd) Our eyes are fixed on the Lord, pleading for his mercy.

1 To thee have I lifted up my eyes, who dwellest in heaven.

2 Behold as the eyes of the servants are on the hands of their masters.

R. Our eyes are fixed on the Lord, pleading for his mercy.

2 As the eyes of the handmaid are on the hands of her mistress: so are our eyes unto the Lord our God, until he have mercy on us.

R. Our eyes are fixed on the Lord, pleading for his mercy.

3 Have mercy on us, O Lord, have mercy on us: for we are greatly filled with contempt.

4 For our soul is greatly filled: we are a reproach to the rich, and contempt to the proud.

R. Our eyes are fixed on the Lord, pleading for his mercy.

Second Reading: Second Corinthians 12: 7-10

7 And lest the greatness of the revelations should exalt me, there was given me a sting of my flesh, an angel of Satan, to buffet me.

8 For which thing thrice I besought the Lord, that it might depart from me.

9 And he said to me: My grace is sufficient for thee; for power is made perfect in infirmity. Gladly therefore will I glory in my infirmities, that the power of Christ may dwell in me.

10 For which cause I please myself in my infirmities, in reproaches, in necessities, in persecutions, in distresses, for Christ. For when I am weak, then am I powerful.

Alleluia: Luke 4: 18

R. Alleluia, alleluia.

18 The Spirit of the Lord is upon me, for he sent me to bring glad tidings to the poor.

R. Alleluia, alleluia.

Gospel: Mark 6: 1-6

1 And going out from thence, he went into his own country; and his disciples followed him.

2 And when the sabbath was come, he began to teach in the synagogue: and many hearing him were in admiration at his doctrine, saying: How came this man by all these things? and what wisdom is this that is given to him, and such mighty works as are wrought by his hands?

3 Is not this the carpenter, the son of Mary, the brother of James, and Joseph, and Jude, and Simon? are not also his sisters here with us? And they were scandalized in regard of him.

4 And Jesus said to them: A prophet is not without honor, but in his own country, and in his own house, and among his own kindred.

5 And he could not do any miracles there, only that he cured a few that were sick, laying his hands upon them.

6 And he wondered because of their unbelief, and he went through the villages round about teaching.

रविवार, 04 जुलाई, 2021 वर्ष का चौदहवाँ सामान्य रविवार

 

रविवार, 04 जुलाई, 2021

वर्ष का चौदहवाँ सामान्य रविवार

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पहला पाठ : एज़ेकिएल का ग्रन्थ 2:2-5



2) आत्मा ने मुझ में प्रवेश कर मुझे पैरों के पर खड़ा कर दिया और मैंने उसे मुझ से यह कहते सुना।

3) उसने मुझ से कहा, “मानवपुत्र! मैं तुम्हें इस्राएलियों के पास भेज रहा हूँ, उस विद्रेही राष्ट्र के पास, जो मेरे विरुद्ध में उठ खड़ा है। वे और उनके पुरखे आज तक मेरे विरुद्ध विद्रोह करते चले आ रहे हैं।

4) उनके पुत्र हठी हैं और उनका हृदय कठोर है। मैं तुम्हें उनके पास यह कहने भेज रहा हूँः ’प्रभु-ईश्वर यह कहता है’।

5) चाहे वे सुनें या सुनने से इनकार करें, क्योंकि वे विद्रोही प्रजा हैं- किन्तु वे जान जायेंगे कि उनके बीच एक नबी प्रकट हुआ है।



दूसरा पाठ: कुरिन्थियों के नाम सन्त पौलुस का दूसरा पत्र 12:7-10



7) मुझ पर बहुत-सी असाधारण बातों का रहस्य प्रकट किया गया है। मैं इस पर घमण्ड न करूँ, इसलिए मेरे शरीर में एक काँटा चुभा दिया गया है। मुझे शैतान का दूत मिला है, ताकि वह मुझे घूंसे मारता रहे और मैं घमण्ड न करूँ।

8) मैंने तीन बार प्रभु से निवेदन किया कि यह मुझ से दूर हो;

9) किन्तु प्रभु ने कहा-मेरी कृपा तुम्हारे लिए पर्याप्त है, क्योंकि हमारी दुर्बलता में मेरा सामर्थ्य पूर्ण रूप से प्रकट होता है।

10) इसलिए मैं बड़ी खुशी से अपनी दुर्बलताओं पर गौरव करूँगा, जिससे मसीह की सामर्थ्य मुझ पर छाया रहे। मैं मसीह के कारण अपनी दुर्बलताओं पर, अपमानों, कष्टों, अत्याचारों और संकटों पर गर्व करता हूँ; क्योंकि मैं जब दुर्बल हूँ, तभी बलवान् हूँ।


सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 6:1-6



1) वहाँ से विदा हो कर ईसा अपने शिष्यों के साथ अपने नगर आये।

2) जब विश्राम-दिवस आया, तो वे सभागृह में शिक्षा देने लगे। बहुत-से लोग सुन रहे थे और अचम्भे में पड़ कर कहते थे, ’’यह सब इसे कहाँ से मिला? यह कौन-सा ज्ञान है, जो इसे दिया गया है? यह जो महान् चमत्कार दिखाता है, वे क्या हैं?

3) क्या यह वही बढ़ई नहीं है- मरियम का बेटा, याकूब, यूसुफ़, यूदस और सिमोन का भाई? क्या इसकी बहनें हमारे ही बीच नहीं रहती?’’ और वे ईसा में विश्वास नहीं कर सके।

4) ईसा ने उन से कहा, ’’अपने नगर, अपने कुटुम्ब और अपने घर में नबी का आदर नहीं होता’।

5) वे वहाँ कोई चमत्कार नहीं कर सके। उन्होंने केवल थोड़े-से रोगियों पर हाथ रख कर उन्हें अच्छा किया।

6) उन लोगों के अविश्वास पर ईसा को बड़ा आश्चर्य हुआ।




-Br. Biniush Topno


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