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इतवार, - 18 अप्रैल 2021 पास्का का तीसरा इतवार

इतवार, - 18 अप्रैल 2021

पास्का का तीसरा इतवार






पहला पाठ :प्रेरित-चरित 3:13-15,17-19

13) इब्राहीम, इसहाक और याकूब के ईश्वर ने, हमारे पूर्वजों के ईश्वर ने अपने सेवक ईसा को महिमान्वित किया है। आप लोगों ने उन्हें पिलातुस के हवाले कर दिया और जब पिलातुस उन्हें छोड़ कर देने का निर्णय कर चुका था, तो आप लोगों ने उन्हें अस्वीकार किया।

14) आप लोगों ने सन्त तथा धर्मात्मा को अस्वीकार कर हत्यारे की रिहाई की माँग की।

15) जीवन के अधिपति को आप लोगों ने मार डाला; किन्तु ईश्वर ने उन्हें मृतकों में से जिलाया। हम इस बात के साक्षी हैं।

17) भाइयो! मैं जानता हूँ कि आप लोग, और आपके शासक भी, यह नहीं जानते थे कि वे क्या कर रहे हैं।

18) ईश्वर ने इस प्रकार अपना वह कथन पूरा किया जिसके अनुसार उसके मसीह को दुःख भोगना था और जिसे उसने सब नबियों के मुख से घोषित किया था।

19) आप लोग पश्चात्ताप करें और ईश्वर के पास लौट आयें, जिससे आपके पाप मिट जायें

दूसरा पाठ 1 योहन 2:1-5a.

1) बच्चो! मैं तुम लोगों को यह इसलिए लिख रहा हूँ कि तुम पाप न करो। किन्तु यदि कोई पाप करता, तो पिता के पास हमारे एक सहायक विद्यमान हैं, अर्थात् धर्मात्मा ईसा मसीह।

2) उन्होंने हमारे पापों के लिए प्रायश्चित किया है और न केवल हमारे पापों के लिए, बल्कि समस्त संसार के पापों के लिए भी।

3) यदि हम उनकी आज्ञाओं का पालन करेंगे, तो उस से हमें पता चलेगा कि हम उन्हें जानते हैं।

4) जो कहता है कि मैं उन्हें जानता हूँ, किन्तु उनकी आज्ञाओं का पालन नहीं करता वह झूठा है और उस में सच्चाई नहीं है।

5) परन्तु जो उनकी आज्ञाओं का पालन करता है, उस में ईश्वर का प्रेम परिपूर्णता तक पहुँचता है।

सुसमाचार : लूकस 24:35-48

35) तब उन्होंने भी बताया कि रास्ते में क्या-क्या हुआ और उन्होंने ईसा को रोटी तोड़ते समय कैसे पहचान लिया।

36) वे इन सब घटनाओं पर बातचीत कर ही रहे थे कि ईसा उनके बीच आ कर खड़े हो गये। उन्होंने उन से कहा, "तुम्हें शान्ति मिले!"

37) परन्तु वे विस्मित और भयभीत हो कर यह समझ रहे थे कि वे कोई प्रेत देख रहे हैं।

38) ईसा ने उन से कहा, "तुम लोग घबराते क्यों हो? तुम्हारे मन में सन्देह क्यों होता है?

39) मेरे हाथ और मेरे पैर देखो- मैं ही हूँ। मुझे स्पर्श कर देख लो- प्रेत के मेरे-जैसा हाड़-मांस नहीं होता।"

40) उन्होंने यह कह कर उन को अपने हाथ और पैर दिखाये।

41) जब इस पर भी शिष्यों को आनन्द के मारे विश्वास नहीं हो रहा था और वे आश्चर्यचकित बने हुए थे, तो ईसा ने कहा, "क्या वहाँ तुम्हारे पास खाने को कुछ है?"

42) उन्होंने ईसा को भुनी मछली का एक टुकड़ा दिया।

43) उन्होंने उसे लिया और उनके सामने खाया।

44) ईसा ने उन से कहा, "मैंने तुम्हारे साथ रहते समय तुम लोगों से कहा था कि जो कुछ मूसा की संहिता में और नबियों में तथा भजनों में मेरे विषय में लिखा है, सब का पूरा हो जाना आवश्यक है"।

45) तब उन्होंने उनके मन का अन्धकार दूर करते हुए उन्हें धर्मग्रन्थ का मर्म समझाया

46) और उन से कहा, "ऐसा ही लिखा है कि मसीह दुःख भोगेंगे, तीसरे दिन मृतकों में से जी उठेंगे

47) और उनके नाम पर येरुसालेम से ले कर सभी राष्ट्रों को पापक्षमा के लिए पश्चात्ताप का उपदेश दिया जायेगा।

48) तुम इन बातों के साक्षी हो।

📚 मनन-चिंतन

प्रभु येसु का दुखभोग एवं मृत्यु ऐतिहासिक सत्य था। शिष्यों ने यह स्वयं देखा था तथा कुछ एक तो उनके दफन के समय भी मौजूद थे। इस प्रकार वे निश्चित तौर पर जानते थे कि येसु मर चुके थे। वे इन घटनाओं के कारण बेहद उदास थे। येसु की उनके दुखभोग तथा मृत्यु की भविष्यवाणी के बावजूद भी वे यही सोच रहे थे ऐसा कुछ नहीं होगा तथा अंत में येसु नाटकीय ढंग से राजनैतिक उलटफेर करेंगे। किन्तु क्रूस मरण ने उनकी सारी उम्मीदें छीन ली थी। ऐसी निराशाजनक अवस्था में पुनरूत्थान की खबर ने उन्हें संशय में डाल दिया था। ऐसी परिस्थिति में ईश्वर स्वयं उनके विश्वास को पुनःस्थापित करने की पहल करते हैं।

येसु पहले दो शिष्यों से एम्माउस के मार्ग में मिले थे तथा अब वे एक बंद कमरे में उन्हें दर्शन देते हैं। येसु अपने शिष्यों को आश्वसन देने के लिये तत्पर थे कि वे भूत-प्रेत नहीं वरन एक नयी अवस्था में वहीं येसु है जिन्हें वे जानते थे। उनकी पहचान का सबसे मजबूत सबूत उनके घाव थे, जो मसीह के चिन्ह थे, तथा उनकी भविष्य्वाणी के अनुरूप थे कि मसीह दुःख भोगेंगे, तीसरे दिन मृतकों में से जी उठेंगे। येसु मानवीय ढंग से उनके विश्वास को जीतना चाहते थे। वे अपने घावों को दिखाते तथा उनका स्पर्श करने का निमंत्रण देकर बताना चाहते हैं कि वे सचमुच के है। वे उनके सामने खाते हैं। फिर उन्हें समझाते हैं कि जो कुछ भी उनके साथ हुआ वह धर्मग्रंथ के अनुसार हुआ। संहिता, नबी, तथा स्तोत्र, जो कि धर्मग्रंथ के तीन भाग थे को उल्लेखित कर येसु यही बताते हैं कि मसीह के बारे में भविष्यवाणी सम्पूर्ण धर्मग्रंथ में की गयी है।

येसु के दुखभोग, मृत्यु तथा पुनरूत्थान से ईश्वर से मानवजाति के मिलन का मिशन उत्प्रेरित होता है जैसा कि प्रभु कहते हैं, ’’तुम इन बातों के साक्षी हो।’’ यह शिष्यों का मिशन है कि सारे संसार में ईश्वर के राज्य की स्थापन के लिये कार्यरत रहे। उन्हें येसु के नाम पर येरुसालेम से लेकर सभी राष्ट्रों को पापक्षमा के लिये पश्चाताप का उपदेश देना होगा।

कलीसिया अपने स्वाभाव से ही मिश्नरी है। ईश्वर के अनुभव तथा वरदानों को सभी के साथ बांटा जाना चाहिये ताकि सभी मुक्ति प्राप्त कर सके। यह कारण था कि शिष्यों ने ज्ञात दुनिया के सभी हिस्सों को येसु की शिक्षा तथा उनके पुनरूत्थान की सच्चाई से भर दिया था। कुरिन्थियों के नाम अपने पहले पत्र में संत पौलुस जिन्होंने स्वयं पुनरूत्थान की सच्चाई का अनुभव किया था, कहते हैं, ’’धिक्कार मुझे, यदि मैं सुसमाचार का प्रचार न करूं।’’(1 कुरि.9:16)

हम भी ईश्वर का अनुभव करते तथा उनके उपहारों को ग्रहण करते हैं। ये हमारी स्वयं की महिमा तथा उपभोग के लिये नहीं बल्कि दूसरों के कल्याण के लिये दिये गये हैं। हमें दूसरों के साथ येसु के पुनरूत्थान का सुसमाचार तथा ईश्वर के क्रियाशील सामर्थ्य को बांटना चाहिये। प्रेरितों के समान हम भी केवल वहीं बांट सकते हैं जो हमने अनुभव किया है तथा प्रभु से विनती करे कि वे हमारे हृदयों को धर्मग्रंथ को समझने के लिये खोले। केवल ईश्वर ही ऐसा कर सकते है। ईश्वर हमें उनकी राह देखते तथा उनके लिये पुनःआगमन के लिये उल्सित पाये।

📚 REFLECTION

The passion and death of the Jesus was a historical reality. The disciples had witnessed it and they and some of had been present at burial of Jesus. So, they knew for sure that Jesus was dead. They were dismayed at the turn of event for obvious reasons. Inspite of Jesus’ forewarning of his passion and death they had continued to hope for the sensational triumphant resurgence of Jesus at political platform. Now the news of resurrection had terribly confused them. They had already been devastated by the death and now the rising from the death had been too much to digest. But it was God who takes initiative in restoration of their faith.

Jesus meets them on the road to Emmaus previously and now when they had been closed up in a room the Lord Jesus appears to them. Jesus is keen to reassure his friends that he not a ghost, but the same one as before, though in a new state. The strongest proof of this identity are his wounds, a clear sign that ‘that the Messiah is to suffer and to rise from the dead on the third day’. Jesus tries to win over their confidence in a very human manner. He speaks to them of peace. He showed his wounds to be touched and felt. He eats with them. Definitely the Lord was not hungry but he wanted to be as human and normal as he was before. Jesus then goes on to explain, all that had happened to him was fully in harmony with and the fulfilment of the Law, the prophets and psalms. Mentioning the three parts of the Old Testament Jesus indicates that the Messiah was foretold through the whole of the scriptures.

Out of Christ’s suffering, death and resurrection comes the mission to proclaim reconciliation with God through Jesus to the whole word. “You are witnesses to this.” It is the mission of apostles to carry on the establishment of the Kingdom throughout the world. They are to preach “repentance, for the forgiveness of sin, in Jesus’ name to all the nations, beginning from Jerusalem”.

Church my nature is a missionary. God’s experience and gifts are to be shared so that all must obtain salvation. This is very reason the apostles would fill the whole known parts of the earth with the teachings and news of the resurrection of Jesus. Paul who come to the truth of the resurrection at a later stage would say, “Foe to me if I do not preach the gospel” and moreover if the Christ has not been risen then vain is our faith.” (1 Cor.9:16)

We too experience God and his gifts. They are not for self-glory or advantages but for the good of the others. We ought to be sharing with other the news of the risen Lord and his power working amidst us. Like the apostles we can only witness what we have already experienced and we ask the Lord to open our hearts to the understanding of the scripture and to the truth of his resurrection in our life. Only the Lord can do it and we shall be found waiting and thirsting for the his coming into our life.

मनन- चिं तन

मानव अनादि काल से ही शांति की खोज करता रहा है। इब्रानी भाषा में शांति को ’शालो’ कहते हैं जिसका अर्थ है, ’परिपूर्णता’, ’परिपक्वता’, ’सम्पूर्ण’। जब मनुष्य अपने अंतरतम में परिपूर्णता का अनुभव करता है तो उसे वह शांति प्राप्त होती है जिसकी तलाश उसे हमेशा से होती रही है। हम जिंदगी में शांति को समृद्धि में खोजने का प्रयत्न करते हैं। उपलब्धि, संपत्ति, अधिकार, विलक्षणता आदि के द्वारा भी हम परिपूर्णता या शांति को प्राप्त करना चाहते हैं। मानव पहाडों, गुफाओं, रेगिस्तानों जैसी एंकात स्थानों में शरण लेता है। जीवन जीने की विभिन्न शैलियॉ अपनाता तथा योग, प्राणिक चंगाई आदि कसरतें करता है। किन्तु ये मानवीय प्रयत्न क्षणिक सांसारिक उल्लास या सुख प्रदान करते हैं। स्थायी शांति फिर भी दूर बनी रहती है।

’शांति’ प्रभु येसु का वह अनमोल उपहार है जिसे उन्होंने अपने शिष्यों को दिया है। “मैं तुम्हारे लिये शांति छोड जाता हूँ। अपनी शांति तुम्हें प्रदान करता हूँ। वह संसार की शांति-जैसी नहीं है। तुम्हारा जी घबराये नहीं। भीरु मत बनो।” (योहन 14:27) प्रभु के जन्म पर भी स्वर्गदूतों के समूहों ने शांति के वरदान की घोषणा की थी, ‘‘सर्वोच्च स्वर्ग में ईश्वर की महिमा प्रकट हो और पृथ्वी पर उसके कृपापात्रों को शान्ति मिले!” (लूकस 2:14) प्रभु येसु के जन्म की भविष्यवाणी में भी नबी इसायाह उन्हें शांति का राजा कहते हैं, “....हम को एक पुत्र मिला है। उसके कन्धों पर राज्याधिकार रखा गया है और उसका नाम होगा- अपूर्व परामर्शदाता, शक्तिशाली ईश्वर, शाश्वत पिता, शान्ति का राजा।” (इसायाह 9:5) अपने शिष्यों का प्रेषण करते समय येसु उन्हें इसी शांति के साथ भेजते हैं। “जिस घर में प्रवेश करते हो, सब से पहले यह कहो, ’इस घर को शान्ति!’ यदि वहाँ कोई शान्ति के योग्य होगा, तो उस पर तुम्हारी शान्ति ठहरेगी, नहीं तो वह तुम्हारे पास लौट आयेगी।” (लूकस 10:5-6) इब्रानियों के नाम पत्र का लेखक भी येसु को शांति का राजा बताते हैं। वे मेलखिसेदेक को, येसु का पूर्व-चिन्ह बताते हुये इंगित करते हैं, “सालेम के राजा और सर्वोच्च ईश्वर के पुरोहित ....मेलखिसेदेक का अर्थ है -धार्मिकता का राजा। वह सालेम के राजा भी है, जिसका अर्थ है- शान्ति के राजा।”(इब्रानियों 7:1-2)

प्रभु की मृत्यु के बाद जब शिष्य निराश एवं भयभीत थे तो पुनर्जीवित प्रभु तीन बार शिष्यों को पुनः शांति प्रदान करते है। “...ईसा उनके बीच आकर खडे हो गये। उन्होंने शिष्यों से कहा, “तुम्हें शांति मिले!” और इसके बाद उन्हें अपने हाथ और अपनी बगल दिखायी। प्रभु को देखकर शिष्य आनन्दित हो उठे। ईसा ने उन से फिर कहा, “तुम्हें शांति मिले!” (योहन 20:19-20) “वे इन सब घटनाओं पर बातचीत कर ही रहे थे कि ईसा उनके बीच आ कर खड़े हो गये। उन्होंने उन से कहा, ‘‘तुम्हें शान्ति मिले!” (लूकस 24:36) इस प्रकार शांतिप्रदाता येसु शिष्यों के हृदयों की उथलपुथल को अपनी शांति से शांत करते हैं।

हमें यह सदैव याद रखना चाहिए कि हमारा ईश्वर शांति का ईश्वर है तथा उसने हमें शांति का जीवन जीने के लिए बुलाया है। जो शांति प्रभु हमें प्रदान करते हैं वह संसार की शांति के समान नहीं है जो कुछ क्षण के लिए हमें केवल शांति का अहसास कराती है। प्रभु की शांति उनके सानिध्य एवं सामिप्य से प्राप्त होती है।

जब येसु शिष्यों के साथ नाव में जा रहे थे तो नाव तूफान से घिर गयी थी। शिष्यों में भय छा गया था। वे इस डर और घबराहट के बीच येसु को जगाते हैं। येसु ने “वायु को डाँटा और समुद्र से कहा, “शान्त हो! थम जा!” वायु मन्द हो गयी और पूर्ण शान्ति छा गयी।” (मारकुस 4:39) संत पौलुस कहते हैं, “ईश्वर कोलाहल का नहीं, वरन् शान्ति का ईश्वर है।...” (1 कुरि. 14:33) हमारे जीवन में भी हम अव्यवस्था, अंशांति एवं तूफानों से गुजरते हैं। ऐसी परिस्थितियों में हमें शांति के राजा येसु को पुकारना चाहिए जो सारे कोलाहल को शांत करते हैं। यदि विषम परिस्थितियों में हम सांसारिक तिकडमों पर भरोसा करेंगे तो यह कोलाहल बढता ही जायेगा।

प्रभु की शांति को प्राप्त करने और उसमें बने रहने के लिए हमें लोगों के बीच शांति स्थापित करना चाहिए। जो व्यक्ति मेलमिलाप के कार्यों में लगे रहते हैं वे सचमुच में ऐसे लोग है जो प्रभु की शांति का अनुभव करते हैं। उसी शांति से प्रेरित होकर वे मेल कराते हैं। ऐसे शांतिप्रिय लोगों को येसु धन्य कह कर पुकारते हैं, “धन्य हैं वे, जो मेल कराते हैं! वे ईश्वर के पुत्र कहलायेंगे।” (मत्ती 5:9) इसी प्रकर अपने शिष्यों को नमक के समान बनने की चुनौती देने के साथ-साथ येसु हमें आपसी शांति एवं मेल-मिलाप को बनाये रखने का आव्हान करते हैं। “...अपने में नमक बनाये रखो और आपस में मेल रखो।” (मारकुस 9:50) ईश्वर जो शांति का ईश्वर है चाहते हैं कि हम अपने कार्यों के द्वारा शांति भंग न करें तथा शांति स्थापित कर प्रभु की धन्यता को धारण करना चाहिए। इस प्रकार “ईश्वर की शान्ति, जो हमारी समझ से परे हैं, आपके हृदयों और विचारों को ईसा मसीह में सुरक्षित रखेगी।” (फिलिल्पियों 4:7) यह वही शांति है जिसे येसु अपने भयभीत शिष्यों को अपने पुनरूत्थान के बाद प्रदान करते हैं।

✍ BR. BINIUSH TOPNO


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आज का पवित्र वचन शनिवार, - 17 अप्रैल 2021

 

शनिवार, - 17 अप्रैल 2021

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पहला पाठ :प्रेरित-चरित 6:1-7


1) उन दिनों जब शिष्यों की संख्या बढ़ती जा रही थी, तो यूनानी-भाषियों ने इब्रानी-भाषियों के विरुद्ध यह शिकायत की कि रसद के दैनिक वितरण में उनकी विधवाओं की उपेक्षा हो रही है।

2) इसलिए बारहों ने शिष्यों की सभा बुला कर कहा, "यह उचित नहीं है कि हम भोजन परोसने के लिए ईश्वर का वचन छोड़ दे।

3) आप लोग अपने बीच से पवित्र आत्मा से परिपूर्ण सात बुद्धिमान् तथा ईमानदार व्यक्तियों का चुनाव कीजिए। हम उन्हें इस कार्य के लिए नियुक्त करेंगे,

4) और हम लोग प्रार्थना और वचन की सेवा में लगे रहेंगे।"

5) यह बात सबों को अच्छी लगी। उन्होंने विश्वास तथा पवित्र आत्मा से परिपूर्ण स्तेफनुस के अतिरिक्त फिलिप, प्रोख़ोरुस, निकानोर, तिमोन, परमेनास और यहूदी धर्म में नवदीक्षित अन्ताखिया-निवासी निकोलास को चुना

6) और उन्हें प्रेरितों के सामने उपस्थित किया। प्रेरितों ने प्रार्थना करने के बाद उन पर अपने हाथ रखे।

7) ईश्वर का वचन फैलता गया, येरुसालेम में शिष्यों की संख्या बहुत अधिक बढ़ने लगी और बहुत-से याजकों ने विश्वास की अधीनता स्वीकार की।


सुसमाचार : योहन 6:16-21


16) सन्ध्या हो जाने पर शिष्य समुद्र के तट पर आये।

17) वे नाव पर सवार हो कर कफरनाहूम की ओर समुद्र पार कर रहे थे। रात हो चली थी और ईसा अब तक उनके पास नहीं आये थे।

18) इस बीच समुद्र में लहरें उठ रही थी, क्योंकि हवा जोरों से चल रही थी।

19) कोई तीन-चार मील तक नाव खेने के बाद शिष्यों ने देखा कि ईसा समुद्र पर चलते हुए, नाव की ओर आगे बढ़ रहे हैं। वे डर गये,

20) किन्तु ईसा ने उन से कहा, "मैं ही हूँ। डरो मत।"

21) वे उन्हें चढ़ाना चाहते ही थे कि नाव तुरन्त उस किनारे, जहाँ वे जा रहे थे, लग गयी।


📚 मनन-चिंतन


प्राथमिकतायें जीवन को दिशा और मकसद प्रदान करती है। यह आवश्यक है कि हम यह जाने कि हम क्या चाहते हैं तथा किन बातों पर केंद्रित होकर अपने लक्ष्यों की प्राप्ति करना चाहते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि हमारी प्राथमिकताओं को छोडकर दूसरी बातें मायने नहीं रखती किन्तु जीवन की प्राथमिकतायें ही है जो हमें अन्य बातों से दूर रखती है। संत पौलुस बहुत खूबसूरती यह इस बात को बताते हुये कहते हैं, ’’मुझे सब कुछ करने की अनुमति है, किन्तु सब कुछ हितकर नहीं। मुझे सब कुछ करने की अनुमति है, किन्तु मैं किसी भी चीज का गुलाम नहीं बनूँगा।’’ (1 कुरि. 6:12)

आज के पहले पाठ में हमें पढते है भोजन वितरण के दौरान कुछ लोगों को भेदभाव का सामना पडता है। एक विशेष वर्ग की अवहेलना की जा रही है। यह एक वास्तविक समस्या थी जिसका शीघ्र निवारण किया जाना आवश्यक था। लेकिन प्रेरितों ने प्रार्थना तथा वचन के प्रचार को उनके जीवन की प्राथमिकता बताते हुये इस समस्या से सीधे रूप से जुडने से इंकार कर दिया। उन्होंने इसके लिये योग्य व्यक्तियों को चुनकर भेदभाव की समस्या को सुधारने को कहा।

हम निरंतर निर्णय लेते हैं। हमें प्राथमिकता पर ध्यान देना चाहिये अन्यथा हम मंजिल से भटक जायेंगे। प्राथमिकताओं से शुरूआती भटकाव इतना सूक्ष्म होता है कि हमें इसका अहसास ही नहीं होता है किन्तु जब इसका प्रभाव पडने लगता है तो जीवन अस्तव्यस्त हो जाता है।

प्राथमिकतायें हमें प्रभावी तथा क्रियाशील बनाये रखती है। हमें अपने लक्ष्य का सदैव ध्यान रहता है क्योंकि हम निरंतर लक्ष्य के पक्ष में निर्णय लेते रहते हैं। यह प्रभावशीलता प्रेरितों के कार्यों में स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है जैसा कि बताया गया है, ’’ईश्वर का वचन फैलता गया, येरुसालेम में शिष्यों की सख्ंया बहुत बढने लगी और बहुत से याजकों ने विश्वास की अधीनता स्वीकार की।’’




📚 REFLECTION



Priorities are the things that give life meaning and a purpose. It is important to know what we want and focus on while trying to achieve the goal. That doesn’t mean that other things are not important or useful but it is matter of priority in life that we refrain from something. St. Paul beautifully describes it, "I have the right to do anything," you say--but not everything is beneficial. "I have the right to do anything"--but I will not be mastered by anything.” (1 Corinthians 6:12 )

Today’s first reading from the Acts of the Apostles describes a situation when people faced partiality in the distribution of food. They felt a certain section was being neglected. It was a genuine problem and demanded an immediate action. However, apostles refused to be drawn into it on the ground that their priority was to pray and preach. They decided to remain adhered to their priorities and found another solution for it. They appointed others trusted men to oversee the distribution and solve the issues.

We constantly make decisions. We need to prioritise the work otherwise the deviate from the destination would be inevitable. The problem is that the deviation can be so subtle that it may go unnoticed at initially but would land us on a distant territory.

Priorities keep us motivated and effected in our work. We are constantly reminded of our goal since we make conscious efforts and decisions in its favour. This effectiveness is extremely perceivable in the work of apostles as it reported in the following verses, “The word of God continued to increase and the number of the disciples multiplied greatly in Jerusalem…”

✍ -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!

शुक्रवार, - 16 अप्रैल 2021

 

शुक्रवार, - 16 अप्रैल 2021

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पहला पाठ :प्रेरित-चरित 5:34-42


34) उस समय गमालिएल नामक फ़रीसी, जो संहिता का शास्त्री और सारी जनता में सम्मानित था, महासभा में उठ खड़ा हुआ। उसने प्रेरितों को थोड़ी देर के लिए बाहर ले जाने का आदेश दिया

35) और महासभा के सदस्यों से यह कहा, "इस्राइली भाइयों! आप सावधानी से विचार करें कि इन लोगों के साथ क्या करने जा रहे हैं।

36) कुछ समय पहले थेउदस प्रकट हुआ। वह दावा करता था कि मैं भी कुछ हूँ और लगभग चार सौ लोग उसके अनुयायी बन गये। वह मारा गया, उसके सभी अनुयारी बिखर गये और उनका नाम-निशान भी नहीं रहा।

37) उसके बाद, जनगणना के समय, यूदस गलीली प्रकट हुआ। उसने बहुत-से लोगों को बहका कर अपने विद्रोह में सम्मिलित कर लिया। वह भी नष्ट हो गया और उसके सभी अनुयायी बिखर गये।

38) इसलिए इस मामले के सम्बन्ध में मैं आप लोगों से यह कहना चाहता हूँ कि आप इनके काम में दखल न दें और इन्हें अपनी राह चलने दें। यदि यह योजना या आन्दोलन मनुष्यों का है, तो यह अपने आप नष्ट हो जायेगा।

39) परन्तु यदि यह ईश्वर का है, तो आप इन्हें नहीं मिटा सकेंगे और ईश्वर के विरोधी प्रमाणित होंगे।"

40) वे उसकी बात मान गये। उन्होंने प्रेरितों को बुला भेजा, उन्हें कोड़े लगवाये और यह कड़ा आदेश दे कर छोड़ दिया कि तुम लोग ईसा का नाम ले कर उपदेश मत दिया करो।

41) प्रेरित इसलिए आनन्दित हो कर महासभा के भवन से निकले कि वे {ईसा के} नाम के कारण अपमानित होने योग्य समझे गये।

42) वे प्रतिदिन मन्दिर में और घर-घर जा कर शिक्षा देते रहे और ईसा मसीह का सुसमाचार सुनाते रहे।


सुसमाचार : योहन 6:1-15


1) इसके बाद ईसा गलीलिया अर्थात् तिबेरियस के समुद्र के उस पर गये।

2) एक विशाल जनसमूह उनके पीछे हो लिया, क्योंकि लोगों ने वे चमत्कार देखे थे, जो ईसा बीमारों के लिए करते थे।

3) ईसा पहाड़ी पर चढ़े और वहाँ अपने शिष्यों के साथ बैठ गये।

4) यहूदियों का पास्का पर्व निकट था।

5) ईसा ने अपनी आँखें ऊपर उठायीं और देखा कि एक विशाल जनसमूह उनकी ओर आ रहा है। उन्होंने फिलिप से यह कहा, "हम इन्हें खिलाने के लिए कहाँ से रोटियाँ खरीदें?"

6) उन्होंने फिलिप की परीक्षा लेने के लिए यह कहा। वे तो जानते ही थे कि वे क्या करेंगे।

7) फिलिप ने उन्हें उत्तर दिया, "दो सौ दीनार की रोटियाँ भी इतनी नहीं होंगी कि हर एक को थोड़ी-थोड़ी मिल सके"।

8) उनके शिष्यों में एक, सिमोन पेत्रुस के भाई अन्द्रेयस ने कहा,

9) "यहाँ एक लड़के के पास जौ की पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ हैं, पर यह अतने लोगों के लिए क्या है,"

10) ईसा ने कहा, "लोगों को बैठा दो"। उस जगह बहुत घास थी। लोग बैठ गये। पुरुषों की संख्या लगभग पाँच हज़ार थी।

11) ईसा ने रोटियाँ ले लीं, धन्यवाद की प्रार्थना पढ़ी और बैठे हुए लोगों में उन्हें उनकी इच्छा भर बँटवाया। उन्होंने मछलियाँ भी इसी तरह बँटवायीं।

12) जब लोग खा कर तृत्त हो गये, तो ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, "बचे हुए टुकड़े बटोर लो, जिससे कुछ भी बरबाद न हो"।

13) इस लिए शिष्यों ने उन्हें बटोर लिया और उन टुकड़ों से बारह टोकरे भरे, जो लोगों के खाने के बाद जौ की पाँच रोटियों से बच गये थे।

14) लोग ईसा का यह चमत्कार देख कर बोल उठे, "निश्चय ही यह वे नबी हैं, जो संसार में आने वाले हैं"।

15) ईसा समझ गये कि वे आ कर मुझे राजा बनाने के लिए पकड़ ले जायेंगे, इसलिए वे फिर अकेले ही पहाड़ी पर चले गये।


📚 मनन-चिंतन


प्रभु के जीवन, मृत्यु एवं पुनरूत्थान की घटनाओं तथा पेंतेकोस्त के दिन पवित्र आत्मा के उतरने से प्रेरित नयी स्फूर्ति तथा सामर्थ्य से भर गये थे। वे पुनर्जीवित प्रभु का प्रचार साहस एवं बेहद प्रभावी रूप से कर रहे थे। यहूदी नेता येसु की सच्चाई के प्रति अंधे थे तथा किसी भी तरीके से वे प्रेरितों के प्रचार कार्य का दमन करना चाहते थे। उनके पास राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक तथा वित्तीय ताकतें थी जिसके द्वारा वे आक्रामक रूप से इन्हें दबाने का प्रयत्न कर रहे थे। इस पृष्ठभूमि में एक फरीसी गमालिएल जो संहिता का शास्त्री था ने ईश्वर पर भरोसा रखने का सुझाव देते हुये बताया कि पहले भी ऐसे अनेक आंदोलन हुये जो ऐसे प्रतीत होते थे मानो वह सफल होंगे किन्तु उनका दुःखद अंत हुआ। इसी प्रकार ख्राीस्त के प्रचार का यह प्रयास यदि मानवीय प्रयास है तो यह भी विफल हो जायेगा।

गमालिएल ने ईश्वर के सामर्थ्य में सच्चा विश्वास दिखाया। वह महासभा के सदस्यों से कहता हैं, ’’आप इनके काम में दखल न दें और इन्हें अपनी राह चलने दें। यदि यह योजना या आन्दोलन मनुष्यों का है तो यह अपने आप नष्ट हो जायेगा। परन्तु यदि यह ईश्वर का है तो आप इन्हें नहीं मिटा सकेंगे और ईश्वर के विरोधी प्रमाणित होंगे। ईश्वर के हाथों में सारी स्थिति सौंपने की यह बात साहसपूर्ण थी। ऐसा करने के लिये हमें गहरे विश्वास की आवश्यकता होती है अन्यथा परिस्थितियां हमें तबाह कर सकती है। राजा दाउद ईश्वर की अभिमुख मनुष्य था। वे जीवन की घटनाओं को ईश्वर के दृष्टिकोण से देखते थे। जब उन्हें अपनी जान बचाने के भागना पडा तो साउल का वंशज शिमई उसे कोसता है किन्तु दाउद इस बात से कतई उत्तेजित नहीं होते तथा कहते हैं, ’’यदि वह इसलिए दाऊद को कोसता है कि प्रभु ने उसे ऐसा करने की प्रेरणा दी है, तो कौन पूछ सकता है कि तुम ऐसा क्यों कर रहे हो?.....उसे कोसने दो, क्योंकि प्रभु ने उसे ऐसा करने की प्रेरणा दी है।’’ (2 समूएल 16:10-12) संत पौलुस ईश्वर की उदारता का आश्वासन देते हुये कहते हैं, ’’हम जानते हैं कि जो लोग ईश्वर को प्यार करते हैं और उसके विधान के अनुसार बुलाये गये हैं, ईश्वर उनके कल्याण के लिए सभी बातों में उनकी सहायता करता है’’। (रोमियों 8:28)




📚 REFLECTION



After the events related to Jesus’ life, death, resurrection and outpouring of the Holy Spirit at the Pentecost apostles were filled with great energy and strength. They were proclaiming the Risen Lord with unspoken boldness and emphatic. The Jews leaders being blind to the reality of the resurrection were terribly hostile and wanted to snub the apostles’ proclamation activities. They had the political, social, religious and financial muscle power to suppress the movement and in fact they were aggressively doing it. in such a scenario Gamaliel a Pharisee, a teacher of the law, dared to trust God, even if it means losing ground. He cited the earlier movements that seemed so real and powerful that everyone thought they might be game changer. However, after initial hype they were doomed to oblivion.

Gamaliel displayed a real faith in the power of God. He exhorted the council with the words, “Keep away from these men and let them alone; because if this plan or this undertaking is of human origin, it will fail; but if it is of God, you will not be able to overthrow them—in that case you may even be found fighting against God!’ (Acts 5:38-39) It was a brave call to leave the things or situation into God’s hands. Many a times when we are at the cross roads and find it difficult to discern, it is better to leave the things in God’s hand. For this we need to have a depth in our faith otherwise things or situations will tear us apart. King David was the man after the heart of God. He would always see things from God’s perspective. He had to a flee to save his life and when during this run, he had to face the abusive curses of Shimei but David refused to take offence at the cursing of the Shimei, descendent of Saul saying, “If he is cursing because the Lord has said to him, “Curse David”, who then shall say, “Why have you done so?”….It may be that the Lord will look on my distress, and the Lord will repay me with good for this cursing of me today.’ (2 Samuel 16:10-12) St. Paul assures us of God’s benevolent help, “We know that in everything God works for good with those who love him, who are called according to his purpose. ” (Romans 8:28)


✍ -Br. Biniush Topno


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आज का पवित्र वचन बुधवार - 14 अप्रैल 2021

 

बुधवार - 14 अप्रैल 2021

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 5:17-26


17) यह सब देख कर प्रधानयाजक और उसके सब संगी-साथी, अर्थात् सदूकी सम्प्रदाय के सदस्य, ईर्ष्या से जलने लगे।

18) उन्होंने प्रेरितों को गिरफ्तार कर सरकारी बन्दीगृह में डाल दिया।

19) परन्तु ईश्वर के दूत ने रात को बन्दीगृह के द्वार खोल दिये और प्रेरितों को बाहर ले जा कर यह कहा,

20) "जाइए और निडर हो कर मन्दिर में जनता को इस नव-जीवन की पूरी-पूरी शिक्षा सुनाइए"। उन्होंने यह बात मान ली और भोर होते ही वे मन्दिर जा कर शिक्षा देने लगे।

21) जब प्रधानायाजक और उसके संगी-साथी आये, तो उन्होंने महासभा अर्थात् इस्राएली नेताओं की सर्वोच्च परिषद् बुलायी और प्रेरितों को ले आने के लिए प्यादों को बन्दी-गृह भेजा।

22) जब प्यादे वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने प्रेरितों को बन्दीगृह में नहीं पाया। उन्होंने लौट कर यह समाचार दिया,

23) "हमने देखा कि बन्दीगृह बड़ी सावधानी से बन्द किया हुआ है और पहरेदार फाटकों पर तैनात हैं, किन्तु खोलने पर हमें भीतर कोई नहीं मिला।

24) यह सुन कर मन्दिर-आरक्षी के नायक और महायाजक यह नहीं समझ पा रहे थे कि प्रेरितों का क्या हुआ है।

25) इतने में किसी ने आ कर उन्हें यह समाचार दिया, "देखिए, आप लोगों ने जिन व्यक्तियों को बन्दीगृह में डाल दिया, वे मन्दिर में जनता को शिक्षा दे रहे हैं"।

26) इस पर मन्दिर का नायक अपने प्यादों के साथ जा कर प्रेरितों को ले आया। वे प्रेरितो को बलपूर्वक नहीं लाये, क्योंकि वे लोगों से डरते थे कि कहीं हम पर पथराव न करें।


सुसमाचार : योहन 3:16-21


16) ईश्वर ने संसार को इतना प्यार किया कि उसने इसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उस में विश्वास करता हे, उसका सर्वनाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन प्राप्त करे।

17) ईश्वर ने अपने पुत्र को संसार मं इसलिए नहीं भेजा कि वह संसार को दोषी ठहराये। उसने उसे इसलिए भेजा कि संसार उसके द्वारा मुक्ति प्राप्त करे।

18) जो पुत्र में विश्वास करता है, वह दोषी नहीं ठहराया जाता है। जो विश्वास नहीं करता, वह दोषी ठहराया जा चुका है; क्योंकि वह ईश्वर के एकलौते पुत्र के नाम में विश्वास नहीं करता।

19) दण्डाज्ञा का कारण यह है कि ज्योति संसार में आयी है और मनुष्यों ने ज्योति की अपेक्षा अन्धकार को अधिक पसन्द किया, क्योंकि उनके कर्म बुरे थे।

20) जो बुराई करता है, वह ज्योंति से बैर करता है और ज्योति के पास इसलिए नहीं आता कि कहीं उसके कर्म प्रकट न हो जायें।

21) किन्तु जो सत्य पर चलता है, वह ज्योति के पास आता है, जिससे यह प्रकट हो कि उसके कर्म ईश्वर की प्रेरणा से हुए हैं।


📚 मनन-चिंतन


अधिकाश लोग चमत्कार एवं दिव्य उपहारों को खोजते हैं और ऐसा करने में कोई हर्ज भी नहीं है। लेकिन स्वयं से यह सवाल भी पूछना चाहिये कि हम इन्हें क्यों चाहते हैं। यदि इन अभिलाषाओं एवं उपहारों को व्यक्तिगत और सांसारिक लाभ के लिये की जा रही हो तो वे शायद ही हमें मिले। किन्तु यदि वे ईश्वर की महिमा के लिये हो तो ईश्वर लौकिक एवं अलौकिक रूप से अवश्य ही हस्तक्षेप कर सकते हैं। ईश्वर के उपहार समुदाय के कल्याण के लिये होते हैं। ये ईश्वर की शक्ति एवं सामर्थ्य के चिन्ह होते हैं। जब पावन आत्मा के वरदान प्रत्याक्ष रूप में विश्वासियों और गैर-विश्वासियों पर प्रकट होते हैं तो वह लोगों के विश्वास को बढाता तथा ढांढस देता है ईश्वर समीप ही है तथा वह हमारे कल्याण के लिये कार्यरत है। जब ईश्वर अपने प्रेम, शक्ति-सामर्थ्य और प्रज्ञा को विश्वाससियों के द्वारा प्रदर्शित करता है तो गैर-विश्वासी इस चमत्कारों के समक्ष ईश्वर की सत्यता से रूबरू होते हैं। जो लोग ईश्वर प्रद्त्त उपहारों या चमत्कारों को करते हैं, वे लोगों की सेवा एवं कल्याण के लिये, मात्र ईश्वर के उपकरण एवं माध्यम होते हैं। हमें इन चमत्कारों को तुच्छ मानवीय लाभ की दृष्टि या दायरे से नहीं देखना चाहिये।

जब ईर्ष्या की भावना से महायाजक तथा अन्यों ने प्रेरितों का गिरफतार कर जेल में डालवा दिया था तो ईश्वर ने उन्हें आश्चर्यजनक ढंग से मुक्त कर दिया। कारावास के द्वार अपने आप खुल जाते हैं और वे बाहर आ जाते हैं। पहरेदारों ने द्वारों को ताला बंद पाया किन्तु प्रेरित अंदर नहीं थे। ईश्वर ने प्रेरितों को इस अलौकिक रूप इसलिये मुक्त कराया ताकि वे जाकर उन्हीं लोगों के समक्ष गवाही दे सके जिन्होंने उन्हें गिरफतार किया था। इस मुक्तिकार्य से विरोधी अंचभित थे। वे उनके इस प्रकार कारावास से छुटने को लेकर विस्मित थे। वे आश्चर्यचकित तो थे किन्तु इस महान कार्य में ईश्वर का सामर्थ्य पहचानने से इंकार करते हैं। महायाजकों तथा अन्य पुनः उनके विरूद्ध षडयंत्र रचने लगते हैं।

हमें अपने जीवन में तथा योजनाओं में इतना अधिक नहीं डूबना चाहिये कि हम ईश्वर की उपस्थिति को ही न पहचान पाये।




📚 REFLECTION



We seek miracles and divine gifts and we are not wrong in seekingthem in our lives. Sometimes it is good to ask ourselves so as why do we need them. If the gifts or miracles are meant for individual gains or mundane reasons then they may be hard to come by, however, if they are for the glory of God and not for vain human self then God may intervene even in some supernatural and human ways. God’s gifts are meant for the welfare of a larger community. They merely reflect God’s power among men. When the Holy Spirit works in various ways that can be perceived by believers and unbelievers, this encourages people’s faith that God is near and active and that he is working to fulfil his purposes in us and to bring blessings to his people. The unbelievers come face to face with the reality of the living God as He displays His power, His love, and His wisdom through His people.Those who receive God’s gifts are merely instruments of God for others. We must never confuse the gifts with petty selfish motives or gains.

When out of jealously the high priest and others arrested and put the apostles in public prison the Lord rescued them in an astonishing manner. The prison gates were opened and they moved out of the prison. The gourds found the prison securely locked but the apostles had not been there. The Lord did this great thing only to send them back to bear witness to the very people they had been arrested by. This rescue work left the oppositions into in to perplexity. They wonder how could some people be out of the tightly secured prison. They wondered about the incident but refused to believe God’s hand in such an extra-ordinary way. The chief priests and others still refused to believe in the power working in and through the apostles. They again began to plot how to destroy them.

We should not so much engrossed in our thinking and understanding of the events of life that we may fail to see God and his ways.

✍ -Br. Biniush Topno


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मंगलवार - 13 अप्रैल 2021

 

मंगलवार - 13 अप्रैल 2021

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 4:32-37


32) विश्वासियों का समुदाय एक हृदय और एकप्राण था। कोई भी अपनी सम्पत्ति अपनी ही नहीं समझता था। जो कुछ उनके पास था, उस में सबों का साझा था।

33) प्रेरित बड़े सामर्थ्य से प्रभु ईसा के पुनरुत्थान का साक्ष्य देते रहते थे और उन सबों पर बड़ी कृपा बनी रहती थी।

34) उन में कोई कंगाल नहीं था; क्योंकि जिनके पास खेत या मकान थे, वे उन्हें बेच देते और कीमत ला कर

35) प्रेरितों के चरणों में अर्पित करते थे। प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार बाँटा जाता था।

36) यूसुफ नामक लेवी-वंशी का जन्म कुप्रुस में हुआ था। प्रेरितों ने उसका उपनाम बरनाबस अर्थात् सान्त्वना-पुत्र रखा था।

37) उसकी एक जमीन थी। उसने उसे बेच दिया और उसकी कीमत ला कर प्रेरितों के चरणों मं अर्पित कर दी।


सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 3:7-15


7) आश्चर्य न कीजिए कि मैंने यह कहा- आप को दुबारा जन्म लेना है।

8) पवन जिधर चाहता, उधर बहता है। आप उसकी आवाज सुनते हैं, किन्तु यह नहीं जानते कि वह किधर से आता और किधर जाता है। जो आत्मा से जन्मा है, वह ऐसा ही है।’’

9) निकोदेमुस ने उन से पूछा, ‘‘यह कैसे हो सकता है?’’

10) ईसा ने उसे उत्तर दिया, ‘‘आप इस्राएल के गुरु हैं और ये बातें भी नहीं समझते!

11) मैं आप से यह कहता हूँ- हम जो जानते हैं, वही कहते हैं और हमने जो देखा है, उसी का साक्ष्य देते हैं; किन्तु आप लोग हमारा साक्ष्य स्वीकार नहीं करते।

12) मैंने आप को पृथ्वी की बातें बतायीं और आप विश्वास नहीं करते। यदि मैं आप को स्वर्ग की बातें बताऊँ, तो आप कैसे विश्वास करेंगे?

13) मानव पुत्र स्वर्ग से उतरा है। उसके सिवा कोई भी स्वर्ग नहीं पहुँचा।

14) जिस तरह मूसा ने मरुभूमि में साँप को ऊपर उठाया था, उसी तरह मानव पुत्र को भी ऊपर उठाया जाना है,

15) जिससे जो उस में विश्वास करता है, वह अनन्त जीवन प्राप्त करे।’’


📚 मनन-चिंतन


आदिम कलीसिया के चरित्र की मुख्य विशेषता उनका प्रभु के प्रति उत्साह एवं जोश था। उनका उत्साह इतना अधिक था कि वे येसु के लिये कोई भी खतरा उठाने को तैयार थे। हम सब अपने भविष्य के लिये आर्थिक रूप से कुछ न कुछ तैयारी करके रखते हैं ताकि किसी भी परिचित-अपरिचित घटनाक्रम से निपटा जा सके। लेकिन इन विश्वासियों ने प्रभु के प्रति अपने उत्साह के सामने इस पांरपरिक बुद्धिमता को नगण्य माना। एक-दूसरे की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये वे अपनी व्यक्तिगत संपत्ति को भी बेचकर उसका धन प्रेरितों को सौंपा करते थे। उनमें किसी की जरूरत अधूरी नहीं रहती थी। यह कितनी अविस्मणीय तथा मनभावन स्थिति थी।

दुनिया में कई विचारधाराओं ने सामाजिक एवं आर्थिक समानता एवं बराबरी स्थापित करने का प्रयास किया। इनमें मार्क्सवाद, साम्यवाद, समाजवाद आदि प्रमुख है। इन विचारधाराओं ने कुछ समय के लिये सबको चकमित कर रखा था किन्तु समय के साथ-साथ इनकी अप्रसांगिकता एवं खोलखापन भी उजागर हो गया। इनका उददेश्य समानता हासिल करना था जिसमें वे विफल रहे किन्तु आदिम कलीसिया ने तो वह समानता पूर्णरूप तथा स्वेच्छा से कई सौ साल पूर्व प्राप्त कर ली थी। इन विचारधाराओं में ईश्वर की कमी थी। इनके सिद्धांत जल्द ही हाशिये पर पहुॅच गये। किन्तु आदिम कलीसिया के उत्साह की मूल प्रेरणा ईश्वर था जिसने उन्हें दूसरों के कल्याण के लिये बुलाया था।

जब हम अपने आधुनिक समाज या फिर अपने अंदर झांककर टटोले तो पायेंगे कि हम सभी स्वार्थी तथा ज्यादा दुनियावी समझदारी से भरे पडे है। अपनी सम्पति को बचाये रखने के लिये हमारे पास सैकडो कारण है। जबकि दूसरे के लिये हमारी सम्पत्ति का कुछ अंश भी उसकी आवश्यकताओं को पूरी कर सकता है। यदि हम दूसरों की जरूरतों के प्रति उत्साह या संवेदनशीलता नहीं दिखा पाते हैं तो इसकी मुख्य वजह यह है कि हमने येसु को अपनी शक्ति और बुद्धि से प्रेम नहीं किया है। येसु के प्रति हमारे प्रेम में उत्साह एवं जोश की कमी है। आइये हम इन विश्वासियों के समूह से प्रेरणा प्राप्त करे।




📚 REFLECTION



One of the most extra-ordinary characteristics of the early Christian community was their passion and zeal for the Lord. Their passion was so great that they were willing to take any risk in their life. We keep some savings for futureto be prepared to meet the demands of any eventuality. But the believers did not take into account any of those conventional wisdom. For need of the believers’ community they were even selling off their possessions and handing over money to the apostles to meet the needs of the community. There was not a needy person among them. What a marvellous situation it was. All were equal, all share common good and there was an exceptional unity and harmony among them.

Many ideologies have come to forefront to redefine and restructure the economy and social order of the world. The ideologies such as the Marxist, Communists, Socialist etc. had all envisioned what the first Christian community had already achieved. These ideologies mesmerised the world for a while and then eventually were damped into the oblivion. The ideologies tried to achieve it without the love of God. They were devoid of God. On the contrary the believers’ community had nothing but love. They were overflowing with love for the Lord and for one another. It was the love and passion for Jesus that people were happily and willingly parting away from their possessions to meet the needs of the other.

As we look around and even probe into our own hearts, we find ourselves guilty of being selfish and calculative. We often have a reason to hold on to what we have even while it means a world for poor and the needy. If we lack desire and motivation to part away from our possession it is because we have not loved Jesus enough. Our love for Jesus lacks passion and flare. Let us take the inspiration from them and do likewise.

✍ -Br. Biniush Topno


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आज का पवित्र वचन 12 अप्रैल 2021

 

सोमवार - 12 अप्रैल 2021

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 4:23-31



23) रिहा होने के बाद पेत्रुस और योहन अपने लोगों के पास लौटे और महायाजकों तथा नेताओं ने उन से जो कुछ कहा था, वह सब बतलाया।

24) वे उनकी बातें सुन कर एक स्वर से ईश्वर को सम्बोधित करते हुए बोले, ’’प्रभु! तूने स्वर्ग और पृथ्वी बनायी, समुद्र भी, और जो कुछ उन में है।

25) तूने पवित्र आत्मा द्वारा हमारे पिता, अपने सेवक दाऊद के मुख से यह कहाः

26) राष्ट्रों में खलबली क्यों मची हुई? देश-देश के लोग व्यर्थ की बातें क्यों करते हैं? पृथ्वी के राजा विद्रोह करते हैं। वे प्रभु तथा उसके मसीह के विरुद्ध षड्यन्त्र रचते हैं।

27) वास्तव में हेरोद और पिलातुस, गैर-यहूदियों तथा इस्राएल के वंशों ने मिल कर इस शहर में तेरे परमपावन सेवक ईसा के विरुद्ध, जिनका तूने अभिशेक किया, षड्यन्त्र रचा था।

28) उन्होंने इस प्रकार वह सब पूरा किया, जिसे तू, शक्तिशाली विधाता, ने पहले से निर्धारित किया था।

29) प्रभु! तू उनकी धमकियों पर ध्यान दे और अपने सेवकों को यह कृपा प्रदान कर कि वे निर्भीकता से तेरा वचन सुनायें।

30) तू अपना हाथ बढ़ा कर अपने परमपावन सेवक ईसा के नाम पर स्वास्थ्यलाभ, चिन्ह तथा चमत्कार प्रकट होने दे।’’

31) उनकी प्रार्थना समाप्त होने पर वह भवन, जहाँ वे एकत्र थे, हिल गया। सब पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गये और निर्भीकता के साथ ईश्वर का वचन सुनाते रहे।



सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 3:1-8


1) निकोदेमुस नामक फरीसी यहूदियों की महासभा का सदस्य था।

2) वह रात को ईसा के पास आया और बोला, ‘‘रब्बी! हम जानते हैं कि आप ईश्वर की ओर से आये हुए गुरु हैं। आप जो चमत्कार दिखाते हैं, उन्हें कोई तब तक नहीं दिखा सकता, जब तक कि ईश्वर उसके साथ न हो।’’

3) ईसा ने उसे उत्तर दिया, ‘‘मैं आप से यह कहता हूँ- जब तक कोई दुबारा जन्म न ले, तब तक वह स्वर्ग का राज्य नहीं देख सकता’’।

4) निकोदेमुस ने उन से पूछा, ‘‘मनुष्य कैसे बूढ़ा हो जाने पर दुबारा जन्म ले सकता है? क्या वह अपनी माता के गर्भ में दूसरी बार प्रवेश कर जन्म ले सकता है?’’

5) ईसा ने उत्तर दिया, ‘‘मैं आप से कहता हूँ- जब तक कोई जल और पवित्र आत्मा से जन्म न ले, तब तक वह ईश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं कर सकता।

6) जो देह से उत्पन्न होता है, वह देह है और जो आत्मा से उत्पन्न होता है, वह आत्मा है।

7) आश्चर्य न कीजिए कि मैंने यह कहा- आप को दुबारा जन्म लेना है।

8) पवन जिधर चाहता, उधर बहता है। आप उसकी आवाज सुनते हैं, किन्तु यह नहीं जानते कि वह किधर से आता और किधर जाता है। जो आत्मा से जन्मा है, वह ऐसा ही है।’’


📚 मनन-चिंतन


निकोदेमुस येसु के पास आता है। यह रोचक बात है क्योंकि निकोदेमुस जैसा प्रतिष्ठित व्यक्ति येसु के पास कुछ सिखने आता है। निकोदेमुस फरीसियों के अभिजात वर्ग से था तथा स्वयं भी अव्वल दर्जे का शिक्षक था। इतनी साख होने के बावजूद भी वह येसु के पास आता है। निकोदेमुस खुद शिक्षक होकर भी येसु को ईश्वर के पास के आये शिक्षक, गुरू कहता है। येसु के महान कार्यों को देखकर वह समझ जाता है कि येसु एक धार्मिक व्यक्ति थे। वह येसु के बारे में पूरी तरह से नहीं जानता था किन्तु वह उनके कार्यों के कारण उनकी ओर खींचा चला आता है।

निकोदेमुस का मनोभाव या रूख हमें उसके ईश्वर के प्रति खुलेपन तथा तत्परता को दर्शाता है। येसु स्वयं यहूदियों से कहते हैं वे उनके कार्यों को देखे और परखे कि वे ईश्वर की सहायता से है या मानवीय स्रोत से, ’’मुझ पर विश्वास नहीं करने पर भी तुम कार्यों पर ही विश्वास करो, जिससे यह जान जाओ और समझ लो कि पिता मुझ में है और मैं पिता में हूं।’’ (योहन 10:38) जब योहन बपतिस्ता यह जानता चाहता था कि क्या येसु ही मसीह है या फिर वे किसी और की प्रतीक्षा करे तब येसु केवल अपने कार्यों का उल्लेख करते हुये कहते हैं, ’’उन्होंने योहन के शिष्यों से कहा, ’जाओ, तुमने जो सुना और देखा है, उसे योहन को बता दो - अंधे देखते हैं, लंगडे चलते हैं, कोढी शुद्ध किये जाते हैं, बहरे सुनते हैं, मुर्दे जिलाये जाते हैं, दरिद्रों को सुसमाचार सुनाया जाता है।’’ (लूकस 7:22)

येसु के कार्य स्वर्ग राज्य के आने के चिन्ह थे। हमें कार्यों की गंभीरता को गहराई से समझना तथा उन पर विश्वास करना चाहिये। हमें अपने दैनिक जीवन चर्या के छोट-बडे कार्यों में ईश्वर की उपस्थिती को देखना तथा महसूस कहते हुये विश्वास में गहरा बनाना चाहिये। ईश्वर हमारे जीवन में अपने मुक्ति के कार्यों के द्वारा हमें उनमें विश्वास करने के लिये आमंत्रित करते हैं।




📚 REFLECTION



Nicodemus comes to Jesus. It is quite interesting to know that a person of Nicodemus’s repute came to Jesus to learn something from him. Nicodemus belonged to the elite class of Pharisees,besides, ‘Sanhedrin’ and a high-quality teacher. Yet inspite of all these credentials he came to Jesus. Nicodemus being a teacher calls teacher a teacher but one who came from God. He knows that Jesus is a godly man because of the mighty works Jesus had been performing. He didn’t have the full identity of Jesus but he was drawn towards him by the great works of the Lord.

Nicodemus’ attitude tells us about his openness and willingness to see God in the works of Jesus. Jesus himself tells the Jews to look at his work and judge for themselves whether they are from God or from human source, “But if I do them, even though you do not believe me, believe the works, so that you may know and understand that the Father is in me and I am in the Father.’ (John 10:38) When John the Baptist inquired if Jesus was the Messiah, Jesus merely pointed out the works that he was doing for John to believe, “And he answered them, ‘Go and tell John what you have seen and heard: the blind receive their sight, the lame walk, the lepers are cleansed, the deaf hear, the dead are raised, the poor have good news brought to them.” (Luke 7:22)

Works of Jesus were the signs of the coming of the Kingdom. We need to understand the gravity of the works and believe. Even in our daily life we ought to realise the presence of God by the small and big happenings that take place and come to a greater faith. God through his saving and providential acts in our life invites us to come to faith in him.

✍ -Br. Biniush Topno


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पास्का का दूसरा रविवार - 11 अप्रैल 2021 दिव्य करुणा रविवार

 

पास्का का दूसरा रविवार - 11 अप्रैल 2021

दिव्य करुणा रविवार

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पहला पाठ :प्रेरित-चरित 4:32-35


32) विश्वासियों का समुदाय एक हृदय और एकप्राण था। कोई भी अपनी सम्पत्ति अपनी ही नहीं समझता था। जो कुछ उनके पास था, उस में सबों का साझा था।

33) प्रेरित बड़े सामर्थ्य से प्रभु ईसा के पुनरुत्थान का साक्ष्य देते रहते थे और उन सबों पर बड़ी कृपा बनी रहती थी।

34) उन में कोई कंगाल नहीं था; क्योंकि जिनके पास खेत या मकान थे, वे उन्हें बेच देते और कीमत ला कर

35) प्रेरितों के चरणों में अर्पित करते थे। प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार बाँटा जाता था।


दूसरा पाठ : 1 Jn 5:1-6


1) जो यह विश्वास करता है कि ईसा ही मसीह हैं, वह ईश्वर की सन्तान है और जो जन्मदाता को प्यार करता है, वह उसकी सन्तान को भी प्यार करता है।

2) इसलिए यदि हम ईश्वर को प्यार करते हैं और उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं, तो हमें ईश्वर की सन्तान को भी प्यार करना चाहिए।

3) ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करना- यही ईश्वर का प्रेम है। उसकी आज्ञाएं भारी नहीं,

4) क्योंकि ईश्वर की हर सन्तान संसार पर विजयी होती है। वह विजय, जो संसार को पराजित करती है, हमारा विश्वास ही है।

5) संसार का विजयी कौन है? केवल वही, जो यह विश्वास करता है कि ईसा ईश्वर के पुत्र हैं।

6) ईसा मसीह जल और रक्त से आये - न केवल जल से, बल्कि जल और रक्त से। आत्मा इसके विषय में साक्ष्य देता है, क्योंकि आत्मा सत्य है।


सुसमाचार : योहन 20:19-31.


19) उसी दिन, अर्थात सप्ताह के प्रथम दिन, संध्या समय जब शिष्य यहूदियों के भय से द्वार बंद किये एकत्र थे, ईसा उनके बीच आकर खडे हो गये। उन्होंने शिष्यों से कहा, "तुम्हें शांति मिले!"

20) और इसके बाद उन्हें अपने हाथ और अपनी बगल दिखायी। प्रभु को देखकर शिष्य आनन्दित हो उठे। ईसा ने उन से फिर कहा, "तुम्हें शांति मिले!

21) जिस प्रकार पिता ने मुझे भेजा, उसी प्रकार मैं तुम्हें भेजता हूँ।"

22) इन शब्दों के बाद ईसा ने उन पर फूँक कर कहा, "पवित्र आत्मा को ग्रहण करो!

23) तुम जिन लोगों के पाप क्षमा करोगे, वे अपने पापों से मुक्त हो जायेंगे और जिन लोगों के पाप क्षमा नहीं करोगे, वे अपने पापों से बँधे रहेंगे।

24) ईसा के आने के समय बारहों में से एक थोमस जो यमल कहलाता था, उनके साथ नहीं था।

25) दूसरे शिष्यों ने उस से कहा, "हमने प्रभु को देखा है"। उसने उत्तर दिया, "जब तक मैं उनके हाथों में कीलों का निशान न देख लूँ, कीलों की जगह पर अपनी उँगली न रख दूँ और उनकी बगल में अपना हाथ न डाल दूँ, तब तक मैं विश्वास नहीं करूँगा।

26) आठ दिन बाद उनके शिष्य फिर घर के भीतर थे और थोमस उनके साथ था। द्वार बन्द होने पर भी ईसा उनके बीच आ कर खडे हो गये और बोले, "तुम्हें शांति मिले!"

27) तब उन्होने थोमस से कहा, "अपनी उँगली यहाँ रखो। देखो- ये मेरे हाथ हैं। अपना हाथ बढ़ाकर मेरी बगल में डालो और अविश्वासी नहीं, बल्कि विश्वासी बनो।"

28 थोमस ने उत्तर दिया, "मेरे प्रभु! मेरे ईश्वर!"

29) ईसा ने उस से कहा, "क्या तुम इसलिये विश्वास करते हो कि तुमने मुझे देखा है? धन्य हैं वे जो बिना देखे ही विश्वास करते हैं।"

30) ईसा ने अपने शिष्यों के सामने और बहुत से चमत्कार दिखाये जिनका विवरण इस पुस्तक में नहीं दिया गया है।

31) इनका ही विवरण दिया गया है जिससे तुम विश्वास करो कि ईसा ही मसीह, ईश्वर के पुत्र हैं और विश्वास करने से उनके नाम द्वारा जीवन प्राप्त करो।


📚 मनन-चिंतन


येसु ने अपने शिष्यों से कहा, ’’शांति तुम्हारे साथ हो; जिस प्रकार पिता ने मुझे भेजा है, वैसे ही मैं तुम्हें भेजता हूं। येसु अपने पिता की इच्छा पूरी करने, पिता के द्वारा भेजे गये थे। (योहन 4:34; 6:38-39); वे पिता के वचन बताने (योहन 12:49) तथा पिता के कार्य करने भेजे गये थे। (योहन 4:34; 5:36) वे संसार की मुक्ति के लिये भेजे गये थे (योहन 3:37)। योहन 18:37 में वे पिलातुस से कहते हैं, ’’मैं इसलिये जन्मा और इसलिये संसार में आया हूं कि सत्य के विषय में साक्ष्य पेश कर सकूं।’’ वे लोगों को पिता के राज्य में प्रवेश दिलाने आये। जिस प्रकार वे भेजे गये थे उसी प्रकार वे हमें भी भेजते हैं। इसलिये उनका लक्ष्य अब हमारा लक्ष्य बन जाता है।

येसु पिता को प्रकट करने के लिये हमारे बीच आये। आज प्रभु जिन पर अपने को प्रकट करते हैं उनको भेजते भी है। इसलिये संत पौलुस बताते हैं ख्रीस्त विश्वासियों के बीच उपस्थित तथा जीवंत बने रहते हैं। इस प्रकार हम एक दूसरे के लिये ’लघु ख्रीस्त’ बन जाते हैं।

लेकिन अक्सर एवं अधिकांशः हम कलीसिया के रूप में, भले वह चाहे व्यक्तिगतरूप से हो या सामूहिक- अपने को ख्रीस्त भेजे गये लक्ष्य से भटक जाते हैं। हम वर्तमान के सामाजिक तथा राजनैतिक परिवेश जो ख्रीस्तीय के जीवन को मुश्किल बनाता है, की आड में छिपने की कोशिश करते हुये कहते है, अभी समय अनुकूल नहीं है। हम उन सभी सीमिताओं को, जो हम कलीसिया या व्यक्तिगत रूप से महसूस करते हैं को ढाल बनाते हें। कुछ वर्ष पूर्व इग्लैंड के सोहन सिंह जोकि वहॉ किराने की दुकाने चलते थे का रोचक तथा चर्चित किस्सा सामने आया। उन्होंने अपनी दुकान पर उन सारे उपभोक्ताओं के प्रवेश पर रोक लगा दी थी जो ध्रूमपान करते थे या फिर जो अश्लील भाषा बोलते थे या जो शिशुओं को घुमाने लाते थे या जो अभद्र व्यवहार करते थे आदि। इस प्रकार उन्होंने अपने बहुत सारे ग्राहकों को खो दिया था। एक अखबार को दिये साक्षात्कार में उन्होंने कहा, ’’मेरे सिद्धांतों और निर्णयों के कारण मैंने बहुत ग्राहकों को खो दिया तथा व्यापार में हानि भी उठायी किन्तु मुझे इस पर कोई खेद नहीं हैं।’’ सोहन सिंह के निर्णय पर हम भी सवाल उठा सकते हैं कि यह व्यापार की दृष्टि से सही फैसला नहीं था। किन्तु समाज-सुधार का जो सपना वह संजोय हुये था वह उसे किसी भी कीमत पर हासिल करना चाहता था।

ऐसा प्रतीत होता है कि सोहन सिंह का फैसला मूर्खतापूर्ण फैसला था। उसने अपनी व्यक्तिगत नैतिक धारणा को अपने व्यापार के साथ मिश्रित किया। किन्तु अपने सिद्धांतों के प्रति उसकी दृढ आस्था शिक्षाप्रद तथा प्रेरणादायक है। उसमें उसके सिद्धांतों के लिये खडे होने का साहस था। वह अपनी दुकान में ग्राहकों को अभद्र व्यवहार करते नहीं देख सकता था इसलिये उसने यह अजीबोगरीब कदम उठाया। उसनेस अपनी इस आप्रासंगिक तथा अलोकप्रिय प्रतीत होती शैली के बावजूद भी अपने उसूलों के साथ समझौता नहीं किया।

कलीसिया भी अपने मूल उददेश्य को पूरा करने के लिये समय तथा परिस्थितियों के बदलने का इंतजार नहीं कर सकती । हमारा मिशन ’दूसरा ख्रीस्त’ बनने का है। हमारा मिशन यही है हम उन सब के पाप माफ करे जिन्होंने हमारे विरूद्ध काम किया हो। हमें ईश्वर के राज्य के लिये कार्य करते हुये ’चंगाई’ प्रदान करने वाले सैनिक बनना चाहिये। लेकिन वर्तमान प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण हमारे उत्साह तथा दिलचस्पी में भारी कमी आई है।

हमें अपनी व्यक्तिगत सीमिताओं तथा चुनौतिपूर्ण परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर येसु द्वारा प्रदान मिशन को हर दिन एवं हर पल जीना चाहिये। प्रारंभिक कलीसिया ने बहुत विकट तथा हिंसक परिस्थितियों का सामना किया तथा इसके बावजूद भी वे ख्रीस्त के मिशन को जीने में सफल रहे। हमें भी अपने आईने में झांकना चाहिये तथा पूछना चाहिये कि ख्रीस्त के मिशन को जीने में विफलता के लिये वास्तविक कारण क्या है? हम जानते हैं परिस्थितियों को चुनौती देने से परेशानी तथा अत्याचार का माहौल बनेगा तथा हमारा दमन होगा किन्तु येसु ने हमें भेजते समय यह भी बताया है, ’’देखो, मैं तुम्हें भेडियों के बीच भेडों की तरह भेजता हूं। इसलिये सॉप की तरह चतुर और कपोत की तरह निष्कपट बनों’’ (मत्ती 10:16) हमें भी सॉप के तरह परिस्थितियों का सामना चतुरता के करना तथा कपोत की तरह निष्कपट अंतरतम रखकर अपना कार्य जारी रखना चाहिये।



📚 REFLECTION



Jesus said to his disciples, ‘Peace be with you; as the Father has sent Me, I also send you.” Jesus was sent by the Father to do his will (John 4:34; 6:38-39); to speak the Father’s words (John 12:49); and to perform the Father’s works (John 4:34; 5:36). He was sent to bring salvation to the world (John 3:17). In John 18:37, Jesus told Pilate, “For this I have been born, and for this I have come into the world, to testify to the truth.” He came to establish the Father’s kingdom by bringing people under His lordship to do His will. By sending us in the same way that He was sent, His purpose becomes our purpose.

Jesus came to reveal God to us. Today, those whom Jesus sends reveal Him. In this regard, Paul proclaimed that Christ lives in and through believers. Hence we become “little Christ’ to one another.

But so often the church collectively and we as individuals lose sight of our purpose. We get distracted with other things. We try to hide behind the prevailing social and political circumstances which are making the life of the Christians harder and harder. We try to excuse ourselves by enumerating the limitations we experience as individuals and the as collectively Church. A few years ago, Mr. Sohan Singh, grocery store owner hit the headline in England. He had banned customers from his grocery store in England. He told a London newspaper that he was forced to take such drastic action because of people’s bad manners. First, he banned smoking, then crude language, baby strollers, pets and finally customers themselves. Shoppers now must look through the window to spot items they want and then ring a bell to be served through a small hatch in the door. “I have lost business, but I cannot say how much,” Singh said. “I am a man of principles, and I stand by my decision.” (In Flagstaff Live, June 4-10, 1998.)

It seems that a grocer who bans customers from his store has lost sight of his purpose! If your aim is to sell groceries, then you must put up with some people whom you may dislike in order to achieve your purpose.

Sohan Singh made a foolish decision to mix up his personal moral-ethical principles with public behaviour of the people. However, his audacity and conviction to his principles are overwhelmingly edifying. He had the courage to stand for his principle. He could not sit in his store and let people behave in it as it pleases them. He decided to live by this conviction and principles and of course, paid the price. He lost considerable of it. That’s fine! He was true to his conviction although it appears irrelevant and outdated in the modern world.

Church too cannot wait for the situation to become conducive and tolerable. The mission of every individual is to be another Christ to his fellow man. Mission is to forgive the sins of those who have sinned against you. Mission is to be healing soldier working for ‘His kingdom to come’. Somewhere the zeal and zest for the mission has been smothered under theprevailing unconducive situation.

We got to live day in and day out the mission of Jesus, overcoming the personal barriers and limitation and challenging the circumstances. The early Christians had one of the most hostile situations but nothing prevented them to accept Christ and proclaim it. we ought to look into the mirror and challenge our settled disposition to flow with the current. We know by reversing the trend there will be ripples and disturbance but the Lord had already warned us, “Behold, I am sending you out sheep among the wolves. be wise as serpents and innocent as doves." (Matthew 10:16) We ought to gauge the situation and deal with prudence like serpent and maintain our inner self innocent like that of the dove and march forward to complete for which we have been sent.



मनन- चिं तन


“अविश्वासी नहीं बल्कि विश्वासी बनों।”

प्रभु येसु थॉमस को अपने घावों का स्पर्श करने को कहते हैं तथा इन शब्दों “अविश्वासी नहीं, बल्कि विश्वासी बनो”, के साथ उससे विश्वासी बनने का आव्हान करते हैं। इस बात का यह तात्पर्य नहीं है कि इससे पहले थॉमस येसु में विश्वास नहीं करता था। वह पहले से विश्वासी था किन्तु उसका विश्वास अपरिपक्व था तथा उसे येसु में संदेह हो गया था। जैसा कि संत याकूब कहते हैं, “क्योंकि जो संदेह करता है, वह समुद्र की लहरों के सदृश है, जो हवा से इधर-उधर उछाली जाती हैं।” (याकूब 1:6) थॉमस का विश्वास येसु के दुःखभोग एवं मृत्यु के कारण विचलित हो गया था। थॉमस जानता था कि येसु एक महान व्यक्ति थे। उसने येसु के साथ रहकर विस्मयकारी चमत्कारों को देखा था। ऐसे महान एवं चमत्कारी पुरूष के इस प्रकार दीन-हीन दशा में मर जाने ने थॉमस के विश्वास के स्तंभों को हिला दिया था। अब फिर से विश्वास करना उन्हें मुश्किल लग रहा था।

विश्वास एक अदभुत वस्तु है। विश्वास के सहारे हम महान एवं अविश्वनीय कार्य पूरे कर सकते हैं। किन्तु यदि हमारे विश्वास में संदेह, दृढ़ता एवं निरंतरता की कमी होती है तो हम ज्यादा आगे नहीं जा सकते। येसु स्वयं कहते हैं, “यदि तुम्हें विश्वास हो और तुम संदेह न करो, ....तुम इस पहाड से यह कहो- उठ, समुद्र में गिर जा’ तो वैसा ही हो जायेगा।” (मत्ती 21:21) अगर विश्वास की कमी को पूरा करना है तो हमें संदेह से ऊपर उठना होगा। संदेह विश्वास के लिए दीमक समान है। संदेह के कारण विश्वास पनप नहीं पाता है इसलिए संदेह पर विजय प्राप्त कर हमें विश्वास की परिपूर्णता तक पहुँचने का प्रयत्न करना चाहिए। येसु थॉमस के संदेह को कैसे दूर करते हैं? थॉमस के संदेह का कारण येसु की मृत्यु थी। क्रूस पर उनकी मृत्यु ने शायद उसके लिए विश्वास के सारे मार्ग अविरूद्ध कर दिये थे। ऐसी मनस्थिति में केवल पुनरूत्थित, पुनर्जीवित येसु ही उसके विश्वास को पुनः स्थापित कर सकते थे। थॉमस के संदेह को दूर करने पुनरूत्थित येसु स्वयं उसके पास आते हैं तथा उसे अपने घावों को स्पर्श करने का निमंत्रण देते हैं। यदि हमारे विश्वास में भी संदेह है तो हमें भी येसु से उस संदेह को दूर करने की प्रार्थना करनी चाहिए।

येसु संत योहन बपतिस्ता को मानवों में सबसे महान कहते हैं, “मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ - मनुष्यों में योहन बपतिस्ता से बड़ा कोई पैदा नहीं हुआ।” (मत्ती 11:11) किन्तु योहन भी येसु को लेकर संशय में पड़ जाते है। इसलिए वे बंदीगृह से अपने शिष्यों को येसु के पास यह पूछने भेजते हैं, “क्या आप वही हैं, जो आने वाले हैं या हम किसी और की प्रतीक्षा करें?”(मत्ती 11:3) येसु योहन के शिष्यों से अपने कार्यों की चर्चा करते हुए कहते हैं, “जाओ, तुम जो सुनते और देखते हो, उसे योहन को बता दो - अंधे देखते हैं, लँगड़े चलते हैं, कोढ़ी शुद्ध किये जाते हैं, बहरे सुनते हैं, मुरदे जिलाये जाते हैं, दरिद्रों को सुसमाचार सुनाया जाता है,”। येसु वास्तव में नबी इसायाह की प्रतिज्ञात मसीहा के बारे में की गयी भविष्यवाणी (देखिये इसायाह 35:5-6) को योहन के लिए दोहराते है। येसु जानते थे कि धर्मग्रंथ की बात को पूरा होते देख योहन का विश्वास कि येसु ही मसीह है, दृढ़ता प्राप्त करेगा। इसके अंत में येसु जोड देते हैं, “और धन्य है वह, जिसका विश्वास मुझ पर से नहीं उठता!” योहन की मनस्थिति यही बताती है कि किसी को भी संदेह हो सकता है। येसु भी मनुष्य की इस कमी को समझते हैं तथा योहन के शिष्यों के जाने के बाद योहन बपतिस्ता के विश्वास को महान बताते हुये कहते हैं, “योहन वही एलियस है जो आने वाला था।” (मत्ती 11:14) इस प्रकार विश्वास के अभाव को यदि ईश्वर के सामने व्यक्त किया जाये तो ईश्वर इस संशय को दूर कर विश्वास के अभाव को पूर्णता तक पहुँचा देते हैं।

येसु मरथा के विश्वास को भी पूर्णता तक ले जाते हैं। लाजरूस के मरने के बाद भी मरथा ईसा में विश्वास बनाये रखती है तथा कहती है, “प्रभु! यदि आप यहाँ होते, तो मेरा भाई नही मरता और मैं जानती हूँ कि आप अब भी ईश्वर से जो माँगेंगे, ईश्वर आप को वही प्रदान करेगा। (योहन 11:21-22) येसु मरथा की इस मांग को यह कहकर “क्या मैंने तुम से यह नहीं कहा कि यद तुम विश्वास करोगी, तो ईश्वर की महिमा देखोगी? (योहन 11:40) पूरा करते हैं तथा उनके भाई लाजरूस को पुनर्जीवित करते है। मरथा का विश्वास संसार के अंत में होने वाले पुनरूत्थान में था लेकिन येसु उसे मरथा के लिए यथार्थ की बात बना देते हैं।

हमारा ख्रीस्तीय विश्वास भी संदेह के घेरे में आता जाता रहता है। ऐसी स्थिति में क्या हम निराश होकर प्रार्थना करना छोड देते हैं या फिर थॉमस, योहन बपतिस्ता या फिर मरथा के समान येसु के पास अपने संदेह को लेकर जाते हैं? नबी हबक्कूक कहते हैं, “मैं अपनी चौकी पर खड़ा हो जाऊँगा, मैं चारदीवारी पर चढ कर प्रतीक्षा करता रहूँगा कि प्रभु मुझ से क्या कहेगा और मेरी शिकायतों का क्या उत्तर देगा। प्रभु ने उत्तर में मुझ से यह कहा, “जो दृश्य तुम देखने वाले हो, उसे स्पष्ट रूप से पाटियों पर लिखो, जिससे सब उसे सुगमता से पढ सकें”। ईश्वर हबक्कूक से लिखने को कहते हैं जिससे लोग उसे पढ कर विश्वास कर सके। संत योहन भी सुसमाचार के लिखने का उद्देश्य बताते कि लोग विश्वास में बने रहें, “इनका विवरण दिया गया है, जिससे तुम विश्वास करो...।” आइये हम भी अपने विश्वास को संदेह से दूर रखे तथा संदेह की स्थिति में येसु को जीवन में आमंत्रित करे तथा वचन की सहायता से विश्वास की परिपक्वता तक पहुँच सके।


✍ Br. Biniush Topno

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Praise the Lord!