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बुधवार, 18 अगस्त, 2021

 

बुधवार, 18 अगस्त, 2021

वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : न्यायकर्ताओं 9:6-15



6) इसके बाद सिखेम और बेत-मिल्लों के सब नागरिक सिखेम के बड़े पत्थर के निकट, बलूत वृक्ष के पास एकत्र हो गये और उन्होंने अबीमेलेक को राजा घोषित किया।

7) जब योताम को इसकी सूचना मिली, तो वह जा कर गरिज़्ज़ीम पर्वत के षिखर पर खड़ा हो गया। उसने ऊँचे स्वर से लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा, ’’सिखेम के नागरिको! मेरी बात सुनो, जिससे प्रभु तुम लोगों की बात सुने।

8) वृक्ष किसी दिन अपने राजा का अभिशेक करने निकले। वे जैतून के पेड़ से बोले, ‘आप हमारे राजा बन जाइए’।

9) किन्तु जैतून वृक्ष ने उन्हें यह उत्तर दिया, ’यह क्या! मैं वृक्षों पर राज्य करने के लिए अपना यह तेल क्यों छोड़ दूँ, जिसके द्वारा देवताओं और मनुष्यों का सम्मान किया जाता है?

10) तब वृक्ष अंजीर के पेड़ से बोले, ’आप हमारे राजा बन जाइए’।

11) किन्तु अंजीर वृक्ष ने उन्हें यह उत्तर दिया, ‘यह क्या! मैं वृक्षों पर राज्य करने के लिए अपना बढ़िया मधुर फल क्यों छोड़ दूँ?’

12) इसके बाद वृक्ष अंगूर के पेड़ से बोले, ’आप हमारे राजा बन जाइए’

13) और अंगूर के पेड़ ने उन्हें यह उत्तर दिया, ’यह क्या! मैं वृक्षों पर राज्य करने के लिए अपना यह रस क्यों छोड़ दूँ, जो देवताओं और मनुष्यों का आनन्दित करता है?-

14) ’’तब सब वृक्ष कँटीले झाड़ से बोले, ’आप हमारे राजा बन जाइए’।

15) कँटीले झाड़ ने वृक्षों को यह उत्तर दिया, ’यदि तुम लोग सचमुच अपने राजा के रूप में मेरा अभिशेक करना चाहते हो, तो मेरी छाया की षरण लेने आओ। नहीं तो, कँटीले झाड़ से आग निकलेगी और लेबानोन के देवदार वृक्षों को भी भस्म कर देगी।’



सुसमाचार : सन्त मत्ती 20:1-16



1) ’’स्वर्ग का राज्य उस भूमिधर के सदृश है, जो अपनी दाखबारी में मज़दूरों को लगाने के लिए बहुत सबेरे घर से निकला।

2) उसने मज़दूरों के साथ एक दीनार का रोज़ाना तय किया और उन्हें अपनी दाखबारी भेजा।

3) लगभग पहले पहर वह बाहर निकला और उसने दूसरों को चैक में बेकार खड़ा देख कर

4) कहा, ’तुम लोग भी मेरी दाखबारी जाओ, मैं तुम्हें उचित मज़दूरी दे दूँगा’ और वे वहाँ गये।

5) लगभग दूसरे और तीसरे पहर भी उसने बाहर निकल कर ऐसा ही किया।

6) वह एक घण्टा दिन रहे फिर बाहर निकला और वहाँ दूसरों को खड़ा देख कर उन से बोला, ’तुम लोग यहाँ दिन भर क्यों बेकार खड़े हो’

7) उन्होंने उत्तर दिया, ’इसलिए कि किसी ने हमें मज़दूरी में नहीं लगाया’ उसने उन से कहा, ’तुम लोग भी मेरी दाखबारी जाओ।

8) ’’सन्ध्या होने पर दाखबारी के मालिक ने अपने कारिन्दों से कहा, ’मज़दूरों को बुलाओ। बाद में आने वालों से ले कर पहले आने वालों तक, सब को मज़दूरी दे दो’।

9) जब वे मज़दूर आये, जो एक घण्टा दिन रहे काम पर लगाये गये थे, तो उन्हें एक एक दीनार मिला।

10) जब पहले मज़दूर आये, तो वे समझ रहे थे कि हमें अधिक मिलेगा; लेकिन उन्हें भी एक-एक दीनार ही मिला।

11) उसे पाकर वे यह कहते हुए भूमिधर के विरुद्ध भुनभुनाते थे,

12) इन पिछले मज़दूरों ने केवल घण्टे भर काम किया। तब भी आपने इन्हें हमारे बराबर बना दिया, जो दिन भर कठोर परिश्रम करते और धूप सहते रहे।’

13) उसने उन में से एक को यह कहते हुए उत्तर दिया, ’भई! मैं तुम्हारे साथ अन्याय नहीं कर रहा हूँ। क्या तुमने मेरे साथ एक दीनार नहीं तय किया था?

14) अपनी मजदूरी लो और जाओ। मैं इस पिछले मजदूर को भी तुम्हारे जितना देना चाहता हूँ।

15) क्या मैं अपनी इच्छा के अनुसार अपनी सम्पत्ति का उपयोग नहीं कर सकता? तुम मेरी उदारता पर क्यों जलते हो?

16) इस प्रकार जो पिछले हैं, अगले हो जायेंगे और जो अगले है, पिछले हो जायेंगे।’’



📚 मनन-चिंतन


आज का दृष्टान्त येसु के उन दृष्टान्तों में से एक है जिस पर लोग अक्सर नकारात्मक प्रतिक्रिया देते हैं। ऐसा माना जाता है कि जिन मजदूरों ने दिनभर मेहनत की उनके साथ जिन्होंने एक घंटे तक काम किया उनकी तुलना में अन्याय हुआ क्योंकि सबों को सामान वेतन दिया गया था। हालांकि, मालिक ने पूरे दिन काम करने वालों के साथ अन्याय नहीं किया; उसने उन्हें एक दिन के काम के लिए एक दिन की मजदूरी दी। कहानी में आश्चर्य की बात यह है कि नियोक्ता उन लोगों के साथ असाधारण रूप से उदार था जिन्होंने एक घंटे तक काम किया। साथ ही उन्हें एक दिन का वेतन भी देता है। उसने किसी के साथ कोई अन्याय नहीं किया गया, लेकिन कुछ मज़दूर आश्चर्यजनक और असाधारण उदारता के हितग्राही बने थे यह कुछ लोगों के लिए एक प्रकार से अचरज और जलन का कारण बन गया था।

इस दृष्टान्त की शुरूआत इस वाक्यांश के साथ होती है - 'स्वर्ग का राज्य ऐसा है...' कहानी की दुनिया में ईश्वर का संसार परिलक्षित होता है; नियोक्ता का चरित्र किसी न किसी रूप में ईश्वर को दर्शाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि येसु कह रहे हैं कि ईश्वर की उदारता हमें हमेशा आश्चर्यचकित करेगी। हमारे साथ व्यवहार करने का ईश्वर का तरीका उस सीमा को तोड़ देता है जिसे मनुष्य न्यायसंगत और उचित समझेंगे। ईश्वर हमारे लिए जो कुछ करता है वह उससे कहीं अधिक है जो हम ईश्वर के लिए कर सकते हैं। हमने जो कमाया है या जिसके लायक है, उसके आधार पर ईश्वर हमसे सम्बन्ध या नाता रखता। ईश्वर का उदार प्रेम एक शुद्ध उपहार है; यह किये गए श्रम का पुरस्कार नहीं है। हम दिन के एक छोर से दूसरे छोर तक प्रभु की सेवा करते हैं, न कि उसका प्यार हासिल करने या अर्जित करने के लिए, बल्कि उस प्यार के लिए आभारी प्रतिक्रिया के रूप में।



📚 REFLECTION



This is one of the parables of Jesus that people often react negatively to. There is a feeling that the workers who worked all done were hard done by because those who worked for the last hour were given the same wage. However, in the world of the story, the employer did not treat those who worked all day unjustly; he gave them a day’s wages for a day’s work. The surprise in the story is that the employer was exceptionally generous with those who worked for an hour, giving them a day’s wages as well. No injustice was done to anyone, but some of the workers were the recipients of a surprising and extravagant generosity.

Jesus began this parable, with the phrase, ‘the kingdom of heaven is like…’ The world of God is reflected in the world of the story; the character of the employer reflects God in some way. Jesus appears to be saying that God’s generosity will always take us by surprise. God’s way of dealing with us breaks the bounds of what humans would consider just and fair. What God does for us far exceeds what we might do for God. God does not relate to us on the basis of what we have earned or deserved. God’s generous love is pure gift; it is not a reward for labour rendered. We serve the Lord from one end of the day to the other not to gain or earn his love but in grateful response for the love already given to us long before we could do anything.



 -Br Biniush topno


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मंगलवार, 17 अगस्त, 2021 वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह

 

मंगलवार, 17 अगस्त, 2021

वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : न्यायकर्ताओं 6:11-24



11) प्रभु का दूत आया और ओफ्ऱा के बलूत वृक्ष के नीचे बैठ गया। यह वृक्ष अबीएजे़र-वंशी योआश का था। योआश का पुत्र गिदओन इसलिए अंगूर पेरने के कोल्हू में गेहूँ दाँव रहा था कि वह उसे मिदयानियों से छिपा कर रखे।

12) प्रभु का दूत उसे दिखाई दिया और बोला, "वीर योद्धा! प्रभु तुम्हारे साथ है"।

13) गिदओन ने उत्तर दिया, "क्षमा करें, महोदय! यदि प्रभु हमारे साथ हैं, तो यह सब हम पर क्यों बीती? वे सब चमत्कार कहाँ गये, जिनका वर्णन हमारे पूर्वज यह कहते हुए करते थे- ‘प्रभु ने हमें मिस्र से निकाल लसश्स’? अब तो प्रभु ने हमें छोड़ कर मिदयानियों के हवाले कर दिया।

14) प्रभु ने उसे सम्बोधित करते हुए कहा, "तुम मिदयानियों से युद्ध करने जाओ। तुम अपनी शक्ति के बल पर इस्राएल को उनके हाथ से बचा सकते हो। मैं ही तुम को भेज रहा हूँ।"

15) गिदओन ने उत्तर दिया, "क्षमा करें, महोदय! मैं इस्राएल को कैसे बचा सकता हूँ? मेरा कुल मनस्से में सब से दरिद्र है और मैं अपने पिता के घराने में सब से छोटा हूँ।"

16) किन्तु प्रभु ने कहा, "मैं तुम्हारे साथ रहूँगा। तुम मिदयानियों को पराजित करोगे, मानो वे एक ही आदमी हों।"

17) गिदओन ने निवेदन किया, "यदि मुझ पर आपकी कृपादृष्टि हो, तो मुझे एक ऐसा चिन्ह दीजिए, जिससे मैं जान सकूँ कि

18) आप ही मुझ से बोल रहे हैं। आप कृपया यहाँ से तब तक न जायें, जब तक मैं आपके पास न लौट आऊँ। मैं अपना चढ़ावा ले कर आऊँगा और आपके सामने रखूँगा।" उसने उत्तर दिया, "मैं तुम्हारे लौटने तक यहाँ रहूँगा"।

19) गिदओन ने जा कर बकरी का एक बच्चा पकाया और आधा मन मैदे की बे-ख़मीर रोटियाँ बनायी। उसने एक टोकरी में मांस रखा और एक पात्र में षोरबा उँड़ेला। फिर उसने इन्हें ले जा कर बलूत के नीचे स्वर्गदूत के सामने रख दिया।

20) प्रभु के दूत ने उस से कहा, "मांस और रोटियाँ वहाँ चट्टान पर रखो और उन पर षोरबा उँड़ेल दो"। उसने यही किया।

21) तब प्रभु के दूत ने अपने हाथ का डण्डा बढ़ा कर उसके सिरे से मांस और बेख़मीर रोटियों को स्पर्श किया। इस पर चट्टान से आग निकली, जिसने मांस और बेख़मीर रोटियों को भस्म कर दिया और प्रभु का दूत गिदओन की आँख से ओझल हो गया।

22) तब गिदओन समझ गया कि वह प्रभु का दूत था और उसने कहा, "हाय! प्रभु-ईश्वर! मैंने प्रभु के दूत को आमने-सामने देखा है।"

23) किन्तु प्रभु ने उसे आश्वासन दिया, "तुम्हें शान्ति मिले! मत डरो। तुम नहीं मरोगे।"

24) गिदओन ने वहाँ प्रभु के लिए एक वेदी बनायी और उसका नाम ‘प्रभु-शांति’ रखा। वह अबीएज़ेर के वंशजों के ओफ्ऱा में आज तक विद्यमान है।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 19:23-30



23) तब ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, "मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ - धनी के लिए स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना कठिन होगा।

24) मैं यह भी कहता हूँ कि सूई के नाके से हो कर ऊँट का निकलना अधिक सहज है, किन्तु धनी का ईश्वर के राज्य में प्रवेश करना कठिन है।"

25) यह सुनकर शिष्य बहुत अधिक विस्मित हो गये और बोले, "तो फिर कौन बच सकता है।"

26) उन्हें स्थिर दृष्टि से देखते हुए ईसा ने कहा, "मनुष्यों के लिए तो यह असम्भव है। ईश्वर के लिए सब कुछ सम्भव है।"

27) तब पेत्रुस ने ईसा से कहा, "देखिए, हम लोग अपना सब कुछ छोड़ कर आपके अनुयायी बन गये हैं। तो, हमें क्या मिलेगा?"

28) ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, "मैं तुम, अपने अनुयायियों से यह कहता हूँ - मानव पुत्र जब पुनरुत्थान में अपने महिमामय सिहांसन पर विराजमान होगा, तब तुम लोग भी बारह सिंहासनों पर बैठ कर इस्राएल के बारह वंशों का न्याय करोगे।

29) और जिसने मेरे लिए घर, भाई-बहनों, माता-पिता, पत्नी, बाल-बच्चों अथवा खेतों को छोड दिया है, वह सौ गुना पायेगा और अनन्त जीवन का अधिकारी होगा।

30) बहुत-से लोग, जो अगले हैं, पिछले हो जायेंगे और जो पिछले हैं, अगले हो जायेंगे।



📚 मनन-चिंतन



कल के सुसमाचार में अमीर युवक ने अपनी संपत्ति के प्रति लगाव के कारण, अनन्त जीवन प्राप्त करने की अपनी महान इच्छा के बावजूद, येसु का अनुसरण करना असंभव पाया। यही कारण है कि आज के सुसमाचार में येसु आगे कहते हैं, 'स्वर्ग के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊंट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है। येसु के इस कठोर कथन ने शिष्यों को चकित कर दिया और उन्हें लगभग निराशाजनक प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित किया, 'फिर कौन बच सकता है?' वे ये कहते प्रतीत होते हैं, कि न केवल उस अमीर, युवक के लिए जो आपके पास आया था परन्तु किसी के लिए भी स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना लगभग असंभव होगा। यीशु ने उनकी नकारात्मक सोच को एक बहुत ही आशावादी कथन के साथ काट दिया, 'मनुष्यों के लिए यह असंभव है; ईश्वर के लिए सब कुछ संभव है'।

येसु कह रहे हैं कि हमारे अंतिम मुकाम पर पहुंचना हमारे कर्मों से ज्यादा ईश्वर का काम है; यह हमारे प्रयासों से अधिक ईश्वर की कृपा के कारण संभव है। एफीसियों को लिखे पत्र की भाषा में- इस प्रकार आप लोग, ईश्वर की पूर्णता तक पहुँच कर, स्वयं परिपूर्ण हो जायेंगे। जिसका सामर्थ्य हम में क्रियाशील है और जो वे सब कार्य सम्पन्न कर सकता है, जो हमारी प्रार्थना और कल्पना से अत्यधिक परे है,। (एफेसियों 3:20)

जब हम अपने आप में कमज़ोर होते हैं और महसूस करते हैं कि यात्रा हमारी यह दुनयाई यात्रा बहुत भारी है, तब हमें खुद को इस महान सत्य की याद दिलाना होगा। संत पौलुस ने जेल से एक पत्र में घोषणा की,जो मुझे बल प्रदान करते हैं, मैं उनकी सहायता से सब कुछ कर सकता हूँ।(फिलिपियों 4:13) हमें उन संसाधनों पर अपना भरोसा बनाए रखने की आवश्यकता है जो प्रभु हमें हमेशा हमें प्रदान करते हैं और जिनकी हमें बहुत आवश्यकता है।




📚 REFLECTION




In yesterday’s gospel reading the rich young man found it impossible to follow Jesus because of his attachment to his possessions, in spite of his great desire to inherit eternal life. That is why Jesus goes on to say in this morning’s gospel reading, ‘it is easier for a camel to pass through the eye of an needle than for a rich man to enter the kingdom of kingdom of heaven. This stark statement of Jesus left the disciples astonished and led them to ask the almost despairing question, ‘Who then can be saved?’ They seem to be saying, ‘it must be nearly impossible for anyone to enter the kingdom o heaven, not just that rich, good man who approached you’. Jesus cuts across their negative thinking with a very hopeful statement, ‘for men this is impossible; for God everything is possible’.

Jesus is saying that arriving at our ultimate destiny is more God’s doing than our doing; it is due more to God’s grace than to our efforts. In the language of the letter to the Ephesians, God’s ‘power at work within us is able to accomplish abundantly far more than all we can ask or imagine’. It is above all when we are low in ourselves and feel the journey is too much for us that we need to remind ourselves of this great truth. Saint Paul declared in a letter from prison, ‘I can do all things in him who gives me strength’. We need to keep putting our trust in the resources the Lord is always giving us and which we need so much.


 -Br Biniush topno


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सोमवार, 16 अगस्त, 2021

 

सोमवार, 16 अगस्त, 2021

वर्ष का बीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : न्यायकर्ताओं 2:11-19



11) तब इस्राएलियों ने वही किया, जो प्रभु की दृष्टि में बुरा है और वे बाल-देवताओं की पूजा करने लगे।

12) उन्होंने प्रभु को, अपने पूर्वजों के ईश्वर को, जो उन्हें मिस्र से निकाल लाया था, त्याग दिया। वे अपने आसपास रहने वाले लोगों के देवताओं के अनुयायी बन कर उनकी पूजा करने लगे। उन्होंने प्रभु को अप्रसन्न कर दिया।

13) वे प्रभु को त्याग कर बाल और अष्तारता-देवियों की पूजा करने लगे।

14) तब प्रभु का कोप इस्राएलियों के विरुद्ध भड़क उठा। उसने उन्हें छापामारों के हवाले कर दिया, जो उन्हें लूटने लगे। उसने उन्हें उनके षत्रुओं के हाथ बेच दिया और वे उनका सामना करने में असमर्थ रहे।

15) जब वे युद्ध करने निकलते, तो पराजित हो जाते थे; क्योंकि प्रभु उनके विरुद्ध था, जैसी कि उसने षपथ खा कर उन्हें चेतावनी दी थी।

16) जब इस्राएलियों की दुर्गति बहुत अधिक बढ़ जाती थी, तो प्रभु न्यायकर्ताओं को नियुक्त किया करता था, जो उन्हें लूटने वालों के हाथ से बचाया करते थे।

17) किन्तु वे न्यायकर्ताओं की बात नहीं मानते और पथभ्रष्ट हो कर पराये देवताओं की पूजा और उपासना करते थे। वे प्रभु की आज्ञा पर चलने वाले अपने पूर्वजों का मार्ग षीघ्र ही छोड़ देते थे। वे अपने पूर्वजों का अनुकरण नहीं करते थे।

18) जब प्रभु उनके लिए कोई न्यायकर्ता नियुक्त करता था, तो प्रभु उसका साथ देता और जब तक न्यायकर्ता जीता रहता था, तब तक प्रभु इस्राएलियों को उनके षत्रुओं के हाथ से बचाया करता था; क्योंकि जब वे अपने अत्याचारियों के दुव्र्यवहार से पीड़ित हो कर कराहते थे, तो प्रभु को उन पर तरस आता था।

19) परन्तु जब वह न्यायकर्ता मर जाता था, तो वे षीघ्र ही अपने पूर्वजों से भी अधिक घोर पाप करते थे। वे पराये देवताओं के अनुयायी बन कर उनकी पूजा और उपासना करते थे। उन्होंने अपनी पुरानी आदतें और हठीला व्यवहार कभी नहीं छोड़ा।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 19:16-22



16) एक व्यक्ति ईसा के पास आ कर बोला, ’’गुरुवर! अनन्त जीवन प्राप्त करने के लिए मैं कौन-सा भला कार्य करूँ?’’

17) ईसा ने उत्तर दिया, ’’भले के विषय में मुझ से क्यों पूछते हो? एक ही तो भला है। यदि तुम जीवन में प्रवेश करना चाहते हो, तो आज्ञाओं का पालन करो।’’

18) उसने पूछा, ’’कौन-सी आज्ञाएं?’’ ईसा ने कहा, ’’हत्या मत करो; व्यभिचार मत करो; चोरी मत करो; झूठी गवाही मत दो;

19) अपने माता पिता का आदर करो; और अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो’’।

20) नवयुवक ने उन से कहा, ’’मैने इन सब का पालन किया है। मुझ में किस बात की कमी है?’’

21) ईसा ने उसे उत्तर दिया, ’’यदि तुम पूर्ण होना चाहते हो, तो जाओ, अपनी सारी सम्पत्ति बेच कर गरीबों को दे दो और स्वर्ग में तुम्हारे लिए पूँजी रखी रहेगी, तब आकर मेरा अनुसरण करो।’’

22) यह सुन कर वह नव-युवक बहुत उदास हो कर चला गया, क्योंकि वह बहुत धनी था।




📚 मनन-चिंतन



आज के सुसमाचार वर्णित युवक स्पष्ट रूप से एक बहुत ही नेक इरादे वाला व्यक्ति है। वह उन आज्ञाओं के प्रति वफादार रहा है जिन्हें येसु उद्धृत करते हैं। फिर भी, वह महसूस करता है कि उसे किसी और चीज़ के लिए बुलाया जा रहा है, और, इसलिए वह अपने प्रश्न के साथ येसु की जाँच करता है, 'मुझे और क्या करने की आवश्यकता है?' जब व्यक्तिगत बुलाहट की बात आती है जिसके बारे में येसु ने उसे बताया, तो वह इसका उत्तर नहीं दे सका। इस युवक को, येसु का अनुसरण करने के आह्वान के लिए अपने महान धन को छोड़ने की आवश्यकता थी। यीशु उससे कह रहे थे कि वह अपनी बड़ी दौलत के बजाय ईश्वर पर भरोसा रखे। वह ऐसा करने के लिए खुद को राजी नहीं कर सका, और इसलिए, वह उदास होकर चला गया।

यीशु हम में से प्रत्येक को एक व्यक्तिगत बुलाहट प्रदान करते हैं। यह बुलाहट हम में से प्रत्येक के लिए एक अलग रूप लेगी और हम में से प्रत्येक के लिए अलग-अलग निहितार्थ होंगे। हालाँकि,येसु की बुलाहट हमारे लिए जो भी रूप लेती है, उसमें हमेशा ईश्वर में हमारी सुरक्षा को खोजने के लिए एक आह्वान शामिल होगा। हमारा परम खजाना हमें स्वर्ग में मिलना है, धरती पर नहीं। जैसा कि येसु अन्यत्र कहते हैं, हमें ईश्वर को अपने पूरे दिल, दिमाग, आत्मा और शक्ति से प्यार करना है। और सबसे पहले ईश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज करना है, तभी हमें बाकी सब चीज़ें यूँ ही मिल जाएगी।




📚 REFLECTION





There is something appealing about the young man in today’s Gospel reading. He was an earnest young man who was serious about finding the path that led to eternal life. His question is a serious question, ‘What good deed must I do to possess eternal life?’ In his reply Jesus named a number of commandments, all of which have to do with how we are to relate to other people. Jesus indicates that the way to life for ourselves entails relating in a life-giving way to others. This young man was not satisfied with Jesus’ answer because he felt he was already doing what Jesus was asking for, and, yet, he knew there was more he could be doing.

When Jesus revealed what this ‘more’ would involve for this particular young man, it again had to do with his relationship to others, in particular the poor, the needy; Jesus called on him to sell what he had and give the money to the poor. This was a step too far for him. Jesus did not make this particular demand of everybody he encountered. Yet, for all of us, the path to life, the path of life, will always be the path of love, of loving relationships with others. By his teaching, by his life and his death, Jesus shows us what relating in a loving way to others looks like.


 -Br Biniush topno


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Sunday Mass Readings for 15 August 2021 – Day

 Daily Mass Readings for Sunday , 15 August 2021 – Day



First Reading: Revelation 11: 19a; 12: 1-6a, 10ab


19a And the temple of God was opened in heaven: and the ark of his testament was seen in his temple.

12:1 And a great sign appeared in heaven: A woman clothed with the sun, and the moon under her feet, and on her head a crown of twelve stars:

2 And being with child, she cried travailing in birth, and was in pain to be delivered.

3 And there was seen another sign in heaven: and behold a great red dragon, having seven heads, and ten horns: and on his head seven diadems:

4 And his tail drew the third part of the stars of heaven, and cast them to the earth: and the dragon stood before the woman who was ready to be delivered; that, when she should be delivered, he might devour her son.

5 And she brought forth a man child, who was to rule all nations with an iron rod: and her son was taken up to God, and to his throne.

6a And the woman fled into the wilderness, where she had a place prepared by God.

10ab And I heard a loud voice in heaven, saying: Now is come salvation, and strength, and the kingdom of our God, and the power of his Christ.


Responsorial Psalm: Psalms 45: 10, 11, 12, 16


R. (10bc) The queen stands at your right hand, arrayed in gold.

10 The daughters of kings have delighted thee in thy glory. The queen stood on thy right hand, in gilded clothing; surrounded with variety.

R. The queen stands at your right hand, arrayed in gold.

11 Hearken, O daughter, and see, and incline thy ear: and forget thy people and thy father’s house.

R. The queen stands at your right hand, arrayed in gold.

12 And the king shall greatly desire thy beauty; for he is the Lord thy God, and him they shall adore.

R. The queen stands at your right hand, arrayed in gold.

16 They shall be brought with gladness and rejoicing: they shall be brought into the temple of the king.

R. The queen stands at your right hand, arrayed in gold.


Second Reading: First Corinthians 15: 20-27


20 But now Christ is risen from the dead, the firstfruits of them that sleep:

21 For by a man came death, and by a man the resurrection of the dead.

22 And as in Adam all die, so also in Christ all shall be made alive.

23 But every one in his own order: the firstfruits Christ, then they that are of Christ, who have believed in his coming.

24 Afterwards the end, when he shall have delivered up the kingdom to God and the Father, when he shall have brought to nought all principality, and power, and virtue.

25 For he must reign, until he hath put all his enemies under his feet.

26 And the enemy death shall be destroyed last: For he hath put all things under his feet. And whereas he saith,

27 All things are put under him; undoubtedly, he is excepted, who put all things under him.

Alleluia

R. Alleluia, alleluia.

Mary is taken up to heaven; a chorus of angels exults.

R. Alleluia, alleluia.

Gospel: Luke 1: 39-56


39 And Mary rising up in those days, went into the hill country with haste into a city of Juda.

40 And she entered into the house of Zachary, and saluted Elizabeth.

41 And it came to pass, that when Elizabeth heard the salutation of Mary, the infant leaped in her womb. And Elizabeth was filled with the Holy Ghost:

42 And she cried out with a loud voice, and said: Blessed art thou among women, and blessed is the fruit of thy womb.

43 And whence is this to me, that the mother of my Lord should come to me?

44 For behold as soon as the voice of thy salutation sounded in my ears, the infant in my womb leaped for joy.

45 And blessed art thou that hast believed, because those things shall be accomplished that were spoken to thee by the Lord.

46 And Mary said: My soul doth magnify the Lord.

47 And my spirit hath rejoiced in God my Saviour.

48 Because he hath regarded the humility of his handmaid; for behold from henceforth all generations shall call me blessed.

49 Because he that is mighty, hath done great things to me; and holy is his name.

50 And his mercy is from generation unto generations, to them that fear him.

51 He hath shewed might in his arm: he hath scattered the proud in the conceit of their heart.

52 He hath put down the mighty from their seat, and hath exalted the humble.

53 He hath filled the hungry with good things; and the rich he hath sent empty away.

54 He hath received Israel his servant, being mindful of his mercy:

55 As he spoke to our fathers, to Abraham and to his seed for ever.

56 And Mary abode with her about three months; and she returned to her own house.

✍️Br. Biniush topno

इतवार, 15 अगस्त, 2021 धन्य कुँवारी मरियम का उदग्रहण – समारोह

 

इतवार, 15 अगस्त, 2021

धन्य कुँवारी मरियम का उदग्रहण – समारोह

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पहला पाठ : प्रकाशना ग्रन्थ 11:19a;12:1-6a.10ab


19) तब स्वर्ग में ईश्वर का मन्दिर खुल गया और मन्दिर में ईश्वर के विधान की मंजूषा दिखाई पड़ी।

1) आकाश में एक महान् चिन्ह दिखाई दिया: सूर्य का वस्त्र ओढ़े एक महिला दिखाई पड़ी। उसके पैरों तले चन्द्रमा था और उसके सिर पर बारह नक्षत्रों का मुकुट।

2) वह गर्भवती थी और प्रसव-वेदना से पीडि़त हो कर चिल्ला रही थी।

3) तब आकाश में एक अन्य चिन्ह दिखाई पड़ा- लाल रंग का एक बहुत बड़ा पंखदार सर्प। उसके सात सिर थे, दस सींग थे और हर एक सिर पर एक मुकुट था।

4) उसकी पूँछ ने आकाश के एक तिहाई तारे बुहार कर पृथ्वी पर फेंक दिये। वह पंखदार सर्प प्रसव-पीडि़त महिला के सामने खड़ा रहा, जिससे वह नवजात शिशु को निगल जाये।

5) उस महिला ने एक पुत्र प्रसव किया, जो लोह-दण्ड से सब राष्ट्रों पर शासन करेगा। किसी ने उस शिशु को उठाकर ईश्वर और उसके सिंहासन तक पहुंचा दिया

6) और वह महिला मरुभूमि की ओर भाग गयी, जहाँ ईश्वर ने उसके लिए आश्रय तैयार करवाया था

10) मैंने स्वर्ग में किसी को ऊँचे स्वर से यह कहते सुना, ’अब हमारे ईश्वर की विजय, सामर्थ्य तथा राजत्व और उसके मसीह का अधिकार प्रकट हुआ है;



दूसरा पाठ: 1 कुरिन्थियों 15:20-27



20) किन्तु मसीह सचमुच मृतकों में से जी उठे। जो लोग मृत्यु में सो गये हैं, उन में वह सब से पहले जी उठे।

21) चूँकि मृत्यु मनुष्य द्वारा आयी थी, इसलिए मनुष्य द्वारा ही मृतकों का पुनरूत्थान हुआ है।

22) जिस तरह सब मनुष्य आदम (से सम्बन्ध) के कारण मरते हैं, उसी तरह सब मसीह (से सम्बन्ध) के कारण पुनर्जीवित किये जायेंगे-

23) सब अपने क्रम के अनुसार, सब से पहले मसीह और बाद में उनके पुनरागमन के समय वे जो मसीह के बन गये हैं।

24) जब मसीह बुराई की सब शक्तियों को नष्ट करने के बाद अपना राज्य पिता-परमेश्वर को सौंप देंगे, तब अन्त आ जायेगा;

25) क्योंकि वह तब तक राज्य करेंगे, जब तक वह अपने सब शत्रुओं को अपने पैरों तले न डाल दें।

26) सबों के अन्त में नष्ट किया जाने वाला शत्रु है- मृत्यु।

27) धर्मग्रन्थ कहता है कि उसने सब कुछ उसके अधीन कर दिया है; किन्तु जब वह कहता है कि ’’सब कुछ उसके अधीन हैं’’, तो यह स्पष्ट है कि ईश्वर, जिसने सब कुछ मसीह के अधीन किया है, इस ’सब कुछ’ में सम्मिलित नहीं हैं।



सुसमाचार : सन्त लूकस 1:39-56



39) उन दिनों मरियम पहाड़ी प्रदेश में यूदा के एक नगर के लिए शीघ्रता से चल पड़ी।

40) उसने ज़करियस के घर में प्रवेश कर एलीज़बेथ का अभिवादन किया।

41) ज्यों ही एलीज़बेथ ने मरियम का अभिवादन सुना, बच्चा उसके गर्भ में उछल पड़ा और एलीज़बेथ पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गयी।

42) वह ऊँचे स्वर से बोली उठी, ’’आप नारियों में धन्य हैं और धन्य है आपके गर्भ का फल!

43) मुझे यह सौभाग्य कैसे प्राप्त हुआ कि मेरे प्रभु की माता मेरे पास आयीं?

44) क्योंकि देखिए, ज्यों ही आपका प्रणाम मेरे कानों में पड़ा, बच्चा मेरे गर्भ में आनन्द के मारे उछल पड़ा।

45) और धन्य हैं आप, जिन्होंने यह विश्वास किया कि प्रभु ने आप से जो कहा, वह पूरा हो जायेगा!’’

46) तब मरियम बोल उठी, ’’मेरी आत्मा प्रभु का गुणगान करती है,

47) मेरा मन अपने मुक्तिदाता ईश्वर में आनन्द मनाता है;

48) क्योंकि उसने अपनी दीन दासी पर कृपादृष्टि की है। अब से सब पीढि़याँ मुझे धन्य कहेंगी;

49) क्योंकि सर्वशक्तिमान् ने मेरे लिए महान् कार्य किये हैं। पवित्र है उसका नाम!

50) उसकी कृपा उसके श्रद्धालु भक्तों पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनी रहती है।

51) उसने अपना बाहुबल प्रदर्शित किया है, उसने घमण्डियों को तितर-बितर कर दिया है।

52) उसने शक्तिशालियों को उनके आसनों से गिरा दिया और दीनों को महान् बना दिया है।

53) उसने दरिंद्रों को सम्पन्न किया और धनियों को ख़ाली हाथ लौटा दिया है।

54) इब्राहीम और उनके वंश के प्रति अपनी चिरस्थायी दया को स्मरण कर,

55) उसने हमारे पूर्वजों के प्रति अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार अपने दास इस्राएल की सुध ली है।’’

56) लगभग तीन महीने एलीज़बेथ के साथ रह कर मरियम अपने घर लौट गयी।



📚 मनन-चिंतन



आज धन्य कुंवारी मरियम के आत्मा और शरीर में स्वर्ग में आरोहण की ख़ुशी मना रहे हैं। जैसा कि पहले पाठ और सुसमाचार में चित्रित किया गया है, मरियम वह महिला है जिसके माध्यम से प्रभु हमारे पास आए हैं। यह उन्हें येसु के साथ एक अनोखा रिश्ता प्रदान करता है। उस अनोखे रिश्ते के आधार पर कलीसिया ने हमेशा माना है कि मरियम अपने बेटे की मृत्यु पर विजय को विशिष्ट रूप से साझा करती है। मरियम हमें अपना परम भाग्य दिखाने के साथ-साथ उस नियति का मार्ग भी बताती हैं।

उनकी अनूठी बुलाहट थी - येसु को दुनिया में लाना। हमें भी, अपने तरीके से, आज येसु को अपनी दुनिया में लाने के लिए बुलाया गया है। हमारे पहले पाठ की सबसे पहली व्याख्या महिला को कलीसिया के प्रतीक के रूप में देखना था। हम सभी को जो कलीसिया का निर्माण करते हैं, दूसरों के जीवन में येसु को लाना है, उसकी गवाही देना है। भले ही इसके लिए हमें अक्सर विरोध का सामना करना पड़े जैसे उस महिला को करना पड़ा। जैसा कि प्रकाशना ग्रन्थ की महिला को ईश्वर की ओर से सुरक्षा प्रदान की जाती है ईश्वर, हमारे प्रयासों में हमारी भी रक्षा करेगा और अपने पुत्र को हमारे माध्यम से दूसरों के पास ले जाने के हमारे प्रयासों को आशीषित करेगा।



📚 REFLECTION




Today, we celebrate the feast of the Assumption. The first reading and the Gospel reading portray, Mary as the woman through whom the Lord has come to us. This gives her a unique relationship with Jesus. In virtue of that unique relationship the church has always held that Mary shares uniquely in the triumph of her Son over death.

Apart from showing us our ultimate destiny, Mary also shows us the path to that destiny. Her unique calling was to bring Jesus into the world. We too are called, in our own way, to bring Jesus into our world today. The earliest interpretation of our first reading was to see the woman as an image of the church, of all of us who make up the church. We are to bring Jesus into the lives of others, to witness to him, even though it will often mean encountering opposition. Yet, as that first reading assures us, we do so know that God will protect and safeguard us in our efforts to allow his Son to come to others through us.


 -Br Biniush topno


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शनिवार, 14 अगस्त, 2021

 

शनिवार, 14 अगस्त, 2021

वर्ष का उन्नीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : योशुआ का ग्रन्थ 24:14-29



14) प्रभु पर श्रद्धा रखो और ईमारदारी तथा सच्चाई से उसकी उपासना करो। उन देवताओं का बहिष्कार करो, जिनकी उपासना तुम्हारे पूर्वज फरात नदी के उस पार और मिस्र में किया करते थे। तुम प्रभु की उपासना करो।

15) यदि तुम ईश्वर की उपासना नहीं करना चाहते, तो आज ही यह कर लो कि तुम किसकी उपासना करना चाहते हो- उन देवताओं की, जिनकी उपासना तुम्हारे पूर्वज नदी के उस पार करते थे अथवा अमोरियों के देवताओं की, जिनके देश में तुम रहते हो। मैं और मेरा परिवार, हम सब प्रभु की उपासना करना चाहते हैं।

16) लोगों ने उत्तर दिया, ’’प्रभु के छोड़ कर अन्य देवताओं की उपासना करने का विचार हम से कोसों दूर है।

17) हमारे प्रभु-ईश्वर ने हमें और हमारे पूर्वजों को दासता के घर से, मिस्र देश से निकाल लिया है। उसी ने हमारे सामने महान् चमत्कार दिखाये हैं। हम बहुत लम्बा रास्ता तय कर चुके हैं, बहुत से राष्ट्रों से हो कर यहाँ तक आये हैं और सर्वत्र उसी ने हमारी रक्षा की है।

18) हम भी प्रभु की उपासना करना चाहते हैं, क्योंकि वही हमारा ईश्वर है।

19) तब योशुआ ने लोगों से कहा, ’’तुम प्रभु की उपासना नहीं कर सकोगे, क्योंकि वह पवित्र ईश्वर है, असहनशील ईश्वर है। वह तुम्हारे अपराध और पाप नहीं क्षमा करेगा।

20) यदि प्रभु को त्याग कर अन्य देवताओं की उपासना करोगे, तो यद्यपि वह तुम्हारी भलाई करता रहा, फिर भी वह तुम्हारी बुराई करेगा और तुम्हें नष्ट कर देगा।’’

21) लोगों ने योशुआ से कहा, ’’नहीं! हम प्रभु की उपासना करेंगे।’’

22) तब योशुआ ने लोगों से कहा, ’’तुम लोग अपने विरुद्ध साक्षी हो कि तुमने प्रभु को चुन लिया ओर उसी की उपासना करोगे’’। उन्होंने उत्तर दिया, ’’हम साक्षी हैं।’’

23) इस पर योशुआ ने कहा, ’’तब तो अपने पास के पराये देवताओं का बहिष्कार करो और अपना मन ईश्वर में, इस्राएल के प्रभु में लगाओ’’।

24) लोगों ने योशुआ को यह उत्तर दिया, ’’हम प्रभु अपने ईश्वर की उपासना करेंगे और उसी की बात मानेंगे’’।

25) योशुआ ने उसी दिन लोगों के साथ समझौता कर लिया। उसने सिखेम में उनके लिए संविधान और अध्यादेश बनाया।

26) इसके बाद उसने उन बातों को प्रभु की संहिता के ग्रन्थ में लिख दिया। उसने बलूत के नीचे, प्रभु के मंदिर में एक बड़ा पत्थर खड़ा कर दिया

27) और सब लोगों से कहा, यह पत्थर हमारे विरुद्ध साक्ष्य देगा, क्योंकि इसने उन सब बातों को सुना, जिन्हें प्रभु ने हमें बताया। इसलिए यह तुम्हारे विरुद्व साक्ष्य देगा, जिससे तुम अपने ईश्वर को अस्वीकार नहीं करो।’’

28) इसके बाद योशुआ ने लोगों को अपनी अपनी भूमि में भेज दिया।

29) इन घटनाओं के बाद प्रभु के सेवक, नून के पुत्र योशुआ का, एक सौ दस वर्ष की उम्र में देहान्त हुआ।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 19:13-15



13) उस समय लोग ईसा के पास बच्चों को लाते थे, जिससे वे उन पर हाथ रख कर प्रार्थना करें। शिष्य लोगों को डाँटते थे,

14) परन्तु ईसा ने कहा, ’’बच्चों को आने दो और उन्हें मेरे पास आने से मत रोको, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन-जैसे लोगों का है’’

। 15) और वह बच्चों पर हाथ रख कर वहाँ से चले गये।


📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में येसु कहते हैं - "इस से बड़ा प्रेम किसी का नहीं, कि कोई अपके मित्रों के लिए अपना प्राण दे दे।" प्रभु येसु ने निश्चित रूप से हमारे लिए यही किया। बाद में येसु आगे कहते हैं कि हम उनके द्वारा चुने गये हैं कि हम जाकर फल उत्पन्न करें, फल जो बना रहे। इससे पहले, येसु ने कहा था - "मैं सच्ची दाखलता हूँ"। उसके चेले वे डालियां हैं जो दाखलता से जीवन लेती हैं और फल देती हैं, स्थायी फल, बना रहने वाला फल।

हम देख सकते हैं कि यह सब संत मैक्सिमिलियन पर कैसे लागू होता है। वे एक ऐसे व्यक्ति थे जो बिना किसी हिचकिचाहट के एक भाई के लिए अपनी जान देने के लिए तैयार थे, एक अजनबी जिसे वह वास्तव में नहीं जानता था। यह वह प्रेम है जिसके बारे में येसु बोलते हैं। और ज़ाहिर है, यह एक ऐसा कार्य है जिसे भुलाया नहीं गया है। यह आज तक फल देता है और हमें अपने भाई-बहनों की निःस्वार्थता से देखभाल करने के लिए प्रेरित करता है।



📚 REFLECTION



In the Gospel today Jesus says - “No one has greater love than this, to lay down one’s life for one’s friends”. Which, of course, is just what Jesus did for us. To love as he loves is to be ready to do exactly this. And who are our ‘friends’? They are those who have this love also.

Later in the passage Jesus says that we have been chosen by him to go out and bear fruit, fruit that will endure. Earlier, Jesus had said, “I AM the True Vine”. His disciples are those who are branches taking life from the vine and bearing fruit, lasting fruit.

We can see how all of this applies so aptly to Maximilian. Here is someone who unhesitatingly was ready to give his life for a brother, a stranger whom he did not really know. This is the love that Jesus speaks of. And, of course, it is an act that has not been forgotten. It bears fruit to this day and inspires us to imitate such great unselfishness and care for our brothers and sisters.


 -Fr. Preetam Vasuniya



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