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27 फरवरी 2022, इतवार

 

27 फरवरी 2022, इतवार

सामान्य काल का आठवाँ इतवार



📒 पहला पाठ : प्रवक्ता-ग्रन्थ 27:4-7


3-4) जो दृढ़तापूर्वक प्रभु पर श्रद्धा नहीं रखता, उसका घर शीघ्र उजड़ जायेगा।

5) छलनी हिलाने से कचरा रह जाता है, बातचीत में मनुष्य के दोष व्यक्त हो जाते हैं।

6) भट्टी में कुम्हार के बरतनों की, और बातचीत में मनुष्य की परख होती है।

7) पेड़ के फल बाग की कसौटी होते हैं और मनुष्य के शब्दों से उसके स्वभाव का पता चलता है।


📒 दूसरा पाठ : 1 कुरिन्थियों 15:54-58



54) जब यह नश्वर शरीर अनश्वरता को धारण करेगा, जब यह मरणशील शरीर अमरता को धारण करेगा, तब धर्मग्रन्थ का यह कथन पूरा हो जायेगा: मृत्यु का विनाश हुआ। विजय प्राप्त हुई।

55) मृत्यु! कहाँ है तेरी विजय? मृत्यु! कहाँ है तेरा दंश?

56) मृत्यु का दंश तो पाप है और पाप को संहिता से बल मिलता है।

57) ईश्वर को धन्यवाद, जो हमारे प्रभु ईसा मसीह द्वारा हमें विजय प्रदान करता है!

58) प्यारे भाइयो! आप दृढ़ तथा अटल बने रहें और यह जान कर कि प्रभु के लिए आपका परिश्रम व्यर्थ नहीं है, आप निरन्तर उनका कार्य करते रहें।


📒 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 6:39-45



39) ईसा ने उन्हें एक दृष्टान्त सुनाया, "क्या अन्धा अन्धे को राह दिखा सकता है? क्या दोनों ही गड्ढे में नहीं गिर पडेंगे?

40) शिष्य गुरू से बड़ा नहीं होता। पूरी-पूरी शिक्षा प्राप्त करने के बाद वह अपने गुरू-जैसा बन सकता है।

41) "जब तुम्हें अपनी ही आँख की धरन का पता नहीं, तो तुम अपने भाई की आँख का तिनका क्यों देखते हो?

42) जब तुम अपनी ही आँख की धरन नहीं देखते हो, तो अपने भाई से कैसे कह सकते हो, ’भाई! मैं तुम्हारी आँख का तिनका निकाल दूँ?’ ढोंगी! पहले अपनी ही आँख की धरन निकालो। तभी तुम अपने भाई की आँख का तिनका निकालने के लिए अच्छी तरह देख सकोगे।

43) "कोई अच्छा पेड़ बुरा फल नहीं देता और न कोई बुरा पेड़ अच्छा फल देता है।

44) हर पेड़ अपने फल से पहचाना जाता है। लोग न तो कँटीली झाडि़यों से अंजीर तोड़ते हैं और न ऊँटकटारों से अंगूर।

45) अच्छा मनुष्य अपने हृदय के अच्छे भण्डार से अच्छी चीजे़ं निकालता है और जो बुरा है, वह अपने बुरे भण्डार से बुरी चीज़ें निकालता है; क्योंकि जो हृदय में भरा है, वहीं तो मुँह से बाहर आता है।



📚 मनन-चिंतन.


सुसमाचार में, येसु अपने समय के सामान्य छवियों के साथ महत्वाकांक्षा, निर्णय और कमजोर चरित्र को संबोधित करते हैं। वह इन पात्रों को दृष्टान्तों के माध्यम से दिखाता है। वे नेतृत्व की शैली का वर्णन करते हैं जिसके लिए प्रत्येक ख्रीस्तीय को बुलाया गया है। दृष्टान्त दो छवियों से शुरू होते हैं: अंधा और छात्र। दोनों नेतृत्व के लिए महत्वाकांक्षा का उल्लेख करते हैं। एक अंधा व्यक्ति किसी का नेतृत्व नहीं कर सकता, दूसरे अंधे व्यक्ति की तो बात ही नहीं। बढ़ईगीरी से ली गई सादृश्यता नेताओं में नकारात्मक, और कभी-कभी उतावले, नैतिक निर्णय लेने के प्रलोभन की ओर इशारा करती है। प्रतिबिंबित करने और सुधार करने के लिए समय लेने की तुलना में इंगित करना और निंदा करना आसान है। येसु ने अपने दृष्टान्तों को फलों के पेड़ों की एक छवि के साथ समाप्त किया। फलों और पेड़ों की गुणवत्ता विनिमेय नहीं थी। एक पौधे की उपज उसके चरित्र की प्राकृतिक वृद्धि होती है। सच्ची परीक्षा जीवित विश्वास और नैतिक आचरण में देखी जाती है। आइए हम ईमानदारी का जीवन जिएं।




📚 REFLECTION



In the Gospel, Jesus addresses ambition, judgement, and weak character with images common to his time. He illustrates these characters with a set of parables. They describe the style of leadership every Christian is called to. The parables begin with two images: the blind and the student. Both refer to the ambition for leadership. A blind person cannot lead anyone, much less another blind person. The analogy taken from the carpentry points to the temptation in leaders to make negative, and sometimes rash, moral judgments. It is easier to point and condemn, than to take time to reflect and reform. Jesus finished his parables with an image of fruit trees. The quality of fruit and trees were not interchangeable. A plant’s produce is the natural outgrowth of its character. True test is seen in lived faith and ethical conduct. Let us live a life of integrity.



📚 मनन-चिंतन - 2



मृदभाषी व्यक्ति को सब लोग पसंद करते हैं। अक्सर ऐसे लोगों को लोग अजात शत्रु (अर्थात जिसका कोई शत्रु न हो) भी कहते हैं। दुकानदार और व्यापारी अपने ग्राहकों से सदैव मधुर वाणी एवं व्यवहार कर उन्हें लुभाते हैं। अच्छा व्यवहार एवं मृदभाषी होना एक कला है। आज का पहला पाठ भी हमें अपनी बातों तथा व्यवहार के प्रति आगाह करते हुये चेताता है। “बातचीत में मनुष्य के दोष व्यक्त हो जाते हैं.... बातचीत में मनुष्य की परख होती है। ...मनुष्य के शब्दों से उसके स्वभाव का पता चलता है। किसी की प्रशंसा मत करो, जब तक वह नहीं बोले, क्योंकि यहीं मनुष्य की कसौटी है।” जीवन की वास्तविकता भी यही है कि हम अपनी मृद वाणी से जीवन को सफल एवं सरल या कठिन एवं जाटिल बना लेते हैं। प्रवक्ता ग्रंथ वाणी के सदुपयोग के बारे में शिक्षा देता है, ’’...दान देते समय कटु शब्द मत बोलो। क्या ओस शीतल नहीं करती? इसी प्रकार उपहार से भी अच्छा एक शब्द हो सकता है। एक मधुर शब्द महंगे उपहार से अच्छा है। स्नेही मनुष्य एक साथ दोनों को देता है। मूर्ख कटु शब्दों से डांटता है ...बोलने से पहले जानकार बनो। .....गप्पी के होंठ बकवाद करते हैं, किन्तु समझदार व्यक्ति के शब्द तराजू पर तौले हुए हैं।’’ (प्रवक्ता 18:15-19, 21:28)

संत याकूब भी वाणी के परिणामों को विस्तृत तथा तुलनात्मक शैली में बताते हुये कहते हैं, ’’यदि हम घोड़ों को वश में रखने के लिए उनके मुंह में लगाम लगाते हैं, तो उनके सारे शरीर को इधर-उधर घुमा सकते हैं। जहाज... कितना ही बड़ा क्यों न हो और तेज हवा से भले ही बहाया जा रहा हो, तब भी वह कर्णधार की इच्छा के अनुसार एक छोटी सी पतवार से चलाया जाता है। इसी प्रकार जीभ शरीर का एक छोटा-सा अंग है, किन्तु वह शक्तिशाली होने का दावा कर सकती है। ....जो हमारे अंगों के बीच हर प्रकार की बुराई का स्रोत है। वह हमारा समस्त शरीर दूषित करती और नरकाग्नि से प्रज्वलित हो कर हमारे पूरे जीवन में आग लगा देती है। ...किन्तु कोई मनुष्य अपनी जीभ को वश में नहीं कर सकता। वह एक ऐसी बुराई है, जो कभी शान्त नहीं रहती और प्राणघातक विष से भरी हुई है।’’ (देखिये याकूब 3:3-8) हम अपनी वाणी से किसी को प्रोत्साहित या हतोत्साहित कर सकते हैं। हम अपने बुरे शब्दों से झगडा शुरू कर सकते हैं, या अच्छे शब्दों से झगडा टाल भी सकते हैं। इसलिए प्रभु का वचन कहता है, “चिनगारी पर फूँक मारो और वह भड़केगी, उस पर थूक दो और वह बुझेगी: दोनों तुम्हारे मुँह से निकलते हैं” (प्रवक्ता 28:14)।

येसु की वाणी में सत्य का तेज था। उनकी शिक्षा अद्वितीय थी लोग उनकी वाणी को सुनकर दंग रह जाते थे, ’’...वे लोगों को उनके सभाग्रह में शिक्षा देते थे। वे अचम्भे में पड़ कर कहते थे, ’’इसे यह ज्ञान और यह सामर्थ्य कहाँ से मिला? (मत्ती 13:54) उनके विरोधी स्वयं स्वीकार करते हुये कहते हैं, ’’गुरुवर! हम यह जानते हैं कि आप सत्य बोलते हैं और सच्चाई से ईश्वर के मार्ग की शिक्षा देते हैं। आप को किसी की परवाह नहीं। आप मुँह-देखी बात नहीं करते।’’ (मत्ती 22:16)

प्रभु येसु अपने शब्दों को खरा-खरा तथा नापतोल के बोलते थे। उनके विरोधी उनकी परीक्षा लेने तथा उनमें दोष ढुंढनें के उद्देश्य से उनसे प्रश्न करते थे, ’’उस समय फरीसियों ने जा कर आपस में परामर्श किया कि हम किस प्रकार ईसा को उनकी अपनी बात के फन्दे में फँसायें।’’ किन्तु कैसर को कर देने के बारे में येसु का उत्तर ’’....सुन कर वे अचम्भे में पड़ गये और ईसा को छोड़ कर चले गये।’’ (देखिये मत्ती 22:15-22) इसी प्रकार जब उन्होंने पुनरूत्थान, विवाह तथा ईश्वर की आज्ञा के बारे में पूछा तो ईसा की वाणी में उन्होंने कोई दोष नहीं पाया तथा वे निरूत्तर रह गये। ’’इसके उत्तर में कोई ईसा से एक शब्द भी नहीं बोल सका और उस दिन से किसी को उन से और प्रश्न करने का साहस नहीं हुआ।’’ (मत्ती 22:46)

अनेक स्थानों पर येसु अपने विरोधियों के प्रति भी कड़े शब्द उनके सामने तथा बिना किसी व्यक्तिगत द्वेष-घृणा से बोलते थे। उनके विरोधी इससे तिलमिला जाते थे किन्तु वे कोई दोष या त्रुटि उनकी वाणी में नहीं पाते थे। हमें येसु के समान सत्य को सीधे, सरल तथा स्पष्ट रूप से बोलना चाहिये इससे लोग तो विरूद्ध हो सकते हैं, किन्तु हमारे वचन दोषरहित होगें। येसु स्वयं इस बारे में कहते हैं, ’’तुम्हारी बात इतनी हो - हाँ की हाँ, नहीं की नहीं। जो इससे अधिक है, वह बुराई से उत्पन्न होता है।’’ (मत्ती 5:37) साथ ही साथ येसु हमें चेतावनी देते हैं कि हमें अपने शब्दों को सोच समझ कर बोलना चाहिये तथा दूसरों के लिए तुच्छ तथा अपशब्दों का उपयोग नहीं करना चाहिये। ’’यदि वह अपने भाई से कहे, ’रे मूर्ख! तो वह महासभा में दण्ड के योग्य ठहराया जायेगा और यदि वह कहे, ’रे नास्तिक! तो वह नरक की आग के योग्य ठहराया जायेगा।’’ (मत्ती 5:22) यदि अपनी वाणी पर हम व्यवहार में गलत बातों का प्रयोग करेंगे तो ईश्वर हम से इन सारी बातों का लेखा-जोखा लेगा। ’’मैं तुम लोगों से कहता हूँ- न्याय के दिन मनुष्यों को अपनी निकम्मी बात का लेखा देना पड़ेगा, क्योंकि तुम अपनी ही बातों से निर्दोष या दोषी ठहराये जाओगे।’’(मत्ती 12:36) आइये हम भी अपनी वाणी पर ध्यान दे जिससे जीवन में मधुरता बनी रहें।


✍ -Br. Biniush Topno


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The Word for the day/ Rev. Fr. Bobby vc


 

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20 फरवरी 2022, रविवा

 

20 फरवरी 2022, रविवार

वर्ष का सातवां सामान्य रविवार



📙 पहला पाठ : समुएल का पहला ग्रन्थ 26:2.7-9.12-13.22-23



2) साऊल इस्राएल के तीन हज़ार चुने हुए योद्धाओं को ले कर ज़ीफ़ के उजाड़खण्ड की ओर चल दिया, जिससे वह ज़ीफ़ के उजाड़खण्ड में दाऊद का पता लगाये।

7) दाऊद और अबीशय रात को उन लोगों के पास पहुँचे। उन्होंने पड़ाव में साऊल को सोया हुआ पाया। उसका भाला उसके सिरहाने जमीन में गड़ा हुआ था। अबनेर और दूसरे योद्धा उसके चारों ओर लेटे हुए थे।

8) तब अबीशय ने दाऊद से कहा, ‘‘ईश्वर ने आज आपके शत्रु को आपके हाथ दे दिया है। मुझे करने दीजिए- मैं उसे उसके अपने भाले के एक ही बार से ज़मीन में जकड दूँगा। मुझे दूसरी बार वार करने की ज़रूरत नहीं पडे़गी।’’

9) दाऊद ने अबीशय को यह उत्तर दिया, ‘‘उसे मत मारो। कौन प्रभु के अभिषिक्त को मार कर दण्ड से बच सकता है?’’

12) दाऊद ने वह भाला और साऊल के सिरहाने के पास रखी हुई पानी की सुराही ले ली और वे चले गये। न किसी ने यह सब देखा, न किसी को इसका पता चला और न कोई जगा। वे सब-के-सब सोये हुए थे; क्योंकि प्रभु की ओर से भेजी हुई गहरी नींद उन पर छायी हुई थी।

13) दाऊद घाट पार कर दूर की पहाड़ी पर खड़ा हो गया- दोनों के बीच बड़ा अन्तर था।

22) दाऊद ने उत्तर दिया, ‘‘यह राजा का भाला है। नवयुवकों में से कोई आ कर इसे ले जाये।

23 (23-24) प्रभु हर एक को उसकी धार्मिकता तथा ईमानदारी का फल देगा। आज प्रभु ने आप को मेरे हाथ दे दिया था, किन्तु मैंने प्रभु के अभिषिक्त पर हाथ उठाना नहीं चाहा; क्योंकि आज आपका जीवन मेरी दृष्टि में मूल्यवान् था। इसलिए मेरा जीवन भी प्रभु की दृष्टि में मूल्यवान हो और वह मुझे सब संकटों से बचाता रहे।"



📙 दूसरा पाठ : कुरिन्थियों के नाम सन्त पौलुस का पहला पत्र 15:45-49



45) धर्मग्रन्थ में लिखा है कि प्रथम मनुष्य आदम जीवन्त प्राणी बन गया और अन्तिम आदम जीवन्तदायक आत्मा।

46) जो पहला है, वह आध्यात्मिक नहीं, बल्कि प्राकृत है। इसके बाद ही आध्यात्मिक आता है।

47) पहला मनुष्य मिट्टी का बना है और पृथ्वी का है, दूसरा स्वर्ग का है।

48) मिट्टी का बना मनुष्य जैसा था, वैसे ही मिट्टी के बने मनुष्य हैं और स्वर्ग का मनुष्य जैसा है, वैसे ही सभी स्वर्गी होंगे;

49) जिस तरह हमने मिट्टी के बने मनुष्य का रूप धारण किया है, उसी तरह हम स्वर्ग के मनुष्य का भी रूप धारण करेंगे।



📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 6:27-38



27) ’’मैं तुम लोगों से, जो मेरी बात सुनते हो, कहता हूँ-अपने शत्रुओं से प्रेम करो। जो तुम से बैर करते हैं, उनकी भलाई करो।

28) जो तुम्हें शाप देते है, उन को आशीर्वाद दो। जो तुम्हारे साथ दुव्र्यवहार करते हैं, उनके लिए प्रार्थना करो।

29) जो तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारता है, दूसरा भी उसके सामने कर दो। जो तुम्हारी चादर छीनता है, उसे अपना कुरता भी ले लेने दो।

30) जो तुम से माँगता है, उसे दे दो और जो तुम से तुम्हारा अपना छीनता है, उसे वापस मत माँगो।

31) दूसरों से अपने प्रति जैसा व्यवहार चाहते हो, तुम भी उनके प्रति वैसा ही किया करो।

32) यदि तुम उन्हीं को प्यार करते हो, जो तुम्हें प्यार करते हैं, तो इस में तुम्हारा पुण्य क्या है? पापी भी अपने प्रेम करने वालों से प्रेम करते हैं।

33) यदि तुम उन्हीं की भलाई करते हो, जो तुम्हारी भलाई करते हैं, तो इस में तुम्हारा पुण्य क्या है? पापी भी ऐसा करते हैं।

34) यदि तुम उन्हीं को उधार देते हो, जिन से वापस पाने की आशा करते हो, तो इस में तुम्हारा पुण्य क्या है? पूरा-पूरा वापस पाने की आशा में पापी भी पापियों को उधार देते हैं।

35) परन्तु अपने शत्रुओं से प्रेम करो, उनकी भलाई करो और वापस पाने की आशा न रख कर उधार दो। तभी तुम्हारा पुरस्कार महान् होगा और तुम सर्वोच्च प्रभु के पुत्र बन जाओगे, क्योंकि वह भी कृतघ्नों और दुष्टों पर दया करता है।

36) ’’अपने स्वर्गिक पिता-जैसे दयालु बनो। दोष न लगाओ और तुम पर भी दोष नहीं लगाया जायेगा।

37) किसी के विरुद्ध निर्णय न दो और तुम्हारे विरुद्ध भी निर्णय नहीं दिया जायेगा। क्षमा करो और तुम्हें भी क्षमा मिल जायेगी।

38) दो और तुम्हें भी दिया जायेगा। दबा-दबा कर, हिला-हिला कर भरी हुई, ऊपर उठी हुई, पूरी-की-पूरी नाप तुम्हारी गोद में डाली जायेगी; क्योंकि जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिए भी नापा जायेगा।

’’

📚 मनन-चिंतन


सुसमाचार में, येसु शत्रु और सताने वालो के प्रति प्रेम प्रकट कर रहे है। यह विशुद्ध रूप से एक गैर-पारस्परिक व्यवहार है। यह येसु की एक सर्व समावेशी दृष्टि है। शत्रुओं से प्रेम करने की क्षमता केवल चाहने मात्र से प्राप्त नहीं होती। यह केवल द्वेष की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि दूसरे व्यक्ति की भलाई के लिए एक दयालु इच्छा है। ईश्वर के समान प्यार करना, अर्थार्त दूसरों पर अधिक ध्यान केंद्रित करना है। यह परिपक्वता का कारक है।यह स्पष्ट रूप से आत्म-ज्ञान, आत्म-स्वीकृति और सहानुभूति की क्षमता से जुड़ा हुआ है। यह ईश्वर के प्रेम की प्रबल भावना से उत्पन्न होता है। येसु अपने शिष्यों को उस प्रेम में भाग लेने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं जो पिता के हृदय में उत्पन्न होता है। यह येसु की तरह बनने के लिए नम्रता का आह्वान करता है। आइए हम ईश्वर से अपने दिलों को दिव्य प्रेम के लिए खोलने के लिए कहें, ताकि हम प्यार कर सकें, अच्छा कर सकें और उदारता से कार्य कर सकें।



📚 REFLECTION


In the Gospel, Jesus is extending love to the enemy and the persecutor. It is purely a non-reciprocal behavior. It is an all inclusive vision of Jesus. The capacity to love enemies is not achieved simply by wishing it. It is not merely the absence of malice, but a compassionate desire for the other person’s good. To love as God loves is to focus more on others. It is a factor of maturity. It is clearly connected to self-knowledge, self-acceptance and the capacity to empathise. It originates from a strong sense of God’s love. Jesus is inviting his disciples to share in the love that originates in the heart of the Father. It calls for humility and an emptying of ourselves to become like Jesus. Lets us ask God to open our hearts to divine love, so that we may love, do good and act generously.




हर इन्सान खुद का मित्र है या शत्रु। अक्सर देखा जाता है कि हमारे विरोधी या शत्रु हमारे दिमाग और मन में ज्यादा समय निवास करते हैं। प्रेम सब कुछ प्रेमपूर्ण बनाता। घृणा सब कुछ घृणित बनाती हैं।

समूएल के पहले ग्रंथ में राजा दाऊद और राजा साऊल की कहानी काफी रोचक है। दाऊद की बालक के सदृश्य प्रगति, असर और प्रभाव और दाऊद के प्रति साऊल की जलन को हम जानते हैं।

राजा साऊल दाऊद का सर्वनाश करना चाहता था और पीछा करता था - एक शत्रु और दुश्मन के तौर पर। दाऊद के हाथ में फंस जाने पर भी उसने साऊल की हत्या नहीं की। क्योंकि वह ईश्वर के द्वारा अभिषिक्त का आदर करता था। यह सच है कि इस्राएलियों की पराम्परा में राजा ईश्वर का प्रतिनिधित्व करता था। इसलिए राजा का तिरस्कार करना अर्थात ईश्वर का तिरस्कार करना था और दाऊद की यह बड़ी उदार, निस्वार्थ सोच, मनोभाव साऊल के जीवन में परिवर्तन लाता है, न सिर्फ परिवर्तन लाता है बल्कि साऊल के नजर में दाऊद आर्शीवाद का पात्र बनता है।

जान लेना पाप है।

ईश्वर की नियुक्ति पर विरोध नहीं करना चाहिये।

दयालुता अर्थात बडे दिल वाला होना है।

प्रेम और क्षमा इन्सान को बदल देती है। प्रेम से सब कुछ पर विजय प्राप्त की जा सकती है।

येसु ख्रीस्त ने एक बहुत ही क्रांतिकारी शिक्षा पेश की और उनकी यह क्रांतिकारी शिक्षा प्रभावशाली इसलिए है कि बहुतों ने उस शिक्षा को अपने जीवन में लागू किया। यह दुनिया की आम सोच से बिल्कुल अलग या हट के है। दुनिया की रीति है कि जो हमें प्यार करते है उन्हीं से हम प्यार करते हैं और जो हमसे बैर रखते उनसे बैर। लेकिन इसके ठीक विपरीत वे कहते हैं अपने शत्रु से प्रेम करो, उनकी शुभ चिंता रखो और उनके लिए प्रार्थना भी करो। हम बदले की भावना या गलती के लिए दण्ड देना सामाजिक दृष्टि से न्याय समझते हैं। लेकिन वे कहते है कि कोई तुम्हें एक गाल पर थापड़ मारे तो दूसरा गाल भी दिखा दो। हमें यह सब इसलिए करना है कि हम उस स्वर्गिक पिता की संतान हैं जो अत्यंत प्रेमी, दयालु, क्षमाशील हैं और यह उचित है कि उनकी संतान, जो येसु में विश्वास करती है उनके सदृश्य बने। ख्रीस्तीयों के लिए येसु मसीह उच्च कोटि का मापदण्ड/जीने का standard प्रस्तुत करते हैं। और यह दुनिया को बदल देता है| जैसे उदाहरण के लिए चोट के बदले प्रतिक्रियात्मक ढंग ये बदला ले तो यह cycle क्रिया चलती ही रहेगी। गैर ख्रीस्तीय और ख्रीस्तीय में फिर क्या फर्क है? इसलिए येसु कहते हैं कि हमें नमक जैसे बन जाना चाहिए, दीपक जैसे बन जाना है ताकि सब कुछ नया हो जाएगा। एक प्रकार से प्रतिक्रिया न करके, दूसरे तरीके से हम हमारे शत्रु पर विजय पाते हैं और उनमें परिवर्तन या बदलाव लाते हैं।

येसु मसीह स्वर्गराज्य का निर्माण करने आये और उस राज्य के नियम, संहिता, सिध्दांत बिल्कुल सर्वोपरि गुणवत्ता quality के हो। ख्रीस्तीय प्रेम इसी में प्रदर्शित होता है और दिखाई देता है अपनी ऑखों के सामने ही स्वयं येसु ने अपने शत्रुओं को मरते समय क्षमा किया। “प्रभु इन्हें क्षमा कर क्योंकि ये नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं”। यदि हर कोई बदला ले तो इस संसार में सब अन्धे, लगड़े, लूले ही मिलेगें।

दूसरे दृष्टिकोण से यह भी बोला जा सकता है कि पड़ोसी-प्रेम का सिंध्दात् यह है कि मेरे प्रेम से, दूसरों की भलाई में कोई भी वंचित न रहें। ईश्वर की शिक्षा का सांराश यही है कि हम पिता के सदृश्य दयालु बने अर्थात् ईश्वर प्रेम में बढ़े, साथ ही साथ येसु के सदृश्य पड़ोसी प्रेम में भी बढ़ते जाएँ अर्थात यह काफी नहीं कि सिर्फ मैं चिंता ही करूँ कि कैसे स्वर्ग पहुँच जाऊँ किन्तु यह भी आवश्यक है कि मैं अकेले नहीं अपने पड़ोसी को भी स्वर्गराज्य का सदृश्य बनाऊँ, साथ ले चलुँ।

क्षमाशीलता ही ख्रीस्तीय धर्म का सारांश है।


✍ -Br. Biniush Topno


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13 फरवरी 2022, रविवार

 

13 फरवरी 2022, रविवार

वर्ष का छठवां सामान्य रविवार


📒 पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 17:5-8


5) प्रभु यह कहता है: “धिक्कार उस मनुय को, जो मनुय पर भरोसा रखता है, जो निरे मनुय का सहारा लेता है और जिसका हृदय प्रभु से विमुख हो जाता है!

6) वह मरुभूमि के पौधे के सदृश है, जो कभी अच्छे दिन नहीं देखता। वह मरुभूमि के उत्तप्त स्थानों में- नुनखरी और निर्जन धरती पर रहता है।

7) धन्य है वह मनुय, जो प्रभु पर भरोसा रखता है, जो प्रभु का सहारा लेता है।

8) वह जलस्रोत के किनारे लगाये हुए वृक्ष के सदृश हैं, जिसकी जड़ें पानी के पास फैली हुई हैं। वह कड़ी धूप से नहीं डरता- उसके पत्ते हरे-भरे बने रहते हैं। सूखे के समय उसे कोई चिंता नहीं होती क्योंकि उस समय भी वह फलता हैं।“.


📒 दूसरा पाठ : कुरिन्थियों के नाम सन्त पौलुस का पहला पत्र 15:12.16-20


12) यदि हमारी शिक्षा यह है कि मसीह मृतकों में से जी उठे, तो आप लोगों में कुछ यह कैसे कहते हैं कि मृतकों का पुनरूत्थान नहीं होता?

16) कारण, यदि मृतकों का पुनरुत्थान नहीं होता, तो मसीह भी नहीं जी उठे।

17) यदि मसीह नहीं जी उठे, तो आप लोगों का विश्वास व्यर्थ है और आप अब तक अपने पापों में फंसे हैं।

18) इतना ही नहीं, जो लोग मसीह में विश्वास करते हुए मरे हैं, उनका भी विनाश हुआ है।

19) यदि मसीह पर हमारा भरोसा इस जीवन तक ही सीमित है, तो हम सब मनुष्यों में सब से अधिक दयनीय हैं।

20) किन्तु मसीह सचमुच मृतकों में से जी उठे। जो लोग मृत्यु में सो गये हैं, उन में वह सब से पहले जी उठे।


📒 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 6:17.20-26

17) ईसा उनके साथ उतर कर एक मैदान में खड़े हो गये। वहाँ उनके बहुत-से शिष्य थे और समस्त यहूदिया तथा येरुसालेम का और समुद्र के किनारे तीरूस तथा सिदोन का एक विशाल

 जनसमूह भी था, जो उनका उपदेश सुनने और अपने रोगों से मुक्त होने के लिए आया था।

20) ईसा ने अपने शिष्यों की ओर देख कर कहा, ’’धन्य हो तुम, जो दरिद्र हो! स्वर्गराज्य तुम लोगों का है।

21) धन्य हो तुम, जो अभी भूखे हो! तुम तृप्त किये जाओगे। धन्य हो तुम, जो अभी रोते हो! तुम हँसोगे।

22) धन्य हो तुम, जब मानव पुत्र के कारण लोग तुम से बैर करेंगे, तुम्हारा बहिष्कार और अपमान करेंगे और तुम्हारा नाम घृणित समझ कर निकाल देंगे!

23) उस दिन उल्लसित हो और आनन्द मनाओ, क्योंकि स्वर्ग में तुम्हें महान् पुरस्कार प्राप्त होगा। उनके पूर्वज नबियों के साथ ऐसा ही किया करते थे।

24) ’’धिक्कार तुम्हें, जो धनी हो! तुम अपना सुख-चैन पा चुके हो।

25) धिक्कार तुम्हें, जो अभी तृप्त हो! तुम भूखे रहोगे। धिक्कार तुम्हें, जो अभी हँसते हो! तुम शोक मनाओगे और रोओगे।

26) धिक्कार तुम्हें, जब सब लोग तुम्हारी प्रशंसा करते हैं! उनके पूर्वज झूठे नबियों के साथ ऐसा ही किया करते थे।


📚 मनन-चिंतन


सुसमाचार में, येसु ईश्वरिय राज्य में जीवन और सांसारिक जीवन के बीच मूलभूत अंतर की व्याख्या करते हैं। ईश्वर के राज्य का एक हिस्सा होने का मतलब है कि दुनिया से अलग तरीके से जीना। जो गरीब हैं, भूखे हैं, रोते हैं, या सताए जाते हैं, वे धन्य कहलाते हैं। यह परिवर्तन का सुसमाचार है। जिन लोगों को अक्सर ईश्वर द्वारा भुला दिया गया माना जाता है उन्हें धन्य कहा जाता है। शापितो की सूची में वे हैं जिन्हें हम साधारणतया धन्य मानते हैं। उनके धन, संपत्ति, हँसी, प्रतिष्ठा के बारे में चेतावनी देते हैं। ये ऐसी चीजें नहीं हैं जिन पर हम शाश्वत सुख के स्रोत के रूप में निर्भर रह सकते हैं। आशीर्वचन को अक्सर ख्रीस्तीय जीवन के लिए एक रूपरेखा के रूप में वर्णित किया जाता है। ख्रीस्तीयों के रूप में हमारा बुलाहट इस दुनिया में प्रथम नहीं होना है, बल्कि ईश्वर की दृष्टि में प्रथम होना है। हमें अपने अंतिम क्षितिज, ईश्वर के राज्य के संदर्भ में अपनी वर्तमान स्थिति की जांच करने की चुनौती है।



📚 REFLECTION


In the Gospel, Jesus explains the radical difference between Kingdom Life and secular life. To be a part of God’s Kingdom means to live differently than the secular world around. Those who are poor, hungry, weeping, or persecuted are called blessed. This is a Gospel of reversals. Those often thought to have been forgotten by God are called blessed. In the list of woes are those whom we might ordinarily describe as blessed. Jesus warns about their riches, possessions, laughter, reputation. These are not things we can depend upon as sources of eternal happiness. The beatitudes are often described as a framework for Christian living. Our vocation as Christians is not to be first in this world, but rather to be first in the eyes of God. We are challenged to examine our present situation in the context of our ultimate horizon, the Kingdom of God.



📚 मनन-चिंतन - 2


धन्य है वह मनुष्य जो ईश्वर पर भरोसा रखता है वह उस पेड़ के सदृश्य है जो सदाबहार और bumper फल पैदा करता है। (येरिमियाह 17:5-8) येसु ख्रीस्त मृतकों में से जी उठे हैं और वे पहला फल हैं। (1 कुरिन्थियों 15:12,16-20)

आज सामान्य काल का छटवाँ रविवार है और मेरा प्रवचन आज के सुसमाचार पर आधारित करना चाहूँगा। आज के सुसमाचार, लूकस 6:17, 20-26, का विषय है - येसु मसीह का पर्वत प्रवचन। इसका उल्लेख संत मत्ती के द्वारा भी किया गया है। अंग्रेजी में इसे beatitudes कहते हैं। यह शब्द लैटिन के beatis शब्द से उद्गम होता है जिसका अर्थ है happy, Blest, fortunate यानि खुश, सुखद्, आनंदित, सौभाग्यशाली, मुदित, संतोषमय इत्यादि। सामान्य रचना के तौर पर इस प्रकार की शैली का प्रयोग पुराने साहित्य में अलंकार के रूप में किया जाता था, और बाईबल की किताबों में भी इसका प्रयोग किया गया है। वर्तमान की या आधुनिक साहित्य में भी यह अलंकार उपयोग में लिया जाता है। परपंरागत वह व्यक्ति धन्य या सुखद माना जाता था, जिससे ईश्वर प्रसन्न हो। संत लूकस के लेख में चार सकारात्मक आर्शीवादपूर्ण और चार धिक्कारपूर्ण पंक्तियाँ मिलती हैं। सांसारिक दृष्टि में सौभाग्यशाली वह व्यक्ति माना जाता है जो आर्थिक दृष्टि में सम्पन्न है, शारीरिक रूप में स्वस्थ है और परिवार में कुशल हैं तथा उसकी ईश्वरभय रखने वाली पत्नी और संतान हो और जिनकी लम्बी उम्र हो।

दुनिया की दृष्टि में उपरोक्त सब कुछ होने के बावजूद भी ईश्वर की दृष्टि में एक व्यक्ति नगण्य तथा धिक्कार के योग्य हो सकता है। येसु अपने शिष्यों को प्रत्यक्ष रूप से संबोधित करते हैं। येसु के दर्शनों में आम आदमी भी सम्मिलित है। जो नज़दीकी शिष्यों को बुलाता है और वे भी शिष्यों की गिनती में आते हैं, और यह भी प्रतीत होता है कि संत लूकस की कलीसिया या समुदाय में अधिकांश लोग आर्थिक रूप से तंगी की हालात में थे और येसु का अनुसरण करने की वजह से उन्हें अत्याचार भी सहना पड़ता था। वे अक्सर तिरस्क्र्त किये जाते थे, घृणित और तुच्छ नजरों से देखे जाते थे। वे दुनिया की दृष्टि में हँसी, अपमान, उपहास के पात्र थे। लेकिन येसु की दृष्टि में वे धन्य, खुशहाल, सौभाग्यशाली थे क्योंकि ईश्वर उनके पक्ष और उनके साथ थे। उनकी खुशी, संतुष्टि, पर्याप्तता का कारण और स्रोत ईश्वर थे। व्यंग और विरोधाभाष भाषा का प्रयोग करते हुए येसु उन्हें धन्य कहते हैं, इसलिए नहीं कि वे गरीब हैं, भूखे हैं, शोकित हैं, घृणित हैं लेकिन इसलिए कि वे स्वर्गराज के उत्तराधिकारी हैं, वे तृप्त किये जाएगें तथा आनन्द के हकद़ार होगें। ईश्वर उन्हें धिक्कारते हैं जो अपनी खुशी, आस्था, चिंता तथा दुनियाई मूल्यों पर केन्द्रित जीवन बिताते हैं। शायद कुछ सीख है। क्या ईश्वर हमारे आनन्द, सौभाग्यशाली होने का कारण है?

क्या ईश्वर हमें और हमारे जीवन को देख के हमें धन्य कहेगें या धिक्कारेगें?

क्या हमारी खुशी क्षणभंगुर है या ईश्वर जैसी चिरस्थायी है?

ईश्वर का राज्य और ईश्वर का मूल्य सांसारिक मूल्यों के विपरीत हैं।

सांसारिक मूल्य ईश्वरीय मूल्यों और ईश्वर के राज्य का विरोध करते हैं।

ईश्वर का राज्य हमें ऊपर की बातों की प्रतिज्ञा करता है।

ख्रीस्त के राज्य की स्थापना करना एक चुनौती है।

ख्रीस्तीय जीवन जीना अर्थात् ईश्वरीय राज्य के मूल्यों के आधारित जीना है।

ईश्वर की दृष्टि में धन्य होना है, मानवीय दृष्टि में नहीं।

येसु की शिक्षा, आधुनिक मानव और समाज के लिए चुनौती है क्योंकि हर एक ख्रीस्तीय एक नबी है; वह कोई पेशा नहीं।

ईश्वर के राज्य का भागी होना अर्थात् फैसला लेना कि ईश्वर के पक्ष में या ईश्वर के विरोध में।


✍ -Br. Biniush Topno


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30 जनवरी 2022, इतवार

 

30 जनवरी 2022, इतवार

सामान्य काल का चौथा इतवार



📒 पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 1:4-5,17-19

4) प्रभु की वाणी मुझे यह कहते हुए सुनाई पड़ी-

5) “माता के गर्भ में तुम को रचने से पहले ही, मैंने तुम को जान लिया। तुम्हारे जन्म से पहले ही, मैंने तुम को पवत्रि किया। मैंने तुम को राष्ट्रों का नबी नियुक्त किया।“

17) अब तुम कमर कस कर तैयार हो जाओ और मैं तुम्हें जो कुछ बताऊँ, वह सब सुना दो। तुम उनके सामने भयभीत मत हो, नहीं तो मैं तुम को उनके सामने भयभीत बना दूँगा।

18) देखो! इस सारे देश के सामने, यूदा के राजाओं, इसके अमीरों, इसके याजकों और इसके सब निवासियों के सामने, मैं आज तुम को एक सुदृढ़ नगर के सदृश, लोहे के खम्भे और काँसे की दीवार की तरह खड़ा करता हूँ।

19) वे तुम्हारे विरुद्ध लडेंगे, किन्तु तुम को हराने में असमर्थ होंगे; क्योंकि मैं तुम्हारी रक्षा करने के लिए तुम्हारे साथ रहूँगा।“ यह प्रभु की वाणी है।


📒 दूसरा पाठ : कुरिन्थियों के नाम सन्त पौलुस का पहला पत्र 12:31-13:13


31) आप लोग उच्चतर वरदानों की अभिलाषा किया करें। मैं अब आप लोगों को सर्वोत्तम मार्ग दिखाता चाहता हूँ।

1) मैं भले ही मनुष्यों तथा स्वर्गदूतों की सब भाषाएँ बोलूं; किन्तु यदि मुझ में प्रेम का अभाव है, तो मैं खनखनाता घडि़याल या झनझनाती झाँझ मात्र हूँ।

2) मुझे भले ही भविष्यवाणी का वरदान मिला हो, मैं सभी रहस्य जानता होऊँ, मुझे समस्त ज्ञान प्राप्त हो गया हो, मेरा विश्वास इतना परिपूर्ण हो कि मैं पहाड़ों को हटा सकूँ; किन्तु यदि मुझ में प्रेम का अभाव हैं, तो मैं कुछ भी नहीं हूँ।

3) मैं भले ही अपनी सारी सम्पत्ति दान कर दूँ और अपना शरीर भस्म होने के लिए अर्पित करूँ; किन्तु यदि मुझ में प्रेम का अभाव है, तो इस से मुझे कुछ भी लाभ नहीं।

4) प्रेम सहनशील और दयालु है। प्रेम न तो ईर्ष्या करता है, न डींग मारता, न घमण्ड, करता है।

5) प्रेम अशोभनीय व्यवहार नहीं करता। वह अपना स्वार्थ नहीं खोजता। प्रेम न तो झुंझलाता है और न बुराई का लेखा रखता है।

6) वह दूसरों के पाप से नहीं, बल्कि उनके सदाचरण से प्रसन्न होता है।

7) वह सब-कुछ ढाँक देता है, सब-कुछ पर विश्वास करता है, सब-कुछ की आशा करता है और सब-कुछ सह लेता है।

8) भविष्यवाणियाँ जाती रहेंगी, भाषाएँ मौन हो जायेंगी और ज्ञान मिट जायेगा, किन्तु प्रेम का कभी अन्त नहीं होगा;

9) क्योंकि हमारा ज्ञान तथा हमारी भविष्यवाणियाँ अपूर्ण हैं

10) और जब पूर्णता आ जायेगी, तो जो अपूर्ण है, वह जाता रहेगा।

11) मैं जब बच्चा था, तो बच्चों की तरह बोलता, सोचता और समझता था; किन्तु सयाना हो जाने पर मैंने बचकानी बातें छोड़ दीं।

12) अभी तो हमें आईने में धुँधला-सा दिखाई देता है, परन्तु तब हम आमने-सामने देखेंगे। अभी तो मेरा ज्ञान अपूर्ण है; परन्तु तब मैं उसी तरह पूर्ण रूप से जान जाऊँगा, जिस तरह ईश्वर मुझे जान गया है।

13) अभी तो विश्वास, भरोसा और प्रेम-ये तीनों बने हुए हैं। किन्तु उनमें प्रेम ही सब से महान् हैं।


📒 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 4:21-30


21) तब वह उन से कहने लगे, ’’धर्मग्रन्थ का यह कथन आज तुम लोगों के सामने पूरा हो गया है’’।

22) सब उनकी प्रशंसा करते रहे। वे उनके मनोहर शब्द सुन कर अचम्भे में पड़ जाते और कहते थे, ’’क्या यह युसूफ़ का बेटा नहीं है?’’

23) ईसा ने उन से कहा, ’’तुम लोग निश्चय ही मुझे यह कहावत सुना दोगे-वैद्य! अपना ही इलाज करो। कफ़रनाहूम में जो कुछ हुआ है, हमने उसके बारे में सुना है। वह सब अपनी मातृभूमि में भी कर दिखाइए।’’

24) फिर ईसा ने कहा, ’’मैं तुम से यह कहता हूँ-अपनी मातृभूमि में नबी का स्वागत नहीं होता।

25) मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि जब एलियस के दिनों में साढ़े तीन वर्षों तक पानी नहीं बरसा और सारे देश में घोर अकाल पड़ा था, तो उस समय इस्राएल में बहुत-सी विधवाएँ थीं।

26) फिर भी एलियस उन में किसी के पास नहीं भेजा गया-वह सिदोन के सरेप्ता की एक विधवा के पास ही भेजा गया था।

27) और नबी एलिसेयस के दिनों में इस्राएल में बहुत-से कोढ़ी थे। फिर भी उन में कोई नहीं, बल्कि सीरी नामन ही निरोग किया गया था।’’

28) यह सुन कर सभागृह के सब लोग बहुत क्रुद्ध हो गये।

29) वे उठ खड़े हुए और उन्होंने ईसा को नगर से बाहर निकाल दिया। उनका नगर जिस पहाड़ी पर बसा था, वे ईसा को उसकी चोटी तक ले गये, ताकि उन्हें नीचे गिरा दें,

30) परन्तु वे उनके बीच से निकल कर चले गये।


📚 मनन-चिंतन


अपने घोषणापत्र की प्रस्तुति के तुरंत बाद, येसु को अपने गाँव के लोगों से परिचित होने के कारण विरोध का सामना करना पड़ा। ऐसा कहा जाता है, परिचितता अवमानना को जन्म देती है। येसु के मामले में वास्तव में यही हुआ था। उन्होंने दावा किया था कि वे ईश्वर के अभिषिक्त हैं। नाज़रेथ के लोग येसु से बहुत परिचित थे और मसीह के रूप में उनकी नई पहचान को वे आसानी से स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने उन्हें एक साधारण बढ़ई के रूप में देखा था। वे इस सच्चाई को नहीं समझ सके कि येसु ही मसीह हो सकते हैं। उन्हें उन पर शक था। इस अवमानना ने उनमें से कुछ लोगों को हिंसक विरोध करने के लिए प्रेरित किया। येसु कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते हैं बल्कि वहां से चले जाते हैं। कभी-कभी हम भी दूसरों का न्याय करने में अधीर होते हैं और लोगों की निंदा करने से पहले सभी तथ्यों को नहीं देखते हैं। हमारी अधीरता से कई पहल टूट जाती हैं। आइए हम ईश्वर के तरीकों को जानने के लिए दिव्य ज्ञान की तलाश करें। संत पौलुस हमें याद दिलाते हैं, "प्रेम सहनशील और दयालु है। प्रेम न तो ईर्ष्या करता है, न डींग मारता, न घमण्ड, करता है। प्रेम अशोभनीय व्यवहार नहीं करता।" (1कुरिन्थियों 13:4)।



📚 REFLECTION

Immediately after the presentation of his manifesto, Jesus faced opposition caused by familiarity of the people of his village. It is said, familiarity breeds contempt. This is what really happened in the case of Jesus who claimed to be the anointed one of God. The people of Nazareth were too familiar with Jesus and could not easily accept his newly revealed identity as the Messiah. They had seen him as an ordinary carpenter. They could not understand the truth that Jesus could be the Messiah. They were skeptic about him. This contempt led some of them to violent opposition. Jesus does not react but moves away from there. Sometimes we too are impatient in judging others and do not look into all facts before condemning people. Many initiatives are torn down by our impatience. Let us seek the divine wisdom to know the ways of God. St. Paul reminds us, “Love is patient; love is kind; love is not envious or boastful or arrogant or rude” (1Cor 13:4).


📚 मनन-चिंतन -02


आप क्या करेगें? आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी? क्या कभी आपने ठोकर खायी है? किसी ने हिन्दी में कहा है ’बिना ठोकर खाकर कोई ठाकुर नहीं बनता।

मानवीय, सामाजिक जीवन में तिरस्कार, अनादर या अस्वीकार का अनुभव कोई नई बात नहीं है। ठोकर खाना, नफरत सहन करना, तिरस्कार का अनुभव इन्सान को बनाता (make), बिगाड़ता (break), नीचे गिराता या ऊपर उठाता है। नौकरी के लिए जाओ, दाखिले के लिए जाओ, कई स्थानों पर लोगों को भेदभाव की सच्चाई का सामना करना पडता है।

आज के पहले पाठ में (यिरमियाह 1:4-15,17) नबी यिरमियाह के बुलावे के बारे में वर्णन किया गया है। प्रभु परमेश्वर नबी यिरमियाह को बुलाते समय कहते हैं-‘‘माता के गर्भ में रचने से पहले ही मैंने तुम्हें चुन लिया।’’ वह ईश्वर के ज्ञान में था, पूर्व निर्धारित नबी यिरमियाह चुन लिया गया था, नियुक्त किया गया था। ईश्वर उन्हें इस कार्य के लिए सशक्त, सक्षम बनाते हैं और चेतावनी भी देते हैं कि उन्हें तिरस्कार का सामना करना होगा और उन्हें ढ़ाढ़स देते हैं कि उन्हें घबराना नहीं चाहिए, डरना नहीं चाहिए, क्योंकि ईश्वर उन्हें आश्वासन देते हैं कि वे उनके साथ हैं और उनका उध्दार करेंगे। अपने विशेष कार्यों के लिए ईश्वर अपने चुने हुए लोगों को अलग रखते, पवित्र रखते ताकि वे दूसरों से अलग हो जो जीवित मछली की तरह रहते नहीं लेकिन मृत मछली के जैसे जो पानी के बहाव में बह जाता है।

ईश्वर के कार्य के लिए ईश्वर द्वारा चुने जाने पर और लोगों के द्वारा अस्वीकार या तिरस्कार का सामना करने पर एक असमजंस की स्थिति पैदा होती है। डर का कारण यह हो सकता है कि कोई जोखिम उठाना नहीं चाहता है। लेकिन नबी यिरमियाह हिम्मत नहीं हारते हैं क्योंकि जिनको ईश्वर बुलाते हैं, इस बुलावे के साथ-साथ उन्हें वे सशक्त और संपन्न भी करते हैं।

दूसरे पाठ के द्वारा संत पौलुस कुरिन्थियों के पहले पत्र में इस बात का उल्लेख करते हैं कि प्यार सब से बड़कर है, सर्वोपरि है। येसु को भी नबी यिरमियाह के सदृश्य अस्वीकार का सामना करना पड़ा जैसे कि संत योहन के सुसमाचार में हम पढ़ते हैं कि ईश्वर का रूप येसु मसीह में पूर्णरूप से प्रकट हुआ। वे अपने ही लोगों के बीच में आये और अपने ही लोगों ने उसे नहीं अपनाया। जब नाजरेत निवासी उनको अस्वीकार करते हैं तब इसकी प्रतिक्रिया में पुरानी कहावत प्रकट करते हैं कि अपने ही स्थान में नबी का आदर नहीं होता।

1. यह घटना हमें पुरानी कहावत याद दिलाती है - घर की मुर्गी दाल बराबर।

2. हम/वर्त्तमान में brand और label की दुनिया में जीते हैं और लोगों को भी label करते हैं।

3. बाहरी रूप रंग देखना और स्वीकार या अस्वीकार करना एक मानसिकता है ।

4. हम हमारी पूर्वधारणा या मानसिकता को छोड़ें और नवीन दृष्टिकोण अपनाएं। ताकि नाजरेत के निवासियों के समान ईसा या किसी अच्छी चीज का तिरस्कार न करें या साबूत या प्रमाण न मागें।

5. ईश्वर का नबी होना खतरों से, जोखिमों से भरा है। नबी बनने के लिए हिम्मत चाहिए, नबी होना कोई profession नहीं, पेशा नहीं लेकिन बुलाहट है।


✍ -Br. Biniush Topno


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23 जनवरी 2022, इतवार

 

23 जनवरी 2022, इतवार

सामान्य काल का तीसरा इतवार

ईशवचन का इतवार

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📒 पहला पाठ : नहेम्या 8:2-6,8-10


2) पुरोहित एज्ऱा सभा में संहिता का ग्रन्थ ले आया। सभा में पुरुष, स्त्रियाँ और समझ सकने वाले बालक उपस्थित थे। यह सातवें मास का पहला दिन था।

3) उसने सबेरे से ले कर दोपहर तक जलद्वार के सामने के चैक में स्त्री-पुरुषों और समझ सकने वाले बालकों को ग्रन्थ पढ़ कर सुनाया। सब लोग संहिता का ग्रन्थ ध्यान से सुनते रहे।

4) शास्त्री एज़ा विशेष रूप से तैयार किये हुए लकड़ी के मंच पर खड़ा था। उसकी दाहिनी और मत्तित्या, शेमा, अनाया, ऊरीया, हिलकीया और मासेया थे और उसकी बायीं ओर पदाया, मीशाएल, मलकीया, हाशुम, हशबद्दाना, ज़कर्या और मशुल्लाम थे।

5) एज्ऱा लोगों से ऊँची जगह पर था। उसने सबों के देखने में ग्रन्थ खोल दिया। जब ग्रन्थ खोला गया, तो सारी जनता उठ खड़ी हुई।

6) तब एज्ऱा ने प्रभु, महान् ईश्वर का स्तुतिगान किया और सब लोगों ने हाथ उठा कर उत्तर दिया, "आमेन, आमेन!" इसके बाद वे झुक गये और मुँह के बल गिर कर उन्होंने प्रभु को दण्डवत् किया।

8) उन्होंने ईश्वर की संहिता का ग्रन्थ पढ़ कर सुनाया, इसका अनुवाद किया और इसका अर्थ समझाया, जिससे लोग पाठ समझ सकें।

9) इसके बाद राज्यपाल, नहेम्या, याजक तथा शास्त्री एज़्रा और लोगों को समझाने वाले लेवियों ने सारी जनता से कहा, "यह दिन तुम्हारे प्रभु-ईश्वर के लिए पवित्र है। उदास हो कर मत रोओ"; क्योंकि सब लोग संहिता का पाठ सुन कर रोते थे।

10) तब एज्ऱा ने उन से कहा, "जा कर रसदार मांस खाओ, मीठी अंगूरी पी लो और जिसके लिए कुछ नहीं बन सका, उसके पास एक हिस्सा भेज दो; क्योंकि यह दिन हमारे प्रभु के लिए पवित्र है। उदास मत हो। प्रभु के आनन्द में तुम्हारा बल है।"



📒 दूसरा पाठ : 1कुरिन्थियो 12:12-30


12) मनुष्य का शरीर एक है, यद्यपि उसके बहुत-से अंग होते हैं और सभी अंग, अनेक होते हुए भी, एक ही शरीर बन जाते हैं। मसीह के विषय में भी यही बात है।

13) हम यहूदी हों या यूनानी, दास हों या स्वतन्त्र, हम सब-के-सब एक ही आत्मा का बपतिस्मा ग्रहण कर एक ही शरीर बन गये हैं। हम सबों को एक ही आत्मा का पान कराया गया है।

14) शरीर में भी तो एक नहीं, बल्कि बहुत-से अंग हैं।

15) यदि पैर कहे, "मैं हाथ नहीं हूँ, इसलिए शरीर का नहीं हूँ, तो क्या वह इस कारण शरीर का अंग नहीं?

16) यदि कान कहे, ’मैं आँख नहीं हूँ, इसलिए शरीर का नहीं हूँ’, तो क्या वह इस कारण शरीर का अंग नहीं?

17) यदि सारा शरीर आँख ही होता, तो वह कैसे सुन सकता? यदि सारा शरीर कान ही होता, तो वह कैसे सूँघ सकता?

18) वास्तव में ईश्वर ने अपनी इच्छानुसर शरीर में एक-एक अंग को अपनी-अपनी जगह रचा।

19) यदि सब-के-सब एक ही अंग होते, तो शरीर कहाँ होता?

20) वास्तव में बहुत-से अंग होने पर भी शरीर एक ही होता है।

21) आँख हाथ से नहीं कह सकती, ’मुझे तुम्हारी ज़रूरत नहीं’, और सिर पैरों से नहीं कह सकता, ’मुझे तुम्हारी ज़रूरत नहीं’।

22) उल्टे, शरीर के जो अंग सब से दुर्बल समझे जाते हैं, वे अधिक आवश्यक हैं।

23) शरीर के जिन अंगों को हम कम आदणीय समझते है।, उनका अधिक आदर करते हैं और अपने अशोभनीय अंगों की लज्जा का अधिक ध्यान रखते हैं।

24) हमारे शोभनीय अंगों को इसकी जरूरत नहीं होती। तो, जो अंग कम आदरणीय हैं, ईश्वर ने उन्हें अधिक आदर दिलाते हुए शरीर का संगठन किया है।

25) यह इसलिए हुआ कि शरीर में फूट उत्पन्न न हो, बल्कि उसके सभी अंग एक दूसरे का ध्यान रखें।

26) यदि एक अंग को पीड़ा होती है, तो उसके साथ सभी अंगों को पीड़ा होती हैं और यदि एक अंग का सम्मान किया जाता है, तो उसके साथ सभी अंग आनन्द मनाते हैं।

27) इसी तरह आप सब मिल कर मसीह का शरीर हैं और आप में से प्रत्येक उसका एक अंग है।

28) ईश्वर ने कलीसिया में भिन्न-भिन्न लोगों को नियुक्त किया है- पहले प्रेरितों को, दूसरे भविष्यवक्ताओं को, तीसरे शिक्षकों और तब चमत्कार दिखाने वालों को। इसके बाद स्वस्थ करने वालों, परोपकारकों, प्रशासकों, अनेक भाषाएँ बोलने वालों को।

29) क्या सब प्रेरित हैं? सब भविष्यवक्ता हैं? सब शिक्षक हैं? सब चमत्कार दिखने वाले हैं? सब भाषाएँ बोलने वाले हैं? सब व्याख्या करने वाले हैं?

30) सब स्वस्थ करने वाले हैं? सब भाषाएँ बोलने वाले हैं? सब व्याख्या करने वाले हैं?



📒 सुसमाचार : लूकस 1:1-4, 4:14-21


1:1) जो प्रारम्भ से प्रत्यक्षदर्शी और सुसमाचार के सेवक थे, उन से हमें जो परम्परा मिली, उसके आधार पर

2) बहुतों ने हमारे बीच हुई घटनाओं का वर्णन करने का प्रयास किया है।

3) मैंने भी प्रारम्भ से सब बातों का सावधानी से अनुसन्धान किया है; इसलिए श्रीमान् थेओफि़लुस, मुझे आपके लिए उनका क्रमबद्ध विवरण लिखना उचित जान पड़ा,

4) जिससे आप यह जान लें कि जो शिक्षा आप को मिली है, वह सत्य है।

14) आत्मा के सामर्थ्य से सम्पन्न हो कर ईसा गलीलिया लौटे और उनकी ख्याति सारे प्रदेश में फैल गयी।

15) वह उनके सभागृहों में शिक्षा दिया करते और सब उनकी प्रशंसा करते थे।

16) ईसा नाज़रेत आये, जहाँ उनका पालन-पोषण हुआ था। विश्राम के दिन वह अपनी आदत के अनुसार सभागृह गये। वह पढ़ने के लिए उठ खड़े हुए

17) और उन्हें नबी इसायस की पुस्तक़ दी गयी। पुस्तक खोल कर ईसा ने वह स्थान निकाला, जहाँ लिखा हैः

18) प्रभु का आत्मा मुझ पर छाया रहता है, क्योंकि उसने मेरा अभिशेक किया है। उसने मुझे भेजा है, जिससे मैं दरिद्रों को सुसमाचार सुनाऊँ, बन्दियों को मुक्ति का और अन्धों को दृष्टिदान का सन्देश दूँ, दलितों को स्वतन्त्र करूँ

19) और प्रभु के अनुग्रह का वर्ष घोषित करूँ।

20) ईसा ने पुस्तक बन्द कर दी और वह उसे सेवक को दे कर बैठ गये। सभागृह के सब लोगों की आँखें उन पर टिकी हुई थीं।

21) तब वह उन से कहने लगे, "धर्मग्रन्थ का यह कथन आज तुम लोगों के सामने पूरा हो गया है"।


📚 मनन-चिंतन


आज के सुसमाचार में हम येसु को अपनी परिकल्पना और मिशन नाज़रथ के सभागृह में प्रस्तुत करते हुए पाते हैं जहाँ उनका पालन-पोषण हुआ था। वे यह कार्य नबी इसायाह के ग्रन्थ के अध्याय 61 की भविष्यवाणियों का हवाला देते हुए करते हैं जहाँ मसीह, प्रभु के अभिषिक्त, के कार्य का वर्णन किया गया है। वे भविष्यवाणियां येसु की बातें सुनने वाले लोगों के सामने साकार हो रही थीं। येसु ही प्रभु का अभिषिक्त है। पुराने विधान में, याजकों, नबियों तथा राजाओं का अभिषेक किया जाता था। प्रभु येसु एक ही समय में याजक, नबी और राजा हैं। मेलकीसेदेक के समान येसु सबसे बड़ा महायाजक हैं। वे मूसा के समान एक नबी है, जिन्हें ईश्वर ने इस्राएली लोगों के बीच उनके भाईयों में से उप्तन्न किया है। वे राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु है। उनका अभिषेक स्वयं लिए नहीं, बल्कि ईश्वर की प्रजा के लिए किया गया था। वे हमारे लिए अभिषेक किये गये थे। उनका प्रेम हमें मुक्त करे।



📚 REFLECTION

In today’s Gospel we find Jesus presenting his vision and mission in the Synagogue of Nazareth where he had been brought up. He does this by quoting the prophecies of Isaiah 61 where the task of the Messiah, the Anointed One is described. Those prophecies were being realized in the hearing of the people. Jesus is the Anointed One. In the Old Testament, the priests, prophets and kings were anointed. Jesus is at the same time Priest, Prophet and King. Jesus is the Greatest High Priest after the model of Melchizedek. He is a Prophet like Moses raised up by God from among his People. He is the King of kings and Lord of lords. He was anointed not for himself, but for God’s people. He was anointed for us. May his love liberate us.


📚 मनन-चिंतन -02

आज के सुसमाचार में संत लूकस बडे़ ही सुन्दर शब्दों में प्रभु येसु के द्वारा अपने गॉव के सभागृह में किये गये कार्यों को हमें बताते हुये कहते हैं - वे खड़े होते हैं, पवित्र ग्रन्थ को अपने हाथों में लेते हैं और पवित्र ग्रन्थ में नबी इसायाह से एक पाठ पढ़ते हैं। इसके तत्पश्चात वे किताब को बन्द करते हैं और अपने स्थान पर बैठ जाते हैं। हर एक ख्रीस्तीय को ध्यानपूर्वक इन शब्दों को सुनना चाहिये जिसे प्रभु येसु ने हम सबों के लिये चुना है। इसी कार्य को आगे बढ़ाने के लिये ईश्वर ने संत लूकस को चुना। संत लूकस कभी भी किसी धर्म को सही ढ़ंग से चलाने की बात नहीं करते और न ही अधिक योग्य रीति से पूजा करने की बात करते हैं, परन्तु वे स्वतत्रता को बढ़ावा देकर, विश्वास, ज्योति, गरीबों के लिये आर्शीवाद का कारण बनने की बात करते हैं। ये ही वे शब्द हैं जिन्हें प्रभु येसु पढ़ते हैं, ‘प्रभु का आत्मा मुझ पर छाया रहता है,...उसने मुझे भेजा है, जिससे मैं दरिद्रों को सुसमाचार सुनाऊँ।’’

येसु के मिशन को आज के सुसमाचार में एक महान विचार के रूप में व्यक्त किया गया है। यर्दन नदी में उन पर जो पवित्र आत्मा उतरे थे, वे जीवन देने के तरीके को सिखाने में अग्रसर थे। हमें बताया गया है कि उन्होंने विश्राम के दिन सभागृह में प्रवेश किया, जैसा कि वे आम तौर पर किया करते थे। येसु का ऐसा करना एक नये युग के आरंभ होने की घोषणा थी। नबी इसायस ने स्पष्ट रूप से भविष्यवाणी की थी कि जब मसीह आयेंगे तो क्या होगा।

येसु मसीह की शिक्षाओं को जीना और उनकी घोषणा करना आसान नहीं है। जो लोग सबसे अधिक पीड़ित होते हैं उनसे दूर रह कर हम किस सुसमाचार कर रहे हैं, किस येसु का हम अनुसरण कर रहे हैं? किस आध्यात्मिकता को बढ़ावा दे रहे हैं? अगर स्पश्ट शब्दों में कहा जाये तो आज की कलीसियाई समुदायों के बारे में हमारी क्या धारणा है? क्या हम उसी दिशा में चल रहे हैं जिसे येसु ने प्रकट किया था?

येसु ने उस अदभुत वाक्य को पढ़ा, फिर स्क्रोल को आगे बढ़ाया और घोषणा की कि आज ये शब्द मेरे बोलते हुये सच हो रहे हैं। इस बात को लोग स्वीकार नहीं कर पाये।

येसु के मिशन को आज के सुसमाचार में बहुत बल के साथ व्यक्त किया गया है। कुछ बुनियादी विद्रोह और गर्व अन्धापन और उत्पीड़न की ओर ले जाता है। ऐसा कुछ नहीं है जिसे हम बाहर से कुछ मदद के बिना हल कर सकते हैं। लेकिन हम से जुड़ने के लिये, हमारे नेतृत्व करने के लिये, हमें बचाने के लिये येसु हमारे साथ हैं। यह वह शक्तिशाली खुशखबरी है जिसकी घोषणा उन्होंने नाजरेत के सभागृह में की थी। प्रभु का आत्मा मुझ पर छाया रहता है, क्योंकि उन्होंने गरीबों के लिये मेरा अभिशेक किया है।

येसु का जीवन ज़रूरतमन्दों के लिए समर्पित था और वे चाहते हैं कि हम भी जो उनके चेले हैं, ज़रूरतमन्दों की सेवा करें। वास्तव में येसु के शिष्य येसु के मिशन-कार्य को ही आगे बढ़ाते हैं। हम भी उनके मिशन-कार्य को जारी रखते हैं। हम भी दरिद्रों को सुसमाचार सुनाने, बन्दियों को मुक्ति का और अन्धों को दृष्टिदान का सन्देश देने, दलितों को स्वतन्त्र करने के लिए बुलाये गये हैं। हमारी प्रतिक्रिया क्या है?


✍ -Br. Biniush Topno


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18 जनवरी 2022, मंगलवार

 

18 जनवरी 2022, मंगलवार

सामान्य काल का दूसरा सप्ताह

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📒 पहला पाठ: समुएल का पहला ग्रन्थ 16:1-13

1) प्रभु ने समूएल से कहा, ‘‘तुम कब तक उस साऊल के कारण शोक मनाते रहोगे, जिसे मैंने इस्राएल के राजा के रूप में अस्वीकार किया है? तुम सींग में तेल भर कर जाओ। मैं तुम्हें बेथलेहेम-निवासी यिशय के यहाँ भेजता हूँ, क्योंकि मैंने उसके पुत्रों में एक को राजा चुना है।"

2) समूएल ने यह उत्तर दिया, ‘‘मैं कैसे जा सकता हूँ? साऊल को इसका पता चलेगा और वह मुझे मार डालेगा।’’ इस पर प्रभु ने कहा, ‘‘अपने साथ एक कलोर ले जाओ और यह कहो कि मैं प्रभु को बलि चढ़ाने आया हूँ।

3) यज्ञ के लिए यिशय को निमन्त्रण दो। मैं बाद में तुम्हें बताऊँगा कि तुम्हें क्या करना है- मैं जिसे तुम्हें दिखाऊँगा, उसी को मेरी ओर से अभिशेक करोगे।’’

4) प्रभु ने जो कहा था, समूएल ने वही किया। जब वह बेथलेहेम पहुँचा, तो नगर के अधिकारी घबरा कर उसके पास दौडे़ आये और बोले, ‘‘कैसे पधारे? कुशल तो है?’’

5) समूएल ने कहा, ‘‘सब कुशल है। मैं प्रभु को बलि चढ़ाने आया हूँ। अपने को शुद्ध करो और मेरे साथ बलि चढ़ाने आओ।’’ उसने यिशय और उसके पुत्रों को शुद्ध किया और उन्हें यज्ञ के लिए निमन्त्रण दिया।

6) जब वे आये और समूएल ने एलीआब को देखा, तो वह यह सोचने लगा कि निश्चय ही यही ईश्वर का अभिषिक्त है।

7) परन्तु ईश्वर ने समूएल से कहा, ‘‘उसके रूप-रंग और लम्बे क़द का ध्यान न रखो। मैं उसे नहीं चाहता। प्रभु मनुष्य की तरह विचार नहीं करता। मनुष्य तो बाहरी रूप-रंग देखता है, किन्तु प्रभु हृदय देखता है।’’

8) यिशय ने अबीनादाब को बुला कर उसे समूएल के सामने उपस्थित किया। समूएल ने कहा, ‘‘प्रभु ने उसे को भी नहीं चुना।’’

9) तब यिशय ने शम्मा को उपस्थित किया, किन्तु समूएल ने कहा, ‘‘प्रभु ने उस को भी नहीं चुना।’’

10) इस प्रकार यिशय ने अपने सात पुत्रों को समूएल के सामने उपस्थित किया। किन्तु समूएल ने यिशय से कहा, ‘‘प्रभु ने उन में किसी को भी नहीं चुना।’’

11) उसने यिशय से पूछा, ‘‘क्या तुम्हारे पुत्र इतने ही है? ’’यिशय ने उत्तर दिया, ‘‘सब से छोटा यहाँ नहीं है। वह भेडे़ चरा रहा है।‘‘ तब समूएल ने यिशय से कहा, ‘‘उसे बुला भेजो। जब तक वह नहीं आयेगा, हम भोजन पर नहीं बैठेंगे।’’

12) इसलिए यिशय ने उसे बुला भेजा। लड़के का रंग गुलाबी, उसकी आँखें सुन्दर और उसका शरीर सुडौल था। ईश्वर ने समूएल से कहा, ‘‘उठो, इसका अभिशेक करो। यह वही है।’’

13) समूएल ने तेल का सींग हाथ में ले लिया और उसके भाइयों के सामने उसका अभिशेक किया। ईश्वर का आत्मा दाऊद पर छा गया और उसी दिन से उसके साथ विद्यमान रहा। समूएल लौट कर रामा चल दिया।

📙 सुसमाचार : सन्त मारकुस 2:23-28

23) ईसा किसी विश्राम के दिन गेहूँ के खे़तों से हो कर जा रहे थे। उनके शिष्य राह चलते बालें तोड़ने लगे।

24) फ़रीसियों ने ईसा से कहा, ’’देखिए, जो काम विश्राम के दिन मना है, ये क्यों वही कर रहे हैं?’’

25) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, ’’क्या तुम लोगों ने कभी यह नहीं पढ़ा कि जब दाऊद और उनके साथी भूखे थे और खाने को उनके पास कुछ नहीं था, तो दाऊद ने क्या किया था?

26) उन्होंने महायाजक अबियाथार के समय ईश-मन्दिर में प्रवेश कर भेंट की रोटियाँ खायीं और अपने साथियों को भी खिलायीं। याजकों को छोड़ किसी और को उन्हें खाने की आज्ञा तो नहीं थी।’’

27) ईसा ने उन से कहा, ’’विश्राम-दिवस मनुष्य के लिए बना है, न कि मनुष्य विश्राम-दिवस के लिए।

28) इसलिए मानव पुत्र विश्राम-दिवस का भी स्वामी है।’’

📚 मनन-चिंतन

फरीसियों को क्रोधित करने वाली एक बात यह थी कि येसु ने विश्राम दिवस के नियमों को तोड़ा। फरीसियों ने विश्राम दिवस के नियमों की व्याख्या बहुत ही संकीर्ण तरीके से की थी। येसु चाहते थे कि वे समझें कि ईश्वर की आज्ञाएँ मनुष्य के लाभ और कल्याण के लिए हैं। हमारे प्रभु चाहते हैं कि हम सुखी रहें। कानूनों का इस्तेमाल इंसानों पर अत्याचार करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। इसके विपरीत येसु कहते हैं, “थके-माँदे और बोझ से दबे हुए लोगो! तुम सभी मेरे पास आओ। मैं तुम्हें विश्राम दूँगा। मेरा जूआ अपने ऊपर ले लो और मुझ से सीखो। मैं स्वभाव से नम्र और विनीत हूँ। इस तरह तुम अपनी आत्मा के लिए शान्ति पाओगे, क्योंकि मेरा जूआ सहज है और मेरा बोझ हल्का।" (मत्ती 11:28-30)। प्रभु में, हमें आराम, सांत्वना और आनंद पाना चाहिए।


📚 REFLECTION

One of the things that angered the Pharisees was that Jesus broke the Sabbath laws. The Pharisees had interpreted the Sabbath laws in a very narrow and ritualistic way. Jesus wanted them to understand that the commandments of God were meant for the benefit and welfare of human beings. Our Lord wants us to be happy. The laws were not meant to be used to oppress human beings. On the contrary Jesus says, “Come to me, all you that are weary and are carrying heavy burdens, and I will give you rest. Take my yoke upon you, and learn from me; for I am gentle and humble in heart, and you will find rest for your souls. For my yoke is easy, and my burden is light.” (Mt 11:28-30). In the Lord, we need to find comfort, solace and joy.



📚 मनन-चिंतन - 02


धार्मिक प्रथाओं सहित किसी भी प्रकार के मानव व्यवहार या प्रथा से प्रभु ईश्वर को कोई लाभ नहीं होता है। धर्म मनुष्य के लिए है कि वह अपने जीवन के लिए समझदार लक्ष्य और मूल्य प्रणाली रख सकें। ईश्वर सभी लोगों की भलाई चाहते हैं। ईश्वर केवल एक है। कोई ईसाई ईश्वर, हिंदू ईश्वर या इस्लामी ईश्वर नहीं है। ईश्वर सभी का कल्याण चाहते हैं। वे नहीं चाहते कि कोई भी भूखा, प्यासा, बीमार या परेशानी में रहे। वे चाहते हैं कि सभी लोगों का जीवन आरामदायक और शांतिप्रद हो। येसु के प्रचार के विषय, ईश्वर के राज्य का सारांश भी यही था। प्रभु ने मानव को प्रभु के दिन को पवित्र रखने की आज्ञा दी। वह विश्राम का दिन है। यह कानून मानव के कल्याण के लिए बनाया गया था। हम किसी भी तरह से ईश्वर के नाम पर विभिन्न धार्मिक प्रथाओं को शुरू करके ईश्वर की महानता में कुछ नहीं जोड़ सकते हैं। विश्राम दिवस के आचरण की आज्ञा लोगों को परेशान करने की आज्ञा नहीं थी, बल्कि लोगों को आराम और विश्राम देने के लिए थी। येसु के समय के कुछ निष्ठावान धर्मगुरुओं ने विश्राम दिवस के आचरण के लिए कई नियम बनाये और प्रतिबंध लगाए। वे लोगों के लिए सहायक नहीं थे, लेकिन उन्होंने उनके जीवन को दयनीय बना दिया। हमें अपने नियमों और विनियमों की जांच करने और उन पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है कि क्या वे ईश्वर और पड़ोसी को प्यार करने में सहायक हैं या नहीं।



📚 REFLECTION


God does not benefit from human practices of any kind including religious practices. Religion is meant for human beings to have sensible goal and a value system for their lives. God wills the good of all. There is only one God. There is no Christian God, Hindu God or Islamic God. God wants the welfare of everyone. He does not want any one to remain hungry, thirsty, sick or in trouble. He wants everyone to have a comfortable, peaceful and joyful life. That is the logic of the Kingdom of God, the theme of Jesus’ preaching. The Lord commanded human beings to keep the Sabbath holy. That is a day of rest – a day to rest in God, to breathe the goodness of God. This law was made for the welfare of the human beings. We cannot add in any way to the greatness of God by introducing various new religious practices in the name of God. Sabbath was not meant to be a law to trouble the people of God, but was meant to give rest and relaxation to God’s people. Some of the scrupulous religious leaders of Jesus’ time introduced too many regulations and restrictions for the practice of the Sabbath. They were not helpful to people but made their lives difficult and at times miserable. We need to examine and reconsider our rules and regulations as to whether they are helpful in loving God and the neighbor.


✍ -Br. Biniush Topno


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