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शुक्रवार, 24 सितम्बर, 2021 वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य सप्ताह

शुक्रवार, 24 सितम्बर, 2021

वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : हग्गय का ग्रन्थ 2 :1-9


1) राज दारा के शासनकाल के द्वितीय वर्ष, सातवें महीने के इक्कीसवें दिन नबी हग्गय को प्रभु की यह वाणी सुनाई पड़ीः

2) "शअलतीएल के पुत्र, यूदा के राज्यपाल ज़रुबबाबेल से, योसादाक के पुत्र प्रधानयाजक योशुआ और राष्ट्र के शेष लोगों से यह कहो-

3) क्या तुम लोगों में कोई ऐसा व्यक्ति जीवित है, जिसने इस मन्दिर की पूर्व महिमा देखी है? और अब तुम क्या देख रहे हो? क्या तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि कुछ भी नहीं बचा है?

4) फिर भी, ज़रुबबाबेल! धीरज रखो! यह प्रभु की वाणी है। योसादाक के पुत्र, प्रधानयाजक योशुआ! धीरज रखो! समस्त देश के निवासियों! धीरज रखो! यह प्रभु की वाणी है।

5) निर्माण-कार्य प्रारंभ करो। मैं तुम लोगों के साथ हूँ। यह विश्वमण्डल के प्रभु की वाणी है। जब तुम मिस्र से निकल रहे थे, उस समय मैंने तुम से जो प्रतिज्ञा की है, मैं उसे पूरा करूँगा। मेरा आत्मा तुम्हारे बीच निवास करेगा। मत डरो!

6) क्योंकि विश्वमण्डल का प्रभु यह कहता है, "मैं थोड़े समय बाद आकाश और पृथ्वी को, जल और थल को हिलाऊँगा,

7) मैं सभी राष्ट्रों को हिला दूँग। तब सब राष्ट्रों की सम्पत्ति यहाँ आयेगी और मैं इस मन्दिर को वैभव से भर दूँगा - विश्वमण्डल का प्रभु यह कहता है।

8) चाँदी मेरी है और सोना मेरा है- यह विश्वमण्डल के प्रभु की वाणी है।

9) इस पिछले मन्दिर का वैभव पहले से बढ़ कर होगा- विश्वमण्डल का प्रभु यह कहता है। और मैं इस स्थान पर शान्ति प्रदान करूँगा- यह विश्वमण्डल के प्रभु की वाणी है।"


सुसमाचार : सन्त लूकस 9:18-22


18) ईसा किसी दिन एकान्त में प्रार्थना कर रहे थे और उनके शिष्य उनके साथ थे। ईसा ने उन से पूछा, "मैं कौन हूँ, इस विषय में लोग क्या कहते हैं?"

19) उन्होंने उत्तर दिया, "योहन बपतिस्ता; कुछ लोग कहतें-एलियस; और कुछ लोग कहते हैं-प्राचीन नबियों में से कोई पुनर्जीवित हो गया है"।

20) ईसा ने उन से कहा, "और तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ?" पेत्रुस ने उत्तर दिया, "ईश्वर के मसीह"।

21) उन्होंने अपने शिष्यों को कड़ी चेतावनी दी कि वे यह बात किसी को भी नहीं बतायें।

22) उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, "मानव पुत्र को बहुत दुःख उठाना होगा; नेताओं, महायाजकों और शास्त्रियों द्वारा ठुकराया जाना, मार डाला जाना और तीसरे दिन जी उठना होगा"।


मनन-चिंतन


‘‘और तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूॅं?’’ यह प्रश्न येसु ने पेत्रुस से पूछा और इस प्रश्न पर हमने कई बार मनन चिंतन किया होगा। यह प्रश्न हम सब के लिए व्यक्तिगत रूप से सवाल करता है कि आखिर येसु ‘मेरे’ लिए कौन है? इस प्रश्न का हम ख्रीस्तीयों का जवाब यहीं होगा कि येसु प्रभु है, जिसकों कभी हम दोस्त के रूप में, सहायक के रूप में या एक मुक्तिदाता के रूप में या किसी अन्य रूप में जानते है। मान लिजिए यदि हम किसी अन्य धर्म में पैदा होते और हम येसु के बारे में दूसरों से सुनते तब हमारा जवाब क्या यही होता कि येसु ही प्रभु है। आइये हम दूसरों के कहने से नहीं परंतु अपने अंर्ततम से विश्वास करें कि येसु ही प्रभु है।



📚 REFLECTION



“But who do you say that I am?” This is the question Peter was asked by Jesus and we too might have reflected on this many times. This question asks us personally that who is Jesus for ‘me’. The answer to this question for us Christians will be Jesus is the God whom we know as a friend, a helper, a Saviour or any other. Imagine if we would have born in some other religion and we would have heard about Jesus from others then whether our answer would have been same that Jesus is the Lord. Let’s believe not by the sayings of others but by our own conviction that Jesus is the Lord.



मनन-चिंतन - 2


प्रभु येसु यह जानना चाहते थे कि तीन साल उनके साथ रहने, उनकी शिक्षा सुनने तथा उनके कार्य देखने के बाद शिष्यों का उनके बारे में क्या विचार था। पेत्रुस ने सभी शिष्यों की ओर से कहा कि आप ईश्वर के मसीह हैं। उस समय के लोग यह सोच रहे थे कि योहन बपतिस्ता, एलियस या पुराने नबियों में कोई येसु के रूप में वापस आया है। उस सोच से हट कर जब शिष्यों ने उनको मसीह के रूप में देखा, तब प्रभु को पता था कि यह पिता ईश्वर ने ही उन पर प्रकट किया है। उस सच्चाई का एक और महत्वपूर्ण पहलू था जिसका ज्ञान शिष्यों के लिए जरूरी था। वह था दुख-भोग का पहलू। मसीह को दुख भोगना, मार डाला जाना तथा तीसरे दिन जी उठना होगा। वे शायद एक विजेता मसीह की ही कल्पना कर पा रहे थे। लेकिन दुख-भोग मसीह के जीवन का अभिन्न अंग था। हम येसु को क्रूस से अलग नहीं कर सकते हैं। हम क्रूसित प्रभु को ही मानते हैं और उन्हीं की हम घोषणा करते हैं।




Jesus wanted to know what the disciples had thought about him after having stayed with him, listened to him and seen his works. Peter, on behalf of the disciples, told him that he was the Christ. The people of that time thought John the Baptist, or Elijah or one of the prophets had come back to life in the person of Jesus. Differing from them when Peter proclaimed him as the Christ of God Jesus understood that the Father had revealed this to them. Yet he wanted them to grasp an important aspect of his messiahship – that of suffering. So he told them that the messiah is to suffer, to die and rise again on the third day. The disciples could think only of a triumphant messiah. But suffering was an indispensable aspect of the life of the messiah. We cannot separate Jesus from the Cross. We believe and proclaim the crucified Lord.


 -Br. Biniush Topno


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गुरुवार, 23 सितम्बर, 2021 वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य सप्ताह

 

गुरुवार, 23 सितम्बर, 2021

वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : हग्गय का ग्रन्थ 1 :1-8


1) राजा दारा के शासनकाल के दूसरे वर्ष के छठे महीने के प्रथम दिन नबी हग्गय के माध्यम से, शअलतीएल के पुत्र, यूदा के राज्यपाल ज़रूबबाबेल और योसादाक के पुत्र प्रधानयाजक योशुआ को प्रभु की यह वाणी प्राप्त हुईः

2) ’’यह विश्वमण्डल के प्रभु की वाणी है। यह राष्ट्र कहता है- अभी प्रभु के मन्दिर के पुनर्निर्माण का समय नहीं आया है।

3) किन्तु नबी हग्गय के माध्यम से प्रभु की यह वाणी सुनाई पड़ी-

4) जब यह मन्दिर टूटा-फुटा पडा है, तो क्या यह समय तुम लोगों के लिए अच्छी तरह आच्छादित घरों में रहने का है?

5) इसलिए विश्वमण्डल का प्रभु यह कहता है।

6) तुम अपनी स्थिति पर विचार करो। तुमने बहुत बोया, किन्तु कम लुनते हो; तुम खाते तो हो, किन्तु तुम्हें तृप्ति नहीं मिलती; तुम पीते हो, किन्तु तुम्हारी प्यास नहीं बुझती; तुम कपडे पहनते हो, किन्तु तुम्हारा शरीर गरम नहीं रहता; मज़दूर अपना वेतन तो पाता है, किन्तु उसे छेद वाली थैली में रखता है।

7) ’’विश्वमण्डल का प्रभु यह कहता हैं: तुम अपनी स्थिति पर विचार करो।

8) पहाड़ी प्रदेश जा कर लकडी ले आओ और मन्दिर फिर बनाओ। मैं उस से प्रसन्न होऊँगा और उस में अपनी महिमा प्रकट करूँगा।



सुसमाचार : सन्त लूकस 9:7-9



7) राजा हेरोद उन सब बातों की चर्चा सुन कर असमंजस में पड़ गया, क्योंकि कुछ लोग कहते थे कि योहन मृतकों में से जी उठा है।

8) कुछ कहते थे कि एलियस प्रकट हुआ है और कुछ लोग कहते थे कि पुराने नबियों में से कोई जी उठा है।

9) हरोद ने कहा, ’’योहन का तो मैंने सिर कटवा दिया। फिर यह कौन है, जिसके विषय में ऐसी बातें सुनता हूँ?’’ और वह ईसा को देखने के लिए उत्सुक था।



मनन-चिंतन



येसु के बारे में सुनकर अलग अलग लोगों की अलग अलग प्रतिक्रिया होती थी। जो लोग अपने जीवन में किसी बिमारी या परेशानियों से जूझ रहे थे उनके लिए येसु एक सांत्वना एवं आशा था। परंतु जिनके मन में गलत भावनाये थी उनके लिए येसु के प्रति ईर्षा और नफरत थी। आज के सुसमाचार में हम राजा हेरोद के बारे में सुनते है जो प्रभु येसु की चर्चा सुनकर असमंजस में पड़ जाता है और घबरा जाता है क्यांेकि उसके द्वारा एक सच्चे इंसान की मृत्यु हुई थी जो निडरता पूर्वक सत्य पर चलता था और सच का साथ देता था। उसको लगा येसु वही योहन है जो फिर से जी उठा है। येसु की चर्चा हेरोद के लिए भय की प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है। लोग चाहे कितना भी सत्य को मिटाना चाहे परंतु सत्य मिटता नहीं परंतु वह और भी प्रबल रूप में उभर कर सामने आता है।



📚 REFLECTION


People had various reactions listening about Jesus. For the people who were struggling from their sickness and problems for them Jesus was a comfort and a hope, but for the people who had wrong intensions in their minds for them there was jealousy and hatredness towards Jesus. In today’s gospel we hear about Herod who got perplexed and fear after hearing about Jesus because by him a true person was killed who used to walk bravely in the way of truth and was always standing for the truth. He felt that Jesus is that same John who now has been raised from the dead. To hear about Jesus brought the reaction of perplexity in Herod. People whatever they do to eradicate the truth but the truth never dies but it comes forward more strongly.



मनन-चिंतन - 2


चोर को हमेशा पुलिस का डर रहता है। जब कभी हम कुछ गलत कार्य करते हैं, हमारा यह विचार रहता है कि यह बात कोई न जान पाये। राजा हेरोद ने एक बडी गलती की थी। उसने अपने भाई फिलिप की पत्नि से विवाह किया था। संत योहन बपतिस्ता ने उस हरकत को गलत ठहराया। इस पर राजा ने उसे बन्दीगृह में डलवा दिया तथा उसका सिर कटवा दिया। लेकिन उसका पाप उसका पीछा करता रहा। उसे चैन की नींद नहीं आती थी। उसे मालूम था कि उसका कर्म बहुत बुरा था। उसका मन शान्ति से वंचित रह गया। जब वह येसु के सार्वजनिक कार्यों के बारे में सुनता है, उसे संदेह होता है कि कहीं संत योहन बपतिस्ता जिसका सिर उसने कटवा दिया था पुनर्जीवित तो नहीं हुआ! इस प्रकार वह असंमंजस में पड जाता है। पाप हमें बेचैन कर देता है और हमारे अन्दर अशान्ति पैदा करता है। क्योंकि पाप उस शैतान का कार्य है जो “केवल चुराने, मारने और नष्ट करने आता है” (योहन 10:10)। हम पाप तथा उसकी वासनाओं से छुटकारा पाने के लिए पश्चात्तपपूर्ण हृदय से प्रभु येसु के चरणों में जायें।




A thief is always afraid of the police. Whenever we do something wrong, our concern is that no one should discover it. King Herod had committed a grave sin. He married his brother Philip’s wife. St. John the Baptist pointed out this sin to him and pressed him to repent. The king was annoyed and he imprisoned him and got him beheaded. Although St. John was physically eliminated from the scene, the king’s sin kept haunting him. He was disturbed in his mind. He was deprived of peace. When he heard of Jesus, he began to doubt whether St. John the Baptist whom he beheaded came back to life again. He was confused. Our sins leave us confused and disturbed because they come from the devil who “comes to steal and to kill” (Jn 10:10).


 -Br. Biniush Topno


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बुधवार, 22 सितम्बर, 2021

बुधवार, 22 सितम्बर, 2021

वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ : एज़्रा का ग्रन्थ 9 :5-9


5) सन्ध्याकालीन यज्ञ के समय मैं अपने विषाद की अवस्था से जागा। मेरा कुरता और मेरी चादर फटी हुई थी। मैं घुटनों के बल गिर कर और अपने प्रभु-ईश्वर की ओर हाथ फैला कर

6) इस प्रकार प्रार्थना करने लगाः ’’मेरे ईश्वर! मैं इतना लज्जित हूँ कि तेरी ओर दृष्टि लगाने का साहस नहीं हो रहा है, क्योंकि हम अपने पापों में डूब गये हैं और हमारा दोष आकाश छूने लगा है।

7) अपने पूर्वजों के समय से आज तक हम भारी अपराध करते आ रहे हैं। अपने पापों के कारण हम, हमारे राजा और हमारे याजक विदेशी राजाओं के हाथ, तलवार, निर्वासन, लूट और अपमान के हवाले कर दिये गये, जैसी कि आज हमारी दुर्गति है।

8) अब हमारे प्रभु-ईश्वर ने हम पर थोड़े समय के लिए दया प्रदर्शित की। उसने कुछ लोगों को निर्वासन से वापस बुलाया और हमें अपने पवित्र स्थान में शरण दी है। उसने हमारी आँखों को फिर ज्योति प्रदान की और हमें हमारी दासता में विश्राम दिया है;

9) क्योंकि हम दास ही हैं, किन्तु हमारे ईश्वर ने हमें हमारी दासता में नहीं त्यागा और हमें फ़ारस के राजाओं का कृपापात्र बनाया है। उन्होंने हमें हमारे ईश्वर का मन्दिर फिर बनाने और उसका पुनरुद्धार करने की अनुमति दी और यूदा तथा येरुसालेम में सुरक्षित स्थान दिलाया हैं।


सुसमाचार : सन्त लूकस 9:1-6


1) ईसा ने बारहों को बुला कर उन्हें सब अपदूतों पर सामर्थ्य तथा अधिकार दिया और रोगों को दूर करने की शक्ति प्रदान की।

2) तब ईसा ने उन्हें ईश्वर के राज्य का सुसमाचार सुनाने और बीमारों को चंगा करने भेजा।

3) उन्होंने उन से कहा, ’’रास्ते के लिए कुछ भी न ले जाओ-न लाठी, न झोली, न रोटी, न रुपया। अपने लिए दो कुरते भी न रखो।

4) जिस घर में ठहरने जाओ, नगर से विदा होने तक वहीं रहो।

5) यदि लोग तुम्हारा स्वागत न करें, तो उनके नगर से निकलने पर उन्हें चेतावनी देने के लिए अपने पैरों की धूल झाड़ दो।’’

6) वे चले गये और सुसमाचार सुनाते तथा लोगों को चंगा करते हुए गाँव-गाँव घूमते रहे।


मनन-चिंतन


प्रभु येसु शिष्यों को सुसमाचार सुनाने और चंगा करने के लिए भेजते है। येसु शिष्यों को वही कार्य करने के लिए भेजते है जो कार्य वे स्वयं कर रहे थे। इस बात को जानना उनके अनुयायियों के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि बहुत लोग प्रभु के अनुयायी बनने के लिए आगे आतेेे है परंतु वे अपने इस जीवन में आगे बढ़कर शायद बड़े बड़े कार्य करने लगते सिवाये येसु के कार्यो को छोड़कर। जहॉं हम देखते है इस संसार के दूसरें सभी कार्यों को करने के लिये बहुत चीजों की जरूरत होती है, परंतु प्रभु के कार्यो को करने के लिए किसी चीज़ की जरूरत नहीं पड़ती; जिस प्रकार आज का वचन बताता है, ’’रास्ते के लिए कुछ भी न ले जाओ न लाठी, न झोली, न रोटी, न रुपया।’’ कहने का तात्पर्य है प्रभु के कार्य करने के लिए जिस चीज की भी जरूरत है उसको प्रदान करने वाला ईश्वर है, क्योंकि वह उसका कार्य है। हम प्रभु पर आश्रित होना सीखें।



📚 REFLECTION



Lord Jesus sends the disciples to proclaim the Kingdom of God and to heal. Lord Jesus sends the disciples to do the same work which he was doing. This thing should be know to the followers because many come forward to follow him but as they go ahead in life they do all the big big works accept the works of Jesus. As we see that many things are required to do the works of the world but to do the work of God no things are required, as the word of God says today, “Take nothing for your journey, no staff, nor bag, nor bread, nor money.” That means to say the things required to do the work of God will be provided by God himself because it is his work. Let’s learn to depend on God.



मनन-चिंतन - 2


ख्रीस्तीय विश्वासी देने के लिए बुलाये गये हैं, लेने के लिए नहीं। प्रभु येसु हमें सिखाते हैं कि हम अपने पास जो कुछ हैं उनमें से ज़रूरतमंदों को दें। वे धनी युवक से कहते हैं, “जाओ, अपना सब कुछ बेच कर ग़रीबों को दे दो” (मारकुस 10:21) प्रभु स्वयं अपना शरीर और रक्त भी दे देते हैं। शिष्यों के विषय में संत लूकस 9:6 कहता है, “वे चले गये और सुसमाचार सुनाते तथा लोगों को चंगा करते हुए गाँव-गाँव घूमते रहे”। वे प्रभु येसु के अनुदेश के अनुसार शुभ संदेश, चंगाई और शांति देते हुए जा रहे थे। प्रभु ने उन्हें अनुदेश दिया कि जब लोग उनका तिरस्कार करते हैं, तब वे “उनके नगर से निकलने पर उन्हें चेतावनी देने के लिए अपने पैरों की धूल झाड़ दें”। (लूकस 9:5) यह इस बात का भी प्रमाण है कि हम आप से कुछ लेने के लिए नहीं बल्कि देने के लिए आए हैं, हम आप के गाँव की धूल तक लेकर नहीं जायेंगे। हर ख्रीस्तीय विश्वासी को देना सीखना चाहिए, जितना ज्यादा हम दे सकेंगे उतना ज्यादा हम ख्रीस्तीय बनेंगे। सब से बडा दान हम जो दे सकते हैं – वह है जीवन की कुर्बानी।




Christians are called to give, not to take. The Lord teaches us that we should give to those in need from whatever we have. He told the rich young man, “go, sell what you own, and give the money to the poor” (Lk 10:21). In Lk 9:6 we are told that the disciples went from village to village preaching the good news and healing people. According to the instructions of Jesus they were going around giving good news, healing and peace. Jesus had instructed them, “Wherever they do not welcome you, as you are leaving that town shake the dust off your feet as a testimony against them” (Lk 9:5). This is also a testimony that the preacher of the good news does not expect to receive anything from those to whom he is sent, not even the dust. He receives only from God. It is God who provides for him in his own mysterious ways. It is also a warning to them who have rejected God himself when they rejected his disciples.


 -Br. Biniush Topno


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मंगलवार, 21 सितम्बर, 2021

 

मंगलवार, 21 सितम्बर, 2021

वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य सप्ताह

प्रेरित,सुसमाचार-लेखक सन्त मत्ती का पर्व

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पहला पाठ : एफ़ेसियों 4:1-7, 11-13


1) ईश्वर ने आप लोगों को बुलाया है। आप अपने इस बुलावे के अनुसार आचरण करें - यह आप लोगों से मेरा अनुरोध है, जो प्रभु के कारण कै़दी हूँ।

2) आप पूर्ण रूप से विनम्र, सौम्य तथा सहनशील बनें, प्रेम से एक दूसरे को सहन करें

3) और शान्ति के सूत्र में बँध कर उस एकता को बनाये रखने का प्रयत्न करते रहें, जिसे पवित्र आत्मा प्रदान करता है।

4) एक ही शरीर है, एक ही आत्मा और एक ही आशा, जिसके लिए आप लोग बुलाये गये हैं।

5) एक ही प्रभु है, एक ही विश्वास और एक ही बपतिस्मा।

6) एक ही ईश्वर है, जो सबों का पिता, सब के ऊपर, सब के साथ और सब में व्याप्त है।

7) मसीह ने जिस मात्रा में देना चाहा, उसी मात्रा में हम में प्रत्येक को कृपा प्राप्त हुई है।

11) उन्होंने कुछ लोगों को प्रेरित, कुछ को नबी, कुछ को सुसमाचार-प्रचारक और कुछ को चरवाहे तथा आचार्य होने का वरदान दिया।

12) इस प्रकार उन्होंने सेवा-कार्य के लिए सन्तों को नियुक्त किया, जिससे मसीह के शरीर का निर्माण तब तक होता रहे,

13) जब तक हम विश्वास तथा ईश्वर के पुत्र के ज्ञान में एक नहीं हो जायें और मसीह की परिपूर्णता के अनुसार पूर्ण मनुष्यत्व प्राप्त न कर लें।


सुसमाचार : सन्त मत्ती 9:9-13


9) ईसा वहाँ से आगे बढ़े। उन्होंने मत्ती नामक व्यक्ति को चुंगी-घर में बैठा हुआ देखा और उस से कहा, ’’मेरे पीछे चले आओ’’, और वह उठकर उनके पीछे हो लिया।

10) एक दिन ईसा अपने शिष्यों के साथ मत्ती के घर भोजन पर बैठे और बहुत-से नाकेदार और पापी आ कर उनके साथ भोजन करने लगे।

11) यह देखकर फरीसियों ने उनके शिष्यों से कहा, ’’तुम्हारे गुरु नाकेदारों और पापियों के साथ क्यों भोजन करते हैं?’’

12) ईसा ने यह सुन कर उन से कहा, ’’नीरोगों को नहीं, रोगियों को वैद्य की ज़रूरत होती है।

13) जा कर सीख लो कि इसका क्या अर्थ है- मैं बलिदान नहीं, बल्कि दया चाहता हूँ। मैं धर्मियों को नहीं, पापियों को बुलाने आया हूँ।’’


मनन-चिंतन


संत मत्ती जो कि बारह शिष्यांे में से एक है जिन्होंने प्रभु येसु के साथ समय बिताया एवं आगे चलकर चारों सुसमाचारों में से एक के लेखन भी किया; आज हम उस प्रेरित संत मत्ती का पर्व सम्पूर्ण कलीसिया के साथ मिलकर मना रहे है।

प्रेरित संत मत्ती की बुलाहट अन्य शिष्यों के भांति ही हुआ जहॉं प्रभु येसु ने मत्ती को उनके काम धंधा अपने कार्य से बुलाया। ये एक बुलाहट था पुरानी जिंदगी से नई जिंदगी में प्रवेश करने के लिए। इस नये जीवन में प्रवेश करने के लिए येसु पुराने जीवन या पुराना कार्य को महत्ता नहीं देते परंतु नये जीवन की ओर महत्ता देते हुए बुलाते है। मत्ती का पुराना कार्य कर इकट्ठा करना था जिन्हें यहुदी लोग उस समय पापमय के समान देखते थे। प्रभु येसु मत्ती को उस पापमय जीवन से निकाल कर अपना शिष्य और प्रेरित बनाते हैं। और आज ऐसे बहुत से लोग है जो संत मत्ती के सुसमाचार से प्रेरित होकर नये जीवन को अपनाते है। संत मत्ती का पर्व हम सब के लिए नवीन बुलाहट लेकर आये। आमेन



📚 REFLECTION



Together with the entire Catholic Church today we are celebrating the feast of the Apostle St. Matthew, the one disciple among the twelve, who spend time with Jesus and later one became the writer of one of the four gospels.

The Call of Aposlte St. Matthew was like that of others disciples also where Lord Jesus called him from his work. This was the call to enter into a new life from old life. To enter into the new life Lord Jesus do not give importance to the old life or old work but calls the person giving importance to the new life. The old work of Matthew was to collect the tax which was like sin in the eyes of Jews at that time. Lord Jesus takes Mattew from that sinful situation to become his disciple and Apostle and today there many people who accept new life inspiring by the gospel of St. Matthew. May the Feast of St. Matthew bring renewed call to us. Amen


 -Br. Biniush Topno


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सोमवार, 20 सितम्बर, 2021 वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य सप्ताह

 

सोमवार, 20 सितम्बर, 2021

वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : एज़्रा का ग्रन्थ 1:1-6


1) यिरमियाह द्वारा घोषित अपनी वाणी पूरी करने के लिए प्रभु ने फ़ारस के राजा सीरुस को उसके शासनकाल के प्रथम वर्ष में प्रेरित किया कि वह अपने सम्पूर्ण राज्य में यह लिखित राजाज्ञा प्रसारित करे,

2) ’’फारस के राजा सीरुस कहते हैं: प्रभु, स्वर्ग के ईश्वर ने मुझे पृथ्वी के सब राज्य प्रदान किये और उसने मुझे यहूदियों के येरुसालेम में एक मन्दिर बनवाने का आदेश दिया है।

3) ईश्वर उनके साथ रहे, जो तुम लोगों में उसकी प्रजा के सदस्य हैं! वे लोग येरुसालेम में रहने वाले ईश्वर, इस्राएल के ईश्वर, प्रभु का मन्दिर बनाने के लिए येरुसालेम की ओर प्रस्थान करें।

4) जहाँ कहीं कोई इस्राएली हो, उस को वहाँ के लोग चाँदी, सोना, सामान, पशुधन और येरुसालेम में रहने वाले ईश्वर के मन्दिर के लिए स्वेच्छित उपहार प्रदान करें।’’

5) तब यूदा और बेनयामीन के परिवारों के अध्यक्ष, याजक और लेवी-वे सब लोग, जिन्हें ईश्वर से यह प्रेरणा मिली-येरुसालेम में रहने वाले प्रभु का मन्दिर बनवाने के लिए लौटने की तैयारियाँ करने लगे।

6) उनके सभी पड़ोसी उन्हें चाँदी, सोना, सामान, पशुधन, बहुत-सी बहुमूल्य वस्तुएँ और स्वेच्छित उपहार दे कर उनकी हर प्रकार की सहायता करते थे।


सुसमाचार : सन्त लूकस 8:16-18


16) ’’कोई दीपक जला कर बरतन से नहीं ढकता या पलंग के नीचे नहीं रखता, बल्कि वह उसे दीवट पर रख देता है, जिससे भीतर आने वाले उसका प्रकाश देख सकें।

17) ’’ऐसा कुछ भी छिपा हुआ नहीं है, जो प्रकट नहीं होगा और ऐसा कुछ भी गुप्त नहीं है, जो नहीं फैलेगा और प्रकाश में नहीं आयेगा।

18) तो इसके सम्बन्ध में सावधान रहो कि तुम किस तरह सुनते हो; क्योंकि जिसके पास कुछ है, उसी को और दिया जायेगा और जिसके पास कुछ नहीं है, उस से वह भी ले लिया जायेगा, जिसे वह अपना समझता है।


मनन-चिंतन


जब कभी अंधकार होता है तो घरों मे दीपक जलाते है आज के समय में बल्ब या ट्यूबलाईट जलाई जाती है। दीपक या बल्ब को जलाने का मकसद प्रकाश करना होता है और कोई भी व्यक्ति जिसने प्रकाश के लिए दीपक या बल्ब को जलाया है उसको जलाने के बाद शायद ही उसके प्रकाश को छुपाने का कार्य करेगा क्योकि यदि उसे छिपाना हीे होता तो वह दीपक को जलाता ही नहीं। जलता हुआ दीपक एक प्रकार से एक मनुष्य में अच्छाई का प्रतीक है और जिस किसी में अच्छाई होती है उसकी अच्छाईयॉं छिपाये नहीं छिपती इसके विपरीत वह दूसरों के लिए कृपा और आशीष का माध्यम बन जाता है।

हम इस संसार मंे कुछ नहीं छिपा सकते और जिसे हम समझते है कि हमन छिपा के रखा है वह भले ही मनुष्यांे के नजरों में न दिखाई दे परंतु वह ईश्वर के नजर से छिप नहीं सकता; भले ही वह अच्छे चीज हो या बुरी चीज़। प्रभु हमारे अच्छाईयों और बुराईयों दोनो को देखता है। हिन्दी में एक अच्छा लोकोक्ति है, ’नेकी कर और दरिया में डाल’ अच्छाई करते जाओ, फल की ईच्छा मत करों क्योंकि अच्छाई छिपाये नहीं छिपती परंतु इसका फल जरूर मिलता है। हमारा दीपक हमेशा जलता रहें और दूसरों को प्रकाश दें।


📚 REFLECTION



Whenever it becomes dark then lamp is lit at home, in today’s time bulb or tubelight is being lit. The purpose of lighting a lamp or bulb is to light up the place and there may be rarely anyone who will cover up the lamp or bulb after light it on because if he/she wanted to hide the light then he/she might have not lit the lamp at all. Lighted lamp is a kind of sign of goodness in a person and anyone who has this goodness that goodness cannot be hidden; all the more it becomes a medium of grace and benevolence for others.

We cannot hide anything in this world and the thing which we think we have kept hidden, it may be not seen in the eyes of people but nothing can be hidden from the eyes of God; whether it is a good thing or bad thing. God sees both our goodness and badness. There is a good proverb in hindi, ‘Neki ker aur dauriya mein daal’ which means doing good without expecting for reward because the goodness can never be hidden but we will receive the reward for it by sure. May our lamp be always burn and give light to others.


 -Br Biniush Topno


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Daily Mass Readings for Sunday, 19 September 202

 Daily Mass Readings for Sunday, 19 September 202


First Reading: Wisdom 2: 12, 17-20

12 Let us therefore lie in wait for the just, because he is not for our turn, and he is contrary to our doings, and upbraideth us with transgressions of the law, and divulgeth against us the sins of our way of life.

17 Let us see then if his words be true, and let us prove what shall happen to him, and we shall know what his end shall be.

18 For if he be the true son of God, he will defend him, and will deliver him from the hands of his enemies.

19 Let us examine him by outrages and tortures, that we may know his meekness and try his patience.

20 Let us condemn him to a most shameful death: for there shall be respect had unto him by his words.

Responsorial Psalm: Psalms 54: 3-4, 5, 6 and 8


R. (6b) The Lord upholds my life.

3 Save me, O God, by thy name, and judge me in thy strength.

4 O God, hear my prayer: give ear to the words of my mouth.

R. The Lord upholds my life.

5 For strangers have risen up against me; and the mighty have sought after my soul: and they have not set God before their eyes.

R. The Lord upholds my life.

6 For behold God is my helper: and the Lord is the protector of my soul.

8 I will freely sacrifice to thee, and will give praise, O God, to thy name: because it is good:

R. The Lord upholds my life.

Second Reading: James 3: 16 – 4: 3


16 For where envying and contention is, there is inconstancy, and every evil work.

17 But the wisdom, that is from above, first indeed is chaste, then peaceable, modest, easy to be persuaded, consenting to the good, full of mercy and good fruits, without judging, without dissimulation.

18 And the fruit of justice is sown in peace, to them that make peace.

4:1 From whence are wars and contentions among you? Are they not hence, from your concupiscences, which war in your members?

2 You covet, and have not: you kill, and envy, and can not obtain. You contend and war, and you have not, because you ask not.

3 You ask, and receive not; because you ask amiss: that you may consume it on your concupiscences.

Alleluia: Second Thessalonians 2: 14

R. Alleluia, alleluia.

14 God has called us through the Gospel to possess the glory of our Lord Jesus Christ.

R. Alleluia, alleluia.

Gospel: Mark 9: 30-37

30 And departing from thence, they passed through Galilee, and he would not that any man should know it.

31 And he taught his disciples, and said to them: The Son of man shall be betrayed into the hands of men, and they shall kill him; and after that he is killed, he shall rise again the third day.

32 But they understood not the word, and they were afraid to ask him.

33 And they came to Capharnaum. And when they were in the house, he asked them: What did you treat of in the way?

34 But they held their peace, for in the way they had disputed among themselves, which of them should be the greatest.

35 And sitting down, he called the twelve, and saith to them: If any man desire to be first, he shall be the last of all, and the minister of all.

36 And taking a child, he set him in the midst of them. Whom when he had embraced, he saith to them:

37 Whosoever shall receive one such child as this in my name, receiveth me. And whosoever shall receive me, receiveth not me, but him that sent me.

इतवार, 19 सितम्बर, 2021 वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य इतवार

 

इतवार, 19 सितम्बर, 2021

वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य इतवार

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पहला पाठ : प्रज्ञा 2:12अ, 17-20


12) "हम धर्मात्मा के लिए फन्दा लगायें, क्योंकि वह हमें परेशान करता और हमारे आचरण का विरोध करता है।

17) हम यह देखें कि उसका दावा कहाँ तक सच है; हम यह पता लगायें कि अन्त में उसका क्या होगा।

18) यदि वह धर्मात्मा ईश्वर का पुत्र है, तो ईश्वर उसकी सहायता करेगा और उसे उसके विरोधियों के हाथ से छुड़ायेगा।

19) हम अपमान और अत्याचार से उसकी परीक्षा ले, जिससे हम उसकी विनम्रता जानें और उसका धैर्य परख सकें।

20) हम उसे घिनौनी मृत्यु का दण्ड दिलायें, क्योंकि उसका दावा है, कि ईश्वर उसकी रक्षा करेगा।



दूसरा पाठ : याकूब 3:16-4:3


3:16) जहाँ ईर्ष्या और स्वार्थ है, वहाँ अशान्ति और हर तरह की बुराई पायी जाती है।

17) किन्तु उपर से आयी हुई प्रज्ञा मुख्यतः पवित्र है और वह शान्तिप्रिय, सहनशील, विनम्र, करुणामय, परोपकारी, पक्षपातहीन और निष्कपट भी है।

18) धार्मिकता शान्ति के क्षेत्र में बोयी जाती है और शान्ति स्थापित करने वाले उसका फल प्राप्त करते हैं।

4:1) आप लोगों में द्वेष और लड़ाई-झगड़ा क्यों? क्या इसका कारण यह नहीं है कि आपकी वासनाएं आपके अन्दर लड़ाई करती हैं?

2) आप अपनी लालसा पूरी नहीं कर पाते और इसलिए हत्या करते हैं। आप जिस चीज़ के लिए ईर्ष्या करते हैं, उसे नहीं पाते और इसलिए लड़ते-झगड़ते हैं। आप प्रार्थना नहीं करते, इसलिए आप लोगों के पास कुछ नहीं होता।

3) जब आप माँगते भी हैं, तो इसलिए नहीं पाते कि अच्छी तरह प्रार्थना नहीं करते। आप अपनी वासनाओं की तृप्ति के लिए धन की प्रार्थना करते हैं।



सुसमाचार : मारकुस 9:30-37


30) वे वहाँ से चल कर गलीलिया पार कर रहे थे। ईसा नहीं चाहते थे कि किसी को इसका पता चले,

31) क्योंकि वे अपने शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे। ईसा ने उन से कहा, "मानव पुत्र मनुष्यों के हवाले कर दिया जायेगा। वे उसे मार डालेंगे और मार डाले जाने के बाद वह तीसरे दिन जी उठेगा।"

32) शिष्य यह बात नहीं समझ पाते थे, किन्तु ईसा से प्रश्न करने में उन्हें संकोच होता था।

33) वे कफ़रनाहूम आये। घर पहुँच कर ईसा ने शिष्यों से पूछा, "तुम लोग रास्ते में किस विषय पर विवाद कर रहे थे?"

34) वे चुप रह गये, क्योंकि उन्होंने रास्ते में इस पर वाद-विवाद किया था कि हम में सब से बड़ा कौन है।

35) ईसा बैठ गये और बारहों को बुला कर उन्होंने उन से कहा, "जो पहला होना चाहता है, वह सब से पिछला और सब का सेवक बने"।

36) उन्होंने एक बालक को शिष्यों के बीच खड़ा कर दिया और उसे गले लगा कर उन से कहा,

37) "जो मेरे नाम पर इन बालकों में किसी एक का भी स्वागत करता है, वह मेरा स्वागत करता है और जो मेरा स्वागत करता है, वह मेरा नहीं, बल्कि उसका स्वागत करता है, जिसने मुझे भेजा है।"



📚 मनन-चिंतन


संत मदर तेरेसा कहती है, ‘‘विनम्रता सभी गुणों की जननी है; पवित्रता, दान और आज्ञाकारिता। विनम्र होने से ही हमारा प्रेम वास्तविक, समर्पित और उत्साही बनता है। यदि तुम विनम्र हो तो कुछ भी आपको परेशान नही कर सकता, न ही प्रशंसा और न ही अपमान, क्योंकि आप जानते हैं कि आप क्या हैं।’’ विनम्रता को सभी गुणों की शुरूआत माना जाता है। विनम्रता एक ऐसा गुण है जो हर एक को संतो के जीवन की ओर अ्रग्रसर करता है। प्रभु येसु ने निरंतर अपने वचनों में विनम्र बनने की शिक्षा प्रदान की है। क्यांेकि वह जानते थे कि मनुष्यों में एक बहुत ही प्रबल प्रवृत्ति है वह है अपने को बड़ा मानना, लोगो की बीच मंे महान समझा जाना। दूसरों की नजरों में बड़ें बनने की प्रवृत्ति हमारे स्वार्थ को बतलाती है जहॉं पर हम सिर्फ अपने विषय में सोचते है। यह स्वार्थ तभी दूर हो सकती जब हम अपने को छोड़ ईश्वर के बारे में सोचे, उन्हे अपने जीवन का कर्ता समझे तब जाकर हमारे अंदर विनम्रता का गुण उत्पन्न होगा।

हर कोई अपने को बड़ा बनना चाहता है या ऊॅंचा पद पाना चाहता है परंतु प्रभु बताते है बड़ा वही बन सकता है जो अपने को सबसे पिछला और सबका सेवक बनाये अर्थात् अपने को विनम्र बनाये। प्रभु कहना चाहते है जो व्यक्ति विनम्रता से परिपूर्ण है वही सच्चाई में महान है। संत याकूब 4ः10 में कहते है, ‘‘प्रभु के सामने दीन-हीन बनें और वह आप को ऊॅंचा उठायेगा।’’ हमें ऊपर उठाने वाला हमें बड़ा बनाने वाला प्रभु है और जो व्यक्ति अपने को विनम्रता बनाता है वह प्रभु की कृपा पाने के लिए अपने को योग्य बनाता है।

बाईबिल मूसा के बारे में बताती है, ‘‘मूसा अत्यन्त विनम्र था। वह पृथ्वी के सब मनुष्यों में सब से अधिक विनम्र था। (गणना 12ः3) व्यक्ति की सच्ची पहचान दुख या तकलीफ में होती है, जिस प्रकार प्रज्ञा ग्रंथ में लिखा है, ‘‘हम अपमान और अत्याचार से उसकी परीक्षा ले, जिससे हम उसकी विनम्रता जाने और उसका धैर्य परख सकें।’’ मूसा के सामने भी कई परेशानियॉं आयी और उसे विनम्रता में आगे बढ़ने में मदद करी जिस प्रकार प्रवक्ता ग्रंथ 2ः5 में लिखा है, ‘‘अग्नि में स्वर्ण की परख होती है और दीन-हीनता की घरिया में ईश्वर के कृपापात्रों की।’’ आईये हम विनम्रता का गुण अपने जीवन में अपनायें।



📚 REFLECTION



Saint Mother Teresa said, “Humility is the mother of all virtues; purity, charity and obedience. It is in being humble that our love becomes real, devoted and ardent. If you are humble nothing will touch you, neither praise nor disgrace, because you know what you are.” Humility is known to be the starting of all virtues. Humility is that virtue which leads a person towards the life of a Saint. Lord Jesus in his words taught many times to be humble; because he knew that in humans there is a strong tendeny to make oneself great, to be called great among others. The tendency to become great in front of others tells about the selfishness in us where we only think about oneself. This selfishness can be removed only when we think about God instead of oneself, to acknowledge him to be the doer of our lives then only the virtue of humility will grow within us.

Everyone wants to become great or to reach great position but Lord tells that only that person can become great who makes himself to be the very last and the servant of all that is to say to make oneself a humble person. Lord wants to tell that a person who is filled with humility is great in the real sense. St James says in 4:10, “Humble yourselves before the Lord and he will lift you up.” Making us great and lifting us up is upto God and one who makes himself a humble being he/she makes oneself worthy to receive God’s grace.

Bible tells about Moses, “Moses was a very humble man, more humble than anyone else on the face of the earth” (Num 12:3). The reality of person comes during the time of troubles and sorrows, as it is written in book of Wisdom, “Let us test him with cruelty and with torture, and thus explore this gentleness of his and put his patience to the test.” Many challenges came in front of Moses which helped him to grow in humility as it is written in Sirach 2:5, “For gold is tested in the fire, and those found acceptable, in the furnace of humiliation. Let’s imbibe the virtue of humility in our lives.



 -Br Biniush Topno


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Praise the Lord!