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31 जुलाई का पवित्र पाठ

31 जुलाई 2020
वर्ष का सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह, शुक्रवार

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पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 26:1-9

1) योशीया के पुत्र यूदा के राजा यहोयाकीम के शासनकाल के प्रारम्भ में यिरमियाह को प्रभु की यह वाणी सुनाई पड़ीः

2) “प्रभु यह कहता है- प्रभु के मन्दिर के प्रांगण में खड़ा हो कर यूदा के सब नगरों के निवासियों को सम्बोधित करो, जो वहाँ आराधना करने आते हैं। जो कुछ मैं तुम्हें बताऊँगा, यह सब उन्हें सुनाओगे- एक शब्द भी नहीं छोड़ोगे।

3) हो सकता है कि वे सुनें और अपना कुमार्ग छोड़ कर मेरे पास लौट आयें। तब मैं भी अपना मन बदल कर उनके पापों के कारण उन पर विपत्ति भेजने का अपना विचार छोड़ दूँगा।

4) इसलिए उन से कहो: प्रभु यह कहता है -यदि तुम लोग मेरी बात नहीं सुनोगे और उस संहिता का पालन नहीं करोगे, जिसे मैंने तुम को दिया है;

5) यदि तुम मेरे सेवकों की उन नबियों की बात नहीं सुनोगे, जिन्हें मैं व्यर्थ ही तुम्हारे पास भेजता रहा,

6) तब मैं इस मन्दिर के साथ वही करूँगा, जो मैंने शिलो के साथ किया और मैं इस नगर को पृथ्वी के राष्ट्रों की दृष्टि में अभिशाप की वस्तु बना दूँगा।“

7) याजकों, नबियों और सभी लोगों ने प्रभु के मन्दिर में यिरमियाह का यह भाषण सुना।

8) जब यिरमियाह प्रभु के आदेश के अनुसार जनता को यह सब सुना चुका था, तो याजक, नबी और सब लोग यह कहते हुए उस पर टूट पड़े: “तुम को मरना ही होगा।

9) तुमने क्यों प्रभु के नाम पर भवियवाणी की है कि यह मन्दिर शिलो के सदृश और यह नगर एक निर्जन खँडहर हो जायेगा?“ सब लोगों ने प्रभु के मन्दिर में यिरमियाह को घेर लिया।

सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 13:54-58

54) वे अपने नगर आये, जहाँ वे लोगों को उनके सभाग्रह में शिक्षा देते थे। वे अचम्भे में पड़ कर कहते थे, ’’इसे यह ज्ञान और यह सामर्थ्य कहाँ से मिला?

55) क्या यह बढ़ई का बेटा नहीं है? क्या मरियम इसकी माँ नहीं? क्या याकूब, यूसुफ, सिमोन और यूदस इसके भाई नहीं?

56) क्या इसके सब बहनें हमारे बीच नहीं रहतीं? तो यह सब इसे कहाँ से मिला?’’

57) पर वे ईसा में विश्वास नहीं कर सके। ईसा ने उन से कहा, ’’अपने नगर और अपने घर में नबी का आदर नहीं होता।’’

58) लोगों के अविश्वास के कारण उन्होंने वहाँ बहुत कम चमत्कार दिखाये।

📚 मनन-चिंतन - 1

प्रभु येसु ईश्वर हैं। अपने देहधारण के द्वारा वे सभी बातों में हमारे जैसे बन गये। इब्रानियों का पत्र कहता है, "हमारे प्रधानयाजक हमारी दुर्बलताओं में हम से सहानुभूति रख सकते हैं, क्योंकि पाप के अतिरिक्त अन्य सभी बातों में उनकी परीक्षा हमारी ही तरह ली गयी है।" (4:15) अपने सांसारिक जीवन के दौरान, वे मनुष्यों के सभी दर्दनाक अनुभवों से गुजरे। हमारे समाज में लोगों को विभिन्न प्रकार के भेदभाव को झेलना पड़ता है। उनमें से एक है माता-पिता की जाति या उनके धन्धे को लेकर भेदभाव। निम्न जाति या वर्ग के लोगों और साधारण सेवा-कार्य करने वाले लोगों को इस प्रकार के भेदभाव का सामना पड़ता है। आज के सुसमाचार-भाग में, हम देखते हैं कि यद्यपि यीसु ने अपार ज्ञान की बात की थी, लेकिन उन्हें उनके परिवार की पैतृक पृष्ठभूमि और सामाजिक स्थिति के आधार पर आंका गया था। लोगों ने उन पर विश्वास नहीं किया और फलस्वरूप उन्होंने उनके लिए ज़्यादा चमत्कार नहीं किए। नबी इसायाह ने इसके बारे में भविष्यवाणी की थी: “वह मनुष्यों द्वारा निन्दित और तिरस्कृत था, शोक का मारा और अत्यन्त दुःखी था। लोग जिन्हें देख कर मुँह फेर लेते हैं, उनकी तरह ही वह तिरस्कृत और तुच्छ समझा जाता था। ”(इसायाह 53: 3)। हमारा समाज उन लोगों के प्रति निर्दयी है जो निम्न सामाजिक स्थिति के हैं। हममें से कई लोग शारीरिक, मानसिक या मनोवैज्ञानिक रूप से पीड़ित लोगों के प्रति कठोर मनोभाव अपनाते हैं। आइए हम हर जगह अच्छाई और सच्चाई को पहचानने और स्वीकार करने के लिए अपने मन और हृदय को खुले रखना सीखें।


📚 REFLECTION

Jesus is God. By incarnation he became like us in all things. The Letter to the Hebrews says, “For we do not have a high priest who is unable to sympathize with our weaknesses, but we have one who in every respect has been tested as we are, yet without sin.” (4:15) During his earthly life, he went through all painful experiences of human beings. One of the ways in which people suffer in our society is humiliation and discrimination based on parental background. This is suffered by people belonging lower caste or class and those doing menial jobs. In today’s Gospel passage, we see that although Jesus spoke unmatchable wisdom, he was judged on the basis of parental background and social status of his family. The people did not believe in him and consequently he did not work many miracles for them. Prophet Isaiah had foretold about it : “He was despised and rejected by others; a man of suffering and acquainted with infirmity; and as one from whom others hide their faces he was despised, and we held him of no account” (Is 53:3). Our society is unkind towards those who are of lower social status. Many of us are also harsh towards those with physical, mental or psychological disability. Let us learn to be open to recognize and accept goodness and truth anywhere.

 -Br. Biniush Topno



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30 जुलाई का पवित्र पाठ

30 जुलाई 2020
वर्ष का सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह, गुरुवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 18:1-6

1) प्रभु की वाणी यिरमियाह को यह कहते हुए सुनाई पड़ी,

2) “उठो और कुम्हार के घर जाओ। वहाँ मैं तुम्हें अपना सन्देश दूँगा“

3) मैं कुम्हार के घर गया, जो चाक पर काम कर रहा था।

4) वह जो बरतन बना रहा था, जब वह उसके हाथ में बिगड़ जाता, तो वह उसकी मिट्टी से अपनी पसंद का दूसरा बरतन बनाता।

5) तब प्रभु की यह वाणी मुझे सुनाई पड़ी,

6) “इस्राएलियो! क्या मैं इस कुम्हार की तरह तुम्हारे साथ व्यवहार नहीं कर सकता?“ यह प्रभु की वाणी हैं। “इस्राएलियों! जैसे कुम्हार के हाथ में मिट्टी है, वैसे ही तुम भी मेरे हाथ में हो।

सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 13:47-53

47) ’’फिर, स्वर्ग का राज्य समुद्र में डाले हुए जाल के सदृश है, जो हर तरह की मछलियाँ बटोर लाता है।

48) जाल के भर जाने पर मछुए उसे किनारे खींच लेते हैं। तब वे बैठ कर अच्छी मछलियाँ चुन-चुन कर बरतनों में जमा करते हैं और रद्दी मछलियाँ फेंक देते हैं।

49) संसार के अन्त में ऐसा ही होगा। स्वर्गदूत जा कर धर्मियों में से दुष्टों को अलग करेंगे।

50) और उन्हें आग के कुण्ड में झोंक देंगे। वहाँ वे लोग रोयेंगे और दाँत पीसते रहेंगे।

51) ’’क्या तुम लोग यह सब बातें समझ गये?’’ शिष्यों ने उत्तर दिया, ’’जी हाँ’’।

52) ईसा ने उन से कहा, ’’प्रत्येक शास्त्री, जो स्वर्ग के राज्य के विषय में शिक्षा पा चुका है, उस ग्रहस्थ के सदृश है, जो अपने ख़जाने से नयी और पुरानी चीज़ें निकालता है’’।

53) इन दृष्टान्तों के समाप्त होने पर ईसा वहाँ से चले गये।

📚 मनन-चिंतन - 1

आज, सुसमाचार में येसु अपने समय के मछुआरों के सामान्य अनुभवों को लेकर ईमेश्वर के राज्य के रहस्यों को प्रकट करते हैं। मछुआरों का यह नियमित काम था कि मछलियों को पकड़ने के बाद अच्छी मछलियों को बुरी मछलियों से अलग किया जाए। अच्छी मछलियों को इकट्ठा किया जाता और बुरी मछलियों को फेंक दिया जाता। येसु इस बात की तुलना अंतिम न्याय से करते हैं। हमारे कर्मों के अनुसार हमारा न्याय किया जाएगा। अंतिम निर्णय के दिन तक प्रभु प्रभु इंतज़ार करते हैं। प्रभु चाहते हैं कि हम इस बात से अवगत हों कि अंत में धर्मियों और दुष्टों का क्या होगा। यह हमारे लिए ज़रूरी है कि हम दोनों की नियति को जानकर धर्मी या दुष्ट बनने को चुनें। एक दिन हमारे लिए आवंटित समय अचानक समाप्त हो जाएगा और हमें आंका जाएगा। उस दिन हमारे पास कोई विकल्प नहीं होगा। चुनाव प्रभु का ही है। अच्छे लोगों की संगति उस दिन दुष्टों को नहीं बचाएगी। धर्मियों की भलाई दुष्टों की मदद नहीं करेगी। हम सभी का अपनी व्यक्तिगत पवित्रता के अनुसार न्याय किया जाएगा। क्या हम उस दिन के लिए तैयार हैं? यदि हम एक परीक्षा में असफल होते हैं, तो फिर से प्रयास कर सकते हैं; दुबारा लिख सकते हैं। यदि हम एक मैच में असफल होते हैं, तो हमारे पास दूसरी, तीसरी और चौथी मैचों में संभावनाएं हो सकती हैं। लेकिन मृत्यु पर मानव आत्मा को पता चलता है कि उसका एकमात्र अवसर खत्म हो गया है। मृत्यु का समय भी निश्चित नहीं है। यह कभी भी हो सकता है। इसलिए हमें हर समय तैयार रहने के लिए समझदार बनना चाहिए।


📚 REFLECTION

Today, in the Gospel Jesus takes the ordinary experiences of the fishermen of his time and reveals the mysteries of the Kingdom of God. It was a routine work of fishermen to separate the good fish from the bad fish after the catch. The good fish would be collected and the bad fish would be thrown away. Jesus compares this with what will happen to people at the final judgement. We shall be judged according to our deeds. The Lord is patient until the day of final judgement. The Lord wants us to be aware of what will happen to the righteous and the wicked at the end. It is for us to choose to be righteous or wicked after knowing the destiny of both. One day the time allotted to us will abruptly come to an end and we shall be judged. On that day we shall not have a choice. The choice is of the Lord. Company of good people will not save the wicked on that day. Their goodness will not come to the aid of the wicked. We will all be judged according to our personal sanctity. Are we ready for that day? If you fail in an examination, you may attempt again. If you fail in a match, you may have chances in successive matches. But human soul at death realises that it has been through its one and only chance. The time of death is not fixed. It can happen any time. Hence we need to be wise enough to be prepared at all times.

 -Br. Biniush Topno


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29 जुलाई का पवित्र वचन

29 जुलाई 2020
वर्ष का सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह, बुधवार

सन्त मार्था – अनिवार्य स्मृति

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ : 1 योहन 4:7-16

7) प्रिय भाइयो! हम एक दूसरे को प्यार करें, क्योंकि प्रेम ईश्वर से उत्पन्न होता है।

8) जौ प्यार करता है, वह ईश्वर की सन्तान है और ईश्वर को जानता है। जो प्यार नहीं करता, वह ईश्वर को नहीं जानता; क्येोंकि ईश्वर प्रेम है।

9) ईश्वर हम को प्यार करता है। यह इस से प्रकट हुआ है कि ईश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को संसार में भेजा, जिससे हम उसके द्वारा जीवन प्राप्त करें।

10) ईश्वर के प्रेम की पहचान इस में है कि पहले हमने ईश्वर को नहीं, बल्कि ईश्वर ने हम को प्यार किया और हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए अपने पुत्र को भेजा।

11) प्रयि भाइयो! यदि ईश्वर ने हम को इतना प्यार किया, तो हम को भी एक दूसरे को प्यार करना चाहिए।

12) ईश्वर को किसी ने कभी नहीं देखा। यदि हम एक दूसरे को प्यार करते हैं, तो ईश्वर हम में निवास करता है और ईश्वर के प्रति हमारा प्रेम पूर्णता प्राप्त करता है।

13) यदि वह इस प्रकार हमें अपना आत्मा प्रदान करता है, तो हम जान जाते हैं कि हम उस में और वह हम में निवास करता है।

14) पिता ने अपने पुत्र को संसार के मुक्तिदाता के रूप में भेजा। हमने यह देखा है और हम इसका साक्ष्य देते हैं।

15) जो यह स्वीकार करता है कि ईसा ईश्वर के पुत्र हैं, ईश्वर उस में निवास करता है और वह ईश्वर में।

16) इस प्रकार हम अपने प्रति ईश्वर का प्रेम जान गये और इस में विश्वास करते हैं। ईश्वर प्रेम है और जो प्रेम में दृढ़ रहता है, वह ईश्वर में निवास करता है और ईश्वर उस में।

अथवा - सुसमाचार : योहन 11:19-27

19) इसलिये भाई की मृत्यु पर संवेदना प्रकट करने के लिये बहुत से यहूदी मरथा और मरियम से मिलने आये थे।

20) ज्यों ही मरथा ने यह सुना कि ईसा आ रहे हैं, वह उन से मिलने गयी। मरियम घर में ही बैठी रहीं।

21) मरथा ने ईसा से कहा, “प्रभु! यदि आप यहाँ होते, तो मेरा भाई नही मरता

22) और मैं जानती हूँ कि आप अब भी ईश्वर से जो माँगेंगे, ईश्वर आप को वही प्रदान करेगा।“

23) ईसा ने उसी से कहा “तुम्हारा भाई जी उठेगा“।

24) मरथा ने उत्तर दिया, “मैं जानती हूँ कि वह अंतिम दिन के पुनरुथान के समय जी उठेगा“।

25) ईसा ने कहा, "पुनरुथान और जीवन में हूँ। जो मुझ में विश्वास करता है वह मरने पर भी जीवित रहेगा

26) और जो मुझ में विश्वास करते हुये जीता है वह कभी नहीं मरेगा। क्या तुम इस बात पर विश्वास करती हो?"

27) उसने उत्तर दिया, "हाँ प्रभु! मैं दृढ़ विश्वास करती हूँ कि आप वह मसीह, ईश्वर के पुत्र हैं, जो संसार में आने वाले थे।"

अथवा - सुसमाचार : लूकस 10:38-42

38) ईसा यात्रा करते-करते एक गाँव आये और मरथा नामक महिला ने अपने यहाँ उनका स्वागत किया।

39) उसके मरियम नामक एक बहन थी, जो प्रभु के चरणों में बैठ कर उनकी शिक्षा सुनती रही।

40) परन्तु मरथा सेवा-सत्कार के अनेक कार्यों में व्यस्त थी। उसने पास आ कर कहा, ’’प्रभु! क्या आप यह ठीक समझते हैं कि मेरी बहन ने सेवा-सत्कार का पूरा भार मुझ पर ही छोड़ दिया है? उस से कहिए कि वह मेरी सहायता करे।’’

41) प्रभु ने उसे उत्तर दिया, ’’मरथा! मरथा! तुम बहुत-सी बातों के विषय में चिन्तित और व्यस्त हो;

42) फिर भी एक ही बात आवश्यक है। मरियम ने सब से उत्तम भाग चुन लिया है; वह उस से नहीं लिया जायेगा।’’

📚 मनन-चिंतन - 1

आज हम बेथानिया की संत मरथा का त्योहार मनाते हैं, जो मरियम और लाज़रुस की बहन थी। मरथा को उनके आतिथ्य के लिए याद किया जाता है। जब येसु उनके परिवार में आते हैं, तब वह उनकी सेवा में व्यस्त हो जाती है। वह न केवल सेवा करती है, बल्कि अपनी बहन मरियम से भी अपेक्षा करती है कि वह प्रभु की सेवा में उसकी मदद करें। फिर, जब लाज़रुस की मृत्यु के बाद येसु बेथानिया में उनसे मिलने जाते हैं, तो मरथा येसु से मिलने के लिए निकल पड़ती है। इस प्रकार वह आतिथ्य के कर्तव्य को पूरा करती है। योहन 12: 2 में येसु के आगमन पर, सुसमाचार लेखक लिखता है - "मरथा परोसती थी"। यह अक्सर कई पिताओं के खिलाफ शिकायत है कि उनके पास बच्चों के लिए समय नहीं है। कई पिता अपनी पत्नी और बच्चों के लिए आजीविका कमाने में इतने व्यस्त हैं कि वे कभी-कभी परिवार के साथ रहने का समय नहीं निकाल पाते हैं। वे अपने कर्तव्यों और कार्यों में व्यस्त हैं और अपने प्रियजनों के लिए अपना प्यार प्रकट करने के लिए बहुत कम समय पाते हैं। सुसमाचर में हम मरथा को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पाते हैं जो अपने सेवा-कार्य में व्यस्त है, लेकिन वह उस अतिथि के साथ समय बिताने में विफल रहती है जिसकी वह सेवा करती है। येसु उसे समझाते हैं कि प्रभु के चरणों में बैठना, ईश्वर के वचन को सुनना और उसे आंतरिक करना प्रभु के नाम पर हमारी सेवा के कार्यों से अधिक महत्वपूर्ण है। यदि हम ईश्वर के वचन की उपेक्षा करते हैं, तो हमारी प्रशंसनीय मेहनत भी एक जोखिम हो सकती है। संत योहन के सुसमाचार में हम कई विश्वास की घोषणाएं पाते हैं। मरथा भी जब येसु से कहती है, "मैं दृढ़ विश्वास करती हूँ कि आप वह मसीह, ईश्वर के पुत्र हैं, जो संसार में आने वाले थे" (योहन 11:27)। यह संत पेत्रुस की विश्वास-घोषणा के समान है जो हमें मत्ती 16:16 में मिलता है। उससे पहले उसने मृतकों के पुनरुत्थान में अपना विश्वास व्यक्त किया था। इस प्रकार मरथा हमें आतिथ्य, सेवा और विश्वास के महान सबक सिखाती है!


📚 REFLECTION

Today we celebrate the feast of St. Martha of Bethany, sister of Mary and Lazarus. Martha is remembered for her hospitality. When Jesus comes to her family she gets busy with serving him. She not only serves, but expects her sister Mary too to help her in serving the Lord. Again, when Jesus comes to visit her family at Bethany after the death of Lazarus, it is Martha who comes to greet Jesus, fulfilling her duty of hospitality. In Jn 12:2 at yet another visit of Jesus, the evangelist mentions – “Martha served”.

It is often a complaint against many Dads that they have no time for children. Many of the dads are too busy with earning a livelihood for their wife and children that they may sometimes fail to find time to be with the family. They are busy with their duties and tasks and find little time to express their love for their dear ones. In the Gospel we find Martha as a person who is busy with her act of serving, but fails to spend time with the guest whom she serves. Jesus makes her understand that sitting at the feet of the Lord, listening to and interiorising the Word of God is more important than our acts of service in the name of the Lord. Even our laudable hard work can be at risk if the Word of God is neglected.

In the Gospel of St. John, we find many Christological declarations. Martha too makes a Christological declaration when she says to Jesus, “I believe that you are the Messiah, the Son of God, the one coming into the world” (Jn 11:27). This is very similar the Christological declaration of St. Peter which we find in Mt 16:16. Prior to that, she expressed her belief in the resurrection of the dead. Thus Martha teaches us great lessons of hospitality, service and faith.

 -Br. Biniush Topno

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28;जुलाई का पाठ

28 जुलाई 2020
वर्ष का सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह, मंगलवार

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पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 14:17-22

17) “तुम उन्हें यह कहोगे: ’मैं दिन-रात निरन्तर आँसू बहाता रहता हूँ, क्योंकि मेरी पुत्री विपत्ति की मारी है, मेरी प्रजा घोर संकट में पड़ी हुई है।

18) यदि मैं खेतों की ओर जाता हूँ, तो तलवार से मारे हुए लोगों को देखता हूँ और यदि मैं नगर में आता हूँ, तो उन्हें भूखों मरते देखता हूँ। नबी और याजक भी देश में मारे-मारे फिरते हैं और नहीं समझते हैं कि क्या हो रहा है?।“

19) क्या तूने यूदा को त्याग दिया है? क्या तुझे सियोन से घृणा हो गयी है? तूने हमें क्यों इस प्रकार मारा है, कि अब उपचार असम्भव हो गया है। हम शान्ति की राह देखते रहे, किन्तु वह मिली नहीं। हम कल्याण की प्रतीक्षा करते रहे, किन्तु आतंक बना रहा।

20) प्रभु! हम अपनी दुष्टता और अपने पूर्वजों का अपराध स्वीकार करते हैं। हमने तेरे विरुद्ध पाप किया है।

21) अपने नाम के कारण हमें न ठुकरा; अपने महिमामय सिंहासन का अपमान न होने दे। हमारे लिए अपने विधान को न भुला और उसे भंग न कर।

22) क्या राष्ट्रों के देवताओं में कोई पानी बरसा सकता है? क्या आकाश अपने आप वर्षा कर सकता है? हमारे प्रभु-ईश्वर! तुझ में ही यह सामर्थ्य है। इसलिए हमें तेरा भरोसा है; क्योंकि तू ही यह सब करता है।

सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 13:36-43

36) ईसा लोगों को विदा कर घर लौटे। उनके शिष्यों ने उनके पास आ कर कहा, ’’खेत में जंगली बीज का दृष्टान्त हमें समझा दीजिए’’।

37) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, ’’अच्छा बीज बोने बाला मानव पुत्र हैं;

38) खेत संसार है; अच्छा बीज राज्य की प्रजा है; जंगली बीज दृष्ट आत्मा की प्रजा है;

39) बोने बाला बैरी शैतान है; कटनी संसार का अंत है; लुनने वाले स्वर्गदूत हैं।

40) जिस तरह लोग जंगली बीज बटोर कर आग में जला देते हैं, वैसा ही संसार के अंत में होगा।

41) मानव पुत्र अपने स्वर्गदूतों को भेजेगा और वे उसके राज्य क़़ी सब बाधाओं और कुकर्मियों को बटोर कर आग के कुण्ड में झोंक देंगें।

42) वहाँ वे लोग रोयेंगे और दाँत पीसते रहेंगे।

43) तब धर्मी अपने पिता के राज्य में सूर्य की तरह चमकेंगे। जिसके कान हों, वह सुन ले।

📚 मनन-चिंतन - 1

खेत के जंगली बीज के दृष्टांत के माध्यम से प्रभु येसु हमें यह बताना चाहते हैं कि हम इस दुनिया में जीवन भर अच्छे और बुरे के बीच संघर्ष में शामिल हैं। प्रभु ईश्वर अच्छे बीज बोते रहते हैं। शैतान जंगली बीज बोता रहता है। हमें, जो ज्ञान और विवेक के साथ सृष्ट किये गये हैं, लगभग हर समय अच्छे और बुरे के बीच वास्तविक चयन करना पडता है। धर्मियों को अंत में, अच्छाई की अंतिम जीत पर पुरस्कृत किया जाएगा। दृष्टान्त तब अधिक जटिल हो जाता है जब हम सीखते हैं कि जिस जंगली बीज का ज़िक्र प्रभु येसु करते हैं, वह गेहूँ की तरह ही दिखता है। दाने दिखाई देने पर ही अंतर स्पष्ट हो जाता है। सन्देश स्पष्ट है - शैतान हमें धोखा देने की कोशिश करता है। जब तक हम सतर्क और सावधान नहीं रहेंगे, हम उसके धोखे के शिकार बने रहेंगे। सूक्ति 14:12 में हम पढ़ते हैं, "कुछ लोग अपना आचरण ठीक समझते हैं, किन्तु वह अन्त में उन्हें मृत्यु की ओर ले जाता है"। संत पौलुस कहते हैं, "यह आश्चर्य की बात नहीं, क्योंकि स्वयं शैतान ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का स्वाँग रचता है" (2 कुरिन्थियों 11:14)। 2 कुरिन्थियों 11: 3 में वे कहते हैं कि शैतान "ने अपनी धूर्तता से हेवा को धोखा दिया था”। प्रकाशना 12: 9 में शैतान को सारे संसार को भटकाने वाला कहा गया है। इस प्रकार आज का सुसमाचार ख्रीस्तीय जीवन में सावधानी और सतर्कता का आह्वान करता है।



📚 REFLECTION

Through the parable of the weeds of the field, Jesus wants us to know that we are constantly involved in a conflict between good and evil throughout our lives in this world. God keeps sowing the good seeds. The devil keeps sowing weeds. We who are gifted with reasoning and discernment are to make real choices between good and evil almost all the time. The righteous will be rewarded at the end of the battle, at the ultimate victory of goodness. The parable becomes more complex when we learn that the darnel is a weed that looks like wheat. The differences become apparent only when the grains appear. Hence the devil tries to deceive us. Unless we are alert and careful, we shall be cheated by him. In Prov 14:12 we read, “There is a way that seems right to a person, but its end is the way to death”. St. Paul says, “Even Satan disguises himself as an angel of light” (2 Cor 11:14). In 2Cor 11:3 he speaks about the devil who deceived Eve “by his craftiness”. Rev 12:9 refers to Satan as one “who deceives the whole world”. This calls for caution and alertness.

✍️ - Br. Biniush Topno

27 जुलाई का पाठ

27 जुलाई 2020
वर्ष का सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह, सोमवार

पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 13:1-11

1) प्रभु ने मुझ से यह कहा, “तुम जा जा कर छालटी की पेटी ख़रीदो और कमर में बाँध लो, किन्तु उसे पानी में नहीं डुबाओ“।

2) मैंने प्रभु के आदेशानुसार पेटी खरीद कर कमर में बाँध ली।

3) प्रभु ने मुझ से दूसरी बार कहा,

4) “तुमने जो पेटी खरीदी, उसे कमर में बाँध कर तुरन्त फ़रात नदी जाओ और उसे वहाँ किसी चट्टान की दरार में छिपा दो।“

5) मैंने प्रभु के आदेशानुसार फ़रात जा कर वहाँ पेटी छिपा दी।

6) बहुत समय बाद प्रभु ने मुझ से कहा, “फ़रात जा कर वह पेटी ले आओ, जिसे तुमने मेरे आदेशानुसार वहाँ छिपाया।“

7) मैंने फ़रात जा कर उस जगह का पता लगाया, जहाँ मैंने पेटी छिपायी थी। मैंने उसे निकाल कर देखा कि वह बिगड़ गयी है और किसी काम की नहीं रह गयी है।

8) तब प्रभु की वाणी मुझे यह कहते हुए सुनाई पड़ी,

9) “प्रभु यह कहता हैः “मैं इसी प्रकार यूदा और येरुसालेम का गौरव नष्ट हो जाने दूँगा।

10) यह दुष्ट प्रजा मेरी एक भी नहीं सुनना चाहती और हठपूर्वक अपनी राह चलती है। यह दूसरे देवताओं की अनुयायी बन कर उनकी उपासना और आराधना करती है। इसलिए यह इस पेटी की तरह किसी काम की नहीं रहेगी ;

11) क्योंकि जिस तरह पेटी मनुय की कमर में कस कर बाँधी जाती है, उसी तरह मैंने समस्त इस्राएल और यूदा को अपने से बाँध लिया था, जिससे वे मेरी प्रजा, मेरा गौरव, मेरी कीर्ति और मेरी शोभा बन जायें। किन्तु उन्होंने मेरी एक भी न सुनी।’ यह प्रभु की वाणी है।

सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 13:31-35

31) ईसा ने उनके सामने एक और दृष्टान्त प्रस्तुत किया, ’’स्वर्ग का राज्य राई के दाने के सदृश है, जिसे ले कर किसी मनुष्य ने अपने खेत में बोया।

32) वह तो सब बीजों से छोटा है, परन्तु बढ़ कर सब पोधों से बड़ा हो जाता है और ऐसा पेड़ बनता है कि आकाश के पंछी आ कर उसकी डालियों में बसेरा करते हैं।’’

33) ईसा ने उन्हें एक दृष्टान्त सुनाया,’’स्वर्ग का राज्य उस ख़मीर के सदृश है, जिसे लेकर किसी स्त्री ने तीन पंसेरी आटे में मिलाया और सारा आटा खमीर हो गया’’।

34) ईसा दृष्टान्तों में ही ये सब बातें लोगों को समझाते थे। वह बिना दृष्टान्त के उन से कुछ नहीं कहते थे,

35) जिससे नबी का यह कथन पूरा हो जाये- मैं दृष्टान्तों में बोलूँगा। पृथ्वी के आरम्भ से जो गुप्त रहा, उसे मैं प्रकट करूँगा।

📚 मनन-चिंतन - 1

आज का सुसमाचार राई के बीज को सभी बीजों में से सबसे छोटे के रूप में प्रस्तुत करता है और स्वर्गराज्य की तुलना इस सबसे छोटे बीज से की जाती है। जबकि राई का बीज सबसे छोटा बीज है या नहीं, इस बारे में एक अनिर्णायक और अनिश्चित बहस हो सकती है, अगर हम इस तरह की बहस में प्रवेश करते हैं तो हम केवल भटक जायेंगे और सुसमाचार के वास्तविक संदेश से वंचित रह जाएंगे। वह बीज अंकुरित होता है और एक बड़ा पेड़ बन जाता है और आकाश के पंछी आ कर उसकी डालियों में बसेरा करने लगते हैं।

दूसरे दृष्टान्त में प्रभु येसु स्वर्गराज्य की तुलना ख़मीर से करते हैं, जिसे लेकर किसी स्त्री ने तीन पंसेरी आटे में मिलाया और सारा आटा खमीर हो गया। प्रभु येसु हमें यह बताना चाहते हैं कि सबसे छोटे तरीके से मौजूद स्वर्गराज्य के रहस्यों का समाज पर बहुत प्रभाव हो सकता है। इन दोनों उदाहरणों में छोटी सी शुरुआत है, लेकिन बड़ी वृद्धि है। करुणा के सबसे छोटे कार्य का भी आस-पास के लोगों पर बहुत प्रभाव पड़ेगा। थोड़ी मुस्कुराहट, दया का कोई लघुकार्य, सांत्वना का एक शब्द - इन सभी का दूसरों पर बहुत प्रभाव हो सकता है। ईश्वर के राज्य के सन्देशवाहक बहुत फल उत्पन्न करने वाले प्रभु पर भरोसा रखते हुए दयालुता और उदारता के सरल कर्मों को अंजाम देते रहते हैं। कलकत्ता की संत तेरेसा ने एक बार कहा था, “हम में से सब महान कार्य नहीं कर सकते हैं। लेकिन हम छोटे काम बड़े प्यार से कर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा, "दयालुता का एक शब्द, बोलने में आसान हो सकते हैं और छोटा भी, लेकिन उसकी गूँज वास्तव में अंतहीन होती है"।

✍- ब्रो बिनियु्स टोपनो


📚 REFLECTION

The Gospel passage of today presents the mustard seed as the smallest of all seeds and the kingdom of heaven is compared to this smallest seed. While there can be an inconclusive and ongoing debate about whether mustard seed is the smallest seed, if we enter into such debates we shall only lose the focus and be deprived of the real message of the Gospel. The seed sprouts and grows into a large tree so as to give shelter to the birds of the air.

We also have the parable of the leaven influencing the whole dough. Jesus wants us to know that the Kingdom of heaven present even in the smallest ways can have great influence on the society. Both these examples have small unassuming beginnings, but great growth. Even the smallest act of compassion will have great influence on the people around. A little smile, a kind gesture, a word of consolation – all these can have great influence on others. The messengers of the Kingdom of God are to carry out simple deeds of kindness and generosity trusting in the Lord who brings us results. St. Theresa of Calcutta once said, “Not all of us can do great things. But we can do small things with great love”. She also said, “Kind words can be short and easy to speak, but their echoes are truly endless”.

 Br. Biniush Topno



26 July Bible Reading

26 जुलाई 2020
वर्ष का सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार

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पहला पाठ : राजाओं का पहला ग्रन्थ 3:5, 7-12

3) सुलेमान को प्रभु से प्रेम था और वह अपने पिता दाऊद के विधानों के अनुसार कार्य करता था; लेकिन वह पहाड़ी पूजास्थानों पर बलि चढ़ाता और धूप दिया करता था।

7) प्रभु! मेरे ईश्वर! तूने अपने इस सेवक को अपने पिता दाऊद के स्थान पर राजा बनाया, लेकिन मैं अभी छोटा हूँ। मैं यह नहीं जानता कि मुझे क्या करना चाहिए।

8) मैं यहाँ तेरी चुनी हुई प्रजा के बीच हूँ। यह राष्ट्र इतना महान् है कि इसके निवासियों की गिनती नहीं हो सकती।

9) अपने इस सेवक को विवेक देने की कृपा कर, जिससे वह न्यायपूर्वक तेरी प्रजा का शासन करे और भला तथा बुरा पहचान सके। नहीं तो, कौन तेरी इस असंख्य प्रजा का शासन कर सकता है?’’

10) सुलेमान का यह निवेदन प्रभु को अच्छा लगा।

11) प्रभु ने उसे से कहा, ‘‘तुमने अपने लिए न तो लम्बी आयु माँगी, न धन-सम्पत्ति और न अपने शत्रुओं का विनाश।

12) तुमने न्याय करने का विवेक माँगा है। इसलिए मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा। मैं तुम को ऐसी बुद्धि और ऐसा विवेक प्रदान करता हूँ कि तुम्हारे समान न तो पहले कभी कोई था और न बाद में कभी कोई होगा।

दूसरा पाठ : रोमियों 8:28-30

28) हम जानते हैं कि जो लोग ईश्वर को प्यार करते हैं और उसके विधान के अनुसार बुलाये गये हैं, ईश्वर उनके कल्याण के लिए सभी बातों में उनकी सहायता करता है;

29) क्योंकि ईश्पर ने निश्चित किया कि जिन्हें उसने पहले से अपना समझा, वे उसके पुत्र के प्रतिरूप बनाये जायेंगे, जिससे उसका पुत्र इस प्रकार बहुत-से भाइयों का पहलौठा हो।

30) उसने जिन्हें पहले से निश्चित किया, उन्हें बुलाया भी है: जिन्हें बुलाया, उन्हें पाप से मुक्त भी किया है और जिन्हें पाप से मुक्त किया, उन्हें महिमान्वित भी किया है।

सुसमाचार : मत्ती 13:44-52

44) ’’स्वर्ग का राज्य खेत में छिपे हुए ख़ज़ाने के सदृश है, जिसे कोई मनुष्य पाता है और दुबारा छिपा देता है। तब वह उमंग में जाता और सब कुछ बेच कर उस खेत को ख़रीद लेता है।

45) ’’फिर, स्वर्ग का राज्य उत्तम मोती खोजने वाले व्यापारी के सदृश है।

46) एक बहुमूल्य मोती मिल जाने पर वह जाता और अपना सब कुछ बेच कर उस मोती को मोल ले लेता है।

47) ’’फिर, स्वर्ग का राज्य समुद्र में डाले हुए जाल के सदृश है, जो हर तरह की मछलियाँ बटोर लाता है।

48) जाल के भर जाने पर मछुए उसे किनारे खींच लेते हैं। तब वे बैठ कर अच्छी मछलियाँ चुन-चुन कर बरतनों में जमा करते हैं और रद्दी मछलियाँ फेंक देते हैं।

49) संसार के अन्त में ऐसा ही होगा। स्वर्गदूत जा कर धर्मियों में से दुष्टों को अलग करेंगे।

50) और उन्हें आग के कुण्ड में झोंक देंगे। वहाँ वे लोग रोयेंगे और दाँत पीसते रहेंगे।

51) ’’क्या तुम लोग यह सब बातें समझ गये?’’ शिष्यों ने उत्तर दिया, ’’जी हाँ’’।

52) ईसा ने उन से कहा, ’’प्रत्येक शास्त्री, जो स्वर्ग के राज्य के विषय में शिक्षा पा चुका है, उस ग्रहस्थ के सदृश है, जो अपने ख़जाने से नयी और पुरानी चीज़ें निकालता है’’।

📚 मनन-चिंतन - 1

हम अक्सर 'ट्रेजर हंट' नामक खेल खेलते हैं। इस खेल में हम कुछ चीज़ की खोज का प्रयास करते हैं जो परिसर में कहीं छिपायी गयी है। कुछ लोग इस तरह के खेलों में भाग लेना ही पसंद नहीं करते क्योंकि वे बहुत सारे प्रयासों की मांग करते हैं, जबकि कई अन्य लोग आश्वस्त लेकिन अज्ञात निश्चितता का सामना करने में रुचि रखते हैं। इस खेल में जब यह देखा जाता है कि अधिकांश खिलाड़ी अपने प्रयासों के बावजूद असफल होते हैं, तब जो खेल का संचालन करता है वह सामान्य रूप से कुछ सुराग देता है। तब खिलाड़ी दिए गए सुरागों के आधार पर अपने प्रयासों को आगे बढ़ाते हैं और कोई खजाना पाने में सफल होता है।

आज का सुसमाचार, ईश्वर के राज्य को खेत में छिपे खजाने के रूप में प्रस्तुत करता है। खजाने को छिपे हुए के रूप में प्रस्तुत करके, येसु हमें यह बताना चाहते हैं कि हमें सबसे पहले खजाने की अमूल्यता और महानता के बारे में पता होना चाहिए। सुसमाचार में उल्लेख व्यक्ति को ख़ज़ाने के अस्तित्व के बारे में दृढ़धारणा है और इसीलिए वह इसकी खोज में निकल पड़ता है। वह इसे पाने के लिए आशावान रहता है। फिर वह उसे खोजने का प्रयास करता है। वह खजाना सहजता से उसे नहीं मिलता है। उसे तलाश करना पड़ता है। इस स्तर पर उसे उस खजाने को हासिल करने के अपने प्रयासों को सही दिशा-निर्देश देना होगा, अन्य मामलों में व्यस्त नहीं रहना चाहिए। उसे प्राप्त करने की दिशा में हर प्रयास को बदलना होगा। उसे प्राप्त करने के बाद, उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यह कभी खो न जाए। उसके संरक्षण के लिए भी उसे प्रयास करते रहना पड़ता है।

यह ईश्वर के राज्य की वास्तविकता है। हमें इस तरह के खजाने के अस्तित्व के बारे में आश्वस्त होना चाहिए और इसे खोजने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। मिल जाने के बाद, हमें इसे महत्व देने और इसे संरक्षित रखना चाहिए। हमें हमारे प्रयासों को उस खजाने पर केन्द्रित करना तथा भटकने से बचना होगा।

दूसरे दृष्टांत में, येसु ने ईश्वर के राज्य की तुलना एक ऐसे व्यापारी से की है जो बढ़िया मोती खोज रहा है और उस मूल्यवान खजाने को हासिल करने के लिए वह अपनी सारी संपत्ति बेचता है। वह उस नए पाए गए बहुमूल्य मोती को प्राप्त करने के लिए कम मूल्य के अन्य सभी मोती देने को तैयार है।

इन दोनों दृष्टांतों के द्वारा प्रभु येसु चाहते हैं कि हम राज्य की महानता से अवगत हों, उसे हासिल करने और संरक्षित करने के लिए हर संभव प्रयास करें। हमें अपनी बहुत सी छोटी-छोटी चीज़ों को त्यागने और ईश्वर के राज्य की खातिर अपने आराम क्षेत्रों से बाहर निकलने के लिए तैयार रहना चाहिए।

संत पौलुस कहते हैं, “ मैं जिन बातों को लाभ समझता था, उन्हें मसीह के कारण हानि समझने लगा हूँ। इतना ही नहीं, मैं प्रभु ईसा मसीह को जानना सर्वश्रेष्ठ लाभ मानता हूँ और इस ज्ञान की तुलना में हर वस्तु को हानि ही मानता हूँ। उन्हीं के लिए मैंने सब कुछ छोड़ दिया है और उसे कूड़ा समझता हूँ, जिससे मैं मसीह को प्राप्त करूँ और उनके साथ पूर्ण रूप से एक हो जाऊँ। मुझे अपनी धार्मिकता का नहीं, जो संहिता के पालन से मिलती है, बल्कि उस धार्मिकता का भरोसा है, जो मसीह में विश्वास करने से मिलती है, जो ईश्वर से आती है और विश्वास पर आधारित है।” (फिलिप्पियों 3: 7-9)।


📚 REFLECTION

We often play the game called ‘Treasure Hunt’. In this game we are to make efforts to search for some specific material which is hidden somewhere in the campus. Some do not like to participate in such games since they demand a lot of efforts, while others are interested in confronting the assured but unknown certainty. When it is noticed that most of the players are unsuccessful in spite of their efforts, the one who conducts the game normally gives some clues. Then the players refocus their efforts based on the clues given and someone succeeds in finding the treasure.

The Gospel presents the Kingdom of God as a Treasure hidden in the field. By presenting the treasure as hidden, Jesus wants us to know that we need to first of all be aware of the preciousness and greatness of the treasure. The man in the Gospel is convinced of the existence of the treasure and that is why he sets out to search for it. He is hopeful in finding it. Then he makes effort to find it. It does not effortlessly come to him. He has to seek. At this stage he has to refocus his efforts to acquire that treasure, not getting diverted to other matters. He has to channelize every effort towards acquiring it. Once acquired, he needs to value it and ensure that it is never lost. Preservation also calls for efforts.

This is the reality of the Kingdom of God. We are to be convinced of the existence of such a treasure and set out to seek it and make every effort to find it. Once found, we need to value it and preserve it. We have to avoid distractions and diversions to have the possession of the treasure.

In another parable, Jesus compares the Kingdom of God to a merchant looking for fine pearls and finding one of great value he sells all his possessions to acquire that valuable treasure. The merchant is willing to give up all other pearls of lower value to acquire that newly found precious pearl.

In both these parables Jesus wants us to be aware the greatness of the Kingdom, to make every effort to acquire and preserve it. We should be willing to forego many of our little possessions and move out of our comfort zones for the sake of the Kingdom of God.

In the first reading, we find that Solomon was a humble seeker of God’s wisdom. He was focussed too. When the Lord said to him, “Ask what you would like me to give you”, he simply asked for “a heart to understand how to govern your people, how to discern between good and evil”. The Lord lavished upon him wisdom that he asked for and wealth and prosperity which he had not asked for. He was, no doubt, seeking a treasure. For sometime he valued that treasure; yet in the latter part of his life, he lost focus and began to seek passing pleasures of this world. Thus he lost the favour of the Lord.

St. Paul says, “Yet whatever gains I had, these I have come to regard as loss because of Christ. More than that, I regard everything as loss because of the surpassing value of knowing Christ Jesus my Lord. For his sake I have suffered the loss of all things, and I regard them as rubbish, in order that I may gain Christ and be found in him” (Phil 3:7-9).

The parable of the fishing net, reminds us of the reality of the final judgment when the righteous will inherit the Kingdom and the wicked will receive eternal punishment. Nothing unclean can enter heaven, because holiness and evil cannot co-exist just as light and darkness cannot co-exist.

 -Br. Biniush Topno

मनन-चिंतन

जब गिबओन में प्रभु रात को राजा सुलेमान को स्वप्न में दिखाई दिये और उन्होंने कहा, ‘‘बताओ, मैं तुम्हें क्या दे दूँ?’’ तब सुलेमान ने प्रभु से प्रभु की चुनी हुयी प्रजा पर न्यायपूर्वक शासन करने तथा भला तथा बुरा पहचान सकने के लिए विवेक माँगा। प्रभु इस बात पर बहुत प्रसन्न हुए कि सुलेमान ने अपने लिए न तो लम्बी आयु माँगी, न धन-सम्पत्ति और न अपने शत्रुओं का विनाश बल्कि न्याय करने का विवेक माँगा। इसलिए प्रभु ने सुलेमान को अतुलनीय बुद्धि और विवेक प्रदान किया। उसके साथ-साथ प्रभु ने उन्हें अतुलनीय धन-सम्पत्ति तथा ऐश्वर्य भी प्रदान किया, जिससे कोई भी राजा उनकी बराबरी नहीं कर पाये।

इब्राहीम ने ईश्वर से सोदम और गोमोरा के लोगों को बचाने के लिए ईश्वर से प्रार्थना की (दे. उत्पत्ति 18)। निर्गमन ग्रन्थ में हम यह पाते हैं कि मूसा बार-बार इस्राएलियों को विभिन्न संकटों से बचाने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। यूदीत और एस्तेर ने ईश्वर की प्रजा की सुरक्षा के लिए प्रभु से प्रार्थना की थी। दानिएल ने ईश्वर से ईश्वर के रहस्यों को जानने की कृपा माँगी। टोबीत, सारा और सुसन्ना ने अपने जीवन की निराशामय परिस्थिति में ईश्वर से राहत के लिए प्रार्थना की।

1 समुएल 1:1-17 में हम देखते हैं कि एल्काना नामक सूफ़वंशी मनुष्य की पत्नी अन्ना शिलो जाकर मन्दिर में दुःखी हो कर प्रभु से प्रार्थना करती है कि प्रभु उसे एक पुत्र प्रदान करे। वह प्रभु से वादा करती है कि अगर उसे एक पुत्र प्राप्त होगा तो वह उसे जीवन भर के लिए प्रभु को अर्पित करेगी।

सुसमाचार में हम देखते हैं कि कई लोग प्रभु येसु के पास आकर चंगाई के लिए या अपदूतों से छुटकारा पाने के लिए या किसी मृतक को जिलाने के लिए प्रार्थना करते हैं। मारकुस 10:37 में ज़बेदी के पुत्र याकूब और योहन प्रभु येसु से अपने राज्य की महिमा में उन दोनों को अपने साथ - एक को अपने दायें और एक को अपने बायें - बैठने देने की कृपा माँगते हैं’’।

अब हम ये प्रश्न उठा सकते हैं कि हम ईश्वर से क्या-क्या माँगते हैं। हममें से ज़्यादात्तर लोग अपने दैनिक जीवन की छोटी-मोटी ज़रूरतों की पूर्ति के लिए ही ईश्वर से वरदान माँगते हैं। कभी हम आर्थिक संकट से बचने के लिए कृपा माँगते हैं तो कभी नौकरी मिलने के लिए। कभी हम चंगाई की माँग करते हैं तो कभी हम बच्चों की अच्छी पढ़ाई के लिए मदद माँगते हैं।

ईश्वर सुलेमान की माँग पर प्रसन्न हुये। अब हम इस पर मनन चिंतन करें कि ईश्वर क्या चाहते हैं कि हम माँगे।

मत्ती 6:6-13 में प्रभु हमें समझाते हैं कि हमें लम्बी-लम्बी प्रार्थनाएँ कर अपनी माँगों को ईश्वर के समक्ष रखने की कोई ज़रूरत नहीं हैं क्योंकि हमारे माँगने पहले स्वर्गिक पिता जानते हैं कि हमंा किन-किन चीज़ों की ज़रूतत हैं। तत्प श्चात प्रभु शिष्यों से ईश्वर का नाम पवित्र माना जाने, ईश्वर का राज्य आने, ईश्वर की इच्छा इस पृथ्वी पर पूरी होने, प्रतिदिन का भोजन मिलने तथा बुराई से बचने के लिए प्रार्थना करना सिखाया।

मत्ती 9:37 में प्रभु येसु फ़सल के स्वामी से अपनी फ़सल काटने हेतु मज़दूरों को भेजने के लिए विनती करने को कहते हैं। लूकस 11:13 में प्रभु हमें अपने स्वर्गिक पिता से पवित्र आत्मा माँगने का आह्वान करते हैं। योहन 4:10 में प्रभु येसु समारी स्त्री को संजीवन जल के लिए प्रार्थना करने की सलाह देते हैं। प्रेरित-चरित 1 में हम अटारी में माता मरियम और येसु के प्रेरितों के साथ पवित्र आत्मा के आगमन के लिए प्राथना करने वाले करीब 120 लोगों के समुदाय को पाते हैं। प्रेरित-चरित 4:29-30 में हम देखते हैं विश्वासियों का समुदाय ईश्वर से निर्भीकता से वचन सुनाने तथा ईसा के नाम पर स्वास्थ्यलाभ, चिन्ह तथा चमत्कार प्रकट होने के लिए प्रार्थना करते हैं।

सूक्ति 30:7-9 में पवित्र वचन कहता है - “मैं तुझ से दो वरदान माँगता हूँ, उन्हे मेरे जीवनकाल में ही प्रदान कर। मुझ से कपट और झूठ को दूर कर दे। मुझे न तो गरीबी दे और न अमीरी- मुझे आवश्यक भोजन मात्र प्रदान कर। कहीं ऐसा न हो कि मैं धनी बन कर तुझे अस्वीकार करते हुए कहूँ ‘‘प्रभु कौन है?‘‘ अथवा दरिद्र बन कर चोरी करने लगूँ और अपने ईश्वर का नाम कलंकित कर दूँ।“

शोकगीत 2:18-21 में सारे हृदय से प्रभु, सियोन के रक्षक से आँसू दिन-रात नदी की तरह बहाते हुए हृदय की गहराई से अपने बच्चों के प्राण बचाने के लिए प्रभु के सामने हाथ उठा कर प्रार्थना करने का आह्वन है। संत योहन कहते हैं, ““हमें ईश्वर पर यह भरोसा है कि यदि हम उसकी इच्छानुसार उस से कुछ भी मांगते हैं, तो वह हमारी सुनता है”। (योहन 5:14)

इस प्रकार यह साफ है, प्रभु की इच्छा यह है कि हम निस्वार्थ भाव से आध्यात्मिक वरदानों के लिए प्रार्थना करें। सबसे बडी प्रार्थना ईश्वर की इच्छा को स्वीकार करने की हिम्मत पाने की पार्थना है। इसी प्रकार की प्रार्थना प्रभु येसु ने गेदसेमनी में की थी। हम विनती करें कि ईश्वर की कृपा से हम भी अपने दैनिक जीवन में ईश्वर की इच्छा सहर्ष स्वीकार कर पायें।

-ब्रो बिनीयुस टोपनो