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गुरुवार, 07 अक्टूबर, 2021

 गुरुवार, 07 अक्टूबर, 2021

वर्ष का सताईसवाँ सामान्य सप्ताह

धन्य कुँवारी मरियम माला की महारानी : स्मृति

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पहला पाठ : प्रेरित-चरित 1:12-14

12) प्रेरित जैतून नामक पहाड़ से येरुसालेम लौटे। यह पहाड़ येरुसालेम के निकट, विश्राम-दिवस की यात्रा की दूरी पर है।


13) वहाँ पहुँच कर वे अटारी पर चढ़े, जहाँ वे ठहरे हुए थे। वे थे-पेत्रुस तथा योहन, याकूब तथा सिमोन, जो उत्साही कहलाता था और याकूब का पुत्र यूदस।


14) ये सब एकहृदय हो कर नारियों, ईसा की माता मरियम तथा उनके भाइयों के साथ प्रार्थना में लगे रहते थे।


सुसमाचार : सन्त लूकस 01:26-38

26) छठे महीने स्वर्गदूत गब्रिएल, ईश्वर की ओर से, गलीलिया के नाजरेत नामक नगर में एक कुँवारी के पास भेजा गया,


27) जिसकी मँगनी दाऊद के घराने के यूसुफ नामक पुरुष से हुई थी, और उस कुँवारी का नाम था मरियम।


29) वह इन शब्दों से घबरा गयी और मन में सोचती रही कि इस प्रणाम का अभिप्राय क्या है।


30) तब स्वर्गदूत ने उस से कहा, ’’मरियम! डरिए नहीं। आप को ईश्वर की कृपा प्राप्त है।


31) देखिए, आप गर्भवती होंगी, पुत्र प्रसव करेंगी और उनका नाम ईसा रखेंगी।


32) वे महान् होंगे और सर्वोच्च प्रभु के पुत्र कहलायेंगे। प्रभु-ईश्वर उन्हें उनके पिता दाऊद का सिंहासन प्रदान करेगा,


33) वे याकूब के घराने पर सदा-सर्वदा राज्य करेंगे और उनके राज्य का अन्त नहीं होगा।’’


34) पर मरियम ने स्वर्गदूत से कहा, ’’यह कैसे हो सकता है? मेरा तो पुरुष से संसर्ग नहीं है।’’


35) स्वर्गदूत ने उत्तर दिया, ’’पवित्र आत्मा आप पर उतरेगा और सर्वोच्च प्रभु की शक्ति की छाया आप पर पड़ेगी। इसलिए जो आप से उत्पन्न होंगे, वे पवित्र होंगे और ईश्वर के पुत्र कहलायेंगे।


36) देखिए, बुढ़ापे में आपकी कुटुम्बिनी एलीज़बेथ के भी पुत्र होने वाला है। अब उसका, जो बाँझ कहलाती थी, छठा महीना हो रहा है;


37) क्योंकि ईश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है।’’


38) मरियम ने कहा, ’’देखिए, मैं प्रभु की दासी हूँ। आपका कथन मुझ में पूरा हो जाये।’’ और स्वर्गदूत उसके पास से चला गया।


📚 मनन-चिंतन

रोज़री की माता का पर्व कलीसिया के सबसे प्रेरक पर्वों में से एक है। यह तुरंत हमारे विचार को माता मरियम और उनकी सबसे लोकप्रिय आम प्रार्थना माला विनती की ओर ले जाता है। पर्व को इतना लोकप्रिय और शक्तिशाली बनाने के लिए इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। 7 अक्टूबर 1571 को एक समूह की सेना ने तुर्की की नाभि सेना को हराया था। सन्त पापा पायस पान्चवे ने जीत का श्रेय धन्य कुंवारी मरियम की मध्यस्था को दिया, जिसे युद्ध के दिन पूरे यूरोप में माला विनती करने के अभियान के माध्यम से आमंत्रित किया गया था। यह ख्रिस्तीय देशों की एक ऐतिहासिक जीत थी क्योंकि तुर्की साम्राज्य ख्रिस्तीय दुनिया विशेषकर यूरोप के लिए खतरा था। यदि तुर्की सेना को युद्ध जीतती, तो यूरोप का सांस्कृतिक, धार्मिक चेहरा पहले जैसा नहीं होता। तब से, माला विनती के माध्यम से मरियम की भक्ति दूर-दूर तक बढ़ी है। लोगों ने ईश्वर की शक्ति का अनुभव किया है और रोजरी की माता मरियम के माध्यम से चमत्कारी अनुग्रह प्राप्त किया है।



📚 REFLECTION


The feast of Our Lady of Rosary is one of the most inspiring feasts in the church. It immediately takes our thought to blessed Mother Mary and the most common prayer Rosary. The historical background plays an important role for the feast to be so popular and powerful. It was on 7th October 1571 that the army of a league defeated the Turkey navel army. Pope St. Pius V attributed the victory to the intercession of the Blessed Virgin Mary, who was invoked on the day of the battle through a campaign to pray the Rosary throughout Europe. It was a landmark victory of the Christian countries as the Turkey empire was threatening the Christian world especially Europe. If the turkey forces were to win the battle, then the cultural, religious face of Europe would not have been the same.


Since then, the devotion to Mary through the Rosary has grown far and wide. People have experienced the power of God and obtained miraculous favors through the intercession of Our Lady of Rosary



मनन-चिंतन - 2

आज कलीसिया माला-विनती की माता मरिया का त्योहार मनाती है। माला-विनती पवित्र वचन पर मनन-चिंतन की प्रार्थना है। माला-विनती में हम ’प्रणाम मरिया” प्रार्थना बार-बार दोहराते हैं। “प्रणाम मरिया, कृपापूर्ण, प्रभु आपके साथ हैं” - यह लूकस 1:28 का पवित्र वचन है। प्रभु का दूत प्रभु का सन्देश लेकर आता है। अगर वह माता मरियम को प्रणाम करता है, तो वह प्रभु के आदेश के अनुसार ही करता है। अगर वह कहता है कि आप कृपापूर्ण है और प्रभु आपके साथ है, तो वह भी प्रभु की प्रेरणा से ही कहता है। “आप नारियों में धन्य हैं और धन्य हैं आप के गर्भ का फल येसु” – यह लूकस 1:42 का एलिज़बेथ द्वारा घोषित पवित्र वचन है। पवित्र वचन कहता है कि एलिज़बेथ पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर ऊँचे स्वर से बोल उठी (देखें लूकस 1:42)। ’प्रणाम मरिया’ प्रार्थना के दूसरे भाग में हम माता मरियम को ‘ईश्वर की माँ’ कह कर उनसे हम पापियों के लिए अब और हमारी मृत्यु के समय प्रार्थना करने की याचना करते हैं। माता मरियम एक ही समय पिता ईश्वर की बेटी हैं, पुत्र ईश्वर की माता हैं और पवित्र आत्मा की दुल्हन हैं। उनका बेटा येसु ईश्वर हैं, इसलिए येसु की माता होने के कारण उन्हें हम ’ईश्वर की माता’ कहते हैं। लूकस 1:43 में एलिज़बेथ उन्हें “मेरे प्रभु की माता” कहती हैं। परम्परा के अनुसार प्रभु येसु के सार्वजनिक कार्यों के शुरू होने से पहले ही संत यूसुफ़ की मृत्यु हुयी थी। प्रभु येसु की मृत्यु के समय माता मरियम क्रूस के नीचे खडी थी। संत यूसुफ़ और प्रभु येसु की मृत्यु के समय उपस्थित माता मरियम से ही हम अब और हमारी मृत्यु के समय हमारे लिए प्रार्थना करने की याचना करते हैं। इस प्रकार यह प्रार्थना ईशवचन तथा मुक्ति के रहस्यों का मनन-ध्यान है।


Today the Church celebrates the Feast of Our Lady of the Rosary. Rosary is a prayer based on the meditation of the Word of God. During the rosary we repeatedly recite ‘Hail Mary’. “Hail Mary, Full of Grace, the Lord is with you” – these are words from Lk 1:28. The angel of the Lord brings the message of the Lord to Mary. It is at the instruction of the Lord that the angel greets Mary in these words. It is at the inspiration of the Lord that the angel describes her as ‘full of grace’. “Blessed are you among women and blessed is the fruit of your womb Jesus” – these are the Word of the Lord uttered by Elizabeth. The Bible says, “And Elizabeth was filled with the Holy Spirit, and exclaimed with a loud cry” (Lk 1:42). These are, therefore, words inspired by the Spirit of the Lord. In the second part of the prayer we, addressing Mary as Mother of God, beg her to pray for us now and at the hour of our death. Jesus is God and therefore Jesus’ mother is Mother of God. Our Lady is at the same time the daughter of God the Father, mother of God the Son and the spouse of the Holy Spirit. In Lk 1:43 Elizabeth calls her ‘Mother of my Lord’. Thus this prayer is completely a meditation of the inspired Word of God and of the mysteries of our salvation. Who can pray for us now at the hour of our death better than Mary who not only lived with Jesus and Joseph, her husband, but also assisted them at their death?


✍ -Br Biniush Topno




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बुधवार, 06 अक्टूबर, 2021

 

बुधवार, 06 अक्टूबर, 2021

वर्ष का सताईसवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ :योना का ग्रन्थ 4:1-11


1) योना को यह बात बहुत बुरी लगी। वह क्रुद्ध हो गया और उसने यह कह कर प्रभु से निवेदन किया,

2) ’’प्रभु! क्या मैंने यह नहीं कहा था, जब मैं अपने स्वदेश में था? इसलिए तो मैं तरशीश नगर भाग गया। मैं जानता था कि तू करुणामय तथा दयालु ईश्वर है- देर से क्रोध करने वाला, अनुग्रह का धनी और दण्ड देने को अनिच्छुक।

3) प्रभु! अब तू मुझे उठा ले। जीवित रहने की अपेक्षा मेरे लिए मर जाना कहीं अच्छा है।’’

4) प्रभु ने उत्तर दिया, ’’क्या तुम्हारा क्रोध उचित है?’’

5) योना नगर से निकल कर उसके पूर्व में बैठ गया। वहाँ उसने अपने लिए एक छप्पर छा लिया और यह देखने के लिए कि नगर का क्या होगा, वह उसकी छाया में बैठ गया।

6) तब प्रभु ने एक कुंदरू लता लगायी। वह योना के ऊपर फैल गयी और उसके सिर पर छाया कर उसे आराम देने लगी। उस लता से योना बहुत प्रसन्न हुआ।

7) दूसरे दिन, सबेरे, प्रभु ने एक कीडे को लता काटने का आदेश दिया और वह लता सूख गयी।

8) सूर्योंदय के बाद ईश्वर के आदेशानुसार झुलसाने वाली पूर्वी हवा चलने लगी। योना के सिर पर पडने वाली धूप इतनी तेज थी कि वह बेहोश होने लगा और मरने की इच्छा प्रकट करते हुए बोल उठा, ’’जीवित रहने की अपेक्षा मेरे लिए मर जाना कहीं अच्छा है।’’

9) ईश्वर ने योना से कहा, ’’क्य कुँदरू लता के कारण तुम्हारा क्रोध उचित है?’’ उसने उत्तर दिया, ‘‘मेरा क्रोध उचित है। मैं मर जाना चाहता हूँ।’’

10) तब प्रभु ने कहा, ’’तुम तो उस लता की चिन्ता करते हो। तुमने उसके लिए कोई परिश्रम नहीं किया। तुमने उसे नहीं उगाया। वह एक रात में उग गयी और एक रात में नष्ट हो गयी।

11) तो क्या मैं इस महान् नगर निनीवे की चिन्ता नहीं करूँ? उस में एक लाख बीस हज़ार से अधिक ऐसे मनुय रहते हैं, जो अपने दाहिने तथा बायें हाथ का अंतर नहीं जानते, और असंख्य जानवर भी।’’..


सुसमाचार : सन्त लूकस 11:1-4



1) एक दिन ईसा किसी स्थान पर प्रार्थना कर रहे थे। प्रार्थना समाप्त होने पर उनके एक शिष्य ने उन से कहा, ‘‘प्रभु! हमें प्रार्थना करना सिखाइए, जैसे योहन ने भी अपने शिष्यों को सिखाया’’।

2) ईसा ने उन से कहा, ’’इस प्रकार प्रार्थना किया करोः पिता! तेरा नाम पवित्र माना जाये। तेरा राज्य आये।

3) हमें प्रतिदिन हमारा दैनिक आहार दिया कर।

4) हमारे पाप क्षमा कर, क्योंकि हम भी अपने सब अपराधियों को क्षमा करते हैं और हमें परीक्षा में न डाल।’’



📚 मनन-चिंतन


प्रार्थना करने वाला व्यक्ति बहुत आकर्षक व्यक्ति बन जाता है। उसके आकर्षण का इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि हमारे पास उसके समान समझ है कि नहीं। वास्तव में प्रार्थना करने वाले व्यक्ति के चारों ओर एक आभा होती है जो लोगों को मोहित करती है।

प्रार्थना करने वाले व्यक्ति के पास न केवल एक दृश्य आभा होती है बल्कि उसका एक बहुत ही ठोस और रहस्यमय व्यक्तित्व भी होता है। येसु बहुत ही आकर्षक व्यक्तित्व थे। वे एक सुपरमैन की तरह थे। ऐसा प्रतीत होता है कि वह कुछ भी और सब कुछ कर सकते थे। उन्होंने बड़े चमत्कार किए। उनके पास हर बात का जवाब था। उनका ज्ञान गहरा था। इंसान के बारे में उनकी समझ अद्भुत है। करुणा, सत्यनिष्ठा, ऊर्जा और प्रेम जैसे उनके गुण अतुलनीय हैं। येसु के बारे में सब कुछ आकर्षक और मनोरम था। फिर भी, सुसमाचारों में, हमें ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता है जहाँ शिष्यों ने उनसे चमत्कार करने या ज्ञान सिखाने का अनुरोध किया हो। उन्होंने केवल उससे पूछा, “हे प्रभु, हमें प्रार्थना करना सिखाईये।” शिष्य शायद समझ गए थे कि येसु की सभी अद्भुत अच्छाइयों का स्रोत स्वयं ईश्वर हैं। यह पिता के साथ उनकी एकता का नतीजा है कि येसु वह सब करने में सक्षम थे जो उन्होंने किया था। प्रार्थना हमारा ईश्वर से मिलन है। जितना अधिक हम ईश्वर से एकजुट होंगे उतना ही हम दुनिया, उसकी शक्तियों, लोगों और उनको चलाने वाली वैचारिक ताकतों को समझ पाएंगे।

शिष्यों ने येसु से उन्हें प्रार्थना करना सिखाने के लिए कहा क्योंकि योहन बपतिस्मा स्वयं एक भविष्यसूचक, मजबूत व्यक्तित्व और एक प्रार्थनापूर्ण व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे। उन्होंने अपने शिष्यों को प्रार्थना करना सिखाया था। और शायद योहन के चेले अपने सार्वजनिक जीवन में प्रभावशाली थे। यह विचार एक बार फिर इंगित करता है कि योहन बपतिस्मा के बारे में सबसे आकर्षक बात उनका प्रार्थना का जीवन था।



📚 REFLECTION



A praying person becomes a very attractive person. His attraction has nothing to do with the kind of understanding we have about it in the world sense. A truly praying person has an aura around him that fascinates people. A praying person not only has a visible aura but also a very solid and mystifying personality. Jesus was a very captivating personality. He was like a superman. Seemingly he could do anything and everything. He performed great miracles. He had answers for everything. His knowledge was profound. His understanding of the human being marvelous. His virtues such as compassion, integrity, energy, and love are unmatchable. Everything about Jesus was fascinating and captivating. Yet in the gospels, we do not find an instance where disciples requested him to teach performing miracles or teaching wisdom. They merely asked him, “Lord, teach us to pray.” Disciples perhaps understood that the source of all the amazing goodness of Jesus is God himself. And it is in union with the Father that Jesus was able to do all that he did. Prayer is the union with God. The more we are united the more we would understand the world, its powers, people, and the driving philosophy behind them.

The disciples asked Jesus to teach them to pray was because john the Baptism himself a prophetic and robust personality was known to be a prayerful person. He had taught his disciples to pray. And perhaps the disciples of John were impressive in their public life. This yet again points out that the most appealing thing about John the Baptist was his prayer life.



मनन-चिंतन - 2


जब शिष्यों ने प्रभु से कहा कि हमें प्रार्थना करना सिखाइए, तब प्रभु ने उनको ’इस प्रकार प्रार्थाना करो’ कह कर ’हे पिता हमारे’ प्रार्थना सिखायी। ’हे पिता हमारे’ न केवल एक आदर्श प्रार्थना है, बल्कि प्रार्थना करने का तरीका भी है। ‘हे पिता हमारे’ एक उदार व्यक्ति की प्रार्थना है। प्रार्थना करने वाले को ईश्वर को पिता मानना चाहिए। जब हम ईश्वर को पिता मानते हैं, तब हम सारी मानवजाति को ईश्वर की संतान होने के कारण भाइ-बहन मानने लगते हैं। इसलिए हम ईश्वर को ’मेरे पिता’ नहीं, बल्कि ’हमारे पिता’ कह कर संबोधित करते हैं। दुनिया के सभी लोगों को अपने भाइ-बहन मानने के लिए हमें उदार बनना पडता है। जितना ज़्यादा हम उदार बनते हैं, उतना ज़्यादा हम प्रार्थना करने योग्य बनते हैं। कलीसिया में अस्सीसी के संत फ्रांसिस जैसे महान संत भी हैं जिन्होंने न केवल सभी मनुष्यों को, और न ही केवल सभी प्राणियों को बल्कि सभी सृष्ट वस्तुओं को भी भाइ-बहन मानते थे। संत फ्रांसिस ने सूर्य को भाई तथा चन्द्रमा को बहन कह कर संबोधित करते थे। अगर हम उदार नहीं हैं, तो हम यह प्रार्थना नहीं कर सकते हैं।




When the disciples approached Jesus and said, “Lord, teach us to pray”. He told them, “when you pray, this is what to say”. Then he proceeded to teach them ‘our Father’. ‘Our Father’, therefore is not only a model prayer, but also a method of prayer. ‘Our Father’ is a prayer of a generous person. The one who prays, according to Jesus, should consider God to be his/ her father. Evidently, it follows that all human beings are our brothers and sisters, the members of our family, the family of God. Jesus taught us to address God as ‘our Father’ not ‘my father’. To be able to consider all human beings as our brothers and sisters, we need to become generous in our outlook and approach. The more generous we become, more worthy we become to recite this prayer. Humanity has witnessed the splendid testimonies of many great saints including St. Francis of Assisi who considered not only all human beings as his brothers and sisters, not only even all the creatures, but all created things. St. Francis addressed the Sun as ‘brother sun’ and the moon as ‘sister moon. If we are not generous we are not worthy to pray to God.


 -Br Biniush Topno


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मंगलवार, 05 अक्टूबर, 2021

 

मंगलवार, 05 अक्टूबर, 2021

वर्ष का सताईसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ :योना का ग्रन्थ 3:1-10


1) प्रभु के वाणी योना को दूसरी बार यह कहते हुए सुनाई पडी,

2) ’’उठो! महानगर निनीवे जा कर वहाँ के लोगों को उपदेश दो, जैसा कि मैंने तुम्हें बताया है’’।

3) इस पर योना उठ खडा हुआ और प्रभु के आज्ञानुसार निनीवे चला गया। निनीवे एक बहुत बड़ा शहर था। उसे पार करने में तीन दिन लगते थे।

4) योना ने उस में प्रवेश किया और एक दिन की यात्रा पूरी करने के बाद वह इस प्रकार उपदेश देने, लगा ’’चालीस दिन के बाद निनीवे का विनाश किया जायेगा’’।

5) निनीवे के लोगों ने ईश्वर की बात पर विश्वास किया। उन्होंने उपवास की घोषणा की और बडों से लेकर छोटों तक सबों ने टाट ओढ लिया।

6) निनीवे के राजा ने यह खबर सुनी। उसने अपना सिंहासन छोड दिया, अपने वस्त्र उतार कर टाट पहन लिया और वह राख पर बैठ गया।

7) इसके बाद उसने निनीवे में यह आदेश घोषित किया, ’’यह राजा तथा उसके सामन्तों का आदेश है: चाहे मनुय हो या पशु, गाय-बैल हो या भेड-बकरी, कोई भी न तो खायेगा, न चरेगा और न पानी पियेगा।

8) सभी व्यक्ति टाट ओढ कर पूरी शक्ति से ईश्वर की दुहाई देंगे। सभी अपना कुमार्ग तथा अपने हाथों से होने वाले हिंसात्मक कार्य छोड दें।

9) क्या जाने ईश्वर द्रवित हो जाये, उसका क्रोध शान्त हो जाये और हमारा विनाश न हो’’।

10) ईश्वर ने देखा कि वे क्या कर रहे हैं और किस प्रकार उन्होंने कुमार्ग छोड दिया है, तो वह द्रवित हो गया और उसने जिस विपत्ति की धमकी दी थी, उसे उन पर नहीं आने दिया।



सुसमाचार : सन्त लूकस 10:38-42


38) ईसा यात्रा करते-करते एक गाँव आये और मरथा नामक महिला ने अपने यहाँ उनका स्वागत किया।

39) उसके मरियम नामक एक बहन थी, जो प्रभु के चरणों में बैठ कर उनकी शिक्षा सुनती रही।

40) परन्तु मरथा सेवा-सत्कार के अनेक कार्यों में व्यस्त थी। उसने पास आ कर कहा, ’’प्रभु! क्या आप यह ठीक समझते हैं कि मेरी बहन ने सेवा-सत्कार का पूरा भार मुझ पर ही छोड़ दिया है? उस से कहिए कि वह मेरी सहायता करे।’’

41) प्रभु ने उसे उत्तर दिया, ’’मरथा! मरथा! तुम बहुत-सी बातों के विषय में चिन्तित और व्यस्त हो;

42) फिर भी एक ही बात आवश्यक है। मरियम ने सब से उत्तम भाग चुन लिया है; वह उस से नहीं लिया जायेगा।’’


📚 मनन-चिंतन


आज का सुसमाचार जीवन के दो अत्यंत महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डालता है। काम और पूजा। मार्था और मरियम दो बहनें हैं जिनका येसु के प्रति बहुत भिन्न प्रकार का दृष्टिकोण था। मार्था येसु के लिए तैयारी करने में व्यस्त थी। वह अपने घर में प्रभु को प्रसन्न करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही थी। हालाँकि, मरियम अपनी बहन के साथ घर के कामों में शामिल नहीं थी। बल्कि उसने येसु के चरणों में बैठना और उनकी बातें सुनना चुना। मार्था येसु को उसकी कठिनाइयों की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए बुलाती है लेकिन हमें मरियम से कुछ भी नहीं सुनाई देता है। हम अच्छी तरह से यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जब आप प्रभु के निकट होते हैं तो आपको और कुछ नहीं चाहिए होता है। यद्यपि हमारे पास कार्य की कमी हो सकती है, परमेश्वर की उपस्थिति जीवन में हमें जो कुछ भी चाहिए, उसका आश्वासन है। व्यस्त जीवन अच्छा है और काम बहुत जरूरी है लेकिन ईश्वर की कीमत पर नहीं। ईश्वर हमारे जीवन की सर्वोच्च और सर्वोच्च प्राथमिकता बनी रहती है।

मार्था की तरह, हम भले ही अद्भुत और न्यायोचित कार्य कर रहे हों, लेकिन अगर यह हमें प्रभु से दूर रख रहा है, तो निश्चित ही जीवन में कुछ असुविधा और शून्यता पैदा होगी। इसलिए जब ईश्वर निकट हो, तो हम उनके साथ रहें। मरियम एक आलसी महिला नहीं थी कि वह काम टालने करने की कोशिश कर रही थी, बल्कि उस समय जब येसु ने घर में प्रवेश किया तो उसने काम करना बंद कर दिया और अपना समय उन्हें समर्पित कर दिया।




📚 REFLECTION



Today’s Gospel throws light on the two very important aspects of life. work and worship. Martha and Mary are two sisters who had a very different types of approaches towards Jesus. Martha was busy in making preparation for Jesus. She was leaving no room in making the Lord comfortable in her house. However, Mary was not involved in the household work with her sister. She rather chose to sit at the feet of Jesus and listen to him. Martha calls out Jesus to draw his attention towards her difficulties but we hear nothing from Mary. We may well conclude that when you are near the Lord there is nothing more you need. Although we may be lacking in action the presence of God is the assurance of everything we need in life. a busy life is good and work is very essential but not at the cost of God. God remains the supreme and the topmost priority of our life.

Like Martha, we may be doing wonderful and justifiable work but if it is keeping us away from the Lord then there is bound to arise some discomfiture and void. Therefore, when the Lord is near let us be with him. Mary was not a lazy woman that she was trying void work but rather at that moment when Jesus entered the house she stopped working and devoted her time to him..



मनन-चिंतन - 2



बेथानिया की मरियम के बारे में प्रभु येसु कहते हैं, “मरियम ने सब से उत्तम भाग चुन लिया है” (लूकस 10:42)। मरियम ने कौन-सा भाग चुन लिया था? पवित्र वचन कहता है कि मरियम “प्रभु के चरणों में बैठ कर उनकी शिक्षा सुनती रही” (लूकस 10:39)। यह एकमात्र वह बात है जो ज़रूरी है। प्रभु के चरणों में बैठ कर उनका वचन सुनना सब से उत्तम भाग है। प्रभु कहते हैं कि मरथा बहुत-सी बातों के बारे में चिन्तित और व्यस्थ थी। क्या हमारे बारे में भी यह सच नहीं है? क्या हम भी बहुत-सी बातों के बारे में चिन्तित और व्यस्थ नहीं हैं? प्रभु कहते हैं, “तुम सब से पहले ईश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज में लगे रहो और ये सब चीजें, तुम्हें यों ही मिल जायेंगी” (मत्ति 6:33)। लूकस 10:23-24 में हम पढ़ते हैं, “प्रभु ने अपने शिष्यों की ओर मुड़ कर एकान्त में उन से कहा, "धन्य हैं वे आँखें, जो वह देखती हैं जिसे तुम देख रहे हो! क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ - तुम जो बातें देख रहे हो, उन्हें कितने ही नबी और राजा देखना चाहते थे, परन्तु उन्होंने उन्हें नहीं देखा और जो बातें तुम सुन रहे हो, वे उन्हें सुनना चाहते थे, परन्तु उन्होंने उन्हें नहीं सुना।" मरियम का यह सौभाग्य था कि वह प्रभु ईश्वर के मुँह से उनकी वाणी सुन सकी। मरथा ने उस अवसर को गँवा दिया।




About Mary of Bethany Jesus says, “Mary has chosen the better part” (Lk 10:42). What did Mary choose? The Bible says, “Mary … sat at the Lord’s feet and listened to what he was saying” (Mt 10:39). Sitting at the Lord’s feet listening to the Word of God is the better part, the only thing that is necessary. About Martha Jesus says that she was worried and troubled about many things. Is this not true about us too? The Lord says, “strive first for the kingdom of God and his righteousness, and all these things will be given to you as well” (Mt 6:33). Once Jesus said to his disciples, “Blessed are the eyes that see what you see! 24 For I tell you that many prophets and kings desired to see what you see, but did not see it, and to hear what you hear, but did not hear it.” (Lk 10:23-24). Mary was fortunate to listen to Word of God from God’s own mouth. Martha wasted that opportunity.


 -Br. Biniush Topno


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सोमवार, 04 अक्टूबर, 2021 वर्ष का सताईसवाँ सामान्य सप्ताह असीसी के सन्त फ़्रान्सिस

 

सोमवार, 04 अक्टूबर, 2021

वर्ष का सताईसवाँ सामान्य सप्ताह

असीसी के सन्त फ़्रान्सिस

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पहला पाठ :योना का ग्रन्थ 1:1-2,1,11


1) प्रभु की वाणी अमित्तय के पुत्र योना के यह कहते हुए सुनाई पड़ी,

2) ’’उठों! महानगर निनीवे जा कर वहाँ के लोगों को डाँटो, क्योंकि मैं उनकी बुराई को अनदेखा नहीं कर सकता’’।

3) किन्तु योना ने प्रभु के सामने से भाग कर तरशीश के लिए प्रस्थान किया। यह याफा पहुँख और उसे वहाँ तरशीश जाने वाला जहाज मिला। उसने किराया दिया और प्रभु के सामने से तरशीश भागने के उद्देश्य से वह नाव पर सवार हो गया।

4) प्रभु ने समुद्र पर जोरों की आँधी भेजी और समुद्र में ऐसा भयंकर तूफान पैदा हुआ कि जहाज टूटने-टूटने को हो गया।

5) मल्लाहों पर भय छा गया और वे अपने-अपने देवता की दुहाई देने लगे। उन्होंने जहाज का भार कम करने के लिए सामान समुद्र में फेंक दिया। योना जहाज के भीतरी भाग में उतर कर लेट गया था और गहरी नींद सो रहा था।

6) कप्तान ने उसके पास आ कर कहा, ’’सोते क्यों हो? उठ कर अपने ईश्वर की दुहाई दो। वह ईश्वर शायद हमारी सुध ले, जिससे हमारा विनाश न हो।’’

7) इसके बाद मल्लाह एक दूसरे से कहने लगे, ’’आओ! हम चिट्ठि डाल कर देखें कि किस व्यक्ति के कारण यह विपत्ति हम पर आयी है’’। उन्होंने चिट्ठि डाली और योना का नाम निकला।

8) उन्होंने उस से कहा, ’’हमें अपना परिचय दो। तुम कहाँ से आये? तुम किस देश के निवासी हो? किस राष्ट्र के सदस्य हो?’’

9) उसने उन्हें उत्तर दिया, ’’मैं इब्रानी हूँ। मैं स्वर्ग के ईश्वर, प्रभु पर श्रद्धा रखता हूँ, जिससे समुद्र और पृथ्वी बनायी है।’’

10) महल्लाह यह सुन कर बहुत डर गये और उन्होंने उस से कहा, ’’तुमने ऐसा क्यों किया?’’ योना ने उन्हें बताया था कि वह प्रभु के सामने से भाग गया था।

11) तब उन्होंने उस से पूछा, ’’हम तुम्हारे साथ क्या करें जिससे समुद्र हमारे लिए शांत हो जाये?’’ क्योंकि समुद्र में तूफान बढता जा रहा था।

12) उसने उन्हें उत्तर दिया, ’’मुझे उठा कर समुद्र में फेंक दो और समुद्र तुम्हारे लिए शान्त हो जायेगा; क्योकि मैं जानता हूँ कि मेरे ही कारण यह भयंकर तूफान तुम लोगों को सता रहा है।’’

13) इस पर मल्लाहों ने डाँड़ के सहारे जहाज़ को किनारे तक पहुँचाने का प्रयत्न किया, किन्तु वे ऐसा नहीं कर सके, क्योंकि समुद्र में उनके चारों और ऊँची-ऊँची लहरें उठने लगीं।

14) तब उन्होंने यह कहते हुए प्रभु से प्रार्थना की, ’’प्रभु! इस मनुय की हत्या से हमारा विनाश न हो। तू हम पर निर्दोष रक्त बहाने का अभियोग नहीं लगा; क्योंकि, प्रभु! तूने चाहा कि ऐसा हो।’’

15) इस पर उन्होंने योना को उठा कर समुद्र में फेंक दिया और समुद्र शान्त हो गया।

16) मल्लाह प्रभु से बहुत डर गये। उन्होंने प्रभु को बलि चढायी और मन्नतें मानीं।

1) प्रभु के आदेशानुसार एक मच्छ योना को निगल गया और योना तीन दिन और तीन रात मच्छ के पेट में पडा रहा।

2) योना ने मच्छ के पेट से ही प्रभु, अपने ईश्वर से प्रार्थना की। उसने कहाः

3) मैंने अपने संकट में प्रभु की दुहाई दी और उसने मेरी प्रार्थना स्वीकार कर ली; मैंने अधोलोक में से तुझे पुकारा और तूने मेरी सुनी।

4) तूने मुझे गहरे महासागर में फेंक दिया था, बाढ़ ने मुझे घेर लिया था। तेरी उमड़ती लहरें मुझे डुबा कर ले गयी थीं।

5) मैंने अपने मन में कहा, ’’तूने मुझे अपने सामने से निकाल दिया। मैं तेरे पवत्रि मन्दिर फिर कैसे देख पाऊँगा?

6) मैं समुद्र में डूब रहा था, मेरे चारों ओर जल ही जल था;

7) मैंने पर्वतों की जड तक पहुँच गया था और मेरे सिर में सिवार लिपट गया था।

8) जब मैं निराशा में डूबा जा रहा था, तो मैंने प्रभु को याद किया और मेर प्रार्थना तेरे पवत्रि मन्दिर में तेरे पास पहुँची।

9) जो मिथ्या देवताओं की पूजा करते हैं, वे भले ही सच्ची भक्ति त्याग दें,

10) किन्तु मैं तेरा ही गुणगान गाते हुए तुझ को बलि चढाऊँगा। मैं अपनी मन्नत पूरी करूँगा। प्रभु-ईश्वर ही उद्धारक है।

11) इसके बाद प्रभु ने मच्छ को आदेश दिया और उसने योना को तट पर उगल दिया।



सुसमाचार : सन्त लूकस 10:25-37



25) किसी दिन एक शास्त्री आया और ईसा की परीक्षा करने के लिए उसने यह पूछा, ’’गुरूवर! अनन्त जीवन का अधिकारी होने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?’’

26) ईसा ने उस से कहा, ’’संहिता में क्या लिखा है?’’ तुम उस में क्या पढ़ते हो?’’

27) उसने उत्तर दिया, ’’अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा, अपनी सारी शक्ति और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो और अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो’’।

28) ईसा ने उस से कहा, ’’तुमने ठीक उत्तर दिया। यही करो और तुम जीवन प्राप्त करोगे।’’

29) इस पर उसने अपने प्रश्न की सार्थकता दिखलाने के लिए ईसा से कहा, ’’लेकिन मेरा पड़ोसी कौन है?’’

30) ईसा ने उसे उत्तर दिया, ’’एक मनुष्य येरुसालेम से येरीख़ो जा रहा था और वह डाकुओं के हाथों पड़ गया। उन्होंने उसे लूट लिया, घायल किया और अधमरा छोड़ कर चले गये।

31) संयोग से एक याजक उसी राह से जा रहा था और उसे देख कर कतरा कर चला गया।

32) इसी प्रकार वहाँ एक लेवी आया और उसे देख कर वह भी कतरा कर चला गया।

33) इसके बाद वहाँ एक समारी यात्री आया और उसे देख कर उस को तरस हो आया।

34) वह उसके पास गया और उसने उसके घावों पर तेल और अंगूरी डाल कर पट्टी बाँधी। तब वह उसे अपनी ही सवारी पर बैठा कर एक सराय ले गया और उसने उसकी सेवा शुश्रूषा की।

35) दूसरे दिन उसने दो दीनार निकाल कर मालिक को दिये और उस से कहा, ’आप इसकी सेवा-शुश्रूषा करें। यदि कुछ और ख़र्च हो जाये, तो मैं लौटते समय आप को चुका दूँगा।’

36) तुम्हारी राय में उन तीनों में कौन डाकुओं के हाथों पड़े उस मनुष्य का पड़ोसी निकला?’’

37) उसने उत्तर दिया, ’’वही जिसने उस पर दया की’’। ईसा बोले, ’’जाओ, तुम भी ऐसा करो’’।



📚 मनन-चिंतन



भले सामरी का दृष्टान्त ख्रीस्तीय उदारता का प्रतीक रहा है। दृष्टांत के माध्यम से, ईश्वर दूसरों के प्रति हमारे दान का मार्ग और असीमता बताते हैं। हमें यह नहीं पूछना है कि मेरा पड़ोसी कौन है बल्कि यह कि मैं किसका पड़ोसी हो सकता हूं।

याजक और लेवी के लिए जो घायल व्यक्ति के रास्ते से गुजरे थे, वह एक बाधा और एक समस्या थी जिसमें वे शामिल नहीं होना चाहते थे। क्योंकि उनके लिए शायद मंदिर में ईश्वर की सेवा करना सबसे महत्वपूर्ण और जरूरी बात थी। हालाँकि, सामरी के लिए, यह परमेश्वर की सेवा करने का एक अवसर था। उसने घायल व्यक्ति की देखभाल करने में असाधारण उदारता और विचारशीलता दिखाई। दृष्टांत के माध्यम से, येसु बताते हैं कि हर कोई जरूरतमंद हमारी सामाजिक और ख्रिस्तीय जिम्मेदारी बन जाता है। दूसरा, हमारी क्षमता के भीतर एक पूर्ण और व्यापक मदद जरूरतमंदों को उपलब्ध कराई जानी चाहिए। मदद के लिए कोई मौसम या अनुकूल स्थिति की जरुरत नहीं है। हमें एक सामरी की तरह गतिशील होना चाहिए, स्वेच्छा से और लोगों तक पहुंचने के लिए अपने जीवन और संसाधनों के साथ उदार होना चाहिए। सन्त विंसेंट डीपॉल ने इन शब्दों के साथ येसु के मन को खूबसूरती से अभिव्यक्त किया है, "जब हम वेदी पर ईश्वर की आराधना करते हैं और कोई द्वार पर घंटी बजाता है तो हमें उठना चाहिए और दरवाजे पर ईश्वर की सेवा करना शुरू करना चाहिए।"



📚 REFLECTION



The parable of the Good Samaritan has been the epitome of Christian charity. Through the parable, the Lord explains the way and the limitlessness of our charity towards others. We are not to ask who is my neighbor but rather whose neighbor can I be.

For the priest and the Levite who had passed by the wayside of the wounded person, he was an obstacle and a problem they did not want to get involved in. For them perhaps serving God in the temple was the most important and urgent thing. However, for the Samaritan, it was an opportunity to serve God. He showed extraordinary generosity and thoughtfulness in taking care of the wounded man. Through the parable, Lord explains that everyone in need becomes our social and Christian responsibility. Secondly, it is not just a help but a complete and comprehensive help within our capacity should be made available to the needy. There is no season or a tailor-made situation for help. One should be like the Samaritan dynamic, willingly and generous with his life and resources to reach out to the people. St. Vincent DePaul beautifully sums up the mind of Jesus with these words, “while we adore God on the altar and someone ring the bell. We must get up and begin to serve God at the doorstep.”


 -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!

इतवार, 03 अक्टूबर, 2021

 

इतवार, 03 अक्टूबर, 2021

वर्ष का सताईसवाँ सामान्य इतवार

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पहला पाठ : उत्पत्ति ग्रन्थ 2:18-24


18) प्रभु ने कहा, ''अकेला रहना मनुष्य के लिए अच्छा नहीं। इसलिए मैं उसके लिए एक उपयुक्त सहयोगी बनाऊँगा।''

19) तब प्रभु ने मिट्ठी से पृथ्वी पर के सभी पशुओं और आकाश के सभी पक्षियों को गढ़ा और यह देखने के लिए कि मनुष्य उन्हें क्या नाम देगा, वह उन्हें मनुष्य के पास ले चला; क्योंकि मनुष्य ने प्रत्येक को जो नाम दिया होगा, वही उसका नाम रहेगा।

20) मनुष्य ने सभी घरेलू पशुओं, आकाश के पक्षियों और सभी जंगली जीव-जन्तुओं का नाम रखा। किन्तु उसे अपने लिए उपयुक्त सहयोगी नहीं मिला।

21) तब प्रभु-ईश्वर ने मनुष्य को गहरी नींद में सुला दिया और जब वह सो गया, तो प्रभु ने उसकी एक पसली निकाल ली और उसकी जगह को मांस से भर दिया।

22) इसके बाद प्रभु ने मनुष्य से निकाली हुई पसली से एक स्त्री को गढ़ा और उसे मनुष्य के पास ले गया।

23) इस पर मनुष्य बोल उठा, ''यह तो मेरी हड्डियों की हड्डी है और मेरे मांस का मांस। इसका नाम 'नारी' होगा, क्योंकि यह तो नर से निकाली गयी है।

24) इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोड़ेगा और अपनी पत्नी के साथ रहेगा और वे दोनों एक शरीर हो जायेंगे।



दूसरा पाठ: इब्रानियों के नाम पत्र 2:9-11



9) परन्तु हम यह देखते हैं कि मृत्यु की यन्त्रणा सहने के कारण ईसा को महिमा और सम्मान का मुकुट पहनाया गया है। वह स्वर्गदूतों से कुछ ही छोटे बनाये गये थे, जिससे वह ईश्वर की कृपा से प्रत्येक मनुष्य के लिए मर जायें।

10) ईश्वर, जिसके कारण और जिसके द्वारा सब कुछ होता है, बहुत-से पुत्रों को महिमा तक ले जाना चाहता था। इसलिए यह उचित था कि वह उन सबों की मुक्ति के प्रवर्तक हो, अर्थात् ईसा को दुःखभोग द्वारा पूर्णता तक पहुँचा दे।

11) जो पवित्र करता है और जो पवित्र किये जाते हैं, उन सबों का पिता एक ही है; इसलिए ईसा को उन्हें अपने भाई मानने में लज्जा नहीं होती और वह कहते हैं -



सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 10:2-16



2 फ़रीसी ईसा के पास आये और उनकी परीक्षा लेते हुए उन्होंने प्रश्न किया, “क्या अपनी पत्नी का परित्याग करना पुरुष के लिए उचित है?“

3) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया? ’’मूसा ने तुम्हें क्या आदेश दिया?’’

4) उन्होंने कहा, “मूसा ने तो त्यागपत्र लिख कर पत्नी का परित्याग करने की अनुमति दी’’।

5) ईसा ने उन से कहा, ’’उन्होंने तुम्हारे हृदय की कठोरता के कारण ही यह आदेश लिखा।

6) किन्तु सृष्टि के प्रारम्भ ही से ईश्वर ने उन्हें नर-नारी बनाया;

7) इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोड़ेगा और दोनों एक शरीर हो जायेंगे।

8) इस तरह अब वे दो नहीं, बल्कि एक शरीर हैं।

9) इसलिए जिसे ईश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग नहीं करे।’’

10) शिष्यों ने, घर पहुँच कर, इस सम्बन्ध में ईसा से फिर प्रश्न किया

11) और उन्होंने यह उत्तर दिया, ’’जो अपनी पत्नी का परित्याग करता और किसी दूसरी स्त्री से विवाह करता है, वह पहली के विरुद्ध व्यभिचार करता है

12) और यदि पत्नी अपने पति का त्याग करती और किसी दूसरे पुरुष से विवाह करती है, तो वह व्यभिचार करती है’’।

13) लोग ईसा के पास बच्चों को लाते थे, जिससे वे उन पर हाथ रख दें; परन्तु शिष्य लोगों को डाँटते थे।

14) ईसा यह देख कर बहुत अप्रसन्न हुए और उन्होंने कहा, ’’बच्चों को मेरे पास आने दो। उन्हें मत रोको, क्योंकि ईश्वर का राज्य उन-जैसे लोगों का है।

15) मैं तुम से यह कहता हूँ- जो छोटे बालक की तरह ईश्वर का राज्य ग्रहण नहीं करता, वह उस में प्रवेश नहीं करेगा।’’

16) तब ईसा ने बच्चों को छाती से लगा लिया और उन पर हाथ रख कर आशीर्वाद दिया।


📚 मनन-चिंतन



ईश्वर ने समस्त सृष्टि की रचना की तथा वह उसे अच्छी लगी। किन्तु मनुष्य को देखकर उसने कहा, ’’अकेला रहना मनुष्य के लिए अच्छा नहीं। इसलिए मैं उसके लिए एक उपयुक्त सहयोगी बनाऊँगा।’’ (उत्पत्ति 2:18) इसलिए ईश्वर ने स्त्री की रचना की। इस प्रकार नर और नारी एक साथ जीवन बिताने लगे। ये नर और नारी आदम और हेवा थे। ईश्वर ने आदम को हेवा ’मनोरंजन’ के लिए प्रदान नहीं किया बल्कि एक उपयुक्त साथी के रूप में प्रदान किया था।

इस रिश्ते की अनिवार्यता एवं महत्वता पर संत पौलुस कहते हैं, ’’पुरुष अपने माता-पिता को छोड़ेगा और अपनी पत्नी के साथ रहेगा और वे दोनों एक शरीर हो जायेंगे। यह एक महान रहस्य है।" (ऐफिसियों 5:31-32) फ़िर वे आगे कहते है, ’’फिर भी प्रभु के विधान के अनुसार स्त्री के बिना पुरुष कुछ नहीं है और पुरुष के बिना स्त्री कुछ नहीं। यदि पुरुष से स्त्री की सृष्टि हुई, तो पुरुष का जन्म स्त्री से होता है और सब कुछ का मूलस्त्रोत ईश्वर है।’’ (1 कुरिन्थियों 7:11-12) प्रभु येसु ने सभी आशंकाओं और अनियमिताओं पर पूर्ण विराम लगाते हुये इस रिश्ते पर ईश्वरीय इच्छा को पुनः इंगित कर कहा, ’’किन्तु सृष्टि के प्रारम्भ से ही ईश्वर ने उन्हें नर-नारी बनाया; इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोडेगा और दोनों एक शरीर हो जायेंगे। इस तरह अब वे दो नहीं, बल्कि एक शरीर है। इसलिए जिसे ईश्वर ने जोडा है, उसे मनुष्य अलग नहीं करे।’’ (मारकुस 10:6-9)

इस प्रकार यह निर्विवादित सत्य है कि पति-पत्नी का रिश्ता ईश्वर द्वारा ठहराया संबंध है। इस संबंध की बुनियाद पर दोनों का जीवन, परिवार तथा समस्त मानवजाति का भविष्य टिका रहता है। प्रवक्ता ग्रन्थ कहता है, ’’मैं तीन बातें पसन्द करता हूँ, वे प्रभु और मनुष्यों को प्रिय हैं भाइयों का मित्रभाव, पड़ोसी का प्रेम और पति-पत्नी का सामंजस्य।’’ (प्रवक्ता 25:1-2) पति-पत्नी को एक-दूसरे को ईश्वर द्वारा प्रदत्त उपहार मानकर अपने गृहस्थ जीवन को जीना चाहिए। यदि वे एक-दूसरे को उपहार मानेगें तो एक-दूसरे का ख्याल भी रखेंगे। इस दृष्टिकोण से वे आपस में प्रेम का तालमेल स्थापित करेंगे जो ईश्वर को प्रिय है। इसके विपरीत यदि वे अपने वैवाहिक साथी को समझौता मानकर इसे झंझट समझेंगे तो वे अपने दाम्पत्य जीवन के बोझ में दब जायेंगे।

दाम्पत्य जीवन में एकता एवं सामंजस्य का रहस्य प्रेम है। संत पौलुस इस प्रेम की व्याखा करते हुये कहते है, ’’प्रेम सहनशील और दयालु है। प्रेम न तो ईर्ष्या करता है, न डींग मारता, न घमण्ड, करता है। प्रेम अशोभनीय व्यवहार नहीं करता। वह अपना स्वार्थ नहीं खोजता। प्रेम न तो झुंझलाता है और न बुराई का लेखा रखता है। वह दूसरों के पाप से नहीं, बल्कि उनके सदाचरण से प्रसन्न होता है। वह सब-कुछ ढाँक देता है, सब-कुछ पर विश्वास करता है, सब-कुछ की आशा करता है और सब-कुछ सह लेता है।...प्रेम का कभी अन्त नहीं होगा... प्रेम ही सब से महान् हैं।’’ (1 कुरि. 13:4-8,13)

इस प्रकार पति-पत्नी को प्रेम के इन गुणों- सहनशीलता, दया, विनम्रता, सद्व्यवहार, विश्वास, आशा आदि को एक-दूसरे के प्रति अपने व्यवहार में ढालना चाहिए। यदि वे एक-दूसरे के बदलने का इंतजार किये बिना स्वयं को की बदलने लगे तो भी उनका साथी उनके भले व्यवहार के कारण बदल जायेगा। ’’क्या जाने, हो सकता है कि पत्नी अपने पति की मुक्ति का कारण बन जाये और पति अपनी पत्नी की मुक्ति का कारण।’’ (1 कुरि. 7:16) इस बात को संत पेत्रुस भी अपने पहले पत्र में लिखते है, ’’पत्नियो! आप अपने पतियों के अधीन रहें। यदि उन में कुछ व्यक्ति अब तक सुसमाचार स्वीकार नहीं करते, तो वे आपका श्रद्धापूर्व तथा पवित्र जीवन देख कर शब्दों के कारण नहीं, बल्कि अपनी पत्नियों के आचरण के कारण विश्वास की ओर आकर्षित हो जायेंगे। (1पेत्रुस 3:1-2)

साधारणः पति-पत्नी अपने जीवन में इस पहलू पर ध्यान नहीं देते हैं कि उनका व्यवहार एक दूसरे को प्रभावित करता है। यदि पत्नी अपने पति के व्यक्तित्व की कमियों के बावजूद भी उसके प्रति सकारात्मकता प्रदर्शित करते हुए उससे अच्छा व्यवहार करे तो अवश्य वह अपने अच्छे व्यवहार से पति का हृदय जीत लेगी। इसके विपरीत जैसा साधारणः देखा जाता है कि दोनों ही एक दूसरे से एक निश्चित व्यवहार की मांग करते हुए रस्साकशी का जीवन जीने के लिए मजबूर हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में वे अपने दाम्पत्य जीवन में ईश्वर के उस महान रहस्य को नहीं पहचान पायेंगे जैसा की धर्मग्रंथ हमें बताता है।

पति एंव पत्नी दोनों को विवाह संस्कार को ईश्वर का ठहराया विधान मानकर एक-दूसरे के अभावों का प्रेम एवं एकता के साथ पूरा करना चाहिये तथा अपनी परेशानियों को विवाह के संस्कार के दायरे में ही देखना चाहिये तथा एक दूसरे से छूटकारा पाने का प्रयत्न नहीं करना चाहिये।



📚 REFLECTION



God created the whole universe and he liked it. But seeing the man, he said, "It is not good for a man to be alone. Therefore, I will make a suitable companion for him." (Genesis 2:18) So God created the woman. Thus, male and female started living together. These men and women were Adam and Eve. God did not provide Eve to Adam for 'entertainment' but as a suitable companion.

On the inevitability and importance of this relationship, Saint Paul says, "The man will leave his parents and live with his wife and they will become one body." This is a great mystery." (Ephesians 5:31-32) Then he goes on to say, "Yet according to the law of the Lord, a man is nothing without a woman, and a woman is nothing without a man. When created, a man is born of a woman, and God is the source of everything." (1 Corinthians 7:11-12)

The Lord Jesus, putting a complete stop to all the apprehensions and irregularities, again pointed out the divine will on this relationship and said, "But from the very beginning of creation God made them male and female; Because of this man will leave his parents and both will become one body. So now they are not two, but one body. Therefore, what God has joined, that man shall not separate.” (Mark 10:6-9)

Thus, it is an indisputable truth that the husband-wife relationship is a God-ordained relationship. On the basis of this relationship rests the life of both, the family and the future of all mankind. The book of Sirach says, "Three things I like are dear to the Lord and men; Friendship of brothers, love of neighbour, and harmony of husband and wife." (Sirach 25:1-2) Husband and wife ought to consider each other as a gift given by God, should live their married life.

If they treat each other as a gift, then they will also take care of each other. From this point of view they will establish the harmony of love which is dear to God. On the contrary, if they consider their matrimonial partner as a compromise and consider it a hassle, then they will be buried in the burden of their married life.

The secret of unity and harmony in married life is love. Saint Paul explains this love by saying, "Love is tolerant and kind. Love is neither jealous, nor bragging, nor proud. Love does not behave indecently. He does not seek his own interest. Love neither annoys nor keeps an account of evil. He is pleased not by the sins of others, but by their good conduct. It envelops everything, believes in everything, hopes for everything and bears everything. ... Love will never end... Love is the greatest of all. '' (1 Cor. 13:4-8,13)

Thus, husband and wife should inculcate these qualities of love – tolerance, kindness, humility, good behaviour, trust, hope, etc. in their behaviour towards each other. Even if they change themselves without waiting for each other to change, their partner will change because of their good behaviour. "Who knows, maybe the wife may become the cause of her husband's salvation and the husband the cause of his wife's salvation." (1 Cor. 7:16) Saint Peter also writes this in his first letter, "Wives! Be subject to your husbands. If some of them do not yet accept the gospel, they will be attracted to the faith not because of the words, but because of the conduct of their wives, seeing your reverent and holy life. (1 Peter 3:1-2)

It is simple that the husband and wife do not pay attention to this aspect in their life that their behaviour affects each other. If the wife behaves well in spite of the shortcomings of her husband's personality by showing positivity towards him, then she will surely win the heart of the husband by her good behaviour. On the contrary, it is seen that both are forced to lead a life of tug of war demanding a certain behaviour from each other.

In such a situation, they will not be able to recognize the great mystery of God in their married life as the scriptures tell us. Both husband and wife should fulfil each other's shortcomings with love and unity, considering the marriage ceremony as the ordained law of God and should see their problems within the scope of marriage ceremony and should not try to get rid of each other.


मनन-चिंतन - 2


हमारा प्रभु ईश्वर एक है, और ईश्वर में तीन जन हैं: पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा। यह हमें ईश्वर और उसमें समाहित पवित्र रिश्ते की विशेषता बतलाता हैं। पवित्र त्रित्व का रिश्ता एक पवित्र, गूढ, अटूट और एकता का रिश्ता है। आज के सुसमाचार में भी हम एक ऐसे रिश्ते से रूबरू होते है जो कि एक पवित्र रिश्ता है और इस रिश्ते से परिवार का निर्माण होता है। यह रिश्ता पति और पत्नी के बीच का रिश्ता है जो विवाह के द्वारा एक दूसरे से जुडते है। यह कलीसिया का एक पवित्र संस्कार है।

प्रभु ईश्वर ने सृष्टि-कार्य से अपना रिश्ता सृष्टि से बनाये रखा हैं: सृष्टिकर्ता-सृष्टि का रिश्ता, विशेष रूप से ईश्वर और मनुष्य का रिश्ता। उन्होनें हमें अपना स्वरूप बनाकर एक रिश्ते को एक नयी दिशा देकर एक अमिट रिश्ते को कायम किया हैं। परन्तु मनुष्य ने पाप में गिरकर अपने आप को इस रिश्ते से दूर कर दिया। फिर भी प्रभु ईश्वर ने कभी भी मनुष्य का साथ नहीं छोड़ा और हमेशा किसी न किसी प्रकार से इस रिश्ते को बनाये रखने की कोशिश की। ‘‘मैं तुम्हे अपनी प्रजा मानूँगा और तुम्हारा ईश्वर होऊॅंगा।’’(निर्ग0 6:7; यिर 30:22; 31:1,33; 7:23; उत्पत्ति 17:8, निर्ग0 29:45, एजे0 20:20)

आज के सुसमाचार में हम पति-पत्नि के रिश्ते के बीच में उलझन सम्बद्धित प्रश्न के बारे में सुनते है, जो कि फरीसियों द्वारा ईसा से पूछा गया। यह प्रश्न पति-पत्नी के रिश्ते को सुलझाने हेतु नहीं परंतु प्रभु ईसा की परीक्षा और उन्हे किसी प्रकार से फॅंसाने हेतु पूछा गया। ईसा के साथ यह कोई नयी बात नहीं थी क्योकि अक्सर फरीसी और शास्त्री उन्हें किसी न किसी प्रकार से फॅसाने की कोशिश किया करते थे। इस बार वे पति द्वारा पत्नी को त्यागने के विषय को लेकर ईसा के पास आये थे। जो कि मूसा द्वारा दिया गया था, ‘‘यदि कोई व्यक्ति किसी स्त्री से विवाह करे, बाद में वह उसे इसलिए नापसन्द करे कि वह उस में कोई लज्जाजनक बात पाता हो और उसे त्याग पत्र दे’’ (विधि विवरण 24:1)। प्रभु इसका जवाब देते हुए कहते है ‘‘उन्होनें तुम्हारे हृदय की कठोरता के कारण ही यह आदेश लिखा’’ अर्थात् यह जो नियम या आदेश था ईश्वर द्वारा नहीं अपितु मनुष्य द्वारा प्रेरित था। इस पर प्रभु येसु ईश्वर के नियम या ईश्वर के विचार को प्रकट करते हैं। प्रभु कहते है, ‘‘किन्तु सृष्टि के प्रारम्भ ही से ईश्वर ने उन्हें नर-नारी बनाया; इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोडे़गा और दोनो एक शरीर हो जायेंगे। इस तरह अब वे दो नहीं, बल्कि एक शरीर हैं। इसलिए जिसे ईश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग नहीं करे।’’ ईसा का यह कथन हमें निम्न बातें बताता है।

पहलाः पति-पत्नि का रिश्ता अभी का बनाया हुआ नहीं परन्तु बहुत पहले से बनाया हुआ है, ‘‘सृष्टि के प्रारंभ से ही’’पति-पत्नि के जन्म से भी बहुत पहले। क्योकि ईश्वर जब हमें गढ़ता है, बनाता है तो वह हमारे जन्म से पूर्व ही हमें जानता है और हमारे लिए र्निधारित योजनाए बनाता हमारी हित की योजनाएं, हमारे मंगलमय जीवन की योजनाएं, आशामय भविष्य की महत्वपूर्ण योजनाएं जिनमें से विवाह का रिश्ता भी एक है।

दूसराः एकता का रिश्ता- विवाह के बाद वे दो नहीं अपितु एक हो जाते है जिस प्रकार पवित्र त्रित्व एक है। इसलिए संत पौलुस एफेसियों के नाम अपने पत्र में पतियों से कहते है, ‘‘पति अपनी पत्नी को इस तरह प्यार करे, मानो वह उसका शरीर हो। कोई अपने शरीर से बैर नहीं करता। उल्टे, वह उसका पालन-पोषण करता और उसकी देख-भाल करता रहता है।’’(एफे0 5:28-29) प्रभु ईश्वर ने नारी को नर के अंग से ही बनाया, ‘‘तब प्रभु-ईश्वर ने मनुष्य को गहरी नींद में सुला दिया और जब वह सो गया, तो प्रभु ने उसकी पसली निकाल ली और उसकी जगह को मांस से भर दिया। इसके बाद प्रभु ने मनुष्य से निकाली हुई पसली से एक स्त्री को गढ़ा और उसे मनुष्य के पास ले गया’’ (उत्पत्ति 2:21,22)

तीसराः ईश्वर की इच्छा- ईश्वर और मनुष्य के विचार में बहुत फर्क है ‘‘प्रभु यह कहता है-तुम लोगों के विचार मेरे विचार नहीं हैं और मेरे मार्ग तुम लोगों के मार्ग नहीं हैं। जिस तरह आकाश पृथ्वी से ऊॅंचा है, उसी तरह मेरे मार्ग तुम्हारे मार्गों से और मेरे विचार तुम्हारे विचारों से ऊॅंचे हैं।’’ यह रिश्ता किसी मनुष्य द्वारा नहीं परंतु ईश्वर द्वारा बनाया हुआ है, ‘‘जिसे ईश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग नहीं करे।’’ जिस रिश्ते को ईश्वर ने जोड़ा है, र्निधारित किया है उसे मनुष्य केवल अपने स्वार्थ के लिए या अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए या किसी भी स्वार्थी मतलब से अलग नहीं करे।

संत मत्ती का सुसमाचार इस विषय को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करता है। ’’मैं तुम लोगों से कहता हूँ कि व्यभिचार के सिवा किसी अन्य कारण से जो अपनी पत्नी का परित्याग करता और किसी दूसरी स्त्री से विवाह करता है, वह भी व्यभिचार करता है।’’ (मत्ती 19:9) आज कल का ज़माना बहुत ही अलग है आजकल परित्याग या डिवोर्स आम बात होती जा रही हैं। हर छोटी से छोटी बात पर परिवार टूटते जा रहें है, पति-पत्नी में झगड़े, विवाद बढ़कर डिवोर्स का रूप ले रही है। आज कल डिवोर्स के कई कारण हो सकते हैः बीमारी, गरीबी, दहेज, शराब, ससुराल की कड़वाहट आदि परन्तु संत मत्ती का वचन स्पष्ट रूप से बताता है कि व्यभिचार के सिवा किसी अन्य कारण से जो अपनी पत्नी का परित्याग करता और किसी दूसरी स्त्री से विवाह करता है, वह भी व्यभिचार करता है। पति और पत्नी के बीच झगड़ा, टकरार, परेशानी, मुसीबत, सुख-दुःख तो आम बात है परंतु इनको लेकर परित्याग करना अर्थात् ईश्वर के समक्ष की गई प्रतीज्ञा का निरादर हैं। विवाह के समय पति-पत्नी ईश्वर के समक्ष यह वादा करते हैं कि -चाहे सुख हो या दुःख हर परिस्थ्तिति में मैं आपका या आपकी पति या पत्नी बना रहूँगा/रहूँगी। विवाह का रिश्ता एक पवित्रता भरा रिश्ता है जो तोड़ने के लिए नही परंतु निभाने के लिए बना हुआ है। जिस प्रकार मसीह और कलीसिया का रिश्ता है उसी प्रकार पतिपती और पत्नी का भी रिश्ता होना चाहिए। एक दूसरे के प्रति प्रेम और सर्मपण (एफे0 5:21-33)। यह रिश्ता दुख, या समस्या देखकर भागने का नहीं परन्तु अपने जीवन, प्रार्थना एवं श्रद्धापूर्वक जीवन द्वारा विपरीत परिस्थिती को अनुकुल स्थ्तिी बनाने की है। संत जोसफ, संत मोनिका, संत रीता, संत थोमस मोर, बालक येसु की संत तेरेसा के माता-पिता, संत लूईस और ज़ेली मार्टिन इसके ज्वलंत उदाहरण है। और यह सब उनके त्यागपूर्ण, पवित्रता एवं संघर्षपूर्ण जीवन की कहानी है। ‘‘पत्नियों! आप अपने पतियों के अधीन रहें। यदि उन में कुछ व्यक्ति अब तक सुसमाचार स्वीकार नहीं करते, तो वे आपका श्रद्धापूर्ण तथा पवित्र जीवन देख कर शब्दों के कारण नहीं, बल्कि अपनी पत्नियों के आचरण के कारण विश्वास की ओर आकर्षित हो जायेंगे।’’(1 पेत्रुस 3:1-2)।

आज का सुसमाचार हमें अलग होने का नही अपितु एक रहकर ईश्वरीय रिश्ते को अनुभव करने का निमंत्रण है।


Br. Biniush Topno


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शनिवार, 02 अक्टूबर, 2021

 

शनिवार, 02 अक्टूबर, 2021

वर्ष का छ्ब्बीसवाँ सामान्य सप्ताह

रक्षक स्वर्गदूत -अनिवार्य स्मृति


🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

पहला पाठ : निर्गमन ग्रन्थ 23:20-23



20) मैं एक दूत को तुम्हारे आगे-आगे भेजता हूँ। वह रास्तें में तुम्हारी रक्षा करेगा और तुम्हें उस स्थान ले जायेगा, जिसे मैंने निश्चित किया है।

21) उसका सम्मान करो और उसकी बातें सुनो। उसके विरुद्ध विद्रोह मत करो। वह तुम्हारा अपराध नहीं क्षमा करेगा, क्योंकि उसे मेरी ओर से अधिकार मिला है।

22) यदि तुम उसकी बातें मानोगे, तो मैं तुम्हारे शत्रुओं का शत्रु और तुम्हारे विरोधियों का विरोधी बनूँगा।

23) मेरा दूत तुम्हारे आगे-आगे चलेगा और तुम्हें अमोरियों, हित्तियों, परिज्जियों, कनानियों, हिव्वियों, तथा यबूसियों के देश पहुँचा देगा और मैं उनका सर्वनाश करूँगा।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 18:1-5; 1


1) उस समय शिष्य ईसा के पास आ कर बोले, ’’स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा कौन है?’’

2) ईसा ने एक बालक को बुलाया और उसे उनके बीच खड़ा कर

3) कहा, ’’मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- यदि तुम फिर छोटे बालकों-जैसे नहीं बन जाओगे, तो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करोगे।

4) इसलिए जो अपने को इस बालक-जैसा छोटा समझता है, वह स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा है।

5) और जो मेरे नाम पर ऐसे बालक का स्वागत करता है, वह मेरा स्वागत करता है।

10) ’’सावधान रहो, उन नन्हों में एक को भी तुच्छ न समझो। मैं तुम से कहता हूँ- उनके दूत स्वर्ग में निरन्तर मेरे स्वर्गिक पिता के दर्शन करते हैं।


📚 मनन-चिंतन



ईश्वर हमें कभी अकेला नहीं छोड़ते। उन्होंने कभी भी सीधे रास्ते और आसान जीत का वादा नहीं किया, लेकिन उनकी उपस्थिति और ताकत का आश्वासन हमें हमारे संघर्षों और जीवन की दुर्बलताओं के साथ लड़ाई में आगे बढ़ने के लिए निरंतर प्रोत्साहन और प्रेरणा प्रदान करते है।

ईश्वर ने प्रतिज्ञा की थी कि वह मार्ग में हमारी रक्षा करने के लिये हमारे आगे आगे चलेगा और हमें उस स्थान पर लाएगा जिसे ईश्वर ने तैयार किया है। यह जानना बहुत उत्साहजनक है कि ईश्वर हमारे आगे आगे जाते है; कि वे जानते है कि जीवन की यात्रा में आगे क्या है और वे हमें सुरक्षित घर पहुंचाएगे। ईश्वर ने अपने दूत को रास्ते में हमारी रक्षा करने के लिए भेजने का वादा किया। लेकिन हमें उसकी आवाज सुननी चाहिए। यह बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि हम में से बहुत से लोग अपने जीवन में ईश्वर के वादों को देखने के लिए तरसते हैं लेकिन प्रभु की वाणी को सुनने से चूक जाते हैं।

ईश्वर ने यह भी वादा किया कि वे हमारे शत्रुओं का शत्रु और हमारे विरोधियों का विरोधी होगा। हमारा दुश्मन शैतान और उसके जाल हैं। जब हम अपने दूत के निर्देशों को सुनते हैं, तो हम उन प्रलोभनों और परेशानियों से निपटने के लिए शक्तिशाली हो जाते हैं जो शैतान हमारे रास्ते में डालता है। ईश्वर हमारे जीवन के हर चरण में हम पर नजर रख रहे हैं। वे हमारी कमजोरियों और उन क्षेत्रों को जानते है जहां हमें उनकी सबसे ज्यादा जरूरत होगी। इसलिए, हम सतर्क रहें और अपने रक्षक देवदूत से लगातार प्रार्थना करें कि वह हमारे मार्ग को रोशन करे, हमें सशक्त करे और हमारे सामने जाए। हम उसे ईश्वचन में सुनते हैं और अपने जीवन की दैनिक घटनाओं में उसका अनुभव करते हैं।



📚 REFLECTION



God never leaves us alone. He never promised a straight path and an easy victory but the assurance of his presence and strength supply us the constant encouragement and inspiration to move on in our struggles and battle with the infirmities of life.

God promised that he would go before us to guard us along the way and to bring us to the place which God prepared. It is very encouraging to know that God goes before us; that he knows what is ahead in the journey of life and that he will bring us safely home. God promised to send His angel to guard us along the way. But we must listen to His voice. This is very important because many of us long to see the promises of God in our lives but miss the part about listening to the voice of the Lord.

God also promised that he would be an enemy to our enemies and an adversary to our adversaries. Our enemy is Satan and his entrapments. When we listen to the instructions of our angel, we become powerful to deal with the temptations and troubles that the devil puts in our path. God is watching over us at every stage of our life. he knows our weaknesses and areas where we would need him most. Therefore, let us remain alert and pray constantly to our guardian angel to enlighten our path, empower us and go before us. We listen to him in the scripture and experience him in the daily events of our life.



मनन-चिंतन - 2


निर्गमन 23:20-21 में प्रभु का वचन कहता है, “मैं एक दूत को तुम्हारे आगे-आगे भेजता हूँ। वह रास्तें में तुम्हारी रक्षा करेगा और तुम्हें उस स्थान ले जायेगा, जिसे मैंने निश्चित किया है। उसका सम्मान करो और उसकी बातें सुनो।” 2 अक्टूबर 2014 को संत पापा फ्रांसिस ने सुबह के मनन-चिंतन में कहा, “हम सभी के पास एक स्वर्गदूत होता है जो हमेशा हमारे साथ रहता है, जो हमें कभी नहीं छोड़ता है और हमें अपना रास्ता नहीं खोने में मदद करता है। … जीवन एक यात्रा है, हमारा जीवन एक यात्रा है जो हमें उस स्थान तक ले जाती है जिसे प्रभु ने तैयार किया है। ... कोई भी अकेला नहीं चलता: कोई भी नहीं!" काथलिक परम्परा के अनुसार हरेक व्यक्ति की देखरख के लिए प्रभु ने एक स्वर्गदूत को नियुक्त किया है। हरेक विश्वासी के बगल में एक चरवाहे या रक्षक के रूप में वह संरक्षक दूत रहता है। हमारे संरक्षक दूत हमें संरक्षण प्रदान करते हैं, हमारे लिए और हमारी ओर से प्रार्थना करते हैं तथा हमें राह दिखाते हैं। हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक वे हमारी देखभाल करते तथा हमारे लिए ईश्वर के समक्ष मध्यस्थता करते हैं। इस धरती पर ही हमें वे हमारे साथ रह कर स्वर्ग की अनुभूति प्रदान करते हैं। (देखें काथलिक कलीसिया की धर्मशिक्षा 336) प्रभु येसु कहते हैं, “सावधान रहो, उन नन्हों में एक को भी तुच्छ न समझो। मैं तुम से कहता हूँ - उनके दूत स्वर्ग में निरन्तर मेरे स्वर्गिक पिता के दर्शन करते हैं।“ (मत्ति 18:10) हमारे संरक्षक दूत हमेशा हमारे साथ रहते हैं, लेकिन वे उसी समय निरन्तर प्रभु ईश्वर के दर्शन करते हैं।




In Ex 23:20-21 we read, “Behold, I send an angel before you, to guard you on the way and to bring you to the place which I have prepared. Give heed to him and hearken to his voice”. On October 2, 2014 in his morning meditation Pope Francis said, “We all have an angel who is always beside us, who never abandons us and helps us not to lose our way. … life is a journey, our life is a journey that leads us to the place that the Lord has prepared. But, no one walks alone: no one!... “ According to Catholic Tradition God has assigned an angel to protect and guide every human being. He protects us, guides us, shows us the way to the goal that the Lord has set for us. The guardian angel also prays constantly for and on behalf of us. The Catechism of the Catholic Church (No.336) teaches us, “Beside each believer stands an angel as protector and shepherd leading him to life. Already here on earth the Christian life shares by faith in the blessed company of angels and men united in God”. Jesus says, “See that you do not despise one of these little ones; for I tell you that in heaven their angels always behold the face of my Father who is in heaven” (Mt 18:10). Our guardian angel stays with us; yet at the same time he has the vision of God.


 -Br. Biniush Topno


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Praise the Lord!