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11 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

11 अक्टूबर 2020
वर्ष का अट्ठाइसवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार

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📒 पहला पाठ :इसायाह का ग्रन्थ 25:6-10a

6) विश्वमण्डल का प्रभु इस प्रर्वत पर सब राष्ट्रों के लिए एक भोज का प्रबन्ध करेगाः उस में रसदार मांस परोसा जायेगा और पुरानी तथा बढ़िया अंगूरी।

7) वह इस पर्वत पर से सब लोगों तथा सब राष्ट्रों के लिए कफ़न और शोक के वस्त्र हटा देगा,

8) श्वह सदा के लिए मृत्यु समाप्त करेगा। प्रभु-ईश्वर सबों के मुख से आँसू पोंछ डालेगा। वह समस्त पृथ्वी पर से अपनी प्रजा का कलंक दूर कर देगा। प्रभु ने यह कहा है।

9) उस दिन लोग कहेंगे - “देखो! यही हमारा ईश्वर है। इसका भरोसा था। यह हमारा उद्धार करता है। यही प्रभु है, इसी पर भरोसा था। हम उल्लसित हो कर आनन्द मनायें, क्योंकि यह हमें मुक्ति प्रदान करता है।“

10) इस पर्वत पर प्रभु का हाथ बना रहेगा।

📕 दूसरा पाठ: फ़िलिप्पियों 4:12-14, 19-20

12) मैं दरिद्रता तथा सम्पन्नता, दोनों से परिचित हूँ। चाहे परितृप्ति हो या भूख, समृद्धि हो या अभाव -मुझे जीवन के उतार-चढ़ाव का पूरा अनुभव है।

13) जो मुझे बल प्रदान करते हैं, मैं उनकी सहायता से सब कुछ कर सकता हूँ।

14) फिर भी आप लोगों ने संकट में मेरा साथ देकर अच्छा किया।

19) मेरा ईश्वर आप लोगों को ईसा मसीह द्वारा महिमान्वित कर उदारतापूर्वक आपकी सब आवश्यकताओं को पूरा करेगा।

20) हमारे पिता ईश्वर को अनन्त काल तक महिमा! आमेन!

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 22:1-14

1) ईसा उन्हें फिर दृष्टान्त सुनाने लगे। उन्होंने कहा,

2) ’’स्वर्ग का राज्य उस राजा के सदृश है, जिसने अपने पुत्र के विवाह में भोज दिया।

3) उसने आमन्त्रित लोगों को बुला लाने के लिए अपने सेवकों को भेजा, लेकिन वे आना नहीं चाहते थे।

4) राजा ने फिर दूसरे सेवकों को यह कहते हुए भेजा, ’अतिथियों से कह दो- देखिए! मैंने अपने भोज की तैयारी कर ली है। मेरे बैल और मोटे-मोटे जानवर मारे जा चुके हैं। सब कुछ तैयार है; विवाह-भोज में पधारिये।’

5) अतिथियों ने इस की परवाहा नहीं की। कोई अपने खेत की और चला गया, तो कोई अपना व्यापार देखने।

6) दूसरे अतिथियों ने राजा के सेवकों को पकड़ कर उनका अपमान किया और उन्हें मार डाला।

7) राजा को बहुत क्रोध आया। उसने अपनी सेना भेज कर उन हत्यारों का सर्वनाश किया और उनका नगर जला दिया।

8) ’’तब राजा ने अपने सेवकों से कहा, ’विवाह-भोज की तैयारी तो हो चुकी है, किन्तु अतिथि इसके योग्य नहीं ठहरे।

9) इसलिए चैराहों पर जाओ और जितने भी लोग मिल जायें, सब को विवाह-भोज में बुला लाओ।’

10) सेवक सड़कों पर गये और भले-बुरे जो भी मिले, सब को बटोर कर ले आये और विवाह-मण्डप अतिथियों से भर गया।

11) ’’राजा अतिथियों को देखने आया, तो वहाँ उसकी दृष्टि एक ऐसे मनुष्य पर पड़ी, जो विवाहोत्सव के वस्त्र नहीं पहने था।

12) उसने उस से कहा, ’भई विवाहोत्सव के वस्त्र पहने बिना तुम यहाँ कैसे आ गये?’ वह मनुष्य चुप रहा।

13) तब राजा ने अपने सेवकों से कहा, ’इसके हाथ-पैर बाँध कर इसे बाहर, अन्धकार में फेंक दो। वहाँ वे लोग रोयेंगे और दाँत पीसते रहेंगे।’

14) क्योंकि बुलाये हुए तो बहुत हैं, लेकिन चुने हुए थोडे़ हैं।’’

📚 मनन-चिंतन

अक्सर जब हम उन चीजों को नहीं करते हैं जिन्हें हमें करना चाहिये तो हमारे पास अपने को सही ठहराने के लिए कई बहाने होते हैं; अपनी गलतियों को स्वीकार करने और जीवन सुधार का हम विरोध करते हैं। जबकि ये बहाने हमें तंग स्थितियों से कभी-कभी बाहर निकाल सकते हैं, वे हमारे बढ़ने में और आध्यात्मिक एवं व्यक्तिगत विकास में बाधा हैं। ईश्वर की क्षमाशीलता हमारे लिए जीवनसुधार नहीं करने का बहाना नहीं बनना है; हमें उसकी पुकार का जवाब देना होगा या पीछे रह जाना होगा।

पहले पाठ में, नबी इसायस ईश्वर की भलाई की घोषणा करता है, जो पवित्र पर्वत पर सभी लोगों के लिए भोज तैयार करता है। ईश्वर चाहता है कि सभी लोग उसके राज्य में उसके साथ हों।

सुसमाचार का आज का दृष्टांत हमें बताता है कि एक राजा अपने दूतों को अपने बेटे की शादी की दावत के लिए आमंत्रित मेहमानों को बुलाने भेजता है। लेकिन उन्होंने आने से मना कर दिया। राजा अभी भी मेहमानों के साथ धीरज रखता है और दूसरे सेवकों को भेजता है। लेकिन फिर से आमंत्रित लोग बहाने बनाते हैं और उन्होंने दुर्व्यवहार किया और नौकरों को मार डाला, जिससे राजा क्रुद्ध हो जाता और उन्हें मार डालता है। चूंकि भोज सब तय है, राजा अब अपने दूतों को चौराहों में भेजता है ताकि वे मिलने वाले सभी लोगों को भोज के लिए बुला लायें। और सेवक सड़कों पर निकल गए और वे सब को बुला लाये जिससे विवाह मंडप अतिथियों से भर गया।

सबसे पहले यह दृष्टांत हमें बताता है कि मुक्ति मसीह में केंद्रित है; यह हमेशा ईश्वर है जो मुक्ति के लिए पहल करता है। यह प्रक्रिया शुरू करने के लिए हम कुछ भी नहीं कर सकते। विश्वास हमेशा एक दान है और विश्वास के माध्यम से ही हम आमंत्रित किये जाते है।

दूसरी बात, यह दृष्टांत हमें ईश्वर की क्षमाशीलता की याद दिलाती है, जो हमें त्याग नहीं देता है। इस दृष्टांत में सेवक न केवल उन नबियों के प्रतीक हैं जिन्हें इस्राएलियों ने अस्वीकार कर दिया था, बल्कि प्रेरितों और विशेष दूतों के भी हैं जिनको ईश्वर हमारे जीवन में भेजते हैं, हमें उनकी पुकार की याद दिलाते हैं। ईश्वर हमें अपने वचन के माध्यम से, प्रार्थना के माध्यम से बुला सकता है; वह हमें उपदेश, शिक्षा और गवाहों के माध्यम से बुला सकता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि हम ईश्वर का आह्वान सुनें, और उनका कार्य करने में बहाना न बनाये। येसु के शिष्य होने की हमारी प्रतिबद्धता में देरी करने के लिए हम अक्सर अनुचित बहाने ढूंढ़ते हैं। कई बार, हम अपने परिवार के रिश्ते या खुशी को ईश्वर की इच्छा को पूरी करने की इच्छा से अधिक महत्त्व देते हैं। येसु निश्चित रूप से यह नहीं कह रहे हैं कि हम इन दायित्वों को भूल जायें, लेकिन यह कि ईश्वर की इच्छा हमारे जीवन की पहली प्राथमिकता बने। अगर हम अपने जीवन में ईश्वर को पहला स्थान देते हैं तो बाकि सब अपने आप से सही हो जाएंगे। जैसा कि हम मत्ति 6:33 में पढ़ते हैं, "तुम सबसे पहले ईश्वर के राज्य और उसकी धार्मिकता की खोज में लगे रहो और ये सभी चीजें यों ही मिल जायेंगी।"

भोजन बाइबल का एक पसंदीदा प्रतीक है। यह जीवन, समावेशिता, आनंद और उत्सव के लिए खड़ा है। प्रभु येसु ने अपने जीवन में इस प्रतीक का खूब उपयोग किया और इसे सुसमाचार का प्रचार का एक जीवंत माध्यम बनाया। पापियों और नाकेदारों के साथ भोजन करते हुए येसु ने “टेबल फेलोशिप” को गरीबों और तिरस्कृत लोगों के लिए सुसमाचार का एक प्रभावी शैली बनायी। पवित्र यूखरिस्त भोजन की स्थापना के साथ वह हमें अपने जीवन में साझा करने के लिए आमंत्रित करता है।

क्या ईश्वर का वचन का जवाब देने में आप बहाने बनाते हैं? आप क्यों ईश्वर के पास आना नहीं चाहते हैं? ऐसा क्या या कौन है जो आपको ईश्वर को अपने जीवन में प्रधम स्थान देने में बाधा बनती है? अपने बहाने छोड़ दो और प्रभु के आनंद में भाग लो !



📚 REFLECTION

Often when we don't do the things we are supposed to do we have our excuses to justify our actions, refuse to accept our mistakes and resist change. While these excuses may get us out of tight situations they can also hinder us from growing and becoming the people we are called to be. In our faith commitment, while we know that God is infinitely patient, we cannot make excuses for our conversion; we have to respond to His call or be left behind.

In the first reading, Isaiah proclaims the goodness of God, who is preparing a banquet for all his people on the holy mountain. God wants all people to be with him in his kingdom.

The Gospel parable tells us that a king sends out his messengers to summon the invited guests for the marriage feast of his son. But they refuse to come. The king is still patient with the guests and sends a second reminder but again those invited scorn the invitation, make excuses and they maltreated and killed the servants, which incenses the king and he destroys them. Since the banquet is all set, the king now sends his messengers to invite anyone whom they can find. And the servants went out into the streets and gathered all whom they found, both good and bad; so the banquet hall was filled with guests.

The parable tells us, firstly, salvation is centred in Christ; it is always God who takes the initiative for salvation. We cannot do anything to start the process, faith is always a gift and it is through our faith that we are invited, as it were, to a royal banquet.

Secondly, the parable reminds us of the patience of God, who does not give up on us. The servants in the parable stand not only for the prophets whom the Israelites rejected but also for the apostles and special messengers whom God sends into our lives to remind us of his call. God can call us through His word, through prayer; he can call us through the preaching, teaching and witnessing.

What is important is to heed God’s call when it comes and not to make excuses. We often make unjustifiable excuses to delay our commitment to being a disciple of Jesus. At times, we put our family relationship or joy higher than our willingness to do God’s will. Jesus is certainly not saying that we forget these obligations but that God’s will must be the first priority of our lives. If we can put God first, everything else will fit in place. As we read in Mt 6:33, “Seek first the Kingdom and his righteousness, and all these things shall be yours as well.”

The meal is a favourite symbol of the Bible. It stands for life, inclusiveness, celebration. Jesus made use of this symbol in his life and preaching lavishly. The table fellowship of Jesus with sinners and tax collectors was his way of proclaiming the good news to the poor. With the institution of the Eucharistic meal he invites us to share in his very life.

What are the usual excuses that you make not to respond to God’s call? What is it that prevents you from coming to the Lord’s banquet? How can you balance your commitment to your family and work with your relationship to the Lord? Give up your excuses and come to the joy of the Lord!


मनन-चिंतन - 2

येसु मसीह के इस संसार में जन्म लेने से इस पूरे संसार को एक नया मोड़ मिला है। येसु के इस संसार में आने से कई ईश्वरीय रहस्य प्रकट हुए जिसे हम शायद ही जान पाते। येसु के जन्म के बाद मॉं मरियम और यूसुफ बालक येसु को प्रभु को अर्पित करने के लिए येरुसालेम ले गये। वहॉं पर सिमेयोन नामक एक धर्मी तथा भक्त पुरुष ने ईसा को अपनी गोद में ले लिया और ईश्वर की स्तुति करते हुए कहा, ‘‘यह गैर-यहुदियों के प्रबोधन के लिए ज्योति है और तेरी प्रजा इस्राएल का गौरव।’’ (योहन 2:32) प्रभु येसु ने अपने वचनो एवं दृष्टांतों द्वारा कई ईश्वरीय रहस्य हम सब को दिये है। आज का दृष्टांत समस्त लोगों की मुक्ति का निमंत्रण लेकर आता है। आज के दृष्टांत का अहम संदेश यह है कि मुक्ति केवल यहुदियों के लिए नहीं परंतु गैर-यहुदियों के लिए भी है।

आज प्रभु येसु हमारे सामने विवाह उत्सव का दृष्टांत प्रस्तुत करते हैं। इस दृष्टांत में राजा ने अपने पुत्र के विवाह के अवसर पर एक बड़ा भोज का उत्सव रखा परन्तु निमंत्रित लोगो के भोज में आने से इंकार करने पर राजा ने रास्ते और चौराहों पर जो भी मिले उन्हें लाने का आदेश दिया। राजा ने लाये गये लोगों में से एक व्यक्ति को पाया जो विवाह उत्सव का वस्त्र नही पहने हुए था और राजा ने उसको दण्डित किया। इस दृष्टांत को सुनने के बाद हमारे मन में राजा के व्यवहार के प्रति अजीबोगरीब भावनाए उत्पन्न होती होगी कि यह राजा तो बड़ा अजीब है सबसे पहले तो वह रास्ते में मिलने वाले सभी लोगो को लाने को कहता है और जब कोई एक व्यक्ति बिना विवाह वस्त्र पहने हुए पाया जाता है तो उसे दण्डित भी करता है। राजा को तो खुश होना चाहिए कि कम से कम वह व्यक्ति विवाह उत्सव में तो आया। अगर राजा ने सबको बुलाया तो उसे उन सब को अपनाना चाहिये था। हो सकता है वह व्यक्ति गरीब हो और उसके पास विवाह वस्त्र खरीदने के लिए समय या धन न हो।

इसे समझने के लिए आइये हम मनन चिंतन और अवलोकन करें- राजा ने जब चौराहो पर मिलने वाले हर एक व्यक्ति को, चाहे वह अच्छा हो या बुरा, सबको लाने का आदेश दिया तब वहॉं पर यह व्यक्ति अकेला नही था परन्तु उसके साथ-साथ बहुत सारे व्यक्ति थे और शायद उन व्यक्तियों के पास भी विवाह के वस्त्र नही होंगे। लेकिन जब वे सब विवाह उत्सव में प्रवेश करते हैं तो केवल एक व्यक्ति ही बिना विवाह उत्सव के वस्त्र के था। इसका मतलब यह है कि विवाह उत्सव के वस्त्र या तो द्वार पर रखे गये थे या ये वस्त्र उन्हें दिये गये थे जिससे वे उन्हे पहन कर अंदर प्रवेश कर सकें। विवाह वस्त्र को पहनना उनकी एक परम्परा रही होगी। विवाह उत्सव के वस्त्र विवाह भोज के लिए अत्यंत जरूरी या अनिवार्य थे ।

यहुदी जनता ईश्वर के करीब थी और शुरू से ईश्वर से जुडी हुई थी। ‘‘मैं तुम्हें और तुम्हारे बाद तुम्हारे वंशजों को वह भूमि प्रदान करूँगा, जिस में तुम निवास करते हो, अर्थात् कनान का समस्त देश। उस पर सदा के लिए तुम लोगों का अधिकार होगा और मैं तुम्हारे वंशजों का ईश्वर होऊॅंगा।’’ (उत्पत्ति 17:18)। ‘‘तुम इस्राएलियों से यह कहोगे - प्रभु तुम्हारे पूर्वजों के ईश्वर, इब्राहीम, इसहाक तथा याकूब के ईश्वर ने मुझे तुम लोगो के पास भेजा है’’(निर्गमन 3:15)। ‘‘मैं उनके पूर्वजों को राष्ट्रों के देखते-देखते मिस्र से निकाल लाया। मैं उनके लिए निर्धारित विधान का स्मरण करूँगा और मैं, प्रभु उनका अपना ईश्वर होऊॅंगा’’ (लेवी 26:45)। ‘‘वह मेरी प्रजा हो और मैं उसका प्रभु होऊॅं’’ (एजे़किएल 1:11)। ईश्वर ने स्वर्ग राज्य का निमंत्रण सबसे पहले यहुदियों को दिया परन्तु उसे उन्होने अस्वीकार किया। इसके बाद प्रभु ने नबियों को भेजा जिससे वे नबियों की सुनें, परन्तु उन्होने उनका अपमान किया और उन्हें मार डाला। ईश्वर ने उनके इस बर्ताव और घमण्ड के कारण उनका और उनके नगर येरुसालेम का सर्वनाश होने दिया। ‘‘येरुसालेम! येरुसालेम! तू नबियों की हत्या करता है और अपने पास भेजे हुए लोगों को पत्थरों से मार देता है। मैंने कितनी बार चाहा कि तेरी सन्तान को वैसे ही एकत्र कर लूँ, जैसे मुर्गी अपने चूजों को अपने डैनों के नीचे एकत्र कर लेती है, परन्तु तुम लोगों ने इनकार कर दिया। देखो, तुम्हारा घर उजाड़ छोड़ दिया जायेगा। मैं तुम से कहता हूँ। अब से तुम मुझे नहीं देखोगे, जब तक तुम यह न कहोगे-धन्य हैं वह, जो प्रभु के नाम पर आते हैं।’’ (मत्ती 23:37-39)।

प्रभु येसु के इस संसार में आने के बाद स्वर्गराज्य सब के लिए, हर प्रकार के जाति, वर्ग और लोगों के लिए खुल गया और दुनिया के हर कोने में रहने वाले सभी लोगों के लिए आमंत्रण मिला। और इस आमंत्रण में हम सब भी शामिल हैं। परन्तु इस विवाह उत्सव में प्रवेश करने से पूर्व हमें इसके लिए तैयारी करने की आवश्यकता है। अन्यथा हमंस उस मनुष्य के समान जिसने विवाह उत्सव के वस्त्र नहीं पहने थे हाथ-पैर बॉंधकर अन्धकार में फेंक दिया जायेगा। विवाह उत्सव का वस्त्र अर्थात् अपने पुराने वस्त्र को उतार कर नये वस्त्र को पहनना हैं। ‘‘आप लोगों को अपना पहला आचरण और पुराना स्वभाव त्याग देना चाहिए, क्योंकि वह बहकाने वाली दुर्वासनाओं के कारण बिगड़ता जा रहा है। आप लोग पूर्ण रूप से नवीन आध्यात्मिक विचारधारा अपनायें और एक नवीन स्वभाव धारण करें, जिसकी सृष्टि ईश्वर के अनुसार हुई है और जो धार्मिकता तथा सच्ची पवित्रता में व्यक्त होता है’’ (एफेसियों 22:24)। अर्थात् अपने पुराने पापमय स्वभाव को छोड़ कर एक पवित्र और नवीन स्वभाव को अपनाने की जरूरत है। और यह नया स्वभाव प्रभु येसु का मनोभाव और उसकी धार्मिकता है। हम सब को स्वर्गराज्य में प्रवेश करने के लिए प्रभु येसु का मनोभाव या उसकी धार्मिकता को अपनाने की जरूरत है।

आज का दृष्टांत हमें यह बताता है कि स्वर्गराज्य सब के लिए है न केवल एक ही जाति या एक ही प्रजाति के लिए। परन्तु बहुतो के अस्वीकार के कारण वे उसमें प्रवेश नही कर पाते हैं। पहले यहुदियों ने येसु मसीह को मानने से इनकार किया और बाद में उन लोगों ने जो येसु के मनोभाव या धार्मिकता को अस्वीकार करते हैं। यहॉं ख्रीस्त का मनोभाव अपनाने का मतलब केवल ख्रीस्तीय धर्म अपनाना नही परन्तु ख्रीस्त के मन के अनुसार अपने मन को बनाना या आचरण करना है और यह मनोभाव या आचरण गैर ख्रीस्तीयों के जीवन में भी पाया जा सकता है।

आईये हम सब अपने मनोभाव को ख्रीस्त के मनोभाव के अनुसार बनायें (फिलिप्पियों 2:5)।

10 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

10 अक्टूबर 2020
वर्ष का सत्ताईसवाँ सामान्य सप्ताह, शनिवार

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📒 पहला पाठ : गलातियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 3:22-29

22) परन्तु धर्मग्रन्थ ने सब कुछ पाप के अधीन कर दिया है, जिससे ईसा मसीह में विश्वास के द्वारा विश्वास करने वालों के लिए प्रतिज्ञा पूरी की जाये।

23) विश्वास के आगमन से पहले हम को उसके प्रकट होने के समय तक संहिता के निरीक्षण में बन्दी बना दिया गया था।

24) इस प्रकार जब तक मसीह नहीं आये और हम विश्वास के द्वारा धार्मिक नहीं बने, तब तक संहिता हमारी निरीक्षक रही।

25) किन्तु अब विश्वास आया है और हम निरीक्षक के अधीन नहीं रहे।

26) क्योंकि आप लोग सब-के-सब ईसा मसीह में विश्वास करने के कारण ईश्वर की सन्तति हैं;

27) क्योंकि जितने लोगों ने मसीह का बपतिस्मा ग्रहण किया, उन्होंने मसीह को धारण किया है।

28) अब न तो कोई यहूदी और न यूनानी, न तो कोई दास है और न स्वतन्त्र, न तो कोई पुरुष है और न स्त्री-आप सब ईसा मसीह में एक हो गये हैं।

29) यदि आप लोग मसीह के है, तो इब्राहीम की सन्तान है और प्रतिज्ञा के अनुसार उनके उत्तराधिकारी।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 11:27-28

27) ईसा ये बातें कह ही रहे थे कि भीड़ में से कोई स्त्री उन्हें सम्बोधित करते हुए ऊँचे स्वर में बोल उठी, ’’धन्य है वह गर्भ, जिसने आप को धारण किया और धन्य हैं वे स्तन, जिनका आपने पान किया है!

28) परन्तु ईसा ने कहा, ’’ठीक है; किन्तु वे कहीं अधिक धन्य हैं, जो ईश्वर का वचन सुनते और उसका पालन करते हैं’’।

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है। उसने हमें विश्वास के माध्यम से अपनी सन्तान होने का विशेषाधिकार दिया है। मसीह में बपतिस्मा लेने वाले सभी लोग उनमें एक हो गए हैं। इसलिए विश्वासियों की भाषा, संस्कृति, धन, शक्ति, आदि के आधार पर कोई अंतर और भेद-भाव नहीं हैं; हम सभी येसु मसीह में एक हैं।

आज के सुसमाचार में ईश्वर के प्रति यह उचित संबंध व्यक्त किया गया है। जब भीड़ में से एक महिला ने ऊँची आवाज में येसु से कहा, "धन्य है वह गर्भ, जिसने आपको धारण किया और धन्य हैं वे स्तन, जिनका आपने पान किया है,” येसु ने उसे उत्तर दिया, "ठीक है; किन्तु वे कहीं अधिक धन्य हैं, जो ईश्वर का वचन सुनते और उसका पालन करते हैं।" येसु मसीह में विश्वास के माध्यम से हमें मुक्ति मिली है। पवित्र सुसमाचार द्वारा हमें विश्वास प्राप्त होता है। इसलिए ईश्वर के साथ हमारा संबन्ध किसी शारीरिक या पारिवारिक रिश्ते पर आधारित नहीं है, बल्कि ख्रीस्त में विश्वास पर आधारित है। इसलिए किसी को भी इस अनुग्रह के बाहर नहीं रखा गया है। वे सभी, जो येसु मसीह में विश्वास करते हैं और पवित्र आत्मा से संचालित हैं, वे सब ईश्वर की संतान हैं।

आप किस बात पर गर्व करते हैं? ईश्वर के साथ आपका सम्बन्ध किस बात पर आधारित है? - विश्वास पर या किसी अन्य चीज़ पर - आपका स्थान या अधिकार पर, या कलीसिया के अधिकारीयों के साथ आपकी निकटता पर? क्या आप विभिन्न चीजों के आधार पर विश्वासियों के साथ भेद-भाव करते हैं? क्या आप नहीं जानते हैं कि येसु मसीह में विश्वास करने वाले सभी लोग बिना किसी भेद-भाव के ईश्वर की संतान हैं? आइए हम सभी विश्वासियों को अपने भाई-बहन जैसे स्वीकार करने और उन्हें प्यार करने का अनुग्रह के लिए प्रार्थना करें।



📚 REFLECTION

We are all children of God thorough faith. For all those baptized in Christ, there are no more distinctions; all of us are one in Christ Jesus.

This proper relation to God is expressed in today’s gospel. When a woman in the crowd raised her voice and said to Jesus, “Happy the womb that bore you and the breasts that you sucked”, Jesus replied, “Still happier are those who hear the word of God and keep it.” We are saved through faith in Jesus Christ. Faith comes from believing in the gospel. So our relationship with God is not based on any physical or family relationship but rather on faith in Jesus. So no one is excluded. All those who believe in Jesus and are led by the Spirit of God are children of God.

In what do you glory? Is your relationship to God based on faith or on something else, like your position or proximity to those in authority in the Church? Do you make distinctions between believers based on different grounds? Know that all those who believe in Jesus are children of God without any distinctions. Let us pray for the grace to accept and love all our brothers and sisters in faith.

09 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

09 अक्टूबर 2020
वर्ष का सत्ताईसवाँ सामान्य सप्ताह, शुक्रवार

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📒 पहला पाठ : गलातियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 3:7-14

7) इसलिए आप लोग यह निश्चित रूप से जान लें कि जो लोग विश्वास करते हैं, वे ही इब्राहीम की सन्तान हैं।

8) धर्मग्रन्थ पहले से यह जानता था कि ईश्वर विश्वास द्वारा गैर-यहूदियों को पापमुक्त करेगा, इसलिए उसने पहले से इब्राहीम को यह सुसमाचार सुनाया कि तुम्हारे द्वारा पृथ्वी भर के राष्ट्र आशीर्वाद प्राप्त करेंगे।

9) इसलिए जो विश्वास पर निर्भर रहते हैं, विश्वास करने वाले इब्राहीम के साथ ही आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

10) परन्तु जो संहिता के कर्मकाण्ड पर निर्भर रहते है, वे शाप के अधीन हैं; क्योंकि लिखा है- जो व्यक्ति संहिता-ग्रन्थ में लिखी हुई सभी बातों का पालन नहीं करता रहता है, वह शापित है।

11) यह तो स्पष्ट है कि कोई संहिता के कारण ईश्वर की दृष्टि में धार्मिक नहीं होता; क्योंकि लिखा है- धार्मिक मनुष्य अपने विश्वास के द्वारा जीवन प्राप्त करेगा।

12) और संहिता का विश्वास से कोई सम्बन्ध नहीं है; क्योंकि उस में लिखा है-जो इन बातों का पालन करेगा, उसे इन्हीं के द्वारा जीवन प्राप्त होगा।

13) मसीह हमारे लिए शापित बने और इस तरह उन्होंने हम को संहिता के अभिशाप से मुक्त किया; क्योंकि लिखा है- जो काठ पर लटकाया जाता है, वह शापित है।

14) यह इसलिए हुआ कि ईसा मसीह के द्वारा इब्राहीम का आशीर्वाद ग़ैर-यहूदियों को भी प्राप्त हो और हमें विश्वास द्वारा वह आत्मा मिले, जिसकी प्रतिज्ञा की गयी थी।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 11:15-26

15) परन्तु उन में से कुछ ने कहा, ’’यह अपदूतों के नायक बेलज़ेबुल की सहायता से अपदूतों को निकालता है’’।

16) कुछ लोग ईसा की परीक्षा लेने के लिए उन से स्वर्ग की ओर का कोई चिन्ह माँगते रहे।

17) उनके विचार जान कर ईसा ने उन से कहा, ’’जिस राज्य में फूट पड़ जाती है, वह उजड़ जाता है और घर के घर ढह जाते हैं।

18) यदि शैतान अपने ही विरुद्ध विद्रोह करने लगे, तो उसका राज्य कैसे टिका रहेगा? तुम कहते हो कि मैं बेलजे़बुल की सहायता से अपदूतों को निकालता हूँ।

19) यदि मैं बेलजे़बुल की सहायता से अपदूतों को निकालता हूँ, तो तुम्हारे बेटे किसी सहायता से उन्हें निकालते हैं? इसलिए वे तुम लोगों का न्याय करेंगे।

20) परन्तु यदि मैं ईश्वर के सामर्थ्य से अपदूतों को निकालता हूँ, तो निस्सन्देह ईश्वर का राज्य तुम्हारे बीच आ गया है।

21) ’’जब बलवान् मनुष्य हथियार बाँधकर अपने घर की रखवाली करता है, तो उसकी धन-सम्पत्ति सुरक्षित रहती है।

22) किन्तु यदि कोई उस से भी बलवान् उस पर टूट पड़े और उसे हरा दे, तो जिन हथियारों पर उसे भरोसा था, वह उन्हें उस से छीन लेता और उसका माल लूट कर बाँट देता है।

23) ’’जो मेरे साथ नहीं है, वह मेरा विरोधी है और जो मेरे साथ नहीं बटोरता, वह बिखेरता है।

24) ’’जब अशुद्ध आत्मा किसी मनुष्य से निकलता है, तो वह विश्राम की खोज में निर्जन स्थानों में भटकता फिरता है। विश्राम न मिलने पर वह कहता है, ’जहाँ से निकला हूँ, अपने उसी घर वापस जाऊँगा’।

25) लौटने पर वह उस घर को झाड़ा-बुहारा और सजाया हुआ पाता है।

26) तब वह जा कर अपने से भी बुरे सात अपदूतों को ले आता है और वे उस घर में घुस कर वहीं बस जाते हैं और उस मनुष्य की यह पिछली दशा पहली से भी बुरी हो जाती है।’’

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है। ईश्वर की इच्छा है की हम सब मुक्ति प्राप्त करें। प्रभु येसु क्रूस पर मर गये ताकि हम उस पर विश्वास करके पवित्र आत्मा प्राप्त कर सकें। हमें कानून और उसके नुस्खों से नहीं बल्कि प्रभु येसु पर विश्वास करने से मुक्ति प्राप्त होती है।

येसु के जीवन में पवित्र आत्मा सक्रिय था। उसने पवित्र आत्मा की शक्ति में सब कुछ किया। उनके विरोधियों ने उन पर शैतानों के राजकुमार बेज़ेबुल के माध्यम से शैतानों को बाहर निकालने का आरोप लगाया। कुछ अन्य लोगों ने उनके कार्यों में ईश्वर की शक्ति को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और एक और चिन्ह की मांग की । येसु ने उनसे स्पष्ट रूप से कहा, "यदि मैं ईश्वर के सामर्थ्य से अपदूतों को निकलता हूँ, तो निस्संदेह ईश्वर का राज्य तुम्हारे बीच आ गया है।"। येसु हमें सतर्क रहने की चेतावनी भी देते हैं क्योंकि शैतान, जो एक बार बाहर निकाला जाता है, वह जिससे निकला गया उसको पुनः अपने अधीन में करने के लिए अधिक से अधिक बल के साथ फिर से प्रवेश करने की कोशिश करेगा।

क्या मैं अपने जीवन में और दूसरों के काम में पवित्र आत्मा को देखता हूँ? क्या मैं अपने जीवन में ईश्वर की शक्ति को स्वीकार करने के लिए अनिच्छुक हूँ? क्या मैं अभी भी येसु में अपने विश्वास को साबित करने के लिए चिन्हों की तलाश कर रहा हूँ? पवित्र आत्मा से प्रार्थना कीजिये कि वह आपको सही मार्ग पर ले चले।



📚 REFLECTION

God loves us. It is his desire that we should be saved. Christ died on the cross so that we might receive the Holy Spirit through faith in him. We are saved, not by the law and its prescriptions but by faith in Jesus.

The Holy Spirit was active in the life of Jesus. He did everything in the power of the Holy Spirit. His opponents accused him of casting out the devils through Beelzebul, the prince of devils. Some others refused to acknowledge God’s power in his works and asked for another sign. Jesus said to them categorically, “If it is through the finger of God that I cast out devils, then know that the Kingdom of God has overtaken you”. Finger of God is another expression for the Holy Spirit. Jesus also warns us to be alert because the devil, once cast out, will try to re-enter with greater force to subdue the believer.

Do I see the Holy Spirit at work in my life and that of others? Am I reluctant to acknowledge the power of God in my life? Am I still seeking for signs to prove my faith in Jesus? Pray to the Holy Spirit to guide you in the right path.

 -Br. Biniush Topno (Duliajan)

08 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

08 अक्टूबर 2020
वर्ष का सत्ताईसवाँ सामान्य सप्ताह, गुरुवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

📒 पहला पाठ : गलातियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 3:1-5

1) नासमझ गलातियों! किसने आप लोगों पर जादू डाला है? आप लोगों को तो सुस्पष्ट रूप से यह दिखलाया गया कि ईसा मसीह क्रूस पर आरोपित किये गये थे।

2) मैं आप लोगों से इतना ही जानना चाहता हूँ - आप को संहिता के कर्मकाण्ड के कारण आत्मा का वरदान मिला या सुसमाचार के सन्देश पर विश्वास करने के कारण?

3) क्या आप लोग इतने नासमझ हैं कि आपने जो कार्य आत्मा द्वारा प्रारम्भ किया, उसे अब शरीर द्वारा पूर्ण करना चाहते हैं?

4) क्या आप लोगों को व्यर्थ ही इतने वरदान प्राप्त हुए? मुझे ऐसा विश्वास नहीं है।

5) जब ईश्वर आप लोगों को आत्मा का वरदान देता है और आपके बीच चमत्कार दिखाता है, तो क्या वह संहिता के कर्मकाण्ड के कारण ऐसा करता है या इसलिए कि आप सुसमाचार के सन्देश पर विश्वास करते है?

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 11:5-13

5) फिर ईसा ने उन से कहा, ’’मान लो कि तुम में कोई आधी रात को अपने किसी मित्र के पास जा कर कहे, ’दोस्त, मुझे तीन रोटियाँ उधार दो,

6) क्योंकि मेरा एक मित्र सफ़र में मेरे यहाँ पहुँचा है और उसे खिलाने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है’

7) और वह भीतर से उत्तर दे, ’मुझे तंग न करो। अब तो द्वार बन्द हो चुका है। मेरे बाल-बच्चे और मैं, हम सब बिस्तर पर हैं। मैं उठ कर तुम को नहीं दे सकता।’

8) मैं तुम से कहता हूँ-वह मित्रता के नाते भले ही उठ कर उसे कुछ न दे, किन्तु उसके आग्रह के कारण वह उठेगा और उसकी आवश्यकता पूरी कर देगा।

9) ’’मैं तुम से कहता हूँ-माँगो और तुम्हें दिया जायेगा; ढूँढ़ो और तुम्हें मिल जायेगा; खटखटाओ और तुम्हारे लिए खोला जायेगा।

10) क्योंकि जो माँगता है, उसे दिया जाता है; जो ढूँढ़ता है, उसे मिल जाता है और जो खटखटाता है, उसके लिए खोला जाता है।

11) ’’यदि तुम्हारा पुत्र तुम से रोटी माँगे, तो तुम में ऐसा कौन है, जो उसे पत्थर देगा? अथवा मछली माँगे, तो मछली के बदले उसे साँप देगा?

12) अथवा अण्डा माँगे, तो उसे बिच्छू देगा?

13) बुरे होने पर भी यदि तुम लोग अपने बच्चों को सहज ही अच्छी चीज़ें देते हो, तो तुम्हारा स्वर्गिक पिता माँगने वालों को पवित्र आत्मा क्यों नहीं देगा?’’

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है। कलीसिया को प्रभु येसु का सबसे बड़ा उपहार पवित्र आत्मा है। आज का पहला पाठ (गलाती 3: 1-5) में संत पौलुस हमें सिखाता है कि सुसमाचार पर विश्वास करने से हमें पवित्र आत्मा प्राप्त होते हैं। और आज के सुसमाचार में येसु कहते हैं कि स्वर्गीय पिता उन लोगों को पवित्र आत्मा देंगे जो उनसे मांगते हैं।

येसु कहते हैं, “मांगो, और तुम्हें दिया जाएगा; ढूंढो और तुम पाओगे; खटखटाओ, और तुम्हारे लिए खोला जाएगा।” ईश्वर हमसे प्यार करता है। इसलिए वह चाहता है कि हमारी ज़रूरतें पूरी हों। वह चाहता है कि हमें अपनी खोज के उत्तर मिलें। वह चाहते हैं कि हमारे लिए नए अवसर खुल जायें। ईश्वर उन लोगों की प्रार्थनाओं का जवाब देता है जो उसे विश्वास के साथ मांगते हैं। प्रभु येसु कहता है कि माँगने वालों को पवित्र आत्मा देने के लिए हमारे पिता ईश्वर तैयार है। इसलिए हम विश्वास के साथ पिता ईश्वर से प्रार्थना करें की वह हमें पवित्र आत्मा प्रदान करें।

क्या मैं मेरी ज़रूरतों में प्रार्थना में ईश्वर के पास जाता हूँ? क्या मुझे विश्वास है कि ईश्वर मेरी प्रार्थनाओं का जवाब देंगे? क्या मैं साधारण, सांसारिक चीजों से संतुष्ट हूं या मैं वास्तव में पवित्र आत्मा की इच्छा रखता हूं? मांगो, ढूंढो, खटखटाओ - ईश्वर आपकी प्रार्थनाओं का जवाब देंगे। आमीन।



📚 REFLECTION

God loves us. The greatest gift of Jesus to the Church is the Holy Spirit. The first reading from Galatians chapter 3: 1-5 says that we receive the Holy Spirit by believing in the gospel. And Jesus says in today’s gospel that the heavenly Father will give the Holy Spirit to those who ask him.

Jesus says, “Ask, and it will be given to you; search, and you will find; knock, and the door will be opened to you”. God loves us. Therefore he wants us to have our needs fulfilled. He wants that we find the answers to our search. He wants that new opportunities be opened for us. God answers the prayers of those who ask him. And the greatest gift that Jesus wants us to have is the Holy Spirit, whom the Father is ready to give to those who ask him.

In my needs do I turn to God in prayer? Do I believe that God will answer my prayers? Am I satisfied with the ordinary, mundane things or do I really desire the Holy Spirit? Ask, seek, knock – God will answer your prayers.


                              ✍️- Biniush Topno

07 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

07 अक्टूबर 2020
वर्ष का सत्ताईसवाँ सामान्य सप्ताह, बुधवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥धन्य कुँवारी मरियम माला की महारानी : स्मृति

📒 पहला पाठ : प्रेरित-चरित 1:12-14

12) प्रेरित जैतून नामक पहाड़ से येरुसालेम लौटे। यह पहाड़ येरुसालेम के निकट, विश्राम-दिवस की यात्रा की दूरी पर है।

13) वहाँ पहुँच कर वे अटारी पर चढ़े, जहाँ वे ठहरे हुए थे। वे थे-पेत्रुस तथा योहन, याकूब तथा सिमोन, जो उत्साही कहलाता था और याकूब का पुत्र यूदस।

14) ये सब एकहृदय हो कर नारियों, ईसा की माता मरियम तथा उनके भाइयों के साथ प्रार्थना में लगे रहते थे।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस 01:26-38

26) छठे महीने स्वर्गदूत गब्रिएल, ईश्वर की ओर से, गलीलिया के नाजरेत नामक नगर में एक कुँवारी के पास भेजा गया,

27) जिसकी मँगनी दाऊद के घराने के यूसुफ नामक पुरुष से हुई थी, और उस कुँवारी का नाम था मरियम।

29) वह इन शब्दों से घबरा गयी और मन में सोचती रही कि इस प्रणाम का अभिप्राय क्या है।

30) तब स्वर्गदूत ने उस से कहा, ’’मरियम! डरिए नहीं। आप को ईश्वर की कृपा प्राप्त है।

31) देखिए, आप गर्भवती होंगी, पुत्र प्रसव करेंगी और उनका नाम ईसा रखेंगी।

32) वे महान् होंगे और सर्वोच्च प्रभु के पुत्र कहलायेंगे। प्रभु-ईश्वर उन्हें उनके पिता दाऊद का सिंहासन प्रदान करेगा,

33) वे याकूब के घराने पर सदा-सर्वदा राज्य करेंगे और उनके राज्य का अन्त नहीं होगा।’’

34) पर मरियम ने स्वर्गदूत से कहा, ’’यह कैसे हो सकता है? मेरा तो पुरुष से संसर्ग नहीं है।’’

35) स्वर्गदूत ने उत्तर दिया, ’’पवित्र आत्मा आप पर उतरेगा और सर्वोच्च प्रभु की शक्ति की छाया आप पर पड़ेगी। इसलिए जो आप से उत्पन्न होंगे, वे पवित्र होंगे और ईश्वर के पुत्र कहलायेंगे।

36) देखिए, बुढ़ापे में आपकी कुटुम्बिनी एलीज़बेथ के भी पुत्र होने वाला है। अब उसका, जो बाँझ कहलाती थी, छठा महीना हो रहा है;

37) क्योंकि ईश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है।’’

38) मरियम ने कहा, ’’देखिए, मैं प्रभु की दासी हूँ। आपका कथन मुझ में पूरा हो जाये।’’ और स्वर्गदूत उसके पास से चला गया।

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है। ईश्वर हमसे प्यार करता है और हमें उस प्यार का अनुभव करने और उसे मनाने के लिए विभिन्न माध्यम देता है। पवित्र रोजरी माला की माँ का पर्व, जिसे हम आज मनाते है, हमारे प्रति ईश्वर का प्रेम का एक सुंदर उदाहरण है। आज के पाठ इस त्यौहार की दृष्टी से चुने गये हैं। आज का सुसमाचार में हम माता मरियम की भक्ति का और विशेष रूप से प्रणाम मरिया प्रार्थना का आधार पाते हैं। मरियम को सम्बोधित करते हुए स्वर्गदूत कहता है: "प्रणाम मरिया, प्रभु की कृपापात्री, प्रभु आपके साथ है"। "प्रणाम मरिया" पूर्ण रूप से बाइबिल पर आधारित एक प्रार्थना है।

संत पोप जॉन पॉल द्वितीय ने पवित्र रोजरी माला विनती को अपनी पसंदीदा प्रार्थना बताया। माता मरियम के साथ हम पवित्र रोजरी माला में येसु के जीवन के मूलभूत रहस्यों पर मनन-चिंतन करते हैं। पवित्र रोजरी माला के दौरान हम माता मरियम के ह्रदय के द्वारा येसु की उपासना करतेहैं।

कलीसिया के इतिहास में कठिन और विरोध की परिस्थितियों में विश्वासियों ने माला विनती द्वारा अपने विश्वास में बने रहे। आप लोगों ने अनुभव किया होगा कैसे लॉकडाउन के इन दिनों में पवित्र रोजरी माला की भक्तिमय प्रार्थना अपने विश्वास को जीने और उसे सक्रिय और जीवंत बनाये रखने में कितने मदत किये हैं।

क्या आप येसु को और अधिक प्यार करना चाहते हैं? यदि हाँ, तो अपनी रोजरी माला लेकर माता मरियम के पास जाईये। हे मरियम, पवित्र रोजरी माला की माँ, हमारे लिए विनती कर !



📚 REFLECTION

God loves us. God loves us and gives us various means to experience and celebrate that love. The feast of Our Lady of the Rosary, which we celebrate today, is a beautiful expression of God’s love for us. The readings are taken in view of this feast. The gospel passage of the annunciation to Mary contains the invocations in honour of Mary, “Hail Mary, full of grace, the Lord is with you”. “Hail Mary” is such a biblical prayer!

Saint Pope John Paul II described the rosary as his favourite prayer. In praying the rosary we reflect on the fundamental mysteries of the life of Jesus along with Mary. It is loving Jesus with the heart and mind of Mary.

During the hard times in the history of the church faith was kept alive by the recitation of the holy rosary by many people. It may be your experience that during these lockdown days rosary has played a great role in living and keeping alive our faith in a prayerful and devotional way.

Do you want to love Jesus more? Then go to Mother Mary and learn at her lap with your rosary in hand! Our Lady of the Rosary, pray for us!

 -Br. Biniush Topno (Duliajan)





06 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

06 अक्टूबर 2020
वर्ष का सत्ताईसवाँ सामान्य सप्ताह, मंगलवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

📒 पहला पाठ :गलातियों 1:13-24

13) आप लोगों ने सुना होगा कि जब मैं यहूदी धर्म का अनुयायी था, तो मेरा आचरण कैसा था। मैं ईश्वर की कलीसिया पर घोर अत्याचार और उसके सर्वनाश का प्रयत्न करता था।

14) मैं अपने पूर्वजों की परम्परओं का कट्टर समर्थक था और अपने समय के बहुत-से यहूदियों की अपेक्षा अपने राष्ट्रीय धर्म के पालन में अधिक उत्साह दिखलाता था।

15) किन्तु ईश्वर ने मुझे माता के गर्भ से ही अलग कर लिया और अपने अनुग्रह से बुलाया था;

16) इसलिए उसने मुझ पर- और मेरे द्वारा- अपने पुत्र को प्रकट करने का निश्चय किया, जिससे मैं गैर-यहूदियों में उसके पुत्र के सुसमाचार का प्रचार करूँ। इसके बाद मैंने किसी से परामर्श नहीं किया।

17) और जो मुझ से पहले प्रेरित थे, उन से मिलने के लिए मैं येरूसालेम नहीं गया; बल्कि मैं तुरन्त अरब देश गया और बाद में दमिश्क लौटा।

18) मैं तीन वर्ष बाद केफ़स से मिलने येरूसालेम गया और उनके साथ पंद्रह दिन रहा।

19) प्रभु के भाई याकूब को छोड़ कर मेरी भेंट अन्य प्रेरितों में किसी से नहीं हुई।

20) ईश्वर मेरा साक्षी है कि मैंने आप को जो लिखा है, वह एकदम सच है।

21) इसके बाद मैं सीरिया और किलिकिया प्रदेश गया।

22) उस समय यहूदिया की मसीही कलीसियाएं मुझे व्यक्तिगत रूप से नहीं जानती थीं।

23) उन्होंने इतना ही सुना था कि जो व्यक्ति हम पर अत्याचार करता था, वह अब उस विश्वास का प्रचार कर रहा है, जिसका वह सर्वनाश करने का प्रयत्न करता था

24) और वे मेरे कारण ईश्वर की स्तुति करती थीं।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस 10:38-42

38) ईसा यात्रा करते-करते एक गाँव आये और मरथा नामक महिला ने अपने यहाँ उनका स्वागत किया।

39) उसके मरियम नामक एक बहन थी, जो प्रभु के चरणों में बैठ कर उनकी शिक्षा सुनती रही।

40) परन्तु मरथा सेवा-सत्कार के अनेक कार्यों में व्यस्त थी। उसने पास आ कर कहा, ’’प्रभु! क्या आप यह ठीक समझते हैं कि मेरी बहन ने सेवा-सत्कार का पूरा भार मुझ पर ही छोड़ दिया है? उस से कहिए कि वह मेरी सहायता करे।’’

41) प्रभु ने उसे उत्तर दिया, ’’मरथा! मरथा! तुम बहुत-सी बातों के विषय में चिन्तित और व्यस्त हो;

42) फिर भी एक ही बात आवश्यक है। मरियम ने सब से उत्तम भाग चुन लिया है; वह उस से नहीं लिया जायेगा।’’

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है। जैसा कि संत पौलुस आज का पहला पाठ में कहता है, "उसने मुझ पर - और मेरे द्वारा - अपने पुत्र को प्रकट करने का निश्चय किया, जिससे मैं गैर यहूदियों में उसके पुत्र के सुसमाचार का प्रचार करूं"। उसने स्वयं प्रभु येसु से सुसमाचार का संदेश सीखा; किसी भी मानव स्रोत से नहीं। ईश्वर अपनी उदारता में अपने आपको हमारे सामने प्रकट करता है और चाहता है कि हम सभी लोगों के साथ सुसमाचार का आनंद का साझा करें।

आज का सुसमाचार का पाठ येसु के द्वारा मरथा और मरियम कों उनके घर में भेंट करने के बारे में है। मारथा ने येसु का उनके घर में स्वागत किया। मरियम ने प्रभु के चरणों में बैठकर उनकी शिक्षा सुनती रही। येसु ने मरथा से कहा, "तुम बहुत सी बातों के विषय में चिंतित और व्यस्त हो; फिर भी एक ही बात आवश्यक है। मरियम ने सबसे उत्तम भाग चुन लिया है; वह उस से नहीं लिया जायेगा"।

येसु के साथ व्यक्तिगत प्रार्थना में समय बिताने से और उनकी बात मौन-साधना और पवित्र वचन में सुनने से ही कोई येसु के साथ अपने सम्बन्ध में बढ़ सकता है। प्रार्थना में येसु के साथ समय बिताने से ही आध्यात्मिक जीवन का विकास होता है। प्रार्थना में प्रभु के साथ पहले समय बिताए बिना सुसमाचार की सच्ची घोषणा नहीं हो सकती है - येसु के संग रहना, उनकी शिक्षा सुनना, और सुसमाचार की घोषणा करना।

हम अपने आपसे पूछें: क्या मेरा प्रभु येसु के साथ व्यक्तिगत संबंध है? प्रभु से मेरा सम्बन्ध में बढ़ने के लिए मुझे क्या करना चाहिए ? क्या मैं इसे दैनिक व्यक्तिगत प्रार्थना और पवित्र वचन के पढ़न के द्वारा पोषण करता हूँ?



📚 REFLECTION

God loves us. As Paul says in today’s reading, “God revealed his son to me, so that I might preach the good news about him to the pagans.” He learned the truth of the gospel from the Lord Jesus himself; not from any human source. In his goodness God reveals himself to us and wants us to share the joy of the gospel with all people.

The gospel passage is about the visit of Jesus to the house of Martha and Mary. Martha welcomed Jesus into their house. Mary sat down at the Lord’s feet and listened to him speaking. About his Jesus said, “Mary has chosen the better part; and it is not to be taken from her”.

It is by spending time with Jesus in personal prayer and listening to him - in silence as well as in the Scriptures - that one grows in relationship with him. There can be no spiritual life without time spent with Jesus in prayer. And there can be no proclamation of the gospel without first spending time with the Lord in prayer. Spend time with Jesus, listen to him, and then proclaim the Gospel to others.

Let us ask ourselves: Do I have a personal relationship with the Lord? What must I do to grow in my relationship with him? Do I nourish it with daily personal prayer and reading of the Holy Scripture?

05 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

05 अक्टूबर 2020
वर्ष का सत्ताईसवाँ सामान्य सप्ताह, सोमवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

📒 पहला पाठ :गलातियों 1:6-12

6) मुझे आश्चर्य होता है कि जिसने आप लोगों को मसीह के अनुग्रह द्वारा बुलाया, उसे आप इतना शीघ्र त्याग कर एक दूसरे सुसमाचार के अनुयायी बन गये हैं।

7) दूसरा तो है ही नहीं, किन्तु कुछ लोग आप में अशान्ति उत्पन्न करते और मसीह का सुसमाचार विकृत करना चाहते हैं।

8) लेकिन जो सुसमाचार मैंने आप को सुनाया, यदि कोई- चाहे वह मैं स्वयं या कोई स्वर्गदूत ही क्यों न हो- उस से भिन्न सुसमाचार सुनाये, तो वह अभिशप्त हो!

9) मैं जो कह चुका हूँ, वही दुहराता हूँ- जो सुसमाचार आप को मिला है, यदि कोई उस से भिन्न सुसमाचार सुनाये, तो वह अभिशप्त हो!

10) मैं अब किसका कृपापात्र बनने की कोशिश कर रहा हूँ - मनुष्यों का अथवा ईश्वर का? क्या मैं मनुष्यों को प्रसन्न करना चाहता हूँ? यदि मैं अब तक मनुष्यों को प्रसन्न करना चाहता, तो मैं मसीह का सेवक नहीं होता।

11) भाइयो! मैं आप लोगों को विश्वास दिलाता हूँ कि मैंने जो सुसमाचार सुनाया, वह मनुष्य-रचित नहीं है।

12) मैंने किसी मनुष्य से उसे न तो ग्रहण किया और न सीखा, बल्कि उसे ईसा मसीह ने मुझ पर प्रकट किया।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस 10:25-37

25) किसी दिन एक शास्त्री आया और ईसा की परीक्षा करने के लिए उसने यह पूछा, ’’गुरूवर! अनन्त जीवन का अधिकारी होने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?’’

26) ईसा ने उस से कहा, ’’संहिता में क्या लिखा है?’’ तुम उस में क्या पढ़ते हो?’’

27) उसने उत्तर दिया, ’’अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा, अपनी सारी शक्ति और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो और अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो’’।

28) ईसा ने उस से कहा, ’’तुमने ठीक उत्तर दिया। यही करो और तुम जीवन प्राप्त करोगे।’’

29) इस पर उसने अपने प्रश्न की सार्थकता दिखलाने के लिए ईसा से कहा, ’’लेकिन मेरा पड़ोसी कौन है?’’

30) ईसा ने उसे उत्तर दिया, ’’एक मनुष्य येरुसालेम से येरीख़ो जा रहा था और वह डाकुओं के हाथों पड़ गया। उन्होंने उसे लूट लिया, घायल किया और अधमरा छोड़ कर चले गये।

31) संयोग से एक याजक उसी राह से जा रहा था और उसे देख कर कतरा कर चला गया।

32) इसी प्रकार वहाँ एक लेवी आया और उसे देख कर वह भी कतरा कर चला गया।

33) इसके बाद वहाँ एक समारी यात्री आया और उसे देख कर उस को तरस हो आया।

34) वह उसके पास गया और उसने उसके घावों पर तेल और अंगूरी डाल कर पट्टी बाँधी। तब वह उसे अपनी ही सवारी पर बैठा कर एक सराय ले गया और उसने उसकी सेवा शुश्रूषा की।

35) दूसरे दिन उसने दो दीनार निकाल कर मालिक को दिये और उस से कहा, ’आप इसकी सेवा-शुश्रूषा करें। यदि कुछ और ख़र्च हो जाये, तो मैं लौटते समय आप को चुका दूँगा।’

36) तुम्हारी राय में उन तीनों में कौन डाकुओं के हाथों पड़े उस मनुष्य का पड़ोसी निकला?’’

37) उसने उत्तर दिया, ’’वही जिसने उस पर दया की’’। ईसा बोले, ’’जाओ, तुम भी ऐसा करो’’।

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है। हम आज से पहले पाठ के रूप में गलातियों के नाम संत पौलुस का पत्र से सुनते हैं। संत पौलुस का दावा है कि जिस सुसमाचार का उसने प्रचार किया वह कुछ ऐसा था जो उसने येसु मसीह के रहस्योद्घाटन के माध्यम से सीखा था, न कि उसे कोई पुरुषों के द्वारा दिया गया कुछ। इसलिए वह लोगों को इस सुसमाचार को किसी अन्य संदेश में बदलने के बारे में चेतावनी देता है।

आज का सुसमाचार पाठ में यह सवाल है, "मेरा पड़ोसी कौन है?"। यह प्रश्न पूछने में शात्री का उद्देश्य खुद को सही ठहराने का था, न की अपने पडोसी कौन है यह जानना और उसे मदद करना। प्रभु येसु ने उत्तर के रूप में भला सामरी का दृष्टांत सुनाया जिसमें यह बताया गया है कि कैसे कोई व्यक्ति जरूरतमंद लोगों की मदद करने के द्वारा एक अच्छा पड़ोसी बन सकता है।

कलीसिया के धर्म पुरखों ने इस दृष्टांत के पात्रों में इस्राइली जनता को और स्वयं येसु को देखते हैं। पड़ोसियों को प्यार करने से हम येसु को ही प्यार करते हैं। अच्छे पड़ोसी बनकर दूसरों को प्यार करने से हम स्वयं येसु की तरह व्यवहार करते हैं। यही है वह सुसमाचार का मर्म जिसका संत पौलुस ने प्रचार किया था।

येसु कहता है, “जाओ, तुम भी ऐसा ही करो!” हम अपने आपसे पूछें: क्या मैं एक अच्छा पड़ोसी हूँ या नहीं? और एक अच्छा पड़ोसी बनने के लिए मुझे क्या करने की आवस्यकता है?



📚 REFLECTION

God loves us. From today we listen to the letter to the Galatians in the first reading. Paul asserts that the Gospel that he preached was something that he learnt through a revelation of Jesus Christ, not something given to him by men. Therefore he warns people about diluting or replacing it with any other message.

The gospel contains the question, “who is my neighbour?’. The lawyer asked the question to justify himself rather than know and help the neighbour. The parable of the good Samaritan which Jesus gave as an answer ends up showing how one can and need to be a good neighbour - by loving, caring for, and helping those in need.

The Fathers of the Church have seen in this parable the story of Israel and Jesus himself as the good Samaritan. By loving the neighbours in need we are loving Jesus himself. By loving others by becoming good neighbours we are behaving like Jesus himself. This is the undiluted Gospel that Paul was preaching about.

Jesus says, “Go and do the same yourself!” Let us ask ourselves: Am I a good neighbour? What do I need to do to become a good neighbour?