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Daily Mass Readings for Saturday, 10 April 2021

 Daily Mass Readings for Saturday, 10 April 2021




First Reading: Acts 4: 13-21

13 Now seeing the constancy of Peter and of John, understanding that they were illiterate and ignorant men, they wondered; and they knew them that they had been with Jesus.

14 Seeing the man also who had been healed standing with them, they could say nothing against it.

15 But they commanded them to go aside out of the council; and they conferred among themselves,

16 Saying: What shall we do to these men? for indeed a known miracle hath been done by them, to all the inhabitants of Jerusalem: it is manifest, and we cannot deny it.

17 But that it may be no farther spread among the people, let us threaten them that they speak no more in this name to any man.

18 And calling them, they charged them not to speak at all, nor teach in the name of Jesus.

19 But Peter and John answering, said to them: If it be just in the sight of God, to hear you rather than God, judge ye.

20 For we cannot but speak the things which we have seen and heard.

21 But they threatening, sent them away, not finding how they might punish them, because of the people; for all men glorified what had been done, in that which had come to pass.

Responsorial Psalm: Psalms 118: 1 and 14-15ab, 16-18, 19-21

R. (21a) I will give glory to thee because thou hast heard me.

or

R. Alleluia.

1 Give praise to Lord, for he is good: for his mercy endureth for ever.

14 The Lord is my strength and my praise: and he is become my salvation.

15 The voice of rejoicing and of salvation is in the tabernacles of the just.

R. I will give glory to thee because thou hast heard me.

or

R. Alleluia.

16 The right hand of the Lord hath wrought strength: the right hand of the Lord hath exulted me: the right hand of the Lord hath wrought strength.

17 I shall not die, but live: and shall declare the works of the Lord.

18 The Lord chastising hath chastised me: but he hath not delivered me over to death.

R. I will give glory to thee because thou hast heard me.

or

R. Alleluia.

19 Open ye to me the gates of justice: I will go into them, and give praise to the Lord.

20 This is the gate of the Lord, the just shall enter into it.

21 I will give glory to thee because thou hast heard me: and art become my salvation.

R. I will give glory to thee because thou hast heard me.

or

R. Alleluia.

Alleluia: Psalms 118: 24

R. Alleluia, alleluia.

24 This is the day which the Lord hath made: let us be glad and rejoice therein.

R. Alleluia, alleluia.

Gospel: Mark 16: 9-15

9 But he rising early the first day of the week, appeared first to Mary Magdalen, out of whom he had cast seven devils.

10 She went and told them that had been with him, who were mourning and weeping.

11 And they hearing that he was alive, and had been seen by her, did not believe.

12 And after that he appeared in another shape to two of them walking, as they were going into the country.

13 And they going told it to the rest: neither did they believe them.

14 At length he appeared to the eleven as they were at table: and he upbraided them with their incredulity and hardness of heart, because they did not believe them who had seen him after he was risen again.

15 And he said to them: Go ye into the whole world, and preach the gospel to every creature.


10 अप्रैल 2021 पास्का अठवारा - शनिवार

 

10 अप्रैल 2021
पास्का अठवारा - शनिवार

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 4:13-21


13) पेत्रुस और योहन का आत्मविश्वास देखकर और इन्हें अशिक्षित तथा अज्ञानी जान कर, महासभा के सदस्य अचम्भे में पड़ गये। फिर, वे पहचान गये कि ये ईसा के साथ रह चुके हैं,

14) किन्तु स्वस्थ किये गये मनुष्य को इनके साथ खड़ा देखकर, वे उत्तर में कुछ नहीं बोल सके।

15) उन्होंने पेत्रुस और योहन को सभा से बाहर जाने का आदेश दिया और यह कहते हुए आपस में परामर्श किया,

16) ’’हम इन लोगों के साथ क्या करें? येरुसालेम में रहने वाले सभी लोगों को यह मालूम हो गया कि इन्होंने एक अपूर्व चमत्कार दिखाया है। हम यह अस्वीकार नहीं कर सकते।

17) फिर भी जनता में इसका और अधिक प्रचार न हो, इसलिए हम इन्हें कड़ी चेतावनी दें कि अब से ईसा के नाम पर किसी से कुछ नहीं कहोगे।’’

18) उन्होंने पेत्रुस तथा योहन को फिर बुला भेजा और उन्हें आदेश दिया कि वे न तो जनता को सम्बोधित करें और न ईसा का नाम ले कर शिक्षा दें।

19) इस पर पेत्रुस और योहन ने उन्हें यह उत्तर दिया, ’’आप लोग स्वयं निर्णय करें-क्या ईश्वर की दृष्टि में यह उचित होगा कि हम ईश्वर की नहीं, बल्कि आप लोगों की बात मानें?

20) क्योंकि हमने जो देखा और सुना है, उसके विषय में नहीं बोलना हमारे लिए सम्भव नहीं।’’

21) इस पर उन्होंने पेत्रुस और योहन को फिर धमकाने के बाद जाने दिया। वे नहीं समझ पा रहे थे कि उन्हें किस प्रकार दण्ड दिया जाये, क्योंकि उस घटना के कारण सारी जनता ईश्वर की स्तुति करती थी।


सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 16:9-15


9) ईसा सप्ताह के प्रथम दिन प्रातः जी उठे। वे पहले मरियम मगदलेना को, जिस से उन्होंने सात अपदूतों को निकाला था, दिखाई दिये।

10) उसने जा कर उनके शोक मनाते और विलाप करते हुए अनुयायियों को यह समाचार सुनाया।

11) किन्तु जब उन्होंने यह सुना कि ईसा जीवित हैं और उसने उन्हें देखा है, तो उन्हें इस पर विश्वास नहीं हुआ।

12) इसके बाद ईसा दूसरे वेश में उन में दो को दिखाई दिये, जो पैदल देहात जा रहे थे।

13) उन्होंने लौट कर शेष शिष्यों को यह समाचार सुनाया, किन्तु शिष्यों को उन दोनों पर भी विश्वास नहीं हुआ।

14) बाद में ईसा ग्यारहों को उनके भोजन करते समय दिखाई दिये और उन्होंने उनके अविश्वास और उनकी हठधर्मी की निन्दा की; क्योंकि उन्होंने उन लागों पर विश्वास नहीं किया था, जिन्होंने ईसा को पुनर्जीवित देखा था।

15) इसके बाद ईसा ने उन से कहा, ’’संसार के कोने-कोने में जाकर सारी सृष्टि को सुसमाचार सुनाओ।


📚 मनन-चिंतन


साहस प्रेरितों तथा आदिम कलीसिया की पहचान थी। वे पुनरूत्थित येसु और उनके द्वारा मुक्ति में पूर्णत विश्वास करते थे। उनका यह नवीन विश्वास उनमें उत्साह का संचार करता था तथा वे विश्वास में बने रहने के लिये अपना सबकुछ दांव पर लगा देते थे। वे जानते थे येसु में लाभ जीवन की सारी हानियों से श्रेष्ठ था। उनका साहस इतना विस्मय था कि ये अपने आप में उनके विश्वास की गवाही बन गया था। अत्याचार के दौरान उनके साहस ने अनेकों को विश्वास ग्रहण करने के लिये प्रेरित किया।

अशिक्षित प्रेरित पेत्रुस और योहन का साहस एवं दृढता देखकर शासक एवं शास्त्री भी अंचभित थे। वे महसूस करते तथा जानते थे कि उनके साहस का कारण येसु के साथ उनकी मित्रता थी। शासकों तथा धर्माधिकारियों के पास ताकत तथा अधिकार था कि वे पेत्रुस और योहन को कोई भी यंत्रणा दे सकते थे किन्तु वे उनकी दृढता तथा विश्वास उनसे दूर नहीं कर सकते थे। योहन और पेत्रुस का साहस ईश्वर का वरदान था। शासकों को निराश होकर उन्हें छोड देना पडा।

जब हम दबाव एवं डर की परिस्थितियों से गुजरते हैं तो हम क्या करते हैं? क्या हम मौन होकर समर्पण कर देते हैं? या तनाव एवं दबाव हमें तोड देता? यदि ऐसा है तो हमें पेत्रुस और योहन तथा प्रेरित-चरित में उल्लेखित विश्वास के नायकों की ओर देखना चाहिये कि किस प्रकार इस विषम परिस्थितियों में और अधिक साहस एवं दृढता के लिये प्रार्थना करते हैं, ’’प्रभु! तू उनकी धमकियों पर ध्यान दे और अपने सेवकों को यह कृपा प्रदान कर कि वे निर्भीकता से तेरा वचन सुनाये।.......उनकी प्रार्थना समाप्त होने पर वह भवज जहॉ वे एकत्र थे, हिल गया। सब पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गये और निर्भीकता के साथ ईश्वर का वचन सुनाते रहे।’’ (प्रेरित-चरित 4:29, 31) इस प्रकार की प्रार्थनाओं द्वारा उन्होंने विरोधियों तथा दबाव का सामना किया। ईश्वर ने साहस, सामर्थ्य का आत्मा प्रदान किया जिससे प्रभु का मिशन निरंतर आगे बढता गया। तिमथी को लिखते समय संत पौलुस हमें स्मरण दिलाते हैं, ’’ईश्वर ने हमें भीरुता का नहीं, बल्कि सामर्थ्य, प्रेम तथा आत्मसंयम का मनोभाव प्रदान किया।’’ (2 तिमथी 1:7) आइये हम भी प्रार्थना करे कि ईश्वर हमें साहस का आत्मा प्रदान करे।




📚 REFLECTION



Boldness had been the earmark of the apostles and early Christian community. They had been deeply convinced of the risen Lord and salvation in him. their enthusiasm led them to risk anything for the sake of their newly imbibed faith. For they knew that no loss is a real loss in the comparison with the gain in Jesus. Their boldness was so astonishing that it itself became an edifying witness. In the face of persecution their boldness brought many people to faith.

Seeing the boldness of the uneducated Peter and John the rulers, elders and the scribes were clueless. They also realized that their boldness was the result of their association with Jesus. They had the power to inflict anything on them but they couldn’t take away their boldness and conviction in Jesus. For the boldness of Peter and John was the gift from God. In their frustration they had to let them go.

Whenever we are faced with fear and pressure what we do? Do we go silent and become submissive? Or the pressure and tension break us down? If this is the case with us then look at Peter and John and heroes of Acts of the apostles how they even prayer for boldness and courage to overcome fear, “When they had prayed, the place in which they were gathered together was shaken; and they were all filled with the Holy Spirit and spoke the word of God with boldness. (Acts 4:29-31) that is how they handled the opposition and their own fear. God granted them the spirit of power so that they may carry out His mission without inhibition. St. Paul reminds us through Timothy that, “For God did not give us a spirit of cowardice, but rather a spirit of power and of love and of self-discipline.” (2 Timothy 1:7)

Let pray to the Father to send the Spirit of boldness.


✍ -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!

08 अप्रैल 2021 पास्का अठवारा - गुरुवार

 

08 अप्रैल 2021
पास्का अठवारा - गुरुवार

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 3:11-26


11) वह मनुष्य पेत्रुस और योहन के साथ लगा हुआ था, इसलिए सब लोग आश्चर्यचकित हो कर सुलेमान नामक मण्डप में उनके पास दौड़े आये।

12) पेत्रुस ने यह देख कर उन से कहा, ‘‘इस्राएली भाइयो! आप लोग इस पर आश्चर्य क्यों कर रहे हैं और हमारी ओर से इस प्रकार क्यों ताक रहे हैं, मानों हमने अपने सामर्थ्य या सिद्धि से इस मनुष्य को चलने-फिरने योग्य बना दिया है?

13) इब्राहीम, इसहाक और याकूब के ईश्वर ने, हमारे पूर्वजों के ईश्वर ने अपने सेवक ईसा को महिमान्वित किया है। आप लोगों ने उन्हें पिलातुस के हवाले कर दिया और जब पिलातुस उन्हें छोड़ कर देने का निर्णय कर चुका था, तो आप लोगों ने उन्हें अस्वीकार किया।

14) आप लोगों ने सन्त तथा धर्मात्मा को अस्वीकार कर हत्यारे की रिहाई की माँग की।

15) जीवन के अधिपति को आप लोगों ने मार डाला; किन्तु ईश्वर ने उन्हें मृतकों में से जिलाया। हम इस बात के साक्षी हैं।

16) ईसा के नाम में विश्वास के कारण उसी नाम ने इस मनुष्य को, जिसे आप देखते और जानते हैं, बल प्रदान किया है। उसी विश्वास ने इसे आप सबों के सामने पूर्ण रूप से स्वस्थ किया है।

17) भाइयो! मैं जानता हूँ कि आप लोग, और आपके शासक भी, यह नहीं जानते थे कि वे क्या कर रहे हैं।

18) ईश्वर ने इस प्रकार अपना वह कथन पूरा किया जिसके अनुसार उसके मसीह को दुःख भोगना था और जिसे उसने सब नबियों के मुख से घोषित किया था।

19) आप लोग पश्चात्ताप करें और ईश्वर के पास लौट आयें, जिससे आपके पाप मिट जायें

20) और प्रभु आप को विश्रान्ति का समय प्रदान करे। तब वह पूर्वनिर्धारित मसीह को, अर्थात् ईसा को आप लोगों के पास भेजेगा।

21) यह आवश्यक है कि वह उस विश्वव्यापी पुनरूत्थान के समय तक स्वर्ग में रहें, जिसके विषय में ईश्वर प्राचीन काल से अपने पवित्र नबियों के मुख से बोला।

22) मूसा ने तो कहा, प्रभु-ईश्वर तुम्हारे भाइयों में से तुम्हारे लिए मुझ-जैसा एक नबी उत्पन्न करेगा वह जो कुछ तुम लोगों से कहेगा तुम उस पर ध्यान देना।

23) जो उस नबी की बात नहीं सुनेगा, वह प्रजा में से निकाल दिया जायेगा।

24) समूएल और सभी परवर्ती नबियों ने इन दिनों की भविष्यवाणी की है।

25) ‘‘आप लोग नबियों की सन्तति और उस विधान के भागीदार हैं, जिसे ईश्वर ने आपके पूर्वजों के लिए उस समय निर्धारित किया, जब उसने इब्राहिम से कहा, तुम्हारी सन्तति द्वारा पृथ्वी भर के वंश आशीर्वाद प्राप्त करेंगे।

26) ईश्वर ने सब से पहले आप लोगों के लिए अपने पुत्र ईसा को पुनर्जीवित किया और आपके पास भेजा, जिससे वह आप लोगों में हर एक को कुमार्ग से विमुख कर आशीर्वाद प्रदान करें।’’


सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 24:35-48


35) तब उन्होंने भी बताया कि रास्ते में क्या-क्या हुआ और उन्होंने ईसा को रोटी तोड़ते समय कैसे पहचान लिया।

36) वे इन सब घटनाओं पर बातचीत कर ही रहे थे कि ईसा उनके बीच आ कर खड़े हो गये। उन्होंने उन से कहा, ‘‘तुम्हें शान्ति मिले!’’

37) परन्तु वे विस्मित और भयभीत हो कर यह समझ रहे थे कि वे कोई प्रेत देख रहे हैं।

38) ईसा ने उन से कहा, ‘‘तुम लोग घबराते क्यों हो? तुम्हारे मन में सन्देह क्यों होता है?

39) मेरे हाथ और मेरे पैर देखो- मैं ही हूँ। मुझे स्पर्श कर देख लो- प्रेत के मेरे-जैसा हाड़-मांस नहीं होता।’’

40) उन्होंने यह कह कर उन को अपने हाथ और पैर दिखाये।

41) जब इस पर भी शिष्यों को आनन्द के मारे विश्वास नहीं हो रहा था और वे आश्चर्यचकित बने हुए थे, तो ईसा ने कहा, ‘‘क्या वहाँ तुम्हारे पास खाने को कुछ है?’’

42) उन्होंने ईसा को भुनी मछली का एक टुकड़ा दिया।

43) उन्होंने उसे लिया और उनके सामने खाया।

44) ईसा ने उन से कहा, ‘‘मैंने तुम्हारे साथ रहते समय तुम लोगों से कहा था कि जो कुछ मूसा की संहिता में और नबियों में तथा भजनों में मेरे विषय में लिखा है, सब का पूरा हो जाना आवश्यक है’’।

45) तब उन्होंने उनके मन का अन्धकार दूर करते हुए उन्हें धर्मग्रन्थ का मर्म समझाया

46) और उन से कहा, ‘‘ऐसा ही लिखा है कि मसीह दुःख भोगेंगे, तीसरे दिन मृतकों में से जी उठेंगे

47) और उनके नाम पर येरुसालेम से ले कर सभी राष्ट्रों को पापक्षमा के लिए पश्चात्ताप का उपदेश दिया जायेगा।

48) तुम इन बातों के साक्षी हो।


📚 मनन-चिंतन


पेत्रुस और योहन अत्यत साधारण लोग थे। वे अशिक्षित मछुआरे थे। (देखिये प्रेरित चरित 3:13) प्रभु येसु ने उनको चुनकर तथा लंगडे व्यक्ति को उनके द्वारा चंगाई दिलाकर उन्हें आकर्षण का केन्द्र बना दिया था। अचानक लोगों की प्रंशसा तथा सरहना ने उनको घेर लिया था। उस क्षण के लिये वे ’सुपर हीरो’ बन गये थे। लेकिन उन्होंने व्यक्तिगत प्रशंसा और गलत आत्म-धारणा के प्रलोभन से बचकर इस बात को घोषित किया कि ईश्वर के सामर्थ्य ने लंगडे व्यक्ति को चंगा किया है। पेत्रुस जानता था कि वे कमजोर, पापी येसु जिन्होंने उस लंगडे का चंगा किया पर निर्भर रहने वाले व्यक्ति थे। वे कहते हैं, ’’ईसा के नाम में विश्वास के कारण उसी नाम ने इस मनुष्य को, जिसे आप देखते और जानते हैं, बल प्रदान किया है। उसी विश्वास ने इसे आप सबों के सामने पूर्ण रूप से स्वस्थ किया है।’’ (प्रेरित चरित 3:16)

इस की सेवा में कार्यरत लोगों को अत्यंत विनम्र होना चाहिये। ईश्वर के सेवकों को ईश्वर के श्रेय को चुराना नहीं चाहिये। स्तोत्रकार कहते हैं, ’’हम को नहीं, हम को नहीं, बल्कि अपना नाम महिमान्वित कर।’’ (स्तोत्र 115:1) जो लोग ईश्वर की सेवा में विनम्र बने रहते हैं वे स्वयं पर बडा उपकार करते हैं। ईश्वर उनकी इस विनम्रता के कारण उनका उपयोग अपने कार्यों में करता है किन्तु जो घमण्डी बन जाता है वे स्वयं के विनाश को आमंत्रित करते हैं।

दाउद ने ईश्वर की मंजूषा के सामने हर्ष-उल्लास में सुधबुध खोकर नाच किया था तथा इस बात के लिये उसकी पत्नी मीकल ने उन्हें फटकारा था। राजा दाउद ने अपनी विनम्रता का कारण बताते हुये कहा, ’’दाऊद ने मीकल से कहाए ष्प्रभु ने तुम्हारे पिता और तुम्हारे सारे घराने की अपेक्षा मुझे चुना है और मुझे प्रभु की प्रजा इस्राएल का शासक बनाया है। मैं उसी प्रभु के सामने नाचता रहा और नाचूँगा। मैं इस से अधिक अशोभनीय आचरण करूँगा और अपनी दृष्टि में अपने को और नीचा दिखाऊँगा।’’ (2 समूएल 6:21-22) दाउद ईश्वर के समक्ष अपनी विनम्रता के कारण धनी माने जाते हैं। दाउद ने धार्मिक भावना से प्रेरित होकर ईश्वर का मंदिर बनाने का निर्णय लिया। उसने इसके लिये विस्तृत योजना बनायी तथा तैयारी की। लेकिन जब ईश्वर ने दाउद की योजना को नकार दिया तो दाउद ने ईश्वर की इच्छा का विरोध नहीं किया वरन उसे स्वीकारा।

संत पौलुस इस सच्चाई को स्पष्ट करते हुये कहते हैं, ’’इसका अर्थ यह नहीं कि हमारी कोई अपनी योग्यता है। हम अपने को किसी बात का श्रेय नहीं दे सकते। हमारी योग्यता का स्त्रोत ईश्वर है। उसने हमें एक नये विधान के सेवक होने के योग्य बनाया है।’’ (2 कुरि.3:6) एक व्यक्ति यदि अपनी उपलब्धियों के लिये यदि स्वयं को ही महिमांवित करता है, तो वह अपना ही नुकसान करता है। हम मन सांसारिक मोहमाया, लोगों की वाहवाही के गर्व में आसानी से पड जाता है। लेकिन संत पेत्रुस एवं प्रेरितगण हमें सिखाते हैं कि यदि हम ईश्वर को महिमा प्रदान करेंगे तो ईश्वर निरंतर हमारा उपयोग उनके साधनों के रूप में करते रहेंगे।




📚 REFLECTION



Peter and John were very ordinary people. They were illiterate and fishermen. (See Acts 3:13)However it was the Lord Jesus who by his choice and now by the curing of the lame man had made them the centre of attraction. They were suddenly surrounded by awe and admiration of the people. They had become ‘supermen’ at least for a while. Nevertheless, brushing aside all temptation of self-glory and self-assumption they maintained a steadfast stance that it was the Lord whose power was at work. Peter refused to take any honour to himself but gave it to the Lord who had used them as instruments. Peter knew that they were weak, sinful and dependent for everything on Jesus whose power effected the cure of the man. He said, “And by faith in his name, his name itself has made this man strong, whom you see and know; and the faith that is through Jesus has given him this perfect health in the presence of all of you.” (3:16)

Useful man must be very humble. God’s servants do not rob the Lord of his credit. Palmist would aptly plead, “Not to us, O Lord, not to us, but to your name give glory.” (Psalm 115:1) All those who remain humble in the service of God do to themselves a great favour. God continues to use them for his mission on the contrary when someone becomes proud and draws credit for himself, lives in vain glory and propels his own downward journey.

David danced before the ark of God with great joy and for doing so he was chastised by his wife Michal for not maintaining the decorum befitting a king. However, David remained humble and spoke, “It was before the Lord, who chose me in place of your father and all his household, to appoint me as prince over Israel, the people of the Lord, that I have danced before the Lord. I will make myself yet more contemptible than this, and I will be abased in my own eyes.” (2 Samuel 6:21-22) David is always exalted for his humility before God. David had all the good intentions and wanted to build the temple. He made elaborate plans and preparation for it, however, when the Lord denies him the permission David does resist or resents but accepts Lord’s will.

St. Paul clearly state this fact, “Not that we are competent of ourselves to claim anything as coming from us; our competence is from God, who has made us competent to be ministers of a new covenant, (2 Cor. 3:6)

A person breaks his ownfortunes when he exalts himself and seek glory and credit to his own human skill. Too often, the heart is easily led astray by the attention, attraction and success we receive for our good deeds, but Peter and apostles teachus to give honour to God not to themselves so that God’s grace continue to flow abundantly and flawlessly.

✍ -Br. Biniush Topno


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07 अप्रैल 2021 पास्का अठवारा - बुधवार

 

07 अप्रैल 2021
पास्का अठवारा - बुधवार

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 3:1-10


1) पेत्रुस और योहन तीसरे पहर की प्रार्थना के समय मन्दिर जा रहे थे।

2) लोग एक मनुष्य को ले जा रहे थे, जो जन्म से लँगड़ा था। वे उसे प्रतिदिन ला कर मन्दिर के ‘सुन्दर’ नामक फाटक के पास रखा करते थे, जिससे वह मन्दिर के अन्दर जाने वालों से भीख माँग सके।

3) जब उसने पेत्रुस और योहन को मन्दिर में प्रवेश करते देखा, तो उन से भीख माँगी।

4) पेत्रुस और योहन ने उसे ध्यान से देखा। पेत्रुस ने कहा, ‘‘हमारी ओर देखो’’

5) और वह कुछ पाने की आशा से उनकी ओर देखता रहा।

6) किन्तु पेत्रुस ने कहा, ‘मेरे पास न तो चाँदी है और न सोना; बल्कि मेरे पास जो, वही तुम्हें देखा हूँ- ईसा मसीह नाज़री के नाम पर चलो’’

7) और उनसे उसका दाहिना हाथ पकड़ कर उसे उठाया। उसी क्षण लँगड़े के पैरों और टखनों में बल आ गया।

8) वह उछल कर खड़ा हो गया और चलने-फिरने लगा। वह चलते, उछलते तथा ईश्वर की स्तुति करते हुए उनके साथ मन्दिर आया।

9) सारी जनता ने उस को चलते-फिरते तथा ईश्वर की स्तुति करते हुए देखा।

10) लोग उसे पहचानते थे। यह वही था, जो मन्दिर के ‘सुन्दर’ फाटक के पास बैठ कर भीख माँगा करता था और यह देख कर कि उसे क्या हुआ है, वे अचम्भे में पड़ कर चकित थे।


सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 24:13-35


13) उसी दिन दो शिष्य इन सब घटनाओं पर बातें करते हुए एम्माउस नामक गाँव जा रहे थे। वह येरुसालेम से कोई चार कोस दूर है।

14) वे आपस में बातचीत और विचार-विमर्श कर ही रहे थे

15) कि ईसा स्वयं आ कर उनके साथ हो लिये,

16) परन्त शिष्यों की आँखें उन्हें पहचानने में असमर्थ रहीं।

17) ईसा ने उन से कहा, ‘‘आप लोग राह चलते किस विषय पर बातचीत कर रहे हैं?’’ वे रूक गये। उनके मुख मलिन थे।

18) उन में एक क्लेओपस-ने उत्तर दिया, ‘‘येरुसालेम में रहने वालों में आप ही एक ऐसे हैं, जो यह नहीं जानते कि वहाँ इन दिनों क्या-क्या हुआ है’।

19) ईसा ने उन से कहा, ‘‘क्या हुआ है?’’ उन्होंने उत्तर दिया, ‘‘बात ईसा नाज़री की है वे ईश्वर और समस्त जनता की दृष्टि में कर्म और वचन के शक्तिशाली नबी थे।

20) हमारे महायाजकों और शासकों ने उन्हें प्राणदण्ड दिलाया और क्रूस पर चढ़वाया।

21) हम तो आशा करते थे कि वही इस्राएल का उद्धार करने वाले थे। यह आज से तीन दिन पहले की बात है।

22) यह सच है कि हम में से कुछ स्त्रियों ने हमें बड़े अचम्भे में डाल दिया है। वे बड़े सबेरे क़ब्र के पास गयीं

23) और उन्हें ईसा का शव नहीं मिला। उन्होंने लौट कर कहा कि उन्हें स्वर्गदूत दिखाई दिये, जिन्होंने यह बताया कि ईसा जीवित हैं।

24) इस पर हमारे कुछ साथी क़ब्र के पास गये और उन्होंने सब कुछ वैसा ही पाया, जैसा स्त्रियों ने कहा था; परन्तु उन्होंने ईसा को नहीं देखा।’’

25) तब ईसा ने उन से कहा, ‘‘निर्बुद्धियों! नबियों ने जो कुछ कहा है, तुम उस पर विश्वास करने में कितने मन्दमति हो !

26) क्या यह आवश्यक नहीं था कि मसीह वह सब सहें और इस प्रकार अपनी महिमा में प्रवेश करें?’’

27) तब ईसा ने मूसा से ले कर अन्य सब नबियों का हवाला देते हुए, अपने विषय में जो कुछ धर्मग्रन्थ में लिखा है, वह सब उन्हें समझाया।

28) इतने में वे उस गाँव के पास पहुँच गये, जहाँ वे जा रहे थे। लग रहा था, जैसे ईसा आगे बढ़ना चाहते हैं।

29) शिष्यों ने यह कह कर उन से आग्रह किया, ‘‘हमारे साथ रह जाइए। साँझ हो रही है और अब दिन ढल चुका है’’ और वह उनके साथ रहने भीतर गये।

30) ईसा ने उनके साथ भोजन पर बैठ कर रोटी ली, आशिष की प्रार्थना पढ़ी और उसे तोड़ कर उन्हें दे दिया।

31) इस पर शिष्यों की आँखे खुल गयीं और उन्होंने ईसा को पहचान लिया ... किन्तु ईसा उनकी दृष्टि से ओझल हो गये।

32) तब शिष्यों ने एक दूसरे से कहा, हमारे हृदय कितने उद्दीप्त हो रहे थे, जब वे रास्ते में हम से बातें कर रहे थे और हमारे लिए धर्मग्रन्थ की व्याख्या कर रहे थे!’’

33) वे उसी घड़ी उठ कर येरुसालेम लौट गये। वहाँ उन्होंने ग्यारहों और उनके साथियों को एकत्र पाया,

34) जो यह कह रहे थे, ‘‘प्रभु सचमुच जी उठे हैं और सिमोन को दिखाई दिये हैं’’।

35) तब उन्होंने भी बताया कि रास्ते में क्या-क्या हुआ और उन्होंने ईसा को रोटी तोड़ते समय कैसे पहचान लिया।


📚 मनन-चिंतन


जब मंदिर के ’सुन्दर’ नामक फाटक के पास बैठा लॅगडे व्यक्ति ने पेत्रुस और योहन के ओर भीख मांगने के लिये हाथ फैलाये तो उसने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि कुछ अप्रत्याशित और दिव्य घटना उसके जीवन में होने जा रही है। पेत्रुस और योहन ने उसकी ओर ध्यान से देखा जो इस बात की निशानी थे कि वे उसे कुछ देना चाहते थे अन्यथा लोग जो भिखारियों से आंखे चुराया करते हैं।

पेत्रुस ने कहा, मेरे पास न तो चांदी है और न सोना; बल्कि जो मेरे पास है वही तुम्हें देता हूं।’’ पेत्रुस और योहन के पैसे नहीं थे इसलिये उन्होंने वह ढुंढा जो उनके पास था। पेत्रुस के पास येसु का नाम तथा चंगाई की शक्ति थी जो उसे प्रभु ने दी थी। पेत्रुस ने उस लंगडे व्यक्ति को चंगा किया क्योंकि उसके पास येसु का नाम था। लातीनी भाषा में एक खूबसूरत कहावत है, ’’जो चीज किसी के पास नहीं है वह उसे नहीं दे सकता।’’ पेत्रुस को येसु का नाम एवं उसका सामर्थ्य दिया गया था इसलिये वह उसे लंगडे को दे सका।

आज हमें स्वयं से पूछना चाहिये, ’’मेरे पास क्या है?’ क्या इस बात का दावा कर सकते हैं कि ईश्वर का नाम मेरे साथ है? शायद हमारे पास सोना और चांदी हो सकता है किन्तु येसु का नाम न हो। पैसे और सम्पदा में हमारा विश्वास ईश्वर में हमारे विश्वास को कमजोर करता है। हम अंजाने में ही पैसे की खरीदने की शक्ति पर विश्वास अधिक विश्वास करने लगते हैं।

पेत्रुस और प्रेरितों इस बात से वाकिफ थे इसलिये उन्होंने सांसारिक बातों से दूर ही रहना, भले ही वे लोगों के आंशिक लाभ के लिये क्यों न हो, हितकर समझा। जब यूनानियों इस बात की शिकायत की भोजन सामग्री के वितरण में भेदभाव हो रहा है तो प्रेरितों ने स्पष्ट कहा, यह उचित नहीं है कि हम भोजन परोसने के लिये ईश्वर का वचन छोड दे।....और यह बात सभी को अच्छी लगी।.....ईश्वर का वचन फैलता गया।’’ (प्रेरित चरित 6:2-7) प्रेरितों न सिर्फ येसु का नाम और उसका सामर्थ्य ईश्वर से वरदान स्वरूप पाया बल्कि उसे उन्होंने बडे ही जतन और सतर्कता से संरक्षित भी रखा। जब उन्होंने ऐसा किया तो लोगों ने इसकी प्रशंसा की तथा इसके परिणामस्वरूप ईश्वर का वचन फैलता गया।

हमारी समस्याएं बहुतरफा हो सकती है। लेकिन इन सबसे उपर हमें सर्वप्रथम उचें तथा आध्यात्मिक वरदानों की अभिलाषा करनी तथा उनके सुरक्षा भी करनी चाहिये। लोग हमारे इस दृष्टिकोण का समर्थन करेंगे तथा ईश्वर की आशीष हमारे कार्यों पर बनी रहेगी।




📚 REFLECTION



When the lame man lying at the Beautiful Gate extended his hands towards Peter and John for alms,never he could have imagined that something so unexpected, dramatic and sublime would happen to him. Peter and John looked at him intently this was the sign that they wanted to give something otherwise mostly people like to avoid an eye contact with the beggars.

Peter said, “Silver and gold I have none but I give you what I have”. Peter and John literally didn’t have money to give so he looked for what he had. Peter had the name of Jesus and powers of healing the Lord had bestowed upon him. Peter heals that man because he had the name of Jesus with him. There is a beautiful saying in Latin, Nemo dat quod non habet, literally meaning "no one gives what they do not have”. Peter had been given it so he could give it.

Today we need to introspect and ask ourselves ‘What do we have?’ Can we claim to have the name of Jesus with us? Perhaps we may have silver and gold but the power of the name of Jesus is yet away from us. Faith in the wealth deteriorates the depth of faith in us. We unknowingly begin to rely on the purchasing power of the money.

Peter and the apostles were greatly aware of this fact and never let them be drawn into anything worldly even if it meant temporal good. When the Greeks complained about the partiality being done in the distribution of the food the apostles categorically said, “It is not right that we should neglect the word of God in order to wait at tables…for our part, will devote ourselves to prayer and to serving the word.’ What they said pleased the whole community. The word of God continued to spread;” (See Acts 6:2-7) It was not just the apostles received the power in the name of Jesus they also tried to preserve it deliberately and cautiously. When they preserved it, people liked it and appreciated and as a result the Word of God spread far and wide.

So, our problems are manifold. First of all, we need to ask for the higher and spiritual gifts from Jesus and preserves them with dutifully. People would love this dedication and the God would bless our ministries.

✍ -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!

05 अप्रैल 2021 पास्का अठवारा - सोमवार

 

05 अप्रैल 2021
पास्का अठवारा - सोमवार

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पहला पाठ :प्रेरित-चरित 2:14,22-33


14) पेत्रुस ने ग्यारहो के साथ खड़े हो कर लोगों को सम्बोधित करते हुए ऊँचे स्वर से कहा, "यहूदी भाइयो और येरुसालेम के सब निवासियो! आप मेरी बात ध्यान से सुनें और यह जान लें कि

22) इस्राएली भाइयो! मेरी बातें ध्यान से सुनें! आप लोग स्वयं जानते हैं कि ईश्वर ने ईसा नाज़री के द्वारा आप लोगों के बीच कितने महान् कार्य, चमत्कार एवं चिन्ह दिखाये हैं। इस से यह प्रमाणित हुआ कि ईसा ईश्वर की ओर से आप लोगों के पास भेजे गये थे।

23) वह ईश्वर के विधान तथा पूर्वज्ञान के अनुसार पकड़वाये गये और आप लोगों ने विधर्मियों के हाथों उन्हें क्रूस पर चढ़वाया और मरवा डाला है।

24) किन्तु ईश्वर ने मृत्यु के बन्धन खोल कर उन्हें पुनर्जीवित किया। यह असम्भव था कि वह मृत्यु के वश में रह जायें,

25) क्योंकि उनके विषय में दाऊद यह कहते हैं - प्रभु सदा मेरी आँखों के सामने रहता है। वह मेरे दाहिने विराजमान है, इसलिए मैं दृढ़ बना रहता हूँ।

26) मेरा हृदय आनन्दित है, मेरी आत्मा प्रफुल्लित है और मेरा शरीर भी सुरक्षित रहेगा;

27) क्योंकि तू मेरी आत्मा को अधोलोक में नहीं छोड़ेगा, तू अपने भक्त को क़ब्र में गलने नहीं देगा।

28) तूने मुझे जीवन का मार्ग दिखाया है। तेरे पास रह कर मुझे परिपूर्ण आनन्द प्राप्त होगा।

29) भाइयो! मैं कुलपति दाऊद के विषय में। आप लोगों से निस्संकोच यह कह सकता हूँ कि वह मर गये और कब्र में रखे गये। उनकी कब्र आज तक हमारे बीच विद्यमान है।

30) दाऊद जानते थे कि ईश्वर ने शपथ खा कर उन से यह कहा था कि मैं तुम्हारे वंशजों में एक व्यक्ति को तुम्हारे सिंहासन पर बैठाऊँगा;

31) इसलिये नबी होने के नाते भविष्य में होने वाला मसीह का पुनरुत्थान देखा और इनके विषय में कहा कि वह अधोलोक में नहीं छोड़े गये और उनका शरीर गलने नहीं दिया गया।

32) ईश्वर ने इन्हीं ईसा नामक मनुष्य को पुनर्जीवित किया है-हम इस बात के साक्षी हैं।

33) अब वह ईश्वर के दाहिने विराजमान हैं। उन्हें प्रतिज्ञात आत्मा पिता से प्राप्त हुआ और उन्होंने उसे हम लोगों को प्रदान किया, जैसा कि आप देख और सुन रहे हैं।


सुसमाचार : मत्ती 28:8-15


8) स्त्रियाँ शीघ्र ही कब्र के पास से चली गयीं और विस्मय तथा आनन्द के साथ उनके शिष्यों को यह समाचार सुनाने दौड़ीं।

9) ईसा एकाएक मार्ग में स्त्रियों के सामने आ कर खड़े हो गये और उन्हें नमस्कार किया। वे आगे बढ़ आयीं और उन्हें दण्डवत् कर उनके चरणों से लिपट़ गयीं।

10) ईसा ने उनसे कहा, "डरो नहीं। जाओ और मेरे भाइयों को यह सन्देश दो कि वे गलीलिया जायें। वहाँ वे मेरे दर्शन करेंगे।"

11) स्त्रियाँ जा ही रही थीं कि कुछ पहरेदार नगर आये। उन्होंने महायाजकों को सारा हाल कह सुनाया।

12) महायाजकों ने नेताओं से मिल कर परामर्श किया और सैनिकों को एक मोटी रकम दे कर

13) इस प्रकार समझाया, "तम लोग यही कहो कि रात को जब हम लोग सोये हुये थे, तो ईसा के शिष्य आये और उसे चुरा ले गये।

14) यदि यह बात राज्यपाल के कान में पड़ गयी, तो हम उन्हें समझा कर तुम लोगों को बचा लेंगे।"

15) पहरेदारों ने रुपया ले लिया और वैसा ही किया, जैसा उन्हें सिखाया गया था। यही कहानी फैल गयी और अब तक यहूदियों में प्रचलित है।


📚 मनन-चिंतन


आज के सुसमाचार में हम दो प्रकार के लोगों को पाते हैं जो प्रभु के पुनरूत्थान की घटना पर दो अलग-अलग विपरीत प्रतिक्रियाएं देते हैं। पहले समूह में मरियम मेगदलेना तथा दूसरी महिलायें है जो येसु के पुनरूत्थान के कारण विस्मित तथा हर्ष से भर गयी है। येसु उन्हें दर्शन देकर बताते है कि उन्हें उनके पुनरूत्थान का साक्षी बनना है तथा शिष्यों को बताना है कि येसु उन्हें कहॉ मिलेंगे। दूसरी ओर पहरदारों का समूह है जो इस वास्तविकता से परिचित है कि येसु जी उठे है। वे यह बात जब महापुरोहितों को बताते तो वे उन्हें रिश्वत देकर न सिर्फ इस बात को दबाना चाहते हैं बल्कि उन्हें झूठी गवाही देने के लिये भी कहते हैं। पहरेदार पुनरूत्थान की सच्चाई को लोगों के प्रभाव एवं पैसे के बदले में नकार देते हैं। वे इस घटना को अफवाह बताकर भी लोगों को इस सच्चाई से दूर रखना चाहते हैं।

हम जीवन में अनेक बार इस घटना की पुनरावृर्ति होते देखते हैं जब लोग येसु के पुनरूत्थान में विश्वास करने के बावजूद भी सांसारिक दबाव, प्रभाव, लाभ एवं पैसे के लिये अपने व्यवहार के द्वारा इस सच्चाई को नकार देते हैं। इन पहरेदारों के समान हम न सिर्फ स्वयं येसु की कृपा से दूर रहते बल्कि दूसरों को भी इस वास्तविक सच्चाई से दूर रखते हैं। जब हम इस पुनरूत्थान को स्वीकारते है तो दूसरों को भी इस सच्चाई के प्रति आकर्षित करते है। शिष्यों के जीवन को देखकर अनेकों ने येसु में विश्वास किया तथा ख्राीस्तीय होना स्वीकारा। जब पेत्रुस और योहन को जब कोडो से मारा जाता है तथा आदेश दिया जाता है येुस का नाम लेकर शिक्षा न दे तो वे कहते हैं, ’’आप लोग स्वयं निर्णय करें-क्या ईश्वर की दृष्टि में यह उचित होगा कि हम ईश्वर की नहीं, बल्कि आप लोगों की बात मानें? क्योंकि हमने जो देखा और सुना है, उसके विषय में नहीं बोलना हमारे लिए सम्भव नहीं।’’ (प्रेरित चरित 4:19-20) हमें भी अपने जीवन में सांसारिक लाभ एवं लोभ से परे जाकर ईश्वर की बात मानकर पुनरूत्थान की सच्चाई का साक्ष्य देना चाहिये।




📚 REFLECTION



In today’s Gospel we find two type of people or reactions to the truth of the resurrection. In the first group we have Mary Magdalen and the other woman who are overwhelmed by resurrection of the Lord. They are told by the Lord himself not to be panicked and inform the disciples to go to Galilee. On the contrary we have the soldiers who were guarding the tomb. They are aware of the fact that Jesus is risen. When they reported this matter to the high priests, they not only bribed them but also prepare them to bear false witness to the happening. For the greed of money, they not only refuse the truth but also agree to spread it as a lie.

Quite often we witness such scenario being played out time and again when people know the reality of the resurrection yet due to worldly pressure, influence, greed and money deny it in their behaviour. We not only keep ourselves away from the grace and gift of the Lord but also deny others an opportunity to experience it. when we accept it we open the doors for others too. Seeing the life of disciples hundreds of people were attracted to Christianity and accepted Jesus. When Peter and John were beaten and threatened not to preached in the name of Jesus they unlike soldiers refused to buckle under pressured said, “Whether it is right in God’s sight to listen to you rather than to God, you must judge; 20for we cannot keep from speaking about what we have seen and heard.’ (Acts 4:19-20) Like the apostles we too ought too look beyond the safety and security, gains and loses of this world and accept and live the truth of the resurrection in our life.


✍ -Br. Biniush Topno


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आज का पवित्र वचन



प्रभात का मिस्सा बलिदान

पहला पाठ : प्रेरित-चरित 10:34a. 37-43

34) पेत्रुस ने कहा, "मैं अब अच्छी तरह समझ गया हूँ कि ईश्वर किसी के साथ पक्ष-पात नहीं करता।

37) नाज़रेत के ईसा के विषय में यहूदिया भर में जो हुआ हैं, उसे आप लोग जानते हैं। वह सब गलीलिया में प्रारंभ हुआ-उस बपतिस्मा के बाद, जिसका प्रचार योहन किया था।

38) ईश्वर ने ईसा को पवित्र आत्मा और सामर्थ्य से विभूषित किया और वह चारों ओर घूम-घूम कर भलाई करते रहें और शैतान के वश में आये हुए लोगों को चंगा करते रहें, क्योंकि ईश्वर उनके साथ था

39) उन्होंने जो कुछ यहूदिया देश और येरुसालेम में किया, उसके साक्षी हम हैं। उन को लोगों ने क्रूस के काठ पर चढ़ा कर मार डाला;

40) परंतु ईश्वर ने उन्हें तीसरे दिन जिलाया और प्रकट होने दिया-

41) सारी जनता के सामने नहीं, बल्कि उन साक्षियों के सामने, जिन्हें ईश्वर ने पहले ही से चुन लिया था। वे साक्षी हम हैं। मृतकों में से उनके जी उठने के बाद हम लोगों ने उनके साथ खाया-पिया

42) और उन्होंने हमें आदेश दिया कि हम जनता को उपदेश दे कर घोषित करें कि ईश्वर ने उन्हें जीवितों और मृतकों का न्यायकर्ता नियुक्त किया हैं।

43) उन्हीं के विषय में सब नबी घोषित करते है कि जो उन में विश्वास करेगा, उसे उनके नाम द्वारा पापों की क्षमा मिलेगी।"

दूसरा पाठ : कलोसियों 3:1-4

1) यदि आप लोग मसीह के साथ ही जी उठे हैं- जो ईश्वर के दाहिने विराजमान हैं- तो ऊपर की चीजें खोजते रहें।

2) आप पृथ्वी पर की नहीं, ऊपर की चीजों की चिन्ता किया करें।

3) आप तो मर चुके हैं, आपका जीवन मसीह के साथ ईश्वर में छिपा हुआ है।

4) मसीह ही आपका जीवन हैं। जब मसीह प्रकट होंगे, तब आप भी उनके साथ महिमान्वित हो कर प्रकट हो जायेंगे।

अथवा दूसरा पाठ : 1 कुरिन्थियों 5: 6b-8.

6) आप लोगों का आत्मसन्तोष आप को शोभा नहीं देता। क्या आप यह नहीं जानते कि थोड़ा-सा ख़मीर सारे सने हुए आटे को ख़मीर बना देता है?

7) आप पुराना ख़मीर निकाल कर शुद्ध हो जायें, जिससे आप नया सना हुआ आटा बन जायें। आप को बेख़मीर रोटी-जैसा बनना चाहिए क्योंकि हमारा पास्का का मेमना अर्थात् मसीह बलि चढ़ाये जा चुके हैं।

8) इसलिए हमें न तो पुराने खमीर से और न बुराई और दुष्टता के खमीर से बल्कि शुद्धता और सच्चाई की बेख़मीर रोटी से पर्व मनाना चाहिए।


सुसमाचार योहन 20:1-9


1) मरियम मगदलेना सप्ताह के प्रथम दिन, तडके मुँह अँधेरे ही कब्र के पास पहुँची। उसने देखा कि कब्र पर से पत्थर हटा दिया गया है।

2) उसने सिमोन पेत्रुस तथा उस दूसरे शिष्य के पास, जिसे ईसा प्यार करते थे, दौडती हुई आकर कहा, "वे प्रभु को कब्र में से उठा ले गये हैं और हमें पता नहीं कि उन्होंने उन को कहाँ रखा है।"

3) पेत्रुस और वह दूसरा शिष्य कब्र की ओर चल पडे।

4) वे दोनों साथ-साथ दौडे। दूसरा शिष्य पेत्रुस को पिछेल कर पहले कब्र पर पहुँचा।

5) उसने झुककर यह देखा कि छालटी की पट्टियाँ पडी हुई हैं, किन्तु वह भीतर नहीं गया।

6) सिमोन पेत्रुस उसके पीछे-पीछे चलकर आया और कब्र के अन्दर गया। उसने देखा कि पट्टियाँ पडी हुई हैं।

7) और ईसा के सिर पर जो अँगोछा बँधा था वह पट्टियों के साथ नहीं बल्कि दूसरी जगह तह किया हुआ अलग पडा हुआ है।

8) तब वह दूसरा शिष्य भी जो कब्र के पास पहले आया था भीतर गया। उसने देखा और विश्वास किया,

9) क्योंकि वे अब तक धर्मग्रन्थ का वह लेख नहीं समझ पाये थे कि जिसके अनुसार उनका जी उठना अनिवार्य था।


अथवा मारकुस 16:1-7.


1) विश्राम-दिवस के बाद मरियम और सलोमी ने सुगन्धित द्रव्य खरीदा, ताकि जा कर ईसा के शरीर का विलोपन करें।

2) वे सप्ताह के प्रथम दिन बहुत सबेरे, सूर्योदय होते ही, कब्र पर पहुंचीं।

3) वे आपस में यह कह रही थीं, "कौन हमारे लिए कब्र के द्वार पर से पत्थर लुढ़का कर हटा देगा?"

4) किन्तु जब उन्होंनं आंखें ऊपर उठा कर देखा, तो पता चला कि वह पत्थर, जो बहुत बड़ा था, अलग लुढ़काया हुआ है।

5) वे कब्र में अन्दर गयीं और यह देख कर चकित-सी रह गयीं कि लम्बा श्वेत वस्त्र पहने एक नवयुवक दाहिने बैठा हुआ है।

6) उसने उन से कहा, "डरिए नहीं। आप लोग ईसा नाज़री को ढूँढ़ रहीं हैं, जो क्रूस पर चढ़ाये गये थे। वे जी उठे हैं- वे यहाँ नहीं हैं। देखिए, यही जगह है, जहाँ उन्होंने उन को रखा था।

7) जा कर उनके शिष्यों और पेत्रुस से कहिए कि वे आप लोगों से पहले गलीलिया जायेंगे। वहां आप लोग उनके दर्शन करेंगे, जैसा कि उन्होंने आप लोगों से कहा था।"


📚 मनन-चिंतन


बिल विलसन एक अमेरिकन सैनिक था जिसने यूरोप में अपनी नियुक्ति के दौरान शराब पीने की आदत डाल ली थी। अमेरिका वापस आने पर भी उसकी शराब की लत बनी रही। वह लगभग 2 दशकों तक वह निरंतर शराब पीता रहा। इस दौरान इस वजह से उसकी आर्थिक स्थिति बर्बाद हो गयी। उसका पारिवारिक जीवन तथा स्वास्थ्य भी टूटने की कगार पर था। इस बीच उसकी मुलाकात उसके पुराने पियक्कड दोस्त से होती है जो उसे बताता की येसु ने उसे चंगा कर दिया है तथा उसने शराब पीना छोड दिया है। बिल का उसकी बात हास्यास्पद लगी। उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि कोई शराब पीना छोड सकता है। इस घटना के कुछ ही महीने बाद दिसंबर 1934 में बिल को एक दिव्य अनुभव हुआ। वह मेनहटन के पुर्नवास क्रेन्द में अपना इलाज करवा रहा था। वह अत्यत पीडा में था। ’’वह कई दिनों तक अपने होशोहवास में नहीं था। शराब न मिलने के कारण उसे ऐसा लग रहा था मानो कीडे उसके खून में दौड रहे हो। दर्द के कारण वह अपने हाथ-पैर भी नहीं चला पा रहा था। अपनी इस पीडा में वह कहता है, ’’अगर ईश्वर है तो वह आये। मैं सबकुछ करने को तैयार हूं।’’ उसी समय उसका कमरा एक सफेद रोशनी से भर गया, उसका दर्द खत्म हो गया। उसे ऐसा महसूस हो रहा था मानो वह किसी पहाड की उचाई पर हो जहॉ आत्मा हवा में बह रहा हो। वह एकदम से मुक्त हो गया।

इसके बाद बिल विलसन ने कभी शराब नहीं पी। अगले छत्तीस साल बिल लोगों की शराब-मुक्ति के पुर्नावास के कार्यों में लगा रहा। उसने अल्कोहल अनोनिमस की स्थापना की जिससे लगभग एक करोड लोगों की शराब मुक्ति में सहायता की।

येसु से एक भेंट या उनके इस अनुभव ने एक शराबी को शराब के विरूद्ध चलाने वाला आंदोलनकारी बना दिया। यह उस परिवर्तन का अद्वितीय उदाहरण है जो पुनरूत्थित येसु के बाद होता है। येसु का पुनरूत्थान हमारे विश्वास की धूरी है। संत पौलुस कुरिंथियों के नाम अपने पहले पत्र में इस सत्य के बारे में लिखते हैं, ’’यदि मसीह नहीं जी उठे, तो हमारा धर्मप्रचार व्यर्थ है और आप लोगों का विश्वास भी व्यर्थ है। (1 कुरि.15:14) पुनरूत्थान सारी मानवजाति के लिये एक मोड है। यह मोड है क्योंकि हमारा विश्वास मात्र मृत्यु उपरांत जीवन में नहीं बल्कि उस जीवन में हैं जो हमें मसीह में विश्वास, उनकी मृत्यु तथा पुन जी उठने से प्राप्त होता है। पुनरूत्थान के बारे में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है जो मनुष्य इसमें विश्वास एवं अनुभव करता है उसका जीवन मूल रूप से बदल जाता है।

संत पौलुस के लिये पुनर्जीवित येसु से भेंट एक परिवर्तनकारी घटना थी। वे कलीसिया तथा ख्राीस्तीयों पर अत्याचार करते थे। किन्तु जब वे दमिश्क जा रहे थे तो रास्ते में उन्हें, येसु नाजरी, जिन पर वे अब तक अत्याचार कर रहे थे, के दर्शन होते हैं। इस घटना के बाद पौलुस का जीवन तथा उसका लक्ष्य एकदम से बदल गया। अब वह जिस येसु पर अत्याचार किया करता था का सबसे निष्ठावान अनुयायी बन गया था। वह उसके जीवन की सभी उपलब्धियों को तुच्छ तथा मसीह के ज्ञान को ही श्रेष्ठ समझने लगा। ’’इतना ही नहीं, मैं प्रभु ईसा मसीह को जानना सर्वश्रेष्ठ लाभ मानता हूँ और इस ज्ञान की तुलना में हर वस्तु को हानि ही मानता हूँ। उन्हीं के लिए मैंने सब कुछ छोड़ दिया है और उसे कूड़ा समझता हूँ,....मैं यह चाहता हूँ कि मसीह को जान लूँ, उनके पुनरूत्थान के सामर्थ्य का अनुभव करूँ और मृत्यु में उनके सदृश बन कर उनके दुःखभोग का सहभागी बन जाऊँ, जिससे मैं किसी तरह मृतकों के पुनरूत्थान तक पहुँच सकूँ।’’ (फिल्लिपियों 3:8,10-11)

शिष्यों के जीवन में भी पुनरूत्थान के बाद आमूलचूल परिवर्तन आये। वे अनपढ मछुआरे थे। उन्हें येसु के दुखभोग, मृत्यु तथा पुनरूत्थान को समझने के लिये साहस तथा व्यापक समझ की कमी थी। येसु के गिरफ्तार होते ही वे उन्हें छोडकर तितर-बितर हो गये। पेत्रुस ने तो उन्हें पहचानने से भी इंकार कर दिया था। वे इतने डर गये थे कि उन्हें कुछ पर भी विश्वास करना मुश्किल लग रहा था। लेकिन येसु ने पुनरूत्थान का साक्ष्य कई बार अपने दर्शनों के द्वारा दिये। जिससे शिष्यों का येसु के पुनरूत्थान में विश्वास पक्का हो गया था। अब वे साहस के साथ उसका साक्ष्य दे रहे थे। उनका विश्वास एवं साहस देखकर सभी विस्मित हो गये थे, ’’पेत्रुस और योहन का आत्मविश्वास देखकर और इन्हें अशिक्षित तथा अज्ञानी जान कर, महासभा के सदस्य अचम्भे में पड़ गये। फिर, वे पहचान गये कि ये ईसा के साथ रह चुके हैं,’’ (प्रेरित चरित 4:13) अब वे येसु के नाम के कारण दुख भोगने को भी तैयार थे, ’’इस पर पेत्रुस और अन्य प्रेरितों ने यह उत्तर दिया, ष्मनुष्यों की अपेक्षा ईश्वर की आज्ञा का पालन करना कहीं अधिक उचित है। इन बातों के साक्षी हम हैं और पवित्र आत्मा भी, जिसे ईश्वर ने उन लोगों को प्रदान किया है, जो उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। प्रेरित इसलिए आनन्दित हो कर महासभा के भवन से निकले कि वे {ईसा के} नाम के कारण अपमानित होने योग्य समझे गये।’’ (प्रेरित चरित 5:29-32,41)

प्रेरितगण प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद भी हर जगह बडे साहस और निडरता के साथ सुसमाचार का प्रचार करने लगे थे। इनमें से कईयों ने तो मरने से पूर्व घोर यातनायें सही किन्तु हार नहीं मानी। उनका विश्वास तथा आस्था बहुत गहरा था। यह सब उनका प्रभु के जीवित होने में विश्वास के कारण था। हम भी प्रभु के पुनरूत्थान में विश्वास करते हैं किन्तु शायद उसका रूपांतरित करने वाला अनुभव हम से दूर है। हम प्रार्थना करे कि प्रभु की दया से हम भी उनके पुनरूत्थान का अनुभव कर सकें।




📚 REFLECTION



Bill Wilson was an American soldier who picked up drinking habit during his days on duty to Europe. After returning from the military, he continued drinking and with the passage of time became completely observed in it. His drinking continued for almost two decades. During this period, he was financially completely ruined. His family life tattered and health on the cusp collapse. He was told by his alcoholic friend that God had healed him and consequently completely given up drinking. Bill Wilson laughed at the thought of being sobriety. But a few months later, in December 1934, Wilson had a revelatory experience while in a Manhattan rehab centre. The only thing, he found, that would relieve his pain from the detox drug was prayer.

“For days he hallucinated. The withdrawal pains made it feel as if insects were crawling across his skin. He was so nauseous he could hardly move, but the pain was too intense to stay still. “If there is a God, let Him show Himself!” I am ready to do anything. Anything!” At that moment a white light filled his room, the pain ceased and he felt as if he were on a mountaintop and that a wind not of air but of spirit was blowing. I was free man.

Bill Wilson would never have another drink. For next thirty-six years he would devote himself to founding, building and spreading Alcoholics Anonymous until it became the largest, most well-known and successful habit changing organization in the world. Since then, Alcoholics Anonymous has helped an estimated 10 million people get sober.

An encounter with Jesus turned an alcoholic into in to a crusader against the alcohol. It is just an example of the transformation one has when encounter the risen Lord. The resurrection of Jesus has been the axis of our faith. St. Paul’s points out, “In vain is our faith if Christ has not been risen.” (1 Cor.15:14)

Resurrection has been the turning point for the whole humanity. Our faith not merely in life after death but a life with God which we gain through the death and resurrection of the Christ. A life in risen-Christ is eternal which we gain through our faith in Christ and his death and resurrection.

One of the most significant things about resurrection is the transformation it brings about in the life of people who accept this truth and live in their life.

For St. Paul encountering the Lord Jesus was a transforming reality. He was a persecutor of the Church and he could go on to any extend to persecute the Christians. However, on the way to Damascus he encountered Jesus of Nazareth whom he was persecuting. This encounter completely turned about the life and its purposes for him. Now Paul becomes one of the staunchest supporters of Jesus. He would count everything as a thrash in comparing with the knowing the Christ, “I regard everything as loss because of the surpassing value of knowing Christ Jesus my Lord… I want to know Christ and the power of his resurrection and the sharing of his sufferings by becoming like him in his death, if somehow I may attain the resurrection from the dead.” (Philippians 3:8,10-11) So far the only ambition of Paul was to persecute any attempt of proclaiming Jesus as risen but now is the champion of this cause.

The change in the life of the apostles too had been exceptionally great. They were illiterate fishermen. They lacked courage and understanding of the Jesus’ passion, death and resurrection. They run away as soon as Jesus was arrested. Peter even refused to recognise him. they were freight to the point of disbelieve. However, after meeting the risen Jesus they became bold and irresistible. They were no longer in hiding but rather in open preaching and performing miracles. Their new found courage and wisdom baffled the authorities, “Now when they saw the boldness of Peter and John and realized that they were uneducated and ordinary men, they were amazed and recognized them as companions of Jesus. (Acts 3:13) They were willing to suffer and to die. They responded, “We must obey God rather than any human authority. The God of our ancestors raised up Jesus, whom you had killed by hanging him on a tree…And we are witnesses to these things, and so is the Holy Spirit whom God has given to those who obey him.’…As they left the council, they rejoiced that they were considered worthy to suffer dishonour for the sake of the name. (Acts 5:29-32,41)

The Apostles went about everywhere daring the inclement and hostile conditions preaching the risen Lord. Most of them before being martyred suffered a great pain and torture. Their conviction and faith were of astronomical heights. It was due to the experience of the risen Lord. We too perhaps believe in the resurrection but lack the transforming experience of risen Lord. Let us Pray and earnestly seek the risen Lord for God would not hold back anything good from us.



मनन- चिं तन -2


मसीह का पुनरूत्थान मानवीय इतिहास की अविश्वसनीय घटना थी। इस प्रकार किसी मनुष्य का सार्वजनिक तौर पर मर जाना तथा उसका पूर्वघोषित तरीके से तीसरे दिन जी उठना अप्रत्याशित बात थी। हरेक व्यक्ति की इस बात को लेकर अपनी-अपनी धारणा तथा प्रतिक्रिया थी। येसु ने अपने जीवनकाल में ही शिष्यों को अनेक बार अपने दुःखभोग एवं पुनरूत्थान के बारे में आगाह किया था किन्तु शिष्य इस बात को समझने में नाकाम रहे। येसु के गिरफ्तार होते ही वे तितर-बितर हो गये तथा पेत्रुस ने तो उन्हें पहचानने से ही इनकार कर दिया था। येसु के भयावह दुःखभोग एवं दर्दनाक मृत्यु ने उनका मनोबल तोड दिया था। ऐसी मनोदशा में उनका पुनरूत्थान पर विश्वास करना संभव नहीं था। प्रभु के शव को कब्र में नहीं पाये जाने की सूचना सर्वप्रथम मरियम मगदलेना द्वारा पेत्रुस एवं योहन को इस प्रकार दी गयी, “वे प्रभु को कब्र में से उठा ले गये हैं और हमें पता नहीं कि उन्होंने उन को कहाँ रखा है।” इस खबर पर पेत्रुस एवं योहन कब्र की ओर दौड पडते हैं। पेत्रुस सर्वप्रथम कब्र के अंदर जाता है और देखता है कि, ”पट्टियाँ पडी हुई हैं। और ईसा के सिर पर जो अँगोछा बँधा था वह पट्टियों के साथ नहीं बल्कि दूसरी जगह तह किया हुआ अलग पडा हुआ है।” इसके बाद योहन कब्र में प्रवेश करता है किन्तु योहन वह दृश्य देखकर विश्वास करता है कि प्रभु सचमुच में जी उठे हैं। मरियम मगदलेना एवं पेत्रुस के विपरीत, योहन ने खाली कब्र को देख कर विश्वास किया कि प्रभु ने जैसा कहा था वैसे ही वे जीवन उठे होंगे।

योहन के अनुसार अन्यों का पुनरूत्थान में विश्वास न कर पाने का कारण उनका धर्मग्रंथ को नहीं समझ पाना था। शिष्यों को पुनरूत्थान में विश्वास दिलाने के लिए येसु को उन्हें न सिर्फ अपने दर्शन कराने पडे बल्कि उन्हें धर्मग्रंथ के द्वारा भी यह समझाना तथा विश्वास दिलाना पडा। संत लूकस के सुसमाचार में एम्माउस जाने वाले दो शिष्यों को येसु इसी प्रकार समझाते हैं, ”तब ईसा ने उन से कहा, ‘‘निर्बुद्धियों! नबियों ने जो कुछ कहा है, तुम उस पर विश्वास करने में कितने मन्दमति हो! क्या यह आवश्यक नहीं था कि मसीह वह सब सहें और इस प्रकार अपनी महिमा में प्रवेश करें?” तब ईसा ने मूसा से ले कर अन्य सब नबियों का हवाला देते हुए, अपने विषय में जो कुछ धर्मग्रन्थ में लिखा है, वह सब उन्हें समझाया।” (लूकस 24:25-27) येसु उनको धर्मग्रंथ का हवाला देकर ही अपने पुनरूत्थान की सच्चाई पर विश्वास करना सिखलाते हैं। येसु की यह शैली शिष्यों के लिए प्रभावशाली सिद्ध हुयी तथा वे कह उठे, ”हमारे हृदय कितने उद्दीप्त हो रहे थे, जब वे रास्ते में हम से बातें कर रहे थे और हमारे लिए धर्मग्रन्थ की व्याख्या कर रहे थे!” (लूकस 24:32) बाद में येसु ने प्रेरितों के समूह पर स्वयं को प्रकट किया तथा उनको अपनी शिक्षा का स्मरण दिलाते हुये कहा, ”मैंने तुम्हारे साथ रहते समय तुम लोगों से कहा था कि जो कुछ मूसा की संहिता में और नबियों में तथा भजनों में मेरे विषय में लिखा है, सब का पूरा हो जाना आवश्यक है”। तब उन्होंने उनके मन का अन्धकार दूर करते हुए उन्हें धर्मग्रन्थ का मर्म समझाया”। (लूकस 24:44-45)

इस प्रकार बाद में अपने प्रेरिताई के कार्यों के दौरान शिष्य भी दूसरों को धर्मग्रंथ की सहायता से येसु के पुनरूत्थान पर विश्वास करने के लिए प्रेरित करते हैं। संत पेत्रुस अपने प्रथम प्रेरिताई संबोधन में राजा दाउद के स्तोत्र 16 को आधार बनाते हुये उपस्थित जनसमूह को पुनरूत्थान की सच्चाई से अवगत कराने का प्रयास करते हैं। वे कहते हैं, ”उन्होंने नबी होने के नाते भविष्य में होने वाला मसीह का पुनरूत्थान देखा और इसके विषय में कहा कि, ’वह अधोलोक में नहीं छोडे गये और उनका शरीर गलने नहीं दिया गया।’ ईश्वर ने इन्ही ईसा नामक मनुष्य को पुनर्जीवित किया है - हम इस बात के साक्षी हैं। अब वह ईश्वर के दाहिने विराजमान हैं।”(प्रेरित चरित 2:31-33) अन्य स्थानों जैसे प्रेरित चरित 3:22-26; 4:11 पर भी संत पेत्रुस धर्मग्रंथ की व्याख्या द्वारा येसु के पुनरूत्थान को सच तथा ईश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित प्रमाणित करते हैं। संत पौलुस भी कुरिन्थियों के नाम प्रथम पत्र में धर्मग्रंथ के लेखों के द्वारा पुनरूत्थान के सच को प्रतिपादित करते हैं। (1 कुरि. 15:25,27,32,45,54)

धर्मग्रंथ के द्वारा हम भी पुनरूत्थान पर विश्वास करना सीखते हैं। हमने प्रभु को नहीं देखा और न ही हम पुनरूत्थान के प्रत्यक्ष साक्षी हैं किन्तु येसु के पुनरूत्थान पर हमारा विश्वास सच्चा एवं दृढ है। हमें यह विश्वास धर्मग्रंथ के वचनों द्वारा ही प्राप्त होता है। धर्मग्रंथ हमें सिखलाता है कि येसु ही वह प्रतिज्ञात मसीहा है तथा उनका दुःखभोगना तथा पुनरूत्थित होना ईश्वर की इच्छा एवं सामर्थ्य का परिणाम था। धर्मग्रंथ के द्वारा ईश्वर हम से बात करते हैं तथा अपने ईश्वरीय रहस्यों को प्रकट करते हैं। यदि हम धर्मग्रंथ के लेखों को पढते नहीं हैं तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि हम ईश्वर और उनके मार्गों के बारे में भी कम ही जानते होंगे। संत पौलुस भी इसी तथ्य को समझाते हुये कहते हैं कि ”...यदि उन्होंने उसके विषय में कभी सुना नहीं, तो उस में विश्वास कैसे कर सकते हैं?..... सुनने से विश्वास उत्पन्न होता है और जो सुना जाता है, वह मसीह का वचन है।” (रोमियों 10:14,17) मसीह में विश्वास करने के लिए धर्मग्रंथ को जानना तथा उसमें विश्वास करना हमारे खीस्तीय विश्वास की धुरी है। विश्वास के लिए यह भी अत्यंत आवश्यक है कि हम वचन को ईश्वर का वचन मानें, ”..... जब आपने ईश्वर का सन्देश सुना और ग्रहण किया, तो आपने उसे मनुष्यों का वचन नहीं बल्कि -जैसा कि वह वास्तव में है- ईश्वर का वचन समझकर स्वीकार किया और यह वचन अब आप विश्वासियों में क्रियाशील है।” (1 थेसलनीकियों. 2:13) इस विश्वास के साथ वचन को ग्रहण करना हमें पुनरूत्थान में विश्वास की ओर ले जाता है। पवित्र आत्मा हमें वचन को समझने तथा उसमें विश्वास करने की ओर ले जाता है। आज येसु अपने वचन के द्वारा हमें पुनरूत्थान में विश्वास करने का निमंत्रण देते हैं। जब हम उनके इस संदेश को पूर्ण भक्ति एवं विश्वास के साथ ग्रहण करते हैं तो पुनरूत्थान की यह घटना हमारे लिए जीवंत घटना बन जाती है तथा हम भी यह कह सकते हैं, ”मैंने प्रभु को देखा है और उन्होंने मुझे यह संदेश दिया।” (योहन 20:18)

✍ BR. BINIUSH TOPNO

HAPPY EASTER TO YOU ALL



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Praise the Lord!