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मंगलवार, 08 जून, 2021 वर्ष का दसवाँ सप्ताह

 

मंगलवार, 08 जून, 2021

वर्ष का दसवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : 2 कुरिन्थियों 1:18-22



18) ईश्वर की सच्चाई की शपथ! मैंने आप लोगों को जो सन्देश दिया, उस में कभी ’हाँ’ और कभी ’नहीं’-जैसी बात नहीं है;

19) क्योंकि सिल्वानुस, तिमथी और मैंने आपके बीच जिनका प्रचार किया, उन ईश्वर के पुत्र ईसा मसीह में कभी ’हाँ’ और कभी ’नहीं’-जैसी बात नहीं - उन में मात्र ’हाँ’ है।

20) उन्हीं में ईश्वर की समस्त प्रतिज्ञाओं की ’हाँ’ विद्यमान है, इसलिए हम ईश्वर की महिमा के लिए उन्हीं के द्वारा ’आमेन’ कहते हैं।

21) ईश्वर आप लोगों के साथ हम को मसीह में सुदृढ़ बनाये रखता है और उसी ने हमारा अभिशेक किया है।

22) उसी ने हम पर अपनी मुहर लगायी और अग्रिम के रूप में हमारे हृदयों को पवित्र आत्मा प्रदान किया है।



सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 5:13-16



(13) "तुम पृथ्वी के नमक हो। यदि नमक फीका पड़ जाये, तो वह किस से नमकीन किया जायेगा? वह किसी काम का नहीं रह जाता। वह बाहर फेंका और मनुष्यों के पैरों तले रौंदा जाता है।

(14) "तुम संसार की ज्योति हो। पहाड़ पर बसा हुआ नगर छिप नहीं सकता।

(15) लोग दीपक जला कर पैमाने के नीचे नहीं, बल्कि दीवट पर रखते हैं, जहाँ से वह घर के सब लोगों को प्रकाश देता है।

(16) उसी प्रकार तुम्हारी ज्योति मनुष्यों के सामने चमकती रहे, जिससे वे तुम्हारे भले कामों को देख कर तुम्हारे स्वर्गिक पिता की महिमा करें।



📚 मनन-चिंतन



आज के सुसमाचार पर्वत प्रवचन में हम सुनते हैं कि प्रभु येसु हमें नमक और ज्योति के बारे में बताते हैं। नमक की अपने आप में कोई उपयोगिता नहीं है। यदि हमें कितनी ही मँहगी और स्वादिष्ट भोजन दिया जाए यदि उसमें नमक ना हो तो वह फीका ही समझा जायेगा। वह फेका और पैरों तले रौंदा जाता है। दोनों नमक और ज्योति अपने गुणों द्वारा अपने आस-पास के लोगों और वस्तुओं को प्रभावित करते हैं। नमक का अर्थ है कि हम अपने अच्छे गुणों द्वारा उनके जीवन को प्रभावित कर प्रभु येसु के असीम प्रेम को दूसरों तक अपने अच्छे कार्यों द्वारा दिखा सकें। नमक का उपयोग वस्तु को सड़ने या गलने से रोकने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है। उसी प्रकार ज्योति के महत्व को हम तब समझते हैं जब हम अंधकार में फंस जाते हैं।

हमें अपने ख्रीस्तीय जीवन में नमक और ज्योति तरह बनकर दुसरों के लिए सार्थक और उपयोगी बनना है। यही हमारे ख्रीस्तीय जीवन का सार है। इसीलिए प्रभु येसु हमे संत योहन के सुसमाचार 01:4-5 में कहते हैं, उसमें जीवन था, और वह जीवन मनुष्यों की ज्योति था। वह ज्योति अंधकार में चमकती रहती है - अंधकार ने उसे नहीं बुझाया।



📚 REFLECTION



In today’s gospel reading Sermon on the Mount, we hear very important things told by Jesus about salt and light. Salt by itself has no utility. If we are served a costly and delicious meal; but if it has no salt then it will be of no use. It will be thrown away and trampled by foot. Both salt and light have properties which affect things around them. To ‘be salt’ means to deliberately seek the influence the people in one’s life by showing them the unconditional love of Christ through good deeds. And also salt is used to enhance flavour and as a preservative. Similarly, we feel the importance light when we are in darkness; and we look for light; without light we cannot do anything.

In our Christian life we need to be useful as salt and light for others and make their lives meaningful and useful. This is the core message of Christian life. That’s why Jesus says in St.John’s gospel 1:4-5, in him was life, and the life was the light of all people. The light shines in the darkness, and the darkness did not overcome it.


 -Br Biniush Topno



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सोमवार, 07 जून, 2021 वर्ष का दसवाँ सप्ताह

 

सोमवार, 07 जून, 2021

वर्ष का दसवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : 2 कुरिन्थियों 1:1-7



1) कुरिन्थ में ईश्वर की कलीसिया तथा समस्त अख़ैया में रहने वाले सभी सन्तों के नाम पौलुस, जो ईश्वर द्वारा ईसा मसीह का प्रेरित नियुक्त हुआ है, और भाई तिमथी का पत्र।

2) हमारा पिता ईश्वर, और प्रभु ईसा मसीह आप लोगों को अनुग्रह तथा शान्ति प्रदान करें।

3) धन्य है ईश्वर, हमारे प्रभु ईसा मसीह का पिता, परमदयालु पिता और हर प्रकार की सान्त्वना का ईश्वर।

4) वह सारी दुःख तकलीफ़ में हम को सान्त्वना देता रहता है, जिसमें ईश्वर की ओर से हमें जो सान्त्वना मिलती है, उसके द्वारा हम दूसरों को भी, उनकी हर प्रकार की तकलीफ में सान्त्वना देने के लिए समर्थ हो जायें;

5) क्योंकि जिस प्रकार हम प्रचुर मात्रा में मसीह के दुःख-भोग के सहभागी हैं, उसी प्रकार मसीह द्वारा हम को प्रचुर मात्रा में सान्त्वना भी मिलती है।

6) यदि हमें दुःख भोगना पड़ता है, तो आप लोगों की सान्त्वना और मुक्ति के लिए, और यदि हमें सान्त्वना मिलती है, तो इसलिए की हम आप लोगों को सान्त्वना दे सकें, जिससे आप धैर्य के साथ वह दुःख सहने में समर्थ हों, जिसे हम भोगते हैं।

7) आप लोगों के विषय में हमारी आशा सुदृढ़ है; क्योंकि हम जानते हैं कि जिस प्रकार आप हमारे दुःख के भागी हैं, उसी प्रकार आप हमारी सान्त्वना के भी भागी होंगे।



सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 5:1-12



(1) ईसा यह विशाल जनसमूह देखकर पहाड़ी पर चढ़े और बैठ गए। उनके शिष्य उनके पास आये।

(2) और वे यह कहते हुए उन्हें शिक्षा देने लगेः

(3) "धन्य हैं वे, जो अपने को दीन-हीन समझते हैं! स्वर्गराज्य उन्हीं का है।

(4) धन्य हैं वे जो नम्र हैं! उन्हें प्रतिज्ञात देश प्राप्त होगा।

(5) धन्य हैं वे, जो शोक करते हैं! उन्हें सान्त्वना मिलेगी।

(6) घन्य हैं, वे, जो धार्मिकता के भूखे और प्यासे हैं! वे तृप्त किये जायेंगे।

(7) धन्य हैं वे, जो दयालू हैं! उन पर दया की जायेगी।

(8) धन्य हैं वे, जिनका हृदय निर्मल हैं! वे ईश्वर के दर्शन करेंगे।

(9) धन्य हैं वे, जो मेल कराते हैं! वे ईश्वर के पुत्र कहलायेंगे।

(10) धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के कारण अत्याचार सहते हैं! स्वर्गराज्य उन्हीं का है।

(11) धन्य हो तुम जब लोग मेरे कारण तुम्हारा अपमान करते हैं, तुम पर अत्याचार करते हैं और तरह-तरह के झूठे दोष लगाते हैं।

(12) खुश हो और आनन्द मनाओ - स्वर्ग में तुम्हें महान् पुरस्कार प्राप्त होगा। तुम्हारे पहले के नबियों पर भी उन्होंने इसी तरह अत्याचार किया।



📚 मनन-चिंतन



पर्वत प्रवचन शायद प्रभु येसु के सभी प्रवचनों से प्रसिध्द है। यहाँ पर वे स्वर्गराज्य के रहस्यों को किस प्रकार होना चाहिए उसे बताते हैं। यह प्रभु येसु की अभिव्यक्ति है।

आज के सुसमाचार में हम सभी प्रकार के लोगों को पाते हैंः गरीब, शोक मनाने वाले, भूखे, प्यासे, दयालू, निर्मल, मेल कराने वाले, अत्याचार। ये सभी लोग अलग हैं, उनके अलग कहानी, कमजोरी और शक्ति है, और उनके अलग उदेश्य, चुनौती और जीवन के अलग अनुभव है। फिर भी प्रभु येसु उन्हें धन्य कहते हैं उनके विभिन्नताओं के बौजुद, वे उन्हें अपने पास बुलाते हैं और अपने प्रेम को दिखाते हैं।

आज का सुसमाचार संत फ्रासिंस के शब्दों में, ’’यह एक नया नियम है, एक जिसे हम ’आर्शीवचन’ कहते हैं। यह प्रभु का हमारे लिए नया नियम है.....................ख्रीस्तीय जीवन का राह-माप जो हमें आगे बढ़ने के लिए सच्ची राह दिखाता है।’’



📚 REFLECTION




Sermon on the Mount is perhaps the best known and loved of Christ’s sermon. Here he tells how the members of the kingdom should be. This is the manifesto of Christ. In today’s gospel we find people of all kinds: the poor, the mourning, meek, hungry, merciful, pure, peacemakers, persecuted. All these people are different, have different stories weakness and strengths; also have different goals and challenges and life experiences. And yet Jesus calls them blessed despite their differences, Christ calls them to himself and shows them his love.

In the words of Pope Francis, “This is the new law, the one we call the ‘Beatitudes’. It’s the Lord’s new law for us... the roadmap of Christian life which gives us the indications to move forward on the right path.”(Jan.6th 2016).


 -Br Biniush Topno


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इतवार, 06 जून, 2021 येसु के पवित्रतम शरीर और रक्त का महोत्सव (Corpus Christi)

 

इतवार, 06 जून, 2021

येसु के पवित्रतम शरीर और रक्त का महोत्सव (Corpus Christi)

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पहला पाठ : निर्गमन 24:3-8



3) मूसा ने सीनई पर्वत से उतर कर प्रभु के सब वचन और आदेश लोगों को सुनाये। लोगों ने एक स्वर से इस प्रकार उत्तर दिया, ''प्रभु ने जो कुछ कहा है, हम उसका पालन करेंगे।''

4) मूसा ने प्रभु के सब आदेश लिख दिये और दूसरे दिन, भोर को, उसने पर्वत के नीचे एक वेदी बनायी और इस्राएल के बारह वंषों के लिए बारह पत्थर खड़े कर दिये।

5) उसने इस्राएली नवयुवकों को आदेश दिया कि वे होम-बलि चढ़ायें और शांतियज्ञ के लिए बछड़ों का वध करें।

6) तब मूसा ने पशुओं का आधा रक्त पात्रों में इकट्ठा किया और आधा वेदी पर छिड़का।

7) उसने विधान की पुस्तक ली और उसे लोगों को पढ़ सुनाया। लोगों ने उत्तर दिया, प्रभु ने जो कुछ कहा है, हम उसके अनुसार चलेंगे और उसका पालन करेंगे।

8) इस पर मूसा ने रक्त ले लिया और उसे लोगों पर छिड़कते हुए कहा, ''यह उस विधान का रक्त है, जिसे प्रभु ने उन सब आदेशों के माध्यम से तुम लोगों के लिए निर्धारित किया है।




दूसरा पाठ : इब्रानियों 9:11-15



11) किन्तु अब मसीह हमारे भावी कल्याण के प्रधानयाजक के रूप में आये हैं और उन्होंने एक ऐसे तम्बू को पार किया, जो यहूदियों के तम्बू से महान् तथा श्रेष्ठ है, जो मनुष्य के हाथ से नहीं बना और इस पृथ्वी का नहीं है।

12) उन्होंने बकरों तथा बछड़ों का नहीं, बल्कि अपना रक्त ले कर सदा के लिए एक ही बार परमपावन स्थान में प्रवेश किया और इस तरह हमारे लिए सदा-सर्वदा रहने वाला उद्धार प्राप्त किया है।

13) याजक बकरों तथा सांड़ों का रक्त और कलोर की राख अशुद्ध लोगों पर छिड़कता है और उनका शरीर फिर शुद्ध हो जाता है। यदि उस में पवित्र करने की शक्ति है,

14) तो फिर मसीह का रक्त, जिसे उन्होंने शाश्वत आत्मा के द्वारा निर्दोष बलि के रूप में ईश्वर को अर्पित किया, हमारे अन्तःकरण को पापों से क्यों नहीं शुद्ध करेगा और हमें जीवन्त ईश्वर की सेवा के योग्य बनायेगा?

15) मसीह पहले विधान के समय किये हुए अपराधों की क्षमा के लिए मर गये हैं और इस प्रकार वह एक नये विधान के मध्यस्थ हैं। ईश्वर जिन्हें बुलाते हैं, वे अब उसकी प्रतिज्ञा के अनुसार अनन्त काल तक बनी रहने वाली विरासत प्राप्त करते हैं।



सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 14:12-16,22-26



12) बेख़मीर रोटी के पहले दिन, जब पास्का के मेमने की बलि चढ़ायी जाती है, शिष्यों ने ईसा से कहा, ’’आप क्या चाहते हैं? हम कहाँ जा कर आपके लिए पास्का भोज की तैयारी करें?’’

13) ईसा ने दो शिष्यों को यह कहते हुए भेजा, ’’शहर जाओ। तुम्हें पानी का घड़ा लिये एक पुरुष मिलेगा। उसके पीछे-पीछे चलो।

14) और जिस घर में वह प्रवेश करे, उस घर के स्वामी से यह कहो, ’गुरुवर कहते हैं- मेरे लिए अतिथिशाला कहाँ हैं, जहाँ मैं अपने शिष्यों के साथ पास्का का भोजन करूँ?’

15) और वह तुम्हें ऊपर सजा-सजाया बड़ा कमरा दिखा देगा वहीं हम लोगों के लिए तैयार करो।’’

16) शिष्य चल पड़े। ईसा ने जैसा कहा था, उन्होंने शहर पहुँच कर सब कुछ वैसा ही पाया और पास्का-भोज की तैयारी कर ली।

22) उनके भोजन करते समय ईसा ने रोटी ले ली, और आशिष की प्रार्थना पढ़ने के बाद उसे तोड़ा और यह कहते हुए शिष्यों को दिया, ’’ले लो, यह मेरा शरीर है’’।

23) तब उन्होंने प्याला ले कर धन्यवाद की प्रार्थना पढ़ी और उसे शिष्यों को दिया और सब ने उस में से पीया।

24) ईसा ने उन से कहा, ’’यह मेरा रक्त है, विधान का रक्त, जो बहुतों के लिए बहाया जा रहा है।

25) मैं तुम से यह कहता हूँ- जब तक मैं ईश्वर के राज्य में नवीन रस न पी लूँ, तब तक मैं दाख का रस फिर नहीं पिऊँगा।’’

26) भजन गाने के बाद वे जैतून पहाड़ चल दिये।



📚 मनन-चिंतन



निर्गमन ग्रन्थ 24:3-8 इब्रानियों 9:11-15, मारकुस 14:12-16,22-26

आज हम प्रभु येसु के पवित्र शरीर व रक्त का पर्व मनाते हैं। पवित्र युख्ररिस्त या प्रभु येसु के शरीर और रक्त का त्यौहार हमारे ख्रीस्तिीय जीवन का अभिन्न अंग है क्योंकि प्रभु येसु ने इसे हमारे पापों की क्षमा एवं मुक्ति के लिए स्थापित किया है। इसमें प्रभु येसु हमें पूर्णतः अपने को हमारे लिए देते हैं। व हमारे लिए भोजन और बलि बन जाते हैं। यह त्यौहार हमारे लिए उनकी समृति में मनाया जाता है। उन्होंने हमें आज्ञा दी है कि हम इसे उनकी स्मृति मनाये। मानवीय पोषण के अध्ययन से हमें पता चलता है कि ’’जो हम खाते हैं वही बनते हैं और अच्छी खादय प्रदार्थ हमारे शरीर को पोषित करता है।’’ जैसे हम भौतिक भोजन अपने शरीर को जीवित रखने के लिए खाते हैं, वैसे ही हमारी अध्यात्मिक भोजन हमारी आत्मा को बचाने के लिए आवश्यक है। उसी प्रकार युख्ररिस्त हमारे शरीर और आत्मा को स्वास्थ्य रखता है।

आज के पहले पाठ में मूसा ने इस्रलियों को ईश्वर के आदेश और वचन को सुनाते हैं और लोगों ने एक स्वर से इस प्रकार उत्तर दिया, ’’प्रभु ने जो कुछ कहा है, हम उसका पालन करेंगें (निर्गमन 24:3)। मूसा ने प्रभु के सब आदेश लिख दिये और जोर से पढ़कर सुनाया, लोगों ने पुनः अपनी प्रतिज्ञाओं को दुहराया, प्रभु ने जो कहा है, हम उसके अनुसार चलेंगे और उसका पालन करेंगे। (निर्गमन 34:7)। स्तोत्र ग्रन्थ 116:18 प्रभु की सारी प्रजा के सामने प्रभु के लिए अपनी मन्नतें पुरी करूँगा।

आज का दूसरा पाठ और सुसमाचार हम ख्रीस्तीयों के लिए महिमामय आशा की सुचक है। युख्रीस्तीय संस्कार में प्रभु येसु को ग्रहण कर हम उनके साथ एक हो जाते हैं। प्रभु येसु हमें निमत्रंण देते हुए कहतें हैं, ’’ले लो, यह मेरा शरीर है।’’ (मारकुस 14:22) और पुनः कहते हैं, ’’यह मेरा रक्त है, विधान का रक्त, जो बहुतों के लिए बहाया जा रहा है।’’ (मारकुस 14:24) प्रभु येसु अपने प्रेम को एक पवित्र सहभागिता से पूर्ण करते है।

प्रभु येसु के पवित्र शरीर एवं रक्त के विषय में संत पिता योहन पौलुस द्वितीय ने कहा कि ’’हमारा विश्वास ईश्वर में शरीर धारण किया जिससे हम उनके मित्र बन सकें।’’ उन्हें हम हर जगह घोषित करें, विशेष करके हमारे घरों में, समाज में और हमारे संसार में।




📚 REFLECTION




Today, we celebrate the feast of Holy Eucharist or Holy Body and Blood of Christ. The Eucharist is offered by believers, to the Heavenly Father together with Jesus for the remission of sins and as an offering of gratitude and thanksgiving. The Holy Eucharist is the indivisible part of our Christian life; Jesus instituted it for the forgiveness of our sins and salvation. In the Eucharist Jesus gives himself totally to us and he becomes our food and sacrifice. This feast is celebrated because he has given us the commandment that we celebrate in his memory. From the human nutrition study, it is known that, “we eat what we become,” and good food nourishes the body”. As physical food we eat nourishes the body, so the spiritual food nourishes our soul, and prepares and preserves for eternity, likewise Eucharist keeps our body and soul fit and healthy.

In the first reading today Moses tells to the people Lord’s words and ordinances, and the people respond it, “All the words that the Lord has spoken we will do.” Then Moses wrote down the words of the Lord and read it aloud and the people reaffirm it, “All that the Lord has spoken we will do, and we will be obedient.” We also find similar response of the people in Psalm 116:18, “I will pay my vows to the Lord in the presence of his people.”

Today’s second reading and the gospel is a reminder of his glorious hope of God’s blessing. After receiving the Eucharist we become one with Christ. And Jesus invites us and says, “Take; this is my blood”. And again Jesus said, “This is my blood of the covenant, which is poured out for many.” Jesus completely gives his body and blood for us to become his sons and daughters. St. John Paul II said, “Our faith in God took flesh in order to become our companion along the way need to be everywhere proclaimed, especially in our streets and homes, as an expression of our grateful love as an inexhaustible source of blessings.”




मनन-चिंतन- 2



योहन 15:13 में प्रभु येसु कहते हैं, “इस से बडा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिये अपने प्राण अर्पित कर दे”। प्रभु येसु यही सर्वोत्तम प्रेम क्रूस पर प्रस्तुत करते हैं जब वे कलवारी पहाडी पर क्रूस पर हमारे लिए, सारी मानव-जाति के लिए अपने प्राण अर्पित करते हैं। प्रेम के इस बलिदान को अटारी में शिष्यों के साथ अंतिम भोज के समय एक अमर चिह्न के रूप में प्रदान कर प्रभु ने यूखारिस्तीय संस्कार की स्थापना की। इसलिए यूखारिस्त सर्वोत्तम प्रेम का बलिदान है।

पुराने विधान में पशुओं के बलिदान चढाये जाते थे। परन्तु नये विधान में एक अनोखा बलिदान चढाया जाता है। इस संदर्भ में इब्रानियों के पत्र में प्रभु का वचन कहता है, “प्रधानयाजक ही, वर्ष में एक बार, पिछले कक्ष में वह रक्त लिये प्रवेश करता था, जिसे वह अपने और प्रजा के दोषों के लिए प्रायश्चित के रूप में चढ़ाता था।.... किन्तु अब मसीह हमारे भावी कल्याण के प्रधानयाजक के रूप में आये हैं और उन्होंने एक ऐसे तम्बू को पार किया, जो यहूदियों के तम्बू से महान् तथा श्रेष्ठ है, जो मनुष्य के हाथ से नहीं बना और इस पृथ्वी का नहीं है। उन्होंने बकरों तथा बछड़ों का नहीं, बल्कि अपना रक्त ले कर सदा के लिए एक ही बार परमपावन स्थान में प्रवेश किया और इस तरह हमारे लिए सदा-सर्वदा रहने वाला उद्धार प्राप्त किया है।“ (इब्रानियों 9:7, 11-12)

निर्गमन 24:6,8 में हम देखते हैं कि मूसा ने बलि-पशुओं का आधा रक्त लोगों पर छिड़कते हुए कहा, ''यह उस विधान का रक्त है, जिसे प्रभु ने उन सब आदेशों के माध्यम से तुम लोगों के लिए निर्धारित किया है”। अंतिम भोज के समय प्रभु येसु “ने प्याला लिया, धन्यवाद की प्रार्थना पढ़ी और कहा, ‘‘इसे ले लो और आपस में बाँट लो; क्योंकि मैं तुम लोगों से कहता हूँ, जब तक ईश्वर का राज्य न आये, मैं दाख का रस फिर नहीं पिऊँगा’’। उन्होंने रोटी ली और धन्यवाद की प्रार्थना पढ़ने के बाद उसे तोड़ा और यह कहते हुए शिष्यों को दिया, ‘‘यह मेरा शरीर है, जो तुम्हारे लिए दिया जा रहा है। यह मेरी स्मृति में किया करो’’। (लूकस 22:17-19) उसी आज्ञा के अनुसार आज भी दुनिया भर के गिरजाघरों में वही बलिदान प्रभु येसु की स्मृति में मनाया जाता है।

जब प्रभु इस्राएलियों को मिस्र देश से छुडाने पर थे, तब ईश्वर ने आज्ञा दी थी कि हर इस्राएली परिवार में एक मेमने का वध किया जाये और उसका रक्त घर के चौखटों पर पुताया जाये ताकि विनाशक दूत मेमने के रक्त से पुते इस्राएली घरों को कोई हानि नहीं पहुँचाये। इस्राएली लोग निर्गमन से संबंधित घटनाओं को याद करते हुए हर वर्ष पास्का त्योहार मनाते थे। प्रभु येसु नये विधान का मेमना है। संत योहन बपतिस्ता अपने शिष्यों को येसु से परिचित कराते हुए कहते हैं, “देखो-ईश्वर का मेमना, जो संसार का पाप हरता है” (योहन 1:29)। ह्म उन्हीं प्रभु के रक्त से खरीदे गये हैं, बचाये गये है। संत पेत्रुस कहते हैं, “आप लोग जानते हैं कि आपके पूर्वजों से चली आयी हुई निरर्थक जीवन-चर्या से आपका उद्धार सोने-चांदी जैसी नश्वर चीजों की कीमत पर नहीं हुआ है, बल्कि एक निर्दोष तथा निष्कलंक मेमने अर्थात् मसीह के मूल्यवान् रक्त की कीमत पर।” (1 पेत्रुस 1:18-19)

कलवारी पर प्रभु येसु के बलिदान की महानता की ओर इशारा करते हुए नबी इसायाह कहते हैं, “विश्वमण्डल का प्रभु इस पर्वत पर सब राष्ट्रों के लिए एक भोज का प्रबन्ध करेगाः उस में रसदार मांस परोसा जायेगा और पुरानी तथा बढ़िया अंगूरी। वह इस पर्वत पर से सब लोगों तथा सब राष्ट्रों के लिए कफ़न और शोक के वस्त्र हटा देगा, वह सदा के लिए मृत्यु समाप्त करेगा। प्रभु-ईश्वर सबों के मुख से आँसू पोंछ डालेगा। वह समस्त पृथ्वी पर से अपनी प्रजा का कलंक दूर कर देगा। प्रभु ने यह कहा है।” (इसायाह 25:6-8) इसी कारण इस बलिदान में बडी शक्ति है। राजाओं के पहले ग्रन्थ के अध्याय 19 में हम पढ़ते हैं कि नबी एलियाह ईश्वर के दिये हुए भोजन के बल पर चालीस दिन और चालीस रात चल कर ईश्वर के पर्वत होरेब तक पहुँच कर वहाँ ईश्वर के दर्शन करते हैं। आज विश्वासी लोग यूखारिस्तीय बलिदान से अपने दैनिक जीवन की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति पाते हैं। येसु के द्वारा रोटियों के चमत्कार तथा पानी को अंगूरी में बदलना यूखारिस्तीय संस्कार की ओर शिष्यों को ले चलने वाली घटनाओं के रूप में भी देखे जा सकते हैं। इस महानतम संस्कार को योग्य रीति से ग्रहण करने के विषय में संत पौलुस कहते हैं, “जो अयोग्य रीति से वह रोटी खाता या प्रभु का प्याला पीता है, वह प्रभु के शरीर और रक़्त के विरुद्ध अपराध करता है। अपने अन्तःकरण की परीक्षा करने के बाद ही मनुष्य वह रोटी खाये और वह प्याला पिये।” (1 कुरिन्थियों 11:27-28) आइए, हम इस बलिदान में भाग लेने योग्य बनने के लिए ईश्वर की कृपा माँगे।


-Br Biniush Topno


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शनिवार, 05 जून, 2021 वर्ष का नौवाँ सप्ताह

 

शनिवार, 05 जून, 2021

वर्ष का नौवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : टोबीत का ग्रन्थ 12:1,5-15,20



1) टोबीत ने विवाहोत्सव के बाद अपने पुत्र टोबीयाह को बुला कर उस से कहा, "हमें उस व्यक्ति को, जो तुम्हारे साथ गया, वेतन के सिवा कुछ और देना चाहिए"।

5) टोबीयाह ने उसे बुलाया और कहा, "जो कुछ तुम अपने साथ ले आये, उसका आधा भाग वेतन के रूप में स्वीकार करो और सकुशल विदा लो"।

6) इस पर रफ़ाएल ने दोनों को एकान्त में बुला कर उन से कहा, "ईश्वर का धन्यवाद कीजिए और सब प्राणियों के सामने यह घोषित कीजिए कि उसने हमारा कितना उपकार किया है। उसके नाम के आदर में धन्यवाद और स्तुतिगान कीजिए। ईश्वर के सत्कार्य प्रकट करने में संकोच मत कीजिए।

7) राजा का रहस्य अवश्य गुप्त रखना चाहिए, किन्तु ईश्वर के कार्य घोषित करना और योग्य रीति से उसकी स्तुति करना उचित है। भलाई कीजिए और बुराई आपके पास नहीं फटकेगी।

8) प्रार्थना तथा उपवास और भिक्षादान तथा धार्मिकता उत्तम हैं। दुष्टता से संचित धन-सम्पदा की अपेक्षा धार्मिकता से कमाया हुआ थोड़ा धन भी अच्छा है। भिक्षादान स्वर्ण-संचय से श्रेष्ठ है।

9) भिक्षादान मृत्यु से बचाता और हर प्रकार का पाप हरता है। जो भिक्षादान करता है, उसे पूर्ण जीवन प्राप्त होगा।

10) जो पाप और अन्याय किया करते हैं, वे अपने को हानि पहुँचाते हैं।

11) मैं आपके लिए पूरा सत्य प्रकट करूँगा और आप लोगों से कुछ भी नहीं छिपाऊँगा। मैं आप से कह चुका हूँ कि राजा का रहस्य अवश्य गुप्त रखना चाहिए, किन्तु ईश्वर के कार्य घोषित करना उचित है।

12) जब आप और सारा प्रार्थना कर रहे थे, तो मैं अपनी प्रार्थना ईश्वर की महिमा के सामने प्रस्तुत कर रहा था। जब आप मुरदों को दफ़नाते थे, तो मैं यही करता था।

13) जब आप आगा-पीछा किये बिना अपना भोजन छोड़ कर मुरदा दफ़नाने गये, तो मुझे आपकी परीक्षा करने भेजा गया।

14) ईश्वर ने मुझे फिर भेजा, जिससे मैं आप को और आपकी बहू को स्वस्थ करूँ।

15) मैं स्वर्गदूत रफ़ाएल हूँ। मैं उन सात स्वर्गदूतों में से एक हूँ, जो प्रभु की महिमा के सामने उपस्थित रहते हैं।"

20) अब पृथ्वी पर प्रभु का धन्यवाद कीजिए और ईश्वर के महान् कार्यो का बखान कीजिए। मैं अब उसके पास जा रहा हूँ, जिसने मुझे भेजा है। आपके साथ जा कुछ घटित हुआ, वह सब लिख लीजिए"। स्वर्गदूत ऊपर चल पड़ा।



सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 12:38-44



38) ईसा ने शिक्षा देते समय कहा, "शास्त्रियों से सावधान रहो। लम्बे लबादे पहन कर टहलने जाना, बाज़ारों में प्रणाम-प्रणाम सुनना,

39) सभागृहों में प्रथम आसनों पर और भोजों में प्रथम स्थानों पर विराजमान होना- यह सब उन्हें बहुत पसन्द है।

40) वे विधवाओं की सम्पत्ति चट कर जाते और दिखावे के लिए लम्बी-लम्बी प्रार्थनाएँ करते हैं। उन लोगों को बड़ी कठोर दण्डाज्ञा मिलेगी।"

41) ईसा ख़जाने के सामने बैठ कर लोगों को उस में सिक्के डालते हुए देख रहे थे। बहुत-से धनी बहुत दे रहे थे।

42) एक कंगाल विधवा आयी और उसने दो अधेले अर्थात् एक पैसा डाल दिया।

43) इस पर ईसा ने अपने शिष्यों को बुला कर कहा, "मैं तुम से यह कहता हूँ - ख़जाने में पैसे डालने वालों में से इस विधवा ने सब से अधिक डाला है;

44) क्योंकि सब ने अपनी समृद्धि से कुछ डाला, परन्तु इसने तंगी में रहते हुए भी जीविका के लिए अपने पास जो कुछ था, वह सब दे डाला।"



📚 मनन-चिंतन


जब हम आज के सुसमाचार को पढ़ते हैं, तक सबसे पहले हमारे मन में यही सोच आता है कि हमारी धार्मिकता कैसी है? क्या हमारा जीवन और कार्य में एकरूपता है? एक बार शास्त्री उपदेश दे रहा था, उसने अपनी उपदेश का सार्थक बनाने के लिए एवं विश्वासियों का ध्यान आर्कषित करने के लिए कई उदाहरण दिया। उसके उपदेश को सुनने के बाद कई विश्वासी उनसे एक सवाल पुछें। आप वाकई, अपने उपदेश से सभों को मत्रमुग्ध कर दिये, लोग आपकी प्रसंशा करने से नहीं भूलेंगे।

एक सप्ताह बाद वही शास्त्री अपने विश्वासियों के द्वारा किसी बीमार से पीड़ित के घर देखे गये और उसने उसे कई आश्वासन दिये और वह वहाँ से चला गया, उसके बाद वहीं पर एक दूसरा व्यक्ति आया और उसने उस बीमार व्यक्ति की सेवा की और आर्थिक मद्द भी किया। इन दोनों व्याक्तियों में शास्त्री और एक आम व्यक्ति में फर्क इतना था की साधारण व्यक्ति बीमार से पीड़ित व्यक्ति के हदय को पहचाना, जबकि शास्त्री केवल अपने ज्ञान और धन दौलत से आशक्त था उसने उस बीमार से पीड़ित के हदय को नहीं पहचान सका। आज के सुसमाचार में प्रभु येसु एक कगांल विधवा की प्रसंशा किये बिना नहीं रह सके, क्योंकि येसु उसके हदय के भावना को समझते थे। इस लिए ईसा ने अपने शिष्यों को बुलाकर कहा, ’’मैं तुमसे यह कहता हॅँू-खजाने में पैसा डालने वालों में से इस विधवा ने सबसे अधिक डाला हैं क्योंकि सब ने अपनी समृध्दि से कुछ डाला, परन्तु इसने तंगी मे रहते हुए भी जीविका के लिए अपने पास जो कुछ था, वह सब दे डाला। (मारकुस 12:43-44)



📚 REFLECTION



When we read today’s gospel what comes first to our mind is that, how is our spiritual life? Is it in conformity with our life? There is a story told of a Scribe. Once he was giving a sermon, to make his sermon gorgeous and catch the interest of the faithful; he cited numerous instances. Having listened to his sermon one of the attendants asked him, you have really won the heart of the listeners; People would never forget your sermon.

After a week the same Scribe was seen by the same people who had heard him speaking so emphatically in the sermon met a sick man, and gave a lot of assurances and went away; incidentally after that a simple ordinary man also reached to the sick man and took care of him. He did everything to make his life happy that he could do. When we see the life of these two men what difference we find is that; the Scribe was a selfish man he was worried about himself where as the ordinary man was really concerned about the wellbeing of the sick man; he could touch his heart and where as the Scribe was far away from him.

That’s why Jesus in today’s gospel praised the widow because Jesus understood the emotion of heart and called his disciples and said to them, “Truly I tell you, this poor widow has put in more than all those who are contributing to the treasury. For all of them have contributed out of their abundance; but she out of her poverty has put in everything she had, all she had to live on.”(Mk.12:43-44).


 -Br Biniush Topno


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शुक्रवार, 04 जून, 2021 वर्ष का नौवाँ सप्ताह

 

शुक्रवार, 04 जून, 2021

वर्ष का नौवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : टोबीत का ग्रन्थ 11:5-17


5) इस बीच अन्ना बाहर बैठी हुई अपने पुत्र की राह देख रही थी।

6) उसने उसे आते देखा और उसके पिता से कहा, "देखो, तुम्हारा पुत्र और वह व्यक्ति, जो उसके साथ गया था, आ रहे हैं"।

7) पिता के पास पहुँचने से पहले रफ़ाएल ने टोबीयाह से कहा, "मैं जानता हूँ कि उनकी आँखें अच्छी हो जायेंगी।

8) उन की आँखों पर मछली का पित्त लगाओ। इस से मातियाबिन्द की झिल्ली उनकी आँखों पर से निकल जायेगी और तुम्हारे पिता फिर प्रकाश देख सकेंगे।"

9) अन्ना दौड़ते हुए अपने पुत्र से मिली और यह कहते हुए उसे गले लगाया, "बेटा! मैंने तुम को फिर देखा; अब मरने को तैयार हूँ" और वह रोने लगी।

10) टोबीत उठ कर लड़खड़ाता हुआ अपने आँगन के द्वार से निकला।

11) टोबीयाह हाथ में मछली का पित्त लिये उसके पास आया और उसे सँभालते हुए उसकी आँखों पर फँूक मारी और बोला, "पिताजी! ढारस रखिए!" इसके बाद उसने उन पर दवा लगायी

12) और अपने दोनों हाथों से अपने पिता की आँखों के कोरों से मोतियाबिन्द की झिल्ली निकाली।

13) टोबीत ने अपने पुत्र को देख कर उसे गले लगाया

14) और रोते हुए उस से कहा, "बेटा! मैं तुम को, अपनी आँखों की ज्योति को देखता हूँ" उसने फिर कहा, "धन्य है ईश्वर, धन्य है उसका महान् नाम और उसके सब स्वर्गदूत युग-युग धन्य है;

15) क्योंकि उसने मुझे मारा और अब वह मुझे अपने पुत्र टोबीयाह के दर्शन कराता है"। टोबीत और उसकी पत्नी अन्ना आनन्दित को कर घर के अन्दर आये और उन्होंने ऊँचे स्वर में ईश्वर को धन्यवाद देते हुए सबों को बताया कि उनके साथ क्या-क्या हुआ। टोबीयाह ने अपने पिता को बताया कि उसकी यात्रा प्रभु-ईश्वर की कृपा से सफ़ल रही, वह रुपया ले आया, उसने रगुएल की पुत्री से विवाह किया और यह कि वह आने वाली है, क्योंकि यह नीनवे के फ़ाटक पर पहुँच रही है। यह सुनकर टोबीत और अन्ना को बडा आनन्द हुआ

16) और वे अपनी बहू की अगवानी करने नीनवे के फाटक गये। जब नीनवे के निवासियों ने देखा कि टोबीत पूर्ण स्वस्थ हो कर चलता-फिरता है और कोई उसका हाथ पकड़ कर उसे नहीं ले चलता, तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ।

17) उनके सामने ऊँचे स्वर में ईश्वर को धन्यवाद देते हुए टोबीत यह बताता था कि ईश्वर ने उस पर कैसे दया की और उसकी आँखों को अच्छा किया। टोबीत ने अपने पुत्र टोबीयाह की पत्नी सारा के पास आ कर उसे यह कहते हुए आशीर्वाद दिया, " पुत्री ! सकुशल पधारो। पुत्री!



सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 12:35-37



35) ईसा ने, मन्दिर में शिक्षा देते समय, यह प्रश्न उठाया, “शास्त्री लोग कैसे कह सकते हैं कि मसीह दाऊद के पुत्र हैं?

36) दाऊद ने स्वयं पवित्र आत्मा की प्रेरणा से कहा- प्रभु ने मेरे प्रभु से कहा, तुम तब तक मेरे दाहिने बैठे रहो, जब तक मैं तुम्हारे शत्रुओं को तुम्हारे पैरों तले न डाल दूँ।

37) दाऊद स्वयं उन्हें प्रभु कहते हैं, तो वह उनके पुत्र कैसे हो सकते हैं?" एक विशाल जन समूह बड़ी रुचि से ईसा की बातें सुन रहा था।



📚 मनन-चिंतन


हम जानते हैं कि हर व्यक्ति का अपना अलग पहचान होता है और उसी पहचान से उसे जाना या पुकारा जाता है। यह पहचान व्यक्ति के नाम से भी संबंध रखता है। जैसे कि आज के सुसमाचार पाठ में हम पाते हैं, ईसा ने मंदिर में शिक्षा देते समय, प्रश्न उठायाय शास्त्री लोग कैसे कह सकते हैं कि मसीह दाऊद के पुत्र हैं? (मारकुस 12:35) जब हम किसी प्रसिध्द व्यक्ति के बारे में पढ़ते या सुनते हैं, तब हम सबसे पहले उसके उदगम को जानना चाहते है, और वह उसका पहचान बन जाता है। स्त्रोत्र 110:1 में हम पढ़ते हैं, प्रभु ने मेरे प्रभु ने कहाः तुम मेरे दहिने बैठ जाओ मैं तुम्हारे शत्रुओं को तुम्हारा पावदान बना दूँगा। यहाँ पर ईसा एक अखडनीय तथ्य के बारे में बताते हैं कि ईसा दाऊद के पुत्र हैं। असल में ईसा के दिनों में शास्त्री और यहुदी नये विधान और कलीसिया की पुष्टि करते हैं। इसी को हम संत पौलुस के नाम फिलिपियों 2:9 में पाते हैं इसलिए ईश्वर ने उन्हें महान बनाया और उन को वह नाम प्रदान किया, जो सब नामों में श्रेष्ठ है।

आइये हम आज के सुसमाचार को समझने का प्रयास करें और मनन-चिंतन करें जिससे हम ईसा मसीह को जाने एवं पहचान सकें। हम स्वयं से प्रश्न करें क्या हमारा बुध्दि, ज्ञान ईसा मसीह पर कितना गहरा है?



📚 REFLECTION



We know that each individual has an identity, and he/she is known and called by that identity. This identity also signifies the particular trait of the individual. We find it in today’s gospel reading, while Jesus was teaching in the temple, he said, “How can Scribes say that the Messiah is the son of David”? (Mk12:35). When we read or hear about well-known personality; we at first enquire his/ her whereabouts and origin, and it becomes his/ her identity or whole mark. Psalm 110: 1 The Lord says to my lord, “Sit at my right hand until I make your enemies your footstool”. Here Jesus makes an irrefutable fact that he is the son of David. In fact during the time of Jesus, the Scribes and the Jewish people testify the New Testament and the church. We find this in St. Paul’s letter to the Philippians 2:9, Therefore God also highly exalted him and gave him the name that is above every name”.

As we meditate today on this gospel passage, let’s try to understand the true message of Jesus, so that we may be able to know and understand Jesus more deeply.


 -Br Biniush Topno


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गुरुवार, 03 जून, 2021 वर्ष का नौवाँ सप्ताह

 

गुरुवार, 03 जून, 2021

वर्ष का नौवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : टोबीत का ग्रन्थ 6:10-12; 7:1,9-12,15-16; 8:1,4-9



6:10) मेदिया में प्रवेश करने के बाद और एकबतना के पास पहुँच कर

11) रफ़ाएल ने युवक से कहा, "भाई टोबीयाह! "उसने उत्तर दिया, "मैं प्रस्तुत हूँ"। उसने कहा, "हमें यह रात रागुएल के यहाँ बितानी है। वह तुम्हारा सम्बन्धी है और उसके सारा नामक एक पुत्री है।

12) उसके कोई पुत्र नहीं है और सारा के सिवा उसके कोई पुत्री भी नहीं। तुम उसके सब से निकट सम्बन्धी हो। तुम को उसके साथ विवाह करने और उसके पिता की सम्पत्ति का पहला अधिकार है। क़न्या समझदार, स्वस्थ और बहुत भली है। उसका पिता उसे बहुत प्यार करता है।"

7:1) एकबतना पहुँच कर उसने कहा, "भाई अज़र्या! मुझे सीधे हमारे भाई रागुएल के पास ले जाओ"। वह उसे रागुएल के घर ले गया। वह अपने आँगन के द्वार पर बैठा हुआ था। उन्होंने उसे पहले प्रणाम किया। उसने उन से कहा, "भाइयो! भले-चंगे रहो। तुम्हारा स्वागत है|" वह उन्हें घर के अन्दर ले गया

9) रागुएल ने अपनी भेड़ों में से एक का वध किया और उनका सहर्ष स्वागत किया। उन्होंने नहाया और अपने को पवित्र किया और जब वे भोजन करने बैठे, तो टोबीयाह ने रफ़ाएल से कहा, "भाई अज़र्या! रागुएल से कहो कि वह मुझे मेरी बहन सारा को दे दें"।

10) रागुएल ने यह सुन कर युवक से कहा, "भाई! इस रात आनन्द मनाते हुए खाओ-पिओ तुम्हारे सिवा कोई मनुष्य मेरी पुत्री सारा से विवाह करने योग्य नहीं है। तुम को छोड़ कर उसे दूसरे पुरुष को देने का मुझे अधिकार भी नहीं है, क्योंकि तुम सब से निकट सम्बन्धी हो।

11) मैं उसे अपने भाइयों में से सात पुरुषों को दे चुका हूँ और जिस रात वे उसके पास गये, उसी रात सब की मृत्यु हो गयी। पुत्र! अब खाओ-पियो! प्रभु तुम दोनों का भला करे।" टोबीयाह ने उत्तर दिया, "जब तब आप मुझे अपनी पुत्री सारा को देने की प्रतिज्ञा नहीं करेंगे, तब तक मैं कुछ नहीं खाऊँगा-पिऊँगा"। रागुएल ने उस से कहा, "प्रतिज्ञा करता हूँ। मूसा की संहिता के निर्णयों के अनुसार वह तुम्हारी है। उसके साथ तुम्हारा विवाह स्वर्ग में निश्चित किया गया है। अपनी बहन को अपनाओ। अब से तुम उस के भाई हो और वह तुम्हारी बहन है। आज वह सदा के लिए तुम्हें दी जाती है। पुत्र! स्वर्ग का ईश्वर तुम्हारा कल्याण करे और इस रात तुम पर दया करे और शान्ति प्रदान करे।"

12) रागुएल ने अपनी पुत्री सारा को बुलाया और वह उसके पास आयी। उसने उसका हाथ पकड़ कर यह कहते हुए उसे टोबीयाह को दिया, "मूसा के ग्रन्थ में निर्धारित विवाह-विधि के अनुसार इसे अपनाओ। यह तुम्हारी पत्नी है। इसे सकुशल अपने पिता के घर ले जाओ। स्वर्ग का ईश्वर तुम लोगों को सुरक्षित यात्रा और शान्ति प्रदान करे।"

15) रागुएल ने अपनी पत्नी एदना को बुला कर उस से कहा, "बहन! दूसरा कमरा तैयार करो और सारा को वहाँ ले जाओ"।

16) उसने जा कर उसके कहने के अनुसार पलंग तैयार किया और अपनी पुत्री को कमरे में ले जा कर उसके लिए रोने लगी। तब उसने आँसू पोंछ कर उस से कहा, "बेटी! ढारस रखो। स्वर्ग का ईश्वर तुम को दुःख के बदले आनन्द प्रदान करे। ढारस रखो।" इसके बाद वह चली गयी।

8:1) वे भोजन के बाद विश्राम करना चाहते थे। उन्होंने युवक को ले जा कर सारा के कमरे में पहुँचा दिया।

4) माता-पिता ने कमरे से बाहर आ कर उसका दरवाज़ा बन्द कर दिया। टोबीयाह ने पलंग से उठ कर सारा से कहा, "बहन! उठो। हम प्रार्थना करें और अपने प्रभु से निवेदन करें कि वह हम पर दया करें और हमें सुरक्षित रखे"।

5) वह उठी और दोनों प्रार्थना करने लगे। उन्होंने प्रभु से निवेदन किया कि वह उन्हें सुरक्षित रखे। वे कहने लगे, "हमारे पूर्वजों के प्रभु! तू धन्य है! तेरा नाम युग-युग तक धन्य है। आकाश और सारी सृष्टि तुझे अनन्त काल तक धन्य कहे।

6) तूने आदम की सृष्टि की और उसे स्थायी सहयोगिनी के रूप में हेवा को प्रदान किया। उन दोनों से मानवजाति की उत्पत्ति हुई है। तूने कहा कि अकेला रहना मनुष्य के लिए अच्छा नहीं। इसलिए हम उसके लिए सदृश एक सहयोगिनी बनायें।

7) अब मैं काम-वासना से प्रेरित हो कर नहीं, बल्कि धर्म के अनुसार अपनी इस बहन को पत्नी के रूप में ग्रहण करता हूँ। इस पर और मुझ पर दया कर और ऐसा कर कि हम दोनों बुढ़ापे तक सकुशल साथ रहें।"

8) दोनों ने कहा, "आमेन! आमेन!

9) और वे रात बिताने के लिए पलंग पर लेट गये।



सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 12:28-34



28) तब एक शास्त्री ईसा के पास आया। उसने यह विवाद सुना था और यह देख कर कि ईसा ने सदूकियों को ठीक उत्तर दिया था, उन से पूछा, “सबसे पहली आज्ञा कौन सी है?“

29) ईसा ने उत्तर दिया, “पहली आज्ञा यह है- इस्राएल, सुनो! हमारा प्रभु-ईश्वर एकमात्र प्रभु है।

30) अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा, अपनी सारी बुद्धि और सारी शक्ति से प्यार करो।

31) दूसरी आज्ञा यह है- अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो। इनसे बड़ी कोई आज्ञा नहीं।“

32) शास्त्री ने उन से कहा, “ठीक है, गुरुवर! आपने सच कहा है। एक ही ईश्वर है, उसके सिवा और कोई नहीं है।

33) उसे अपने सारे हृदय, अपनी सारी बुद्धि और अपने सारी शक्ति से प्यार करना और अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करना, यह हर प्रकार के होम और बलिदान से बढ़ कर है।“

34) ईसा ने उसका विवेकपूर्ण उत्तर सुन कर उस से कहा, “तुम ईश्वर के राज्य से दूर नहीं हो"। इसके बाद किसी को ईसा से और प्रश्न करने का साहस नहीं हुआ।



📚 मनन-चिंतन



विधि-विवरण गंन्थ 6:4-5 में हम पढ़ते हैं। इस्राइल सुनो। हमारा प्रभु-ईश्वर एक मात्र प्रभु है। तुम अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हदय, अपनी सारी आत्मा और अपनी सारी शक्ति से प्यार करो। ये पंक्तियाँ हर धर्म परायण व्यक्ति के लिए एक औषधि की तरह है। क्योंकि मनुष्य का जीवन एक संघर्ष है। संसार एव अध्यामिकता के बीच का संघर्ष है। जब हम आज के सुसमाचार पर मनन चितंन करते है, तो हमें ज्ञात होता है कि आज्ञापालन जीवन के हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण है, चाहे यह पारिवारिक जीवन हो, समाजिक जीवन हो या अध्यात्मिक। इसलिए जब शास्त्री ने ईसा से पूछा, सबसे पहली आज्ञा कौन सी है। संत योहन के सुसमाचार में ईसा उसे कहते हैं, तुम लोग यह समझकर धर्मग्रन्थ का अनुशीलन करते हो कि उसमें तुम्हें अनन्त जीवन का मार्ग मिलेगा।

शास्त्री और ईसा के बीच का प्रसंग हमारे जीवन के लिए स्तंभ खडा करने जैसा है, जहाँ से हम ईसा की शिक्षा को अच्छी तरह सुन और समझ सकते है। इसे संत पौलुस तिमथी के नाम अपने दूसरे पत्र अध्याय 2:7 में कहते हैं, तुम मेरी बातों पर अच्छी तरह विचार करो, क्योंकि प्रभु सब बातें पूर्णरूप से समझने में तुम्हारी सहायता करेगा।

आइये हम आज के सुसमाचार को समझने का प्रयास करें तथा दृढ़ संकल्प लें कि हम ईश्वर के आज्ञापालन में हमेशा तत्पर रह कर ईश्वर के राज्य का रहस्य के योग्य रीति से जी सकें तथा इसके प्राप्ति के लिए प्रार्थना करें।



📚 REFLECTION



We read in the book of Deuteronomy 6:4-5, Hear, O Israel: The Lord is our God, the Lord alone. You shall love the Lord your God with all your heart, and with all your soul, and with all your might. These lines are like a medicine for a righteous man, because there is a constant tow between the powers of the just and the unjust powers. And when we reflect on this passage we come to know that obedience is an imperative in every aspect of our life; may it be the family life, social life, or religious life. Which is why the Scribe asks Jesus in the gospel today,” which commandment is the first of all’. In the gospel of St. John Jesus says,’ you search the scriptures because you think that in them you have eternal life; and it is they that testify on my behalf’.

The context between the Scribe and Jesus is like a foundation from where we can and understand the teachings of Jesus clearly. To this St. Paul in his epistle to Timothy says,’ Think over what I say, for the Lord will give you understanding in all things’.

Today let us try to understand the core message of the gospel and take a resolution to practice it in our daily lives; that we may be able to live the values of the kingdom of God.


 -Br Biniush Topno



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बुधवार, 02 जून, 2021 वर्ष का नौवाँ सप्ताह

 

बुधवार, 02 जून, 2021

वर्ष का नौवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : टोबीत का ग्रन्थ 3:1-11, 16-17


1) मैं बड़ा दुःखी हो कर कराहते और आँसू बहाते हुए इस प्रकार प्रार्थना करने लगा,

2) "प्रभु! तू न्यायी है और तेरे समस्त कार्य न्यायपूर्ण हैं। तेरे सभी मार्ग दया और सच्चाई के हैं। तू संसार का न्याय करता है।

3) प्रभु! अब मुझे याद कर। मुझे मेरे पापों का दण्ड न दे। मेरे और मेरे पूर्वजों के अपराध भुला।

4) हम लोगों ने तेरी आज्ञाओं का पालन नहीं किया, इसलिए हम लूट, निर्वासन एवं मृत्यु के शिकार बने हुए हैं और तूने हमें जिन राष्ट्रों में बिखेरा, वहाँ हम अपमानित हुए हैं।

5) प्रभु! तेरा दण्ड सही है; क्योंकि हमने तेरी आज्ञाओं का पालन नहीं किया और हम तेरे प्रति ईमानदार नहीं रहे।

6) इसलिए, प्रभु! जैसी तेरी इच्छा हो, मेरे साथ वैसा ही व्यवहार कर। मुझे उठा लेने की कृपा कर, क्योंकि मेरे लिए जीवन की अपेक्षा मरण अच्छा है। मैं झूठी निन्दा सुनते-सुनते तंग आ गया हूँ। मैं बड़ा दुःखी हूँ। प्रभु! मुझ से यह कष्ट दूर कर। मुझे अपने शाश्वत निवास में प्रवेश करने दे। प्रभु! मुझ से अपना मुख न छिपा। जीवन भर इस प्रकार का कष्ट सहते और निन्दा सुनते रहने की अपेक्षा मेरे लिए मरण अच्छा है।"

7) उसी दिन, मेदिया के एकबतना नामक नगर में, रागुएल की पुत्री सारा को भी अपने पिता की एक नौकरानी की फटकार सुननी पड़ी।

8) सारा का विवाह सात बार हुआ था और सारा के पति का संसर्ग होने के पहले ही अस्मादेव नामक पिशाच ने क्रमशः सातों को उसके पास आते ही मार डाला था। नौकरानी ने सारा से कहा, "पतियों की हत्यारिन! तुम को सात पति मिल चुके हैं और तुम किसी की नहीं बन सकी।

9) अपने मरे हुए पतियों के कारण हम को क्यों डाँटती हो? उनके पास चली जाओ। अच्छा हो कि हम तुम्हारे पुत्र या तुम्हारी पुत्री को कभी नहीं देखें।"

10) उस दिन सारा को बड़ा दुःख हुआ। वह रोते हुए पिता के घर की छत पर जा कर अपने को फाँसी लगाना चाहती थी। फिर वह सोचने लगी-कहीं ऐसा न हो कि लोग यह कहते हुए मेरे पिता का अपमान करें: "तुम्हारी एक ही प्यारी पुत्री थी और उसने अपने दुःख के कारण फाँसी लगा ली" और इस तरह मैं अपने बूढ़े पिता की मृत्यु का कारण बनूँगी। मेरे लिएक अच्छा यह है कि मैं अपने को फ़ाँसी न लगाऊँ, बल्कि ईश्वर से प्रार्थना करूँ कि मैं मर जाऊँ, जिससे मुझे अपने जीवन में मर जाऊँ, जिससे मुझे अपने जीवन में और अपमान नहीं सुनना पड़े।

11) इसके बाद वह खिड़की के पास हाथ पसारे इस प्रकार प्रार्थना करने लगीः "दयालु प्रभु-ईश्वर! तू धन्य है। तेरा पवित्र और सम्मान्य नाम सदा-सर्वदा धन्य है। तेरे सभी कार्य सदा-सर्वदा तुझे धन्य कहें।

16) प्रभु-ईश्वर ने उन दोनों की प्रार्थनाएँ सुनीं।

17) स्वर्गदूत रफ़ाएल उनके पास भेजा गया, जिससे वह उन दोनों को स्वस्थ करे-वह टोबीत का मोतियाबिन्द दूर करे और रागुएल की बेटी सारा का विवाह टोबीत के पुत्र टोबीयाह से कराये। साथ ही अस्मादेव पिशाच को बन्दी बना ले; क्योंकि सारा टोबीयाह की होने जा रही थी। इधर टोबीत घर लौटा और उधर रागुएल की पुत्री सारा छत से नीचे उतरी।

सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 12:18-27


18) इसके बाद सदूकी उनके पास आये। उनकी धारणा है कि पुनरुत्थान नहीं होता। उन्होंने ईसा के सामने यह प्रश्न रखा,

19) "गुरुवर! मूसा ने हमारे लिए यह नियम बनाया- यदि किसी का भाई, अपनी पत्नी के रहते निस्सन्तान मर जाये, तो वह उसकी विधवा को ब्याह कर अपने भाई के लिए सन्तान उत्पन्न करे।

20) सात भाई थे। पहले ने विवाह किया और वह निस्सन्तान मर गया।

21) दूसरा उसकी विधवा को ब्याह कर निस्सन्तान मर गया। तीसरे के साथ भी वही हुआ,

22) और सातों भाई निस्सन्तान मर गये। सब के बाद वह स्त्री भी मर गयी।

23) जब वे पुनरुत्थान में जी उठेंगे, तो वह किसकी पत्नी होगी? वह तो सातों की पत्नी रह चुकी है।"

24) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, "कहीं तुम लोग इसीलिए तो भ्रम में नहीं पड़े हुए हो कि तुम न तो धर्मग्रन्थ जानते हो और न ईश्वर का सामर्थ्य?

25) क्योंकि जब वे मृतकों में से जी उठते हैं, तब न तो पुरुष विवाह करते और न स्त्रियाँ विवाह में दी जाती है; बल्कि वे स्वर्गदूतों के सदृश होते हैं।

26) "जहाँ तक पुनरुत्थान का प्रश्न है, क्या तुम लोगों ने मूसा के ग्रन्थ में, झाड़ी की कथा में, यह नहीं पढ़ा कि ईश्वर ने मूसा से कहा- मैं इब्राहीम का ईश्वर, इसहाक का ईश्वर और याकूब का ईश्वर हूँ?

27) वह मृतकों का नहीं, जीवितों का ईश्वर है। यह तुम लोगों का भारी भ्रम है।“



📚 मनन-चिंतन


मानवीय इतिहास की प्रत्यके संस्कृति में जो अस्तित्व में आया है उसका मृत्यु और पुनरूत्थान के प्रति अलग-अलग धारणा है। हम ख्रीस्तीयों के लिए मृत्यु पुनरूत्थान की आशा है। इसको हम आज के सुसमाचार में पाते हैं जहाँ ईश्वर मूसा से कहते हैं,-’’मैं इब्राहीम का ईश्वर, इसहाक का ईश्वर और याकूब का ईश्वर हूँ’’(मारकुस 12ः26) लेकिन ईसा के प्रतिद्वन्दी पुनरूत्थान और अनन्त जीवन पर विश्वास नहीं करते थे। वे केवल मूसा की पाँच किताबों पर विश्वास करते थे। (उत्पत्ति ग्रंथ, निगर्मन ग्रंथ, लेवी ग्रंथ, गणना ग्रंथ और विधि विवरण ग्रंथ)। वे ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास तो करते है पर वे उन सभी तत्थयों को स्वीकार नहीं करते थे जो कि अप्राकृतिक था। वे अपने जीवन में शक्ति और फायदे के लिए जीते थे और मृतकों के पुनरूत्थान पर विश्वास नहीं करते थे। इस लिए वे सदूकी कहे गये। ’’क्योंकि सदूकीयों की धारणा है कि न तो पुनरूत्थान है, न स्वर्गदूत और न आत्मा। परन्तु फारीसी इन पर विश्वास करते हैं।’’ (प्रेरित चरित 23:8)।

ईसा ईश्वर के पुत्र हमें सिखाया है कि ईश्वर संपूर्ण विश्व का स्ष्टिकर्त्ता है और वह अपने मापदंड के अनुसार उसे बनाये रखता एवं उसकी देखभाल करता है वह हमें अंनन्त जीवन देता है। ईसा ने उसे कहा, -’’मार्ग सत्य और जीवन मैं हूँ। मुझसे होकर गये बिना कोई पिता के पास नहीं आ सकता।’’ (योहन 14:6)।

आइये हम आपने आपसे पुछें पुनरूत्थान पर हमारा विश्वास कितना गहरा है? क्या हम ईश्वर के सर्वशाक्तिमता पर विश्वास करते हैं?, या हम उन सदूकीयों की तरह अपने जीवनशैली या शाक्ति पर विश्वास करते हैं।

आइये आज हम पुनरूत्थान पर अटूट विश्वास करने के लिए वर मांगे।



📚 REFLECTION



In the history of mankind every culture that has come into existence, has its different belief systems on death and resurrection. For us Christian’s death is the hope of the resurrection. It is clear from the text (Mk.12:26), gospel reading of the day, where God says to Moses,” I am the God of Abraham, the God of Isaac, and the God of Jacob”. But the Sadducees didn’t believe in the resurrection and afterlife, they only believed in the five books of Moses (Genesis, Exodus, Leviticus, Numbers and Deuteronomy). The Sadducees only believed in their power and benefits. That is why they are called saddu –yu see. The Sadducees say that there is no resurrection, or angel, or spirit; but Pharisees acknowledge all three. (Acts 23:8)

Jesus the son of God teaches us that God is the creator of everything and he looks after in his own way and gives eternal life. Jesus said to him,” I am the way, and the truth, and the life”. No one comes to the father except through me. (Jn.14:6).

Let us ask ourselves, how deep is our faith in the resurrection? Do we believe in the almighty power of God? Or we also stumble and hesitate and depend on reasoning as the Sadducees do? Today let us ask God to give us grace to have a strong faith in the resurrection and eternal life.


 -Br Biniush Topno



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