मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
Duliajan, Assam, India
Catholic Bibile Ministry में आप सबों को जय येसु ओर प्यार भरा आप सबों का स्वागत है। Catholic Bibile Ministry offers Daily Mass Readings, Prayers, Quotes, Bible Online, Yearly plan to read bible, Saint of the day and much more. Kindly note that this site is maintained by a small group of enthusiastic Catholics and this is not from any Church or any Religious Organization. For any queries contact us through the e-mail address given below. 👉 E-mail catholicbibleministry21@gmail.com

13 सितंबर का पवित्र वचन

 

13 सितंबर 2020
वर्ष का चौबीसवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

📒 पहला पाठ : प्रवक्ता-ग्रन्थ 27:33-28:9

27) मैं बहुत-सी बातों से घृणा करता हूँ, किन्तु ऐसे व्यक्ति से सब से अधिक। प्रभु को भी उस से घृणा है।

28) जो पत्थर ऊपर फेंकता, वह उसे अपने सिर पर गिराता है, जो षड्यन्त्र रचता, वह उस से घायल हो जायेगा।

29) जो गड्ढा खोदता, वह स्वयं उसी में गिरेगा, जो अपने पड़ोसी के लिए पत्थर रखता, वह उसी से ठोकर खायेगा और जो जाल बिछाता, वह उसी में फँसेगा।

30) जो बुराई करता, उसे उस से हानि होती है, यद्यपि वह नहीं जानता कि वह कहाँ से आती है।

31) घमण्डी का उपहास और अपमान किया जायेगा और प्रतिशोध घात में बैठे हुए सिंह की तरह उसकी प्रतीक्षा करता है।

32) जो धर्मियों के पतन पर आनन्दित है, वे स्वयं जाल में फँसेंगे और वे मृत्यु से पहले वेदना से धुल जायेंगे।

33) विद्वेष और क्रोध घृणित है, तो भी पापी दोनों किया करता है।

1) ईश्वर बदला लेने वाले को दण्ड देगा और उसके पापों का पूरे-पूरा लेखा रखेगा।

2) अपने पड़ोसी का अपराध क्षमा कर दो और प्रार्थना करने पर तुम्हारे पाप क्षमा किये जायेंगे।

3) यदि कोई अपने मन में दूसरों पर क्रोध बनाये रखता है, तो वह प्रभु से क्षमा की आशा कैसे कर सकता है?

4) यदि वह अपने भाई पर दया नहीं करता, तो वह अपने पापों के लिए क्षमा कैसे माँग सकता है?

5) निरा मनुष्य होते हुए भी यदि वह बैर बनाये रखता, तो उसे अपने पापों की क्षमा कैसे मिल सकती है? उसके पापों की क्षमा के लिए कौन प्रार्थना करेगा?

6) अन्तिम बातों का ध्यान रखो और बैर रखना छोड़ दो।

7) विकृति तथा मृत्यु को याद रखो और आज्ञाओें का पालन करो।

8) आज्ञाओें का ध्यान रखो और अपने पड़ोसी से बैर न रखो।

9) सर्वोच्च ईश्वर के विधान का ध्यान रखो और दूसरो के अपराध क्षमा कर दो।

📕 दूसरा पाठ :रोमियो 14:7-9

7) कारण, हम में कोई न तो अपने लिए जीता है और न अपने लिए मरता है।

8) यदि हम जीते रहते हैं, तो प्रभु के लिए जीते हैं और यदि मरते हैं, तो प्रभु के लिए मरते हैं। इस प्रकार हम चाहे जीते रहें या मर जायें, हम प्रभु के ही हैं।

9) मसीह इसलिए मर गये और जी उठे कि वह मृतकों तथा जीवितों, दोनों के प्रभु हो जायें।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 18:21-35

21) तब पेत्रुस ने पास आ कर ईसा से कहा, ’’प्रभु! यदि मेरा भाई मेरे विरुद्ध अपराध करता जाये, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूँ? सात बार तक?’’

22) ईसा ने उत्तर दिया, ’’मैं तुम से नहीं कहता ’सात बार तक’, बल्कि सत्तर गुना सात बार तक।

23) ’’यही कारण है कि स्वर्ग का राज्य उस राजा के सदृश है, जो अपने सेवकों से लेखा लेना चाहता था।

24) जब वह लेखा लेने लगा, तो उसका लाखों रुपये का एक कर्ज़दार उसके सामने पेश किया गया।

25) अदा करने के लिए उसके पास कुछ भी नहीं था, इसलिए स्वामी ने आदेश दिया कि उसे, उसकी पत्नी, उसके बच्चों और उसकी सारी जायदाद को बेच दिया जाये और ऋण अदा कर लिया जाये।

26) इस पर वह सेवक उसके पैरों पर गिर कर यह कहते हुए अनुनय-विनय करता रहा, ’मुझे समय दीजिए, और मैं आपको सब चुका दूँगा।

27) उस सेवक के स्वामी को तरस हो आया और उसने उसे जाने दिया और उसका कजऱ् माफ़ कर दिया।

28) जब वह सेवक बाहर निकला, तो वह अपने एक सह- सेवक से मिला, जो उसका लगभग एक सौ दीनार का कर्ज़दार था। उसने उसे पकड़ लिया और उसका गला घांेट कर कहा, ’अपना कर्ज़ चुका दो’।

29) सह-सेवक उसके पैरों पर गिर पड़ा और यह कहते हुए अनुनय-विनय करता रहा, ’मुझे समय दीजिए और मैं आपको चुका दूँगा’।

30) परन्तु उसने नहीं माना और जा कर उसे तब तक के लिये बन्दीगृह में डलवा दिया, जब तक वह अपना कर्ज़ न चुका दे!

31) यह सब देख कर उसके दूसरे सह-सेवक बहुत दुःखी हो गये और उन्होंने स्वामी के पास जा कर सारी बातें बता दीं।

32) तब स्वामी ने उस सेवक को बुला कर कहा, ’दृष्ट सेवक! तुम्हारी अनुनय-विनय पर मैंने तुम्हारा वह सारा कजऱ् माफ़ कर दिया था,

33) तो जिस प्रकार मैंने तुम पर दया की थी, क्या उसी प्रकार तुम्हें भी अपने सह-सेवक पर दया नहीं करनी चाहिए थी?’

34) और स्वामी ने क्रुद्ध होकर उसे तब तक के लिए जल्लादों के हवाले कर दिया, जब तक वह कौड़ी-कौड़ी न चुका दे।

35) यदि तुम में हर एक अपने भाई को पूरे हृदय से क्षमा नहीं करेगा, तो मेरा स्वर्गिक पिता भी तुम्हारे साथ ऐसा ही करेगा।’’

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में येसु ने एक निर्दय सेवक के बारे में बताया जो अपने स्वामी से क्षमा का उपहार प्राप्त करता है, लेकिन वह अपने सह- सेवक को क्षमा करने से इंकार कर देता है। यह दृष्टान्त जहाँ एक ओर ईश्वर की क्षमाशीलता को दर्शाता है, वहीँ हमें अपने अपराधियों को क्षमा करने के लिए आह्वान करता है।

हमारे जीवन में हम देखते हैं कि जब हमारी बारी आती है, तो हम औरों से हमारी बड़ी से बड़ी गलती की भी क्षमा की उम्मीद करते हैं पर जब दूसरों को क्षमा देने की बात आती है तो फिर हमें वहाँ पर न्याय चाहिए होता है। यही माविय प्रवृति है। अगर ईश्वर हमारे हर-एक गुनाह के अनुसार हमारे साथ बर्ताव करता तो बताओ कौन उनके सामने टिक सकता जैसा के भजन संहिंता 130:3 में हम पढ़ते है - "प्रभु! यदि तू हमारे अपराधों को याद रखेगा, तो कौन टिका रहेगा?"

जिस तरह से ईश्वर हमारे साथ बर्ताव करता है, हम कितना दूसरों के साथ वैसा ही बर्ताव कर पाते हैं। हम तो हमारी स्वार्थी प्रवृति के शिकार हैं और सिर्फ खुद का भला सोचते हैं। पर हमें याद रहे कि ऐसी प्रवृति तो सांसारिक है, और हम सांसारिक नहीं स्वर्गिक हैं। इसलिए हमारे मनोभाव स्वर्ग के मुताबिक होने चाहिए। संत मत्ती 5:48 में येसु कहते हैं - "इसलिए तुम पूर्ण बनो, जैसे तुम्हारा स्वर्गिक पिता पूर्ण है।" और संत लूकस इसी बात को थोड़ा सा अलग रूप में पेश करते हैं - "अपने स्वर्गिक पिता-जैसे दयालु बनो।" पूर्णता का आह्वान ईश्वर के समान उदार और प्रेममय क्षमा करने का आह्वान है। प्रभु हमें सिर्फ पूर्णता के जीवन का आह्वान ही नहीं देते, पर इस आह्वान को अपने जीवन में साकार करने के लिए साधन भी मुहैया कराते हैं और वह साधन, निश्चित रूप से, पवित्र आत्मा है, जिसे संत पौलुस ईश्वर के प्रेम का आत्मा कहता है, जिसे ईश्वर ने हमारे दिलों में रोपित किया है।

जब हम आत्मा से संचालित जीवन जियेंगे, तो हम हमारे स्वर्गिक पिता जैसा प्यार और क्षमा दूसरों को दिखा पाएंगे।



📚 REFLECTION

In today's gospel, Jesus tells of an unforgiving servant who receives the gift of forgiveness from his master, but refuses to forgive his co-servant. While this parable shows God's forgiveness on the one hand, it calls on us to forgive our fellow brothers or sisters on the other hand.

In our lives we see that when it is our turn, we expect forgiveness of even our biggest mistake from others, but when it comes to forgiving others, and then we need justice there. This is the social trend. If God treats us according to our every wrongdoing, then, who can stand in front of Him, as we read in Psalm 130: 3 - "Lord! If you remember our sins, then who will stand?"

How much are we able to treat others as God treats us? We are victims of our selfish tendencies and think only of ourselves. But let us remember that such a tendency is worldly and we are heavenly, not earthly. Therefore our attitude should be in accordance with heaven. In St. Matthew 5:48, Jesus says - "Therefore, be perfect, as your heavenly Father is perfect." And Saint Luke presents this in a slightly different form- "Be merciful as your heavenly Father is merciful."

The call to perfection is a call to generous and loving forgiveness like God. The Lord not only gives us the call to a life of perfection, but also provides the means to make this call come true in our lives and that means, of course, is the Holy Spirit, which Saint Paul calls the Spirit of God's love, Which God has planted in our hearts.

When we live a spirit-driven life, we will be able to show to others the love and forgiveness like our Heavenly Father.


मनन-चिंतन

हम संत लूकस के सुसमाचार अध्याय 15 में ईश्वरीय प्रेम और क्षमा पर आधारित उडाऊ पुत्र का दृष्टान्त पढ़ते हैं । इस दृष्टान्त से हम सब परिचित है । एक पिता के दो पुत्र थे । छोटे पुत्र ने अपने पिता से कहा कि सम्पत्ति का जो हिस्सा मेरा है वह मुझे दे दीजिए और पिता ने दोनों में अपनी सम्पत्ति का बटॅंवारा कर दिया । इस तरह छोटा बेटा अपनी सम्पत्ति लेकर अपने पिता और घर से दूर चला जाता है और वहाँ घोर पापमय जीवन जीता है और अपनी धन-सम्पत्ति का दुरुपयोग करता है और सब कुछ समाप्त होने के बाद, पश्चात्ताप करते हुए वह घर लौटता है । तब पिता उसके अपराधों को क्षमा करते हुए घर में उसका स्वागत करते हैं। यह दृष्टान्त हम मनुष्यों के पाप, पश्चाताप और पिता परमेश्वर के प्रेम और क्षमा पर आधारित है। इस दृष्टान्त से हम सब भली भांति परिचित है। हम इस कहानी के दूसरे भाग के बारे में भी कल्पना कर सकते हैं। कल्पना कीजिए कि इस प्रकार घर आने के बाद वह उडाऊ पुत्र अपने पिता के साथ खुशी से रहता है और कुछ समय बाद उसका विवाह होता है। विवाह के पश्चात अपने पिता के ही समान उसके भी दो पुत्र होते हैं, पुत्रों के बड़े होने पर जैसा कि उडाऊ पुत्र ने अपने पिता के साथ किया, ठीक वैसे ही उसका पुत्र भी उसके साथ करता है। वह सम्पत्ति का हिस्सा माँगता है और अपने पिता व घर से दूर चला जाता है, पिता की सम्पत्ति का दुरूपयोग करता है, पापमय जीवन जीता है और सब कुछ समाप्त होने के पश्चात, पश्चाताप करते हुए अपने पिता के पास लौट आता है। घर लौटने पर क्या उडाऊ पुत्र अपने बेटे को अपने पिता के समान स्वीकार करेगा या नहीं? यदि वह अपने पिता के समान अपने पुत्र का स्वागत करता है तो वह अपने पिता के समान बन जाता है। परन्तु यदि वह अपने पिता के विपरीत अपने पुत्र का स्वागत नहीं करता है तो वह अपने पिता के साथ रहने के बावजूद भी अपने पिता से दूर है। हमारी बुलाहट पिता के समान बनने के लिए है। प्रभु कहते हैं कि हमें स्वर्गीय पिता के समान दयालु और परिपूर्ण बनना चहिए।

उडाऊ पुत्र के दृष्टान्त के द्वारा पुत्र के पश्चाताप और पिता के घर में वापस लौटने पर जोर दिया गया है। अपनी गलतियों के लिए क्षमा माँगते हुए ईश्वर के पास आना हमारी आत्मीय यात्रा की शुरूआत हैं । आत्मीय जीवन में हमारा लक्ष्य पिता परमेश्वर के समान बनना हैं इसलिए हमारी बुलाहट में दया, क्षमा, प्रेम आदि होना चाहिए ताकि हम पिता परमेश्वर के समान बन सकें।

आज के सुसमाचार में हमने सुना कि जब सेवक अपने मालिक से दया की याचना करता है, तो उसे दया मिल जाती हैं। लेकिन वही सेवक अपने सह कर्मियों के साथ विपरीत व्यवहार करता है। उसने अपने मालिक से दया व क्षमा प्राप्त की है परन्तु फिर भी वह मालिक के समान नही बन पाया क्योंकि उसमें दयालुता की भावना नही है। इसी कारण उसे दंड भी मिलता है ।

हम पिता ईश्वर से दया व क्षमा की प्रार्थना करते हैं और वे हमारे अपराधों केा क्षमा भी करते हैं। क्या हम क्षमा प्राप्त करने के पश्चात प्रभु के समान बनने की कोशिश करते हैं या नहीं? प्रभु चाहते है कि हम पिता के समान बने जिन्होंने हमें अपनी असीम दया और क्षमा प्रदान की है।

उत्पत्ति ग्रंथ अध्याय 33 में याकूब को अपने भाई से मिलते इुए हम देखते हैं। याकूब ने अपने भाई को धोखा दिया था तथा उसके इस धोखे के कारण ही उसका बडा भाई एसाव अपने जीवन में पिता की आशिष से वंचित रह गया था। कई सालों के बाद याकूब एसाव से मिलने जाता है। उस समय वह बहुत डरा हुआ था लेकिन उसकी सोच के विपरीत एसाव उसके पास स्नेह से आता है और उसे गले लगाता है। तब याकूब अपने भाई से कहता है, ”मेरे लिए आपके दर्शन ईश्वर के दर्शनों के तुल्य है”। जो कोई भी दूसरों के अपराधों को क्षमा करता है व दया दिखाता है वह प्रभु के समान बन जाता है। इसलिए हमें भी प्रभु के समान बनने की कोशिश करना चाहिए। हम प्रभु से प्रार्थना करें कि हम प्रभु के समान क्षमाशील व दयावान बनें ताकि दूसरों के अपराधो व गुनाहों को माफ कर सकें और प्रभु के नजदीक जा सकें ।

-फादर वर्गीस पल्लिपरम्पिल


atpresentofficial.blogspot.com



12 सितंबर का पवित्र वचन

 

12 सितंबर 2020, शनिवार
कुँवारी मरियम का पवित्र नाम

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 10:14-22

14) प्रिय भाइयो! आप मूर्तिपूजा से दूर रहें।

15) मैं आप लोगों को समझदार जान कर यह कह रहा हूँ। आप स्वयं मेरी बातों पर विचार करें।

16) क्या आशिष का प्याला, जिस पर हम आशिष की प्रार्थना पढ़ते हैं, हमें मसीह के रक्त का सहभागी नहीं बनाता? क्या वह रोटी, जिसे हम तोड़ते हैं, हमें मसीह के शरीर का सहभागी नहीं बनाती?

17) रोटी तो एक ही है, इसलिए अनेक होने पर भी हम एक हैं; क्योंकि हम सब एक ही रोटी के सहभागी हैं।

18) इस्राएलियों को देखिए! क्या बलि खाने वाले वेदी के सहभागी नहीं हैं?

19) मैं यह नहीं कहता कि देवता को चढ़ाये हुए मांस की कोई विशेषता है अथवा यह कि देवमूर्तियों का कुछ महत्व है।

20) किन्तु-धर्मग्रन्थ के अनुसार- गैर-यहूदियों के बलिदान ईश्वर को नहीं, बल्कि अपदूतों को चढ़ाये जाते हैं। मैं यह नहीं चाहता कि आप लोग अपदूतों के सहभागी बनें।

21) आप प्रभु का प्याला और अपदूतों का प्याला, दोनों नहीं पी सकते। आप प्रभु की मेज़ और अपदूतों की मेज़, दोनों के सहभागी नहीं बन सकते।

22) क्या हम प्रभु को चुनौती देना चाहते हैं? क्या हम उस से बलवान् हैं?


सुसमाचार : लूकस 6:43-49

43) "कोई अच्छा पेड़ बुरा फल नहीं देता और न कोई बुरा पेड़ अच्छा फल देता है।

44) हर पेड़ अपने फल से पहचाना जाता है। लोग न तो कँटीली झाडि़यों से अंजीर तोड़ते हैं और न ऊँटकटारों से अंगूर।

45) अच्छा मनुष्य अपने हृदय के अच्छे भण्डार से अच्छी चीजे़ं निकालता है और जो बुरा है, वह अपने बुरे भण्डार से बुरी चीज़ें निकालता है; क्योंकि जो हृदय में भरा है, वहीं तो मुँह से बाहर आता है।

46) "जब तुम मेरा कहना नहीं मानते, तो ’प्रभु! प्रभु! कह कर मुझे क्यों पुकारते हो?

47) जो मेरे पास आ कर मेरी बातें सुनता और उन पर चलता है-जानते हो, वह किसके सदृश है?

48) वह उस मनुष्य के सदृश है, जो घर बनाते समय गहरा खोदता और उसकी नींव चट्टान पर डालता है। बाढ़ आती है, और जलप्रवाह उस मकान से टकराता है, किन्तु वह उसे ढा नहीं पाता; क्योंकि वह घर बहुत मज़बूत बना है।

49) परन्तु जो मेरी बातें सुनता है और उन पर नहीं चलता, वह उस मनुष्य के सदृश है, जो बिना नींव डाले भूमितल पर अपना घर बनाता है। जल-प्रवाह की टक्कर लगते ही वह घर ढह जाता है और उसका सर्वनाश हो जाता है।"

कुँवारी मरियम का पवित्र नाम

📒 पहला पाठ : गलातियों 4:4-7

4) किन्तु समय पूरा हो जाने पर ईश्वर ने अपने पुत्र को भेजा। वह एक नारी से उत्पन्न हुए और संहिता के अधीन रहे,

5) जिससे वह संहिता क अधीन रहने वालों को छुड़ा सकें और हम ईश्वर के दत्तक पुत्र बन जायें।

6) आप लोग पुत्र ही हैं। इसका प्रमाण यह है कि ईश्वर ने हमारे हृदयों में अपने पुत्र का आत्मा भेजा है, जो यह पुकार कर कहता है -"अब्बा! पिता!" इसलिए अब आप दास नहीं, पुत्र हैं और पुत्र होने के नाते आप ईश्वर की कृपा से विरासत के अधिकारी भी हैं।

7) इसलिए अब आप दास नहीं, पुत्र हैं और पुत्र होने के नाते आप ईश्वर की कृपा से विरासत के अधिकारी भी हैं।

अथवा - पहला पाठ : एफ़ेसियों 1:3-6

3) धन्य है हमारे प्रभु ईसा मसीह का ईश्वर और पिता! उसने मसीह द्वारा हम लोगों को स्वर्ग के हर प्रकार के आध्यात्मिक वरदान प्रदान किये हैं।

4) उसने संसार की सृष्टि से पहले मसीह में हम को चुना, जिससे हम मसीह से संयुक्त हो कर उसकी दृष्टि में पवित्र तथा निष्कलंक बनें।

5) उसने प्रेम से प्रेरित हो कर आदि में ही निर्धारित किया कि हम ईसा मसीह द्वारा उसके दत्तक पुत्र बनेंगे। इस प्रकार उसने अपनी मंगलमय इच्छा के अनुसार

6) अपने अनुग्रह की महिमा प्रकट की है। वह अनुग्रह हमें उसके प्रिय पुत्र द्वारा मिला है,


सुसमाचार : लूकस 1:39-47

39) उन दिनों मरियम पहाड़ी प्रदेश में यूदा के एक नगर के लिए शीघ्रता से चल पड़ी।

40) उसने ज़करियस के घर में प्रवेश कर एलीज़बेथ का अभिवादन किया।

41) ज्यों ही एलीज़बेथ ने मरियम का अभिवादन सुना, बच्चा उसके गर्भ में उछल पड़ा और एलीज़बेथ पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गयी।

42) वह ऊँचे स्वर से बोली उठी, "आप नारियों में धन्य हैं और धन्य है आपके गर्भ का फल!

43) मुझे यह सौभाग्य कैसे प्राप्त हुआ कि मेरे प्रभु की माता मेरे पास आयीं?

44) क्योंकि देखिए, ज्यों ही आपका प्रणाम मेरे कानों में पड़ा, बच्चा मेरे गर्भ में आनन्द के मारे उछल पड़ा।

45) और धन्य हैं आप, जिन्होंने यह विश्वास किया कि प्रभु ने आप से जो कहा, वह पूरा हो जायेगा!"

46) तब मरियम बोल उठी, "मेरी आत्मा प्रभु का गुणगान करती है,

47) मेरा मन अपने मुक्तिदाता ईश्वर में आनन्द मनाता है;

📚 मनन-चिंतन

आज हम माता मरियम के पवित्र नाम का पर्व मानते हैं। मरियम के पवित्र नाम का बखान भक्त विश्वासी मंडली सदियों से करती आ रही है। और आज का यह पर्व हमारी मरियम के प्रति उसी श्रद्धा को दर्शाता है। मरियम के नाम के लगभग सत्तर अलग-अलग अर्थ हैं। उन सब में सबसे आकर्षक अर्थ है - "ईश्वर की प्रिय।"

अपने नाम के अनुरूप ही मरियम ज़रूर ईश्वर की प्रिय रही है। सभी मुष्यों में ईश्वर की मर्ज़ी को पूरी तरह से पूरा करने और ईश्वर को हमेशा प्रसन्न करने में मरियम सदा अग्रणी रहीं है, क्योंकि वह हमेशा पाप से मुक्त थी (निष्कलंक गर्भाधान), और इस तरह हमेशा सर्वशक्तिमान की प्यारी रही। अनंत काल से ईश्वर ने उनसे प्यार किया; प्यार से उसकी श्रष्टि की ; उसके प्रति प्रेम के कारण उसने उन्हें पाप से बचाए रखा; प्रेम के खातिर उसने उसे सब कृपाओं व अनुग्रह से सुशोभित किया। हर दृष्टि से उसका नाम पवित्र है।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि माता कलीसिया उनके नाम का सम्मान करती है। कोई आश्चर्य नहीं कि कलीसिया के संतों और पिताओं ने उसकी प्रशंसा की है। उदाहरण के लिए :

संत बॉनावेन्चर : "धन्य है वह मनुष्य जो तेरे नाम को प्यार करता है, हे! मरियम । हाँ, वास्तव में धन्य है वह जो तेरे प्यारे नाम को प्यार करता है, हे ईश्वर की माँ, तेरा नाम इतना शानदार और सराहनीय है, कि जो कोई, इसका स्मरण करता है, उसे मौत की घडी का कोई डर नहीं। "

तो, प्यारे विश्वासियों, स्वर्ग दूत गेब्रियल की तरह जब-जब हम रोजरी माला विनती करें, हम मरियम का नाम नित पुकारते रहें : "प्रणाम मरिया कृपापूर्ण प्रभु आपके साथ है---," और वह हम पापियों के लिए नित प्रार्थना करती रहेगी।



📚 REFLECTION

Today we honour the holy name of ‘Mary’ the Mother of God. The devout people of God have been honoring the holy name of Mary for centuries. And this feast of today shows the same reverence for our beloved Mother Mary. Mary’s name has about seventy different meanings. The most attractive meaning of them all is - "Beloved of God."

According to this meaning she has definitely been dear to God. In all matters, she has always been at the forefront in fulfilling God's will and pleasing God, as she was always free from sin (immaculate conception), and thus was always beloved of the Almighty. God loved her from the eternity; He created her with love; He kept her from sin because of his love for her; for the great love he adorned her with all the graces. From every point of view her name is sacred.

It is no wonder that the mother Church honors her name; No wonder she is praised by the saints and fathers of the church, for example : Saint Bonaventure: "Blessed is the man who loves your name, O Mary! Yes, indeed blessed is the one who loves your beloved name, O Mother of God, your name is so magnificent and admirable, that whoever honours your name, will have no fear of death.” So, dear brothers and sisters, as we pray, the Rosary, like the angel Gabriel, we keep on calling Mary's name constantly: "Hail Mary, full of Grace, the Lord is with you ---," and she will continue to pray for us sinners.

11 सितंबर का पवित्र वचन

 

11 सितंबर 2020
वर्ष का तेईसवाँ सामान्य सप्ताह, शुक्रवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 9:16-19, 22-27

16) मैं इस पर गौरव नहीं करता कि मैं सुसमाचार का प्रचार करता हूँ। मुझे तो ऐसा करने का आदेश दिया गया है। धिक्कार मुझे, यदि मैं सुसमाचार का प्रचार न करूँ!

17) यदि मैं अपनी इच्छा से यह करता, तो मुझे पुरस्कार का अधिकार होता। किन्तु मैं अपनी इच्छा से यह नहीं करता। मुझे जो कार्य सौंपा गया है, मैं उसे पूरा करता हूँ।

18) तो, पुरस्कार पर मेरा कौन-सा दावा है? वह यह है कि मैं कुछ लिये बिना सुसमाचार का प्रचार करता हूँ और सुसमाचार-सम्बन्धी अपने अधिकारों का पूरा उपयोग नहीं करता।

19) सब लोगों से स्वतन्त्र होने पर भी मैंने अपने को सबों का दास बना लिया है, जिससे मैं अधिक -से-अधिक लोगों का उद्धार कर सकूँ।

20) मैं यहूदियों के लिए यहूदी-जैसा बना, जिससे मैं यहूदियों का उद्धार कर सकँू। जो लोग संहिता के अधीन हैं, उनका उद्धार करने के लिए मैं संहिता के अधीन-जैसा बना, यद्यपि मैं वास्तव में संहिता के अधीन नहीं हूँ।

21) जो लोग संहिता के अधीन नहीं है, उनका उद्धार करने के लिए मैं उनके जैसा बना, यद्यपि मैं मसीह की संहिता के अधीन होने के कारण मैं वास्तव में ईश्वर की संहिता से स्वतन्त्र नहीं हूँ।

22) मैं दुर्बलों के लिए दुर्बल-जैसा बना, जिससे मैं उनका उद्धार कर सकूँ। मैं सब के लिए सब कुछ बन गया हूँ, जिससे किसी-न-किसी तरह कुछ लोगों का उद्धार कर सकूँ।

23) मैं यह सब सुसमाचार के कारण कर रहा हूँ, जिससे मैं भी उसके कृपादानों का भागी बन जाऊँ।

24) क्या आप लोग यह नहीं जानते कि रंगभूमि में तो सभी प्रतियोगी दौड़ते हैं, किन्तु पुरस्कार एक को ही मिलता है? आप इस प्रकार दौड़ें कि पुरस्कार प्राप्त करें।

25) सब प्रतियोगी हर बात में संयम रखते हैं। वे नश्वर मुकुट प्राप्त करने के लिए ऐसा करते हैं, जब कि हम अनश्वर मुकुट के लिए।

26) इसलिए मैं एक निश्चित लक्ष्य सामने रख कर दौड़ता हूँ। मैं ऐसा मुक्केबाज़ हूँ, जो हवा में मुक्का नहीं मारता।

27) मैं अपने शरीर को कष्ट देता हूँ और उसे वश में रखता हूँ। कहीं ऐसा न हो कि दूसरों को प्रवचन देने के बाद स्वयं मैं ही ठुकरा दिया जाऊँ।


सुसमाचार : लूकस 6:39-42

39) ईसा ने उन्हें एक दृष्टान्त सुनाया, "क्या अन्धा अन्धे को राह दिखा सकता है? क्या दोनों ही गड्ढे में नहीं गिर पडेंगे?

40) शिष्य गुरू से बड़ा नहीं होता। पूरी-पूरी शिक्षा प्राप्त करने के बाद वह अपने गुरू-जैसा बन सकता है।

41) "जब तुम्हें अपनी ही आँख की धरन का पता नहीं, तो तुम अपने भाई की आँख का तिनका क्यों देखते हो?

42) जब तुम अपनी ही आँख की धरन नहीं देखते हो, तो अपने भाई से कैसे कह सकते हो, ’भाई! मैं तुम्हारी आँख का तिनका निकाल दूँ?’ ढोंगी! पहले अपनी ही आँख की धरन निकालो। तभी तुम अपने भाई की आँख का तिनका निकालने के लिए अच्छी तरह देख सकोगे।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में प्रभु येसु हम सबसे दूसरों में गलतियां तलाशने से पहले अपनी गिरेबाँह में झाँकने के लिए आह्वान करते हैं। दूसरों में दोष देखना बहुत आसान है पर खुद की कमज़ोरियों पर ध्यान देना और उन्हें स्वीकार करना मुश्किल होता है। यदि आज की आधुनिक फोटोग्राफी तकनिकी की भाषा में बोले, तो हम दुसरों की बुराइयों को हाईलाइट अथवा zoom करके दिखाते हैं पर खुद की कमज़ोरियों को blur कर देते हैं।

दुनिया का नजरिया दूसरों में दोष ढूंढकर उस पर स्पॉट लाइट फोकस करने का होता है परन्तु प्रभु येसु हमारे दोषों व गुनाहों को अपने लहू से ढककर हम पर अपनी दया प्रदर्शित करते हैं. योहन 8:1-11 में हम पढ़ते हैं लोगों को उस व्यभिचारिणी नारी में सिर्फ गुनाह ही दिखा, पर येसु ने उसके गुनाहों पर फोकस न करके उसपर दया की और उसे उस पाप के दल-दल से बहार निकाला। वैसे ही लुकस 19 में हम देखते ज़केउस में लोगों ने सिर्फ एक पापी को ही देखा, परन्तु परन्तु येसु ने उसमे इब्राहम के बेटे को देखा और उसका उद्धार किया।

आइये आज हम विचार करें कि उत्तम क्या है दूसरोंको को दोषी ठहराना या उन पर दया दिखना। किसी को बदनाम करके उसे और अधिक बुराई करने के लिए मज़बूर करना या उसके साथ नरमी से पेश आते हुए उसे प्रेम व दया के साथ सही मार्ग पर लाना। आइये हम जो सही व उत्तम है उसका चयन करें व अपने व औरों के जीवन को सुन्दर बनायें.



📚 REFLECTION

In today's gospel, Jesus calls us to look into our own faults, before looking for the faults of others. It is very easy to see faults in others, but it is difficult to focus on our own weaknesses and accept them. If I speak in the language of today's photography, then, we show the evils of others by highlighting or zooming them, but we tend to blur our own weaknesses.

The trend of the world is to focus the spot light on others by finding faults in them, but Lord Jesus shows his mercy to us by covering our faults and sins with his precious blood. In John 8: 1-11, we read that people saw only sin in that adulterous woman, but Jesus did not focus on her sins and took pity on her and drove her out of the sinful situation. Likewise in Luke 19 we see, in the story of Zacchaeus, people saw only a sinner in him, but Jesus saw Abraham's son in him and saved him.

Let us consider today what is best: to blame others or to show compassion; to discredit someone and force him/her to do more evil or to treat him/her tenderly and to bring him/her to the right path with love and kindness. Let us choose what is right and good and make the life of others beautiful.

10 सितंबर का पवित्र वचन

 

10 सितंबर 2020
वर्ष का तेईसवाँ सामान्य सप्ताह, गुरुवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 8:1ब-7, 11-13

1) अब देवताओं को अर्पित मांस के विषय में। हम सबों को ज्ञान प्राप्त है- यह मानी हुई बात है; किन्तु ज्ञान घमण्डी बनाता है, जब कि प्रेम निर्माण करता है।

2) यदि कोई समझता है कि वह कुछ जानता है, तो वह अब तक यह नहीं जानता कि किस प्रकार जानना चाहिए।

3) किन्तु यदि कोई ईश्वर को प्यार करता है, तो वह ईश्वर द्वारा अपनाया गया है।

4) देवताओं को अर्पित मांस खाने के विषय में हम जानते हैं कि विश्व भर में वास्तव में किसी देवी-देवता का अस्तित्व नहीं है-एक मात्र ईश्वर के अतिरिक्त कोई ईश्वर नहीं है।

5) यद्यपि भले ही आकाश में या पृथ्वी पर तथाकथित देवता हों, और सच पूछिए तो इस प्रकार के बहुत-से देवता और प्रभु हैं;

6) फिर भी हमारे लिए तो एक ही ईश्वर है- वह पिता, जिस से सब कुछ उत्पन्न होता है और जिसके पास हमें जाना है- और एक ही प्रभु है, अर्थात ईसा मसीह, जिनके द्वारा सब कुछ बना है और हम भी उन्हीं के द्वारा।

7) परन्तु यह ज्ञान सबों को प्राप्त नहीं है। कुछ लोग हाल में मूर्तिपूजक थे। वे वह मांस देवता को अर्पित समझ कर खाते हैं और उनका अन्तःकरण दुर्बल होने के कारण दूषित हो जाता है।

11) इस तरह आपके ’ज्ञान’ के कारण उस दुर्बल भाई का विनाश होता है, जिसके लिए मसीह मरे।

12) भाइयो के विरुद्ध इस प्रकार पाप करने और उनके दुर्बल अन्तकरण को आघात पहुँचाने से आप मसीह के विरुद्ध पाप करते हैं।

13) इसलिए यदि मेरा भोजन मेरे भाई के लिए पाप का कारण बनता है, तो मैं फिर कभी मांस नहीं खाऊँगा। कहीं ऐसा न हो कि मैं अपने भाई के लिए पाप का कारण बन जाऊँ।


सुसमाचार : लूकस 6:27-38

27) "मैं तुम लोगों से, जो मेरी बात सुनते हो, कहता हूँ-अपने शत्रुओं से प्रेम करो। जो तुम से बैर करते हैं, उनकी भलाई करो।

28) जो तुम्हें शाप देते है, उन को आशीर्वाद दो। जो तुम्हारे साथ दुव्र्यवहार करते हैं, उनके लिए प्रार्थना करो।

29) जो तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारता है, दूसरा भी उसके सामने कर दो। जो तुम्हारी चादर छीनता है, उसे अपना कुरता भी ले लेने दो।

30) जो तुम से माँगता है, उसे दे दो और जो तुम से तुम्हारा अपना छीनता है, उसे वापस मत माँगो।

31) दूसरों से अपने प्रति जैसा व्यवहार चाहते हो, तुम भी उनके प्रति वैसा ही किया करो।

32) यदि तुम उन्हीं को प्यार करते हो, जो तुम्हें प्यार करते हैं, तो इस में तुम्हारा पुण्य क्या है? पापी भी अपने प्रेम करने वालों से प्रेम करते हैं।

33) यदि तुम उन्हीं की भलाई करते हो, जो तुम्हारी भलाई करते हैं, तो इस में तुम्हारा पुण्य क्या है? पापी भी ऐसा करते हैं।

34) यदि तुम उन्हीं को उधार देते हो, जिन से वापस पाने की आशा करते हो, तो इस में तुम्हारा पुण्य क्या है? पूरा-पूरा वापस पाने की आशा में पापी भी पापियों को उधार देते हैं।

35) परन्तु अपने शत्रुओं से प्रेम करो, उनकी भलाई करो और वापस पाने की आशा न रख कर उधार दो। तभी तुम्हारा पुरस्कार महान् होगा और तुम सर्वोच्च प्रभु के पुत्र बन जाओगे, क्योंकि वह भी कृतघ्नों और दुष्टों पर दया करता है।

36) "अपने स्वर्गिक पिता-जैसे दयालु बनो। दोष न लगाओ और तुम पर भी दोष नहीं लगाया जायेगा।

37) किसी के विरुद्ध निर्णय न दो और तुम्हारे विरुद्ध भी निर्णय नहीं दिया जायेगा। क्षमा करो और तुम्हें भी क्षमा मिल जायेगी।

38) दो और तुम्हें भी दिया जायेगा। दबा-दबा कर, हिला-हिला कर भरी हुई, ऊपर उठी हुई, पूरी-की-पूरी नाप तुम्हारी गोद में डाली जायेगी; क्योंकि जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिए भी नापा जायेगा।"

📚 मनन-चिंतन

आज, प्रभु का सुसमाचार हमें हमारे दुश्मनों से प्यार करने के लिए आह्वान कर रहा है और इसके तुरंत बाद, यह इस आज्ञा के तीन सकारात्मक उदाहरण देता है: जो लोग आपसे घृणा करते हैं, उनका भला करें, जो आपको शाप देते हैं उन्हें आशीर्वाद दें, जो आपका अपमान करते हैं उनके लिए प्रार्थना करें। इस आज्ञा का पालन करना मुश्किल सा लगता है: हम उन लोगों से कैसे प्यार कर सकते हैं जो हमसे प्यार नहीं करते? ये तो बहुत ज्यादा ही हो गया; हम उन लोगों से प्यार कैसे कर सकते हैं जिन्हें हम जानते हैं कि वे हमसे नफरत करते हैं? इस तरह से प्यार करना मानवीय बुद्धि व सोच द्वारा संभव नहीं, यह तो ईश्वर की ओर से एक तोहफा है, ईश्वर की कृपा से ही यह संभव है। इस कृपा को पाने के लिए हमें खुद को ईश्वर के सामने खोलने की ज़रूरत है।

इन सब को संभव करने के लिए येसु ने एक संक्षिप्त सारगर्भित स्वर्णिम कहावत पेश की है : सभी धर्मों में एक स्वर्णिम कहावत है: दूसरों के साथ वह मत करो जो तुम नहीं चाहोगे कि दूसरे तुम्हारे लिए करें। हालाँकि, येसु ने इसे उन सबसे हटकर प्रस्तुत किया है, उन्होंने इसे सकारात्मक रूप दिया : "दूसरों से अपने प्रति जैसा व्यव्हार चाहते हो, तुम भी उनके प्रति वैसा ही किया करो" (लूकस 6:31)। यह सुनहरा नियम सभी नैतिकताओं का आधार है। एक छोटी सी कविता पर टिप्पणी करते हुए, सेंट जॉन ख्रिसोस्तम कहते है: " येसु ने केवल यह नहीं कहा:‘ दूसरों के बारे में भला सोचना, बल्कि दूसरों का भला करना’; यही कारण है कि, येसु द्वारा प्रस्तावित स्वर्णीम नियम के अनुसार हमें केवल अच्छे की इच्छा अथवा सोच तक सीमित नहीं रहना चाहिए वरन हमें इसका अनुवाद अपने कर्मों में करना चाहिए।


📚 REFLECTION

Today, the gospel of the Lord is asking us to love our enemies. And, shortly thereafter, it gives three positive examples of this commandment: bless those who hate you, bless those who curse you, pray for those who insult you. It seems difficult to obey this command: How can we love those who do not love us? This is too much; how can we love those, we know who hate us? Loving in this way is not possible through human intelligence and thinking, it is a gift from God; it is possible only by the grace of God. To receive this grace, we need to open ourselves to God. To make all of this possible, Jesus has introduced a short golden rule.

Most religions have a golden maxim: “Do not do unto others what you would not want others to do unto you”. Jesus, however, is the only one to formulate it positively: “Do to others as you would have others do to you”(Lk 6:31). This golden rule is the basis for all morals. Commenting on this little verse, St. John Chrysostom says: “There is even more, for Jesus did not only say: ‘wish good to others’, but ‘do good to others”; this is why, the golden maxim proposed by Jesus cannot just remain as wishful thinking, but it must be translated into deeds.

9 सितंबर का पवित्र वचन

 

09 सितंबर 2020
वर्ष का तेईसवाँ सामान्य सप्ताह, बुधवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 7:25-31

25) कुँवारियों के विषय में मुझे प्रभु की ओर से कोई आदेश नहीं मिला है, किन्तु प्रभु की दया से विश्वास के योग्य होने के नाते मैं अपनी सम्मति दे रहा हूँ।

26) मैं समझता हूँ कि वर्तमान संकट में यही अच्छा है कि मनुष्य जिस स्थिति में है, उसी स्थिति में रहे।

27) आपने किसी स्त्री से विवाह किया है? तो उस से मुक्त होने का प्रयत्न न करें। आपकी पत्नी का देहान्त हुआ है? तो दूसरी की खोज न करें।

28) यदि आप विवाह करते हैं, तो इस में कोई पाप नहीं और यदि कुँवारी विवाह करती है, तो वह पाप नहीं करती। किन्तु ऐसे लोग अवश्य ही विवाहित जीवन की झंझटें मोल लेते हैं- इन से मैं आप लोगों को बचाना चाहता हूँ।

29) भाइयो! मैं आप लोगों से यह कहता हूँ - समय थोड़ा ही रह गया है। अब से जो विवाहित हैं, वे इस तरह रहे मानो विवाहित नहीं हों;

30) जो रोते है, मानो रोते नहीं हो; जो आनन्द मनाते हैं, मानो आनन्द नहीं मनाते हों; जो खरीद लेते हैं, मानो उनके पास कुछ नहीं हो;

31) जो इस दुनिया की चीज़ों का उपभोग करते है, मानो उनका उपभोग नहीं करते हों; क्योंकि जो दुनिया हम देखते हैं, वह समाप्त हो जाती है।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस 6:20-26

20) ईसा ने अपने शिष्यों की ओर देख कर कहा, ’’धन्य हो तुम, जो दरिद्र हो! स्वर्गराज्य तुम लोगों का है।

21) धन्य हो तुम, जो अभी भूखे हो! तुम तृप्त किये जाओगे। धन्य हो तुम, जो अभी रोते हो! तुम हँसोगे।

22) धन्य हो तुम, जब मानव पुत्र के कारण लोग तुम से बैर करेंगे, तुम्हारा बहिष्कार और अपमान करेंगे और तुम्हारा नाम घृणित समझ कर निकाल देंगे!

23) उस दिन उल्लसित हो और आनन्द मनाओ, क्योंकि स्वर्ग में तुम्हें महान् पुरस्कार प्राप्त होगा। उनके पूर्वज नबियों के साथ ऐसा ही किया करते थे।

24) ’’धिक्कार तुम्हें, जो धनी हो! तुम अपना सुख-चैन पा चुके हो।

25) धिक्कार तुम्हें, जो अभी तृप्त हो! तुम भूखे रहोगे। धिक्कार तुम्हें, जो अभी हँसते हो! तुम शोक मनाओगे और रोओगे।

26) धिक्कार तुम्हें, जब सब लोग तुम्हारी प्रशंसा करते हैं! उनके पूर्वज झूठे नबियों के साथ ऐसा ही किया करते थे।

📚 मनन-चिंतन

आज,येसु हमें बताते हैं कि हमारे जीवन में सच्ची खुशी हमें कहाँ से मिलती है। आशीर्वचन और धिक्कार के द्वारा प्रभु येसु दो मार्गों के सिद्धांत को लागू करते है: जीवन का मार्ग और मृत्यु का तथ्य। तीसरी और तटस्थ संभावना नहीं है: वह जो जीवन के मार्ग का अनुसरण नहीं करता है वह मृत्यु के मार्ग की ओर अग्रसर है; जो प्रकाश का पालन नहीं करता, वह अंधकार में रहता है।

आशीर्वचन में येसु कहते हैं धन्य हो तुम, जो दरिद्र हो ! स्वर्ग राज्य तुम लोगों का है। (लूकस 6:29)। यह आशीर्वचन अन्य सभी का आशीर्वचन आधार है, क्योंकि जो गरीब है वह उपहार के रूप में ईश्वर का राज्य प्राप्त करने में सक्षम होगा। वह जो गरीब है उसे एहसास होगा कि उसे भूखा और प्यासा होना चाहिए: भौतिक चीजों का नहीं, बल्कि परमेश्वर के वचन के लिए; सत्ता के लिए नहीं, पर प्रेम और न्याय के लिए । जो गरीब है वह दुनिया की तकलीफों को अपने जीवन में अनुभव कर सकता है। जो दरिद्र है, उसे पता होगा कि ईश्वर ही उसकी सारी दौलत है और ईश्वर की वजह से दुनिया उसे नहीं समझेगी और उसे परेशान करेगी।

धिक्कार तुम्हें जो धनी हो ! तुम अपना सुख चैन पा चुके हो। (लूकस 6:24)। यह धिक्कार भी अन्य सभी धिक्कारों के लिए आधार है: क्योंकि जो समृद्ध और आत्मनिर्भर है,वह दूसरों की सेवा में अपना धन नहीं लगाना चाहता, वह सिर्फ अपने स्वार्थ की पूर्ति पर ही ध्यान देता है। जो संसार पर भरोसा करता है उसका हृदय ईश्वर से विमुख हो जाता है। जिसने इस संसार में अपनी दौलत का सुख भोगा और ईश्वर को भूलाया है वह आने वाले संसार में कुछ भी हासिल नहीं करेगा।

आइये हम स्वर्ग राज्य को हासिल करना अपनी प्राथमिकता माने और सांसारिक चीजों के मोह से बचें।



📚 REFLECTION

Today, Jesus explains how we get the true happiness in our lives. Through beatitudes and woes, Lord applies the principle of two paths: the way of life and the fact of death. There is no third and neutral possibility: He who does not follow the path of life is leading to the path of death; He, who does not follow light, lives in darkness. In blessings or beatitudes, Jesus says - blessed are you who are poor! The kingdom of heaven belongs to you. (Luke 6:29). This beatitude is the basis of all others, because the poor one will be able to receive the kingdom of God as a gift. He, who is poor, will realize that he must be hungry and thirsty: not for material things, but for the word of God; not for power, but for love and justice. One who is poor can experience the sufferings of the world in his life. He, who is poor, will know that God is all his wealth and because of God the world will not understand him and persecute him.

‘But woe to you who are rich, for you have received your consolation.(Luke 6:24). This woe is also like vice the basis for all other woes: because he who is rich and self-sufficient does not want to invest his wealth in the service of others, he only pays attention to the fulfillment of his selfishness. Who trusts the world his heart turns away from God. Whoever has enjoyed the happiness of his wealth in this world and has forgotten God, will not achieve anything in the world to come.

Let us make the kingdom of heaven our priority and avoid the temptation of worldly things.

8 सितंबर का पवित्र वचन

08 सितंबर 2020

धन्य कुँवारी मरियम का जन्मोत्सव



🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥



📒 पहला पाठ : मीकाह 5:1-4

1) बेथलेहेम एफ्राता! तू यूदा के वंशों में छोटा है। जो इस्राएल का शासन करेगा, वह मेरे लिए तुझ में उत्पन्न होग। उसकी उत्पत्ति सुदूर अतीत में, अत्यन्त प्राचीन काल में हुई है।


2) इसलिए प्रभु उन्हें तब तक त्याग देगा, जब तक उसकी माता प्रसव न करे। तब उसके बचे हुए भाई इस्राएल के लोगों से मिल जायेंगे।


3) वह उठ खडा हो जायेगा, वह प्रभु के सामर्थ्य से तथा अपने ईश्वर के नाम प्रताप से अपना झुण्ड चरायेगा। वे सुरक्षा में जीवन बितायेंगे, क्योंकि वह देश के सीमान्तों तक अपना शासन फैलायेगा


4) और शांति बनाये रखेगा। जब अस्सूरी लोग हमारे देश पर आक्रमण करेंगे और हमारी भूमि में घुसपैठ करेंगे, तब हम उनके विरुद्ध सात चरवाहों और आठ शासकों को नियुक्त करेंगे।


अथवा - पहला पाठ : रोमियो 8:28-30

28) हम जानते हैं कि जो लोग ईश्वर को प्यार करते हैं और उसके विधान के अनुसार बुलाये गये हैं, ईश्वर उनके कल्याण के लिए सभी बातों में उनकी सहायता करता है;


29) क्योंकि ईश्पर ने निश्चित किया कि जिन्हें उसने पहले से अपना समझा, वे उसके पुत्र के प्रतिरूप बनाये जायेंगे, जिससे उसका पुत्र इस प्रकार बहुत-से भाइयों का पहलौठा हो।


30) उसने जिन्हें पहले से निश्चित किया, उन्हें बुलाया भी है: जिन्हें बुलाया, उन्हें पाप से मुक्त भी किया है और जिन्हें पाप से मुक्त किया, उन्हें महिमान्वित भी किया है।



सुसमाचार : मत्ती 1:1-6, 18-23

(1) इब्राहीम की सन्तान, दाऊद के पुत्र, ईसा मसीह की वंशावली।


(2) इब्राहीम से इसहाक उत्पन्न हुआ, इसहाक से याकूब, याकूब से यूदस और उसके भाई,


(3) यूदस और थामर से फ़़ारेस और ज़़ारा उत्पन्न हुए। फ़़ारेस से एस्रोम, एस्रोम से अराम,


(4) अराम से अमीनदाब, अमीनदाब से नास्सोन, नास्सोन से सलमोन,


(5) सलमोन और रखाब से बोज़़, बोज़ और रूथ से ओबेद, ओबेद से येस्से,


(6) येस्से से राजा दाऊद उत्पन्न हुआ। दाऊद और उरियस की विधवा से सुलेमान उत्पन्न हुआ।


(18) ईसा मसीह का जन्म इस प्रकार हुआ। उनकी माता मरियम की मँगनी यूसुफ से हुई थी, परंतु ऐसा हुआ कि उनके एक साथ रहने से पहले ही मरियम पवित्र आत्मा से गर्भवती हो गयी।


(19) उसका पति यूसुफ चुपके से उसका परित्याग करने की सोच रहा था, क्योंकि वह धर्मी था और मरियम को बदनाम नहीं करना चाहता था।


(20) वह इस पर विचार कर ही रहा था कि उसे स्वप्न में प्रभु का दूत यह कहते दिखाई दिया, "यूसुफ! दाऊद की संतान! अपनी पत्नी मरियम को अपने यहाँ लाने में नहीं डरे,क्योंकि उनके जो गर्भ है, वह पवित्र आत्मा से है।


(21) वे पुत्र प्रसव करेंगी और आप उसका नाम ईसा रखेंगें, क्योंकि वे अपने लोगों को उनके पापों से मुक्त करेगा।"


(22) यह सब इसलिए हुआ कि नबी के मुख से प्रभु ने जो कहा था, वह पूरा हो जाये -


(23) देखो, एक कुँवारी गर्भवती होगी और पुत्र प्रसव करेगी, और उसका नाम एम्मानुएल रखा जायेगा, जिसका अर्थ हैः ईश्वर हमारे साथ है।


📚 मनन-चिंतन

हम सबों की ज़िन्दगी में माँ की भूमिका बहुत ही अहम होती है। माँ के बिना हमारा सँसार अधूरा रहता है, हमारी खुशियाँ अधूरी रहती है। जब हम छोटे थे तो माँ की उपस्तिथि हममें हिम्मत व आश्वासन देती थी कि मेरा माँ है तो मैं सुरक्षित हूँ।


आज हमारे लिए बड़ी ख़ुशी का दिन है क्योंकि आज हम हमारी स्वर्गिक माँ का जन्मदिन मना रहे हैं जिन्हें ईश्वर ने जन्म से ही पवित्र ठहराया और अपने एकलौते बेटे की माँ बनने के लिए तैयार किया। येसु को इस संसार में आने की तैयारी कई सालों पूर्व हो चुकी थी, जिसके बारे में आज के सुसमाचर में संत मत्ती हमें बतलाते हैं। प्रभु की वंशावली में सब प्रकार के लोग शामिल हैं : धर्मी, अधर्मी, धोखेबाज, हत्यारे, कवी, राजा, भीतरी लोग, और बाहरी लोग सब येसु के आगमन की तयारी करते हैं। पूर्वजों में ज़रूर कमियां-घाटियां थी पर ईश्वर ने अपने बेटे के लिए एक निष्कलंक गर्भ को चुना। जी हाँ येसु की वंशावली में बाकि सब मानवीय पिता से उत्पन्न हुए पर येसु के बारे में लिखा है - "याकूब से मरियम का पति युसूफ, और मरियम से येसु उतपन्न हुए, जो मसीह कहलाते हैं। " (मत्ती 1:16) पवित्र बाइबल यह स्पष्ट करती है कि येसु का जन्म किसी पुरुष से न होकर, पवित्र आत्मा के सामर्थ्य से हुआ। मरियम ने कहा -" देख मैं प्रभु की दासी हूँ आपका कथन मुझमे पूरा हो। " ऐसा कहकर उन्होंने अपने जीवन को पूर्ण रूप से ईश्वर को सौंप दिया और अपने आप को आत्मा के अभिषेक के लिए पूरी तरह से खोल दिया। उस पूर्ण समर्पण व खुलेपन में आत्मा उनपर भरपूरि से उतरा और ईश्वर का बेटा येसु उनकी कोख में आ गया।


आज हम सब को आत्मा के अभिषेक की ज़रूरत है। आत्मा से भरकर ही हम येसु के सच्चे अनुयाई बन सकते हैं। आत्मा से भरकर ही मरियम ने येसु को पाया, आत्मा से भरकर ही येसु ने सेवकाई की शुरुआत की और आत्मा से भरकर ही चेलों ने प्रचार प्रारम्भ किया। तो आइये हम हमारी स्वर्गीय माता की तरह बिना किसी शर्त के खुद को ईश्वर के लिए समर्पित करें और एक आत्मामय जीवन जियें और अपने जीवन में हमेशा येसु से भरपूर रहें।

🖼️REFLECTION

Mother's role is very important in the life of all of us. Without mother, our world remains incomplete, our happiness remains incomplete. When we were young, Mother's presence used to give us courage and assurance that I am safe, if I have a mother. Today is a very happy day for us because today we are celebrating the birthday of our heavenly mother, whom God had sanctified since birth and prepared her to be the mother of his only son. Jesus made a preparation of many years to come into this world, about which St. Matthew tells us in today's Gospel. The genealogy of the Lord includes all sorts of people: the righteous, the unrighteous, the traitors, the murderers, the poet, the king, the insider, and the outsiders all prepare for the arrival of Jesus. The ancestors certainly had their own weaknesses, but at the end God chose a spotless womb for his son. Yes, in the lineage of Jesus, all the others were born of a human father, but it is written about Jesus - and Jacob the father of Joseph the husband of Mary, of whom Jesus was born, who is called the Messiah (Matthew 1:16) Holy Bible makes it clear that Jesus was born, not of man, but by the power of the Holy Spirit. Mary said – “Here am I, the servant of the Lord; let it be with me according to your word.” By saying this, she surrendered her life completely to God and opened herself completely for the anointing of the Holy Spirit. In that complete surrender and openness, the Spirit came upon him and the son of God, Jesus, came into her womb. Today we all need the anointing of the Holy Spirit. Only by being filled with the Holy Spirit will we become true followers of Jesus. Mary found Jesus only when she was filled with Spirit; Jesus started his puplic ministry only by filling with Holy Spirit. The disciples started preaching only when they were filled with Spirit. So, like our heavenly mother, let us surrender ourselves unconditionally to God and live a spirit in the Spirit so that our life may become Christ centered like Mother Mary.

7 सितंबर का पवित्र वचन

 

07 सितंबर 2020
वर्ष का तेईसवाँ सामान्य सप्ताह, सोमवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 5:1-8

1) आप लोगों के बीच हो रहे व्यभिचार की चरचा चारों और फैल गयी है- ऐसा व्यभिचार जो गैर-यहूदियों में भी नहीं होता। किसी ने अपने पिता की पत्नी को रख लिया है।

2) तब भी आप घमण्ड में फूले हुए हैं! आप को शोक मनाना और जिसने यह काम किया, उसका बहिष्कार करना चाहिए था।

3) मैं शरीर से अनुपस्थित होते हुए भी आत्मा से आप लोगों के बीच हूँ। जिसने यह काम किया है, मैं उसका न्याय कर चुका हूँ, मानों मैं वास्तव में वहाँ उपस्थित हूँ।

4) और मेरा निर्णय यह है: प्रभु ईसा के नाम पर हम-अर्थात् आप लोग और मैं आत्मा से - एकत्र हो जायेंगे

5) और अपने प्रभु ईसा के अधिकार से उस व्यक्ति को शैतान के हवाले कर देंगे, जिससे उसके शरीर का विनाश हो, किन्तु प्रभु के दिन उसकी आत्मा का उद्धार हो।

6) आप लोगों का आत्मसन्तोष आप को शोभा नहीं देता। क्या आप यह नहीं जानते कि थोड़ा-सा ख़मीर सारे सने हुए आटे को ख़मीर बना देता है?

7) आप पुराना ख़मीर निकाल कर शुद्ध हो जायें, जिससे आप नया सना हुआ आटा बन जायें। आप को बेख़मीर रोटी-जैसा बनना चाहिए क्योंकि हमारा पास्का का मेमना अर्थात् मसीह बलि चढ़ाये जा चुके हैं।

8) इसलिए हमें न तो पुराने खमीर से और न बुराई और दुष्टता के खमीर से बल्कि शुद्धता और सच्चाई की बेख़मीर रोटी से पर्व मनाना चाहिए।


सुसमाचार : लूकस 6:6-11

6) किसी दूसरे विश्राम के दिन ईसा सभागृह जा कर शिक्षा दे रहे थे। वहाँ एक मनुष्य था, जिसका दायाँ हाथ सूख गया था।

7) शास्त्री और फ़रीसी इस बात की ताक में थे कि यदि ईसा विश्राम के दिन किसी को चंगा करें, तो हम उन पर दोष लगायें।

8) ईसा ने उनके विचार जान कर सूखे हाथ वाले से कहा, "उठो और बीच में खड़े हो जाओ"। वह उठ खड़ा हो गया।

9) ईसा ने उन से कहा, "मैं तुम से पूछ़ता हूँ-विश्राम के दिन भलाई करना उचित है या बुराई, जान बचाना या नष्ट करना?"

10) तब उन सबों पर दृष्टि दौड़ा कर उन्होंने उस मनुष्य से कहा, "अपना हाथ बढ़ाओ"। उसने ऐसा किया और उसका हाथ अच्छा हो गया।

11) वे बहुत क्रुद्ध हो गये और आपस में परामर्श करते रहे कि हम ईसा के विरुद्ध क्या करें।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में प्रभु येसु एक सूखे हाथ वाले को विश्राम दिवस के दिन चंगा करता हैं। येसु के प्रतिद्वंदी इस ताक में रहते हैं कि वे उन पर यह दोष लगाए कि उन्होंने विश्राम दिवस के नियम को तोडा है। प्रभु येसु उनके मन की बात जानते थे फिर भी वे उनके भय से भलाई का कार्य करने से पीछे नहीं हटे। वे सब प्रकार के बंधनों से मनुष्यों को छुड़ाने आये थे। यहाँ पर वे ना केवल उस सूखे हाथ वाले को बंधन मुक्त करते हैं पर शास्त्री और फरीसियों के धर्मान्धता के बंधन को तोड़ते हुए उन्हें ये सिखलाते हैं कि मनुष्य का जीवन और उनका कल्याण नियमों से ऊपर होता है। दूसरे शब्दों में नियम मनुष्यों के हित और कल्याण के लिए होने चाहिए और कोई भी नियम यदि मनुष्यों को इससे वंचित करता है तो ऐसी स्थिति में उस नियम के विरुद्ध जाकर मानव कल्याण के कार्य करना उचित है।

हमारे जीवन में कई बार हम भले कार्य करने की ख्वाहिश तो रखते हैं परन्तु लोकलज्जा और भय के कारण कर नहीं पाते। हम उस व्यक्ति के जीवन और उसकी समस्याओं की गंभीरता पर ध्यान न देकर लोगों की क्रिया-प्रतिक्रिया पर ध्यान देते हैं कि यदि मैं ऐसा करूँगा तो कोई क्या कहेगा; कोई मेरा विरोध तो नहीं करेगा; कोई मेरा मज़ाक तो नहीं उड़ाएगा आदि। प्रभु येसु को दूसरों को जीवन देने, चंगाई देने, और बंधनों से छुटकारा देने में कोई भी व्यक्ति या नियम आड़े नहीं आया। हम भी जीवन में जो उचित है, भला है, और दूसरों के कल्याण के लिए है उसे करने में कभी पीछे नहीं हटें।