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4 सितंबर का पवित्र वचन

 04 सितंबर 2020

वर्ष का बाईसवाँ सामान्य सप्ताह, शुक्रवार

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📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 4:1-5

1) लोग हमें मसीह के सेवक और ईश्वर के रहस्यों के कारिन्दा समझे।


2) अब कारिन्दा से यह आशा की जाती है कि वह ईमानदार निकले।


3) मेरे लिए इस बात का कोई महत्व नहीं कि आप लोग अथवा मनुष्यों का कोई न्यायालय मुझे योग्य समझे। मैं स्वयं भी अपना न्याय नहीं करता।


4) मैं अपने में कोई दोष नहीं पाता, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि मैं निर्दोष हूँ। प्रभु ही मेरे न्यायकर्ता हैं।


5) इसलिए प्रभु के आने तक कोई किसी का न्याय नहीं करे। वह अन्धकार के रहस्य प्रकाश में लायेंगे और हृदयों के गुप्त अभिप्राय प्रकट करेंगे। उस समय हर एक को ईश्वर की ओर से यथायोग्य श्रेय दिया जायेगा।



सुसमाचार : लूकस 5:33-39

33) उन्होंने ईसा से कहा "योहन के शिष्य बारम्बार उपवास करते हैं और प्रार्थना में लगे रहते हैं और फरीसियों के शिष्य भी ऐसा ही करते हैं, किन्तु आपके शिष्य खाते-पीते हैं"।


34) ईसा ने उन से कहा, "जब तक दुलहा उनके साथ हैं, क्या तुम बारातियों से उपवास करा सकते हो?


35) किन्तु वे दिन आयोंगे, जब दुलहा उनके स बिछुड़ जायेगा। उन दिनों वे उपवास करेंगे।"


36) ईसा ने उन्हें यह दृष्टान्त भी सुनाया, "कोई नया कपड़ा फाड़ कर पुराने कपड़े में पैबंद नहीं लगाता। नहीं तो वह नया कपड़ा फाड़ेगा और नये कपड़े का पैबंद पुराने कपड़े के साथ मेल भी नहीं खायेगा।


37) और कोई पुरानी मशकों में नयी अंगूरी नहीं भरता। नहीं तो नयी अंगूरी पुरानी मशकों को फाड़ देगी, अंगूरी बह जायेगी और मशकें बरबाद हो जायेंगी।


38) नयी अंगूरी को नयी मशकों में ही भरना चाहिए।


39) "कोई पुरानी अंगूरी पी कर नयी नहीं चाहता। वह तो कहता है, ’पुरानी ही अच्छी है।"


📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में हम पढ़ते हैं शास्त्री और फरीसी येसु से उपवास को लेकर सवाल करते हुए कहते हैं कि योहन के शिष्य और फरीसियों के शिष्य उपवास करते हैं पर उनके शिष्य क्यों खाते - पीते हैं। प्रभु येसु उनके प्रश्न का जवाब अन्य प्रश्न से ही देते हैं। वे उनसे पूछते हैं कि जब तक दूल्हा साथ है क्या तुम बारातियों से उपवास करा सकते हो ? जब दूल्हा उनसे बिछुड़ जायेगा तब वे उपवास करेंगे।


यहाँ पर दो बिंदु मनन-चिंतन के लिए हमारा ध्यान खींचते हैं। 1 ) हमारे उपवास या फिर किसी भी भले कार्य के पीछे एक उद्द्देश्य होना चाहिए। कई बार देखा जाता है कि कई लोगों की धार्मिक क्रियाएं या तो किसी की देखा देखी में की जाती है या फिर दूसरों को दिखने के लिए की जाती है। कुछ - कुछ काम हम बस रिवाज के नाम पर करते रहते हैं जिसका ना हमें अर्थ पता होता है और न कारण ही।


2 ) हर कार्य का अपना एक समय होता है। बारात के समय शोक और मौत के समय जश्न मनाना उचित नहीं है। उपदेशक ग्रन्थ 3:1 में उपदेशक कहता है पृथ्वी पर हर बात का अपना वक्त और हर काम का अपना समय होता है। उस समय जब येसु शरीर रूप में अपने शिष्यों के साथ थे उनका उपवास करना बेवजह था। पर आज, हमें उपवास करने की ज़रुरत है। ये उपवास, प्रार्थना, पश्चाताप और प्रायश्चित का समय है। आइये हम सब विश्वासी मिलकर उपवास प्रार्थना व प्रायश्चित करते हुए कोरोना महामारी, प्राकृतिक आपदायें, दुर्घटनाएँ, और हिंसा झेल रहे हमारे संसार के लिए प्रार्थना करें।

03 सितंबर का पवित्र वचन

 

03 सितंबर 2020
वर्ष का बाईसवाँ सामान्य सप्ताह, गुरुवार

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📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 3:18-23

18) कोई अपने को धोखा न दे। यदि आप लोगों में कोई अपने को संसार की दृष्टि से ज्ञानी समझता हो, तो वह सचमुच ज्ञानी बनने के लिए अपने को मूर्ख बना ले;

19) क्योंकि इस संसार का ज्ञान इ्रश्वर की दृष्टि में ’मूर्खता’ है। धर्मग्रन्थ में यह लिखा है- वह ज्ञानियों को उनकी चतुराई से ही फँसाता है

20) और प्रभु जानता है कि ज्ञानियों के तर्क-वितर्क निस्सार हैं।

21) इसलिए कोई मनुष्यों पर गर्व न करे सब कुछ आपका है।

22) चाहे वह पौलुस, अपोल्लोस अथवा कैफ़स हो, संसार हो, जीवन अथवा मरण हो, भूत अथवा भविष्य हो-वह सब आपका है।

23) परन्तु आप मसीह के और मसीह ईश्वर के हैं।


सुसमाचार : लूकस 5:1-11

1) एक दिन ईसा गेनेसरेत की झील के पास थे। लोग ईश्वर का वचन सुनने के लिए उन पर गिरे पड़ते थे।

2) उस समय उन्होंने झील के किनारे लगी दो नावों को देखा। मछुए उन पर से उतर कर जाल धो रहे थे।

3) ईसा ने सिमोन की नाव पर सवार हो कर उसे किनारे से कुछ दूर ले चलने के लिये कहा। इसके बाद वे नाव पर बैठे हुए जनता को शिक्षा देते रहे।

4) उपदेश समाप्त करने के बाद उन्होंने सिमोन से कहा, "नाव गहरे पानी में ले चलो और मछलियाँ पकड़ने के लिए अपने जाल डालो"।

5) सिमोन ने उत्तर दिया, "गुरूवर! रात भर मेहनत करने पर भी हम कुछ नहीं पकड़ सके, परन्तु आपके कहने पर मैं जाल डालूँगा"।

6) ऐसा करने पर बहुत अधिक मछलियाँ फँस गयीं और उनका जाल फटने को हो गया।

7) उन्होंने दूसरी नाव के अपने साथियों को इशारा किया कि आ कर हमारी मदद करो। वे आये और उन्होंने दोनों नावों को मछलियों से इतना भर लिया कि नावें डूबने को हो गयीं।

8) यह देख कर सिमोन ने ईसा के चरणों पर गिर कर कहा, "प्रभु! मेरे पास से चले जाइए। मैं तो पापी मनुष्य हूँ।"

9) जाल में मछलियों के फँसने के कारण वह और उसके साथी विस्मित हो गये।

10) यही दशा याकूब और योहन की भी हुई; ये जेबेदी के पुत्र और सिमोन के साझेदार थे। ईसा ने सिमोन से कहा, "डरो मत। अब से तुम मनुष्यों को पकड़ा करोगे।"

11) वे नावों को किनारे लगा कर और सब कुछ छोड़ कर ईसा के पीछे हो लिये।

📚 मनन-चिंतन

मित्रो, आज के सुसमाचार में हम पढ़ते हैं कि येसु सिमोन की नाव में सवार होकर सुसमाचार सुनाते है और बाद में वे उनसे कहते है - "नाव को गहरे पानी में ले जाओ और मछलियाँ पकड़ने के लिए जाल डालो।" पेत्रुस ने ऐसा ही किया और भरपूर मात्रा में उन्हें मछलियाँ मिली। शायद उतनी उन्होंने पहले कभी ना पकड़ी होंगी।

मैं येसु के नाव में आने की तुलना पवित्र यूखरिस्त से करना चाहता हूँ। पवित्र यूखरिस्त में प्रभु येसु हमारे जीवन रूपी नाव में आते हैं। वो हमारे दिल में आते और हमारे दिल में रहते हुए हमें बहुत सारी शिक्षा देते हैं। आज हम अपने आप से ये सवाल करें कि क्या मैं मेरे दिल में आने वाले येसु की बातें सुनता हूँ, जैसे पेत्रुस ने न केवल उनका प्रवचन सुना बल्कि उन्होंने येसु के आदेश का अक्षरसः पालन किया। उन्होंने न भीड़ की परवाह की और न ही खुद की बुद्धि पर भरोसा किया। उन्होंने बस जैसा येसु ने कहा वैसा ही किया और देखो एक बड़ा चमत्कार उनके सामने होता है, जिसके बाद से उनकी पूरी ज़िन्दगी बदल जाती है।

हम येसु को अपने जीवन की नाव में अथवा अपने हृदय में बुलाते तो हैं, पर उनकी बात मानने को तैयार नहीं। उनकी वाणी सुनकर जैसा वे हमें करने को कहते हैं, वैसा करने को तैयार नहीं। हम किनारा छोड़कर गहराई में जाने को तैयार नहीं। येसु हमारे जीवन को भरपूर मात्रा में आशीष व अनुग्रह देना चाहते हैं पर हम उनकी आज्ञा मानकर हमारे जीवन की नाव को गहरे पानी में ले जाना नहीं चाहते। येसु पर पूर्ण भरोसा करके उनकी मर्ज़ी अनुसार निर्णय लेना और कार्य करना हम नहीं चाहते। जब तक हम जीवन में खुद की बुद्धि और खुद की योजनाओं के अनुसार कार्य करेंगे तो हमें या तो बहुत थोड़ा ही मिलेगा या फिर कुछ भी नहीं मिलेगा भले ही हम सारी रात मेहनत कर लें । पर जब येसु की मर्ज़ी के अनुसार चलेंगे तो इतना अनुग्रह मिलेगा की जीवन में समा नहीं पायेगा।

02 सितंबर का पवित्र वचन

 

02 सितंबर 2020
वर्ष का बाईसवाँ सामान्य सप्ताह, बुधवार

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📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 3:1-9

1) भाइयो! मैं उस समय आप लोगों से उस तरह बातें नहीं कर सका, जिस तरह आध्यात्मिक व्यक्तियों से की जाती हैं। मुझे आप लोगों से उस तरह बातें करनी पड़ी, जिस तरह प्राकृत मनुष्यों से, मसीह में मेरे निरे बच्चों से, की जाती हैं।

2) मैंने आप को दूध पिलाया। मैंने आप को ठोस भोजन इसलिए नहीं दिया कि आप उसे नहीं पचा सकते थे।

3) आप इस समय भी उसे पचा नहीं सकते, क्योंकि आप अब तक प्राकृत हैं। आप लोगों में ईर्ष्या और झगड़ा होता है। क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं कि आप प्राकृत हैं और निरे मनुष्यों-जैसा आचरण करते हैं?

4) जब कोई कहता है, "मैं पौलुस का हूँ" और कोई कहता है, "मैं अपोल्लोस का हूँ", तो क्या यह निरे मनुष्यों-जैसा आचरण नहीं है?

5) अपोल्लोस क्या है? पौलुस क्या है? हम तो धर्मसेवक मात्र हैं, जिनके माध्यम से आप विश्वासी बने। हम में प्रत्येक ने वही कार्य किया, जिसे प्रभु ने उस को सौंपा।

6) मैंने पौधा रोपा, अपोल्लोस ने उसे सींचा, किन्तु ईश्वर ने उसे बड़ा किया।

7) न तो रोपने वाले का महत्व है और न सींचने वाले का, बल्कि वृद्धि करने वाले अर्थात् ईश्वर का ही महत्व है।

8) रोपने वाला और सींचने वाला एक ही काम करते हैं और प्रत्येक अपने-अपने परिश्रम के अनुरूप अपनी मज़दूरी पायेगा।

9) हम ईश्वर के सहयोगी हैं और आप लोग हैं-ईश्वर की खेती, ईश्वर का भवन।


सुसमाचार : लूकस 4:38-44

38) वे सभागृह से निकल कर सिमोन के घर गये। सिमोन की सास तेज़ बुखार में पड़ी हुई थी और लोगों ने उसके लिए उन से प्रार्थना की।

39) ईसा ने उसके पास जा कर बुख़ार को डाँटा और बुख़ार जाता रहा। वह उसी क्षण उठ कर उन लोगों के सेवा-सत्कार में लग गयी।

40) सूरज डूबने के बाद सब लोग नाना प्रकार की बीमारियों से पीडि़त अपने यहाँ के रोगियों को ईसा के पास ले आये। ईसा एक-एक पर हाथ रख कर उन्हें चंगा करते थे।

41) अपदूत बहुतों में से यह चिल्लाते हुये निकलते थे, "आप ईश्वर के पुत्र हैं"। परन्तु वह उन को डाँटते और बोलने से रोकते थे, क्योंकि अपदूत जानते थे कि वह मसीह हैं।

42) ईसा प्रातःकाल घर से निकल कर किसी एकान्त स्थान में चले गये। लोग उन को खोजते-खोजते उनके पास आये और अनुरोध करते रहे कि वह उन को छोड़ कर नहीं जायें।

43) किन्तु उन्होंने उत्तर दिया, "मुझे दूसरे नगरों को भी ईश्वर के राज्य का सुसमाचार सुनाना है-मैं इसीलिए भेजा गया हूँ"

44) और वे यहूदिया के सभागृहों में उपदेश देते रहे।

📚 मनन-चिंतन

आज के वचन में एक विरोधाभास मिलता है : एक तरफ हम देखते हैं कि लोग येसु की खोज में आते हैं और वे उनके रोगियों को चंगा करते हैं, उपदूतों को बहार निकलते हैं। और लोग येसु से अनुरोध करते हैं कि वे उन्हें छोड़कर ना जाएँ। वहीँ दूसरी तरफ अपदूत येसु को देखकर छिड़ जाते हैं। एक तरफ अच्छाई है तो दूसरी तरफ बुराई। एक तरफ चंगाई, शांति, और उम्मीद है तो दूसरी तरफ बंधन, अशांति, और निराशा है।

येसु का बुरी आत्मा से यह पहली बार सामना नहीं हो रहा है। सुसमाचार में हम पढ़ते हैं, कि बुराई के आत्मा जब भी येसु के सामने आते है वे चिल्ला उठते हैं। हम याद करें गेरासीन के उपदूत को (लूकस 8: 26-39) । वह यूँ तो येसु से मिलने बाहर निकलकर आता है, हालांकि वास्तव में वह काफी उग्र और गुस्से में, रहता है, क्योंकि येसु की उपस्थिति उसको को विचलित व परेशान कर रही थी।

इन दो विरोधाभास वाली परिस्थितियों में हम अपने आप को किसमें पाते हैं। उन लोगों में जो येसु को ढूँढ़ते हुवे जाते हैं और उन्हें पाकर उनसे अनुरोध करते हैं कि वे उन्हें छोडकर ना जाएँ या फिर उन उपदूतों में जो येसु के होने से परेशान हो जाते हैं। जिनको येसु के पास आने से छिड़ होती है। हम में से कितने ही लोग आज कल दूसरी वाली प्रवृति के शिकार हैं। कितने लोग विशेषकरके आज की युवा पीढ़ी येसु से दूर रहना पसंद करती है। प्रार्थना, मिस्सा बलिदान, पवित्र बाइबल पढ़ना आदि से उनको छिड़ होती है। वे इन सब बातों से खुद को दूर रखना पसंद करते हैं। हमें और उन सब लोगों को जो इस प्रवृति के शिकार हैं ये स्वीकार करना चाहिए कि इस प्रकार की मानसिकता शैतान की ऒर से आती है। यदि हमें आध्यात्मिकता से अरुचि व नफरत है तो हम भी एक तरह से अपदूतग्रस्त हैं और हमें हमारे चरवाहे येसु को ढूंढते हुवे उनके पास आने की ज़रूरत है ताकि वो हमें छुटकारा दे सके, चंगाई दे सके ।

1 सितंबर का पवित्र वचन

 

01 सितंबर 2020
वर्ष का बाईसवाँ सामान्य सप्ताह, मंगलवार

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📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 2:10ब-16

10) ईश्वर ने अपने आत्मा द्वारा हम पर वही प्रकट किया है, क्योंकि आत्मा सब कुछ की, ईश्वर के रहस्य की भी, थाह लेता है।

11) मनुष्य के निजी आत्मा के अतिरिक्त कौन किसी का अन्तरतम जानता है? इसी तरह ईश्वर के आत्मा के अतिरिक्त कोई ईश्वर का अन्तरतम नहीं जानता।

12) हमें संसार का नहीं, बल्कि ईश्वर का आत्मा मिला है, जिससे हम ईश्वर के वरदान पहचान सकें।

13) हम उन वरदानों की व्याख्या करते समय मानवीय प्रज्ञा के शब्दों का नहीं, बल्कि आत्मा द्वारा प्रदत्त शब्दों का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार हम आध्यात्मिक शब्दावली में आध्यात्मिक तथ्यों की विवेचना करते है।।

14) प्राकृत मनुष्य ईश्वर के आत्मा की शिक्षा स्वीकार नहीं करता। वह उसे मूर्खता मानता और उसे समझने में असमर्थ है, क्योंकि आत्मा की सहायता से ही उस शिक्षा की परख हो सकती है।

15) आध्यात्मिक मनुष्य सब बातों की परख करता है, किन्तु कोई भी उस मनुष्य की परख नहीं करता है, किन्तु कोई भी उस मनुष्य की परख नहीं कर पाता;

16) क्योंकि (लिखा है) - प्रभु का मन कौन जानता है? कौन उसे शिक्षा दे सकता है? हम में तो मसीह का मनोभाव विद्यमान है।


सुसमाचार : लूकस 4:31-37

31) वे गलीलिया के कफ़रनाहूम नगर आये और विश्राम के दिन लोगों को शिक्षा दिया करते थे।

32) लोग उनकी शिक्षा सुन कर अचम्भे में पड़ जाते थे, क्योंकि वे अधिकार के साथ बोलते थे।

33) सभागृह में एक मनुष्य था, जो अशुद्ध आत्मा के वश में था। वह ऊँचे स्वर से चिल्ला उठा,

34) "ईसा नाज़री! हम से आप को क्या? क्या आप हमारा सर्वनाश करने आये हैं? मैं जानता हूँ कि आप कौन हैं-ईश्वर के भेजे हुए परमपावन पुरुष।"

35) ईसा ने यह कहते हुए उसे डाँटा, " चुप रह, इस मनुष्य से बाहर निकल जा"। अपदूत ने सब के देखते-देखते उस मनुष्य को भूमि पर पटक दिया और उसकी कोई हानि किये बिना वह उस से बाहर निकल गया।

36) सब विस्मित हो गये और आपस में यह कहते रहे, "यह क्या बात है! वे अधिकार तथा सामर्थ्य के साथ अशुद्ध आत्माओं को आदेश देते हैं और वे निकल जाते हैं।"

37) इसके बाद ईसा की चर्चा उस प्रदेश के कोने-कोने में फैल गयी।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में हम प्रभु येसु के दैनिक कार्यों की एक झलक देखते हैं। उनकी सेवकाई के दो मुख्य पहलु थे (1) सुसमाचार का प्रचार, (2) चिन्ह और चमत्कार अथवा चंगाई। उनकी शिक्षा को सुनकर लोग अचम्भे में पड़ जाते थे क्योंकि वे अधिकार के साथ बोलते थे। प्रभु येसु की शिक्षा में बहुत ही गहराई और उनकी बातों में सच्चाई थी। वे गहरी से गहरी और जटिल से भी जटिल बात को बड़े सहज लहजे में समझा देते थे, इसलिए लोग, शास्त्रियों की तुलना में उनकी बातों को सुनना अधिक पसंद करते थे (मत्ती 7:29) स्वर्ग की बातों को समझाने के लिए उन्होंने धरती के उदाहरण व कहानियों का इस्तेमाल किया। वे प्रकृति व तत्कालीन परिस्थितियों से वाकिफ थे। इसलिए उनकी शिक्षा सहज पर प्रभावशाली थी।

उनकी शिक्षा इसलिए भी प्रभावशाली थी की जो वे सिखाते थे उसे वे करते भी थे। यदि उन्होंने प्रेम की शिक्षा दी तो उन्होंने प्रेम करके भी दिखाया; क्षमा की शिक्षा दी तो क्षमा भी किया; सेवा की शिक्षा दी तो सेवा भी की। आज के सुसमाचार में भी हम देखते है कि उन्होंने पहले तो लोगों को वचन सुनाया फिर अपने कार्यों द्वारा उसकी पुष्टि की। उन्होंने स्वर्ग राज्य की शिक्षा दी और फिर अपने ही समय में रोगियों को चंगा करके, उपदूतों को निकालकर, बंधनों से आज़ादी देकर उन्हें स्वर्ग राज्य का पूर्वाभास कराया जहाँ ईश्वर - "उनके सब आंसू पौंछ डालेगा। इसके बाद ना मृत्यु होगी, न शोक, न विलाप, और न दुःख। " (प्रकाशना 21:4)

हम प्रभु येसु के समान हमारी ज़मीनी हकीकत से वाकिफ रहें। देश दुनियां और लोगों के जीवन और उनकी परेशानियों से परिचित रहकर ही हम उनके हित में कार्य कर सकते हैं।



📚 REFLECTION

In today's Gospel we see a glimpse of the daily work of Lord Jesus. There were two main aspects of his ministry: 1- Preaching the Gospel, 2- Signs and miracles or healing. People were amazed to hear his teaching as he spoke with authority. There was a lot of depth in the teaching of Lord Jesus and truth in his words. . He used to explain profound and complicated things in a very simple manner, so people preferred to listen to him more than the scribes (Matthew 7:29). He used examples and stories of the earth to explain the things of heaven. He was aware of the nature and natural things and also was aware of the prevailing circumstances of the society. Therefore his teaching was simple, down to earth and effective.

His teaching was also influential because he used to do what he taught. If he taught about love, he showed love; if he taught forgiveness, then he forgives also; If he was preached about service, he did serve. Even in today's gospel, we see that he first gave the Word to them and then confirmed it through his actions. He taught the kingdom of heaven and then in his own time healed the sick and cast out demons, and restored the joy and happiness to the lives of people thus giving them the foretaste of the Kingdom of heaven where “God will wipe out all their tears. After this there will be no death, neither mourning, nor sorrow"(Revelation 21: 4).

Let us be aware of our ground reality; let us be aware of everyday happenings, like Lord Jesus did. Only by being familiar with the world and the life of the people around us, can we really work for them, for their welfare.


 - Biniush Topno 

31 अगस्त का पवित्र वचन

 

31 अगस्त 2020
वर्ष का बाईसवाँ सामान्य सप्ताह, सोमवार

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📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 2:1-5

1) भाइयो! जब मैं ईश्वर का सन्देश सुनाने आप लोगों के यहाँ आया, तो मैंने शब्दाडम्बर अथवा पाण्डित्य का प्रदर्शन नहीं किया।

2) मैंने निश्चय किया था कि मैं आप लोगों से ईसा मसीह और क्रूस पर उनके मरण के अतिरिक्त किसी और विषय पर बात नहीं करूँगा।

3) वास्तव में मैं आप लोगों के बीच रहते समय दुर्बल, संकोची और भीरू था।

4) मेरे प्रवचन तथा मेरे संदेश में विद्वतापूर्ण शब्दों का आकर्षण नहीं, बल्कि आत्मा का सामर्थ्य था,

5) जिससे आप लोगों का विश्वास मानवीय प्रज्ञा पर नहीं, बल्कि ईश्वर के सामर्थ्य पर आधारित हो।


सुसमाचार : लूकस 4:16-30

16) ईसा नाज़रेत आये, जहाँ उनका पालन-पोषण हुआ था। विश्राम के दिन वह अपनी आदत के अनुसार सभागृह गये। वह पढ़ने के लिए उठ खड़े हुए

17) और उन्हें नबी इसायस की पुस्तक़ दी गयी। पुस्तक खोल कर ईसा ने वह स्थान निकाला, जहाँ लिखा हैः

18) प्रभु का आत्मा मुझ पर छाया रहता है, क्योंकि उसने मेरा अभिशेक किया है। उसने मुझे भेजा है, जिससे मैं दरिद्रों को सुसमाचार सुनाऊँ, बन्दियों को मुक्ति का और अन्धों को दृष्टिदान का सन्देश दूँ, दलितों को स्वतन्त्र करूँ

19) और प्रभु के अनुग्रह का वर्ष घोषित करूँ।

20) ईसा ने पुस्तक बन्द कर दी और वह उसे सेवक को दे कर बैठ गये। सभागृह के सब लोगों की आँखें उन पर टिकी हुई थीं।

21) तब वह उन से कहने लगे, "धर्मग्रन्थ का यह कथन आज तुम लोगों के सामने पूरा हो गया है"।

22) सब उनकी प्रशंसा करते रहे। वे उनके मनोहर शब्द सुन कर अचम्भे में पड़ जाते और कहते थे, "क्या यह युसूफ़ का बेटा नहीं है?"

23) ईसा ने उन से कहा, "तुम लोग निश्चय ही मुझे यह कहावत सुना दोगे-वैद्य! अपना ही इलाज करो। कफ़रनाहूम में जो कुछ हुआ है, हमने उसके बारे में सुना है। वह सब अपनी मातृभूमि में भी कर दिखाइए।"

24) फिर ईसा ने कहा, "मैं तुम से यह कहता हूँ-अपनी मातृभूमि में नबी का स्वागत नहीं होता।

25) मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि जब एलियस के दिनों में साढ़े तीन वर्षों तक पानी नहीं बरसा और सारे देश में घोर अकाल पड़ा था, तो उस समय इस्राएल में बहुत-सी विधवाएँ थीं।

26) फिर भी एलियस उन में किसी के पास नहीं भेजा गया-वह सिदोन के सरेप्ता की एक विधवा के पास ही भेजा गया था।

27) और नबी एलिसेयस के दिनों में इस्राएल में बहुत-से कोढ़ी थे। फिर भी उन में कोई नहीं, बल्कि सीरी नामन ही निरोग किया गया था।"

28) यह सुन कर सभागृह के सब लोग बहुत क्रुद्ध हो गये।

29) वे उठ खड़े हुए और उन्होंने ईसा को नगर से बाहर निकाल दिया। उनका नगर जिस पहाड़ी पर बसा था, वे ईसा को उसकी चोटी तक ले गये, ताकि उन्हें नीचे गिरा दें,

30) परन्तु वे उनके बीच से निकल कर चले गये।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार को दो भागों में बाँटा जा सकता है, पहले भाग प्रभु येसु के मुक्ति-प्रद घोषणा पत्र का वर्णन करता है, और दूसरा भाग प्रभु येसु के अपने ही लोगों द्वारा तिरस्कृत किए जाने का विवरण देता है। प्रभु येसु लौटकर नाज़रेथ आते हैं जहाँ उनका लालन-पालन हुआ था, जहाँ उन्होंने अपना बचपन बिताया था। लोगों में कुछ ऐसे होंगे जो बचपन में उसके साथ खेले होंगे, कुछ होंगे जिन्होंने उसे बड़ा होते हुए देखा था। जब प्रभु येसु ने अपना मिशन कार्य प्रारम्भ किया था तो उन्होंने उनके चमत्कारों और शिक्षाओं के बारे में भी सुना होगा। जब उन्होंने प्रभु येसु को अपने बीच पाया तो वे ज़रूर बहुत उत्साहित हुए होंगे और प्रभु येसु भी अपने आप को उनके बीच में पाकर बहुत आनंदित महसूस कर रहे होंगे।

लेकिन तभी जब प्रभु येसु धर्मग्रंथ में से पाठ पढ़ते हैं और बताते हैं, कि धर्मग्रंथ का यह कथन आज पूरा हुआ। उसने उन्हें बताया कि प्रभु का आत्मा मुझ पर छाया रहता है, उसने मेरा अभिषेक किया है कि मैं दरिद्रों को सुसमाचार सुनाऊँ… संक्षेप में कहें तो वही मसीह था जो अभिषिक्त किया गया था, जो उनके बीच में पल-बढ़ा और ईश्वर ने उसे चुना और उसका अभिषेक किया। उन्हें यह बात हज़म नहीं हुई कि एक मामूली बढ़ई का बेटा संसार का मुक्तिदाता है, और उन्होंने एक नबी के रूप में उनको स्वीकार नहीं किया, उनके लिए वह एक मामूली बढ़ई यूसुफ़ के पुत्र से ज़्यादा और कुछ नहीं था। जब वह अपने आप को नबी बताता है तो उन्हें बहुत ग़ुस्सा आता है। क्या जब मैं ईश्वर का कार्य करने के लिए आगे आता हूँ तो मुझे भी अपने ही लोगों के विरोध और क्रोध का सामना करना पड़ता है?

30 अगस्त का पवित्र वचन

 

30 अगस्त 2020
वर्ष का बाईसवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार

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📒 पहला पाठ : यिरमियाह 20:7-9

7) प्रभु! तूने मुझे राज़ी किया और मैं मान गया। तूने मुझे मात कर दिया और मैं हार गया। मैं दिन भर हँसी का पात्र बना रहता हूँ। सब-के-सब मेरा उपहास करते हैं।

8) जब-जब मैं बोलता हूँ, तो मुझे चिल्लाना और हिंसा तथा विध्वंस की घोषणा करनी पड़ती हैं। ईश्वर का वचन मेरे लिए निरंतर अपमान तथा उपहास का कारण बन गया हैं।

9) जब मैं सोचता हूँ, मैं उसे भुलाऊँगा, मैं फिर कभी उसके नाम पर भविय वाणी नहीं करूँगा“ तो उसका वचन मेरे अन्दर एक धधकती आग जैसा बन जाता है, जो मेरी हड्डी-हड्डी में समा जाती है। मैं उसे दबाते-दबाते थक जाता हूँ और अब मुझ से नहीं रहा जाता।

📕 दूसरा पाठ : रोमियों 12:1-2

1) अतः भाइयो! मैं ईश्वर की दया के नाम पर अनुरोध करता हूँ कि आप मन तथा हृदय से उसकी उपासना करें और एक जीवन्त, पवित्र तथा सुग्राह्य बलि के रूप में अपने को ईश्वर के प्रति अर्पित करें।

2) आप इस संसार के अनुकूल न बनें, बल्कि बस कुछ नयी दृष्टि से देखें और अपना स्वभाव बदल लें। इस प्रकार आप जान जायेंगे कि ईश्वर क्या चाहता है और उसकी दृष्टि में क्या भला, सुग्राह्य तथा सर्वोत्तम है।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 16:21-27

21) उस समय से ईसा अपने शिष्यों को यह समझाने लगे कि मुझे येरुसालेम जाना होगा; नेताओं, महायाजकों और शास्त्रियों की ओर से बहुत दुःख उठाना, मार डाला जाना और तीसरे दिन जी उठना होगा।

22) पेत्रुस ईसा को अलग ले गया और उन्हें यह कहते हुए फटकारने लगा, ’’ईश्वर ऐसा न करे। प्रभु! यह आप पर कभी नहीं बीतेगी।’’

23) इस पर ईसा ने मुड़ कर, पेत्रुस से कहा ’’हट जाओ, शैतान! तुम मेरे रास्ते में बाधा बन रहो हो। तुम ईश्वर की बातें नहीं, बल्कि मनुष्यों की बातें सोचते हो।’’

24) इसके बाद ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, ’’जो मेरा अनुसरण करना चाहता है, वह आत्मत्याग करे और अपना क्रूस उठा कर मेरे पीछे हो ले;

25) क्योंकि जो अपना जीवन सुरक्षित रखना चाहता है, वह उसे खो देगा और जो मेरे कारण अपना जीवन खो देता है, वह उसे सुरक्षित रखेगा।

26) मनुष्य को इस से क्या लाभ यदि वह सारा संसार प्राप्त कर ले, लेकिन अपना जीवन गँवा दे? अपने जीवन के बदले मनुष्य दे ही क्या सकता है?

27) क्योंकि मानव पुत्र अपने स्वर्गदूतों के साथ अपने पिता की महिमा-सहित आयेगा और वह प्रत्येक मनुष्य को उसके कर्म का फल देगा।

📚 मनन-चिंतन

आज सामान्य काल का बाईसवाँ रविवार है और इस महीने का आख़िरी रविवार। यह रविवार इस महीने प्रभु से प्राप्त आशीषों और कृपादानों के लिए धन्यवाद देने का दिन है। पिछले 8 जून को एक प्रसिद्ध फ़िल्मी सितारे की प्रबंधक दिशा सालियन ने 14वें माले से कूदकर आत्महत्या कर ली। वह प्रसिद्ध अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की पूर्व मैनेजर थी, जिसके एक सप्ताह बाद 14 जून को सुशांत सिंह राजपूत भी अपने कमरे में मृत पाए गए। पिछले कुछ महीनों और कुछ सालों में हमने ऐसे कई मामले देखे हैं जहाँ जीवन को खुश रखने के सारे सुख संसाधन होने के बावजूद बड़े-बड़े प्रसिद्ध लोग आत्महत्या कर लेते हैं। उनके पास गाड़ी-बंगला, प्रशंसक-दोस्त, धन-दौलत शोहरत और सब कुछ होते हुए भी आख़िर ऐसा क्या है जो उन्हें अपने लिए ऐसा दर्दनाक अन्त चुनने के लिए मजबूर कर देता है?

वर्तमान में यह बहुत ही ज्वलंत प्रश्न है। सब कुछ होने के बावजूद लोग अपने जीवन में सार्थकता क्यों नहीं पाते? शायद ऐसा इसलिए क्योंकि इस जीवन का एक मक़सद है, और जब तक जीवन का वह मक़सद पूरा नहीं हो जाता तब तक हमारा जीवन सार्थक नहीं होगा। जब तक हम ईश्वर की वाणी पर ध्यान नहीं देंगे, जब तक हम ईश्वर को अपने जीवन का केंद्रबिंदु नहीं बनाएँगे, तब तक हमारे अन्दर एक ख़ालीपन सा रहेगा, कुछ कमी रहेगी, कुछ खोया सा लगेगा, जीवन में कोई अर्थ नहीं, कोई मतलब नहीं निकलेगा। ईश्वर ही है जिसने हमारे जीवन का मक़सद निर्धारित किया है।

जब किसी कारख़ाने में कोई चीज़ बनायी जाती है, या कोई आविष्कारक किसी नई चीज़ का अविष्कार करता है तो उस चीज़ को बनाने वाला ही जानता है कि वह चीज़ किसलिए बनाई गयी है और उसका सबसे सही क्या उपयोग है। उदाहरण के लिए किसी ने अचार बनाने की मशीन बनायी हो, तो उस मशीन को बनाने वाला जानता है कि उस मशीन का उपयोग कैसे किया जाता है, और क्या-क्या सावधानियाँ हैं जिन्हें मन में रखना है ताकि ना मशीन को कुछ नुक़सान हो और ना उससे लिए जाए वाले काम का नुक़सान हो। उस मशीन का सही उपयोग और मक़सद दूसरों को समझाने के लिए एक नियम पुस्तक (मैन्यूअल) भी प्रिंट किया जाता है।

हमें ईश्वर ने बनाया है और हमारे जीवन का मक़सद ईश्वर ही जानते हैं, और जब तक हम विनम्र हृदय से अपने सृष्टिकर्ता की ओर नहीं मुड़ेंगे तब तक हम अपने जीवन का अर्थ नहीं समझ पाएँगे। ओर मुड़ने का सबसे अच्छा तरीक़ा है कि “हम अपना क्रूस उठाकर प्रभु येसु के पीछे हो लें।” हमें ईश्वर के लिए अपना जीवन खोना है तभी हम अपना जीवन पा सकेंगे। पवित्र बाइबिल वह नियम पुस्तिका (मैन्यूअल) है जो हमारे जीवन का मक़सद हमें समझाएगी, ईश्वर पवित्र बाइबिल के द्वारा हमें हमारे जीवन का सही उद्देश्य पहचानने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।आइए हम ईश्वर से प्रार्थना करें कि हम ईश्वर के लिए अपना जीवन खो दें ताकि हम ईश्वर को पा लें। आमेन।

28 अगस्त का पवित्र वचन

 

29 अगस्त 2020, शनिवार

सन्त योहन बपतिस्ता की शहादत की अनिवार्य स्मृति

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📒 पहला पाठ : यिरमियाह 1:17-19

17) अब तुम कमर कस कर तैयार हो जाओ और मैं तुम्हें जो कुछ बताऊँ, वह सब सुना दो। तुम उनके सामने भयभीत मत हो, नहीं तो मैं तुम को उनके सामने भयभीत बना दूँगा।

18) देखो! इस सारे देश के सामने, यूदा के राजाओं, इसके अमीरों, इसके याजकों और इसके सब निवासियों के सामने, मैं आज तुम को एक सुदृढ़ नगर के सदृश, लोहे के खम्भे और काँसे की दीवार की तरह खड़ा करता हूँ।

19) वे तुम्हारे विरुद्ध लडेंगे, किन्तु तुम को हराने में असमर्थ होंगे; क्योंकि मैं तुम्हारी रक्षा करने के लिए तुम्हारे साथ रहूँगा।“ यह प्रभु की वाणी है।

📙 सुसमाचार : सन्त मारकुस 6:17-29

17) हेरोद ने अपने भाई फि़लिप की पत्नी हेरोदियस के कारण योहन को गिरफ़्त्तार किया और बन्दीगृह में बाँध रखा था; क्योंकि हेरोद ने हेरोदियस से विवाह किया था

18) और योहन ने हेरोद से कहा था, ’’अपने भाई की पत्नी को रखना आपके लिए उचित नहीं है’’।

19) इसी से हेरोदियस योहन से बैर करती थी और उसे मार डालना चाहती थी; किन्तु वह ऐसा नहीं कर पाती थी,

20) क्योंकि हेरोद योहन को धर्मात्मा और सन्त जान कर उस पर श्रद्धा रखता और उसकी रक्षा करता था। हेरोद उसके उपदेश सुन कर बड़े असमंजस में पड़ जाता था। फिर भी, वह उसकी बातें सुनना पसन्द करता था।

21) हेरोद के जन्मदिवस पर हेरोदियस को एक सुअवसर मिला। उस उत्सव के उपलक्ष में हेरोद ने अपने दरबारियों, सेनापतियों और गलीलिया के रईसों को भोज दिया।

22) उस अवसर पर हेरोदियस की बेटी ने अन्दर आ कर नृत्य किया और हेरोद तथा उसके अतिथियों को मुग्ध कर लिया। राजा ने लड़की से कहा, ’’जो भी चाहो, मुझ से माँगो। मैं तुम्हें दे दॅूंगा’’,

23) और उसने शपथ खा कर कहा, ’’जो भी माँगो, चाहे मेरा आधा राज्य ही क्यों न हो, मैं तुम्हें दे दूँगा’’।

24) लड़की ने बाहर जा कर अपनी माँ से पूछा, ’’मैं क्या माँगूं?’’ उसने कहा, ’’योहन बपतिस्ता का सिर’’।

25) वह तुरन्त राजा के पास दौड़ती हुई आयी और बोली, ’’मैं चाहती हूँ कि आप मुझे इसी समय थाली में योहन बपतिस्ता का सिर दे दें’’

26) राजा को धक्का लगा, परन्तु अपनी शपथ और अतिथियों के कारण वह उसकी माँग अस्वीकार करना नहीं चाहता था।

27) राजा ने तुरन्त जल्लाद को भेज कर योहन का सिर ले आने का आदेश दिया। जल्लाद ने जा कर बन्दीगृह में उसका सिर काट डाला

28) और उसे थाली में ला कर लड़की को दिया और लड़की ने उसे अपनी माँ को दे दिया।

29) जब योहन के शिष्यों को इसका पता चला, तो वे आ कर उसका शव ले गये और उन्होंने उसे क़ब्र में रख दिया।

📚 मनन-चिंतन

आज हम संत योहन बप्तिस्ता की शहादत को याद करते हैं। जब हम योहन बप्तिस्ता के बारे में विचार करते हैं तो हम देखते हैं कि वह बहुत ही साधारण और मामूली से जान पड़ते हैं, अपने जीवन या पहनावे से बिलकुल ही शाही या आकर्षक नहीं लगता (मत्ती 11:7)। “वह ऊँट के रोओं का कपड़ा पहने और कमर में चमड़े का पट्टा बाँधे रहता था। उसका भोजन टिड्डयाँ और वन का मधु था।” (मत्ती 3:4)। यह कोई ख़ास प्रभावशाली पहनावा नहीं है। लेकिन फिर भी उसने बहुतों के हृदयों को झकझोर दिया और बहुत से लोग उसके पास बपतिस्मा ग्रहण करने आते थे, वे व्यथित होकर उससे पूछते थे, “हमें क्या करना चाहिए?” (लूकस ३:१०)।

उसने मौलिक जीवन जिया और प्रभु का मार्ग तैयार करने की आवाज़ के रूप में आया, और निडर होकर सत्य बोलना और सत्य की राह पर चलना उसका कर्तव्य और ज़िम्मेदारी थी। वह राजा हेरोद से भी नहीं डरता था, और इसलिए जब वह ग़लत कर रहा था तो उसने उसका विरोध किया। अपने मन ही मन राजा भी जानता था कि वह ग़लत कर रहा है, और योहन भी जानता था कि सत्य बोलने के कारण उसे अपनी जान भी गँवानी पड़ सकती है लेकिन “लेकिन इससे क्या फ़ायदा कि इंसान सारा संसार तो प्राप्त कर ले लेकिन अपनी आत्मा गँवा दे” (मारकुस 8:36)। संत योहन हमारे लिए एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं कि हमें सत्य के लिए, सही के लिए और न्याय के लिए खड़े होना है फिर चाहे हमें कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़े। ईश्वर हमें सत्य के लिए डटकर खड़े होने की साहस प्रदान करे। आमेन।