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Daily Mass Readings for Sunday, 19 September 202

 Daily Mass Readings for Sunday, 19 September 202


First Reading: Wisdom 2: 12, 17-20

12 Let us therefore lie in wait for the just, because he is not for our turn, and he is contrary to our doings, and upbraideth us with transgressions of the law, and divulgeth against us the sins of our way of life.

17 Let us see then if his words be true, and let us prove what shall happen to him, and we shall know what his end shall be.

18 For if he be the true son of God, he will defend him, and will deliver him from the hands of his enemies.

19 Let us examine him by outrages and tortures, that we may know his meekness and try his patience.

20 Let us condemn him to a most shameful death: for there shall be respect had unto him by his words.

Responsorial Psalm: Psalms 54: 3-4, 5, 6 and 8


R. (6b) The Lord upholds my life.

3 Save me, O God, by thy name, and judge me in thy strength.

4 O God, hear my prayer: give ear to the words of my mouth.

R. The Lord upholds my life.

5 For strangers have risen up against me; and the mighty have sought after my soul: and they have not set God before their eyes.

R. The Lord upholds my life.

6 For behold God is my helper: and the Lord is the protector of my soul.

8 I will freely sacrifice to thee, and will give praise, O God, to thy name: because it is good:

R. The Lord upholds my life.

Second Reading: James 3: 16 – 4: 3


16 For where envying and contention is, there is inconstancy, and every evil work.

17 But the wisdom, that is from above, first indeed is chaste, then peaceable, modest, easy to be persuaded, consenting to the good, full of mercy and good fruits, without judging, without dissimulation.

18 And the fruit of justice is sown in peace, to them that make peace.

4:1 From whence are wars and contentions among you? Are they not hence, from your concupiscences, which war in your members?

2 You covet, and have not: you kill, and envy, and can not obtain. You contend and war, and you have not, because you ask not.

3 You ask, and receive not; because you ask amiss: that you may consume it on your concupiscences.

Alleluia: Second Thessalonians 2: 14

R. Alleluia, alleluia.

14 God has called us through the Gospel to possess the glory of our Lord Jesus Christ.

R. Alleluia, alleluia.

Gospel: Mark 9: 30-37

30 And departing from thence, they passed through Galilee, and he would not that any man should know it.

31 And he taught his disciples, and said to them: The Son of man shall be betrayed into the hands of men, and they shall kill him; and after that he is killed, he shall rise again the third day.

32 But they understood not the word, and they were afraid to ask him.

33 And they came to Capharnaum. And when they were in the house, he asked them: What did you treat of in the way?

34 But they held their peace, for in the way they had disputed among themselves, which of them should be the greatest.

35 And sitting down, he called the twelve, and saith to them: If any man desire to be first, he shall be the last of all, and the minister of all.

36 And taking a child, he set him in the midst of them. Whom when he had embraced, he saith to them:

37 Whosoever shall receive one such child as this in my name, receiveth me. And whosoever shall receive me, receiveth not me, but him that sent me.

इतवार, 19 सितम्बर, 2021 वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य इतवार

 

इतवार, 19 सितम्बर, 2021

वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य इतवार

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पहला पाठ : प्रज्ञा 2:12अ, 17-20


12) "हम धर्मात्मा के लिए फन्दा लगायें, क्योंकि वह हमें परेशान करता और हमारे आचरण का विरोध करता है।

17) हम यह देखें कि उसका दावा कहाँ तक सच है; हम यह पता लगायें कि अन्त में उसका क्या होगा।

18) यदि वह धर्मात्मा ईश्वर का पुत्र है, तो ईश्वर उसकी सहायता करेगा और उसे उसके विरोधियों के हाथ से छुड़ायेगा।

19) हम अपमान और अत्याचार से उसकी परीक्षा ले, जिससे हम उसकी विनम्रता जानें और उसका धैर्य परख सकें।

20) हम उसे घिनौनी मृत्यु का दण्ड दिलायें, क्योंकि उसका दावा है, कि ईश्वर उसकी रक्षा करेगा।



दूसरा पाठ : याकूब 3:16-4:3


3:16) जहाँ ईर्ष्या और स्वार्थ है, वहाँ अशान्ति और हर तरह की बुराई पायी जाती है।

17) किन्तु उपर से आयी हुई प्रज्ञा मुख्यतः पवित्र है और वह शान्तिप्रिय, सहनशील, विनम्र, करुणामय, परोपकारी, पक्षपातहीन और निष्कपट भी है।

18) धार्मिकता शान्ति के क्षेत्र में बोयी जाती है और शान्ति स्थापित करने वाले उसका फल प्राप्त करते हैं।

4:1) आप लोगों में द्वेष और लड़ाई-झगड़ा क्यों? क्या इसका कारण यह नहीं है कि आपकी वासनाएं आपके अन्दर लड़ाई करती हैं?

2) आप अपनी लालसा पूरी नहीं कर पाते और इसलिए हत्या करते हैं। आप जिस चीज़ के लिए ईर्ष्या करते हैं, उसे नहीं पाते और इसलिए लड़ते-झगड़ते हैं। आप प्रार्थना नहीं करते, इसलिए आप लोगों के पास कुछ नहीं होता।

3) जब आप माँगते भी हैं, तो इसलिए नहीं पाते कि अच्छी तरह प्रार्थना नहीं करते। आप अपनी वासनाओं की तृप्ति के लिए धन की प्रार्थना करते हैं।



सुसमाचार : मारकुस 9:30-37


30) वे वहाँ से चल कर गलीलिया पार कर रहे थे। ईसा नहीं चाहते थे कि किसी को इसका पता चले,

31) क्योंकि वे अपने शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे। ईसा ने उन से कहा, "मानव पुत्र मनुष्यों के हवाले कर दिया जायेगा। वे उसे मार डालेंगे और मार डाले जाने के बाद वह तीसरे दिन जी उठेगा।"

32) शिष्य यह बात नहीं समझ पाते थे, किन्तु ईसा से प्रश्न करने में उन्हें संकोच होता था।

33) वे कफ़रनाहूम आये। घर पहुँच कर ईसा ने शिष्यों से पूछा, "तुम लोग रास्ते में किस विषय पर विवाद कर रहे थे?"

34) वे चुप रह गये, क्योंकि उन्होंने रास्ते में इस पर वाद-विवाद किया था कि हम में सब से बड़ा कौन है।

35) ईसा बैठ गये और बारहों को बुला कर उन्होंने उन से कहा, "जो पहला होना चाहता है, वह सब से पिछला और सब का सेवक बने"।

36) उन्होंने एक बालक को शिष्यों के बीच खड़ा कर दिया और उसे गले लगा कर उन से कहा,

37) "जो मेरे नाम पर इन बालकों में किसी एक का भी स्वागत करता है, वह मेरा स्वागत करता है और जो मेरा स्वागत करता है, वह मेरा नहीं, बल्कि उसका स्वागत करता है, जिसने मुझे भेजा है।"



📚 मनन-चिंतन


संत मदर तेरेसा कहती है, ‘‘विनम्रता सभी गुणों की जननी है; पवित्रता, दान और आज्ञाकारिता। विनम्र होने से ही हमारा प्रेम वास्तविक, समर्पित और उत्साही बनता है। यदि तुम विनम्र हो तो कुछ भी आपको परेशान नही कर सकता, न ही प्रशंसा और न ही अपमान, क्योंकि आप जानते हैं कि आप क्या हैं।’’ विनम्रता को सभी गुणों की शुरूआत माना जाता है। विनम्रता एक ऐसा गुण है जो हर एक को संतो के जीवन की ओर अ्रग्रसर करता है। प्रभु येसु ने निरंतर अपने वचनों में विनम्र बनने की शिक्षा प्रदान की है। क्यांेकि वह जानते थे कि मनुष्यों में एक बहुत ही प्रबल प्रवृत्ति है वह है अपने को बड़ा मानना, लोगो की बीच मंे महान समझा जाना। दूसरों की नजरों में बड़ें बनने की प्रवृत्ति हमारे स्वार्थ को बतलाती है जहॉं पर हम सिर्फ अपने विषय में सोचते है। यह स्वार्थ तभी दूर हो सकती जब हम अपने को छोड़ ईश्वर के बारे में सोचे, उन्हे अपने जीवन का कर्ता समझे तब जाकर हमारे अंदर विनम्रता का गुण उत्पन्न होगा।

हर कोई अपने को बड़ा बनना चाहता है या ऊॅंचा पद पाना चाहता है परंतु प्रभु बताते है बड़ा वही बन सकता है जो अपने को सबसे पिछला और सबका सेवक बनाये अर्थात् अपने को विनम्र बनाये। प्रभु कहना चाहते है जो व्यक्ति विनम्रता से परिपूर्ण है वही सच्चाई में महान है। संत याकूब 4ः10 में कहते है, ‘‘प्रभु के सामने दीन-हीन बनें और वह आप को ऊॅंचा उठायेगा।’’ हमें ऊपर उठाने वाला हमें बड़ा बनाने वाला प्रभु है और जो व्यक्ति अपने को विनम्रता बनाता है वह प्रभु की कृपा पाने के लिए अपने को योग्य बनाता है।

बाईबिल मूसा के बारे में बताती है, ‘‘मूसा अत्यन्त विनम्र था। वह पृथ्वी के सब मनुष्यों में सब से अधिक विनम्र था। (गणना 12ः3) व्यक्ति की सच्ची पहचान दुख या तकलीफ में होती है, जिस प्रकार प्रज्ञा ग्रंथ में लिखा है, ‘‘हम अपमान और अत्याचार से उसकी परीक्षा ले, जिससे हम उसकी विनम्रता जाने और उसका धैर्य परख सकें।’’ मूसा के सामने भी कई परेशानियॉं आयी और उसे विनम्रता में आगे बढ़ने में मदद करी जिस प्रकार प्रवक्ता ग्रंथ 2ः5 में लिखा है, ‘‘अग्नि में स्वर्ण की परख होती है और दीन-हीनता की घरिया में ईश्वर के कृपापात्रों की।’’ आईये हम विनम्रता का गुण अपने जीवन में अपनायें।



📚 REFLECTION



Saint Mother Teresa said, “Humility is the mother of all virtues; purity, charity and obedience. It is in being humble that our love becomes real, devoted and ardent. If you are humble nothing will touch you, neither praise nor disgrace, because you know what you are.” Humility is known to be the starting of all virtues. Humility is that virtue which leads a person towards the life of a Saint. Lord Jesus in his words taught many times to be humble; because he knew that in humans there is a strong tendeny to make oneself great, to be called great among others. The tendency to become great in front of others tells about the selfishness in us where we only think about oneself. This selfishness can be removed only when we think about God instead of oneself, to acknowledge him to be the doer of our lives then only the virtue of humility will grow within us.

Everyone wants to become great or to reach great position but Lord tells that only that person can become great who makes himself to be the very last and the servant of all that is to say to make oneself a humble person. Lord wants to tell that a person who is filled with humility is great in the real sense. St James says in 4:10, “Humble yourselves before the Lord and he will lift you up.” Making us great and lifting us up is upto God and one who makes himself a humble being he/she makes oneself worthy to receive God’s grace.

Bible tells about Moses, “Moses was a very humble man, more humble than anyone else on the face of the earth” (Num 12:3). The reality of person comes during the time of troubles and sorrows, as it is written in book of Wisdom, “Let us test him with cruelty and with torture, and thus explore this gentleness of his and put his patience to the test.” Many challenges came in front of Moses which helped him to grow in humility as it is written in Sirach 2:5, “For gold is tested in the fire, and those found acceptable, in the furnace of humiliation. Let’s imbibe the virtue of humility in our lives.



 -Br Biniush Topno


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शनिवार, 18 सितम्बर, 2021 वर्ष का चौबीसवाँ सामान्य सप्ताह

 

शनिवार, 18 सितम्बर, 2021

वर्ष का चौबीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : 1 तिमथी 6:13-16


13) ईश्वर जो सब को जीवन प्रदान करता है और ईसा मसीह, जिन्होंने पोंतियुस पिलातुस के सम्मुख अपना उत्तम साक्ष्य दिया, दोनों को साक्षी बना कर मैं तुम को यह आदेश देता हूँ।

14) कि हमारे प्रभु ईसा मसीह की अभिव्यक्ति के दिन तक अपना धर्म निष्कलंक तथा निर्दोष बनाये रखो।

15) यह अभिव्यक्ति यथासमय परमधन्य तथा एक मात्र अधीश्वर के द्वारा हो जायेगी। वह राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु है,

16) जो अमरता का एकमात्र स्रोत है, जो अगम्य ज्योति में निवास करता है, जिसे न तो किसी मनुष्य ने कभी देखा है और न कोई देख सकता है। उसे सम्मान तथा अनन्त काल तक बना रहने वाला सामर्थ्य! आमेन!


सुसमाचार : सन्त लूकस 8:4-15


4) एक विशाल जनसमूह एकत्र हो रहा था और नगर-नगर से लोग ईसा के पास आ रहे थे। उस समय उन्होंने यह दृष्टान्त सुनाया,

5) "कोई बोने वाला बीज बोने निकला। बोते-बोते कुछ बीज रास्ते के किनारे गिरे। वे पैरों से रौंदे गये और आकाश के पक्षियों ने उन्हें चुग लिया।

6) कुछ बीज पथरीली भूमि पर गिरे। वे उग कर नमी के अभाव में झुलस गये।

7) कुछ बीज काँटों में गिरे। साथ-साथ बढ़ने वाले काँटों ने उन्हें दबा दिया।

8) कुछ बीज अच्छी भूमि पर गिरे। वे उग कर सौ गुना फल लाये।" इतना कहने के बाद वह पुकार कर बोले, "जिसके सुनने के कान हों, वह सुन ले"।

9) शिष्यों ने उन से इस दृष्टान्त का अर्थ पूछा।

10) उन्होंने उन से कहा, "तुम लोगों को ईश्वर के राज्य का भेद जानने का वरदान मिला है। दूसरों को केवल दृष्टान्त मिले, जिससे वे देखते हुए भी नहीं देखें और सुनते हुए भी नहीं समझें।

11) "दृष्टान्त का अर्थ इस प्रकार है। ईश्वर का वचन बीज है।

12) रास्ते के किनारे गिरे हुए बीज वे लोग हैं, जो सुनते हैं, परन्तु कहीं ऐसा न हो कि वे विश्वास करें और मुक्ति प्राप्त कर लें, इसलिए शैतान आ कर उनके हृदय से वचन ले जाता है।

13) चट्टान पर गिरे हुए बीज वे लोग हैं, जो वचन सुनते ही प्रसन्नता से ग्रहण करते हैं, किन्तु जिन में जड़ नहीं है। वे कुछ ही समय तक विश्वास करते हैं और संकट के समय विचलित हो जाते हैं।

14) काँटों में गिरे हुए बीज वे लोग हैं, जो सुनते हैं, परन्तु आगे चल कर वे चिन्ता, धन-सम्पत्ति और जीवन का भोग-विलास से दब जाते हैं और परिपक्वता तक नहीं पहुँच पाते।

15) अच्छी भूमि पर गिरे हुए बीज वे लोग हैं, जो सच्चे और निष्कपट हृदय से वचन सुन कर सुरक्षित रखते और अपने धैर्य के कारण फल लाते हैं।


📚 मनन-चिंतन


दृष्टान्तों के जरियें प्रभु येसु ने कई रहस्यों को हमारे सामने प्रकट किया है तथा स्वर्गिक बातों को समझाने की कोशिश की है। प्रभु के वचन की वृद्धि के लिए प्रभु येसु बीज बोने वाले का दृष्टांत सुनाते है। यहॉं पर वचन या बीज की क्षमता नहीं अपितु उसे ग्रहण करने वाले हृदय या भूमि की महत्ता पर जोर दिया गया है। प्रभु के वचन में हर प्रकार की क्षमता है कि वह अधिक फल उत्पन्न करें; जिस प्रकार धर्मग्रन्थ में लिखा है, ‘‘मेरी वाणी मेरे मुख से निकल कर व्यर्थ ही मेरे पास नहीं लौटती।’’(इसायह 55ः11), ‘‘आकाश और पृथ्वी टल जायें, तो टल जायें, परंतु मेरे शब्द नहीं टल सकते।’’(मत्ती 24ः35)

परंतु जरूरत है तो उसे ग्रहण करने वाले अच्छे भूमि की। जिस प्रकार अलग अलग तरह की भूमि इस दृष्टांत में बताया गया है वह प्रत्येक मनुष्यों के हृदयांे की स्थिति को इंगित करता है। यह जरूरी नहीं कि अभी हम सबका हृदय अच्छी भूमि के समान हो परंतु हम उसको अच्छी भूमि के समान बना सकते है। यदि हम चाहते है कि प्रभु का वचन हमारे जीवन में फलप्रद हो तो हमें मेंहनत करने की जरूरत है और अपने हृदय रूपी भूमि से हर प्रकार की बाधा को हटाकर अच्छी भूमि में परिवर्तित करने की जरूरत है। प्रभु का वचन हम सबके जीवन में अधिक फल उत्पन्न करें आईये इसके लिए हम प्रयास करें।



📚 REFLECTION



Lord Jesus has tried to reveal many mysteries and to explain heavenly things through the parables. For the growth of God’s word Lord Jesus tells about the parable of a Sower. Here not the potency of word or seed but the receptive heart or soil is been given more stress. In the word of God there is all potency to bear much fruit, as it is written in the scripture, “My word that goes out from my mouth; it will not return to me empty” (Isa 55:11), “Heaven and earth will pass away, but my words will never pass away.” (Mt 24:35)

But what is needed is the good soil for its reception. As the different kinds of soil or surface area are mentioned in this parable it indicates the different state of hearts of each person. It is not necessary that at present our heart may be like that of good soil but we can make it to be a good soil. If we want the word of God to bear much fruit then we need to work hard and removing all the obstacles from our heart we can transform it to a good soil or good heart. Let’s put our effort so that God’s word may bear much fruit in our lives.


 -Br Biniush Topno


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शुक्रवार, 24 सितम्बर, 2021

 

शुक्रवार, 24 सितम्बर, 2021

वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : हग्गय का ग्रन्थ 2 :1-9


1) राज दारा के शासनकाल के द्वितीय वर्ष, सातवें महीने के इक्कीसवें दिन नबी हग्गय को प्रभु की यह वाणी सुनाई पड़ीः

2) "शअलतीएल के पुत्र, यूदा के राज्यपाल ज़रुबबाबेल से, योसादाक के पुत्र प्रधानयाजक योशुआ और राष्ट्र के शेष लोगों से यह कहो-

3) क्या तुम लोगों में कोई ऐसा व्यक्ति जीवित है, जिसने इस मन्दिर की पूर्व महिमा देखी है? और अब तुम क्या देख रहे हो? क्या तुम्हें ऐसा नहीं लगता कि कुछ भी नहीं बचा है?

4) फिर भी, ज़रुबबाबेल! धीरज रखो! यह प्रभु की वाणी है। योसादाक के पुत्र, प्रधानयाजक योशुआ! धीरज रखो! समस्त देश के निवासियों! धीरज रखो! यह प्रभु की वाणी है।

5) निर्माण-कार्य प्रारंभ करो। मैं तुम लोगों के साथ हूँ। यह विश्वमण्डल के प्रभु की वाणी है। जब तुम मिस्र से निकल रहे थे, उस समय मैंने तुम से जो प्रतिज्ञा की है, मैं उसे पूरा करूँगा। मेरा आत्मा तुम्हारे बीच निवास करेगा। मत डरो!

6) क्योंकि विश्वमण्डल का प्रभु यह कहता है, "मैं थोड़े समय बाद आकाश और पृथ्वी को, जल और थल को हिलाऊँगा,

7) मैं सभी राष्ट्रों को हिला दूँग। तब सब राष्ट्रों की सम्पत्ति यहाँ आयेगी और मैं इस मन्दिर को वैभव से भर दूँगा - विश्वमण्डल का प्रभु यह कहता है।

8) चाँदी मेरी है और सोना मेरा है- यह विश्वमण्डल के प्रभु की वाणी है।

9) इस पिछले मन्दिर का वैभव पहले से बढ़ कर होगा- विश्वमण्डल का प्रभु यह कहता है। और मैं इस स्थान पर शान्ति प्रदान करूँगा- यह विश्वमण्डल के प्रभु की वाणी है।"



सुसमाचार : सन्त लूकस 9:18-22


18) ईसा किसी दिन एकान्त में प्रार्थना कर रहे थे और उनके शिष्य उनके साथ थे। ईसा ने उन से पूछा, "मैं कौन हूँ, इस विषय में लोग क्या कहते हैं?"

19) उन्होंने उत्तर दिया, "योहन बपतिस्ता; कुछ लोग कहतें-एलियस; और कुछ लोग कहते हैं-प्राचीन नबियों में से कोई पुनर्जीवित हो गया है"।

20) ईसा ने उन से कहा, "और तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँ?" पेत्रुस ने उत्तर दिया, "ईश्वर के मसीह"।

21) उन्होंने अपने शिष्यों को कड़ी चेतावनी दी कि वे यह बात किसी को भी नहीं बतायें।

22) उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, "मानव पुत्र को बहुत दुःख उठाना होगा; नेताओं, महायाजकों और शास्त्रियों द्वारा ठुकराया जाना, मार डाला जाना और तीसरे दिन जी उठना होगा"।



मनन-चिंतन



‘‘और तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूॅं?’’ यह प्रश्न येसु ने पेत्रुस से पूछा और इस प्रश्न पर हमने कई बार मनन चिंतन किया होगा। यह प्रश्न हम सब के लिए व्यक्तिगत रूप से सवाल करता है कि आखिर येसु ‘मेरे’ लिए कौन है? इस प्रश्न का हम ख्रीस्तीयों का जवाब यहीं होगा कि येसु प्रभु है, जिसकों कभी हम दोस्त के रूप में, सहायक के रूप में या एक मुक्तिदाता के रूप में या किसी अन्य रूप में जानते है। मान लिजिए यदि हम किसी अन्य धर्म में पैदा होते और हम येसु के बारे में दूसरों से सुनते तब हमारा जवाब क्या यही होता कि येसु ही प्रभु है। आइये हम दूसरों के कहने से नहीं परंतु अपने अंर्ततम से विश्वास करें कि येसु ही प्रभु है।




📚 REFLECTION



“But who do you say that I am?” This is the question Peter was asked by Jesus and we too might have reflected on this many times. This question asks us personally that who is Jesus for ‘me’. The answer to this question for us Christians will be Jesus is the God whom we know as a friend, a helper, a Saviour or any other. Imagine if we would have born in some other religion and we would have heard about Jesus from others then whether our answer would have been same that Jesus is the Lord. Let’s believe not by the sayings of others but by our own conviction that Jesus is the Lord.



मनन-चिंतन - 2


प्रभु येसु यह जानना चाहते थे कि तीन साल उनके साथ रहने, उनकी शिक्षा सुनने तथा उनके कार्य देखने के बाद शिष्यों का उनके बारे में क्या विचार था। पेत्रुस ने सभी शिष्यों की ओर से कहा कि आप ईश्वर के मसीह हैं। उस समय के लोग यह सोच रहे थे कि योहन बपतिस्ता, एलियस या पुराने नबियों में कोई येसु के रूप में वापस आया है। उस सोच से हट कर जब शिष्यों ने उनको मसीह के रूप में देखा, तब प्रभु को पता था कि यह पिता ईश्वर ने ही उन पर प्रकट किया है। उस सच्चाई का एक और महत्वपूर्ण पहलू था जिसका ज्ञान शिष्यों के लिए जरूरी था। वह था दुख-भोग का पहलू। मसीह को दुख भोगना, मार डाला जाना तथा तीसरे दिन जी उठना होगा। वे शायद एक विजेता मसीह की ही कल्पना कर पा रहे थे। लेकिन दुख-भोग मसीह के जीवन का अभिन्न अंग था। हम येसु को क्रूस से अलग नहीं कर सकते हैं। हम क्रूसित प्रभु को ही मानते हैं और उन्हीं की हम घोषणा करते हैं।



Jesus wanted to know what the disciples had thought about him after having stayed with him, listened to him and seen his works. Peter, on behalf of the disciples, told him that he was the Christ. The people of that time thought John the Baptist, or Elijah or one of the prophets had come back to life in the person of Jesus. Differing from them when Peter proclaimed him as the Christ of God Jesus understood that the Father had revealed this to them. Yet he wanted them to grasp an important aspect of his messiahship – that of suffering. So he told them that the messiah is to suffer, to die and rise again on the third day. The disciples could think only of a triumphant messiah. But suffering was an indispensable aspect of the life of the messiah. We cannot separate Jesus from the Cross. We believe and proclaim the crucified Lord.


 -Br Biniush Topno


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गुरुवार, 16 सितम्बर, 2021 वर्ष का चौबीसवाँ सामान्य सप्ताह

 

गुरुवार, 16 सितम्बर, 2021

वर्ष का चौबीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : 1तिमथी 4:12-16.


12) तुम्हारी कम उम्र के कारण कोई तुम्हारा तिरस्कार न करे। तुम वचन, कर्म, प्रेम, विश्वास और शुद्धता में विश्वासियों के आदर्श बनो।

13) मेरे आने तक धर्मग्रन्थ का पाठ करने और प्रवचन तथा शिक्षा देने में लगे रहो।

14) उस कृपादान की उपेक्षा मत करो, जो तुम में विद्यमान है और तुम्हें, भविष्यवाणी के अनुसार, अध्यक्ष-समुदाय के हस्तारोपण के समय प्राप्त हो गया है।

15) इन बातों का ध्यान रखों और इन में पूर्ण रूप से लीन रहो, जिससे सब लोग तुम्हारी उन्नति देख सकें।

16) तुम इन बातों में दृढ़ बने रहो। अपने तथा अपनी शिक्षा के विषय में सावधान रहो। ऐसा करने से तुम अपनी तथा अपने श्रोताओं की मुक्ति का कारण बनोगे।



सुसमाचार : सन्त लूकस 7:36-50

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36) किसी फ़रीसी ने ईसा को अपने यहाँ भोजन करने का निमन्त्रण दिया। वे उस फ़रीसी के घर आ कर भोजन करने बैठे।

37) नगर की एक पापिनी स्त्री को यह पता चला कि ईसा फ़रीसी के यहाँ भोजन कर रहे हैं। वह संगमरमर के पात्र में इत्र ले कर आयी

38) और रोती हुई ईसा के चरणों के पास खड़ी हो गयी। उसके आँसू उनके चरण भिगोने लगे, इसलिए उसने उन्हें अपने केशों से पोंछ लिया और उनके चरणो को चूम-चूम कर उन पर इत्र लगाया।

39) जिस फ़रीसी ने ईसा को निमन्त्रण दिया था, उसने यह देख कर मन-ही-मन कहा, "यदि वह आदमी नबी होता, तो जरूर जाना जाता कि जो स्त्री इसे छू रही है, वह कौन और कैसी है-वह तो पापिनी है"।

40) इस पर ईसा ने उस से कहा, "सिमोन, मुझे तुम से कुछ कहना है"। उसने उत्तर दिया, "गुरूवर! कहिए"।

41) "किसी महाजन के दो कर्जदार थे। एक पाँच सौ दीनार का ऋणी था और दूसरा, पचास का।

42) उनके पास कर्ज अदा करने के लिए कुछ नहीं था, इसलिए महाजन ने दोनों को माफ़ कर दिया। उन दोनों में से कौन उसे अधिक प्यार करेगा?"

43) सिमोन ने उत्तर दिया, "मेरी समझ में तो वही, जिसका अधिक ऋण माफ हुआ"। ईसा ने उस से कहा, "तुम्हारा निर्णय सही है।"।

44) तब उन्होंने उस स्त्री की ओर मुड़ कर सिमोन से कहा, "इस स्त्री को देखते हो? मैं तुम्हारे घर आया, तुमने मुझे पैर धोने के लिए पानी नहीं दिया; पर इसने मेरे पैर अपने आँसुओं से धोये और अपने केशों से पोंछे।

45) तुमने मेरा चुम्बन नहीं किया, परन्तु यह जब से भीतर आयी है, मेरे पैर चूमती रही है।

46) तुमने मेरे सिर में तेल नहीं लगाया, पर इसने मेरे पैरों पर इत्र लगाया है।

47) इसलिए मैं तुम से कहता हूँ, इसके बहुत-से पाप क्षमा हो गये हैं, क्योंकि इसने बहुत प्यार दिखाया है। पर जिसे कम क्षमा किया गया, वह कम प्यार दिखाता है।"

48) तब ईसा ने उस स्त्री से कहा, "तुम्हारे पाप क्षमा हो गये हैं"।

49) साथ भोजन करने वाले मन-ही-मन कहने लगे, "यह कौन है जो पापों को भी क्षमा करता है?"

50) पर ईसा ने उस स्त्री से कहा, "तुम्हारे विश्वास ने तुम्हारा उद्धार किया है। शान्ति प्राप्त कर जाओ।"



📚 मनन-चिंतन



जब हम पाप करते है तो हम न केवल अपने लिए दुख लाते है परंतु हम तीन रिश्तों में दरार भी ले आते है। वह है स्वयं और ईश्वर के बीच में रिश्ता, स्वयं और दूसरे व्यक्ति के बीच में रिश्ता और अपने स्वयं के बीच में रिश्ता। एक बार यह रिश्ते में दरार आ जाये ंतो यह इतने आसानी से नहीं जुड़ता। यह तभी जुड़ सकता है जब हमारे पापों को क्षमा मिल जाये।

पापों को क्षमा करने का अधिकार येसु के पास है जिसे वे अर्ध्दांगरोगी की घटना में स्पष्ट भी करते है, ‘‘किन्तु इसलिए कि तुम लोग यह जान लो कि मानव पुत्र को पृथ्वी पर पाप क्षमा करने का अधिकार मिला है - तब वे अर्ध्दांगरोगी से बोले - ‘उठो और अपनी खाट उठा कर घर जाओ’।’’ (मत्ती 9ः6)।

आज के सुसमाचार में प्रभु येसु एक पापिनी स्त्री के पापों को क्षमा करते है जो अपने ऑंसू से येसु के चरणों को भिंगोती है और अपने केशों से पोंछने के बाद उनके चरणों को चूमकर और उन पर इत्र लगाती है। उसका इस प्रकार का व्यवहार अपने पापों के प्रति पश्च्ताप को दर्शाता है। एक सच्चा पश्चाताप हमारे जीवन में परिवर्तन ला सकता है। सबसे पहले तो हमें प्रभु येसु की क्षमा प्राप्त होती है और हमारे तीनों रिश्तों को जोड़ती है जिससे हमारे अंदर खोया हुआ आनंद और शांति फिर से लौट आता है। हम जब कभी भी येसु के पास जाये एक पश्चातापी हृदय लेकर येसु के पास जायें जिससे हम उसके क्षमा और आशिषांे को अपने जीवन में ग्रहण कर सकें।



📚 REFLECTION



When we sin then we not only bring sorrows to ourselves but also bring the breakage in three relationships; and that is relationship between oneself and God, relationship between oneself and others and relationship between oneself. Once the breakage comes in this relationship it is not easy to restore it. It can be restored only when we receive forgiveness or absolution for our sins.

Jesus has the authority to forgive sins which he makes it clear in the incident of paralyzed man where Jesus says, “But I want you to know that the Son of Man has authority on earth to forgive sins. So he said to the paralyzed man, ‘Get up, take your mat and go home.’”

In today’s gospel Jesus forgives the sins of a woman who bathe his feet with her tears and drying them with her hair continued kissing his feet and anointed them with the ointment. This kind of behavior of hers demonstrates the true repentance for her sins. A true repentance can bring change in our lives. First thing what we receive is forgiveness from Jesus which restores the three relationships which brings back the lost inner peace and joy back to us. Whenever we go to Jesus we must always go with a repentant heart so that we can receive forgiveness and graces in our lives.


 -Br Biniush Topno


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बुधवार, 15 सितम्बर, 2021 दु:खी कुँवारी मरिया

 

बुधवार, 15 सितम्बर, 2021

दु:खी कुँवारी मरिया

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पहला पाठ : इब्रानियो 5:7-9


7) मसीह ने इस पृथ्वी पर रहते समय पुकार-पुकार कर और आँसू बहा कर ईश्वर से, जो उन्हें मृत्यु से बचा सकता था, प्रार्थना और अनुनय-विनय की। श्रद्धालुता के कारण उनकी प्रार्थना सुनी गयी।

8) ईश्वर का पुत्र होने पर भी उन्होंने दुःख सह कर आज्ञापालन सीखा।

9 (9-10) वह पूर्ण रूप से सिद्ध बन कर और ईश्वर से मेलखि़सेदेक की तरह प्रधानयाजक की उपाधि प्राप्त कर उन सबों के लिए मुक्ति के स्रोत बन गये, जो उनकी आज्ञाओं का पालन करते हैं।



सुसमाचार : योहन 19:25-27


25) ईसा की माता, उसकी बहिन, क्लोपस की पत्नि मरियम और मरियम मगदलेना उनके कू्रस के पास खडी थीं।

26) ईसा ने अपनी माता को और उनके पास अपने उस शिष्य को, जिसे वह प्यार करते थे देखा। उन्होंने अपनी माता से कहा, "भद्रे! यह आपका पुत्र है"।

27) इसके बाद उन्होंने उस शिष्य से कहा, "यह तुम्हारी माता है"। उस समय से उस शिष्य ने उसे अपने यहाँ आश्रय दिया।



अथवा - सुसमाचार : लूकस 2:33-35.


33) बालक के विषय में ये बातें सुन कर उसके माता-पिता अचम्भे में पड़ गये।

34) सिमेयोन ने उन्हें आशीर्वाद दिया और उसकी माता मरियम से यह कहा, "देखिए, इस बालक के कारण इस्राएल में बहुतों का पतन और उत्थान होगा। यह एक चिन्ह है जिसका विरोध किया जायेगा।

35) इस प्रकार बहुत-से हृदयों के विचार प्रकट होंगे और एक तलवार आपके हृदय को आर-पार बेधेगी।


📚 मनन-चिंतन



जिस प्रकार हमने कल पवित्र कू्रस के विजयोत्सव का पर्व मनाया जिसमें प्रभु येसु ने कू्रस पर घोर पीड़ा और दुख भोग कर हमारे लिए मुक्ति का द्वार खोल दिया; आज हम प्रभु येसु और हम सबकी माता मरियम के दुखी क्षणों को याद करते हुए दुखी कुॅंवारी मरियम का पर्व मनाते है।

एक मॉं और बच्चे का रिश्ता बहुत ही प्यारा और गहराई से जुड़ा रहता है। यदि बच्चे को चोट लगती है तो मॉं को दर्द होता है और जब मॉं को दर्द होता है तो बच्चा व्याकुल हो जाता है। मरियम प्रभु येसु की मॉं का जीवन इतना आसान नहीं था। उन्हे हर प्रकार के दुख, तखलीफ और समस्या से गुजरना पड़ा विशेषकर येसु की मॉं बनने की सहमति के बाद से; कुॅवारी गर्भवति होने पर लोगों की बातो से, गर्भवति होने पर यात्रा करना, प्रसव के लिए स्थान न मिल पाना, मिस्र की ओर प्रस्थान करना, इत्यादि परंतु इन सबसे गहरा दुख जो उन्होने सहा वह है प्रभु येसु अपने पुत्र का कोढ़ों से मारा जाना, येसु द्वारा सबके सामने एक अपराधी के समान कू्रस ढोना, तथा येसु को नग्न बदन कू्रस पर मरते हुए देखना।

इस घोर दुख के विषय में सिमेयोन ने मरियम से कहा था, ‘‘देखिए, इस बालक के कारण........ एक तलवार आपके हृदय को आर-पार बेधेगी।’’ जिस प्रकार बच्चे को चोट पड़ने पर मॉ को दर्द होता है, ठीक उसी प्रकार चोट तो येसु को लग रही थी परंतु उसका दर्द मरियम महसूस कर रही थी। और यह चोट केवल शरीरिक चोट नहीं परंतु मानसिक भी थी। किसी मॉं के लिए अपने बच्चे को इस प्रकार मरते हुये देखना और विशेषकर के जब उस बच्चें की कोई गलती या गुनाह न हो यह बहुत ही असहनीय दुख है जिसे मरियम ने इस संसार में रहते हुए सहा।

आज का पर्व के द्वारा हम सब येसु के दुख और दर्द को समझकर, येसु के पथ पर चलने से जीवन में आनी वाली सभी पिड़ाओं को मॉं मरियम के समान सहनने में मदद मिले। आमेन!



📚 REFLECTION



Just as we celebrated yesterday the feast of Exaltation of the Holy Cross which tells about the excruciating pain and sorrow which Jesus bore on the cross for opening the door of salvation for us; today we celebrate the feast of Our Lady of Sorrows remembering the sorrowful moments of Mary, the mother of Jesus and our mother too.

The relationship of a mother and a child is a beautiful one and is deeply connected with each other. If the child gets hurt mother feels the pain and when mother gets pain child becomes anxious. The life of Mary, the mother of Jesus was not an easy one. She had to undergo sorrow, troubles and problems specially after giving the consent to become the mother of the Lord; the gossips of people about the virginal conception, to travel during the time of pregnancy, not getting the place during the time of delivery, fleeing to Egypt and so on. But the most excruciating sorrow which she bore was flogging of Jesus his son, carrying of the cross by his son as a criminal and seeing him dying naked on the Cross.

Simeon had told about this excruciating pain, “This child is destined to cause the falling and rising of many in Israel …. And a sword will pierce your own soul too.” Just as the mother feels the pain when her child gets hurt, similarly Jesus was getting hurt but Mary was feeling that pain; and this pain was not only physical but also mental pain. To see her own child dying like this specially when that child is innocent and has done no wrong is an intolerable sorrow for a mother which Virgin Mary bore in this world.

Understanding the pain and sorrow of Jesus through today’s feast may help us to bear like Mother Mary all kinds of suffering in following Jesus. Amen!



 -Br Biniush Topno


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मंगलवार, 14 सितम्बर, 2021 पवित्र क्रूस का विजयोत्सव : पर्व

 

मंगलवार, 14 सितम्बर, 2021

पवित्र क्रूस का विजयोत्सव : पर्व



पहला पाठ : गणना ग्रन्थ 4b-9


4) यात्रा करते-करते लोगों का धैर्य टूट गया

5) और वे यह कहते हुए ईश्वर और मूसा के विरुद्ध भुनभुनाने लगे, ''आप हमें मिस्र देश से निकाल कर यहाँ मरुभूमि में मरने के लिए क्यों ले आये हैं? यहाँ न तो रोटी मिलती है और न पानी। हम इस रूखे-सूखे भोजन से ऊब गये हैं।''

6) प्रभु ने लोगों के बीच विषैले साँप भेजे और उनके दंष से बहुत-से इस्राएली मर गये।

7) तब लोग मूसा के पास आये और बोले, ''हमने पाप किया। हम प्रभु के विरुद्ध और आपके विरुद्ध भुनभुनाये। प्रभु से प्रार्थना कीजिए कि वह हमारे बीच से साँपों को हटा दे।'' मूसा ने जनता के लिए प्रभु से प्रार्थना की

8) और प्रभु ने मूसा से कहा, ''काँसे का साँप बनवाओ और उसे डण्डे पर लगाओ। जो साँप द्वारा काटा गया, वह उसकी ओर दृष्टि डाले और वह अच्छा हो जायेगा।''

9) मूसा ने काँसे का साँप बनवाया और उसे डण्डे पर लगा दिया। जब किसी को साँप काटता था, तो वह काँसे के साँप की ओर दृष्टि डाल कर अच्छा हो जाता था।



सुसमाचार : सन्त योहन 3:13-17


13) मानव पुत्र स्वर्ग से उतरा है। उसके सिवा कोई भी स्वर्ग नहीं पहुँचा।

14) जिस तरह मूसा ने मरुभूमि में साँप को ऊपर उठाया था, उसी तरह मानव पुत्र को भी ऊपर उठाया जाना है,

15) जिससे जो उस में विश्वास करता है, वह अनन्त जीवन प्राप्त करे।’’

16) ईश्वर ने संसार को इतना प्यार किया कि उसने इसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उस में विश्वास करता हे, उसका सर्वनाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन प्राप्त करे।

17) ईश्वर ने अपने पुत्र को संसार मं इसलिए नहीं भेजा कि वह संसार को दोषी ठहराये। उसने उसे इसलिए भेजा कि संसार उसके द्वारा मुक्ति प्राप्त करे।



📚 मनन-चिंतन


आज माता कलीसिया पवित्र कू्रस के विजयोत्सव का पर्व मनाती है। संत पौलुस 1 कुरिंथ 1ः18 में कहते है, ‘‘जो विनाश के मार्ग पर चलते है, वे कू्रस की शिक्षा को मूर्खता समझते हैं। किन्तु हम लोगों के लिए, जो मुक्ति के मार्ग पर चलते हैं, वह ईश्वर का सामर्थ्य है।’’ क्रूस इस दुनिया की नजर में एक प्रकार का शर्म, अपमान, कमजोरी, बोझ, दण्ड या हार का प्रतीक हो सकता है परंतु यह कू्रस विश्वासियों के लिए एक वरदान है, सामर्थ्य है क्योंकि इसी कू्रस के द्वारा येसु ने मृत्यु को पराजित किया और हमारे लिए मुक्ति का द्वार खोल दिया था।

प्रभु येसु के बारे में संत योहन लिखते है, ‘‘जिस तरह मूसा ने मरुभूमि में सॉंप को ऊपर उठाया था, उसी तरह मानव पुत्र को भी ऊपर उठाया जाना है।’’ यह उस घटना को बतलाता है जब ईश्वर के प्रति भुनभुनाने के कारण इस्राएली जनता को सॉंप ने कॉंटा और वही लोग अच्छे होते थे जो वह कॉंसे के सॉंप की ओर दृष्टि डालते थे जिसे मूसा नें ईश्वर के कहने पर बनवाया था। यह एक प्रकार का प्रतीक है कि कौन जीवन में उद्धार पायेगा, वहीं जो अपनी दृष्टि अर्थात् अपना विश्वास कू्रसित प्रभु पर लगायेगा।

एक राज्य दूसरे राज्य पर या एक देश दूसरे देश पर विजय पाने के लिए तलवार, भाला, बन्दूक, मिसाईल, परमाणु बम या वायरस का उपयोग करते है; परंतु प्रभु येसु ने उसी कू्रस का उपयोग किया जो उन्हें मृत्यु दण्ड देने या उन्हे परास्त करने के लिए प्रयोग में लाया गया। येसु ने उसी क्रूस को विजय पाने के लिए अपनाया। यह हम सब के लिए एक उदाहरण बना कि किस प्रकार हम भी शैतान और उसके प्रपंचों पर विजय पा सकते है।

प्रभु येसु कहते है जो मेरा अनुसरण करना चाहता है, वह आत्मत्याग करे और अपना कू्रस उठा कर मेरे पीछे हो ले। क्योंकि जो अपना जीवन सुरक्षित रखना चाहता है, वह उसे खो देगा और जो मेरे कारण अपना जीवन खो देता है, वह उसे सुरक्षित रखेगा। इस जीवन का कू्रस हम सब केे लिए आने वाले जीवन के लिए एक प्रकार से सहायक है। प्रभु येसु का पवित्र कू्रस एक माध्यम बना हमारे और पिता ईश्वर के बीच के उस फासले को मिटाने के लिए जो हमारे पापों के कारण आया था। पवित्र कू्रस का विजयोत्सव हम सभी को उत्सह उमंग और जोश से भर दे जिससे हम भी प्रभु का अनुसरण करते हुए अपने पापमय स्वभाव, बुराईयों एवं कमजोरियों पर विजय पा सकें।



📚 REFLECTION



Today the Catholic Church celebrates the feast Exaltation of the Holy Cross. St Paul’s says in 1 Cor. 1:18, “For the message of the cross is foolishness to those who are perishing, but to us who are being saved it is the power of God.” In the world’s view the Cross may be a sign of shame, insult, weakness, burden, punishment or defeat but for the believers this is cross is a gift, a power because by this cross Jesus gained victory over death and opened for us the door of salvation.

St. John’s write about Lord Jesus, “Just as Moses lifted up the snake in the wilderness, so the Son of Man must be lifted up, that everyone who believes may have eternal life in him.” This tells about that incident when Israelites murmered against God and got bitten by the snakes and those who looked at the bronze snake made by the Moses as said by God were healed and lived. This is one kind of sign that who all will be saved, only those who put there eyes or faith upon the crucified Lord will be saved.

To gain victory over the other kingdom or country, one kingdom or country uses the weapons like sword, spear, guns, missile, parmandu bomb or virus; but Lord Jesus used the same cross which was used to punish him or defeat him. He accepted the same cross to gain victory. This became an example for us that how we can too gain victory over Satan and its delusions.

Lord Jesus says whoever wants to be my disciples must deny themselves and take up their cross and follow me. For whoever wants to save their life will lose it, but whoever loses their life for me will find it. The cross of this life is one kind of help for us for the coming life. The holy cross of Jesus became a medium to remove that distance between Father Almighty and us which was created by our sins. May the feast of Exaltation of the Holy Cross fill us with zeal, joy and enthusiasm so that following Jesus we may also gain victory over our sinful nature, vices and weakness.


 -Br Biniush Topno


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