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23 सितंबर का पवित्र वचन

23 सितंबर 2020
वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य सप्ताह, बुधवार

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📒 पहला पाठ : सुक्ति 30:5-9

5) ईश्वर की प्रत्येक प्रतिज्ञा विश्वसनीय है। ईश्वर अपने शरणार्थियों की ढाल है।

6) उसके वचनों में अपनी और से कुछ मत जोड़ो, कहीं ऐसा न हो कि वह तुम को डाँटे और झूठा प्रमाणित करे।

7) मैं तुझ से दो वरदान माँगता हूँ, उन्हे मेरे जीवनकाल में ही प्रदान कर।

8) मुझ से कपट और झूठ को दूर कर दे। मुझे न तो गरीबी दे और न अमीरी- मुझे आवश्यक भोजन मात्र प्रदान कर।

9) कहीं ऐसा न हो कि मैं धनी बन कर तुझे अस्वीकार करते हुए कहूँ "प्रभु कौन है?" अथवा दरिद्र बन कर चोरी करने लगूँ और अपने ईश्वर का नाम कलंकित कर दूँ।


सुसमाचार :लूकस 9:1-6

1) ईसा ने बारहों को बुला कर उन्हें सब अपदूतों पर सामर्थ्य तथा अधिकार दिया और रोगों को दूर करने की शक्ति प्रदान की।

2) तब ईसा ने उन्हें ईश्वर के राज्य का सुसमाचार सुनाने और बीमारों को चंगा करने भेजा।

3) उन्होंने उन से कहा, "रास्ते के लिए कुछ भी न ले जाओ-न लाठी, न झोली, न रोटी, न रुपया। अपने लिए दो कुरते भी न रखो।

4) जिस घर में ठहरने जाओ, नगर से विदा होने तक वहीं रहो।

5) यदि लोग तुम्हारा स्वागत न करें, तो उनके नगर से निकलने पर उन्हें चेतावनी देने के लिए अपने पैरों की धूल झाड़ दो।"

6) वे चले गये और सुसमाचार सुनाते तथा लोगों को चंगा करते हुए गाँव-गाँव घूमते रहे।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार पाठ में जब येसु अपने शिष्यों मिशन पर भेजते है, तो वे उन्हें कम से कम सामान के साथ की यात्रा करने की हिदायत हैं। ऐसा कहकर वे उन्हें खुद पर ज़्यादा निर्भर न रहकर ईश्वर और उन लोगों के आतिथ्य पर निर्भर रहने के लिए कहते हैं, जिनको सुसमाचार सुनाते हैं। खुद पर अत्यधिक निर्भर होने के बजाय, ईश्वर पर भरोसा करने से हम सांसारिकता से खुद को दूर रखेंगे और अपना मन-ध्यान प्रभु और उनके वचनों पर लगाएंगे। कभी-कभी संसांरिक शक्तियों जैसे धन -दौलत, पद या फिर शारीरिक ताकत लोगों को इस भ्रम में डाल देती है कि वे अपने आप में पूर्ण हैं और उन्हें किसी की ज़रूरत नहीं।

आज का सुसमाचार हमें याद दिलाता है कि हम कभी भी पूरी तरह से खुद पर निर्भर नहीं हो सकते। हमने पाने जीवन के शुरुआत ही पूरी तरह से दूसरों पर निर्भर रहते हुए शुरू की है, और जैसे-जैसे हम अपने जीवन के अंत की ओर आते हैं हम एक बार फिर खुद को दूसरों पर पूरी तरह से निर्भर पाते हैं। और पूर्ण- निर्भरता के इन दो मुकामों के बीच की ज़िन्दगी में भी, हम कई प्रकार से दूसरों पर निर्भर रहना जारी रखते हैं। अपने पूरे जीवन में हम दूसरों पर निर्भर रहते हैं कि दूसरे लोग हमें वो चीज़ें दे जो हमारे पास नहीं और हम उन चीजों के लिए उनपर निर्भर रहते हैं जो हमारे पास नहीं।

प्रभु हमेशा हमें उस सेवा के लिए खुले रहने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं जो वह हमें, दूसरों के माध्यम से प्रदान करता है। हम में से प्रत्येक को देने के लिए बहुत कुछ है और प्राप्त करने के लिए बहुत कुछ है। जो प्रभु, हमारे माध्यम से दूसरों की सेवा करना चाहता है, वह दूसरों के माध्यम से हमारी भी सेवा करना चाहता है। तो आइये हमारे जीवन में खुद पर ही भरोसा ना करके ईश्वर और ईश्वर द्वारा हमें दिए गए लोगों और संसाधनों पर भरोसा करें और ईश्वर के वचन की सेवा में लगे रहें।



📚 REFLECTION

In today's Gospel, when Jesus sends his disciples on a mission, He instructs them to travel with very little luggage. By saying this, He tells them not to depend too much on themselves but to depend on the providence of God and the hospitality of the people to whom they preach the Gospel. Instead of relying too much on ourselves, trusting in God will keep us away from worldliness and will help to focus our attention on the Lord and His words. Sometimes the worldly powers such as money, position or physical strength mislead people that they are complete in themselves and that they do not need anyone.

Today's gospel reminds us that we can never be completely self-sufficient. We began our life completely depending on others, and as we come to the end of our lives we once again find ourselves completely dependent on others. And even in the life between these two polar positions of complete dependence, we continue to depend on others in many ways. Throughout our lives we depend on others to give us things that we do not have.

The Lord invites us to be open to the service that He provides to us, through others. Each of us has so much to give and so much to receive. The Lord, who wants to serve others through us, also wants to serve us through others. So, instead of trusting arrogantly, on ourselves, let us trust God and the people and resources given to us by God and continue to serve the Word of God with whatever way we can.

Biniush Topno





आत्मिक भोज़न Gospel - (Lk 8:19-21

 .               22nd September- Tuesday

              ‌          आत्मिक भोज़न

                   Gospel - (Lk 8:19-21

     प्रिय दोस्तो! आप सबों को ज़य येसु। आज़ का 

1. सुसमाचार सन्त लुकस का सुसमाचार से लिया गया है। आज़ का मूल विषय है,".कौन हैं येसु का माता-पिता और भाई-बहन? प्रभु येसु कहते हैं, "मेरा माता और मेरा पिता वही लोग हैं जो ईश्वर का वचन को सुनते हैं और उसको पूरा करते हैं और उसके अनुसार जीते हैं (Lk 8:21)। जो लोग वचन के अनुसार जीते हैं वे प्रभु येसु के परिवार का सदस्य बन जाते हैं।  2. जिस वचन नें पृथ्वी कि सृष्टि किया, जिस वचन शरीर बन कर दुनिया में आया और जिस वचन कलवारी पहाड़ में  टुकड़ा-टुकड़ा हुआ, प्रभु येसु ख्रीस्त, हमारे मुक्तिदाता के द्वारा लोगों के बीच में बांटा गया और जो लोग उस वचन को हृदय में ग्रहण करते हैं वे येसु का भाई-बहन हैं। 3. वचन को सुनने का मतलब- येसु को प्यार करना, वचन को सुनना, वचन में विश्वास करना और वचन में विश्वास करके उसके अनुसार जीना,"। 4. जो लोग उन पर विश्वास करते हैं और जो लोग उसके वचन के अनुसार जीते है वे येसु के साथ और आपस में एक परिवार के समान अटुट सम्बन्ध जोड़ते हैं। यही परिवार येसु ख्रीस्त का शरीर है, जिसका सिर येसु है, और परिवार में रहने वाले लोग उसका सदस्य हैं। 5. निष्कलंक माता मरिया इस परिवार में प्रमुख स्थान को ग्रहण की। जैसे सबसे पहले उसने वचन को सुनी और वचन को अपने हृदय में ग्रहण की और वचन के अनुसार जीवन वितायी। परिवार में उसको सबसे उत्तम स्थान मिला। कुवारी मरिया दुनिया में पवित्र आत्मा कि शक्ति से गर्भवती हुई, और शरीर को दुनिया में जन्म देने का सौभाग्य मिला। वही माता मरियम को परिवार में मुख्य स्थान मिला, वह परिवार का मां है।

22 सितंबर का पवित्र वचन

 

22 सितंबर 2020
वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य सप्ताह, मंगलवार

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📒 पहला पाठ : सुक्ति 21:1-6, 10-13

1) राजा का हृदय प्रभु के हाथ में जल धारा की तरह है: वह जिधर चाहता, उसे मोड़ देता है।

2) मनुष्य जो कुछ करता है, उसे ठीक समझता है; किन्तु प्रभु हृदय की थाह लेता है।

3) बलिदान की अपेक्षा सदाचरण और न्याय प्रभु की दृष्टि में कहीं अधिक महत्व रखते हैं।

4) तिरस्कारपूर्ण आँखें और धमण्ड से भरा हुआ हृदय: ये पापी मनुष्य के लक्षण हैं।

5) जो परिश्रम करता है, उसकी योजनाएँ सफल हो जाती हैं। जो उतावली करता है, वह दरिद्र हो जाता है।

6) झूठ से कमाया हुआ धन असार है और वह मृत्यु के पाष में बाँध देता है।

10) दुष्ट बुराई की बातें सोचता रहता है, वह अपने पड़ोसी पर भी दया नहीं करता।

11) अविश्वासी को दण्डित देख कर, अज्ञानी सावधान हो जाता है। जब बुद्धिमान् को शिक्षा दी जाती है, तो उसका ज्ञान बढ़ता है।

12) न्यायप्रिय दुष्ट के घर पर दृष्टि रखता और कुकर्मियों का विनाश करता है।

13) जो दरिद्र का निवेदन ठुकराता है, उसकी दुहाई पर कोई कान नहीं देगा।


सुसमाचार :लूकस 8:19-21

19) ईसा की माता और भाई उन से मिलने आये, किन्तु भीड़ के कारण उनके पास नहीं पहुँच सके।

20) लोगों ने उन से कहा, "आपकी माता और आपके भाई बाहर हैं। वे आप से मिलना चाहते हैं।"

21) उन्होंने उत्तर दिया, "मेरी माता और मेरे भाई वहीं हैं, जो ईश्वर का वचन सुनते और उसका पालन करते हैं"।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार को, ऊपरी तौर पर पढ़ने से, हमें जो समझ में आता है, वह यह है कि येसु अपने मूल परिवार से खुद को दूर कर रहे हैं। उनकी माँ और भाई घर के बाहर थे और वे उनसे मिलना चाहते थे। हालाँकि, जब उन्होंने येसु को बुला भेजा तो वे उनके पास नहीं आते, इसके बजाय, वे अपने परिवार को फिर से परिभाषित करते हैं। उनका नया परिवार व परिवार सदस्य अब वे लोग हैं, जो ईश्वर का वचन सुनते, और उसे बनाए रखते हैं।

इस घटना के पहले येसु ने बोने वाले के दृष्टांत सुनाया था, जिसमें अच्छी मिट्टी पर गिरे हुए बीज की पहचान उन लोगों के रूप में की गई थी, जो ईश्वर का वचन को सुनते, और उसे अपने दिल में उतारते तथा फल उत्पन्न करते हैं । ये ऐसे लोग हैं जो अब येसु के सच्चे परिवार का गठन करते हैं। उनकी माँ और उनके रक्त सम्बन्धी व अन्य सदस्य तभी इस नए परिवार का हिस्सा बन सकते हैं जब वे भी ईश्वर के वचन को सुनें और उस पर चलें ।

जहाँ तक हम ईश्वर के वचन को स्वीकार करते हैं और उसका पालन करते हैं, हम भी येसु के नए विस्तृत, परिवार के सदस्य बन सकते हैं। हमारे बपतिस्मा की बुलाहट यही है कि हम ईश्वर के वचनों को सुनें और इसे व्यवहार में लाएं । हमें अपने जीवन को वह अच्छी भूमि बनाना है जहाँ पर बीज गिरकर फल लाता है। यदि हम ईश्वर के वचन को सुनने के लिए प्रयास करते रहते हैं और उनपर चलते हुए ईश्वर की मर्ज़ी को पूरा करते है तो प्रभु येसु हमें अपने परिवार सदस्य कहने में प्रसन्न होंगे।



📚 REFLECTION

Reading from the periphery, what we understand from the gospel today is that Jesus is distancing himself from his original family. His mother and brothers were outside the house and they wanted to meet him. However, He does not go out to meet them, when they called for him. Instead, He redefines his family and family relations. His new family and family members are now those who listen to, and keep the word of God. Before this event, Jesus narrated the parable of sower, identifying the seed fallen on good soil as those who would listen to the word of God, and keep it in their hearts and produce fruit. These are the people who now constitute the true family of Jesus. His mother and His blood relations and other members can become part of this new family only when they too listen to the word of God and follow it.

When we accept and obey the Word of God, we can also become members of the new extended family of Jesus. The call of our baptism is that we listen to the Words of God and put it into practice. We have to make our life the good and fertile land where the seed falls and brings fruit. If we listen to God's word and do the will of God, then our Lord Jesus will be happy to call us His family members. Amen.



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चरणों में तेरे आए हिंदी क्रिश्चियन वर्षिप गान



 

 


21 सितंबर का पवित्र वचन

 

21 सितंबर 2020, सोमवार

प्रेरित,सुसमाचार-लेखक सन्त मत्ती का पर्व

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📒 पहला पाठ : एफ़ेसियों 4:1-7, 11-13

1) ईश्वर ने आप लोगों को बुलाया है। आप अपने इस बुलावे के अनुसार आचरण करें - यह आप लोगों से मेरा अनुरोध है, जो प्रभु के कारण कै़दी हूँ।

2) आप पूर्ण रूप से विनम्र, सौम्य तथा सहनशील बनें, प्रेम से एक दूसरे को सहन करें

3) और शान्ति के सूत्र में बँध कर उस एकता को बनाये रखने का प्रयत्न करते रहें, जिसे पवित्र आत्मा प्रदान करता है।

4) एक ही शरीर है, एक ही आत्मा और एक ही आशा, जिसके लिए आप लोग बुलाये गये हैं।

5) एक ही प्रभु है, एक ही विश्वास और एक ही बपतिस्मा।

6) एक ही ईश्वर है, जो सबों का पिता, सब के ऊपर, सब के साथ और सब में व्याप्त है।

7) मसीह ने जिस मात्रा में देना चाहा, उसी मात्रा में हम में प्रत्येक को कृपा प्राप्त हुई है।

11) उन्होंने कुछ लोगों को प्रेरित, कुछ को नबी, कुछ को सुसमाचार-प्रचारक और कुछ को चरवाहे तथा आचार्य होने का वरदान दिया।

12) इस प्रकार उन्होंने सेवा-कार्य के लिए सन्तों को नियुक्त किया, जिससे मसीह के शरीर का निर्माण तब तक होता रहे,

13) जब तक हम विश्वास तथा ईश्वर के पुत्र के ज्ञान में एक नहीं हो जायें और मसीह की परिपूर्णता के अनुसार पूर्ण मनुष्यत्व प्राप्त न कर लें।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 9:9-13

9) ईसा वहाँ से आगे बढ़े। उन्होंने मत्ती नामक व्यक्ति को चुंगी-घर में बैठा हुआ देखा और उस से कहा, ’’मेरे पीछे चले आओ’’, और वह उठकर उनके पीछे हो लिया।

10) एक दिन ईसा अपने शिष्यों के साथ मत्ती के घर भोजन पर बैठे और बहुत-से नाकेदार और पापी आ कर उनके साथ भोजन करने लगे।

11) यह देखकर फरीसियों ने उनके शिष्यों से कहा, ’’तुम्हारे गुरु नाकेदारों और पापियों के साथ क्यों भोजन करते हैं?’’

12) ईसा ने यह सुन कर उन से कहा, ’’नीरोगों को नहीं, रोगियों को वैद्य की ज़रूरत होती है।

13) जा कर सीख लो कि इसका क्या अर्थ है- मैं बलिदान नहीं, बल्कि दया चाहता हूँ। मैं धर्मियों को नहीं, पापियों को बुलाने आया हूँ।’’

📚 मनन-चिंतन

हम सब डॉक्टर लोगों से परिचित हैं। आज नहीं तो कल हमें ज़रूर डॉक्टर की ज़रूरत पड़ सकती है, क्योंकि हम सभी कभी न कभी बीमार पड़ जाते हैं। आज के सुसमाचार में, येसु एक लोकप्रिय कहावत का उपयोग करते हुए कहते हैं, "नीरोगों को नहीं, रोगियों को वैध्य की ज़रूरत होती है। येसु यहाँ, यह घोषणा कर रहे हैं कि उनकी सेवकाई का मुख्य ध्यान उन लोगों की ओर नहीं है जो पूर्ण हैं अथवा जो ठीक हैं, पर उन लोगों की तरफ है जो टूटे हुए हैं, जो बिखरे हुए हैं।

एक तरह से देखा जाए तो किसी न किसी रूप में हम भी अपनी आध्यात्मिकता में टूटे, बिखरे और बीमार हैं। और यदि हम आत्मिक रूप से बीमार हैं तो हमें ज़रूर एक आत्मिक डॉक्टर की ज़रूरत है। साधारण तोर पर डॉक्टर मरीज़ की तलाश में नहीं आता, मरीज़ डॉक्टर के पास जाता है। पर प्रभु येसु ऐसे डॉक्टर हैं जो मरीज़ की तलाश में जाते हैं। येसु हम पापियों के, पाप के इलाज के लिए पहले पहल करता है, वो हमारी तलाश में आता है।

उन्होंने नाकेदार मत्ती को उनकी पापमय ज़िन्दगी से बुलाने की पहल की। और उन्होंने लोगों के सामने यह घोषित किया कि वे धर्मियों को नहीं पापियों को बुलाने आये हैं। येसु हमें तलाश रहे हैं। शायद हम से पहले वे हमें ढूढ़ने निकल पड़े हैं। हमें ज़रूरत है उनकी आवाज़ सुनने की - "मेरे पीछे चले आओ अथवा मेरा अनुसरण करो।" क्या हम मत्ती की तरह अपनी पुरानी ज़िन्दगी को छोड़कर येसु का अनुसरण करने के लिए तैयार हैं? मत्ती ने एक बार अपनी पुरानी ज़िन्दगी को अलविदा कहा, अपने कर वसूली के पेशे को अलविदा कहा, लोगों को ठगने को अलविदा कहा, अय्याशी की ज़िन्दगी को अलविदा कहा तो फिर कभी भी उन राहों पर वे वापस नहीं गए। हम भी हमारे बुराई के रास्तों को छोड़ें, येसु के पीछे, उनके नक़्शे कदम पर चलें, जैसे मत्ती ने येसु से दोस्ती की वैसे हम भी उनसे दोस्ती करें; येसु को अपने घरों में आमंत्रित करें और येसु को अपने जीवन का साथी बना लें, अभिन्न अंग बना लें।



📚 REFLECTION

IWe are all familiar with doctors. If not today, then tomorrow we may need a doctor, because we all fall sick at some time or the other. In today's gospel, Jesus uses a popular, saying, It is the sick who need the doctor not those who are well" Here, Jesus is declaring that the main focus of his ministry is not on those who those who are complete or who are fine, but those who are broken, who are scattered.

In one way or another, we are broken, scattered and sick in our spirituality. And if we are spiritually ill, we definitely need a spiritual doctor. On a simple basis, the doctor does not come in search of the patient; the patient goes to the doctor. But Lord Jesus is such a doctor who goes in search of the patient. Jesus takes the initiative to search for the lost sinners to cure them of their sins. He took the initiative to call Matthew, the tax collector from his sinful life. And he declared in front of the people that he had come to call the sinners, not the righteous. Jesus is looking for us. We need to hear his voice - "follow me." Are we ready to follow Jesus like Matthew, leaving our old life? Matthew once said goodbye to his old life, said goodbye to his profession, said goodbye to the cheating people, said goodbye to his lose living, then he never went back on those paths. Let us also leave our paths of evil, follow Jesus, walk on his footsteps; befriend Jesus as Mathew did; Invite Jesus to our homes and make Jesus a constant companion and integral part of our life. Amen