11 दिसंबर 2020
आगमन का दूसरा सप्ताह, शुक्रवार
📒 पहला पाठ: इसायाह का ग्रन्थ 48:17-19
17) प्रभु, इस्राएल का परमपावन ईश्वर, तुम्हारा उद्धारक यह कहता हैः “मैं प्रभु, तुम्हारा ईश्वर हूँ। मैं तुम्हें कल्याण की बातें बतलाता हूँ और मार्ग में तुम्हारा पथप्रदर्शन करता हूँ।
18) “यदि तुमने मेरी आज्ञाओं का पालन किया होता, तो तुम्हारी सुख-शान्ति नदी की तरह उमड़ती रहती और तुम्हारी धार्मिकता समुद्र की लहरों की तरह।
19) “तुम्हारे वंशज बालू की तरह हो गये होते, तुम्हारी सन्तति उसके कणों की तरह असंख्य हो जाती। उसका नाम कभी नहीं मिटता और मैं उसे कभी अपनी दृष्टि से दूर नहीं करता।“
📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 11:16-19
16) ’’मैं इस पीढ़ी की तुलना किस से करूँ? वे बाजार में बैठे हुए छोकरों के सदृश हैं, जो अपने साथियों को पुकार कर कहते हैं-
17) हमने तुम्हारे लिए बाँसुरी बजायी और तुम नहीं नाचे, हमने विलाप किया और तुमने छाती नहीं पीटी;
18) क्योंकि योहन बपतिस्ता आया, जो न खाता और न पीता है और वे कहते हैं- उसे अपदूत लगा है।
19) मानव पुत्र आया, जो खाता-पीता है और वे कहते हैं- देखो, यह आदमी पेटू और पियक्कड़ है, नाकेदारों और पापियों का मित्र है। किन्तु ईश्वर की प्रज्ञा परिणामों द्वारा सही प्रमाणित हुई है।’’
📚 मनन-चिंतन
दूसरी वतिकान महासभा के अनुसार, "कलीसिया का हमेशा से यह कर्तव्य रहा है कि वह समय के संकेतों की छानबीन करें और उन्हें सुसमाचार के प्रकाश में व्याख्या करे" (GS 4)। हमें विभिन्न परिस्थितियों में ईश्वर द्वारा दी जाने वाली चुनौतियों के अनुसार कार्य करने का आह्वान किया जाता है। जब हम चाहें तब कुछ अच्छा करना काफी नहीं है। हमें दिए गए समय में दिए गए स्थान पर, दिए गए व्यक्तियों के लिए समय की मांग के अनुसार तथा प्रभु ईश्वर की इच्छा के अनुसार भलाई के कार्य करना चाहिए। हर दिन हमारा जीवन नई चुनौतियां लाता है। इसके लिए हमें प्रभु के पवित्र आत्मा की आवाज सुनते रहना चाहिए और उसके अनुसार कार्य करना चाहिए। प्रभु येसु के समय के लोगों ने योहन बपतिस्ता में ईश्वर के निमंत्रण का जवाब नहीं दिया। न ही वे प्रभु येसु में ईश्वर के निमंत्रण का जवाब देने के लिए तैयार थे। इस प्रकार प्रभु ईश्वर की प्रेरणा का नज़र अंदाज़ करते हुए उन्होंने अपने उद्धार के कई अवसर खो दिए। हम समय के चिन्हों तथा संकेतों को पहचानने तथा प्रभु ईश्वर की इच्छा को जान कर उस के अनुसार कार्य करने का प्रयत्न करें।
📚 REFLECTION
According to the Second Vatican Council, “the Church has always had the duty of scrutinizing the signs of the times and of interpreting them in the light of the Gospel” (GS 4). We are called upon to act according the challenges thrown by God in different situations. It is not enough to do some good when we like to. We need to do the good demanded in the given time, in the given space for the given persons. Every day our life brings fresh challenges. For this we need to keep listening to the whispering of the Spirit of the Lord and act accordingly. People of Jesus’ time did not respond to God’s invitation in John the Baptist. Nor were they ready to respond to God’s invitation in Jesus Christ. They did not have the same wavelength with John the Baptist or with Jesus. Therefore they lost many opportunities for their salvation.
✍Br. Biniush Topno
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Praise the Lord!
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