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पास्का का दूसरा रविवार - 11 अप्रैल 2021 दिव्य करुणा रविवार

 

पास्का का दूसरा रविवार - 11 अप्रैल 2021

दिव्य करुणा रविवार

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पहला पाठ :प्रेरित-चरित 4:32-35


32) विश्वासियों का समुदाय एक हृदय और एकप्राण था। कोई भी अपनी सम्पत्ति अपनी ही नहीं समझता था। जो कुछ उनके पास था, उस में सबों का साझा था।

33) प्रेरित बड़े सामर्थ्य से प्रभु ईसा के पुनरुत्थान का साक्ष्य देते रहते थे और उन सबों पर बड़ी कृपा बनी रहती थी।

34) उन में कोई कंगाल नहीं था; क्योंकि जिनके पास खेत या मकान थे, वे उन्हें बेच देते और कीमत ला कर

35) प्रेरितों के चरणों में अर्पित करते थे। प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार बाँटा जाता था।


दूसरा पाठ : 1 Jn 5:1-6


1) जो यह विश्वास करता है कि ईसा ही मसीह हैं, वह ईश्वर की सन्तान है और जो जन्मदाता को प्यार करता है, वह उसकी सन्तान को भी प्यार करता है।

2) इसलिए यदि हम ईश्वर को प्यार करते हैं और उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं, तो हमें ईश्वर की सन्तान को भी प्यार करना चाहिए।

3) ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करना- यही ईश्वर का प्रेम है। उसकी आज्ञाएं भारी नहीं,

4) क्योंकि ईश्वर की हर सन्तान संसार पर विजयी होती है। वह विजय, जो संसार को पराजित करती है, हमारा विश्वास ही है।

5) संसार का विजयी कौन है? केवल वही, जो यह विश्वास करता है कि ईसा ईश्वर के पुत्र हैं।

6) ईसा मसीह जल और रक्त से आये - न केवल जल से, बल्कि जल और रक्त से। आत्मा इसके विषय में साक्ष्य देता है, क्योंकि आत्मा सत्य है।


सुसमाचार : योहन 20:19-31.


19) उसी दिन, अर्थात सप्ताह के प्रथम दिन, संध्या समय जब शिष्य यहूदियों के भय से द्वार बंद किये एकत्र थे, ईसा उनके बीच आकर खडे हो गये। उन्होंने शिष्यों से कहा, "तुम्हें शांति मिले!"

20) और इसके बाद उन्हें अपने हाथ और अपनी बगल दिखायी। प्रभु को देखकर शिष्य आनन्दित हो उठे। ईसा ने उन से फिर कहा, "तुम्हें शांति मिले!

21) जिस प्रकार पिता ने मुझे भेजा, उसी प्रकार मैं तुम्हें भेजता हूँ।"

22) इन शब्दों के बाद ईसा ने उन पर फूँक कर कहा, "पवित्र आत्मा को ग्रहण करो!

23) तुम जिन लोगों के पाप क्षमा करोगे, वे अपने पापों से मुक्त हो जायेंगे और जिन लोगों के पाप क्षमा नहीं करोगे, वे अपने पापों से बँधे रहेंगे।

24) ईसा के आने के समय बारहों में से एक थोमस जो यमल कहलाता था, उनके साथ नहीं था।

25) दूसरे शिष्यों ने उस से कहा, "हमने प्रभु को देखा है"। उसने उत्तर दिया, "जब तक मैं उनके हाथों में कीलों का निशान न देख लूँ, कीलों की जगह पर अपनी उँगली न रख दूँ और उनकी बगल में अपना हाथ न डाल दूँ, तब तक मैं विश्वास नहीं करूँगा।

26) आठ दिन बाद उनके शिष्य फिर घर के भीतर थे और थोमस उनके साथ था। द्वार बन्द होने पर भी ईसा उनके बीच आ कर खडे हो गये और बोले, "तुम्हें शांति मिले!"

27) तब उन्होने थोमस से कहा, "अपनी उँगली यहाँ रखो। देखो- ये मेरे हाथ हैं। अपना हाथ बढ़ाकर मेरी बगल में डालो और अविश्वासी नहीं, बल्कि विश्वासी बनो।"

28 थोमस ने उत्तर दिया, "मेरे प्रभु! मेरे ईश्वर!"

29) ईसा ने उस से कहा, "क्या तुम इसलिये विश्वास करते हो कि तुमने मुझे देखा है? धन्य हैं वे जो बिना देखे ही विश्वास करते हैं।"

30) ईसा ने अपने शिष्यों के सामने और बहुत से चमत्कार दिखाये जिनका विवरण इस पुस्तक में नहीं दिया गया है।

31) इनका ही विवरण दिया गया है जिससे तुम विश्वास करो कि ईसा ही मसीह, ईश्वर के पुत्र हैं और विश्वास करने से उनके नाम द्वारा जीवन प्राप्त करो।


📚 मनन-चिंतन


येसु ने अपने शिष्यों से कहा, ’’शांति तुम्हारे साथ हो; जिस प्रकार पिता ने मुझे भेजा है, वैसे ही मैं तुम्हें भेजता हूं। येसु अपने पिता की इच्छा पूरी करने, पिता के द्वारा भेजे गये थे। (योहन 4:34; 6:38-39); वे पिता के वचन बताने (योहन 12:49) तथा पिता के कार्य करने भेजे गये थे। (योहन 4:34; 5:36) वे संसार की मुक्ति के लिये भेजे गये थे (योहन 3:37)। योहन 18:37 में वे पिलातुस से कहते हैं, ’’मैं इसलिये जन्मा और इसलिये संसार में आया हूं कि सत्य के विषय में साक्ष्य पेश कर सकूं।’’ वे लोगों को पिता के राज्य में प्रवेश दिलाने आये। जिस प्रकार वे भेजे गये थे उसी प्रकार वे हमें भी भेजते हैं। इसलिये उनका लक्ष्य अब हमारा लक्ष्य बन जाता है।

येसु पिता को प्रकट करने के लिये हमारे बीच आये। आज प्रभु जिन पर अपने को प्रकट करते हैं उनको भेजते भी है। इसलिये संत पौलुस बताते हैं ख्रीस्त विश्वासियों के बीच उपस्थित तथा जीवंत बने रहते हैं। इस प्रकार हम एक दूसरे के लिये ’लघु ख्रीस्त’ बन जाते हैं।

लेकिन अक्सर एवं अधिकांशः हम कलीसिया के रूप में, भले वह चाहे व्यक्तिगतरूप से हो या सामूहिक- अपने को ख्रीस्त भेजे गये लक्ष्य से भटक जाते हैं। हम वर्तमान के सामाजिक तथा राजनैतिक परिवेश जो ख्रीस्तीय के जीवन को मुश्किल बनाता है, की आड में छिपने की कोशिश करते हुये कहते है, अभी समय अनुकूल नहीं है। हम उन सभी सीमिताओं को, जो हम कलीसिया या व्यक्तिगत रूप से महसूस करते हैं को ढाल बनाते हें। कुछ वर्ष पूर्व इग्लैंड के सोहन सिंह जोकि वहॉ किराने की दुकाने चलते थे का रोचक तथा चर्चित किस्सा सामने आया। उन्होंने अपनी दुकान पर उन सारे उपभोक्ताओं के प्रवेश पर रोक लगा दी थी जो ध्रूमपान करते थे या फिर जो अश्लील भाषा बोलते थे या जो शिशुओं को घुमाने लाते थे या जो अभद्र व्यवहार करते थे आदि। इस प्रकार उन्होंने अपने बहुत सारे ग्राहकों को खो दिया था। एक अखबार को दिये साक्षात्कार में उन्होंने कहा, ’’मेरे सिद्धांतों और निर्णयों के कारण मैंने बहुत ग्राहकों को खो दिया तथा व्यापार में हानि भी उठायी किन्तु मुझे इस पर कोई खेद नहीं हैं।’’ सोहन सिंह के निर्णय पर हम भी सवाल उठा सकते हैं कि यह व्यापार की दृष्टि से सही फैसला नहीं था। किन्तु समाज-सुधार का जो सपना वह संजोय हुये था वह उसे किसी भी कीमत पर हासिल करना चाहता था।

ऐसा प्रतीत होता है कि सोहन सिंह का फैसला मूर्खतापूर्ण फैसला था। उसने अपनी व्यक्तिगत नैतिक धारणा को अपने व्यापार के साथ मिश्रित किया। किन्तु अपने सिद्धांतों के प्रति उसकी दृढ आस्था शिक्षाप्रद तथा प्रेरणादायक है। उसमें उसके सिद्धांतों के लिये खडे होने का साहस था। वह अपनी दुकान में ग्राहकों को अभद्र व्यवहार करते नहीं देख सकता था इसलिये उसने यह अजीबोगरीब कदम उठाया। उसनेस अपनी इस आप्रासंगिक तथा अलोकप्रिय प्रतीत होती शैली के बावजूद भी अपने उसूलों के साथ समझौता नहीं किया।

कलीसिया भी अपने मूल उददेश्य को पूरा करने के लिये समय तथा परिस्थितियों के बदलने का इंतजार नहीं कर सकती । हमारा मिशन ’दूसरा ख्रीस्त’ बनने का है। हमारा मिशन यही है हम उन सब के पाप माफ करे जिन्होंने हमारे विरूद्ध काम किया हो। हमें ईश्वर के राज्य के लिये कार्य करते हुये ’चंगाई’ प्रदान करने वाले सैनिक बनना चाहिये। लेकिन वर्तमान प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण हमारे उत्साह तथा दिलचस्पी में भारी कमी आई है।

हमें अपनी व्यक्तिगत सीमिताओं तथा चुनौतिपूर्ण परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर येसु द्वारा प्रदान मिशन को हर दिन एवं हर पल जीना चाहिये। प्रारंभिक कलीसिया ने बहुत विकट तथा हिंसक परिस्थितियों का सामना किया तथा इसके बावजूद भी वे ख्रीस्त के मिशन को जीने में सफल रहे। हमें भी अपने आईने में झांकना चाहिये तथा पूछना चाहिये कि ख्रीस्त के मिशन को जीने में विफलता के लिये वास्तविक कारण क्या है? हम जानते हैं परिस्थितियों को चुनौती देने से परेशानी तथा अत्याचार का माहौल बनेगा तथा हमारा दमन होगा किन्तु येसु ने हमें भेजते समय यह भी बताया है, ’’देखो, मैं तुम्हें भेडियों के बीच भेडों की तरह भेजता हूं। इसलिये सॉप की तरह चतुर और कपोत की तरह निष्कपट बनों’’ (मत्ती 10:16) हमें भी सॉप के तरह परिस्थितियों का सामना चतुरता के करना तथा कपोत की तरह निष्कपट अंतरतम रखकर अपना कार्य जारी रखना चाहिये।



📚 REFLECTION



Jesus said to his disciples, ‘Peace be with you; as the Father has sent Me, I also send you.” Jesus was sent by the Father to do his will (John 4:34; 6:38-39); to speak the Father’s words (John 12:49); and to perform the Father’s works (John 4:34; 5:36). He was sent to bring salvation to the world (John 3:17). In John 18:37, Jesus told Pilate, “For this I have been born, and for this I have come into the world, to testify to the truth.” He came to establish the Father’s kingdom by bringing people under His lordship to do His will. By sending us in the same way that He was sent, His purpose becomes our purpose.

Jesus came to reveal God to us. Today, those whom Jesus sends reveal Him. In this regard, Paul proclaimed that Christ lives in and through believers. Hence we become “little Christ’ to one another.

But so often the church collectively and we as individuals lose sight of our purpose. We get distracted with other things. We try to hide behind the prevailing social and political circumstances which are making the life of the Christians harder and harder. We try to excuse ourselves by enumerating the limitations we experience as individuals and the as collectively Church. A few years ago, Mr. Sohan Singh, grocery store owner hit the headline in England. He had banned customers from his grocery store in England. He told a London newspaper that he was forced to take such drastic action because of people’s bad manners. First, he banned smoking, then crude language, baby strollers, pets and finally customers themselves. Shoppers now must look through the window to spot items they want and then ring a bell to be served through a small hatch in the door. “I have lost business, but I cannot say how much,” Singh said. “I am a man of principles, and I stand by my decision.” (In Flagstaff Live, June 4-10, 1998.)

It seems that a grocer who bans customers from his store has lost sight of his purpose! If your aim is to sell groceries, then you must put up with some people whom you may dislike in order to achieve your purpose.

Sohan Singh made a foolish decision to mix up his personal moral-ethical principles with public behaviour of the people. However, his audacity and conviction to his principles are overwhelmingly edifying. He had the courage to stand for his principle. He could not sit in his store and let people behave in it as it pleases them. He decided to live by this conviction and principles and of course, paid the price. He lost considerable of it. That’s fine! He was true to his conviction although it appears irrelevant and outdated in the modern world.

Church too cannot wait for the situation to become conducive and tolerable. The mission of every individual is to be another Christ to his fellow man. Mission is to forgive the sins of those who have sinned against you. Mission is to be healing soldier working for ‘His kingdom to come’. Somewhere the zeal and zest for the mission has been smothered under theprevailing unconducive situation.

We got to live day in and day out the mission of Jesus, overcoming the personal barriers and limitation and challenging the circumstances. The early Christians had one of the most hostile situations but nothing prevented them to accept Christ and proclaim it. we ought to look into the mirror and challenge our settled disposition to flow with the current. We know by reversing the trend there will be ripples and disturbance but the Lord had already warned us, “Behold, I am sending you out sheep among the wolves. be wise as serpents and innocent as doves." (Matthew 10:16) We ought to gauge the situation and deal with prudence like serpent and maintain our inner self innocent like that of the dove and march forward to complete for which we have been sent.



मनन- चिं तन


“अविश्वासी नहीं बल्कि विश्वासी बनों।”

प्रभु येसु थॉमस को अपने घावों का स्पर्श करने को कहते हैं तथा इन शब्दों “अविश्वासी नहीं, बल्कि विश्वासी बनो”, के साथ उससे विश्वासी बनने का आव्हान करते हैं। इस बात का यह तात्पर्य नहीं है कि इससे पहले थॉमस येसु में विश्वास नहीं करता था। वह पहले से विश्वासी था किन्तु उसका विश्वास अपरिपक्व था तथा उसे येसु में संदेह हो गया था। जैसा कि संत याकूब कहते हैं, “क्योंकि जो संदेह करता है, वह समुद्र की लहरों के सदृश है, जो हवा से इधर-उधर उछाली जाती हैं।” (याकूब 1:6) थॉमस का विश्वास येसु के दुःखभोग एवं मृत्यु के कारण विचलित हो गया था। थॉमस जानता था कि येसु एक महान व्यक्ति थे। उसने येसु के साथ रहकर विस्मयकारी चमत्कारों को देखा था। ऐसे महान एवं चमत्कारी पुरूष के इस प्रकार दीन-हीन दशा में मर जाने ने थॉमस के विश्वास के स्तंभों को हिला दिया था। अब फिर से विश्वास करना उन्हें मुश्किल लग रहा था।

विश्वास एक अदभुत वस्तु है। विश्वास के सहारे हम महान एवं अविश्वनीय कार्य पूरे कर सकते हैं। किन्तु यदि हमारे विश्वास में संदेह, दृढ़ता एवं निरंतरता की कमी होती है तो हम ज्यादा आगे नहीं जा सकते। येसु स्वयं कहते हैं, “यदि तुम्हें विश्वास हो और तुम संदेह न करो, ....तुम इस पहाड से यह कहो- उठ, समुद्र में गिर जा’ तो वैसा ही हो जायेगा।” (मत्ती 21:21) अगर विश्वास की कमी को पूरा करना है तो हमें संदेह से ऊपर उठना होगा। संदेह विश्वास के लिए दीमक समान है। संदेह के कारण विश्वास पनप नहीं पाता है इसलिए संदेह पर विजय प्राप्त कर हमें विश्वास की परिपूर्णता तक पहुँचने का प्रयत्न करना चाहिए। येसु थॉमस के संदेह को कैसे दूर करते हैं? थॉमस के संदेह का कारण येसु की मृत्यु थी। क्रूस पर उनकी मृत्यु ने शायद उसके लिए विश्वास के सारे मार्ग अविरूद्ध कर दिये थे। ऐसी मनस्थिति में केवल पुनरूत्थित, पुनर्जीवित येसु ही उसके विश्वास को पुनः स्थापित कर सकते थे। थॉमस के संदेह को दूर करने पुनरूत्थित येसु स्वयं उसके पास आते हैं तथा उसे अपने घावों को स्पर्श करने का निमंत्रण देते हैं। यदि हमारे विश्वास में भी संदेह है तो हमें भी येसु से उस संदेह को दूर करने की प्रार्थना करनी चाहिए।

येसु संत योहन बपतिस्ता को मानवों में सबसे महान कहते हैं, “मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ - मनुष्यों में योहन बपतिस्ता से बड़ा कोई पैदा नहीं हुआ।” (मत्ती 11:11) किन्तु योहन भी येसु को लेकर संशय में पड़ जाते है। इसलिए वे बंदीगृह से अपने शिष्यों को येसु के पास यह पूछने भेजते हैं, “क्या आप वही हैं, जो आने वाले हैं या हम किसी और की प्रतीक्षा करें?”(मत्ती 11:3) येसु योहन के शिष्यों से अपने कार्यों की चर्चा करते हुए कहते हैं, “जाओ, तुम जो सुनते और देखते हो, उसे योहन को बता दो - अंधे देखते हैं, लँगड़े चलते हैं, कोढ़ी शुद्ध किये जाते हैं, बहरे सुनते हैं, मुरदे जिलाये जाते हैं, दरिद्रों को सुसमाचार सुनाया जाता है,”। येसु वास्तव में नबी इसायाह की प्रतिज्ञात मसीहा के बारे में की गयी भविष्यवाणी (देखिये इसायाह 35:5-6) को योहन के लिए दोहराते है। येसु जानते थे कि धर्मग्रंथ की बात को पूरा होते देख योहन का विश्वास कि येसु ही मसीह है, दृढ़ता प्राप्त करेगा। इसके अंत में येसु जोड देते हैं, “और धन्य है वह, जिसका विश्वास मुझ पर से नहीं उठता!” योहन की मनस्थिति यही बताती है कि किसी को भी संदेह हो सकता है। येसु भी मनुष्य की इस कमी को समझते हैं तथा योहन के शिष्यों के जाने के बाद योहन बपतिस्ता के विश्वास को महान बताते हुये कहते हैं, “योहन वही एलियस है जो आने वाला था।” (मत्ती 11:14) इस प्रकार विश्वास के अभाव को यदि ईश्वर के सामने व्यक्त किया जाये तो ईश्वर इस संशय को दूर कर विश्वास के अभाव को पूर्णता तक पहुँचा देते हैं।

येसु मरथा के विश्वास को भी पूर्णता तक ले जाते हैं। लाजरूस के मरने के बाद भी मरथा ईसा में विश्वास बनाये रखती है तथा कहती है, “प्रभु! यदि आप यहाँ होते, तो मेरा भाई नही मरता और मैं जानती हूँ कि आप अब भी ईश्वर से जो माँगेंगे, ईश्वर आप को वही प्रदान करेगा। (योहन 11:21-22) येसु मरथा की इस मांग को यह कहकर “क्या मैंने तुम से यह नहीं कहा कि यद तुम विश्वास करोगी, तो ईश्वर की महिमा देखोगी? (योहन 11:40) पूरा करते हैं तथा उनके भाई लाजरूस को पुनर्जीवित करते है। मरथा का विश्वास संसार के अंत में होने वाले पुनरूत्थान में था लेकिन येसु उसे मरथा के लिए यथार्थ की बात बना देते हैं।

हमारा ख्रीस्तीय विश्वास भी संदेह के घेरे में आता जाता रहता है। ऐसी स्थिति में क्या हम निराश होकर प्रार्थना करना छोड देते हैं या फिर थॉमस, योहन बपतिस्ता या फिर मरथा के समान येसु के पास अपने संदेह को लेकर जाते हैं? नबी हबक्कूक कहते हैं, “मैं अपनी चौकी पर खड़ा हो जाऊँगा, मैं चारदीवारी पर चढ कर प्रतीक्षा करता रहूँगा कि प्रभु मुझ से क्या कहेगा और मेरी शिकायतों का क्या उत्तर देगा। प्रभु ने उत्तर में मुझ से यह कहा, “जो दृश्य तुम देखने वाले हो, उसे स्पष्ट रूप से पाटियों पर लिखो, जिससे सब उसे सुगमता से पढ सकें”। ईश्वर हबक्कूक से लिखने को कहते हैं जिससे लोग उसे पढ कर विश्वास कर सके। संत योहन भी सुसमाचार के लिखने का उद्देश्य बताते कि लोग विश्वास में बने रहें, “इनका विवरण दिया गया है, जिससे तुम विश्वास करो...।” आइये हम भी अपने विश्वास को संदेह से दूर रखे तथा संदेह की स्थिति में येसु को जीवन में आमंत्रित करे तथा वचन की सहायता से विश्वास की परिपक्वता तक पहुँच सके।


✍ Br. Biniush Topno

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Praise the Lord!

Daily Mass Readings for Saturday, 10 April 2021

 Daily Mass Readings for Saturday, 10 April 2021




First Reading: Acts 4: 13-21

13 Now seeing the constancy of Peter and of John, understanding that they were illiterate and ignorant men, they wondered; and they knew them that they had been with Jesus.

14 Seeing the man also who had been healed standing with them, they could say nothing against it.

15 But they commanded them to go aside out of the council; and they conferred among themselves,

16 Saying: What shall we do to these men? for indeed a known miracle hath been done by them, to all the inhabitants of Jerusalem: it is manifest, and we cannot deny it.

17 But that it may be no farther spread among the people, let us threaten them that they speak no more in this name to any man.

18 And calling them, they charged them not to speak at all, nor teach in the name of Jesus.

19 But Peter and John answering, said to them: If it be just in the sight of God, to hear you rather than God, judge ye.

20 For we cannot but speak the things which we have seen and heard.

21 But they threatening, sent them away, not finding how they might punish them, because of the people; for all men glorified what had been done, in that which had come to pass.

Responsorial Psalm: Psalms 118: 1 and 14-15ab, 16-18, 19-21

R. (21a) I will give glory to thee because thou hast heard me.

or

R. Alleluia.

1 Give praise to Lord, for he is good: for his mercy endureth for ever.

14 The Lord is my strength and my praise: and he is become my salvation.

15 The voice of rejoicing and of salvation is in the tabernacles of the just.

R. I will give glory to thee because thou hast heard me.

or

R. Alleluia.

16 The right hand of the Lord hath wrought strength: the right hand of the Lord hath exulted me: the right hand of the Lord hath wrought strength.

17 I shall not die, but live: and shall declare the works of the Lord.

18 The Lord chastising hath chastised me: but he hath not delivered me over to death.

R. I will give glory to thee because thou hast heard me.

or

R. Alleluia.

19 Open ye to me the gates of justice: I will go into them, and give praise to the Lord.

20 This is the gate of the Lord, the just shall enter into it.

21 I will give glory to thee because thou hast heard me: and art become my salvation.

R. I will give glory to thee because thou hast heard me.

or

R. Alleluia.

Alleluia: Psalms 118: 24

R. Alleluia, alleluia.

24 This is the day which the Lord hath made: let us be glad and rejoice therein.

R. Alleluia, alleluia.

Gospel: Mark 16: 9-15

9 But he rising early the first day of the week, appeared first to Mary Magdalen, out of whom he had cast seven devils.

10 She went and told them that had been with him, who were mourning and weeping.

11 And they hearing that he was alive, and had been seen by her, did not believe.

12 And after that he appeared in another shape to two of them walking, as they were going into the country.

13 And they going told it to the rest: neither did they believe them.

14 At length he appeared to the eleven as they were at table: and he upbraided them with their incredulity and hardness of heart, because they did not believe them who had seen him after he was risen again.

15 And he said to them: Go ye into the whole world, and preach the gospel to every creature.


10 अप्रैल 2021 पास्का अठवारा - शनिवार

 

10 अप्रैल 2021
पास्का अठवारा - शनिवार

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 4:13-21


13) पेत्रुस और योहन का आत्मविश्वास देखकर और इन्हें अशिक्षित तथा अज्ञानी जान कर, महासभा के सदस्य अचम्भे में पड़ गये। फिर, वे पहचान गये कि ये ईसा के साथ रह चुके हैं,

14) किन्तु स्वस्थ किये गये मनुष्य को इनके साथ खड़ा देखकर, वे उत्तर में कुछ नहीं बोल सके।

15) उन्होंने पेत्रुस और योहन को सभा से बाहर जाने का आदेश दिया और यह कहते हुए आपस में परामर्श किया,

16) ’’हम इन लोगों के साथ क्या करें? येरुसालेम में रहने वाले सभी लोगों को यह मालूम हो गया कि इन्होंने एक अपूर्व चमत्कार दिखाया है। हम यह अस्वीकार नहीं कर सकते।

17) फिर भी जनता में इसका और अधिक प्रचार न हो, इसलिए हम इन्हें कड़ी चेतावनी दें कि अब से ईसा के नाम पर किसी से कुछ नहीं कहोगे।’’

18) उन्होंने पेत्रुस तथा योहन को फिर बुला भेजा और उन्हें आदेश दिया कि वे न तो जनता को सम्बोधित करें और न ईसा का नाम ले कर शिक्षा दें।

19) इस पर पेत्रुस और योहन ने उन्हें यह उत्तर दिया, ’’आप लोग स्वयं निर्णय करें-क्या ईश्वर की दृष्टि में यह उचित होगा कि हम ईश्वर की नहीं, बल्कि आप लोगों की बात मानें?

20) क्योंकि हमने जो देखा और सुना है, उसके विषय में नहीं बोलना हमारे लिए सम्भव नहीं।’’

21) इस पर उन्होंने पेत्रुस और योहन को फिर धमकाने के बाद जाने दिया। वे नहीं समझ पा रहे थे कि उन्हें किस प्रकार दण्ड दिया जाये, क्योंकि उस घटना के कारण सारी जनता ईश्वर की स्तुति करती थी।


सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 16:9-15


9) ईसा सप्ताह के प्रथम दिन प्रातः जी उठे। वे पहले मरियम मगदलेना को, जिस से उन्होंने सात अपदूतों को निकाला था, दिखाई दिये।

10) उसने जा कर उनके शोक मनाते और विलाप करते हुए अनुयायियों को यह समाचार सुनाया।

11) किन्तु जब उन्होंने यह सुना कि ईसा जीवित हैं और उसने उन्हें देखा है, तो उन्हें इस पर विश्वास नहीं हुआ।

12) इसके बाद ईसा दूसरे वेश में उन में दो को दिखाई दिये, जो पैदल देहात जा रहे थे।

13) उन्होंने लौट कर शेष शिष्यों को यह समाचार सुनाया, किन्तु शिष्यों को उन दोनों पर भी विश्वास नहीं हुआ।

14) बाद में ईसा ग्यारहों को उनके भोजन करते समय दिखाई दिये और उन्होंने उनके अविश्वास और उनकी हठधर्मी की निन्दा की; क्योंकि उन्होंने उन लागों पर विश्वास नहीं किया था, जिन्होंने ईसा को पुनर्जीवित देखा था।

15) इसके बाद ईसा ने उन से कहा, ’’संसार के कोने-कोने में जाकर सारी सृष्टि को सुसमाचार सुनाओ।


📚 मनन-चिंतन


साहस प्रेरितों तथा आदिम कलीसिया की पहचान थी। वे पुनरूत्थित येसु और उनके द्वारा मुक्ति में पूर्णत विश्वास करते थे। उनका यह नवीन विश्वास उनमें उत्साह का संचार करता था तथा वे विश्वास में बने रहने के लिये अपना सबकुछ दांव पर लगा देते थे। वे जानते थे येसु में लाभ जीवन की सारी हानियों से श्रेष्ठ था। उनका साहस इतना विस्मय था कि ये अपने आप में उनके विश्वास की गवाही बन गया था। अत्याचार के दौरान उनके साहस ने अनेकों को विश्वास ग्रहण करने के लिये प्रेरित किया।

अशिक्षित प्रेरित पेत्रुस और योहन का साहस एवं दृढता देखकर शासक एवं शास्त्री भी अंचभित थे। वे महसूस करते तथा जानते थे कि उनके साहस का कारण येसु के साथ उनकी मित्रता थी। शासकों तथा धर्माधिकारियों के पास ताकत तथा अधिकार था कि वे पेत्रुस और योहन को कोई भी यंत्रणा दे सकते थे किन्तु वे उनकी दृढता तथा विश्वास उनसे दूर नहीं कर सकते थे। योहन और पेत्रुस का साहस ईश्वर का वरदान था। शासकों को निराश होकर उन्हें छोड देना पडा।

जब हम दबाव एवं डर की परिस्थितियों से गुजरते हैं तो हम क्या करते हैं? क्या हम मौन होकर समर्पण कर देते हैं? या तनाव एवं दबाव हमें तोड देता? यदि ऐसा है तो हमें पेत्रुस और योहन तथा प्रेरित-चरित में उल्लेखित विश्वास के नायकों की ओर देखना चाहिये कि किस प्रकार इस विषम परिस्थितियों में और अधिक साहस एवं दृढता के लिये प्रार्थना करते हैं, ’’प्रभु! तू उनकी धमकियों पर ध्यान दे और अपने सेवकों को यह कृपा प्रदान कर कि वे निर्भीकता से तेरा वचन सुनाये।.......उनकी प्रार्थना समाप्त होने पर वह भवज जहॉ वे एकत्र थे, हिल गया। सब पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गये और निर्भीकता के साथ ईश्वर का वचन सुनाते रहे।’’ (प्रेरित-चरित 4:29, 31) इस प्रकार की प्रार्थनाओं द्वारा उन्होंने विरोधियों तथा दबाव का सामना किया। ईश्वर ने साहस, सामर्थ्य का आत्मा प्रदान किया जिससे प्रभु का मिशन निरंतर आगे बढता गया। तिमथी को लिखते समय संत पौलुस हमें स्मरण दिलाते हैं, ’’ईश्वर ने हमें भीरुता का नहीं, बल्कि सामर्थ्य, प्रेम तथा आत्मसंयम का मनोभाव प्रदान किया।’’ (2 तिमथी 1:7) आइये हम भी प्रार्थना करे कि ईश्वर हमें साहस का आत्मा प्रदान करे।




📚 REFLECTION



Boldness had been the earmark of the apostles and early Christian community. They had been deeply convinced of the risen Lord and salvation in him. their enthusiasm led them to risk anything for the sake of their newly imbibed faith. For they knew that no loss is a real loss in the comparison with the gain in Jesus. Their boldness was so astonishing that it itself became an edifying witness. In the face of persecution their boldness brought many people to faith.

Seeing the boldness of the uneducated Peter and John the rulers, elders and the scribes were clueless. They also realized that their boldness was the result of their association with Jesus. They had the power to inflict anything on them but they couldn’t take away their boldness and conviction in Jesus. For the boldness of Peter and John was the gift from God. In their frustration they had to let them go.

Whenever we are faced with fear and pressure what we do? Do we go silent and become submissive? Or the pressure and tension break us down? If this is the case with us then look at Peter and John and heroes of Acts of the apostles how they even prayer for boldness and courage to overcome fear, “When they had prayed, the place in which they were gathered together was shaken; and they were all filled with the Holy Spirit and spoke the word of God with boldness. (Acts 4:29-31) that is how they handled the opposition and their own fear. God granted them the spirit of power so that they may carry out His mission without inhibition. St. Paul reminds us through Timothy that, “For God did not give us a spirit of cowardice, but rather a spirit of power and of love and of self-discipline.” (2 Timothy 1:7)

Let pray to the Father to send the Spirit of boldness.


✍ -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!

08 अप्रैल 2021 पास्का अठवारा - गुरुवार

 

08 अप्रैल 2021
पास्का अठवारा - गुरुवार

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 3:11-26


11) वह मनुष्य पेत्रुस और योहन के साथ लगा हुआ था, इसलिए सब लोग आश्चर्यचकित हो कर सुलेमान नामक मण्डप में उनके पास दौड़े आये।

12) पेत्रुस ने यह देख कर उन से कहा, ‘‘इस्राएली भाइयो! आप लोग इस पर आश्चर्य क्यों कर रहे हैं और हमारी ओर से इस प्रकार क्यों ताक रहे हैं, मानों हमने अपने सामर्थ्य या सिद्धि से इस मनुष्य को चलने-फिरने योग्य बना दिया है?

13) इब्राहीम, इसहाक और याकूब के ईश्वर ने, हमारे पूर्वजों के ईश्वर ने अपने सेवक ईसा को महिमान्वित किया है। आप लोगों ने उन्हें पिलातुस के हवाले कर दिया और जब पिलातुस उन्हें छोड़ कर देने का निर्णय कर चुका था, तो आप लोगों ने उन्हें अस्वीकार किया।

14) आप लोगों ने सन्त तथा धर्मात्मा को अस्वीकार कर हत्यारे की रिहाई की माँग की।

15) जीवन के अधिपति को आप लोगों ने मार डाला; किन्तु ईश्वर ने उन्हें मृतकों में से जिलाया। हम इस बात के साक्षी हैं।

16) ईसा के नाम में विश्वास के कारण उसी नाम ने इस मनुष्य को, जिसे आप देखते और जानते हैं, बल प्रदान किया है। उसी विश्वास ने इसे आप सबों के सामने पूर्ण रूप से स्वस्थ किया है।

17) भाइयो! मैं जानता हूँ कि आप लोग, और आपके शासक भी, यह नहीं जानते थे कि वे क्या कर रहे हैं।

18) ईश्वर ने इस प्रकार अपना वह कथन पूरा किया जिसके अनुसार उसके मसीह को दुःख भोगना था और जिसे उसने सब नबियों के मुख से घोषित किया था।

19) आप लोग पश्चात्ताप करें और ईश्वर के पास लौट आयें, जिससे आपके पाप मिट जायें

20) और प्रभु आप को विश्रान्ति का समय प्रदान करे। तब वह पूर्वनिर्धारित मसीह को, अर्थात् ईसा को आप लोगों के पास भेजेगा।

21) यह आवश्यक है कि वह उस विश्वव्यापी पुनरूत्थान के समय तक स्वर्ग में रहें, जिसके विषय में ईश्वर प्राचीन काल से अपने पवित्र नबियों के मुख से बोला।

22) मूसा ने तो कहा, प्रभु-ईश्वर तुम्हारे भाइयों में से तुम्हारे लिए मुझ-जैसा एक नबी उत्पन्न करेगा वह जो कुछ तुम लोगों से कहेगा तुम उस पर ध्यान देना।

23) जो उस नबी की बात नहीं सुनेगा, वह प्रजा में से निकाल दिया जायेगा।

24) समूएल और सभी परवर्ती नबियों ने इन दिनों की भविष्यवाणी की है।

25) ‘‘आप लोग नबियों की सन्तति और उस विधान के भागीदार हैं, जिसे ईश्वर ने आपके पूर्वजों के लिए उस समय निर्धारित किया, जब उसने इब्राहिम से कहा, तुम्हारी सन्तति द्वारा पृथ्वी भर के वंश आशीर्वाद प्राप्त करेंगे।

26) ईश्वर ने सब से पहले आप लोगों के लिए अपने पुत्र ईसा को पुनर्जीवित किया और आपके पास भेजा, जिससे वह आप लोगों में हर एक को कुमार्ग से विमुख कर आशीर्वाद प्रदान करें।’’


सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 24:35-48


35) तब उन्होंने भी बताया कि रास्ते में क्या-क्या हुआ और उन्होंने ईसा को रोटी तोड़ते समय कैसे पहचान लिया।

36) वे इन सब घटनाओं पर बातचीत कर ही रहे थे कि ईसा उनके बीच आ कर खड़े हो गये। उन्होंने उन से कहा, ‘‘तुम्हें शान्ति मिले!’’

37) परन्तु वे विस्मित और भयभीत हो कर यह समझ रहे थे कि वे कोई प्रेत देख रहे हैं।

38) ईसा ने उन से कहा, ‘‘तुम लोग घबराते क्यों हो? तुम्हारे मन में सन्देह क्यों होता है?

39) मेरे हाथ और मेरे पैर देखो- मैं ही हूँ। मुझे स्पर्श कर देख लो- प्रेत के मेरे-जैसा हाड़-मांस नहीं होता।’’

40) उन्होंने यह कह कर उन को अपने हाथ और पैर दिखाये।

41) जब इस पर भी शिष्यों को आनन्द के मारे विश्वास नहीं हो रहा था और वे आश्चर्यचकित बने हुए थे, तो ईसा ने कहा, ‘‘क्या वहाँ तुम्हारे पास खाने को कुछ है?’’

42) उन्होंने ईसा को भुनी मछली का एक टुकड़ा दिया।

43) उन्होंने उसे लिया और उनके सामने खाया।

44) ईसा ने उन से कहा, ‘‘मैंने तुम्हारे साथ रहते समय तुम लोगों से कहा था कि जो कुछ मूसा की संहिता में और नबियों में तथा भजनों में मेरे विषय में लिखा है, सब का पूरा हो जाना आवश्यक है’’।

45) तब उन्होंने उनके मन का अन्धकार दूर करते हुए उन्हें धर्मग्रन्थ का मर्म समझाया

46) और उन से कहा, ‘‘ऐसा ही लिखा है कि मसीह दुःख भोगेंगे, तीसरे दिन मृतकों में से जी उठेंगे

47) और उनके नाम पर येरुसालेम से ले कर सभी राष्ट्रों को पापक्षमा के लिए पश्चात्ताप का उपदेश दिया जायेगा।

48) तुम इन बातों के साक्षी हो।


📚 मनन-चिंतन


पेत्रुस और योहन अत्यत साधारण लोग थे। वे अशिक्षित मछुआरे थे। (देखिये प्रेरित चरित 3:13) प्रभु येसु ने उनको चुनकर तथा लंगडे व्यक्ति को उनके द्वारा चंगाई दिलाकर उन्हें आकर्षण का केन्द्र बना दिया था। अचानक लोगों की प्रंशसा तथा सरहना ने उनको घेर लिया था। उस क्षण के लिये वे ’सुपर हीरो’ बन गये थे। लेकिन उन्होंने व्यक्तिगत प्रशंसा और गलत आत्म-धारणा के प्रलोभन से बचकर इस बात को घोषित किया कि ईश्वर के सामर्थ्य ने लंगडे व्यक्ति को चंगा किया है। पेत्रुस जानता था कि वे कमजोर, पापी येसु जिन्होंने उस लंगडे का चंगा किया पर निर्भर रहने वाले व्यक्ति थे। वे कहते हैं, ’’ईसा के नाम में विश्वास के कारण उसी नाम ने इस मनुष्य को, जिसे आप देखते और जानते हैं, बल प्रदान किया है। उसी विश्वास ने इसे आप सबों के सामने पूर्ण रूप से स्वस्थ किया है।’’ (प्रेरित चरित 3:16)

इस की सेवा में कार्यरत लोगों को अत्यंत विनम्र होना चाहिये। ईश्वर के सेवकों को ईश्वर के श्रेय को चुराना नहीं चाहिये। स्तोत्रकार कहते हैं, ’’हम को नहीं, हम को नहीं, बल्कि अपना नाम महिमान्वित कर।’’ (स्तोत्र 115:1) जो लोग ईश्वर की सेवा में विनम्र बने रहते हैं वे स्वयं पर बडा उपकार करते हैं। ईश्वर उनकी इस विनम्रता के कारण उनका उपयोग अपने कार्यों में करता है किन्तु जो घमण्डी बन जाता है वे स्वयं के विनाश को आमंत्रित करते हैं।

दाउद ने ईश्वर की मंजूषा के सामने हर्ष-उल्लास में सुधबुध खोकर नाच किया था तथा इस बात के लिये उसकी पत्नी मीकल ने उन्हें फटकारा था। राजा दाउद ने अपनी विनम्रता का कारण बताते हुये कहा, ’’दाऊद ने मीकल से कहाए ष्प्रभु ने तुम्हारे पिता और तुम्हारे सारे घराने की अपेक्षा मुझे चुना है और मुझे प्रभु की प्रजा इस्राएल का शासक बनाया है। मैं उसी प्रभु के सामने नाचता रहा और नाचूँगा। मैं इस से अधिक अशोभनीय आचरण करूँगा और अपनी दृष्टि में अपने को और नीचा दिखाऊँगा।’’ (2 समूएल 6:21-22) दाउद ईश्वर के समक्ष अपनी विनम्रता के कारण धनी माने जाते हैं। दाउद ने धार्मिक भावना से प्रेरित होकर ईश्वर का मंदिर बनाने का निर्णय लिया। उसने इसके लिये विस्तृत योजना बनायी तथा तैयारी की। लेकिन जब ईश्वर ने दाउद की योजना को नकार दिया तो दाउद ने ईश्वर की इच्छा का विरोध नहीं किया वरन उसे स्वीकारा।

संत पौलुस इस सच्चाई को स्पष्ट करते हुये कहते हैं, ’’इसका अर्थ यह नहीं कि हमारी कोई अपनी योग्यता है। हम अपने को किसी बात का श्रेय नहीं दे सकते। हमारी योग्यता का स्त्रोत ईश्वर है। उसने हमें एक नये विधान के सेवक होने के योग्य बनाया है।’’ (2 कुरि.3:6) एक व्यक्ति यदि अपनी उपलब्धियों के लिये यदि स्वयं को ही महिमांवित करता है, तो वह अपना ही नुकसान करता है। हम मन सांसारिक मोहमाया, लोगों की वाहवाही के गर्व में आसानी से पड जाता है। लेकिन संत पेत्रुस एवं प्रेरितगण हमें सिखाते हैं कि यदि हम ईश्वर को महिमा प्रदान करेंगे तो ईश्वर निरंतर हमारा उपयोग उनके साधनों के रूप में करते रहेंगे।




📚 REFLECTION



Peter and John were very ordinary people. They were illiterate and fishermen. (See Acts 3:13)However it was the Lord Jesus who by his choice and now by the curing of the lame man had made them the centre of attraction. They were suddenly surrounded by awe and admiration of the people. They had become ‘supermen’ at least for a while. Nevertheless, brushing aside all temptation of self-glory and self-assumption they maintained a steadfast stance that it was the Lord whose power was at work. Peter refused to take any honour to himself but gave it to the Lord who had used them as instruments. Peter knew that they were weak, sinful and dependent for everything on Jesus whose power effected the cure of the man. He said, “And by faith in his name, his name itself has made this man strong, whom you see and know; and the faith that is through Jesus has given him this perfect health in the presence of all of you.” (3:16)

Useful man must be very humble. God’s servants do not rob the Lord of his credit. Palmist would aptly plead, “Not to us, O Lord, not to us, but to your name give glory.” (Psalm 115:1) All those who remain humble in the service of God do to themselves a great favour. God continues to use them for his mission on the contrary when someone becomes proud and draws credit for himself, lives in vain glory and propels his own downward journey.

David danced before the ark of God with great joy and for doing so he was chastised by his wife Michal for not maintaining the decorum befitting a king. However, David remained humble and spoke, “It was before the Lord, who chose me in place of your father and all his household, to appoint me as prince over Israel, the people of the Lord, that I have danced before the Lord. I will make myself yet more contemptible than this, and I will be abased in my own eyes.” (2 Samuel 6:21-22) David is always exalted for his humility before God. David had all the good intentions and wanted to build the temple. He made elaborate plans and preparation for it, however, when the Lord denies him the permission David does resist or resents but accepts Lord’s will.

St. Paul clearly state this fact, “Not that we are competent of ourselves to claim anything as coming from us; our competence is from God, who has made us competent to be ministers of a new covenant, (2 Cor. 3:6)

A person breaks his ownfortunes when he exalts himself and seek glory and credit to his own human skill. Too often, the heart is easily led astray by the attention, attraction and success we receive for our good deeds, but Peter and apostles teachus to give honour to God not to themselves so that God’s grace continue to flow abundantly and flawlessly.

✍ -Br. Biniush Topno


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07 अप्रैल 2021 पास्का अठवारा - बुधवार

 

07 अप्रैल 2021
पास्का अठवारा - बुधवार

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 3:1-10


1) पेत्रुस और योहन तीसरे पहर की प्रार्थना के समय मन्दिर जा रहे थे।

2) लोग एक मनुष्य को ले जा रहे थे, जो जन्म से लँगड़ा था। वे उसे प्रतिदिन ला कर मन्दिर के ‘सुन्दर’ नामक फाटक के पास रखा करते थे, जिससे वह मन्दिर के अन्दर जाने वालों से भीख माँग सके।

3) जब उसने पेत्रुस और योहन को मन्दिर में प्रवेश करते देखा, तो उन से भीख माँगी।

4) पेत्रुस और योहन ने उसे ध्यान से देखा। पेत्रुस ने कहा, ‘‘हमारी ओर देखो’’

5) और वह कुछ पाने की आशा से उनकी ओर देखता रहा।

6) किन्तु पेत्रुस ने कहा, ‘मेरे पास न तो चाँदी है और न सोना; बल्कि मेरे पास जो, वही तुम्हें देखा हूँ- ईसा मसीह नाज़री के नाम पर चलो’’

7) और उनसे उसका दाहिना हाथ पकड़ कर उसे उठाया। उसी क्षण लँगड़े के पैरों और टखनों में बल आ गया।

8) वह उछल कर खड़ा हो गया और चलने-फिरने लगा। वह चलते, उछलते तथा ईश्वर की स्तुति करते हुए उनके साथ मन्दिर आया।

9) सारी जनता ने उस को चलते-फिरते तथा ईश्वर की स्तुति करते हुए देखा।

10) लोग उसे पहचानते थे। यह वही था, जो मन्दिर के ‘सुन्दर’ फाटक के पास बैठ कर भीख माँगा करता था और यह देख कर कि उसे क्या हुआ है, वे अचम्भे में पड़ कर चकित थे।


सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 24:13-35


13) उसी दिन दो शिष्य इन सब घटनाओं पर बातें करते हुए एम्माउस नामक गाँव जा रहे थे। वह येरुसालेम से कोई चार कोस दूर है।

14) वे आपस में बातचीत और विचार-विमर्श कर ही रहे थे

15) कि ईसा स्वयं आ कर उनके साथ हो लिये,

16) परन्त शिष्यों की आँखें उन्हें पहचानने में असमर्थ रहीं।

17) ईसा ने उन से कहा, ‘‘आप लोग राह चलते किस विषय पर बातचीत कर रहे हैं?’’ वे रूक गये। उनके मुख मलिन थे।

18) उन में एक क्लेओपस-ने उत्तर दिया, ‘‘येरुसालेम में रहने वालों में आप ही एक ऐसे हैं, जो यह नहीं जानते कि वहाँ इन दिनों क्या-क्या हुआ है’।

19) ईसा ने उन से कहा, ‘‘क्या हुआ है?’’ उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘बात ईसा नाज़री की है वे ईश्वर और समस्त जनता की दृष्टि में कर्म और वचन के शक्तिशाली नबी थे।

20) हमारे महायाजकों और शासकों ने उन्हें प्राणदण्ड दिलाया और क्रूस पर चढ़वाया।

21) हम तो आशा करते थे कि वही इस्राएल का उद्धार करने वाले थे। यह आज से तीन दिन पहले की बात है।

22) यह सच है कि हम में से कुछ स्त्रियों ने हमें बड़े अचम्भे में डाल दिया है। वे बड़े सबेरे क़ब्र के पास गयीं

23) और उन्हें ईसा का शव नहीं मिला। उन्होंने लौट कर कहा कि उन्हें स्वर्गदूत दिखाई दिये, जिन्होंने यह बताया कि ईसा जीवित हैं।

24) इस पर हमारे कुछ साथी क़ब्र के पास गये और उन्होंने सब कुछ वैसा ही पाया, जैसा स्त्रियों ने कहा था; परन्तु उन्होंने ईसा को नहीं देखा।’’

25) तब ईसा ने उन से कहा, ‘‘निर्बुद्धियों! नबियों ने जो कुछ कहा है, तुम उस पर विश्वास करने में कितने मन्दमति हो !

26) क्या यह आवश्यक नहीं था कि मसीह वह सब सहें और इस प्रकार अपनी महिमा में प्रवेश करें?’’

27) तब ईसा ने मूसा से ले कर अन्य सब नबियों का हवाला देते हुए, अपने विषय में जो कुछ धर्मग्रन्थ में लिखा है, वह सब उन्हें समझाया।

28) इतने में वे उस गाँव के पास पहुँच गये, जहाँ वे जा रहे थे। लग रहा था, जैसे ईसा आगे बढ़ना चाहते हैं।

29) शिष्यों ने यह कह कर उन से आग्रह किया, ‘‘हमारे साथ रह जाइए। साँझ हो रही है और अब दिन ढल चुका है’’ और वह उनके साथ रहने भीतर गये।

30) ईसा ने उनके साथ भोजन पर बैठ कर रोटी ली, आशिष की प्रार्थना पढ़ी और उसे तोड़ कर उन्हें दे दिया।

31) इस पर शिष्यों की आँखे खुल गयीं और उन्होंने ईसा को पहचान लिया ... किन्तु ईसा उनकी दृष्टि से ओझल हो गये।

32) तब शिष्यों ने एक दूसरे से कहा, हमारे हृदय कितने उद्दीप्त हो रहे थे, जब वे रास्ते में हम से बातें कर रहे थे और हमारे लिए धर्मग्रन्थ की व्याख्या कर रहे थे!’’

33) वे उसी घड़ी उठ कर येरुसालेम लौट गये। वहाँ उन्होंने ग्यारहों और उनके साथियों को एकत्र पाया,

34) जो यह कह रहे थे, ‘‘प्रभु सचमुच जी उठे हैं और सिमोन को दिखाई दिये हैं’’।

35) तब उन्होंने भी बताया कि रास्ते में क्या-क्या हुआ और उन्होंने ईसा को रोटी तोड़ते समय कैसे पहचान लिया।


📚 मनन-चिंतन


जब मंदिर के ’सुन्दर’ नामक फाटक के पास बैठा लॅगडे व्यक्ति ने पेत्रुस और योहन के ओर भीख मांगने के लिये हाथ फैलाये तो उसने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि कुछ अप्रत्याशित और दिव्य घटना उसके जीवन में होने जा रही है। पेत्रुस और योहन ने उसकी ओर ध्यान से देखा जो इस बात की निशानी थे कि वे उसे कुछ देना चाहते थे अन्यथा लोग जो भिखारियों से आंखे चुराया करते हैं।

पेत्रुस ने कहा, मेरे पास न तो चांदी है और न सोना; बल्कि जो मेरे पास है वही तुम्हें देता हूं।’’ पेत्रुस और योहन के पैसे नहीं थे इसलिये उन्होंने वह ढुंढा जो उनके पास था। पेत्रुस के पास येसु का नाम तथा चंगाई की शक्ति थी जो उसे प्रभु ने दी थी। पेत्रुस ने उस लंगडे व्यक्ति को चंगा किया क्योंकि उसके पास येसु का नाम था। लातीनी भाषा में एक खूबसूरत कहावत है, ’’जो चीज किसी के पास नहीं है वह उसे नहीं दे सकता।’’ पेत्रुस को येसु का नाम एवं उसका सामर्थ्य दिया गया था इसलिये वह उसे लंगडे को दे सका।

आज हमें स्वयं से पूछना चाहिये, ’’मेरे पास क्या है?’ क्या इस बात का दावा कर सकते हैं कि ईश्वर का नाम मेरे साथ है? शायद हमारे पास सोना और चांदी हो सकता है किन्तु येसु का नाम न हो। पैसे और सम्पदा में हमारा विश्वास ईश्वर में हमारे विश्वास को कमजोर करता है। हम अंजाने में ही पैसे की खरीदने की शक्ति पर विश्वास अधिक विश्वास करने लगते हैं।

पेत्रुस और प्रेरितों इस बात से वाकिफ थे इसलिये उन्होंने सांसारिक बातों से दूर ही रहना, भले ही वे लोगों के आंशिक लाभ के लिये क्यों न हो, हितकर समझा। जब यूनानियों इस बात की शिकायत की भोजन सामग्री के वितरण में भेदभाव हो रहा है तो प्रेरितों ने स्पष्ट कहा, यह उचित नहीं है कि हम भोजन परोसने के लिये ईश्वर का वचन छोड दे।....और यह बात सभी को अच्छी लगी।.....ईश्वर का वचन फैलता गया।’’ (प्रेरित चरित 6:2-7) प्रेरितों न सिर्फ येसु का नाम और उसका सामर्थ्य ईश्वर से वरदान स्वरूप पाया बल्कि उसे उन्होंने बडे ही जतन और सतर्कता से संरक्षित भी रखा। जब उन्होंने ऐसा किया तो लोगों ने इसकी प्रशंसा की तथा इसके परिणामस्वरूप ईश्वर का वचन फैलता गया।

हमारी समस्याएं बहुतरफा हो सकती है। लेकिन इन सबसे उपर हमें सर्वप्रथम उचें तथा आध्यात्मिक वरदानों की अभिलाषा करनी तथा उनके सुरक्षा भी करनी चाहिये। लोग हमारे इस दृष्टिकोण का समर्थन करेंगे तथा ईश्वर की आशीष हमारे कार्यों पर बनी रहेगी।




📚 REFLECTION



When the lame man lying at the Beautiful Gate extended his hands towards Peter and John for alms,never he could have imagined that something so unexpected, dramatic and sublime would happen to him. Peter and John looked at him intently this was the sign that they wanted to give something otherwise mostly people like to avoid an eye contact with the beggars.

Peter said, “Silver and gold I have none but I give you what I have”. Peter and John literally didn’t have money to give so he looked for what he had. Peter had the name of Jesus and powers of healing the Lord had bestowed upon him. Peter heals that man because he had the name of Jesus with him. There is a beautiful saying in Latin, Nemo dat quod non habet, literally meaning "no one gives what they do not have”. Peter had been given it so he could give it.

Today we need to introspect and ask ourselves ‘What do we have?’ Can we claim to have the name of Jesus with us? Perhaps we may have silver and gold but the power of the name of Jesus is yet away from us. Faith in the wealth deteriorates the depth of faith in us. We unknowingly begin to rely on the purchasing power of the money.

Peter and the apostles were greatly aware of this fact and never let them be drawn into anything worldly even if it meant temporal good. When the Greeks complained about the partiality being done in the distribution of the food the apostles categorically said, “It is not right that we should neglect the word of God in order to wait at tables…for our part, will devote ourselves to prayer and to serving the word.’ What they said pleased the whole community. The word of God continued to spread;” (See Acts 6:2-7) It was not just the apostles received the power in the name of Jesus they also tried to preserve it deliberately and cautiously. When they preserved it, people liked it and appreciated and as a result the Word of God spread far and wide.

So, our problems are manifold. First of all, we need to ask for the higher and spiritual gifts from Jesus and preserves them with dutifully. People would love this dedication and the God would bless our ministries.

✍ -Br. Biniush Topno


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