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7 सितंबर का पवित्र वचन

 

07 सितंबर 2020
वर्ष का तेईसवाँ सामान्य सप्ताह, सोमवार

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📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 5:1-8

1) आप लोगों के बीच हो रहे व्यभिचार की चरचा चारों और फैल गयी है- ऐसा व्यभिचार जो गैर-यहूदियों में भी नहीं होता। किसी ने अपने पिता की पत्नी को रख लिया है।

2) तब भी आप घमण्ड में फूले हुए हैं! आप को शोक मनाना और जिसने यह काम किया, उसका बहिष्कार करना चाहिए था।

3) मैं शरीर से अनुपस्थित होते हुए भी आत्मा से आप लोगों के बीच हूँ। जिसने यह काम किया है, मैं उसका न्याय कर चुका हूँ, मानों मैं वास्तव में वहाँ उपस्थित हूँ।

4) और मेरा निर्णय यह है: प्रभु ईसा के नाम पर हम-अर्थात् आप लोग और मैं आत्मा से - एकत्र हो जायेंगे

5) और अपने प्रभु ईसा के अधिकार से उस व्यक्ति को शैतान के हवाले कर देंगे, जिससे उसके शरीर का विनाश हो, किन्तु प्रभु के दिन उसकी आत्मा का उद्धार हो।

6) आप लोगों का आत्मसन्तोष आप को शोभा नहीं देता। क्या आप यह नहीं जानते कि थोड़ा-सा ख़मीर सारे सने हुए आटे को ख़मीर बना देता है?

7) आप पुराना ख़मीर निकाल कर शुद्ध हो जायें, जिससे आप नया सना हुआ आटा बन जायें। आप को बेख़मीर रोटी-जैसा बनना चाहिए क्योंकि हमारा पास्का का मेमना अर्थात् मसीह बलि चढ़ाये जा चुके हैं।

8) इसलिए हमें न तो पुराने खमीर से और न बुराई और दुष्टता के खमीर से बल्कि शुद्धता और सच्चाई की बेख़मीर रोटी से पर्व मनाना चाहिए।


सुसमाचार : लूकस 6:6-11

6) किसी दूसरे विश्राम के दिन ईसा सभागृह जा कर शिक्षा दे रहे थे। वहाँ एक मनुष्य था, जिसका दायाँ हाथ सूख गया था।

7) शास्त्री और फ़रीसी इस बात की ताक में थे कि यदि ईसा विश्राम के दिन किसी को चंगा करें, तो हम उन पर दोष लगायें।

8) ईसा ने उनके विचार जान कर सूखे हाथ वाले से कहा, "उठो और बीच में खड़े हो जाओ"। वह उठ खड़ा हो गया।

9) ईसा ने उन से कहा, "मैं तुम से पूछ़ता हूँ-विश्राम के दिन भलाई करना उचित है या बुराई, जान बचाना या नष्ट करना?"

10) तब उन सबों पर दृष्टि दौड़ा कर उन्होंने उस मनुष्य से कहा, "अपना हाथ बढ़ाओ"। उसने ऐसा किया और उसका हाथ अच्छा हो गया।

11) वे बहुत क्रुद्ध हो गये और आपस में परामर्श करते रहे कि हम ईसा के विरुद्ध क्या करें।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में प्रभु येसु एक सूखे हाथ वाले को विश्राम दिवस के दिन चंगा करता हैं। येसु के प्रतिद्वंदी इस ताक में रहते हैं कि वे उन पर यह दोष लगाए कि उन्होंने विश्राम दिवस के नियम को तोडा है। प्रभु येसु उनके मन की बात जानते थे फिर भी वे उनके भय से भलाई का कार्य करने से पीछे नहीं हटे। वे सब प्रकार के बंधनों से मनुष्यों को छुड़ाने आये थे। यहाँ पर वे ना केवल उस सूखे हाथ वाले को बंधन मुक्त करते हैं पर शास्त्री और फरीसियों के धर्मान्धता के बंधन को तोड़ते हुए उन्हें ये सिखलाते हैं कि मनुष्य का जीवन और उनका कल्याण नियमों से ऊपर होता है। दूसरे शब्दों में नियम मनुष्यों के हित और कल्याण के लिए होने चाहिए और कोई भी नियम यदि मनुष्यों को इससे वंचित करता है तो ऐसी स्थिति में उस नियम के विरुद्ध जाकर मानव कल्याण के कार्य करना उचित है।

हमारे जीवन में कई बार हम भले कार्य करने की ख्वाहिश तो रखते हैं परन्तु लोकलज्जा और भय के कारण कर नहीं पाते। हम उस व्यक्ति के जीवन और उसकी समस्याओं की गंभीरता पर ध्यान न देकर लोगों की क्रिया-प्रतिक्रिया पर ध्यान देते हैं कि यदि मैं ऐसा करूँगा तो कोई क्या कहेगा; कोई मेरा विरोध तो नहीं करेगा; कोई मेरा मज़ाक तो नहीं उड़ाएगा आदि। प्रभु येसु को दूसरों को जीवन देने, चंगाई देने, और बंधनों से छुटकारा देने में कोई भी व्यक्ति या नियम आड़े नहीं आया। हम भी जीवन में जो उचित है, भला है, और दूसरों के कल्याण के लिए है उसे करने में कभी पीछे नहीं हटें।

6 सितंबर का पवित्र वचन

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06 सितंबर 2020
वर्ष का तेईसवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार

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📒 पहला पाठ : एज़ेकिएल 33:7-9

7) “मानवपुत्र! मैंने तुम को इस्राएल के घराने का पहरेदार नियुक्त किया है। तुम मेरी वाणी सुनोगे और इस्रएलियों को मेरी ओर से चेतावनी दोगे।

8) यदि मैं किसी दुष्ट से कहूँ, ’दुष्ट तू मर जायेगा’ और तुम कुमार्ग छोड़ने के लिए उसे चतावनी नहीं दोगे, तो वह अपने पाप के कारण मर जायेगा, किन्तु तुम उसकी मृत्यु के लिए उत्तरदायी होगे।

9) और यदि तुमने कुमार्ग छोड़ने के लिए उसे चेतावनी दी और उसने नहीं छोड़ा, तो वह अपने पाप के कारण मर जायेगा, किन्तु तुम्हारा जीवन सुरक्षित रह जायेगा।

📕 दूसरा पाठ : रोमियों 13:8-10

8) भातृप्रेम का ऋण छोड़कर और किसी बात में किसी के ऋणी न बनें। जो दूसरों को प्यार करता है, उसने संहिता के सभी नियमों का पालन किया है।

9 ’व्यभिचार मत करो, हत्या मत करो, चोरी मत करो, लालच मत करो’ -इनका तथा अन्य सभी दूसरी आज्ञाओं का सारांश यह है- अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो।

10) प्रेम पड़ोसी के साथ अन्याय नहीं करता। इसलिए जो प्यार करता है, वह संहिता के सभी नियमों का पालन करता है।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 18:15-20

15) ’’यदि तुम्हारा भाई कोई अपराध करता है, तो जा कर उसे अकेले में समझाओ। यदि वह तुम्हारी बात मान जाता है, तो तुमने अपनी भाई को बचा लिया।

16) यदि वह तुम्हारी बात नहीं मानता, तो और दो-एक व्यक्तियों को साथ ले जाओ ताकि दो या तीन गवाहों के सहारे सब कुछ प्रमाणित हो जाये।

17) यदि वह उनकी भी नहीं सुनता, तो कलीसिया को बता दो और यदि वह कलीसिया की भी नहीं सुनता, तो उसे गैर-यहूदी और नाकेदार जैसा समझो।

18) मैं तुम से कहता हूँ- तुम लोग पृथ्वी पर जिसका निषेध करोगे, स्वर्ग में भी उसका निषेध रहेगा और पृथ्वी पर जिसकी अनुमति दोगे, स्वर्ग में भी उसकी अनुमति रहेगी।

19) ’’मैं तुम से यह भी कहता हूँ- यदि पृथ्वी पर तुम लोगों में दो व्यक्ति एकमत हो कर कुछ भी माँगेगे, तो वह उन्हें मेरे स्वर्गिक पिता की और से निश्चय ही मिलेगा;

20) क्योंकि जहाँ दो या तीन मेरे नाम इकट्टे होते हैं, वहाँ में उनके बीच उपस्थित रहता हूँ।’’

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में प्रभु येसु ने हमें भाई के सुधार के विषय में बताया है। जब आपक किसी का सुधार करते हैं और वह आपकी मानने को तैयार नहीं होता है तो, दो या तीन व्यक्तियों को बुलाके समझाओ, फिर भी ना समझे तो कलीसिया को बता दो। यह सब कहकर येसु अपने शिष्यों से कह रहे थे की किसी को सही मार्ग पर लाने का भरपूर प्रयास करना चाहिए। यह आवश्यक नहीं कि आपके एक बार कहने पर कोई तुरंत सही मार्ग पर आ जाये।

हम चाहे तो बहुतों को स्वर्ग राज्य में ला सकते हैं और इसके विपरीत हम बहुतों को स्वर्ग राज्य से दूर या वंचित भी कर सकते हैं। हम सब से अंत में हिसाब माँगा जायेगा। जैसा की उत्पत्ति 4:9 में प्रभु ने काईन से पूछा "तुम्हारा भाई हाबिल कहाँ है ? इस पर उसने उत्तर दिया क्या मैं अपने भाई का रखवाला हूँ?" प्रभु हमसे पूछेगा की तुम्हारा भाई, तुम्हारी बहन कहाँ है, वे पाप के किन रास्तों पर भटक रहे हैं? तो हम काईन की तरह यह नहीं कह सकते की क्या मैं उसका रखवाला हूँ? नहीं कदापि नहीं। मैं ज़रूर अपने भाई, अपनी बहन का रखवाला हूँ। मैं अपने भाई और बहन के लिए, उनकी ज़िन्दगी के लिए ज़िम्मेदार हूँ।

पवित्र बाइबल हमें सिखलाती है कि हम खुद के उद्धार के साथ ही साथ दूसरों के उद्धार के लिए भी जिम्मेदार हैं। आज के पहले पाठ में प्रभु कहते हैं कि यदि हमने अपने किसी भाई को बुराई के मार्ग पर चलते देखा और उसे प्रभु के मार्ग की शिक्षा नहीं दी, उसे चेतावनी नहीं दी, उसे अपने मार्ग सुधारने को नहीं कहा तो वह व्यक्ति अपने पाप में मर जाएगा। याने उसे उद्धार नहीं मिलेगा। और प्रभु इसके लिए मुझे दोषी मानेगा। किन्तु यदि मैं किसी को उसके कुकर्मों से मन फिराकर सही मार्ग पर आने की शिक्षा दूँ और वह व्यक्ति मेरी बात ना माने तो वो अपनी बुराई में ही मर जायेगा उसका सर्वनाश होगा परन्तु मेरा जीवन बचा रहेगा।


📚 REFLECTION

In today's gospel, Lord Jesus tells us about correct our fellow brothers and sisters. If the person does not listen to your admonition, then call two or three persons and try to make the person understand. If still he/she does not understand then bring his/her case to the Church authority. The point Jesus wants make here is that we have to take all the measures possible in order to reprove and bring back one of our lost brother/sisters. It is not necessary that once you correct someone and immediately that person would come to the right path.

If we want, we can bring many people to the kingdom of heaven and on the contrary, we can also take away or deprive many of them from the kingdom of heaven. We will have to give an account of what we have done for our fellow brothers and sisters. As in Genesis 4: 9, the Lord asked Cain "Where is your brother Abel? To this he replied, Am I my brother's keeper?" The Lord will ask us, where is your brother, where is your sister, on which way are they wandering in their sinfulness? So we cannot say like Cain- Am I his guardian? No, not at all. I am definitely my brother’s/sister's keeper. I am responsible for my life as well as for my brothers’ and sisters’.

The Holy Bible teaches us that we are responsible for the salvation of ourselves as well as the salvation of others. In the first reading today, God says that if we’ve seen one of our brothers walking on the path of evil and did not teach him the way of the Lord, did not warn him, did not ask him to improve his path, then that person would die in his sin. God will hold me responsible for this. But if I teach someone to repent from his/her misdeeds and come to the right path and if that person does not listen to me, then he will die in his own evil, he will perish, but my soul will be safe.


मनन-चिंतन -2

संत मारकुस के सुसमाचार अध्याय 12 में हम एक घटना देखते हैं जिस में प्रभु येसु मंदिर के खजाने के सामने बैठे हैं और लोगों को उस में सिक्के डालते हुए देखते हैं। बहुत से धनी व्यक्तियों ने उस खजाने में अपना दान डाला। एक कंगाल विधवा भी वहाँ आयी और उस ने दो अधेले अर्थात एक पैसा उस खजाने में डाल दिया। इस पर प्रभु ने उस विधवा की प्रशंसा करते हुए अपने शिष्यों से कहा कि खज़ाने में पैसे डालने वालों में से इस विधवा ने सब से अधिक डाला है क्योंकि सब ने अपनी समृद्धि के अनुसार बड़ी-बड़ी राशि डाली परन्तु इस विधवा ने गरीबी एवं तंगी का जीवन जीते हुए भी अपनी जीविका के लिए जो कुछ था वह सब कुछ दे डाला।

इस घटना की एक विशेषता यह है कि प्रभु ने उस महिला के दान पर ध्यान देते हुए उसकी प्रशंसा की। शायद प्रभु के शिष्यों और वहाँ उपस्थित लोगों ने इस गरीब विधवा तथा उसके दान पर ध्यान ही नहीं दिया होगा। लेकिन प्रभु ने उस विधवा एवं उसके दान को देखा और उसके इस कार्य के लिए उसकी प्रशंसा भी की।

सुसमाचारों में हम देखते हैं कि प्रभु मनुष्यों की छोटी सी छोटी भलाई पर भी ध्यान देते हैं और उसकी प्रशंसा करते हैं विशेषकर जब लोग इन भलाइयों को अनदेखा करते हैं।

आज के सुसमाचार व पहले पाठ में ईश्वर का वचन हमें पापियों को गलत मार्गों से छुड़ाने और उन्हें ईश्वर के वचनों के आधार पर चलने में मदद करने के हमारे कर्तव्य की याद दिलाते हैं। संत याकूब 5:19-20 में वचन कहते है जो किसी पापी को कुमार्ग से वापस ले आता है वह उसकी आत्मा को मृत्यु से बचाता है और बहुत से पाप ढाँक देता है। पापियों को गलत मार्गों अथार्त पाप-मार्ग से छुड़ाना और उन्हें ईश्वर के वचनों के आधार पर चलने में सहायता देना सभी विश्वासियों का कर्तव्य है। प्रभु येसु ने अपने जीवन काल में हमेशा यही किया है। सुसमाचार की एक घटना के आधार पर हम देख सकते हैं कि प्रभु कैसे लोगों को पापों से दूर व ईश्वर के करीब लाते हैं।

संत लूकस के सुसमाचार अध्याय 7 में हम प्रभु येसु को एक फरीसी के घर में भोजन करते हुए देखते हैं। वहाँ एक स्त्री आती हैं और अपने आँसुओं से उनके चरण भिगोने लगती है और अपने केशों से उसे पोछती है। वहाँ जितने भी लोग उपस्थित थे वे सभी उस स्त्री से परिचित थे क्योंकि वह एक पापिनी स्त्री थी। इसे देख कर सभी आश्चर्यचकित थे क्योंकि प्रभु ने एक पापिनी स्त्री को अपने पास आने दिया। सब लोग इस स्त्री के बारे में जानते थे। लेकिन उन सभी लोगों से ज़्यादा प्रभु उस स्त्री के पापों को जानते थे फिर भी प्रभु ने लोगों को उसके पापों के बारे में नही बताया बल्कि उनके प्रति उसके प्यार की प्रशंसा की। सभी ने उस स्त्री में बुराइयाँ देखीं परन्तु प्रभु ने उसकी भलाई को देखा। प्रभु लोगों में उनकी भलाई को देखते हैं भले ही वह भलाई छोटी ही क्यों न हो और उनकी प्रशंसा भी करते हैं। यह बात लोगों को पापों से दूर जाने और प्रभु के करीब रहने की प्रेरणा एवं कृपा देती है।

उड़ाऊ पुत्र के दृष्टान्त में भी हम यही देखते हैं कि उड़ाउ पुत्र का भाई अपने पिता से उड़ाऊ पुत्र की गलतियों व पापों के बारे में कहता है। लेकिन पिता, पुत्र की गलतियों व कमज़ोरियों को नहीं बल्कि उसकी अच्छाइयों को देखता है और खुश है कि वह घर वापस आया है। बहुत सारी गलतियों के बावजूद पिता अपने पुत्र की प्रशंसा करता है।

संत लूकस के सुसमाचार अध्याय 10 में हम एक दृष्टान्त पढ़ते हैं, जिसमें दो लोग प्रार्थना करने के लिए मंदिर में जाते हैं। एक फरीसी और एक नाकेदार। फरीसी उस नाकेदार में बहुत-सी गलतियाँ व कमियाँ देखता है, लेकिन प्रभु उस नाकेदार में भी भलाई देखते हैं और उस नाकेदार की प्रशंसा करते हैं।

हम भी अक्सर एक-दूसरें में गलतियों को ढूँढते हैं और उसकी चर्चा भी लोगों से करने लगते हैं। लोगों की भलाई देखने में हम भी अक्सर चूक जाते हैं। आज हम प्रभु से दूसरों की भलाई देखने की कृपा माँगे ताकि हम भी प्रभु के समान लोगों को पापों से दूर और प्रभु के करीब लाने में सफल हो जाएं। 

✍️- बिनियूश टोपनो


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4 सितंबर का पवित्र वचन

 04 सितंबर 2020

वर्ष का बाईसवाँ सामान्य सप्ताह, शुक्रवार

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📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 4:1-5

1) लोग हमें मसीह के सेवक और ईश्वर के रहस्यों के कारिन्दा समझे।


2) अब कारिन्दा से यह आशा की जाती है कि वह ईमानदार निकले।


3) मेरे लिए इस बात का कोई महत्व नहीं कि आप लोग अथवा मनुष्यों का कोई न्यायालय मुझे योग्य समझे। मैं स्वयं भी अपना न्याय नहीं करता।


4) मैं अपने में कोई दोष नहीं पाता, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि मैं निर्दोष हूँ। प्रभु ही मेरे न्यायकर्ता हैं।


5) इसलिए प्रभु के आने तक कोई किसी का न्याय नहीं करे। वह अन्धकार के रहस्य प्रकाश में लायेंगे और हृदयों के गुप्त अभिप्राय प्रकट करेंगे। उस समय हर एक को ईश्वर की ओर से यथायोग्य श्रेय दिया जायेगा।



सुसमाचार : लूकस 5:33-39

33) उन्होंने ईसा से कहा "योहन के शिष्य बारम्बार उपवास करते हैं और प्रार्थना में लगे रहते हैं और फरीसियों के शिष्य भी ऐसा ही करते हैं, किन्तु आपके शिष्य खाते-पीते हैं"।


34) ईसा ने उन से कहा, "जब तक दुलहा उनके साथ हैं, क्या तुम बारातियों से उपवास करा सकते हो?


35) किन्तु वे दिन आयोंगे, जब दुलहा उनके स बिछुड़ जायेगा। उन दिनों वे उपवास करेंगे।"


36) ईसा ने उन्हें यह दृष्टान्त भी सुनाया, "कोई नया कपड़ा फाड़ कर पुराने कपड़े में पैबंद नहीं लगाता। नहीं तो वह नया कपड़ा फाड़ेगा और नये कपड़े का पैबंद पुराने कपड़े के साथ मेल भी नहीं खायेगा।


37) और कोई पुरानी मशकों में नयी अंगूरी नहीं भरता। नहीं तो नयी अंगूरी पुरानी मशकों को फाड़ देगी, अंगूरी बह जायेगी और मशकें बरबाद हो जायेंगी।


38) नयी अंगूरी को नयी मशकों में ही भरना चाहिए।


39) "कोई पुरानी अंगूरी पी कर नयी नहीं चाहता। वह तो कहता है, ’पुरानी ही अच्छी है।"


📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में हम पढ़ते हैं शास्त्री और फरीसी येसु से उपवास को लेकर सवाल करते हुए कहते हैं कि योहन के शिष्य और फरीसियों के शिष्य उपवास करते हैं पर उनके शिष्य क्यों खाते - पीते हैं। प्रभु येसु उनके प्रश्न का जवाब अन्य प्रश्न से ही देते हैं। वे उनसे पूछते हैं कि जब तक दूल्हा साथ है क्या तुम बारातियों से उपवास करा सकते हो ? जब दूल्हा उनसे बिछुड़ जायेगा तब वे उपवास करेंगे।


यहाँ पर दो बिंदु मनन-चिंतन के लिए हमारा ध्यान खींचते हैं। 1 ) हमारे उपवास या फिर किसी भी भले कार्य के पीछे एक उद्द्देश्य होना चाहिए। कई बार देखा जाता है कि कई लोगों की धार्मिक क्रियाएं या तो किसी की देखा देखी में की जाती है या फिर दूसरों को दिखने के लिए की जाती है। कुछ - कुछ काम हम बस रिवाज के नाम पर करते रहते हैं जिसका ना हमें अर्थ पता होता है और न कारण ही।


2 ) हर कार्य का अपना एक समय होता है। बारात के समय शोक और मौत के समय जश्न मनाना उचित नहीं है। उपदेशक ग्रन्थ 3:1 में उपदेशक कहता है पृथ्वी पर हर बात का अपना वक्त और हर काम का अपना समय होता है। उस समय जब येसु शरीर रूप में अपने शिष्यों के साथ थे उनका उपवास करना बेवजह था। पर आज, हमें उपवास करने की ज़रुरत है। ये उपवास, प्रार्थना, पश्चाताप और प्रायश्चित का समय है। आइये हम सब विश्वासी मिलकर उपवास प्रार्थना व प्रायश्चित करते हुए कोरोना महामारी, प्राकृतिक आपदायें, दुर्घटनाएँ, और हिंसा झेल रहे हमारे संसार के लिए प्रार्थना करें।

03 सितंबर का पवित्र वचन

 

03 सितंबर 2020
वर्ष का बाईसवाँ सामान्य सप्ताह, गुरुवार

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📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 3:18-23

18) कोई अपने को धोखा न दे। यदि आप लोगों में कोई अपने को संसार की दृष्टि से ज्ञानी समझता हो, तो वह सचमुच ज्ञानी बनने के लिए अपने को मूर्ख बना ले;

19) क्योंकि इस संसार का ज्ञान इ्रश्वर की दृष्टि में ’मूर्खता’ है। धर्मग्रन्थ में यह लिखा है- वह ज्ञानियों को उनकी चतुराई से ही फँसाता है

20) और प्रभु जानता है कि ज्ञानियों के तर्क-वितर्क निस्सार हैं।

21) इसलिए कोई मनुष्यों पर गर्व न करे सब कुछ आपका है।

22) चाहे वह पौलुस, अपोल्लोस अथवा कैफ़स हो, संसार हो, जीवन अथवा मरण हो, भूत अथवा भविष्य हो-वह सब आपका है।

23) परन्तु आप मसीह के और मसीह ईश्वर के हैं।


सुसमाचार : लूकस 5:1-11

1) एक दिन ईसा गेनेसरेत की झील के पास थे। लोग ईश्वर का वचन सुनने के लिए उन पर गिरे पड़ते थे।

2) उस समय उन्होंने झील के किनारे लगी दो नावों को देखा। मछुए उन पर से उतर कर जाल धो रहे थे।

3) ईसा ने सिमोन की नाव पर सवार हो कर उसे किनारे से कुछ दूर ले चलने के लिये कहा। इसके बाद वे नाव पर बैठे हुए जनता को शिक्षा देते रहे।

4) उपदेश समाप्त करने के बाद उन्होंने सिमोन से कहा, "नाव गहरे पानी में ले चलो और मछलियाँ पकड़ने के लिए अपने जाल डालो"।

5) सिमोन ने उत्तर दिया, "गुरूवर! रात भर मेहनत करने पर भी हम कुछ नहीं पकड़ सके, परन्तु आपके कहने पर मैं जाल डालूँगा"।

6) ऐसा करने पर बहुत अधिक मछलियाँ फँस गयीं और उनका जाल फटने को हो गया।

7) उन्होंने दूसरी नाव के अपने साथियों को इशारा किया कि आ कर हमारी मदद करो। वे आये और उन्होंने दोनों नावों को मछलियों से इतना भर लिया कि नावें डूबने को हो गयीं।

8) यह देख कर सिमोन ने ईसा के चरणों पर गिर कर कहा, "प्रभु! मेरे पास से चले जाइए। मैं तो पापी मनुष्य हूँ।"

9) जाल में मछलियों के फँसने के कारण वह और उसके साथी विस्मित हो गये।

10) यही दशा याकूब और योहन की भी हुई; ये जेबेदी के पुत्र और सिमोन के साझेदार थे। ईसा ने सिमोन से कहा, "डरो मत। अब से तुम मनुष्यों को पकड़ा करोगे।"

11) वे नावों को किनारे लगा कर और सब कुछ छोड़ कर ईसा के पीछे हो लिये।

📚 मनन-चिंतन

मित्रो, आज के सुसमाचार में हम पढ़ते हैं कि येसु सिमोन की नाव में सवार होकर सुसमाचार सुनाते है और बाद में वे उनसे कहते है - "नाव को गहरे पानी में ले जाओ और मछलियाँ पकड़ने के लिए जाल डालो।" पेत्रुस ने ऐसा ही किया और भरपूर मात्रा में उन्हें मछलियाँ मिली। शायद उतनी उन्होंने पहले कभी ना पकड़ी होंगी।

मैं येसु के नाव में आने की तुलना पवित्र यूखरिस्त से करना चाहता हूँ। पवित्र यूखरिस्त में प्रभु येसु हमारे जीवन रूपी नाव में आते हैं। वो हमारे दिल में आते और हमारे दिल में रहते हुए हमें बहुत सारी शिक्षा देते हैं। आज हम अपने आप से ये सवाल करें कि क्या मैं मेरे दिल में आने वाले येसु की बातें सुनता हूँ, जैसे पेत्रुस ने न केवल उनका प्रवचन सुना बल्कि उन्होंने येसु के आदेश का अक्षरसः पालन किया। उन्होंने न भीड़ की परवाह की और न ही खुद की बुद्धि पर भरोसा किया। उन्होंने बस जैसा येसु ने कहा वैसा ही किया और देखो एक बड़ा चमत्कार उनके सामने होता है, जिसके बाद से उनकी पूरी ज़िन्दगी बदल जाती है।

हम येसु को अपने जीवन की नाव में अथवा अपने हृदय में बुलाते तो हैं, पर उनकी बात मानने को तैयार नहीं। उनकी वाणी सुनकर जैसा वे हमें करने को कहते हैं, वैसा करने को तैयार नहीं। हम किनारा छोड़कर गहराई में जाने को तैयार नहीं। येसु हमारे जीवन को भरपूर मात्रा में आशीष व अनुग्रह देना चाहते हैं पर हम उनकी आज्ञा मानकर हमारे जीवन की नाव को गहरे पानी में ले जाना नहीं चाहते। येसु पर पूर्ण भरोसा करके उनकी मर्ज़ी अनुसार निर्णय लेना और कार्य करना हम नहीं चाहते। जब तक हम जीवन में खुद की बुद्धि और खुद की योजनाओं के अनुसार कार्य करेंगे तो हमें या तो बहुत थोड़ा ही मिलेगा या फिर कुछ भी नहीं मिलेगा भले ही हम सारी रात मेहनत कर लें । पर जब येसु की मर्ज़ी के अनुसार चलेंगे तो इतना अनुग्रह मिलेगा की जीवन में समा नहीं पायेगा।

02 सितंबर का पवित्र वचन

 

02 सितंबर 2020
वर्ष का बाईसवाँ सामान्य सप्ताह, बुधवार

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📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 3:1-9

1) भाइयो! मैं उस समय आप लोगों से उस तरह बातें नहीं कर सका, जिस तरह आध्यात्मिक व्यक्तियों से की जाती हैं। मुझे आप लोगों से उस तरह बातें करनी पड़ी, जिस तरह प्राकृत मनुष्यों से, मसीह में मेरे निरे बच्चों से, की जाती हैं।

2) मैंने आप को दूध पिलाया। मैंने आप को ठोस भोजन इसलिए नहीं दिया कि आप उसे नहीं पचा सकते थे।

3) आप इस समय भी उसे पचा नहीं सकते, क्योंकि आप अब तक प्राकृत हैं। आप लोगों में ईर्ष्या और झगड़ा होता है। क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं कि आप प्राकृत हैं और निरे मनुष्यों-जैसा आचरण करते हैं?

4) जब कोई कहता है, "मैं पौलुस का हूँ" और कोई कहता है, "मैं अपोल्लोस का हूँ", तो क्या यह निरे मनुष्यों-जैसा आचरण नहीं है?

5) अपोल्लोस क्या है? पौलुस क्या है? हम तो धर्मसेवक मात्र हैं, जिनके माध्यम से आप विश्वासी बने। हम में प्रत्येक ने वही कार्य किया, जिसे प्रभु ने उस को सौंपा।

6) मैंने पौधा रोपा, अपोल्लोस ने उसे सींचा, किन्तु ईश्वर ने उसे बड़ा किया।

7) न तो रोपने वाले का महत्व है और न सींचने वाले का, बल्कि वृद्धि करने वाले अर्थात् ईश्वर का ही महत्व है।

8) रोपने वाला और सींचने वाला एक ही काम करते हैं और प्रत्येक अपने-अपने परिश्रम के अनुरूप अपनी मज़दूरी पायेगा।

9) हम ईश्वर के सहयोगी हैं और आप लोग हैं-ईश्वर की खेती, ईश्वर का भवन।


सुसमाचार : लूकस 4:38-44

38) वे सभागृह से निकल कर सिमोन के घर गये। सिमोन की सास तेज़ बुखार में पड़ी हुई थी और लोगों ने उसके लिए उन से प्रार्थना की।

39) ईसा ने उसके पास जा कर बुख़ार को डाँटा और बुख़ार जाता रहा। वह उसी क्षण उठ कर उन लोगों के सेवा-सत्कार में लग गयी।

40) सूरज डूबने के बाद सब लोग नाना प्रकार की बीमारियों से पीडि़त अपने यहाँ के रोगियों को ईसा के पास ले आये। ईसा एक-एक पर हाथ रख कर उन्हें चंगा करते थे।

41) अपदूत बहुतों में से यह चिल्लाते हुये निकलते थे, "आप ईश्वर के पुत्र हैं"। परन्तु वह उन को डाँटते और बोलने से रोकते थे, क्योंकि अपदूत जानते थे कि वह मसीह हैं।

42) ईसा प्रातःकाल घर से निकल कर किसी एकान्त स्थान में चले गये। लोग उन को खोजते-खोजते उनके पास आये और अनुरोध करते रहे कि वह उन को छोड़ कर नहीं जायें।

43) किन्तु उन्होंने उत्तर दिया, "मुझे दूसरे नगरों को भी ईश्वर के राज्य का सुसमाचार सुनाना है-मैं इसीलिए भेजा गया हूँ"

44) और वे यहूदिया के सभागृहों में उपदेश देते रहे।

📚 मनन-चिंतन

आज के वचन में एक विरोधाभास मिलता है : एक तरफ हम देखते हैं कि लोग येसु की खोज में आते हैं और वे उनके रोगियों को चंगा करते हैं, उपदूतों को बहार निकलते हैं। और लोग येसु से अनुरोध करते हैं कि वे उन्हें छोड़कर ना जाएँ। वहीँ दूसरी तरफ अपदूत येसु को देखकर छिड़ जाते हैं। एक तरफ अच्छाई है तो दूसरी तरफ बुराई। एक तरफ चंगाई, शांति, और उम्मीद है तो दूसरी तरफ बंधन, अशांति, और निराशा है।

येसु का बुरी आत्मा से यह पहली बार सामना नहीं हो रहा है। सुसमाचार में हम पढ़ते हैं, कि बुराई के आत्मा जब भी येसु के सामने आते है वे चिल्ला उठते हैं। हम याद करें गेरासीन के उपदूत को (लूकस 8: 26-39) । वह यूँ तो येसु से मिलने बाहर निकलकर आता है, हालांकि वास्तव में वह काफी उग्र और गुस्से में, रहता है, क्योंकि येसु की उपस्थिति उसको को विचलित व परेशान कर रही थी।

इन दो विरोधाभास वाली परिस्थितियों में हम अपने आप को किसमें पाते हैं। उन लोगों में जो येसु को ढूँढ़ते हुवे जाते हैं और उन्हें पाकर उनसे अनुरोध करते हैं कि वे उन्हें छोडकर ना जाएँ या फिर उन उपदूतों में जो येसु के होने से परेशान हो जाते हैं। जिनको येसु के पास आने से छिड़ होती है। हम में से कितने ही लोग आज कल दूसरी वाली प्रवृति के शिकार हैं। कितने लोग विशेषकरके आज की युवा पीढ़ी येसु से दूर रहना पसंद करती है। प्रार्थना, मिस्सा बलिदान, पवित्र बाइबल पढ़ना आदि से उनको छिड़ होती है। वे इन सब बातों से खुद को दूर रखना पसंद करते हैं। हमें और उन सब लोगों को जो इस प्रवृति के शिकार हैं ये स्वीकार करना चाहिए कि इस प्रकार की मानसिकता शैतान की ऒर से आती है। यदि हमें आध्यात्मिकता से अरुचि व नफरत है तो हम भी एक तरह से अपदूतग्रस्त हैं और हमें हमारे चरवाहे येसु को ढूंढते हुवे उनके पास आने की ज़रूरत है ताकि वो हमें छुटकारा दे सके, चंगाई दे सके ।

1 सितंबर का पवित्र वचन

 

01 सितंबर 2020
वर्ष का बाईसवाँ सामान्य सप्ताह, मंगलवार

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📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 2:10ब-16

10) ईश्वर ने अपने आत्मा द्वारा हम पर वही प्रकट किया है, क्योंकि आत्मा सब कुछ की, ईश्वर के रहस्य की भी, थाह लेता है।

11) मनुष्य के निजी आत्मा के अतिरिक्त कौन किसी का अन्तरतम जानता है? इसी तरह ईश्वर के आत्मा के अतिरिक्त कोई ईश्वर का अन्तरतम नहीं जानता।

12) हमें संसार का नहीं, बल्कि ईश्वर का आत्मा मिला है, जिससे हम ईश्वर के वरदान पहचान सकें।

13) हम उन वरदानों की व्याख्या करते समय मानवीय प्रज्ञा के शब्दों का नहीं, बल्कि आत्मा द्वारा प्रदत्त शब्दों का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार हम आध्यात्मिक शब्दावली में आध्यात्मिक तथ्यों की विवेचना करते है।।

14) प्राकृत मनुष्य ईश्वर के आत्मा की शिक्षा स्वीकार नहीं करता। वह उसे मूर्खता मानता और उसे समझने में असमर्थ है, क्योंकि आत्मा की सहायता से ही उस शिक्षा की परख हो सकती है।

15) आध्यात्मिक मनुष्य सब बातों की परख करता है, किन्तु कोई भी उस मनुष्य की परख नहीं करता है, किन्तु कोई भी उस मनुष्य की परख नहीं कर पाता;

16) क्योंकि (लिखा है) - प्रभु का मन कौन जानता है? कौन उसे शिक्षा दे सकता है? हम में तो मसीह का मनोभाव विद्यमान है।


सुसमाचार : लूकस 4:31-37

31) वे गलीलिया के कफ़रनाहूम नगर आये और विश्राम के दिन लोगों को शिक्षा दिया करते थे।

32) लोग उनकी शिक्षा सुन कर अचम्भे में पड़ जाते थे, क्योंकि वे अधिकार के साथ बोलते थे।

33) सभागृह में एक मनुष्य था, जो अशुद्ध आत्मा के वश में था। वह ऊँचे स्वर से चिल्ला उठा,

34) "ईसा नाज़री! हम से आप को क्या? क्या आप हमारा सर्वनाश करने आये हैं? मैं जानता हूँ कि आप कौन हैं-ईश्वर के भेजे हुए परमपावन पुरुष।"

35) ईसा ने यह कहते हुए उसे डाँटा, " चुप रह, इस मनुष्य से बाहर निकल जा"। अपदूत ने सब के देखते-देखते उस मनुष्य को भूमि पर पटक दिया और उसकी कोई हानि किये बिना वह उस से बाहर निकल गया।

36) सब विस्मित हो गये और आपस में यह कहते रहे, "यह क्या बात है! वे अधिकार तथा सामर्थ्य के साथ अशुद्ध आत्माओं को आदेश देते हैं और वे निकल जाते हैं।"

37) इसके बाद ईसा की चर्चा उस प्रदेश के कोने-कोने में फैल गयी।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में हम प्रभु येसु के दैनिक कार्यों की एक झलक देखते हैं। उनकी सेवकाई के दो मुख्य पहलु थे (1) सुसमाचार का प्रचार, (2) चिन्ह और चमत्कार अथवा चंगाई। उनकी शिक्षा को सुनकर लोग अचम्भे में पड़ जाते थे क्योंकि वे अधिकार के साथ बोलते थे। प्रभु येसु की शिक्षा में बहुत ही गहराई और उनकी बातों में सच्चाई थी। वे गहरी से गहरी और जटिल से भी जटिल बात को बड़े सहज लहजे में समझा देते थे, इसलिए लोग, शास्त्रियों की तुलना में उनकी बातों को सुनना अधिक पसंद करते थे (मत्ती 7:29) स्वर्ग की बातों को समझाने के लिए उन्होंने धरती के उदाहरण व कहानियों का इस्तेमाल किया। वे प्रकृति व तत्कालीन परिस्थितियों से वाकिफ थे। इसलिए उनकी शिक्षा सहज पर प्रभावशाली थी।

उनकी शिक्षा इसलिए भी प्रभावशाली थी की जो वे सिखाते थे उसे वे करते भी थे। यदि उन्होंने प्रेम की शिक्षा दी तो उन्होंने प्रेम करके भी दिखाया; क्षमा की शिक्षा दी तो क्षमा भी किया; सेवा की शिक्षा दी तो सेवा भी की। आज के सुसमाचार में भी हम देखते है कि उन्होंने पहले तो लोगों को वचन सुनाया फिर अपने कार्यों द्वारा उसकी पुष्टि की। उन्होंने स्वर्ग राज्य की शिक्षा दी और फिर अपने ही समय में रोगियों को चंगा करके, उपदूतों को निकालकर, बंधनों से आज़ादी देकर उन्हें स्वर्ग राज्य का पूर्वाभास कराया जहाँ ईश्वर - "उनके सब आंसू पौंछ डालेगा। इसके बाद ना मृत्यु होगी, न शोक, न विलाप, और न दुःख। " (प्रकाशना 21:4)

हम प्रभु येसु के समान हमारी ज़मीनी हकीकत से वाकिफ रहें। देश दुनियां और लोगों के जीवन और उनकी परेशानियों से परिचित रहकर ही हम उनके हित में कार्य कर सकते हैं।



📚 REFLECTION

In today's Gospel we see a glimpse of the daily work of Lord Jesus. There were two main aspects of his ministry: 1- Preaching the Gospel, 2- Signs and miracles or healing. People were amazed to hear his teaching as he spoke with authority. There was a lot of depth in the teaching of Lord Jesus and truth in his words. . He used to explain profound and complicated things in a very simple manner, so people preferred to listen to him more than the scribes (Matthew 7:29). He used examples and stories of the earth to explain the things of heaven. He was aware of the nature and natural things and also was aware of the prevailing circumstances of the society. Therefore his teaching was simple, down to earth and effective.

His teaching was also influential because he used to do what he taught. If he taught about love, he showed love; if he taught forgiveness, then he forgives also; If he was preached about service, he did serve. Even in today's gospel, we see that he first gave the Word to them and then confirmed it through his actions. He taught the kingdom of heaven and then in his own time healed the sick and cast out demons, and restored the joy and happiness to the lives of people thus giving them the foretaste of the Kingdom of heaven where “God will wipe out all their tears. After this there will be no death, neither mourning, nor sorrow"(Revelation 21: 4).

Let us be aware of our ground reality; let us be aware of everyday happenings, like Lord Jesus did. Only by being familiar with the world and the life of the people around us, can we really work for them, for their welfare.


 - Biniush Topno 

31 अगस्त का पवित्र वचन

 

31 अगस्त 2020
वर्ष का बाईसवाँ सामान्य सप्ताह, सोमवार

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📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 2:1-5

1) भाइयो! जब मैं ईश्वर का सन्देश सुनाने आप लोगों के यहाँ आया, तो मैंने शब्दाडम्बर अथवा पाण्डित्य का प्रदर्शन नहीं किया।

2) मैंने निश्चय किया था कि मैं आप लोगों से ईसा मसीह और क्रूस पर उनके मरण के अतिरिक्त किसी और विषय पर बात नहीं करूँगा।

3) वास्तव में मैं आप लोगों के बीच रहते समय दुर्बल, संकोची और भीरू था।

4) मेरे प्रवचन तथा मेरे संदेश में विद्वतापूर्ण शब्दों का आकर्षण नहीं, बल्कि आत्मा का सामर्थ्य था,

5) जिससे आप लोगों का विश्वास मानवीय प्रज्ञा पर नहीं, बल्कि ईश्वर के सामर्थ्य पर आधारित हो।


सुसमाचार : लूकस 4:16-30

16) ईसा नाज़रेत आये, जहाँ उनका पालन-पोषण हुआ था। विश्राम के दिन वह अपनी आदत के अनुसार सभागृह गये। वह पढ़ने के लिए उठ खड़े हुए

17) और उन्हें नबी इसायस की पुस्तक़ दी गयी। पुस्तक खोल कर ईसा ने वह स्थान निकाला, जहाँ लिखा हैः

18) प्रभु का आत्मा मुझ पर छाया रहता है, क्योंकि उसने मेरा अभिशेक किया है। उसने मुझे भेजा है, जिससे मैं दरिद्रों को सुसमाचार सुनाऊँ, बन्दियों को मुक्ति का और अन्धों को दृष्टिदान का सन्देश दूँ, दलितों को स्वतन्त्र करूँ

19) और प्रभु के अनुग्रह का वर्ष घोषित करूँ।

20) ईसा ने पुस्तक बन्द कर दी और वह उसे सेवक को दे कर बैठ गये। सभागृह के सब लोगों की आँखें उन पर टिकी हुई थीं।

21) तब वह उन से कहने लगे, "धर्मग्रन्थ का यह कथन आज तुम लोगों के सामने पूरा हो गया है"।

22) सब उनकी प्रशंसा करते रहे। वे उनके मनोहर शब्द सुन कर अचम्भे में पड़ जाते और कहते थे, "क्या यह युसूफ़ का बेटा नहीं है?"

23) ईसा ने उन से कहा, "तुम लोग निश्चय ही मुझे यह कहावत सुना दोगे-वैद्य! अपना ही इलाज करो। कफ़रनाहूम में जो कुछ हुआ है, हमने उसके बारे में सुना है। वह सब अपनी मातृभूमि में भी कर दिखाइए।"

24) फिर ईसा ने कहा, "मैं तुम से यह कहता हूँ-अपनी मातृभूमि में नबी का स्वागत नहीं होता।

25) मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि जब एलियस के दिनों में साढ़े तीन वर्षों तक पानी नहीं बरसा और सारे देश में घोर अकाल पड़ा था, तो उस समय इस्राएल में बहुत-सी विधवाएँ थीं।

26) फिर भी एलियस उन में किसी के पास नहीं भेजा गया-वह सिदोन के सरेप्ता की एक विधवा के पास ही भेजा गया था।

27) और नबी एलिसेयस के दिनों में इस्राएल में बहुत-से कोढ़ी थे। फिर भी उन में कोई नहीं, बल्कि सीरी नामन ही निरोग किया गया था।"

28) यह सुन कर सभागृह के सब लोग बहुत क्रुद्ध हो गये।

29) वे उठ खड़े हुए और उन्होंने ईसा को नगर से बाहर निकाल दिया। उनका नगर जिस पहाड़ी पर बसा था, वे ईसा को उसकी चोटी तक ले गये, ताकि उन्हें नीचे गिरा दें,

30) परन्तु वे उनके बीच से निकल कर चले गये।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार को दो भागों में बाँटा जा सकता है, पहले भाग प्रभु येसु के मुक्ति-प्रद घोषणा पत्र का वर्णन करता है, और दूसरा भाग प्रभु येसु के अपने ही लोगों द्वारा तिरस्कृत किए जाने का विवरण देता है। प्रभु येसु लौटकर नाज़रेथ आते हैं जहाँ उनका लालन-पालन हुआ था, जहाँ उन्होंने अपना बचपन बिताया था। लोगों में कुछ ऐसे होंगे जो बचपन में उसके साथ खेले होंगे, कुछ होंगे जिन्होंने उसे बड़ा होते हुए देखा था। जब प्रभु येसु ने अपना मिशन कार्य प्रारम्भ किया था तो उन्होंने उनके चमत्कारों और शिक्षाओं के बारे में भी सुना होगा। जब उन्होंने प्रभु येसु को अपने बीच पाया तो वे ज़रूर बहुत उत्साहित हुए होंगे और प्रभु येसु भी अपने आप को उनके बीच में पाकर बहुत आनंदित महसूस कर रहे होंगे।

लेकिन तभी जब प्रभु येसु धर्मग्रंथ में से पाठ पढ़ते हैं और बताते हैं, कि धर्मग्रंथ का यह कथन आज पूरा हुआ। उसने उन्हें बताया कि प्रभु का आत्मा मुझ पर छाया रहता है, उसने मेरा अभिषेक किया है कि मैं दरिद्रों को सुसमाचार सुनाऊँ… संक्षेप में कहें तो वही मसीह था जो अभिषिक्त किया गया था, जो उनके बीच में पल-बढ़ा और ईश्वर ने उसे चुना और उसका अभिषेक किया। उन्हें यह बात हज़म नहीं हुई कि एक मामूली बढ़ई का बेटा संसार का मुक्तिदाता है, और उन्होंने एक नबी के रूप में उनको स्वीकार नहीं किया, उनके लिए वह एक मामूली बढ़ई यूसुफ़ के पुत्र से ज़्यादा और कुछ नहीं था। जब वह अपने आप को नबी बताता है तो उन्हें बहुत ग़ुस्सा आता है। क्या जब मैं ईश्वर का कार्य करने के लिए आगे आता हूँ तो मुझे भी अपने ही लोगों के विरोध और क्रोध का सामना करना पड़ता है?