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पुण्य शुक्रवार 02 अप्रैल 2021 पुण्य सप्ताह

 

पुण्य शुक्रवार 02 अप्रैल 2021

पुण्य सप्ताह

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पहला पाठ : इसायाह का ग्रन्थ 52:13-53:12

13) देखो! मेरा सेवक फलेगा-फूलेगा। वह महिमान्वित किया जायेगा और अत्यन्त महान् होगा।

14) उसकी आकृति इतनी विरूपित की गयी थी कि वह मनुय नही जान पड़ता था; लोग देख कर दंग रह गये थे।

15) उसकी ओर बहुत-से राष्ट्र आश्चर्यचकित हो कर देखेंगे और उसके सामने राजा मौन रहेंगे; क्योंकि उनके सामने एक अपूर्व दृश्य प्रकट होगा और जो बात कभी सुनने में नहीं आयी, वे उसे अपनी आँखों से देखेंगे।

1) किसने हमारे सन्देश पर विश्वास किया? प्रभु का सामर्थ्य किस पर प्रकट हुआ है?

2) वह हमारे सामने एक छोटे-से पौधे की तरह, सूखी भूमि की जड़ की तरह बढ़ा। हमने उसे देखा था; उसमें न तो सुन्दरता थी, न तेज और न कोई आकर्षण ही।

3) वह मनुयों द्वारा निन्दित और तिरस्कृत था, शोक का मारा और अत्यन्त दुःखी था। लोग जिन्हें देख कर मुँह फेर लेते हैं, उनकी तरह ही वह तिरस्कृत और तुच्छ समझा जाता था।

4) परन्तु वह हमारे ही रोगों का अपने ऊपर लेता था और हमारे ही दुःखों से लदा हुआ था और हम उसे दण्डित, ईश्वर का मारा हुआ और तिरस्कृत समझते थे।

5) हमारे पापों के कारण वह छेदित किया गया है। हमारे कूकर्मों के कारण वह कुचल दिया गया है। जो दण्ड वह भोगता था, उसके द्वारा हमें शान्ति मिली है और उसके घावों द्वारा हम भले-चंगे हो गये हैं।

6) हम सब अपना-अपना रास्ता पकड़ कर भेड़ों की तरह भटक रहे थे। उसी पर प्रभु ने हम सब के पापों का भार डाला है।

7) वह अपने पर किया हुआ अत्याचार धैर्य से सहता गया और चुप रहा। वध के लिए ले जाये जाने वाले मेमने की तरह और ऊन कतरने वाले के सामने चुप रहने वाली भेड़ की तरह उसने अपना मुँह नहीं खोला।

8) वे उसे बन्दीगृह और अदालत ले गये; कोई उसकी परवाह नहीं करता था। वह जीवितों के बीच में से उठा लिया गया है और वह अपने लोगों के पापों के कारण मारा गया है।

9) यद्यपि उसने कोई अन्याय नहीं किया था और उसके मुँह से कभी छल-कपट की बात नहीं निकली थी, फिर भी उसकी कब्र विधर्मियों के बीच बनायी गयी और वह धनियों के साथ दफ़नाया गया है।

10) प्रभु ने चाहा कि वह दुःख से रौंदा जाये। उसने प्रायश्चित के रूप में अपना जीवन अर्पित किया; इसलिए उसका वंश बहुत दिनों तक बना रहेगा और उसके द्वारा प्रभु की इच्छा पूरी होगी।

11) उसे दुःखभोग के कारण ज्योति और पूर्ण ज्ञान प्राप्त होगा। उसने दुःख सह कर जिन लोगों का अधर्म अपने ऊपर लिया था, वह उन्हें उनके पापों से मुक्त करेगा।

12) इसलिए मैं उसका भाग महान् लोगों के बीच बाँटूँगा और वह शक्तिशाली राजाओं के साथ लूट का माल बाँटेगा; क्योंकि उसने बहुतों के अपराध अपने ऊपर लेते हुए और पापियों के लिए प्रार्थना करते हुए अपने को बलि चढ़ा दिया और उसकी गिनती कुकर्मियों में हुई।

दूसरा पाठ : इब्रानियों के नाम पत्र 4:14-16;5:7-9

14) हमारे अपने एक महान् प्रधानयाजक हैं, अर्थात् ईश्वर के पुत्र ईसा, जो आकाश पार कर चुके हैं। इसलिए हम अपने विश्वास में सुदृढ़ रहें।

15) हमारे प्रधानयाजक हमारी दुर्बलताओं में हम से सहानुभूति रख सकते हैं, क्योंकि पाप के अतिरिक्त अन्य सभी बातों में उनकी परीक्षा हमारी ही तरह ली गयी है।

16) इसलिए हम भरोसे के साथ अनुग्रह के सिंहासन के पास जायें, जिससे हमें दया मिले और हम वह कृपा प्राप्त करें, जो हमारी आवश्यकताओं में हमारी सहायता करेगी।

7) मसीह ने इस पृथ्वी पर रहते समय पुकार-पुकार कर और आँसू बहा कर ईश्वर से, जो उन्हें मृत्यु से बचा सकता था, प्रार्थना और अनुनय-विनय की। श्रद्धालुता के कारण उनकी प्रार्थना सुनी गयी।

8) ईश्वर का पुत्र होने पर भी उन्होंने दुःख सह कर आज्ञापालन सीखा।

9 (9-10) वह पूर्ण रूप से सिद्ध बन कर और ईश्वर से मेलखि़सेदेक की तरह प्रधानयाजक की उपाधि प्राप्त कर उन सबों के लिए मुक्ति के स्रोत बन गये, जो उनकी आज्ञाओं का पालन करते हैं।

सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 18:1-19:42

1) यह सब कहने के बाद ईसा अपने शिष्यों के साथ केद्रेान नाले के उस पार गये। वहाँ एक बारी थी। उन्होंने अपने शिष्यों के साथ उस में प्रवेश किया।

2) उनके विश्वासघाती यूदस को भी वह जगह मालूम थी, क्योंकि ईसा अक्सर अपने शिष्यों के साथ वहाँ गये थे।

3) इसलिये यूदस पलटन और महायाजकों तथा फ़रीसियों के भेजे हुये प्यादों के साथ वहाँ आ पहुँचा। वे लोग लालटेनें मशालें और हथियार लिये थे।

4) ईसा, यह जान कर कि मुझ पर क्या-क्या बीतेगी आगे बढे और उन से बोले, ’’किसे ढूढतें हो?’’

5) उन्होंने उत्तर दिया, ’’ईसा नाज़री को’’। ईसा ने उन से कहा, ’’मैं वही हूँ’’। वहाँ उनका विश्वासघाती यूदस भी उन लोगों के साथ खडा था।

6) जब ईसा ने उन से कहा, ’मैं वही हूँ’ तो वे पीछे हटकर भूमि पर गिर पडे।

7) ईसा ने उन से फि़र पूछा, ’’किसे ढूढते हो?’’ वे बोले, ’’ईसा नाजरी को’’।

8) इस पर ईसा ने कहा, ’’मैं तुम लोगों से कह चुका हूँ कि मैं वही हूँ। यदि तुम मुझे ढूँढ़ते हो तो इन्हें जाने दो।’’

9) यह इसलिये हुआ कि उनका यह कथन पूरा हो जाये- तूने मुझ को जिन्हें सौंपा, मैंने उन में से एक का भी सर्वनाश नहीं होने दिया।

10) उस समय सिमोन पेत्रुस ने अपनी तलवार खींच ली और प्रधानयाजक के नौकर पर चलाकर उसका दाहिना कान उडा दिया। उस नौकर का नाम मलखुस था।

11) ईसा ने पेत्रुस से कहा, ’’तलवार म्यान में कर लो। जो प्याला पिता ने मुझे दिया है क्या मैं उसे नहीं पिऊँ?’’

12) तब पलटन, कप्तान और यहूदियों के प्यादों ने ईसा को पकड कर बाँध लिया।

13) वे उन्हें पहले अन्नस के यहाँ ले गये; क्योंकि वह उस वर्ष के प्रधानयाजक कैफस का ससुर था।

14) यह वही कैफस था जिसने यहूदियों को यह परामर्श दिया था- अच्छा यही है कि राष्ट्र के लिये एक ही मनुष्य मरे।

15) सिमोन पेत्रुस और एक दूसरा शिष्य ईसा के पीछे-पीछे चले। यह शिष्य प्रधानयाजक का परिचित था और ईसा के साथ प्रधानयाजक के प्रांगण में गया,

16) किन्तु पेत्रुस फाटक के पास बाहर खडा रहा। इसलिये वह दूसरा शिष्य जो प्रधानयाजक का परिचित था, फि़र बाहर गया और द्वारपाली से कहकर पेत्रुस को भीतर ले आया।

17) द्वारपाली ने पेत्रुस से कहा, ’’कहीं तुम भी तो उस मनुष्य के शिष्य नहीं हो?’’ उसने उत्तर दिया, ’’नहीं हूँ’’।

18) जाड़े के कारण नौकर और प्यादे आग सुलगा कर ताप रहे थे। पेत्रुस भी उनके साथ आग तापता रहा।

19) प्रधानयाजक ने ईसा से उनके शिष्यों और उनकी शिक्षा के विषय में पूछा।

20) ईसा ने उत्तर दिया, ’’मैं संसार के सामने प्रकट रूप से बोला हूँ। मैंने सदा सभागृह और मन्दिर में जहाँ सब यहूदी एकत्र हुआ करते हैं, शिक्षा दी है। मैंने गुप्त रूप से कुछ नहीं कहा।

21) यह आप मुझ से क्यों पूछते हैं? उन से पूछिये जिन्होंने मेरी शिक्षा सुनी है। वे जानते हैं कि मैंने क्या-क्या कहा।’’

22) इस पर पास खडे प्यादों में से एक ने ईसा को थप्पड मार कर कहा, “तुम प्रधानयाजक को इस तरह जवाब देते हो?“

23) ईसा ने उस से कहा, ’’यदि मैंने गलत कहा, तो गलती बता दो और यदि ठीक कहा तो, मुझे क्यों मारते हो?’’

24) इसके बाद अन्नस ने बाँधें हुये ईसा को प्रधानयाजक कैफस के पास भेजा।

25) सिमोन पेत्रुस उस समय आग ताप रहा था। कुछ लोगों ने उस से कहा, ’’कहीं तुम भी तो उसके शिष्य नहीं हो?’’ उसने अस्वीकार करते हुये कहा, ’’नहीं हूँ’’।

26) प्रधानयाजक का एक नौकर उस व्यक्ति का सम्बन्धी था जिसका कान पेत्रुस ने उडा दिया था। उसने कहा, ’’क्या मैंने तुम को उसके साथ बारी में नहीं देखा था?

27) पेत्रुस ने फिर अस्वीकार किया और उसी क्षण मुर्गे ने बाँग दी।

28) तब वे ईसा को कैफस के यहाँ से राज्य पाल के भवन ले गये। अब भोर हो गया था। वे भवन के अन्दर इसलिये नहीं गये कि अशुद्व न हो जायें, बल्कि पास्का का मेमना खा सकें।

29) पिलातुस बाहर आकर उन से मिला और बोला, ’’आप लोग इस मनुष्य पर कौन सा अभियोग लगाते हैं?’’

30) उन्होने उत्तर दिया, ’’यदि यह कुकर्मी नहीं होता, तो हमने इसे आपके हवाले नहीं किया होता’’।

31) पिलातुस ने उन से कहा, ’’आप लोग इसे ले जाइए और अपनी संहिता के अनुसार इसका न्याय कीजिये।’’ यहूदियों ने उत्तर दिया, ’’हमें किसी को प्राणदंण्ड देने का अधिकार नहीं है’’।

32) यह इसलिये हुआ कि ईसा का वह कथन पूरा हो जाये, जिसके द्वारा उन्होने संकेत किया था कि उनकी मृत्यु किस प्रकार की होगी। 33) तब पिलातुस ने फिर भवन में जा कर ईसा को बुला भेजा और उन से कहा, ’’क्या तुम यहूदियों के राजा हो?’’

34) ईसा ने उत्तर दिया, ’’क्या आप यह अपनी ओर से कहते हैं या दूसरों ने आप से मेरे विषय में यह कहा है?’’

35) पिलातुस ने कहा, ’’क्या मैं यहूदी हूँ? तुम्हारे ही लोगों और महायाजकों ने तुम्हें मेरे हवाले किया। तुमने क्या किया है।’’

36) ईसा ने उत्तर दिया, ’’मेरा राज्य इस संसार का नहीं है। यदि मेरा राज्य इस संसार का होता तो मेरे अनुयायी लडते और मैं यहूदियों के हवाले नहीं किया जाता। परन्तु मेरा राज्य यहाँ का नहीं है।’’

37) इस पर पिलातुस ने उन से कहा, ’’तो तुम राजा हो?’’ ईसा ने उत्तर दिया, ’’आप ठीक ही कहते हैं। मैं राजा हूँ। मैं इसलिये जन्मा और इसलिये संसार में आया हूँ कि सत्य के विषय में साक्ष्य पेश कर सकूँ। जो सत्य के पक्ष में है, वह मेरी सुनता है।’’

38) पिलातुस ने उन से कहा, ’’सत्य क्या है?’’ वह यह कहकर फिर बाहर गया और यहूदियों के पास आ कर बोला, ’’मैं तो उस में कोई दोष नहीं पाता हूँ,

39) लेकिन तुम्हारे लिये पास्का के अवसर पर एक बन्दी को रिहा करने का रिवाज है। क्या तुम लोग चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिये यहूदियों के राजा को रिहा कर दूँ?’’

40) इस पर वे चिल्ला उठे, ’’इसे नहीं, बराब्बस को’’। बराब्बस डाकू था।

1) तब पिलातुस ने ईसा को ले जा कर कोडे लगाने का आदेश दिया।

2) सैनिकेां ने काँटों का मुकुट गूँथ कर उनके सिर पर रख दिया और उन्हें बैंगनी कपडा पहनाया।

3) फिर वे उनके पास आ-आ कर कहते थे, ’’यहूदियों के राजा प्रणाम!’’ और वे उन्हें थप्पड मारते जाते थे।

4) पिलातुस ने फिर बाहर जा कर लोगों से कहा, ’’देखो मैं उसे तुम लोगों के सामने बाहर ले आता हूँ, जिससे तुम यह जान लो कि मैं उस में कोई दोष नहीं पाता’’।

5) तब ईसा काँटों का मुकुट और बैगनी कपडा पहने बाहर आये। पिलातुस ने लोगों से कहा, ’’यही है वह मनुष्य!’’

6) महायाजक और प्यादे उन्हें देखते ही चिल्ला उठे, ’’इसे क्रूस दीजिये! इसे क्रूस दीजिये!’’ पिलातुस ने उन से कहा, ’’इसे तुम्हीं ले जाओ और क्रूस पर चढाओ। मैं तो इस में कोई दोष नहीं पाता।’’

7) यहूदियों ने उत्तर दिया, ’’हमारी एक संहिता है और उस संहिता के अनुसार यह प्राणदंण्ड के योग्य है, क्योंकि इसने ईश्वर का पुत्र होने का दावा किया है।’’

8) पिलातुस यह सुनकर और भी डर गया।

9) उसने फिर भवन के अन्दर जा कर ईसा से पूछा, ’’तुम कहाँ के हो?’’ किन्तु ईसा ने उसे उत्तर नहीं दिया।

10) इस पर पिलातुस ने उन से कहा, ’’तुम मुझ से क्यों नहीं बोलते? क्या तुम यह नहीं जानते कि मुझे तुम को रिहा करने का भी अधिकार है और तुम को क्रूस पर चढ़वाने का भी?

11) ईसा ने उत्तर दिया, ’’यदि आप को ऊपर से अधिकार न दिया गया होता तो आपका मुझ पर कोई अधिकार नहीं होता। इसलिये जिसने मुझे आपके हवाले किया, वह अधिक दोषी है।’’

12) इसके बाद पिलातुस ईसा को मुक्त करने का उपाय ढूँढ़ता रहा, परन्तु यहूदी यह कहते हुये चिल्लाते रहे, ’’यदि आप इसे रिहा करते हैं, तो आप कैसर के हितेषी नहीं हैं। जो अपने को राजा कहता है वह कैसर का विरोध करता है।’’

13) यह सुनकर पिलातुस ने ईसा को बाहर ले आने का आदेश दिया। वह अपने न्यायासन पर उस जगह, जो लिथोस-त्रोतोस, और इब्रानी में गबूबथा, कहलाती है, बैठ गया।

14) पास्का की तैयारी का दिन था। लगभग दोपहर का समय था। पिलातुस ने यहूदियों से कहा, ’’यही ही तुम्हारा राजा!’’

15) इस पर वे चिल्ला उठे, ’’ले जाइये! ले जाइए! इसे क्रूस दीजिये!’’ पिलातुस ने उन से कहा क्या, ’’मैं तुम्हारे राजा को क्रूस पर चढवा दूँ?’’ महायाजकों ने उत्तर दिया, ’’कैसर के सिवा हमारा कोई राजा नहीं’’।

16) तब पिलातुस ने ईसा को कू्रस पर चढाने के लिये उनके हवाले कर दिया।

17) वे ईसा को ले गये और वह अपना कू्रस ढोते हुये खोपडी की जगह नामक स्थान गये। इब्रानी में उसका नाम गोलगोथा है।

18) वहाँ उन्होंने ईसा को और उनके साथ और दो व्यक्तियों को कू्रस पर चढाया- एक को इस ओर, दूसरे को उस ओर और बीच में ईसा को।

19) पिलातुस ने एक दोषपत्र भी लिखवा कर क्रूस पर लगवा दिया। वह इस प्रकार था- ’’ईसा नाज़री यहूदियों का राजा।’’

20) बहुत-से यहूदियों ने यह दोषपत्र पढा क्योंकि वह स्थान जहाँ ईसा कू्स पर चढाये गय थे, शहर के पास ही था और दोष पत्र इब्रानी, लातीनी और यूनानी भाषा में लिखा हुआ था।

21) इसलिये यहूदियों के महायाजकों ने पिलातुस से कहा, ’’आप यह नहीं लिखिये- यहूदियों का राजा; बल्कि- इसने कहा कि मैं यहूदियों का राजा हूँ’’।

22) पिलातुस ने उत्तर दिया, ’’मैंने जो लिख दिया, सो लिख दिया।’’

23) ईसा को कू्रस पर चढाने के बाद सैनिकों ने उनके कपडे ले लिये और कुरते के सिवा उन कपडों के चार भाग कर दिये- हर सैनिक के लिये एक-एक भाग। उस कुरते में सीवन नहीं था, वह ऊपर से नीचे तक पूरा-का-पूरा बुना हुआ था।

24) उन्होंने आपस में कहा, ’’हम इसे नहीं फाडें। चिट्ठी डालकर देख लें कि यह किसे मिलता है। यह इसलिये हुआ कि धर्मग्रंथ का यह कथन पूरा हो जाये- उन्होंने मेरे कपडे आपस में बाँट लिये और मेरे वस्त्र पर चिट्ठी डाली। सैनिकेां ने ऐसा ही किया।

25) ईसा की माता, उसकी बहिन, क्लोपस की पत्नि मरियम और मरियम मगदलेना उनके कू्रस के पास खडी थीं।

26) ईसा ने अपनी माता को और उनके पास अपने उस शिष्य को, जिसे वह प्यार करते थे देखा। उन्होंने अपनी माता से कहा, ’’भद्रे! यह आपका पुत्र है’’।

27) इसके बाद उन्होंने उस शिष्य से कहा, ’’यह तुम्हारी माता है’’। उस समय से उस शिष्य ने उसे अपने यहाँ आश्रय दिया।

28) तब ईसा ने यह जान कर कि अब सब कुछ पूरा हो चुका है, धर्मग्रन्थ का लेख पूरा करने के उद्देश्य से कहा, ’’मैं प्यासा हूँ’’।

29) वहाँ खट्ठी अंगूरी से भरा एक पात्र रखा हुआ था। लेागों ने उस में एक पनसोख्ता डुबाया और उसे जूफ़े की डण्डी पर रख कर ईसा के मुख से लगा दिया।

30) ईसा ने खट्ठी अंगूरी चखकर कहा, ’’सब पूरा हो चुका है’’। और सिर झुकाकर प्राण त्याग दिये।

31) वह तैयारी का दिन था। यहूदी यह नहीं चाहते थे कि शव विश्राम के दिन कू्रस पर रह जाये क्योंकि उस विश्राम के दिन बड़ा त्यौहार पडता था। उन्होंने पिलातुस से निवेदन किया कि उनकी टाँगें तोड दी जाये और शव हटा दिये जायें।

32) इसलिये सैनिकेां ने आकर ईसा के साथ क्रूस पर चढाये हुये पहले व्यक्ति की टाँगें तोड दी, फिर दूसरे की।

33) जब उन्होंने ईसा के पास आकर देखा कि वह मर चुके हैं तो उन्होंने उनकी टाँगें नहीं तोडी;

34) लेकिन एक सैनिक ने उनकी बगल में भाला मारा और उस में से तुरन्त रक्त और जल बह निकला।

35) जिसने यह देखा है, वही इसका साक्ष्य देता है, और उसका साक्ष्य सच्चा है। वह जानता है कि वह सच बोलता है, जिससे आप लोग भी विश्वास करें।

36) यह इसलिये हुआ कि धर्मग्रंथ का यह कथन पूरा हो जाये- उसकी एक भी हड्डी नहीं तोडी जायेगी;

37) फिर धर्मग्रन्थ का एक दूसरा कथन इस प्रकार है- उन्होंने जिसे छेदा, वे उसी की ओर देखेगें।

38) इसके बाद अरिमथिया के यूसुफ ने जो यहूदियों के भय के कारण ईसा का गुप्त शिष्य था, पिलातुस से ईसा का शब ले जाने की अनुमति माँगी। पिलातुस ने अनुमति दे दी। इसलिये यूसुफ आ कर ईसा का शव ले गया।

39) निकोदेमुस भी पहुँचा, जो पहले रात को ईसा से मिलने आया था। वह लगभग पचास सेर का गंधरस और अगरू का सम्मिश्रण लाया।

40) उन्होंने ईसा का शव लिया और यहूदियों की दफन की प्रथा के अनुसार उसे सुगंधित द्रव्यों के साथ छालटी की पट्टियों में लपेटा।

41) जहाँ ईसा कू्रस पर चढाये गये थे, वहाँ एक बारी थी और उस बारी में एक नयी कब्र, जिस में अब तक कोई नहीं रखा गया था।

42) उन्होंने ईसा को वहीं रख दिया, क्योंकि वह यहूदियों के लिये तेयारी का दिन था और वह कब्र निकट ही थी।


📚 मनन-चिंतन


दुख-तकलीफ मानव जीवन का अभिन्न हिस्सा है। किन्तु फिर भी मनुष्य मुख्यतः यही प्रयास करता है कि वह दुख से बचकर सुख और आराम पाता रहें। ट्रेन, होटलों आदि में यात्रा करने या ठहरने की श्रेणीयॉ या वर्ग होते है। उच्च श्रेणीयों में यात्रा करने से हमें अधिक सुविधा और आराम मिलता है जिसके एवज में हमें ज्यादा पैसा खर्च करना पडता है। हांलाकि साधारण श्रेणी के टिकट से भी हम उसी जगह पहुंचते जहॉ उच्च श्रेणी के लोग लेकिन हम अधिकांशः सुविधाजनक एवं आरामदेह यात्रा को ही प्राथमिकता देते हैं। लेकिन प्रभु येसु दुख से बचने के लिये हमें कोई शिक्षा या मार्ग नहीं दिखाते है। उन्होंने दुखभोग एवं क्रूस-मरण को ही जीवन की प्राथमिकता तथा उददेश्य बताया। उन्होंने अपने दुखःभोग एवं मरण के द्वारा ही मानव-जाति की मुक्ति का द्वार खोला।

गेथसेमनी की बारी में येसु ने पिता से प्रार्थना की वे इस भावी प्राणा पीडा का प्याला उनसे हटा ले किन्तु उन्होंने पिता की इच्छा को पूरी करने में ही अपना सुख समझा फिर चाहे वह भले ही दुखभोग एवं मरण ही क्यों न हो। जीवन में स्थायी बने रहने वाले सुख और शांति तब आती है जब हम सही काम करे। ऐसा करने से भले ही कष्ट क्यों न हो किन्तु भलाई और सत्य के काम ही सच्ची और स्थायी शांति प्रदान करते हैं। जीवन में सांसारिक सुख के लिये हमें कई बार समझौते करने पडते हैं। हम चारों ओर से खतरे तथा असुरक्षा की भावना से घेरे रहते हैं। इसलिये हमारी कोशिश सुख सुनिश्चित करने की होती है तथा इसे हासिल करने के लिये हम अनेक बार नैतिक मूल्यों के साथ समझौता करते हैं। किन्तु अपनी नासमझी में हम यह भूल जाते ही सच्चा एवं स्थायी सुख तो ईश्वर का जीवन जी कर आता है उसके लिये चाहे हमें कष्ट ही क्यों न झेलना पडे।

येसु निर्दोष थे। उन्होंने कोई पाप नहीं किया था। उन्होंने सदैव वहीं किया जो सही था तथा अपने भलाई के कार्यों के द्वारा लोगों के स्वास्थ्य और जीवन को पुनः लौटाया। उन्होंने खुले तौर पर सच्ची शिक्षा दी किन्तु फिर भी उन पर साजिश, ईशनिंदा आदि जैसे मनगणंत आरोप मढे गये। किन्तु येसु जानते थे कि उनका दुखभोग और मरण पिता की योजना का हिस्सा है। कोई भी उनका जीवन उनसे नहीं ले सकता था। जब पिलासुन ने उनसे कहा, ’’तुम मुझ से क्यों नहीं बोलते? क्या तुम यह नहीं जानते कि मुझे तुम को रिहा करने का भी अधिकार है और तुम को क्रूस पर चढ़वाने का भी? ईसा ने उत्तर दिया, ’’यदि आप को ऊपर से अधिकार न दिया गया होता तो आपका मुझ पर कोई अधिकार नहीं होता।’’ (योहन 19:10-11) और यहूदियों को उन्होंने और भी स्पष्ट रूप से कहा, ’’मैं अपना जीवन अर्पित करता हूँ, बाद में मैं उसे फिर ग्रहण करूँगा। कोई मुझ से मेरा जीवन नहीं हर सकता, मैं स्वयं उसे अर्पित करता हूँ। मुझे अपना जीवन अर्पित करने और उसे फिर ग्रहण करने का अधिकार है। मुझे अपने पिता की ओर से यह आदेश मिला है।’’ (योहन 10:17-18)

इस प्रकार येसु के दुखभोग में कुडवाहट एवं खेद की भावना नहीं। उनका दुखभोग कठिन है किन्तु वह उन्हें स्वीकार्य है क्योंकि यह पिता को प्रिय है। पुण्य शुक्रवार जीवन के दुख से भागने या बचने का कोई झूठा एवं छदम् सब्जबाग नहीं दिखाता है। वह जो सही और सच्चा है उसे अपनाकर, सबकुछ पिता की इच्छा पर छोडकर, बहादुरी के साथ आगे बढने का प्रस्ताव रखता है। हम हमारे दुख को किसी पुरस्कार से जोडकर देखते हैं। लोग दुख उठाने को तैयार हो जाते हैं किन्तु किसके एवज में। वह जानना चाहते है कि इससे क्या लाभ होगा। किन्तु धर्मग्रंथ हमें बताता है कि धर्मी के दुखभोग का पुरस्कार स्वयं ईश्वर होता है।

योब के दुख का कारण उसकी धार्मिकता थी। शैतान उसे दुख पहुंचाता है ताकि वह अपनी धार्मिकता त्याग दे। योब ने अत्याधिक दुख और हानि उठायी किन्तु उसने ईश्वर को और उसकी धार्मिकता को नहीं त्यागा। ईश्वर स्वयं उसका पुरस्कार था। कई नबियों ने भी धार्मिकता के कारण दुख उठाये वह पुरस्कार जो स्वयं ईश्वर होगा उस पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। इसी प्रकार हमारे जीवन में भी दुखभोग आता है। हमें इससे घबरा कर भागना नहीं चाहिये और झूठी सुरक्षा के पीछे नहीं भागना चाहिये। इसके विपरीत जो भी हम अपनी मानवीय क्षमता के अनुसार कर सकते वही करना चाहिये बाकि जो भी हो उसे ईश्वर की इच्छा मानकर सहना चाहिये। हमें नहीं भूलना चाहिये कि पिता की इच्छा के बिना हमारे सिर का बाल भी नहीं गिरता तो फिर पिता के लिये हमारा जीवन कहीं अधिक मूल्यवान है। हमारे कष्ट और पीडा उससे छिपे हुये नहीं है। वह हमें न सिर्फ सहनशक्ति प्रदान करता है बल्कि जो ख्राीस्तीय साहस के साथ अपने दुःखों को वहन करते हैं उन्हें पुरस्कार भी उन्हें प्रदान करता है।




📚 REFLECTION


Suffering is the integral part of human life. Yet most common attempts of human beings have been to avoid suffering and gain comfort. In the trains, hotels etc. we have classes and categories to be availed while travelling and If we want more comfort then we must pay more. The general class will serve the same purpose and take you to same destination as the first-class but it won’t be comfortable. To avoid any inconvenience, we must take a premium class ticket or reservation. This has been the tendency in all ages. But Jesus does not offer a way out of suffering but a way to go through it. It was Cross that brought the salvation and eternal comfort.

In the Garden of Gethsemane Jesus prayed to have the cup of suffering be taken away yet he found comfort in doing the will of God. Lasting peace and happiness come when we do what is right even if it causes up pain and loss. To gain the worldly comfort and to prolong it we make a lot of compromises in life. We are surrounded by the threat of danger and insecurity. So, we try to ensure our safety and comfort by the worldly means even if they are unethical and corrupt. But when we stand for the right and even suffer for it we experience and gain God’s favour and lasting peace and happiness.

Jesus was innocent. He committed no sin. He did what was right and brought restoration of health and life to the people. He taught them the right things in the open, yet he was unjustly condemned of crimes which were far-fetched and flimsy. But Jesus already knew that no one can take away his life or do any harm to him. In response to Pilot’s exclamation, “Do you not know that I have power to release you, and power to crucify you?’ Jesus answered, “You would have no power over me unless it had been given you from above;” (John 19:10-11) and to the Jews he said even more clearly, “I lay down my life in order to take it up again. No one takes it from me, but I lay it down of my own accord. I have power to lay it down, and I have power to take it up again. I have received this command from my Father.’ (John 10:17-18)

So in Jesus’ suffering there are no grudges and force. It is difficult but it is acceptable because this is what pleases God. Good Friday offers no short cuts and false promises but a stark truth to accept life and its suffering and pain with a brave heart. Often suffering is related with a reward. People are ready to undergo suffering but for what. They would like to know the package. God himself is the reward of the suffering of the righteous. The reason of Job’s suffering was his righteousness. Devil wanted to trouble him so that he may forfeit his righteousness. He underwent extreme suffering but remained righteous. God was his reward. So therefore, in our life too there difficult and painful moments. We do not have get panicked and take all safety measure to avoid pain. But rather do all that in normal human capacity and rest accept it as the will of the father, without his knowledge not even the hair of your heads falls. Our pain and difficulties are not hidden from him. He provides endurance as well the reward to those who bravely take it upon himself.


मनन-चिंतन - 2


एक गैरख्रीस्तीय व्यक्ति अपनी पत्नी को लेकर ख्रीस्तीय मिशनरियों द्वारा संचालित एक अस्पताल गया। उसकी पत्नी गंभीर रूप से बीमार थी। इसलिए वह बहुत चिंतित और बेचैन था। उसने वहाँ एक प्रार्थनालय देखा। उसने सोचा कि मन को शान्त करने के लिए थोडी देर प्रार्थनालय में बैठ जाता हूँ। उसने प्रार्थनालय में प्रवेश किया। उसने क्रूसित प्रभु की मूर्ति की ओर देखा और सोचने लगा कि यह तो मुझ से भी ज़्यादा परेशान दिख रहा है, यह मेरी मदद कैसे कर सकता है? परन्तु, कुछ ही क्षण में उसकी सोच बदल गयी। उसे लगा कि यह मुझ से भी ज़्यादा परेशान है, इसने मुझ से भी ज़्यादा दुख-दर्द का अनुभव किया। इसलिए यह मेरी परेशानी को आसानी से समझेगा, यह मेरे दुख-दर्द को ठीक से जानता है। फिर वह जोर-जोर से चिल्ला-चिल्ला कर अपनी समस्याओं को क्रूसित प्रभु के सामने रखने लगा। उसे एक प्रकार की शांति महसूस हुयी। उसे लगा कि उसका बोझ हलका हो गया।

पवित्र वचन कहता है, “हमारे प्रधानयाजक हमारी दुर्बलताओं में हम से सहानुभूति रख सकते हैं, क्योंकि पाप के अतिरिक्त अन्य सभी बातों में उनकी परीक्षा हमारी ही तरह ली गयी है। इसलिए हम भरोसे के साथ अनुग्रह के सिंहासन के पास जायें, जिससे हमें दया मिले और हम वह कृपा प्राप्त करें, जो हमारी आवश्यकताओं में हमारी सहायता करेगी।” (इब्रानियों 4:15-16)

यह सच है कि इतिहास में प्रभु येसु के समान किसी ने इतना दुख-दर्द नहीं सहा। कई धर्मों के देवी-देवताएं शारीरिक रीति से ही बहुत शक्तिशाली दिखते हैं। किसी के कई हाथ होते हैं, किसी के कई सिर और कई देवताओं के हाथों में भाले या तलवार जैसे हथियार भी होते हैं। अगर कोई वर्तमान युग में देवी-देवताओं की कल्पना करता है तो वे शायद ए.के-47 राइफल लेकर खडे होते नजर आयेंगे। यह सच नहीं है कि हमारे प्रभु ईश्वर के पास कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं हैं। उनके पास एक अन्य प्रकार के अस्त्र शस्त्र हैं। हमारे प्रभु येसु ख्रीस्त के अस्त्र-शस्त्र आध्यात्मिक जीवन के अस्त्र-शस्त्र होते हैं। वे हमारे पास प्यार, दया और अनुकम्पा लेकर आते हैं। संत पौलुस हमें बताते हैं कि प्रभु येसु के अनुयायियों को किस प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण करना चाहिए। “आप ईश्वर के अस्त्र-शस्त्र धारण करें, जिससे आप दुर्दिन में शत्रु का सामना करने में समर्थ हों और अन्त तक अपना कर्तव्य पूरा कर विजय प्राप्त करें। आप सत्य का कमरबन्द कस कर, धार्मिकता का कवच धारण कर और शान्ति-सुसमाचार के उत्साह के जूते पहन कर खड़े हों। साथ ही विश्वास की ढाल धारण किये रहें। उस से आप दुष्ट के सब अग्निमय बाण बुझा सकेंगे। इसके अतिरिक्त मुक्ति का टोप पहन लें और आत्मा की तलवार - अर्थात् ईश्वर का वचन - ग्रहण करें।” (एफेसियों 6:13-17)

क्रूस पर टंगे प्रभु येसु हमारे लिए केवल एक आदर्श नहीं हैं। वह हमारे ईश्वर है जो हमारे सामने हमारे अपने जीवन के रहस्यों को प्रकट करते हैं। जो जीवन हमने उनसे पाया है, उस जीवन को हमें किस प्रकार निभाना चाहिए – यह भी प्रभु हमें बताते हैं। क्रूस विश्वासियों के दैनिक जीवन का अभिन्न अंग है। इसी कारण प्रभु ने अपने शिष्यों से अपने प्रतिदिन के क्रूस उठा कर उनके पीछे चलने को कहा है (देखिए लूकस 9:23)। क्रूस हमारी मुक्ति का मार्ग है। प्रवक्ता ग्रन्थ, अध्याय 4 इस बात पर प्रकाश डालता है कि ईश्वर की प्रज्ञा की खोज में निकलने वालों के साथ क्या होता है। ईश्वर उन्हें प्यार करते हैं, उन्हें आशीर्वाद और सुरक्षा प्रदान करते हैं। लेकिन यह सब प्रदान करने की प्रक्रिया उतनी सरल नहीं है। पवित्र वचन कहता है, “प्रारम्भ में प्रज्ञा उसे टेढ़े-मेढ़े रास्ते पर ले चलेगी और उसकी परीक्षा लेगी। वह उस में भय तथा आतंक उत्पन्न करेगी। वह अपने अनुशासन से उसे उत्पीड़ित करेगी और तब तक अपने नियमों से उसकी परीक्षा करती रहेगी, जब तक वह उस पूर्णतया विश्वास नहीं करती। इसके बाद वह उसे सीधे मार्ग पर ले जा कर आनन्दित कर देगी और उस पर अपने रहस्य प्रकट करेगी। वह उसे ज्ञान और न्याय का विवेक प्रदान करेगी।” (प्रवक्ता 4:18-21) अगर हम इन वचनों पर ध्यान देंगे तो हमें पता चलेगा कि मुक्ति का मार्ग क्रूस का मार्ग है और क्रूस के बिना हमें मुक्ति नहीं मिल सकती। जो ईश्वर की प्रज्ञा की इस प्रक्रिया में सकारात्मक रवैया नहीं अपनायेगा, वह मुक्ति से वंचित रह जायेगा। इसलिए पवित्र वचन आगे कहता है, “किन्तु यदि वह भटक जायेगा, तो वह उसका त्याग करेगी और उसे विनाश के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए छोड़ देगी” (प्रवक्ता 4:22)। यही प्रभु येसु की शिक्षा का सारांश भी है। प्रभु येसु कहते हैं, “सॅकरे द्वार से प्रवेश करो। चौड़ा है वह फाटक और विस्तृत है वह मार्ग, जो विनाश की ओर ले जाता है। उस पर चलने वालों की संख्या बड़ी है। किन्तु सॅकरा है वह द्वार और संकीर्ण है वह मार्ग, जो जीवन की ओर ले जाता है। जो उसे पाते हैं, उनकी संख्या थोड़ी है।” (मत्ती 7:13-14)

आईए, आज के दिन हम अपने क्रूस के लिए ईश्वर को धन्यवाद दें, क्योंकि वह हमारी मुक्ति का मार्ग है। हम पिता ईश्वर से निवेदन करें कि वे हमें अपने क्रूस को ढोने की शक्ति प्रदान करें।

 -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!

Daily Mass Readings for Thursday, 1 April 2021

 Daily Mass Readings for Thursday, 1 April 2021










First Reading: Exodus 12: 1-8, 11-14

1 And the Lord said to Moses and Aaron in the land of Egypt:

2 This month shall be to you the beginning of months: it shall be the first in the months of the year.

3 Speak ye to the whole assembly of the children of Israel, and say to them: On the tenth day of this month let every man take a lamb by their families and houses.

4 But if the number be less than may suffice to eat the lamb, he shall take unto him his neighbour that joineth to his house, according to the number of souls which may be enough to eat the lamb.

5 And it shall be a lamb without blemish, a male, of one year: according to which rite also you shall take a kid.

6 And you shall keep it until the fourteenth day of this month: and the whole multitude of the children of Israel shall sacrifice it in the evening.

7 And they shall take of the blood thereof, and put it upon both the side posts, and on the upper door posts of the houses, wherein they shall eat it.

8 And they shall eat the flesh that night roasted at the fire, and unleavened bread with wild lettuce.

11 And thus you shall eat it: you shall gird your reins, and you shall have shoes on your feet, holding staves in your hands, and you shall eat in haste: for it is the Phase (that is the Passage) of the Lord.

12 And I will pass through the land of Egypt that night, and will kill every firstborn in the land of Egypt both man and beast: and against all the gods of Egypt I will execute judgments: I am the Lord.

13 And the blood shall be unto you for a sign in the houses where you shall be: and I shall see the blood, and shall pass over you: and the plague shall not be upon you to destroy you, when I shall strike the land of Egypt.

14 And this day shall be for a memorial to you: and you shall keep it a feast to the Lord in your generations with an everlasting observance.

Responsorial Psalm: Psalms 116: 12-13, 15-16bc, 17-18

R. (1 Cor 10:16) Our blessing-cup is a communion with the Blood of Christ.

12 What shall I render to the Lord, for all the things he hath rendered unto me?

13 I will take the chalice of salvation; and I will call upon the name of the Lord.

R. Our blessing-cup is a communion with the Blood of Christ.

15 Precious in the sight of the Lord is the death of his saints.

16 O Lord, for I am thy servant: I am thy servant, and the son of thy handmaid. Thou hast broken my bonds:

R. Our blessing-cup is a communion with the Blood of Christ.

17 I will sacrifice to thee the sacrifice of praise, and I will call upon the name of the Lord.

18 I will pay my vows to the Lord in the sight of all his people:

R. Our blessing-cup is a communion with the Blood of Christ.

Second Reading: First Corinthians 11: 23-26

23 For I have received of the Lord that which also I delivered unto you, that the Lord Jesus, the same night in which he was betrayed, took bread.

24 And giving thanks, broke, and said: Take ye, and eat: this is my body, which shall be delivered for you: this do for the commemoration of me.

25 In like manner also the chalice, after he had supped, saying: This chalice is the new testament in my blood: this do ye, as often as you shall drink, for the commemoration of me.

26 For as often as you shall eat this bread, and drink the chalice, you shall shew the death of the Lord, until he come.

Verse Before the Gospel: John 13: 34

34 A new commandment I give unto you: That you love one another, as I have loved you.

Gospel: John 13: 1-15

1 Before the festival day of the pasch, Jesus knowing that his hour was come, that he should pass out of this world to the Father: having loved his own who were in the world, he loved them unto the end.

2 And when supper was done, (the devil having now put into the heart of Judas Iscariot, the son of Simon, to betray him,)

3 Knowing that the Father had given him all things into his hands, and that he came from God, and goeth to God;

4 He riseth from supper, and layeth aside his garments, and having taken a towel, girded himself.

5 After that, he putteth water into a basin, and began to wash the feet of the disciples, and to wipe them with the towel wherewith he was girded.

6 He cometh therefore to Simon Peter. And Peter saith to him: Lord, dost thou wash my feet?

7 Jesus answered, and said to him: What I do thou knowest not now; but thou shalt know hereafter.

8 Peter saith to him: Thou shalt never wash my feet. Jesus answered him: If I wash thee not, thou shalt have no part with me.

9 Simon Peter saith to him: Lord, not only my feet, but also my hands and my head.

10 Jesus saith to him: He that is washed, needeth not but to wash his feet, but is clean wholly. And you are clean, but not all.

11 For he knew who he was that would betray him; therefore he said: You are not all clean.

12 Then after he had washed their feet, and taken his garments, being set down again, he said to them: Know you what I have done to you?

13 You call me Master, and Lord; and you say well, for so I am.

14 If then I being your Lord and Master, have washed your feet; you also ought to wash one another’s feet.

15 For I have given you an example, that as I have done to you, so you do also.

पुण्य गुरुवार 01 अप्रैल 2021 पुण्य सप्ताह

 

पुण्य गुरुवार 01 अप्रैल 2021

पुण्य सप्ताह

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पहला पाठ : निर्गमन ग्रन्थ 12:1-8,11-14


1) प्रभु ने मिस्र देश में मूसा और हारून से कहा,

2) ''यह तुम्हारे लिए आदिमास होगा; तुम इसे वर्ष का पहला महीना मान लो।

3) इस्राएल के सारे समुदाय को यह आदेश दो - इस महीने के दसवें दिन हर एक परिवार एक एक मेमना तैयार रखेगा।

4) यदि मेमना खाने के लिए किसी परिवार में कम लोग हों, तो जरूरत के अनुसार पास वाले घर से लोगों को बुलाओ। खाने वालों की संख्या निश्चित करने में हर एक की खाने की रुचि का ध्यान रखो।

5) उस मेमने में कोई दोश न हो। वह नर हो और एक साल का। वह भेड़ा हो अथवा बकरा।

6) महीने के दसवें दिन तक उसे रख लो। शाम को सब इस्राएली उसका वध करेंगे।

7) जिन घरों में मेमना खाया जायेगा, दरवाजों की चौखट पर उसका लोहू पोत दिया जाये।

8) उसी रात बेखमीर रोटी और कड़वे साग के साथ मेमने का भूना हुआ मांस खाया जायेगा।

11) तुम लोग चप्पल पहन कर, कमर कस कर तथा हाथ में डण्डा लिये खाओगे। तुम जल्दी-जल्दी खाओगे, क्योंकि यह प्रभु का पास्का है।

12) उसी रात मैं, प्रभु मिस्र देश का परिभ्रमण करूँगा, मिस्र देश में मनुष्यों और पशुओं के सभी पहलौठे बच्चों को मार डालूँगा और मिस्र के सभी देवताओं को भी दण्ड दूँगा।

13) तुम लोहू पोत कर दिखा दोगे कि तुम किन घरों में रहते हो। वह लोहू देख कर मैं तुम लोगों को छोड़ दूँगा, इस तरह जब मैं मिस्र देश को दण्ड दूँगा, तुम विपत्ति से बच जाओगे।

14) तुम उस दिन का स्मरण रखोगे और उसे प्रभु के आदर में पर्व के रूप में मनाओगे। तुम उसे सभी पीढ़ियों के लिए अनन्त काल तक पर्व घोषित करोगे।


दूसरा पाठ : कुरिन्थियों के नाम सन्त पौलुस का पहला पत्र 11:23-26


23) मैंने प्रभु से सुना और आप लोगों को भी यही बताया कि जिस रात प्रभु ईसा पकड़वाये गये, उन्होंने रोटी ले कर

24) धन्यवाद की प्रार्थना पढ़ी और उसे तोड़ कर कहा-यह मेरा शरीर है, यह तुम्हारे लिए है। यह मेरी स्मृति में किया करो।

25) इसी प्रकार, ब्यारी के बाद उन्होंने प्याला ले कर कहा- यह प्याला मेरे रक्त का नूतन विधान है। जब-जब तुम उस में से पियो, तो यह मेरी स्मृति में किया करो।

26) इस प्रकार जब-जब आप लोग यह रोटी खाते और वह प्याला पीते हैं, तो प्रभु के आने तक उनकी मृत्यु की घोषणा करते हैं।


सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 13:1-15


1) पास्का पर्व का पूर्व दिन था। ईसा जानते थे कि मेरी घडी आ गयी है और मुझे यह संसार छोडकर पिता के पास जाना है। वे अपनों को, जो इस संसार में थे, प्यार करते आये थे और अब अपने प्रेम का सब से बडा प्रमाण देने वाले थे।

2) शैतान व्यारी के समय तक सिमोन इसकारियोती के पुत्र यूदस के मन में ईसा को पकडवाने का विचार उत्पन्न कर चुका था।

3) ईसा जानते थे कि पिता ने मेरे हाथों में सब कुछ दे दिया है, मैं ईश्वर के यहाँ से आया हूँ और ईश्वर के पास जा रहा हूँ।

4) उन्होनें भोजन पर से उठकर अपने कपडे उतारे और कमर में अंगोछा बाँध लिया।

5) तब वे परात में पानी भरकर अपने शिष्यों के पैर धोने और कमर में बँधें अँगोछे से उन्हें पोछने लगे।

6) जब वे सिमोन पेत्रुस के पास पहुचे तो पेत्रुस ने उन से कहा, ’’प्रभु! आप मेंरे पैर धोते हैं?’’

7) ईसा ने उत्तर दिया, ’’तुम अभी नहीं समझते कि मैं क्या कर रहा हूँ। बाद में समझोगे।’’

8) पेत्रुस ने कहा, ’’मैं आप को अपने पैर कभी नहीं धोने दूँगा’’। ईसा ने उस से कहा, ’’यदि मैं तुम्हारे पैर नहीं धोऊँगा, तो तुम्हारा मेरे साथ कोई सम्बन्ध नहीं रह जायेगा।

9) इस पर सिमोन पेत्रुस ने उन से कहा, ’’प्रभु! तो मेरे पैर ही नहीं, मेरे हाथ और सिर भी धोइए’’।

10) ईसा ने उत्तर दिया, ’’जो स्नान कर चुका है, उसे पैर के सिवा और कुछ धोने की ज़रूरत नहीं। वह पूर्ण रूप से शुद्व है। तुम लोग शुद्ध हो, किन्तु सब के सब नहीं।’’

11) वे जानते थे कि कौन मेरे साथ विश्वास घात करेगा। इसलिये उन्होने कहा- तुम सब के सब शुद्ध नहीं हो।

12) उनके पैर धोने के बाद वे अपने कपडे पहनकर फिर बैठ गये और उन से बोले, ’’क्या तुम लोग समझते हो कि मैंने तुम्हारे साथ क्या किया है?

13) तुम मुझे गुरु और प्रभु कहते हो और ठीक ही कहते हो, क्योंकि मैं वही हूँ।

14) इसलिये यदि मैं- तुम्हारे प्रभु और गुरु- ने तुम्हारे पैर धोये है तो तुम्हें भी एक दूसरे के पैर धोने चाहिये।

15) मैंने तुम्हें उदाहरण दिया है, जिससे जैसा मैंने तुम्हारे साथ किया वैसा ही तुम भी किया करो।


📚 मनन-चिंतन


पुण्य गुरूवार माता कलीसिया के सबसे महत्वपूर्ण दिनों में से एक है। आज के दिन प्रभु येसु ने दो महत्वपूर्ण संस्कारों यूखारिस्त एवं पुरोहिताई की स्थापना की थी। प्रभु के अंतिम भोज के दौरान इन दोनों संस्कारों का जन्म हुआ। ये दोनों संस्कार एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुडे हुये है। क्योंकि पुरोहिताई हम यूखारिस्त संस्कार नहीं मना सकते तथा यूखारिस्त के बिना पुरोहिताई संस्कार अधूरा है।

यूखारिस्त मात्र अनुष्ठान समारोह नहीं है बल्कि यह जीवनदायक बलिदानमय प्रेम है। जब कोई यूखारिस्त में भाग लेता है तो वह वास्तव में यूखारिस्त संस्कार के मूल्यों के लिये स्वयं को बलिदान चढाने की शपथ लेता है। येसु का यह अंतिम भोजन उन सभी भोजनों से अलग था जो उन्होंने अपने शिष्यों के साथ पहले कई बार किया था। अंतिम भोजन के दौरान येसु ने रोटी तथा दाखरस का प्याला जो उनके शरीर तथा रक्त का प्रतीक था, को शिष्यों को दिया और कहा, ये तुम्हारे लिये बलि चढाया एवं बहाया जायेगा। अगर अगले दिन, यानि शुक्रवार को प्रभु क्रूस पर नहीं मरते तो यूखारिस्त अधूरा ही रह जाता। पुण्य शुक्रवार का बलिदान ही पुण्य गुरूवार की प्रतिज्ञा को पूर्ण करता है। प्रभु में हमारा जीवन यूखारिस्तीय जीवन है। वह जीवन जो प्रभु की रोटी और रक्त से बना है तथा जो लोगों के कल्याण के लिये प्रेम और सेवा में निरंतर बलि चढाया जाता है।

अक्सर हम प्रेम को आरामदायक और सुखी समझते हैं। लेकिन उसके दूसरे पहलू जो सेवा और बलिदान है को भूला बैठते हैं। माता-पिता ही इस बात को समझते है कि उनके बच्चें जिन्हें वे जान से भी ज्यादा प्रेम करते हैं की परवरिश करना कितना कठिन काम होता है। जितनों ने भी प्रेम किया है वे जानते है कि त्याग और सेवा के बिना किसी भी रिश्ते को निभाना कठिन है। प्रेम शर्त रहित होता है तथा यह एक भावना मात्र नहीं प्रकृति की शक्ति होता है। मॉ का अपने बच्चे को बचाने के लिये कार का उठाना, पति का पत्नी को बचाने के लिये बंदूक की गोली का सामना करना, माता-पिता का अपनी संतानों के लिये अतिरिक्त कार्य करना प्रेम की निशानी है। त्याग के बिना प्रेम लगभग जल के बिना सागर के समान है। जब भी हम प्रेम में त्याग से बचने की कोशिश करतेे है तब प्रेम एक बोझ बन जाता है। अपनी प्रेम की इस यात्रा को आनन्दायक बनाने के लिये हमें स्वेच्छा से तैयार बलि का मेमना बनना चाहिये। येसु ने भी मानव जाति से अपने प्रेम के लिये तथा उनकी मुक्ति के लिये स्वेच्छा से दुखभोग और मृत्यु को स्वीकार करते हैं। उन्होंने कहा था, "इस से बडा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिये अपने प्राण अर्पित कर दे।" (योहन 15:13)

येसु ने अपने जीवन में पिता के प्रेम के अनेक उदाहरण प्रस्तुत किये। उन्होंने रोगियों को चंगाई देकर, रोटियों के चमत्कार द्वारा, अपदूतों को निकालकर, ईश्वर राज्य की घोषणा आदि पिता के प्रेम की निशानी थी। अंत में उन्होंने अपने पिता के प्रेम को अभूतपूर्व तथा पूर्ण रूप से प्रस्तुत किया जब उन्होंने अपने जीवन को ही क्रूस पर पिता की इच्छानुसार चढा दिया। कू्रस पर अपने बलिदान द्वारा येसु ने पिता को प्रसन्न किया तथा उनके प्रति अपने प्रेम को परिपक्व का दिया। येसु को दुखभोग तथा प्राणपीडा का पूर्वाभास था तथा वे जानते थे कि ये असीम कष्टदायक होगा। वे भी इसे नहीं चाहते थे किन्तु पिता तथा मानवजाति के प्रति अपने प्रेम के लिये उन्होंने यह कडवा प्याला पीना स्वीकार किया।

यूखारिस्त जो कि स्वयं येसु है हमें प्रेम और रिश्तों में उपजी अपनी जिम्मेदारियों को स्वेच्छा तथा सेवा भावना से पूरी करने की प्रेरणा तथा मदद करता है। यूखारिस्त हमें वह अवसर प्रदान करता है जब हम उनके पास बैठकर उनकी बातें सुने तथा उनकी योजना को जाने। स्वयं को स्वेच्छा से बलि का मेमना बनाना हमारी मानवीय इच्छा से परे है। यह बडे ही साहस और सामर्थ्य की बात होती है जब हम खुद को बचाने की अपनी प्राकृतिक वृति के विरूद्ध जाकर स्वयं को बलिदान में चढा दे। इसलिये यूखारिस्त को सही अर्थों को ख्राीस्तीय जीवन का स्रोत और पराकाष्ठा कहा गया है। यूखारिस्त को ख्राीस्तीय जीवन का स्रोत और पराकाष्ठा कहने से तात्पर्य है कि पहला तो जिस तरह सूरज से किरणें निकलती है उस प्रकार ख्राीस्तयी आध्यात्मिकता यूखारिस्त से बहती है। यह जीवन की चुनौतियों को ख्राीस्तीय मूल्यों से सामना करने का बल प्रदान करती है। यह प्रलोभनों में गिरने से बचाती तथा निर्णय लेने में प्रज्ञा प्रदान करता है। यह झकझोरने वाली परिस्थितियों में भी शांत तथा सौम्य बने रहना वरदान देता है। संक्षेप में यूखारिस्त ऊर्जा की सहायता से हम जीवन उन सभी मूल्यों को आत्मसात करते है जिनके लिये यूखारिस्त संस्कार है।

आज हम पुरोहिताई संस्कार की स्थापना की यादगार भी मना रहे हैं। एक पुरोहित यूखारिस्त के मूल्यों और प्रेम के लिये अपना जीवन जीता है। जिस प्रकार येसु बलित मेमने बन गये उसी प्रकार पुरोहित भी लोगों की सेवा में स्वयं को अर्पित करता है। वह स्वयं को गिराकर दूसरों को ऊपर उठाता है। अपने त्याग के द्वारा वह भूले-बिसरे लोगों के जीवन में आशा का दीप जलाता है। वह दूसरों की परिस्थितियों का अनुचित लाभ नहीं उठाता बल्कि लोगों की जरूरतों के लिये स्वयं कष्ट उठाता है एवं उनकी जरूरतों को पूरा करने का प्रयत्न करता है। संत पापा योहन पौलुस द्वितीय अंतिम भोज के दौरान पुरोहिताई संस्कार की स्थापना पर लिखते हैं, ’’अंतिम भोज के दौरान हमारा पुरोहित के रूप में जन्म हुआ....हमारा जन्म यूखारिस्त से हुआ।" यदि हम कहे कि समूची कलीसिया यूखारिस्त से जीवित है तो वही बात पुरोहितों के लिये भी कह सकते है। उसका जन्म, जीवन, कार्य तथा फल सब यूखारिस्त का परिणाम है। यूखारिस्त के बिना पुरोहिताई संस्कार नहीं हो सकता उसी प्रकार पुरोहिताई संस्कार के बिना यूखारिस्त भी नहीं हो सकता।

आइये हम भी यूखारिस्तीय संस्कार की महत्ता को समझे तथा उसमें हमेशा योग्य रीति से भाग ले।




📚 REFLECTION



Maundy Thursday is one of the most important days in the Mother Church. On this day the Lord laid the foundation of the sacraments, Eucharist and the Priesthood.Both the Eucharist and the priesthood “were born” during the Last Supper and the two sacraments of the Eucharist and Holy Orders are so closely linked because without the priesthood we would have no Eucharist.

Eucharist is not just a ritual ceremony but a life-giving sacrificial love. When one takes part in the eucharist he infact pledges to sacrifice himself for the values of the eucharist. Jesus’ last supper was very different from that of other supper or meals he had with his disciples. At the last supper he took and gave the bread and chalice of wine as symbols of his own body and blood which will be broken and shed for them. Had not the Lord died on the following day on the Cross the Eucharist would not have been complete. It is the Good Friday when Jesus was crucified made the pledge of Eucharist complete. So our life in the Lord is a Eucharistic life. a life which is made of Jesus body and blood and constantly sacrificed in love for the service and welfare of the people.

Often, we tend to expect love as something comfortable and pleasurable. But forget the service and sacrifice dimension of it. Anyone who has children knows of the thankless work and relentless devotion necessary to be a good parent. Anyone who has ever loved knows that true love requires sacrifice. The love is unconditional and is not a mere emotion, but a force of nature. It is a mother lifting a car to save her child. It is a husband who jumps in front of a bullet to shield his wife from harm. It is the parents who work overtime to feed their children. Hence pain and sacrifice are the integral parts of love. Love without sacrifice is like an ocean without water. When ever, we try to avoid sacrifice, love becomes a burden. To make this journey of love a happy thing one has to be willing to be a willing victim. It was Jesus who accepted suffering and death for the salvation of all. He said, “there is no greater love than this that a man should lay down his life for his friend.” (John 15:13) By his passion and death Jesus perfected his love for his us. it was a sacrifice so that ‘no one must be lost’.

Jesus revealed the love of His Father in many ways throughout His earthly life, by healing the sick, multiplying bread, casting out demons and proclaiming the Kingdom of God. Then, He showed the Father’s love most fully at the Hour when He passed from this world to the next, when He offered His life in sacrifice on the Cross. By his sacrifice Jesus has pleased the father and made his love towards the father perfect. Jesus did feel the impending suffering and death as terrible and he would rather wish to do away from it but for the sake of the love of towards his father and for humanity he accepted the cup of bitter woe.

Eucharist which is Christ himself prompts, enables and helps to carry out the responsibility of life and relationship and sacrifice ourselves in the service of others. Eucharist offers us an opportunity to gather around the Lord and listen to His words; to listen to his plans. It is not possible to count on our own human strength to be a willing victim. It takes courage and conviction to withstand the pressure and go against the natural instinct of self-preservation. Therefore,eucharist is rightly called the source and the summit of our Christian life. To say that the Eucharist is the "source and summit of Christian spirituality" means at least two things. First, that Christian spirituality flows from the Eucharist as its source, the way light streams forth from the sun. It inspires, empowers and strengthens us to face the challenges and meet the demands of lives. It gives us strength to withstand the test of times. It provides us wisdom to discern. It gives calm and serenity amidst turmoil and confusion. In short with the help of the Eucharistic energy we move ahead to live what Eucharist stands for.

Today we also celebration the institution of the priesthood. A priest stands for eucharist values and love. Just as Jesus the shepherd became the lamb of sacrifice. So a priest too makes his life a living sacrifice for his people. He breaks his own self to raise others higher; he sacrifices his happiness to bring comfort to the lonely. He does not take advantage of his people and their situations but rather he becomes available to the needs and demands of his people at the cost of his own comfort. Pope John Paul II writes about the priesthood originating during the Last Supper, “At the Last Supper we were born as priests…We were born from the Eucharist. If we can truly say that the whole Church lives from the Eucharist…we can say the same thing about the ministerial priesthood: it is born, lives, works and bears fruit “de Eucharistia.” There can be no Eucharist without the priesthood, just as there can be no priesthood without the Eucharist.” Let pray for the grace to be a worthy partaker of eucharist and wish well to all the priests so that they may be worthy minister of the Eucharist.



मनन-चिंतन-2


आज की धर्मविधि में हम विभिन्न रहस्यों का सामना करते हैं। प्रभु येसु अटारी में अपने बारह प्रेरितों के साथ अपने सार्वजनिक जीवन का अंतिम भोजन करते हैं। दुख भोगने के पहले अपने शिष्यों के साथ भोजन करने की उनकी तीव्र इच्छा थी (देखिए लूकस 22:15)। उस भोजन के दौरान वे अपने शिष्यों के पैर धोते हैं। साथ ही साथ दो संस्कारों की स्थापना भी करते हैं – पुरोहिताई और यूखारिस्त।

अपने शिष्यों के पैर धोने के बाद उन्होंने उन्हें एक बहुत ही महत्वपूर्ण शिक्षा दी – “तुम मुझे गुरु और प्रभु कहते हो और ठीक ही कहते हो, क्योंकि मैं वही हूँ। इसलिये यदि मैं- तुम्हारे प्रभु और गुरु- ने तुम्हारे पैर धोये है तो तुम्हें भी एक दूसरे के पैर धोने चाहिये।” (योहन 13:13-14) मसीह के आगमन के बारे में नबी इसायाह की भविष्यवाणियों में मसीह को प्रभु का सेवक कहा गया है। और प्रभु येसु कहते हैं कि वह “अपनी सेवा कराने नहीं, बल्कि सेवा करने तथा बहुतों के उद्धार के लिए अपने प्राण देने आया है” (मत्ती 20:28)। दूसरे एक अवसर पर वे अपने शिष्यों से कहते हैं, "जो पहला होना चाहता है, वह सब से पिछला और सब का सेवक बने" (मारकुस 9:35)। इस प्रकार प्रभु येसु अपने जीवन और अपनी शिक्षा से सेवक बनने तथा सेवा करने की ज़रूरत पर जोर देते हैं।

मुझे लगता है कि आज हमें प्रभु येसु ने जिन संस्कारों की स्थापना अंतिम भोजन के समय की थी, उन संस्कारों के सेवाभाव से संबंध पर ध्यान देना चाहिए। पुरोहिताई संस्कार सेवा का संस्कार है। वह उनके लिए हैं जो ईश्वर और उनकी प्रजा की सेवा करना चाहते हैं और उसके लिए अपने जीवन को पूर्ण रूप से समर्पित करते हैं। पुरोहित को ईश्वर उनकी प्रजा की सेवा के लिए ही बुलाते हैं। मूसा, हारून, एली और समुएल को ईश्वर ने इस्राएलियों की सेवा के लिए बुलाया। प्रेरितों को प्रभु येसु ने ईश्वर की पवित्र प्रजा की सेवा के लिए बुलाया। प्रभु ने उन्हें अपनी भेड़ों के लिए अपने जीवन की कुर्बानी देकर भी उनकी सेवा करने की शिक्षा दी। इसलिए पुरोहित लोगों की सेवा के लिए बुलाये गये हैं। संत पापा जो पुरोहितों में सर्वोच्च हैं, स्वयं भी ’सेवकों का सेवक’ जाने जाते हैं।

यूखारिस्तीय बलिदान हमें सेवा करने की चुनौती देता है। यूखारिस्तीय बलिदान में हमारी मुलाकात अपनी जान देकर भी हमारी सेवा करने वाले हमारे प्रभु से होती है। इस विषय में संत पौलुस कहते हैं, “हम पापी ही थे, जब मसीह हमारे लिए मर गये थे। इस से ईश्वर ने हमारे प्रति अपने प्रेम का प्रमाण दिया है” (रोमियों 5:8)। हमारी सेवा में उन्होंने सब कुछ त्याग कर अपने को दीन-हीन बनाया (देखिए फिलिप्पियों 2:5-11)। इस संस्कार में प्रभु येसु हमें एक दूसरे की पैर धोने अर्थात एक दूसरे की सेवा करने की चुनौती देते हैं।

ख्रीस्तीय विश्वासी दूसरों के सेवक हैं। ख्रीस्तीय जीवन सेवा का जीवन है। हमें यूखारिस्तीय बलिदान से दूसरों की सेवा करने की प्रेरणा और शक्ति मिलती है। लूमन जेन्सियुम 11 में द्वितीय वतिकान महासभा हमें सिखाती है कि यूखारिस्तीय बलिदान हमारे ख्रीस्तीय जीवन के उद्गम और चरम-बिन्दु है। कोलकात्ता की संत तेरेसा के जीवन में यह सच्चाई एक अनोखे ढ़ंग से झलकती है। उन्होंने अपनी धर्मबहनों को अपने सेवामय जीवन के लिए मिस्सा बलिदान से प्रेरणा पाने की सलाह दिया। भले समारी के दृष्टान्त में ज़रूरतमन्द व्यक्ति की सेवा करने में तत्परता दर्शाने वाले समारी यात्री को येसु याजक और लेवी से भी अधिक महत्व देते हैं। रविवारीय मिस्सा बलिदान में भाग लेने वाले विश्वासी लोग पूरे सप्ताह के सेवाकार्य के लिए प्रेरणा तथा शक्ति पाकर ही गिरजाघर से निकलते हैं। मिस्सा बलिदान में अपने आप को हम सब के लिए पूरी तरह देने वाले प्रभु येसु हमें निस्वार्थ भाव से सेवा करने की शिक्षा देते हैं। वे कहते हैं, “सभी आज्ञाओं का पालन करने के बाद तुम को कहना चाहिए, ‘हम अयोग्य सेवक भर हैं, हमने अपना कर्तव्य मात्र पूरा किया है’” (लूकस 17:10)।

आईए पुरोहित जो येसु के प्रतिनिधि बनकर मिस्सा बलिदान चढाते हैं और हरेक व्यक्ति जो प्रभु की प्रिय प्रजा बन कर मिस्स बलिदान चढ़ाता है मिस्सा बलिदान से सेवा करने तथा सेवक बनने की प्रेरणा और ऊर्जा पायें।

 -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!

Daily Mass Readings for Wednesday, 31 March 2021

Daily Mass Readings for Wednesday, 31 March 2021







First Reading: Isaiah 50: 4-9a

4 The Lord hath given me a learned tongue, that I should know how to uphold by word him that is weary: he wakeneth in the morning, in the morning he wakeneth my ear, that I may hear him as a master.

5 The Lord God hath opened my ear, and I do not resist: I have not gone back.

6 I have given my body to the strikers, and my cheeks to them that plucked them: I have not turned away my face from them that rebuked me, and spit upon me.

7 The Lord God is my helper, therefore am I not confounded: therefore have I set my face as a most hard rock, and I know that I shall not be confounded.

8 He is near that justifieth me, who will contend with me? let us stand together, who is my adversary? let him come near to me.

9 Behold the Lord God is my helper: who is he that shall condemn me?

Responsorial Psalm: Psalms 69: 8-10, 21-22, 31 and 33-34

R. (14c) In the multitude of thy mercy hear me.

8 Because for thy sake I have borne reproach; shame hath covered my face.

9 I am become a stranger to my brethren, and an alien to the sons of my mother.

10 For the zeal of thy house hath eaten me up: and the reproaches of them that reproached thee are fallen upon me.

R. In the multitude of thy mercy hear me.

21 In thy sight are all they that afflict me; my heart hath expected reproach and misery. And I looked for one that would grieve together with me, but there was none: and for one that would comfort me, and I found none.

22 And they gave me gall for my food, and in my thirst they gave me vinegar to drink.

R. In the multitude of thy mercy hear me.

31 I will praise the name of God with a canticle: and I will magnify him with praise.

33 Let the poor see and rejoice: seek ye God, and your soul shall live.

34 For the Lord hath heard the poor: and hath not despised his prisoners.

R. In the multitude of thy mercy hear me.

Verse Before the Gospel

Hail to you, our King; you alone are compassionate with our errors.

or

Hail to you, our King, obedient to the Father; you were led to your crucifixion like a gentle lamb to the slaughter.

Gospel: Matthew 26: 14-25

14 Then went one of the twelve, who was called Judas Iscariot, to the chief priests,

15 And said to them: What will you give me, and I will deliver him unto you? But they appointed him thirty pieces of silver.

16 And from thenceforth he sought opportunity to betray him.

17 And on the first day of the Azymes, the disciples came to Jesus, saying: Where wilt thou that we prepare for thee to eat the pasch?

18 But Jesus said: Go ye into the city to a certain man, and say to him: the master saith, My time is near at hand, with thee I make the pasch with my disciples.

19 And the disciples did as Jesus appointed to them, and they prepared the pasch.

20 But when it was evening, he sat down with his twelve disciples.

21 And whilst they were eating, he said: Amen I say to you, that one of you is about to betray me.

22 And they being very much troubled, began every one to say: Is it I, Lord?

23 But he answering, said: He that dippeth his hand with me in the dish, he shall betray me.

24 The Son of man indeed goeth, as it is written of him: but woe to that man by whom the Son of man shall be betrayed: it were better for him, if that man had not been born.

25 And Judas that betrayed him, answering, said: Is it I, Rabbi? He saith to him: Thou hast said it.


31 मार्च 2021, बुधवार पुण्य सप्ताह, बुधवार

 

31 मार्च 2021, बुधवार

पुण्य सप्ताह, बुधवार

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पहला पाठ : इसायाह का ग्रन्थ 50:4-9


4) प्रभु ने मुझे शिय बना कर वाणी दी है, जिससे मैं थके-माँदे लोगों को सँभाल सकूँ। वह प्रतिदिन प्रातः मेरे कान खोल देता है, जिससे मैं शिय की तरह सुन सकूँ।

5) प्रभु ने मेरे कान खोल दिये हैं; मैंने न तो उसका विरोध किया और न पीछे हटा।

6) मैंने मारने वालों के सामने अपनी पीठ कर दी और दाढ़ी नोचने वालों के सामने अपना गाल। मैंने अपमान करने और थूकने वालों से अपना मुख नहीं छिप़ाया।

7) प्रभु मेरी सहायता करता है; इसलिए मैं अपमान से विचलित नहीं हुआ। मैंने पत्थर की तरह अपना मुँह कड़ा कर लिया। मैं जानता हूँ कि अन्त में मुझे निराश नही होना पड़ेगा।

8) मेरा रक्षक निकट है, तो मेरा विरोधी कौन? हम एक दूसरे का सामना करें। मुझ पर अभियोग लगाने वाला कौन? वह आगे बढ़ने का साहस करे।

9) प्रभु-ईश्वर मेरी सहायता करता है, तो कौन मुझे दोषी ठहराने का साहस करेगा? मेरे सभी विरोधी वस्त्र की तरह जीर्ण हो जायेंगे, उन्हें कीड़े खा जायेंगे।


सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 26:14-25


14) तब बारहों में से एक, यूदस इसकारियोती नामक व्यक्ति ने महायाजकों के पास जा कर

15) कहा, ’’यदि मैं ईसा को आप लोगों के हवाले कर दूँ, तो आप मुझे क्या देने को तैयार हैं?’’ उन्होंने उसे चाँदी के तीस सिक्के दिये।

16) उस समय से यूदस ईसा को पकड़वाने का अवसर ढूँढ़ता रहा।

17) बेख़मीर रोटी के पहले दिन शिष्य ईसा के पास आकर बोले, ’’आप क्या चाहते हैं? हम कहाँ आपके लिए पास्का-भोज की तैयारी करें?’’

18) ईसा ने उत्तर दिया, ’’शहर में अमुक के पास जाओ और उस से कहो, ’गुरुवर कहते हैं- मेरा समय निकट आ गया है, मैं अपने शिष्यों के साथ तुम्हारे यहाँ पास्का का भोजन करूँगा’।’’

19) ईसा ने जैसा आदेश दिया, शिष्यों ने वैसा ही किया और पास्का-भोज की तैयारी कर ली।

20) सन्ध्या हो जाने पर ईसा बारहों शिष्यों के साथ भोजन करने बैठे।

21) उनके भोजन करते समय ईसा ने कहा, ’’मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- तुम में से ही एक मुझे पकड़वा देगा’’।

22) वे बहुत उदास हो गये और एक-एक कर उन से पूछने लगे, ’’प्रभु! कहीं वह मैं तो नहीं हूँ?’’

23) ईसा ने उत्तर दिया, ’’जो मेरे साथ थाली में खाता है, वह मुझे पकड़वा देगा।

24) मानव पुत्र तो चला जाता है, जैसा कि उसके विषय में लिखा है; परन्तु धिक्कार उस मनुष्य को, जो मानव पुत्र को पकड़वाता है! उस मनुष्य के लिए कहीं अच्छा यही होता कि वह पैदा ही नहीं हुआ होता।’’

25) ईसा के विश्वासघाती यूदस ने भी उन से पूछा, ’’गुरुवर! कहीं वह मैं तो नहीं हूँ? ईसा ने उत्तर दिया, तुमने ठीक ही कहा’’।


📚 मनन-चिंतन


प्रभु येसु को उनके शिष्यों से तिरस्कार का अनुभव करना पडा। यूदस इसकारियोति ने येसु को धोखा दिया, पेत्रुस ने येसु को तीन बार अस्वीकार किया और अन्य शिष्य भी उन्हें छोड का भग गये। इसके अलावा फरिसियों, सदूक्कियों और शास्त्रियों ने येसु को कटोर दण्ड दिया और क्रुस पर लटका दिया। सैनिको द्वारा उन पर थूका गया, उनके गाल पर थप्पड मारा गाया, उनके सिर पर कॉटों का मुकुट रखा गया, कोडों से मारा गया, उपहास किया गया, नंगा किया गया। इस प्रकार की बहुत सारी पीड़ायें येसु को सहनी पड़ी।

येसु को मालूम था कि मानव जाती को उद्वार करने केलिए उनको यह सब सहन करना अनिवार्य था। इसलिए आज के पहले पाठ में ईश्वर के सेवक सम्बन्धी तीसरा काव्य में कहा गया है- मैंने मारने वालों के सामने अपनी पीठ कर दी और दाढ़ी नोचने वालों के सामने अपना गाल। मैंने अपमान करने और थुकने वालों से अपना मुख नहीं छिपाया। येसु ने यह सब इसलिए सहा कि प्रभु उनकी सहायता करता है; इसलिए वह अपमान से विचलित नहीं हुआ। उसने पत्थर की तरह उनका मुॅह कड़ा कर लिया। वह जानता था कि अन्त में उनको निराश नहीं होना पडेगा।

इस पवित्र हफते में हम येसु के घोर पीडा सहन एवं क्रूस मरण पर मनन चिन्तन करें ताकि हमें हमारे दुःख दर्द येसु के समान सहने की शक्ति मिले। संत पौलूस 2 निमथी 1:12 मैं यहॉ यह कष्ट सह रहा हॅू, किन्तु मैं इस से लज्जित नहीं हॅू; क्योंकि मैं जानता हॅू कि मैंने किस पर भरोसा रखा है। और संत पौलूस कहते है रोमियों 8:18 मैं समझता हॅू कि हम में जो महिमा प्रकट होने को है, उसकी तुलना में इस समय का दुःख नगण्य है।




📚 REFLECTION



Jesus felt abandoned by his own disciples. Judas Iscariot betrayed Jesus; Peter denied Jesus three times, the other disciples deserted Jesus. Other than this the Pharisees, Sadducees and the Scribes gave horrible punishment to Jesus by hanging him on the cross. Soldiers spat on Jesus face, slapped him, mocked him, scourged him and put a crown of thorns on his head. In this way Jesus had to undergo so many pains in his life.

Jesus knew that in order to do penance for the sins of the world he had to undergo so many sufferings. Therefore I today’s first reading about the third poem of the suffering servant of Yahweh says to us: I gave my back to those who struck me, and my cheeks to those who pulled out the beard; I did not hide my face from insult and spitting. The Lord God helps me; therefore I have not been disgraced; therefore I have set my face like flint, and I know that I shall not be put to shame; he who vindicates me is near.

In this holy week let us reflect upon the passion death of Jesus Christ, so that we get grace to suffer like Jesus in all our pains. St. Paul says in 2Tim 1:12 for this reason I suffer as I do. But I am not ashamed, for I know the one in whom I have put my trust, and I am sure that he is able to guard until that day what I have entrusted to him. In Rom 8:18 St. Paul says I consider that the sufferings of this present time are not worth comparing with the glory about to be revealed to us.


 -Br. Biniush Topno


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