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15 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

15 अक्टूबर 2020
वर्ष का अट्ठाइसवाँ सामान्य सप्ताह, गुरुवार

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📒 पहला पाठ :एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 1:1-10

1) सन्तों और ईसा मसीह के विश्वासियों के नाम पौलुस का पत्र, जो ईश्वर द्वारा ईसा मसीह का प्रेरित नियुक्त हुआ है।

2) हमारा पिता ईश्वर और प्रभु ईसा मसीह आप लोगों को अनुग्रह तथा शान्ति प्रदान करें।

3) धन्य है हमारे प्रभु ईसा मसीह का ईश्वर और पिता! उसने मसीह द्वारा हम लोगों को स्वर्ग के हर प्रकार के आध्यात्मिक वरदान प्रदान किये हैं।

4) उसने संसार की सृष्टि से पहले मसीह में हम को चुना, जिससे हम मसीह से संयुक्त हो कर उसकी दृष्टि में पवित्र तथा निष्कलंक बनें।

5) उसने प्रेम से प्रेरित हो कर आदि में ही निर्धारित किया कि हम ईसा मसीह द्वारा उसके दत्तक पुत्र बनेंगे। इस प्रकार उसने अपनी मंगलमय इच्छा के अनुसार

6) अपने अनुग्रह की महिमा प्रकट की है। वह अनुग्रह हमें उसके प्रिय पुत्र द्वारा मिला है,

7) जो अपने रक्त द्वारा हमें मुक्ति अर्थात् अपराधों की क्षमा दिलाते हैं। यह ईश्वर की अपार कृपा का परिणाम है,

8) जिसके द्वारा वह हमें प्रज्ञा तथा बुद्धि प्रदान करता रहता है।

9 (9-10) उसने अपनी मंगलमय इच्छा के अनुसार निश्चय किया था कि वह समय पूरा हो जाने पर स्वर्ग तथा पृथ्वी में जो कुछ है, वह सब मसीह के अधीन कर एकता में बाँध देगा। उसने अपने संकल्प का यह रहस्य हम पर प्रकट किया है।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस 11:47-54

47) धिक्कार तुम लोगों को! क्योंकि तुम नबियों के लिए मक़बरे बनवाते हो, जब कि तुम्हारे पूर्वजों ने उनकी हत्या की।

48) इस प्रकार तुम अपने पूर्वजों के कर्मों की गवाही देते हो और उन से सहमत भी हो, क्योंकि उन्होंने तो उनकी हत्या की और तुम उनके मक़बरे बनवाते हो।

49) ’’इसलिए ईश्वर की प्रज्ञा ने यह कहा-मैं उनके पास नबियों और प्रेरितों को भेजूँगा; वे उन में कितनों की हत्या करेंगे और कितनो पर अत्याचार करेंगे।

50) इसलिए संसार के आरम्भ से जितने नबियों का रक्त बहाया गया है-हाबिल के रक्त से ले कर ज़करियस के रक्त तक, जो वेदी और मन्दिरगर्भ के बीच मारा गया था-

51) उसका हिसाब इस पीढ़ी को चुकाना पड़ेगा। मैं तुम से कहता हूँ, उसका हिसाब इसी पीढ़ी को चुकाना पड़ेगा।

52) ’’शास्त्रियों, धिक्कार तुम लोगों को! क्योंकि तुमने ज्ञान की कुंजी ले ली। तुमने स्वयं प्रवेश नहीं किया और जो प्रवेश करना चाहते थे, उन्हें रोका।’’

53) जब ईसा उस घर से निकले, तो शास्त्री, और फ़रीसी बुरी तरह उनके पीछे पड़ गये और बहुत-सी बातों के सम्बन्ध में उन को छेड़ने लगे।

54) वे इस ताक में थे कि ईसा के किसी-न-किसी कथन में दोष निकाल लें।

📚 मनन-चिंतन

आज का पहला पाठ जो एफिसियों नाम संत पौलुस का पत्र से लिया गया है, हमारे प्रति ईश्वर की प्रेममय एवं शाश्वत योजना को दर्शाती है। ईश्वर ने मसीह द्वारा हम लोगों को स्वर्ग के हर प्रकार के आध्यात्मिक वरदान प्रदान किये हैं। उसने संसार की सृष्टि से पहले मसीह में हम लोगों को चुना,जिससे हम मसीह से संयुक्त हो कर उसकी दृष्टी में पवित्र तथा निष्कलंक बनें।

उनके प्रेम में बने रहने के लिए ईश्वर ने नबियों और अन्य दूतों को समय समय पर भेजा कि हम उनकी योजना को जानें और उनके प्रेम में बने रहें। परंतु लोगों ने उनकी बातों को सुनने से इनकार कर दिया, उन्हें मार डाला। फरिसि और शास्त्री लोग, ईश्वर की योजना और प्रेम की जानकारी रखते हुए, न स्वयं उनके अनुसार जीते थे न दूसरों जीने देते थे। इस बात के लिए येसु फरीसियों और शास्त्रियों की निंदा करता था।

परमेश्वर अपने दूतों और संतों के माध्यम से अपनी कलीसिया को शिक्षा देना और मार्गदर्शन करना जारी रखता है। आज कालिया एक ऐसे महान संत का, अविला की संत तेरेसा, का त्यौहार मानती है। संत तेरेसा कुंवारी और कलीसिया की एक धर्माचार्या के रूप में जानी जाती है। ईश्वर ने संत तेरेसा को चुना और उसे आध्यात्मिक अनुभवों से संपन्न किया।उन्हें ईश्वर ने अपने जीवन, लेखन और शिक्षा द्वारा कलीसिया का नवनीकरण का एक सशक्त साधन बनाया।

आज के दिन हम संत तेरेसा एक के एक उद्धरण को याद करें जिसके द्वारा उनका आध्यात्मिक अनुभव और शिक्षा को हम समझ सकें: “मसीह के पास अब कोई शरीर नहीं है, लेकिन तुम्हारा है। न हाथ, न धरती पर पैर, बल्कि तुम्हारा। आपकी आंखें हैं जिनके माध्यम से मसीह दुनिया में दया की भावना रखते हैं। आपके पैर ऐसे हैं जिनके साथ मसीह अच्छाई करने के लिए चलता है। तुम्हारा वह हाथ है जिसके साथ मसीह दुनिया को आशीर्वाद देता है।“

हम भी संत तेरेसा के समान ईश्वर के सामने पवित्र और निष्कलंक बने रहने केलिए बुलाये गए हैं। यह बुलाहट कुछ लोगों के लिए सीमित नहीं है; हम सभी पवित्रता के लिए बुलाये गए हैं। आइए हम प्रार्थना करें कि हम उस महान बुलाहट को पहचान सकें, जिसे ईश्वर ने हमें अपने प्रेम में बुलाया है और दूसरों को भी ईश्वर के प्रेम का अनुभव करने में मदद कर सकें।


📚 REFLECTION

The first reading from the letter to the Ephesians shows God’s eternal plan of love for us. God has blessed us in Christ with every spiritual blessing in the heavenly places. Before the foundation of the world, God chose us in Christ, to be holy and spotless, to live through love in his presence.

God sent us his prophets and apostles from time to time to reveal this love of God and his plan and to help us to remain in his love. People refused to listen to them and persecuted and killed them. The Pharisees and the lawyers, entrusted with the knowledge, neither entered themselves nor allowed others to enter. This is the condemnation that Jesus has for Pharisees and lawyers.

God continues to teach and guide the church through his messenger and holy souls. Today the church celebrates the feast of one such great saint, St. Teresa of Jesus (Avila), virgin and Doctor of the Church. God chose her and endowed her with intimate spiritual experiences. God made her an instrument of renewal within the Church by her life, writings and teachings.

Today let us remember a quote from St. Teresa which helps us to understand her spiritual experience and teaching: “Christ has no body now, but yours. No hands, no feet on earth, but yours. Yours are the eyes through which Christ looks compassion into the world. Yours are the feet with which Christ walks to do good. Yours are the hands with which Christ blesses the world.”

Like St. Teresa, we too are called to be holy and blameless in God’s presence. The call to holiness is not limited to some people; all are called to be holy. Let us pray that we may recognize the great vocation to which God has called us in his love and help others also to experience God’s love.

 -Br. Biniush Topno


14 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

14 अक्टूबर 2020
वर्ष का अट्ठाइसवाँ सामान्य सप्ताह, बुधवार

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📒 पहला पाठ : गलातियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 5:18-25

18) यदि आप आत्मा की प्रेरणा के अनुसार चलते है, तो संहिता के अधीन नहीं हैं।

19) शरीर के कुकर्म प्रत्यक्ष हैं, अर्थात् व्यभिचार, अशुद्धता, लम्पटता,

20) मूर्तिपूजा, जादू-टोना, बैर, फूट, ईर्ष्या, क्रोध, स्वार्थ-परता, मनमुटाव, दलबन्दी,

21) द्वेष, मतवालापन, रंगरलियाँ और इस प्रकार की और बातें। मैं आप लोगों से कहता हूँ जैसा कि मैंने पहले भी कहा- जो इस प्रकार का आचरण करते हैं, वे ईश्वर के राज्य के अधिकारी नहीं होंगे।

22) परन्तु आत्मा का फल है-प्रेम, आनन्द, शान्ति, सहनशीलता, मिलनसारी, दयालुता ईमानदारी,

23) सौम्यता और संयम। इनके विरुद्ध कोई विधि नहीं है।

24) जो लोग ईसा मसीह के हैं, उन्होंने वासनाओं तथा कामनाओं-सहित अपने शरीर को क्रूस पर चढ़ा दिया है।

25) यदि हमें आत्मा द्वारा जीवन प्राप्त हो गया है, तो हम आत्मा के अनुरूप जीवन बितायें।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 11:42-46

42) ’’फ़रीसियो! धिक्कार तुम लोगों को! क्योंकि तुम पुदीने, रास्ने और हर प्रकार के साग का दशमांश तो देते हो; लेकिन न्याय और ईश्वर के प्रति प्रेम की उपेक्षा करते हो। इन्हें करते रहना और उनकी भी उपेक्षा नहीं करना, तुम्हारे लिए उचित था।

43 फ़रीसियो! धिक्कार तुम लोगों को! क्योंकि तुम सभागृहों में प्रथम आसन और बाज़ारों में प्रणाम चाहते हो।

44) धिक्कार तुम लोगों को! क्योंकि तुम उन क़ब्रों के समान हो, जो दीख नहीं पड़तीं और जिन पर लोग अनजाने ही चलते-फिरते हैं।’’

45) इस पर एक शास्त्री ने ईसा से कहा, ’’गुरूवर! आप ऐसी बातें कह कर हमारा भी अपमान करते हैं’’।

46) ईसा ने उत्तर दिया, ’’शास्त्रियों! धिक्कार तुम लोगों को भी! क्योंकि तुम मनुष्यों पर बहुत-से भारी बोझ लादते हो और स्वयं उन्हें उठाने के लिए अपनी तक उँगली भी नहीं लगाते।

📚 मनन-चिंतन

येसु से संयुक्त रहनेवालों की जीवनशैली के बारे में आज का पहला पाठ में बताया गया है। जो लोग येसु से संयुक्त रहते हैं उन्हें सभी भोग-विलास और सम्बन्धी इच्छाओं को क्रूस पर चढ़ाना होगा। मसीह से संबंधित होने का मतलब हैं पवित्र आत्मा से संचालित होना। इसके विपरीत भोग-विलास का अधीन होने का परिणाम हैं कई प्रकार के पाप, जैसे व्यभिचार, अशुद्धता, लम्पटता, मूर्तिपूजा, जादू-टोना, बैर, फुट, ईर्ष्या, इत्यादि। जबकि, जब कोई व्यक्ति आत्मा द्वारा संचालित किया जाता है तो इसका परिणाम हैं प्रेम, आनंद, शांति, सहनशीलता, मिलनसारी, दयालुता, ईमानदारी, सौम्यता और संयम (गलाति 5:22)। जो मसीह से संयुक्त रहता है उसे आत्मिक फलों का उत्पादन करना चाहिए, न की स्वयं की इच्छानुसार चलना।

आज का सुसमाचार फरीसियों और शास्त्रियों का उनके पाखंडों, गलत प्राथमिकताओं और आडंबरों के लिए कड़ी निंदा है। ये सब बातें भोग विलास और स्वार्थता के लक्षण हैं।

ईश्वर ने हमें अपनी आत्मा दी है और चाहता है कि हम उसके द्वारा संचालित हों। क्या आप पवित्र आत्मा के द्वारा संचालित हैं या अपनी स्वार्थी आत्मा से? इसकी पहचान करना आसान है। इस के लिए आपके जीवन में प्रकट फलों को देखना पर्याप्त है। जैसा कि येसु ने कहा है, एक वृक्ष अपने फलों से पहजाना जाता है।



📚 REFLECTION

The first reading of today from Galatians talks about the drastic demands of belonging to Christ, that is to crucify all self-indulgent passions and desires. Belonging to Christ means being led by the Spirit. The opposite is being led by self-indulgence which results in all kinds of sins to satisfy the self like fornication, gross indecency, sexual irresponsibility, etc. Whereas, when one is guided by the Spirit it results in love, joy, peace, patience, kindness, goodness, trustfulness, gentleness and self-control (Gal 5:22). One who belongs to Christ must produce spiritual fruits, not the works of self-indulgence.

The gospel is a strong condemnation of Pharisees and lawyers for their hypocrisy, wrong priorities, vainglory which are all signs of self-indulgence.

God has given us his Spirit and wants us to be guided by him. Are you guided by the Spirit or by our own selfish spirit? It is easy to identify. It is enough to look at the types of fruits your life bears. As Jesus said, a tree is known by its fruits.

 -Br. Biniush Topno

(Duliajan)

13 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

13 अक्टूबर 2020
वर्ष का अट्ठाइसवाँ सामान्य सप्ताह, मंगलवार

📒 पहला पाठ : गलातियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 5:1-6

1) मसीह ने स्वतन्त्र बने रहने के लिए ही हमें स्वतन्त्र बनाया, इसलिए आप लोग दृढ़ रहें और फिर दासता के जुए में नहीं जुतें।

2) मैं, पौलुस, आप लोगों से यह कहता हूँ- यदि आप ख़तना करायेंगे, तो आप को मसीह से कोई लाभ नहीं होगा।

3) मैं ,खतना कराने वाले हर एक व्यक्ति से फिर कहता हूँ कि उसे समस्त संहिता का पालन करना है।

4) यदि आप अपनी धार्मिकता के लिए संहिता पर निर्भर रहना चाहते हैं, तो आपने मसीह से अपना सम्बन्ध तोड़ लिया और ईश्वर की कृपा को खो दिया है।

5) हम तो उस धार्मिकता की तीव्र अभिलाषा करते हैं; जो विश्वास पर आधारित हैं और आत्मा द्वारा प्राप्त होती है।

6) यदि हम ईसा मसीह से संयुक्त हैं तो न ख़तने का कोई महत्व है और न उसके अभाव का। महत्व विश्वास का है, जो प्रेम से अनुप्रेरित है।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 11:37-41

37) ईसा के उपदेश के बाद किसी फ़रीसी ने उन से यह निवेदन किया कि आप मेरे यहाँ भोजन करें और वह उसके यहाँ जा कर भोजन करने बैठे।

38) फ़रीसी को यह देख कर आश्चर्य हुआ कि उन्होंने भोजन से पहले हाथ नहीं धोये।

39) प्रभु ने उस से कहा, ’’तुम फ़रीसी लोग प्याले और थाली को ऊपर से तो माँजते हो, परन्तु तुम भीतर लालच और दुष्टता से भरे हुए हो।

40) मूर्खों! जिसने बाहर बनाया, क्या उसी ने अन्दर नहीं बनाया?

41) जो अन्दर है, उस में से दान कर दो, और देखो, सब कुछ तुम्हारे लिए शुद्ध हो जायेगा।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में हम यीशु को एक फरीसी के घर में पाते हैं, जिसने उन्हें अपने यहाँ भोजन के लिए आमंत्रित किया था। फरीसि लोग, जो अपने अनुष्ठानों पर बहुत ध्यान देते थे, येसु को भोजन से पहले बिना हाथ धोये देखकर आश्चर्यचकित थे। येसु यह मौका का उपयोग करते हुए बाहरी अनुष्ठानों पर जोर देने के बजाय आंतरिक शुद्धता के महत्व के बारे में सिखाने लगते है। येसु किसी भी तरह से बाहरी शुद्धता के महत्व से इनकार नहीं कर रहा था। यह कितनी मूर्खतापूर्ण बात होगी अगर कोई प्लेट के बाहर की सफाई जैसी बातों पर जोर दे, मगर अपने अंदर की गंदगी और जबरन वसूली जैसी मलिन बातों को देखने से इंकार कर दें? येसु इस गन्दगी और दुष्टता, जबरन वसूली, दूसरों के प्रति बुराई एवं अन्यापूर्ण कार्यों को दूर करने का एक मार्ग सुझाता है, वह है, दूसरों को भिक्षा देना, जो आत्मिक शुद्धिकरण का एक प्रभावशाली तरीका है। यही बात संत पौलुस आज का पहला पाठ में बताते है, " यदि हम इसा मसीह से संयुक्त हैं, तो न ख़तने का कोई महत्त्व है और न उसके आभाव का। महत्त्व विश्वास का है, जो प्रेम से अनुप्रेरित है।"

क्या आप बाहर और अन्दर दोनों तरह से शुद्ध हो? यह अच्छा है कि लोग चर्च में आने पर अपना टिप-टॉप दिखने का ध्यान रखते हैं। कितना बेहतर होगा अगर वे अपने भीतर के रूप-रंग पर ध्यान दें - पवित्र वचनों को सुनकर, आवश्कतानुसार पश्चाताप कर के, दूसरों के साथ सामंजस्य स्थापित करके, अपनी दुष्ट और अन्यायपूर्ण तरीकों को छोड़कर, उदारतापूर्वक पड़ोसी की मदद करके। अपने सर्वश्रेष्ठ बाहरी रूप को देखो और अपने भीतर की अवस्था को भी! प्रार्थना कीजिये कि पवित्र वचनों के सहारे अपने आतंरिक स्वस्छता के लिए हमें मदद मिले !



📚 REFLECTION

In today’s gospel we find Jesus in the house of a Pharisee who invited him to dine at his house. Pharisees, who paid great attention to rituals was surprised that Jesus had not washed the hands before the meals. This was occasion for Jesus to teach about the importance of inner purity rather than just emphasizing on external rituals. Jesus was in no way denying the importance of external signs. How foolish it is to clean the outside of the cup and plate but refuse to see the dirt, like wickedness and extortion, inside? Jesus proposes a way to clean the wickedness and extortion, the evil and unjust actions towards others. That is to give alms, as a way of purification. This is what St. Paul refers to in the first reading, “Whether you are circumcised or not makes no difference – what matters is faith that makes its power felt through love”.

Are you a clean person - both outside and inside? It is good that people take care to look their best when they come to the church. How much better it would be if they were to take care of their inner looks – by listening to the word, repenting where needed, reconciling with others, giving up wicked and unjust ways, helping the neighbour in generosity,… Look at your best self and then look at your inner self! Let the word of God help you to cleanse your inside!

 -Br. Biniush Topno

(Duliajan)

12 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

12 अक्टूबर 2020
वर्ष का अट्ठाइसवाँ सामान्य सप्ताह, सोमवार

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📒 पहला पाठ : गलातियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 4:22-24,26-27,31-5:1

22) उस में लिखा है कि इब्राहीम के दो पुत्र थे - एक दासी से और एक स्वतन्त्र पत्नी से।

23) दासी के पुत्र का जन्म प्रकृति के अनुसार हुआ, किन्तु स्वतन्त्र पत्नी के पुत्र का जन्म प्रतिज्ञा के अनुसार।

24) इन बातों का एक लाक्षणिक अर्थ है। वे दो स्त्रियाँ दो विधानों की प्रतीक हैं। एक अर्थात् सीनई पर्वत का विधान दासता के लिए सन्तति उत्पन्न करता है - यह हागार है,

26) किन्तु दिव्य येरुसालेम स्वतन्त्र है। वही हमारी माता है;

27) क्योंकि लिखा है - वन्ध्या! तुमने कभी पुत्र नहीं जना, अब आनन्द मनाओ। तुमने प्रसव-पीड़ा का अनुभव नहीं किया, उल्लास के गीत गाओ; क्योंकि विवाहिता की अपेक्षा परित्यक्ता के अधिक पुत्र होंगे।

31) इसलिए भाइयो! हम दासी की नहीं, बल्कि स्वतन्त्र पत्नी की सन्तति हैं।

1) मसीह ने स्वतन्त्र बने रहने के लिए ही हमें स्वतन्त्र बनाया, इसलिए आप लोग दृढ़ रहें और फिर दासता के जुए में नहीं जुतें।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 11:29-32

29) भीड़-की-भीड़ उनके चारों ओर उमड़ रही थी और वे कहने लगे, ’’यह एक विधर्मी पीढ़ी है। यह एक चिन्ह माँगती है, परन्तु नबी योनस के चिन्ह को छोड़ इसे और कोई चिन्ह नहीं दिया जायेगा।

30) जिस प्रकार योनस निनिवे-निवासियों के लिए एक चिन्ह बन गया था, उसी प्रकार मानव पुत्र भी इस पीढ़ी के लिए एक चिन्ह बन जायेगा।

31) न्याय के दिन दक्षिण की रानी इस पीढ़ी के लोगों के साथ जी उठेगी और इन्हें दोषी ठहरायेगी, क्योंकि वह सुलेमान की प्रज्ञा सुनने के लिए पृथ्वी के सीमान्तों से आयी थी, और देखो-यहाँ वह है, जो सुलेमान से भी महान् है!

32) न्याय के दिन निनिवे के लोग इस पीढ़ी के साथ जी उठेंगे और इसे दोषी ठहरायेंगे, क्योंकि उन्होंने योनस का उपदेश सुन कर पश्चात्ताप किया था, और देखो-यहाँ वह है, जो योनस से भी महान् है!

📚 मनन-चिंतन

तीन दिन पहले हमने सुसमाचार सुना था जहाँ कुछ लोगों ने येसु पर अपदूतों के नायक बेलज़ेबुल के माध्यम से शैतानों को निकालने का आरोप लगाया था। उन्होंने न केवल येसु में पवित्र आत्मा की शक्ति को ना पहचाना बल्कि उन्होंने उसके कामों में शैतान का हाथ देखा। आज के सुसमाचार में हम देखते है की लोग येसु से एक चिन्ह की मांग करते हैं जिसके द्वारा यह साबित कर सके कि येसु ईश्वर का पुत्र है। येसु का कहना है कि इस दुष्ट पीढ़ी को जो एकमात्र चिन्ह दिया जायेगा वह योना का चिन्ह है। जैसे योना निनिवे के लोगों के लिए एक चिन्ह बन गया था, वैसे मानव पुत्र इस पीढ़ी के लिए होगा। ईश्वर ने योना को निनिवे के लोगों के पास इसलिए भेजा की वे पश्चाताप करे, और वहां के लोगों ने उसके उपदेश पर पश्चाताप किया। येसु योना से बड़ा है फिर भी लोग उस पर विश्वास करने से इनकार करते हैं!

ऐसे कई तरीके हैं जिनसे लोग ईश्वर के वचन का विरोध और अस्वीकार करते हैं। ईश्वर के वचन को न सुनने का लोगों के कई कारण हैं। जैसा कि हम योहन 3:19 में पढ़ते हैं, “दंडाज्ञा का कारण यह है कि ज्योति संसार में आयी है और मनुष्यों ने ज्योति की अपेक्षा अंधकार को अधिक पसन्द किया, क्योंकि उनके कर्म बुरे थे।” ईश्वर ने हमें मुक्त होने के लिए बुलाया है परंतु कई ऐसी चीजें हैं जो हमें गुलाम बनाए रखती हैं।

ईश्वर का वचन बुराई से दूर रहने और ईश्वर की ओर मुड़ने का निमंत्रण है। क्या आपको परमेश्वर के वचन के प्रति अरुचि है? अपने भीतर देखें कि ईश-वचन को सुनने और येसु के निकट आने से आपको क्या रोक रहा है।



📚 REFLECTION

Three days ago we heard the gospel passage where some people accused Jesus of casting out devils through Beelzebul, the prince of devils. They not only did not recognize the Holy Spirit at work in Jesus but attributed it to the counter spirit! In today’s gospel we find the people ask for a sign, to prove that Jesus is the Son of God. Jesus says that the only sign that will be given to this wicked generation is the sign of Jonah. As Jonah became a sign to the people of Nineveh, so the Son of Man will be to this generation. God sent Jonah to preach repentance to the people of Nineveh and they repented at his preaching. Here is Jesus, greater than Jonah, and the people are refusing to believe in him.

There are many ways in which people resist and reject the word of God. And there are many reasons why people do not want to listen to God and his word. As we read in John 3:19, “And this is the judgement, that the light has come into the world, and men loved darkness rather than light, because their deeds were evil”. God has called us to be free. But there are many things that keep us slaves.

God’s word is an invitation to turn away from evil and turn towards God. Do you have dislike for the word of God? Look within to see what is preventing you from listening to the word of God and coming near to Jesus.

 -Br. Biniush Topno

(Duliajan)

11 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

11 अक्टूबर 2020
वर्ष का अट्ठाइसवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार

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📒 पहला पाठ :इसायाह का ग्रन्थ 25:6-10a

6) विश्वमण्डल का प्रभु इस प्रर्वत पर सब राष्ट्रों के लिए एक भोज का प्रबन्ध करेगाः उस में रसदार मांस परोसा जायेगा और पुरानी तथा बढ़िया अंगूरी।

7) वह इस पर्वत पर से सब लोगों तथा सब राष्ट्रों के लिए कफ़न और शोक के वस्त्र हटा देगा,

8) श्वह सदा के लिए मृत्यु समाप्त करेगा। प्रभु-ईश्वर सबों के मुख से आँसू पोंछ डालेगा। वह समस्त पृथ्वी पर से अपनी प्रजा का कलंक दूर कर देगा। प्रभु ने यह कहा है।

9) उस दिन लोग कहेंगे - “देखो! यही हमारा ईश्वर है। इसका भरोसा था। यह हमारा उद्धार करता है। यही प्रभु है, इसी पर भरोसा था। हम उल्लसित हो कर आनन्द मनायें, क्योंकि यह हमें मुक्ति प्रदान करता है।“

10) इस पर्वत पर प्रभु का हाथ बना रहेगा।

📕 दूसरा पाठ: फ़िलिप्पियों 4:12-14, 19-20

12) मैं दरिद्रता तथा सम्पन्नता, दोनों से परिचित हूँ। चाहे परितृप्ति हो या भूख, समृद्धि हो या अभाव -मुझे जीवन के उतार-चढ़ाव का पूरा अनुभव है।

13) जो मुझे बल प्रदान करते हैं, मैं उनकी सहायता से सब कुछ कर सकता हूँ।

14) फिर भी आप लोगों ने संकट में मेरा साथ देकर अच्छा किया।

19) मेरा ईश्वर आप लोगों को ईसा मसीह द्वारा महिमान्वित कर उदारतापूर्वक आपकी सब आवश्यकताओं को पूरा करेगा।

20) हमारे पिता ईश्वर को अनन्त काल तक महिमा! आमेन!

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 22:1-14

1) ईसा उन्हें फिर दृष्टान्त सुनाने लगे। उन्होंने कहा,

2) ’’स्वर्ग का राज्य उस राजा के सदृश है, जिसने अपने पुत्र के विवाह में भोज दिया।

3) उसने आमन्त्रित लोगों को बुला लाने के लिए अपने सेवकों को भेजा, लेकिन वे आना नहीं चाहते थे।

4) राजा ने फिर दूसरे सेवकों को यह कहते हुए भेजा, ’अतिथियों से कह दो- देखिए! मैंने अपने भोज की तैयारी कर ली है। मेरे बैल और मोटे-मोटे जानवर मारे जा चुके हैं। सब कुछ तैयार है; विवाह-भोज में पधारिये।’

5) अतिथियों ने इस की परवाहा नहीं की। कोई अपने खेत की और चला गया, तो कोई अपना व्यापार देखने।

6) दूसरे अतिथियों ने राजा के सेवकों को पकड़ कर उनका अपमान किया और उन्हें मार डाला।

7) राजा को बहुत क्रोध आया। उसने अपनी सेना भेज कर उन हत्यारों का सर्वनाश किया और उनका नगर जला दिया।

8) ’’तब राजा ने अपने सेवकों से कहा, ’विवाह-भोज की तैयारी तो हो चुकी है, किन्तु अतिथि इसके योग्य नहीं ठहरे।

9) इसलिए चैराहों पर जाओ और जितने भी लोग मिल जायें, सब को विवाह-भोज में बुला लाओ।’

10) सेवक सड़कों पर गये और भले-बुरे जो भी मिले, सब को बटोर कर ले आये और विवाह-मण्डप अतिथियों से भर गया।

11) ’’राजा अतिथियों को देखने आया, तो वहाँ उसकी दृष्टि एक ऐसे मनुष्य पर पड़ी, जो विवाहोत्सव के वस्त्र नहीं पहने था।

12) उसने उस से कहा, ’भई विवाहोत्सव के वस्त्र पहने बिना तुम यहाँ कैसे आ गये?’ वह मनुष्य चुप रहा।

13) तब राजा ने अपने सेवकों से कहा, ’इसके हाथ-पैर बाँध कर इसे बाहर, अन्धकार में फेंक दो। वहाँ वे लोग रोयेंगे और दाँत पीसते रहेंगे।’

14) क्योंकि बुलाये हुए तो बहुत हैं, लेकिन चुने हुए थोडे़ हैं।’’

📚 मनन-चिंतन

अक्सर जब हम उन चीजों को नहीं करते हैं जिन्हें हमें करना चाहिये तो हमारे पास अपने को सही ठहराने के लिए कई बहाने होते हैं; अपनी गलतियों को स्वीकार करने और जीवन सुधार का हम विरोध करते हैं। जबकि ये बहाने हमें तंग स्थितियों से कभी-कभी बाहर निकाल सकते हैं, वे हमारे बढ़ने में और आध्यात्मिक एवं व्यक्तिगत विकास में बाधा हैं। ईश्वर की क्षमाशीलता हमारे लिए जीवनसुधार नहीं करने का बहाना नहीं बनना है; हमें उसकी पुकार का जवाब देना होगा या पीछे रह जाना होगा।

पहले पाठ में, नबी इसायस ईश्वर की भलाई की घोषणा करता है, जो पवित्र पर्वत पर सभी लोगों के लिए भोज तैयार करता है। ईश्वर चाहता है कि सभी लोग उसके राज्य में उसके साथ हों।

सुसमाचार का आज का दृष्टांत हमें बताता है कि एक राजा अपने दूतों को अपने बेटे की शादी की दावत के लिए आमंत्रित मेहमानों को बुलाने भेजता है। लेकिन उन्होंने आने से मना कर दिया। राजा अभी भी मेहमानों के साथ धीरज रखता है और दूसरे सेवकों को भेजता है। लेकिन फिर से आमंत्रित लोग बहाने बनाते हैं और उन्होंने दुर्व्यवहार किया और नौकरों को मार डाला, जिससे राजा क्रुद्ध हो जाता और उन्हें मार डालता है। चूंकि भोज सब तय है, राजा अब अपने दूतों को चौराहों में भेजता है ताकि वे मिलने वाले सभी लोगों को भोज के लिए बुला लायें। और सेवक सड़कों पर निकल गए और वे सब को बुला लाये जिससे विवाह मंडप अतिथियों से भर गया।

सबसे पहले यह दृष्टांत हमें बताता है कि मुक्ति मसीह में केंद्रित है; यह हमेशा ईश्वर है जो मुक्ति के लिए पहल करता है। यह प्रक्रिया शुरू करने के लिए हम कुछ भी नहीं कर सकते। विश्वास हमेशा एक दान है और विश्वास के माध्यम से ही हम आमंत्रित किये जाते है।

दूसरी बात, यह दृष्टांत हमें ईश्वर की क्षमाशीलता की याद दिलाती है, जो हमें त्याग नहीं देता है। इस दृष्टांत में सेवक न केवल उन नबियों के प्रतीक हैं जिन्हें इस्राएलियों ने अस्वीकार कर दिया था, बल्कि प्रेरितों और विशेष दूतों के भी हैं जिनको ईश्वर हमारे जीवन में भेजते हैं, हमें उनकी पुकार की याद दिलाते हैं। ईश्वर हमें अपने वचन के माध्यम से, प्रार्थना के माध्यम से बुला सकता है; वह हमें उपदेश, शिक्षा और गवाहों के माध्यम से बुला सकता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि हम ईश्वर का आह्वान सुनें, और उनका कार्य करने में बहाना न बनाये। येसु के शिष्य होने की हमारी प्रतिबद्धता में देरी करने के लिए हम अक्सर अनुचित बहाने ढूंढ़ते हैं। कई बार, हम अपने परिवार के रिश्ते या खुशी को ईश्वर की इच्छा को पूरी करने की इच्छा से अधिक महत्त्व देते हैं। येसु निश्चित रूप से यह नहीं कह रहे हैं कि हम इन दायित्वों को भूल जायें, लेकिन यह कि ईश्वर की इच्छा हमारे जीवन की पहली प्राथमिकता बने। अगर हम अपने जीवन में ईश्वर को पहला स्थान देते हैं तो बाकि सब अपने आप से सही हो जाएंगे। जैसा कि हम मत्ति 6:33 में पढ़ते हैं, "तुम सबसे पहले ईश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज में लगे रहो और ये सभी चीजें यों ही मिल जायेंगी।"

भोजन बाइबल का एक पसंदीदा प्रतीक है। यह जीवन, समावेशिता, आनंद और उत्सव के लिए खड़ा है। प्रभु येसु ने अपने जीवन में इस प्रतीक का खूब उपयोग किया और इसे सुसमाचार का प्रचार का एक जीवंत माध्यम बनाया। पापियों और नाकेदारों के साथ भोजन करते हुए येसु ने “टेबल फेलोशिप” को गरीबों और तिरस्कृत लोगों के लिए सुसमाचार का एक प्रभावी शैली बनायी। पवित्र यूखरिस्त भोजन की स्थापना के साथ वह हमें अपने जीवन में साझा करने के लिए आमंत्रित करता है।

क्या ईश्वर का वचन का जवाब देने में आप बहाने बनाते हैं? आप क्यों ईश्वर के पास आना नहीं चाहते हैं? ऐसा क्या या कौन है जो आपको ईश्वर को अपने जीवन में प्रधम स्थान देने में बाधा बनती है? अपने बहाने छोड़ दो और प्रभु के आनंद में भाग लो !



📚 REFLECTION

Often when we don't do the things we are supposed to do we have our excuses to justify our actions, refuse to accept our mistakes and resist change. While these excuses may get us out of tight situations they can also hinder us from growing and becoming the people we are called to be. In our faith commitment, while we know that God is infinitely patient, we cannot make excuses for our conversion; we have to respond to His call or be left behind.

In the first reading, Isaiah proclaims the goodness of God, who is preparing a banquet for all his people on the holy mountain. God wants all people to be with him in his kingdom.

The Gospel parable tells us that a king sends out his messengers to summon the invited guests for the marriage feast of his son. But they refuse to come. The king is still patient with the guests and sends a second reminder but again those invited scorn the invitation, make excuses and they maltreated and killed the servants, which incenses the king and he destroys them. Since the banquet is all set, the king now sends his messengers to invite anyone whom they can find. And the servants went out into the streets and gathered all whom they found, both good and bad; so the banquet hall was filled with guests.

The parable tells us, firstly, salvation is centred in Christ; it is always God who takes the initiative for salvation. We cannot do anything to start the process, faith is always a gift and it is through our faith that we are invited, as it were, to a royal banquet.

Secondly, the parable reminds us of the patience of God, who does not give up on us. The servants in the parable stand not only for the prophets whom the Israelites rejected but also for the apostles and special messengers whom God sends into our lives to remind us of his call. God can call us through His word, through prayer; he can call us through the preaching, teaching and witnessing.

What is important is to heed God’s call when it comes and not to make excuses. We often make unjustifiable excuses to delay our commitment to being a disciple of Jesus. At times, we put our family relationship or joy higher than our willingness to do God’s will. Jesus is certainly not saying that we forget these obligations but that God’s will must be the first priority of our lives. If we can put God first, everything else will fit in place. As we read in Mt 6:33, “Seek first the Kingdom and his righteousness, and all these things shall be yours as well.”

The meal is a favourite symbol of the Bible. It stands for life, inclusiveness, celebration. Jesus made use of this symbol in his life and preaching lavishly. The table fellowship of Jesus with sinners and tax collectors was his way of proclaiming the good news to the poor. With the institution of the Eucharistic meal he invites us to share in his very life.

What are the usual excuses that you make not to respond to God’s call? What is it that prevents you from coming to the Lord’s banquet? How can you balance your commitment to your family and work with your relationship to the Lord? Give up your excuses and come to the joy of the Lord!


मनन-चिंतन - 2

येसु मसीह के इस संसार में जन्म लेने से इस पूरे संसार को एक नया मोड़ मिला है। येसु के इस संसार में आने से कई ईश्वरीय रहस्य प्रकट हुए जिसे हम शायद ही जान पाते। येसु के जन्म के बाद मॉं मरियम और यूसुफ बालक येसु को प्रभु को अर्पित करने के लिए येरुसालेम ले गये। वहॉं पर सिमेयोन नामक एक धर्मी तथा भक्त पुरुष ने ईसा को अपनी गोद में ले लिया और ईश्वर की स्तुति करते हुए कहा, ‘‘यह गैर-यहुदियों के प्रबोधन के लिए ज्योति है और तेरी प्रजा इस्राएल का गौरव।’’ (योहन 2:32) प्रभु येसु ने अपने वचनो एवं दृष्टांतों द्वारा कई ईश्वरीय रहस्य हम सब को दिये है। आज का दृष्टांत समस्त लोगों की मुक्ति का निमंत्रण लेकर आता है। आज के दृष्टांत का अहम संदेश यह है कि मुक्ति केवल यहुदियों के लिए नहीं परंतु गैर-यहुदियों के लिए भी है।

आज प्रभु येसु हमारे सामने विवाह उत्सव का दृष्टांत प्रस्तुत करते हैं। इस दृष्टांत में राजा ने अपने पुत्र के विवाह के अवसर पर एक बड़ा भोज का उत्सव रखा परन्तु निमंत्रित लोगो के भोज में आने से इंकार करने पर राजा ने रास्ते और चौराहों पर जो भी मिले उन्हें लाने का आदेश दिया। राजा ने लाये गये लोगों में से एक व्यक्ति को पाया जो विवाह उत्सव का वस्त्र नही पहने हुए था और राजा ने उसको दण्डित किया। इस दृष्टांत को सुनने के बाद हमारे मन में राजा के व्यवहार के प्रति अजीबोगरीब भावनाए उत्पन्न होती होगी कि यह राजा तो बड़ा अजीब है सबसे पहले तो वह रास्ते में मिलने वाले सभी लोगो को लाने को कहता है और जब कोई एक व्यक्ति बिना विवाह वस्त्र पहने हुए पाया जाता है तो उसे दण्डित भी करता है। राजा को तो खुश होना चाहिए कि कम से कम वह व्यक्ति विवाह उत्सव में तो आया। अगर राजा ने सबको बुलाया तो उसे उन सब को अपनाना चाहिये था। हो सकता है वह व्यक्ति गरीब हो और उसके पास विवाह वस्त्र खरीदने के लिए समय या धन न हो।

इसे समझने के लिए आइये हम मनन चिंतन और अवलोकन करें- राजा ने जब चौराहो पर मिलने वाले हर एक व्यक्ति को, चाहे वह अच्छा हो या बुरा, सबको लाने का आदेश दिया तब वहॉं पर यह व्यक्ति अकेला नही था परन्तु उसके साथ-साथ बहुत सारे व्यक्ति थे और शायद उन व्यक्तियों के पास भी विवाह के वस्त्र नही होंगे। लेकिन जब वे सब विवाह उत्सव में प्रवेश करते हैं तो केवल एक व्यक्ति ही बिना विवाह उत्सव के वस्त्र के था। इसका मतलब यह है कि विवाह उत्सव के वस्त्र या तो द्वार पर रखे गये थे या ये वस्त्र उन्हें दिये गये थे जिससे वे उन्हे पहन कर अंदर प्रवेश कर सकें। विवाह वस्त्र को पहनना उनकी एक परम्परा रही होगी। विवाह उत्सव के वस्त्र विवाह भोज के लिए अत्यंत जरूरी या अनिवार्य थे ।

यहुदी जनता ईश्वर के करीब थी और शुरू से ईश्वर से जुडी हुई थी। ‘‘मैं तुम्हें और तुम्हारे बाद तुम्हारे वंशजों को वह भूमि प्रदान करूँगा, जिस में तुम निवास करते हो, अर्थात् कनान का समस्त देश। उस पर सदा के लिए तुम लोगों का अधिकार होगा और मैं तुम्हारे वंशजों का ईश्वर होऊॅंगा।’’ (उत्पत्ति 17:18)। ‘‘तुम इस्राएलियों से यह कहोगे - प्रभु तुम्हारे पूर्वजों के ईश्वर, इब्राहीम, इसहाक तथा याकूब के ईश्वर ने मुझे तुम लोगो के पास भेजा है’’(निर्गमन 3:15)। ‘‘मैं उनके पूर्वजों को राष्ट्रों के देखते-देखते मिस्र से निकाल लाया। मैं उनके लिए निर्धारित विधान का स्मरण करूँगा और मैं, प्रभु उनका अपना ईश्वर होऊॅंगा’’ (लेवी 26:45)। ‘‘वह मेरी प्रजा हो और मैं उसका प्रभु होऊॅं’’ (एजे़किएल 1:11)। ईश्वर ने स्वर्ग राज्य का निमंत्रण सबसे पहले यहुदियों को दिया परन्तु उसे उन्होने अस्वीकार किया। इसके बाद प्रभु ने नबियों को भेजा जिससे वे नबियों की सुनें, परन्तु उन्होने उनका अपमान किया और उन्हें मार डाला। ईश्वर ने उनके इस बर्ताव और घमण्ड के कारण उनका और उनके नगर येरुसालेम का सर्वनाश होने दिया। ‘‘येरुसालेम! येरुसालेम! तू नबियों की हत्या करता है और अपने पास भेजे हुए लोगों को पत्थरों से मार देता है। मैंने कितनी बार चाहा कि तेरी सन्तान को वैसे ही एकत्र कर लूँ, जैसे मुर्गी अपने चूजों को अपने डैनों के नीचे एकत्र कर लेती है, परन्तु तुम लोगों ने इनकार कर दिया। देखो, तुम्हारा घर उजाड़ छोड़ दिया जायेगा। मैं तुम से कहता हूँ। अब से तुम मुझे नहीं देखोगे, जब तक तुम यह न कहोगे-धन्य हैं वह, जो प्रभु के नाम पर आते हैं।’’ (मत्ती 23:37-39)।

प्रभु येसु के इस संसार में आने के बाद स्वर्गराज्य सब के लिए, हर प्रकार के जाति, वर्ग और लोगों के लिए खुल गया और दुनिया के हर कोने में रहने वाले सभी लोगों के लिए आमंत्रण मिला। और इस आमंत्रण में हम सब भी शामिल हैं। परन्तु इस विवाह उत्सव में प्रवेश करने से पूर्व हमें इसके लिए तैयारी करने की आवश्यकता है। अन्यथा हमंस उस मनुष्य के समान जिसने विवाह उत्सव के वस्त्र नहीं पहने थे हाथ-पैर बॉंधकर अन्धकार में फेंक दिया जायेगा। विवाह उत्सव का वस्त्र अर्थात् अपने पुराने वस्त्र को उतार कर नये वस्त्र को पहनना हैं। ‘‘आप लोगों को अपना पहला आचरण और पुराना स्वभाव त्याग देना चाहिए, क्योंकि वह बहकाने वाली दुर्वासनाओं के कारण बिगड़ता जा रहा है। आप लोग पूर्ण रूप से नवीन आध्यात्मिक विचारधारा अपनायें और एक नवीन स्वभाव धारण करें, जिसकी सृष्टि ईश्वर के अनुसार हुई है और जो धार्मिकता तथा सच्ची पवित्रता में व्यक्त होता है’’ (एफेसियों 22:24)। अर्थात् अपने पुराने पापमय स्वभाव को छोड़ कर एक पवित्र और नवीन स्वभाव को अपनाने की जरूरत है। और यह नया स्वभाव प्रभु येसु का मनोभाव और उसकी धार्मिकता है। हम सब को स्वर्गराज्य में प्रवेश करने के लिए प्रभु येसु का मनोभाव या उसकी धार्मिकता को अपनाने की जरूरत है।

आज का दृष्टांत हमें यह बताता है कि स्वर्गराज्य सब के लिए है न केवल एक ही जाति या एक ही प्रजाति के लिए। परन्तु बहुतो के अस्वीकार के कारण वे उसमें प्रवेश नही कर पाते हैं। पहले यहुदियों ने येसु मसीह को मानने से इनकार किया और बाद में उन लोगों ने जो येसु के मनोभाव या धार्मिकता को अस्वीकार करते हैं। यहॉं ख्रीस्त का मनोभाव अपनाने का मतलब केवल ख्रीस्तीय धर्म अपनाना नही परन्तु ख्रीस्त के मन के अनुसार अपने मन को बनाना या आचरण करना है और यह मनोभाव या आचरण गैर ख्रीस्तीयों के जीवन में भी पाया जा सकता है।

आईये हम सब अपने मनोभाव को ख्रीस्त के मनोभाव के अनुसार बनायें (फिलिप्पियों 2:5)।

10 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

10 अक्टूबर 2020
वर्ष का सत्ताईसवाँ सामान्य सप्ताह, शनिवार

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📒 पहला पाठ : गलातियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 3:22-29

22) परन्तु धर्मग्रन्थ ने सब कुछ पाप के अधीन कर दिया है, जिससे ईसा मसीह में विश्वास के द्वारा विश्वास करने वालों के लिए प्रतिज्ञा पूरी की जाये।

23) विश्वास के आगमन से पहले हम को उसके प्रकट होने के समय तक संहिता के निरीक्षण में बन्दी बना दिया गया था।

24) इस प्रकार जब तक मसीह नहीं आये और हम विश्वास के द्वारा धार्मिक नहीं बने, तब तक संहिता हमारी निरीक्षक रही।

25) किन्तु अब विश्वास आया है और हम निरीक्षक के अधीन नहीं रहे।

26) क्योंकि आप लोग सब-के-सब ईसा मसीह में विश्वास करने के कारण ईश्वर की सन्तति हैं;

27) क्योंकि जितने लोगों ने मसीह का बपतिस्मा ग्रहण किया, उन्होंने मसीह को धारण किया है।

28) अब न तो कोई यहूदी और न यूनानी, न तो कोई दास है और न स्वतन्त्र, न तो कोई पुरुष है और न स्त्री-आप सब ईसा मसीह में एक हो गये हैं।

29) यदि आप लोग मसीह के है, तो इब्राहीम की सन्तान है और प्रतिज्ञा के अनुसार उनके उत्तराधिकारी।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 11:27-28

27) ईसा ये बातें कह ही रहे थे कि भीड़ में से कोई स्त्री उन्हें सम्बोधित करते हुए ऊँचे स्वर में बोल उठी, ’’धन्य है वह गर्भ, जिसने आप को धारण किया और धन्य हैं वे स्तन, जिनका आपने पान किया है!

28) परन्तु ईसा ने कहा, ’’ठीक है; किन्तु वे कहीं अधिक धन्य हैं, जो ईश्वर का वचन सुनते और उसका पालन करते हैं’’।

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है। उसने हमें विश्वास के माध्यम से अपनी सन्तान होने का विशेषाधिकार दिया है। मसीह में बपतिस्मा लेने वाले सभी लोग उनमें एक हो गए हैं। इसलिए विश्वासियों की भाषा, संस्कृति, धन, शक्ति, आदि के आधार पर कोई अंतर और भेद-भाव नहीं हैं; हम सभी येसु मसीह में एक हैं।

आज के सुसमाचार में ईश्वर के प्रति यह उचित संबंध व्यक्त किया गया है। जब भीड़ में से एक महिला ने ऊँची आवाज में येसु से कहा, "धन्य है वह गर्भ, जिसने आपको धारण किया और धन्य हैं वे स्तन, जिनका आपने पान किया है,” येसु ने उसे उत्तर दिया, "ठीक है; किन्तु वे कहीं अधिक धन्य हैं, जो ईश्वर का वचन सुनते और उसका पालन करते हैं।" येसु मसीह में विश्वास के माध्यम से हमें मुक्ति मिली है। पवित्र सुसमाचार द्वारा हमें विश्वास प्राप्त होता है। इसलिए ईश्वर के साथ हमारा संबन्ध किसी शारीरिक या पारिवारिक रिश्ते पर आधारित नहीं है, बल्कि ख्रीस्त में विश्वास पर आधारित है। इसलिए किसी को भी इस अनुग्रह के बाहर नहीं रखा गया है। वे सभी, जो येसु मसीह में विश्वास करते हैं और पवित्र आत्मा से संचालित हैं, वे सब ईश्वर की संतान हैं।

आप किस बात पर गर्व करते हैं? ईश्वर के साथ आपका सम्बन्ध किस बात पर आधारित है? - विश्वास पर या किसी अन्य चीज़ पर - आपका स्थान या अधिकार पर, या कलीसिया के अधिकारीयों के साथ आपकी निकटता पर? क्या आप विभिन्न चीजों के आधार पर विश्वासियों के साथ भेद-भाव करते हैं? क्या आप नहीं जानते हैं कि येसु मसीह में विश्वास करने वाले सभी लोग बिना किसी भेद-भाव के ईश्वर की संतान हैं? आइए हम सभी विश्वासियों को अपने भाई-बहन जैसे स्वीकार करने और उन्हें प्यार करने का अनुग्रह के लिए प्रार्थना करें।



📚 REFLECTION

We are all children of God thorough faith. For all those baptized in Christ, there are no more distinctions; all of us are one in Christ Jesus.

This proper relation to God is expressed in today’s gospel. When a woman in the crowd raised her voice and said to Jesus, “Happy the womb that bore you and the breasts that you sucked”, Jesus replied, “Still happier are those who hear the word of God and keep it.” We are saved through faith in Jesus Christ. Faith comes from believing in the gospel. So our relationship with God is not based on any physical or family relationship but rather on faith in Jesus. So no one is excluded. All those who believe in Jesus and are led by the Spirit of God are children of God.

In what do you glory? Is your relationship to God based on faith or on something else, like your position or proximity to those in authority in the Church? Do you make distinctions between believers based on different grounds? Know that all those who believe in Jesus are children of God without any distinctions. Let us pray for the grace to accept and love all our brothers and sisters in faith.

09 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

09 अक्टूबर 2020
वर्ष का सत्ताईसवाँ सामान्य सप्ताह, शुक्रवार

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📒 पहला पाठ : गलातियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 3:7-14

7) इसलिए आप लोग यह निश्चित रूप से जान लें कि जो लोग विश्वास करते हैं, वे ही इब्राहीम की सन्तान हैं।

8) धर्मग्रन्थ पहले से यह जानता था कि ईश्वर विश्वास द्वारा गैर-यहूदियों को पापमुक्त करेगा, इसलिए उसने पहले से इब्राहीम को यह सुसमाचार सुनाया कि तुम्हारे द्वारा पृथ्वी भर के राष्ट्र आशीर्वाद प्राप्त करेंगे।

9) इसलिए जो विश्वास पर निर्भर रहते हैं, विश्वास करने वाले इब्राहीम के साथ ही आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

10) परन्तु जो संहिता के कर्मकाण्ड पर निर्भर रहते है, वे शाप के अधीन हैं; क्योंकि लिखा है- जो व्यक्ति संहिता-ग्रन्थ में लिखी हुई सभी बातों का पालन नहीं करता रहता है, वह शापित है।

11) यह तो स्पष्ट है कि कोई संहिता के कारण ईश्वर की दृष्टि में धार्मिक नहीं होता; क्योंकि लिखा है- धार्मिक मनुष्य अपने विश्वास के द्वारा जीवन प्राप्त करेगा।

12) और संहिता का विश्वास से कोई सम्बन्ध नहीं है; क्योंकि उस में लिखा है-जो इन बातों का पालन करेगा, उसे इन्हीं के द्वारा जीवन प्राप्त होगा।

13) मसीह हमारे लिए शापित बने और इस तरह उन्होंने हम को संहिता के अभिशाप से मुक्त किया; क्योंकि लिखा है- जो काठ पर लटकाया जाता है, वह शापित है।

14) यह इसलिए हुआ कि ईसा मसीह के द्वारा इब्राहीम का आशीर्वाद ग़ैर-यहूदियों को भी प्राप्त हो और हमें विश्वास द्वारा वह आत्मा मिले, जिसकी प्रतिज्ञा की गयी थी।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 11:15-26

15) परन्तु उन में से कुछ ने कहा, ’’यह अपदूतों के नायक बेलज़ेबुल की सहायता से अपदूतों को निकालता है’’।

16) कुछ लोग ईसा की परीक्षा लेने के लिए उन से स्वर्ग की ओर का कोई चिन्ह माँगते रहे।

17) उनके विचार जान कर ईसा ने उन से कहा, ’’जिस राज्य में फूट पड़ जाती है, वह उजड़ जाता है और घर के घर ढह जाते हैं।

18) यदि शैतान अपने ही विरुद्ध विद्रोह करने लगे, तो उसका राज्य कैसे टिका रहेगा? तुम कहते हो कि मैं बेलजे़बुल की सहायता से अपदूतों को निकालता हूँ।

19) यदि मैं बेलजे़बुल की सहायता से अपदूतों को निकालता हूँ, तो तुम्हारे बेटे किसी सहायता से उन्हें निकालते हैं? इसलिए वे तुम लोगों का न्याय करेंगे।

20) परन्तु यदि मैं ईश्वर के सामर्थ्य से अपदूतों को निकालता हूँ, तो निस्सन्देह ईश्वर का राज्य तुम्हारे बीच आ गया है।

21) ’’जब बलवान् मनुष्य हथियार बाँधकर अपने घर की रखवाली करता है, तो उसकी धन-सम्पत्ति सुरक्षित रहती है।

22) किन्तु यदि कोई उस से भी बलवान् उस पर टूट पड़े और उसे हरा दे, तो जिन हथियारों पर उसे भरोसा था, वह उन्हें उस से छीन लेता और उसका माल लूट कर बाँट देता है।

23) ’’जो मेरे साथ नहीं है, वह मेरा विरोधी है और जो मेरे साथ नहीं बटोरता, वह बिखेरता है।

24) ’’जब अशुद्ध आत्मा किसी मनुष्य से निकलता है, तो वह विश्राम की खोज में निर्जन स्थानों में भटकता फिरता है। विश्राम न मिलने पर वह कहता है, ’जहाँ से निकला हूँ, अपने उसी घर वापस जाऊँगा’।

25) लौटने पर वह उस घर को झाड़ा-बुहारा और सजाया हुआ पाता है।

26) तब वह जा कर अपने से भी बुरे सात अपदूतों को ले आता है और वे उस घर में घुस कर वहीं बस जाते हैं और उस मनुष्य की यह पिछली दशा पहली से भी बुरी हो जाती है।’’

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है। ईश्वर की इच्छा है की हम सब मुक्ति प्राप्त करें। प्रभु येसु क्रूस पर मर गये ताकि हम उस पर विश्वास करके पवित्र आत्मा प्राप्त कर सकें। हमें कानून और उसके नुस्खों से नहीं बल्कि प्रभु येसु पर विश्वास करने से मुक्ति प्राप्त होती है।

येसु के जीवन में पवित्र आत्मा सक्रिय था। उसने पवित्र आत्मा की शक्ति में सब कुछ किया। उनके विरोधियों ने उन पर शैतानों के राजकुमार बेज़ेबुल के माध्यम से शैतानों को बाहर निकालने का आरोप लगाया। कुछ अन्य लोगों ने उनके कार्यों में ईश्वर की शक्ति को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और एक और चिन्ह की मांग की । येसु ने उनसे स्पष्ट रूप से कहा, "यदि मैं ईश्वर के सामर्थ्य से अपदूतों को निकलता हूँ, तो निस्संदेह ईश्वर का राज्य तुम्हारे बीच आ गया है।"। येसु हमें सतर्क रहने की चेतावनी भी देते हैं क्योंकि शैतान, जो एक बार बाहर निकाला जाता है, वह जिससे निकला गया उसको पुनः अपने अधीन में करने के लिए अधिक से अधिक बल के साथ फिर से प्रवेश करने की कोशिश करेगा।

क्या मैं अपने जीवन में और दूसरों के काम में पवित्र आत्मा को देखता हूँ? क्या मैं अपने जीवन में ईश्वर की शक्ति को स्वीकार करने के लिए अनिच्छुक हूँ? क्या मैं अभी भी येसु में अपने विश्वास को साबित करने के लिए चिन्हों की तलाश कर रहा हूँ? पवित्र आत्मा से प्रार्थना कीजिये कि वह आपको सही मार्ग पर ले चले।



📚 REFLECTION

God loves us. It is his desire that we should be saved. Christ died on the cross so that we might receive the Holy Spirit through faith in him. We are saved, not by the law and its prescriptions but by faith in Jesus.

The Holy Spirit was active in the life of Jesus. He did everything in the power of the Holy Spirit. His opponents accused him of casting out the devils through Beelzebul, the prince of devils. Some others refused to acknowledge God’s power in his works and asked for another sign. Jesus said to them categorically, “If it is through the finger of God that I cast out devils, then know that the Kingdom of God has overtaken you”. Finger of God is another expression for the Holy Spirit. Jesus also warns us to be alert because the devil, once cast out, will try to re-enter with greater force to subdue the believer.

Do I see the Holy Spirit at work in my life and that of others? Am I reluctant to acknowledge the power of God in my life? Am I still seeking for signs to prove my faith in Jesus? Pray to the Holy Spirit to guide you in the right path.

 -Br. Biniush Topno (Duliajan)