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7 अगस्त का पवित्र वचन

  
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📒 पहला पाठ : नहूम 2:1,3; 3:1-3,6-7

1) देखो! सन्देशवाहक पर्वतों पर आ रहा है, वह शांति घोषित करने आ रहा है। यूदा! अपने पर्व मनाओ और अपनी मन्नतें पूरी करो। कुकर्मी फिर कभी तुझ पर आक्रमण नहीं करेगा- उसका सर्वनाश हो गया है।

3) लुटेरों ने याकूब और इस्राएल को उजाडा और उनकी दाखबारियों को नष्ट किया है, किन्तु प्रभु याकूब और इस्राएल को उनका प्राचीन वैभव लौटा देगा।

3:1) धिक्कार है रक्तपिपासु निनीवे को! वह झूठ और लूट से कुट-कूट कर भरा हुआ है और लूटपाट से बाज नहीं आता।

2) सुनो-चाबुक की फटकार, पहियों की खडखडाहट, घोड़ों की टाप और रथों की घरघराहट।

3) देखो-घोड़ों का सरपट, तलवारों की दमक और भालों की चमक। कितने ही घायल और कितने ही मारे हुए! असंख्य शव पडे हुए हैं- लोग उन पर ठोकर खा कर गिर रहे हैं।

6) मैं तझ पर कीचड उछालूँगा, तुझे अपमानित करूँगा और काठ में तरे पांव जकड दूँगा।

7) जो तुझ पर दृष्टि डालेगा, वह मुँह फेर कर कहेगा- ''निनीवे का सर्वनाश हो गया है। कौन उस पर दया करेगा? तुझे सान्त्वना देने वालों को में कहाँ से ले आऊँ?''

📙 सुसमाचार : मत्ती 16:24-28

24) इसके बाद ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, "जो मेरा अनुसरण करना चाहता है, वह आत्मत्याग करे और अपना क्रूस उठा कर मेरे पीछे हो ले;

25) क्योंकि जो अपना जीवन सुरक्षित रखना चाहता है, वह उसे खो देगा और जो मेरे कारण अपना जीवन खो देता है, वह उसे सुरक्षित रखेगा।

26) मनुष्य को इस से क्या लाभ यदि वह सारा संसार प्राप्त कर ले, लेकिन अपना जीवन गँवा दे? अपने जीवन के बदले मनुष्य दे ही क्या सकता है?

27) क्योंकि मानव पुत्र अपने स्वर्गदूतों के साथ अपने पिता की महिमा-सहित आयेगा और वह प्रत्येक मनुष्य को उसके कर्म का फल देगा।

28) मैं तुम से कहता हूँ - यहाँ कुछ ऐसे लोग विद्यमान हैं, जो तब तक नहीं मरेंगे, जब तक वे मानव पुत्र को राजकीय प्रताप के साथ आता हुआ न देख लें।"

📚 मनन-चिंतन

आज हम प्रभु येसु का आह्वान सुनते हैं जिसमें वह वह हमसे आत्मत्याग करने और अपना क्रूस लेकर उनका अनुसरण करने के लिए कहते हैं। आगे वह हमें भरोसा दिलाते हैं कि यदि हमें अपना जीवन सुरक्षित रखना है तो उसे प्रभु के लिए समर्पित करना होगा। इसमें कोई फ़ायदा नहीं कि हम सब कुछ प्राप्त कर लें लेकिन अपनी आत्मा के लिए कुछ भी ना पाएँ। प्रभु येसु का अनुसरण करने के लिए यह कुछ बहुत कड़वी शिक्षा और चुनौती है।

प्रभु येसु का अनुसरण करने से पहले शिष्य बनने की तीन शर्तें हैं, जो हमें जाननी हैं। पहली शर्त या प्रभु येसु का शिष्य बनने का पहला चरण है आत्मत्याग। इसका मतलब है कि हम नगण्य हैं, कुछ भी नहीं हैं। अगर हमारा अस्तित्व नहीं है, तो किसका अस्तित्व है? हममें प्रभु येसु का अस्तित्व होना है, संत पौलुस के शब्दों को याद कीजिए- “…अब मैं जीवित नहीं रहा बल्कि मसीह मुझमें जीवित हैं…”( गलातियों 2:20)। पहले कदम के बाद शिष्य बनने के लिए दूसरा कदम आता है और वह है, अपना क्रूस उठाना। हमारा क्रूस हमारे दिन-प्रतिदिन की कठिनाइयाँ, दुःख-तकलीफ़ें और कष्ट हो सकते हैं, ऐसे लोग हो सकते हैं जो हमारी समझ से बाहर हैं, ऐसी परिस्थितियों का हमें आत्मत्याग की भावना के साथ त्याग करना है। यदि आत्मत्याग का पहला कदम सही से नहीं रखा तो दूसरा कदम उससे भी अधिक कठिन होगा और तीसरा कदम जो प्रभु येसु का अनुसरण करना है वह पहले और दूसरे कदम के बिना असम्भव होगा। यानी कि आत्मत्याग और क्रूस उठाए बिना हम प्रभु येसु का अनुसरण नहीं कर सकते। प्रभु येसु का अनुसरण करने का मतलब है, सब कुछ में उन्हीं के जैसे बनना, उनका मनोभाव, उनका करुण स्वभाव, उनका समर्पण, लोगों के प्रति उनका प्रेम और उनकी त्याग की भावना को अपनाना होगा।आइए हम ईश्वर से प्रभु येसु के सच्चे शिष्य बनने की कृपा माँगें और अपने जीवन को प्रभु के लिए सुरक्षित रखें। आमेन।



📚 REFLECTION

Today we hear Jesus inviting us to deny ourselves, take up the cross and follow him. Further, he assures us that if we have to preserve our life we must lose it for him, and there is no use in gaining whole world and losing our life without any spiritual gain. These are some of the very bitter and challenging conditions to be the true disciple of Jesus or to follow him.

There are three steps to discipleship before we start following him. First step is to deny oneself. This means that you are nothing. You don’t exist in you, then who exists? Christ must exist in you, remember the words of St. Paul, “…it is no longer I who live, but Christ who lives in me…” (Gal.2:20). After the first step comes second one which is to take up the cross. The cross could be our daily challenges, difficulties, situations and people that we don’t understand, we need to face them with same attitude of self-denial. If the first step of self-denial is not taken efficiently, second will be much difficult, third step which is following Jesus, will be almost impossible without the other two steps. Following Jesus would mean being like him in everything, his attitude, his compassion, his dedication, his love for people, his spirit of sacrifice. Let us pray to God to bless us with the grace to be his true disciple and find meaning for our lives. Amen.

 Br. Biniush Topno




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6 अगस्त का पवित्र वचन

06 अगस्त 2020

येसु के रूपान्तरण का पर्व

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📒 पहला पाठ : दानिएल 7:9-10, 13-14

9) मैं देख ही रहा था कि सिंहासन रख दिये गये और एक वयोवृद्ध व्यक्ति बैठ गया। उसके वस्त्र हिम की तरह उज्जवल थे और उसके सिर के केश निर्मल ऊन की तरह।

10) उसका सिंहासन ज्वालाओं का समूह था और सिहंासन के पहिये धधकती अग्नि। उसके सामने से आग की धारा बह रही थी। सहस्रों उसकी सेवा कर रहे थे। लाखों उसके सामने खड़े थे। न्याय की कार्यवाही प्रारंभ हो रही थी। और पुस्तकें खोल दी गयीं।

13) तब मैंने रात्रि के दृश्य में देखा कि आकाश के बादलों पर मानवपुत्र-जैसा कोई आया। वह वयोवृद्ध के यहाँ पहुँचा और उसके सामने लाया गया।

14) उसे प्रभुत्व, सम्मान तथा राजत्व दिया गया। सभी देश, राष्ट्र और भिन्न-भिन्न भाषा-भाषी उसकी सेवा करेंगे। उसका प्रभुत्व अनन्त है। वह सदा ही बना रहेगा। उसके राज्य का कभी विनाश नहीं होगा।

📕 दूसरा पाठ :1पेत्रुस 1: 16-19

16) जब हमने आप लोगों को अपने प्रभु ईसा मसीह के सामर्थ्य तथा पुनरागमन के विषय में बताया, तो हमने कपट-कल्पित कथाओं का सहारा नहीं लिया, बल्कि अपनी ही आंखों से उनका प्रताप उस समय देखा,

17) जब उन्हें पिता-परमेश्वर के सम्मान तथा महिमा प्राप्त हुई और भव्य ऐश्वर्य में से उनके प्रति एक वाणी यह कहती हुई सुनाई पड़ी, ’’यह मेरा प्रिय पुत्र है। मैं इस पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ।’’

18) जब हम पवित्र पर्वत पर उनके साथ थे, तो हमने स्वयं स्वर्ग से आती हुई यह वाणी सुनी।

19) इस घटना द्वारा नबियों की वाणी हमारे लिए और भी विश्वसनीय सिद्ध हुई। इस पर ध्यान देने में आप लोगों का कल्याण है, क्योंकि जब तक पौ नहीं फटती और आपके हृदयों में प्रभात का तारा उदित नहीं होता, तब तक नबियों की वाणी अंधेरे में चमकते हुए दीपक के सदृश है।

📙 सुसमाचार : लूकस 9:28-36

28) इन बातों के करीब आठ दिन बाद ईसा पेत्रुस, योहन और याकूब को अपने साथ ले गये और प्रार्थना करने के लिए एक पहाड़ पर चढ़े।

29) प्रार्थना करते समय ईसा के मुखमण्डल का रूपान्तरण हो गया और उनके वस्त्र उज्जवल हो कर जगमगा उठे।

30) दो पुरुष उनके साथ बातचीत कर रहे थे। वे मूसा और एलियस थे,

31) जो महिमा-सहित प्रकट हो कर येरूसालेम में होने वाली उनकी मृत्यु के विषय में बातें कर रहे थे।

32) पेत्रुस और उसके साथी, जो ऊँघ रहे थे, अब पूरी तरह जाग गये। उन्होंने ईसा की महिमा को और उनके साथ उन दो पुरुषों को देखा।

33) वे विदा हो ही रहे थे कि पेत्रुस ने ईसा से कहा, "गुरूवर! यहाँ होना हमारे लिए कितना अच्छा है! हम तीन तम्बू खड़ा कर दें- एक आपके लिए, एक मूसा और एक एलियस के लिए।" उसे पता नहीं था कि वह क्या कह रहा है।

34) वह बोल ही रहा था कि बादल आ कर उन पर छा गया और वे बादल से घिर जाने के कारण भयभीत हो गये।

35) बादल में से यह वाणी सुनाई पड़ी, "यह मेरा परमप्रिय पुत्र है। इसकी सुनो।"

36) वाणी समाप्त होने पर ईसा अकेले ही रह गये। शिष्य इस सम्बन्ध में चुप रहे और उन्होंने जो देखा था, उस विषय पर वे उन दिनों किसी से कुछ नहीं बोले।

📚 मनन-चिंतन

आज माता कलिसिया प्रभु येसु के रूपांतरण का पर्व मनाती है। प्रभु येसु अपने तीन सबसे प्रिय शिष्यों को अपने साथ एक ऊँचे पहाड़ पर ले जाते हैं, और वहाँ उनकी उपस्थिति में उनका रूपांतरण हो जाता है। नबी मूसा और एलियस आकर उनसे चर्चा करते हैं और अंत में पिता ईश्वर की वाणी यह कहते हुए सुनाई देती है, “यह मेरा प्रिय पुत्र है, जिससे मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ, इसकी सुनो।”

यह घटना प्रभु येसु के मानव जीवन की बहुत महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। हालाँकि प्रभु येसु के जीवन की सारी घटनायें महत्वपूर्ण थी क्योंकि सब कुछ पिता ईश्वर की इच्छा और योजना के अनुसार ही था, लेकिन कुछ घटनाएँ जैसे प्रभु येसु का बपतिस्मा, चालीस दिन और चालीस रात का उपवास, रूपांतरण, येरूसलेम में प्रवेश, गेथसेमनी बारी में प्रभु येसु की प्राण-पीड़ा आदि बहुत महत्वपूर्ण घटनाएँ हैं जो क्रूस के बलिदान की ओर इंगित करती हैं।

प्रभु येसु का इस दुनिया में आने का उद्देश्य क्रूस पर अपने आप को बलिदान करना और संसार को मुक्ति प्रदान करना था। यह बहुत पीड़ादायी होने वाला था, और यहाँ हम देखते हैं कि पिता ईश्वर अपने पुत्र के प्रति अपने प्रेम को प्रकट करते हैं, जो प्रभु येसु को शक्ति और साहस प्रदान करता है। ईश्वर हममें से सभी को प्यार करते हैं। जब हम मुश्किलों और चुनौतियों का सामना करते हैं, तो हमें अपने आंतरिक पर्वत पर चढ़ना है, और अपने स्वर्गीय पिता की वाणी को सुनना है, “तू मेरा प्रिय पुत्र है, तू मेरी प्रिय पुत्री है, मैं तुझसे अत्यन्त प्रसन्न हूँ।” पिता ईश्वर की वह वाणी हमें भी प्रभु येसु की तरह रूपांतरित कर देगी। आमेन।


📚 REFLECTION

Today we celebrate the Feast of the Transfiguration of the Lord. Jesus took his three very close disciples to a high mountain and there he was transfigured. Prophets Moses and Elijah come to discuss with Jesus and at the end voice of God the Father is heard saying, “this is my beloved son, with whom I am well pleased, Listen to him.”

This is among most important events of Jesus’ human life. Although all the events in Jesus’ life were important because everything was planned and according to God’s will, but some events like Baptism of Jesus, Fasting for forty days and forty nights, Transfiguration, Triumphal Entry into Jerusalem, Agony in the garden etc are very important events leading to the ultimate sacrifice on the Cross.

The purpose of Jesus’ coming was to sacrifice himself on the cross and make salvation available to all. This process was going to be painful, perhaps most painful of all the events in Jesus’ life and here Father acknowledges his love for his Son, that certainly gives strength to Jesus. God loves each one of us. When we are faced with difficulties and challenges, we need to go to our inner mountain and hear the voice of the Father. That would certainly transfigure us. Amen.-


✍️-Br Biniush Topno



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5 अगस्त का पवित्र वचन

            

05 अगस्त 2020
वर्ष का अठारहवाँ सामान्य सप्ताह, बुधवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

📒 पहला पाठ : यिरमियाह 31:1-7

1) प्रभु की वाणी यिरमियाह को यह कहते हुए सुनाई पड़ीः

2) इस्राएल का प्रभु-ईश्वर यह कहता है - ’मैंने जो कुछ तुम से कहा, वह सब एक पुस्तक में लिख लो ;

12) “प्रभु यह कहता है- तुम्हारी बीमारी कभी अच्छी नहीं होगी। तुम्हारे घावों पर कोई इलाज नहीं है।

13) तुम्हारा कोई पक्षधर नहीं है। तुम्हारे घाव नहीं भरेंगे।

14) तुम्हारे सभी प्रेमियों ने तुम को भुला दिया; वे तुम्हारी कोई परवाह नहीं करते, क्योंकि तुम्हारे असंख्य अपराधों और पापों के कारण मैंने तुम को शत्रु की तरह मारा और घोर दण्ड दिया है।

15) तुम अपने घावों पर क्यों रोती हो? तुम्हारी बीमारी का कोई इलाज नहीं। तुम्हारे असंख्य अपराधों और पापों के कारण ही मैंने तुम्हारे साथ ऐसा व्यवहार किया है।

18) “प्रभु यह कहता है- मैं याकूब के तम्बुओं को फिर खड़ा करूँगा। मैं उसके घरों पर दया करूँगा। खँडहरों पर नगर का पुननिर्माण होगा और अपने पुराने स्थान पर गढ़ का पुनरुद्धार होगा।

19) उन में से स्तुतिगान और आनन्दोत्सव की ध्वनि सुनाई देगी। मैं उनकी संख्या बढ़ाऊँगा, वह फिर कभी नहीं घटेगी। मैं उन्हें सम्मान प्रदान करूँगा, उनका फिर कभी तिरस्कार नहीं किया जायेगा।

20) उनकी सन्तति पहले-जैसी होगी और उनका समुदाय मेरे सामने बना रहेगा। मैं उनके सब अत्याचारियों को दण्ड दूँगा।

21) उन में से एक उनका शासक बनेगा और उनके बीच में से उनका राजा उत्पन्न होगा। मैं स्वयं उसे अपने पास बुलाऊँगा और वह मेरे पास आयेगा; क्योंकि कोई भी अपने आप मेरे पास आने का साहस नहीं करता। यह प्रभु की वाणी है।

22) तुम मेरी प्रजा होगे और मैं तुम्हारा ईश्वर होऊँगा।“

📙 सुसमाचार : मत्ती 15:21-28

21) ईसा ने वहाँ से बिदा होकर तीरूस और सिदोन प्रान्तों के लिए प्रस्थान किया।

22) उस प्रदेश की एक कनानी स्त्री आयी और पुकार-पुकार कर कहती रही, "प्रभु दाऊद के पुत्र! मुझ पर दया कीजिए। मेरी बेटी एक अपदूत द्वारा बुरी तरह सतायी जा रही है।"

23) ईसा ने उसे उत्तर नहीं दिया। उनके शिष्यों ने पास आ कर उनसे यह निवेदन किया, "उसकी बात मानकर उसे विदा कर दीजिए, क्योंकि वह हमारे पीछे-पीछे चिल्लाती आ रही है"।

24) ईसा ने उत्तर दिया, "मैं केवल इस्राएल के घराने की खोई हुई भेड़ों के पास भेजा गया हूँ।

25) इतने में उस स्त्री ने आ कर ईसा को दण्डवत् किया और कहा, "प्रभु! मेरी सहायता कीजिए"।

26) ईसा ने उत्तर दिया, "बच्चों की रोटी ले कर पिल्लों के सामने डालना ठीक नहीं है"।

27) उसने कहा, "जी हाँ, प्रभु! फिर भी स्वामी की मेज़ से गिरा हुआ चूर पिल्ले खाते ही हैं"।

28) इस पर ईसा ने उत्तर दिया "नारी! तुम्हारा विश्वास महान् है। तुम्हारी इच्छा पूरी हो।" और उसी क्षण उसकी बेटी अच्छी हो गयी।

📚 मनन-चिंतन

आज हम बड़ी अजीब सी परिस्थिति का सामना करते हैं, जहाँ प्रभु येसु तिरुस और सिदोन के प्रांत में जाते हैं। यह ऐसा क्षेत्र है जहाँ प्रभु येसु ने ज़्यादा चमत्कार नहीं दिखाए थे, शायद इसलिए कि इन प्रांतों के लोग अयोग्य और नीच समझे जाते थे। इससे पहले हम प्रभु येसु को देखते हैं जब वह बेथसेदा और कोरजिन को दुत्कारते हैं तो तिरुस और सिदोन का उदाहरण देते हैं कि जो चमत्कार कोराजिन और बेथसेदा में दिखाए गए थे, वे अगर तिरुस और सिदोन में दिखाए जाते तो वहाँ के लोग पश्चताप करते और मुक्ति प्राप्त करते (देखें मत्ती 11:21)। यह कनानी स्त्री इसी बदकिस्मत क्षेत्र से आती है।

प्रभु येसु के शिष्य उस जमाने के लोगों की पक्षपातपूर्ण सोच को उजागर करते हैं। इस कनानी स्त्री का आग्रह मानकर प्रभु येसु दिखाना चाहते हैं कि हमारा राष्ट्र, हमारी जाति, हमारा जंग, हमारा समाज या क्षेत्र ईश्वर के सामने कोई मायने नहीं रखता, जो मायने रखता है, वह है हमारा विश्वास। ईश्वर ने सारी बाधाएँ और बंदिशें तोड़ दी हैं, और प्रभु येसु के द्वारा उसकी कृपा सभी के लिए उपलब्ध है। प्रेरित चरित के 10वें अध्याय के 34वें और 35वें पद में कहते हैं, “अब मैं अच्छी तरह समझ गया हूँ कि ईश्वर किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। मनुष्य किसी भी राष्ट्र का क्यों ना हो, यदि वह ईश्वर पर श्रद्धा रख कर धर्माचरण करता है, तो वह ईश्वर का कृपापत्र बन जाता है।”


📚 REFLECTION

Today we see a very strange occurrence where Jesus is in the region of Tyre and Sidon. This is the place where Jesus had not done much miracles, perhaps people were considered unworthy and low. Before this we saw Jesus while rebuking Chorazin and Besthsaida, gives a picture of people of Sidon that many miracles were not shown there otherwise many people would have repented for their sins and be saved (cf Mt. 11:21). It is from here that this Canaanite woman comes.

The disciples represent the mentality of the people of that time. But through the fulfilling of the woman’s request, Jesus shows us that our caste, our nationality, our colour, region etc, don’t matter, what matters is that we have faith. God has broken all the barriers and boundaries, his grace is available for all through Jesus Christ. St. Peter rightly says in Acts 10:34-35, “I truly understand that God shows no partiality, but in every nation anyone who fears him and does what is right, is acceptable to him.”

 -Br. Biniush Topno




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4 अगस्त का पवित्र वचन

04 अगस्त 2020
वर्ष का अठारहवाँ सामान्य सप्ताह, मंगलवार

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📒 पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 30:1-2,12-15,18-22

1) प्रभु की वाणी यिरमियाह को यह कहते हुए सुनाई पड़ीः

2) इस्राएल का प्रभु-ईश्वर यह कहता है - ’मैंने जो कुछ तुम से कहा, वह सब एक पुस्तक में लिख लो ;

12) “प्रभु यह कहता है- तुम्हारी बीमारी कभी अच्छी नहीं होगी। तुम्हारे घावों पर कोई इलाज नहीं है।

13) तुम्हारा कोई पक्षधर नहीं है। तुम्हारे घाव नहीं भरेंगे।

14) तुम्हारे सभी प्रेमियों ने तुम को भुला दिया; वे तुम्हारी कोई परवाह नहीं करते, क्योंकि तुम्हारे असंख्य अपराधों और पापों के कारण मैंने तुम को शत्रु की तरह मारा और घोर दण्ड दिया है।

15) तुम अपने घावों पर क्यों रोती हो? तुम्हारी बीमारी का कोई इलाज नहीं। तुम्हारे असंख्य अपराधों और पापों के कारण ही मैंने तुम्हारे साथ ऐसा व्यवहार किया है।

18) “प्रभु यह कहता है- मैं याकूब के तम्बुओं को फिर खड़ा करूँगा। मैं उसके घरों पर दया करूँगा। खँडहरों पर नगर का पुननिर्माण होगा और अपने पुराने स्थान पर गढ़ का पुनरुद्धार होगा।

19) उन में से स्तुतिगान और आनन्दोत्सव की ध्वनि सुनाई देगी। मैं उनकी संख्या बढ़ाऊँगा, वह फिर कभी नहीं घटेगी। मैं उन्हें सम्मान प्रदान करूँगा, उनका फिर कभी तिरस्कार नहीं किया जायेगा।

20) उनकी सन्तति पहले-जैसी होगी और उनका समुदाय मेरे सामने बना रहेगा। मैं उनके सब अत्याचारियों को दण्ड दूँगा।

21) उन में से एक उनका शासक बनेगा और उनके बीच में से उनका राजा उत्पन्न होगा। मैं स्वयं उसे अपने पास बुलाऊँगा और वह मेरे पास आयेगा; क्योंकि कोई भी अपने आप मेरे पास आने का साहस नहीं करता। यह प्रभु की वाणी है।

22) तुम मेरी प्रजा होगे और मैं तुम्हारा ईश्वर होऊँगा।“

📙 सुसमाचार : मत्ती 15:1-2,10-14

1) येरूसालेम के कुछ फ़रीसी और शास्त्री किसी दिन ईसा के पास आये।

2) और यह बोले, "आपके शिष्य पुरखों की परम्परा क्यों तोड़ते हैं? वे तो बिना हाथ धोये रोटी खाते हैं।"

10) इसके बाद ईसा ने लोगों को पास बुला कर कहा, "तुम लोग मेरी बात सुनो और समझो।

11) जो मुहँ में आता है, वह मनुष्य को अशुद्ध करता है; बल्कि जो मुँह से निकलता है, वही मनुष्य को अशुद्ध करता है;

12) बाद में शिष्य आ कर ईसा से बोले, "क्या आप जानते हैं कि फ़रीसी आपकी बात सुन कर बहुत बुरा मान गये हैं?"

13) ईसा ने उत्तर दिया, "जो पौधा मेरे स्वर्गिक पिता ने नहीं रोपा है, वह उखाड़ा जायेगा।

14) उन्हें रहने दो; वे अन्धों के अंधे पथप्रदर्शक हैं। यदि अन्धा अन्धे को ले चले, तो दोनों ही गड्ढे में गिर जायेंगे।"

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में प्रभु येसु हमें अशुद्ध करने वाली वस्तुओं के बारे में आगाह करते हैं। प्रभु कहते हैं, “ जो मुँह में आता है वह मनुष्य को अशुद्ध नहीं करता बल्कि जो मुहँ से निकलता है, वही मनुष्य को अशुद्ध करता है।” इसी अध्याय के 18वें पद में प्रभु येसु इसे और स्पष्ट रूप से समझाते हैं। जो हमें अशुद्ध करता है वह हमारे मन में उपजे हुए हमारे पाप हैं। हमें बाहरी शुद्धता से अधिक आंतरिक शुद्धता की चिंता करनी है।

हमारे कार्य हमारे विचारों से जन्म लेते हैं। कोई भी कदम उठाने से पहले हम उसके बारे में सोचते और विचार करते हैं, और यह सोचना-विचारना हमारे अंदर ईश्वर की आवाज़ से प्रेरित होना चाहिए (काथलिक कलिसिया की धर्मशिक्षा CCC 1777) लेकिन अक्सर जब हमारे हृदय में बुराई का निवास होता है तो हमारी वाणी और हमारे कर्म भी बुरे और पापमय होते हैं, जो अंततः हमें एक पापी और बुरा इंसान बना देते हैं। अगर हम अपने मन को ही शुद्ध कर लें तो हम अन्दर से शुद्ध हो जाएँगे। स्वयं को आंतरिक रूप से शुद्ध करने के लिए ईश वचन हमारा मार्गदर्शक है। जब हमारे मन में ईश्वर का निवास होगा तो स्वतः ही हमारे कार्य भी ईश्वरीय और हमारी वाणी पवित्र और मधुर हो जाएगी।



📚 REFLECTION

In the Gospel today Jesus warns us about what can make us unclean. He says, “What enters into the mouth does not make a person unclean. What defiles a person is what comes out of his mouth.” In the 18th verse of the same chapter Jesus explains it more clearly. What makes us unclean is our sins that come out of our heart, our thinking. We have to be alert about our inner cleanness more than outward cleanliness.

Our actions are born of our thoughts. Before acting we first think about it and this thinking should be guided by the voice of God within us(CCC 1777), but very often when our heart becomes filled with evil thoughts then our words and our actions will also be evil, which over all will make us an evil person. If we can make ourselves clean at the heart level, then we will be clean from within. Word of God is our guide to help us to clean ourselves from within. When God dwells in our heart, automatically our actions will also be godly, our words will be good and pleasant.

 -Biniush Topno



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03 अगस्त का पवित्र वचन

03 अगस्त 2020
वर्ष का अठारहवाँ सामान्य सप्ताह, सोमवार

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📒 पहला पाठ : यिरमियाह 28:1-17

1) यूदा के राजा योशीया के शासनकाल के प्रारम्भ में, चैथे वर्ष के पाँचवें महीने में अज्जूर के पुत्र हनन्या- गिबओन में रहने वाले नबी- ने प्रभु के मन्दिर में याजकों तथा समस्त जनता के सामने यिरमियाह से यह कहा,

2) “विश्वमण्डल का प्रभु, इस्राएल का ईश्वर यह कहता हैः मैं बाबुल के राजा का जूआ तोडूँगा।

3) मैं ठीक दो वर्ष बाद प्रभु के मन्दिर के वे सब सामान वापस ले आऊँगा जिन्हें बाबुल का राजा नबूकदनेज़र यहाँ से बाबुल ले गया था।

4) यहोयाकीम के पुत्र, यूदा के राजा यकोन्याह को और यूदा के सब निर्वासितों को भी मैं बाबुल से यहाँ वापस ले आऊँगा- यह प्रभु की वाणी है- क्योंकि मैं बाबुल के राजा का जूआ तोड़ूँगा।“

5) किन्तु नबी यिरमियाह ने सब याजकों समस्त जनता के सामने नबी हनन्या को सम्बोधित करते हुए कहा,

6) “एवमस्तु! प्रभु ऐसा ही करें! प्रभु तुम्हारी भवियवाणी पूरी करे और प्रभु के मन्दिर के सब सामान और सब निर्वासितों को भी वापस ले आये।

7) किन्तु जो बात मैं तुम को और सारी जनता को बताने जा रहा हूँ, उसे ध्यान से सुनो।

8) तुम्हारे और मेरे पहले जो नबी थे, वे प्राचीन काल से, शक्तिशाली देशों और बड़े राज्यों के लिए युद्ध, विपत्ति और महामारी की भवियवाणी करते आ रहे हैं।

9) जो नबी शान्ति की भवियवाणी करता है, वह तभी प्रभु का भेजा हुआ नबी माना जा सकता है, जब उसकी भवियवाणी पूरी हो जाये।“

10) इस पर नबी हनन्या ने नबी यिरमियाह के कन्धे पर से जूआ उतारा और उसे तोड़ डाला।

11) तब हनन्या समस्त जनता के सामने यह बोला, “प्रभु यह कहता है: मैं इसी तरह बाबुल के राजा नबूकदनेज़र का जूआ तोड़ूँगा। मैं ठीक दो वर्ष बाद उसे सब राष्ट्रों के कन्धे पर से उतार कर तोड़ दूँगा।“ इसके बाद नबी यिरमियाह अपनी राह चला गया।

12) जब हनन्या ने नबी यिरमियाह के कन्धे पर से जूआ उतार कर तोड़ दिया था, तो उस के थोड़े समय बाद प्रभु की वाणी यिरमियाह को यह कहते हुए सुनाई दी,

13) “जाओ और हनन्या से कहो- यह प्रभु की वाणी है। तुमने लकड़ी का जूआ तोड़ा, इसके बदले लोहे का जूआ आयेगा;

14) क्योंकि विश्वमण्डल का प्रभु, इस्राएल का ईश्वर यह कहता हैः मैं सब राष्ट्रों के कन्धे पर लोहे का जूआ रखने जा रहा हूँ। वे सब बाबुल के राजा नबूकदनेज़र के अधीन होंगे। मैंने बनैले पशुओं को भी उसके अधीन कर दिया है।“

15) नबी यिरमियाह ने नबी हनन्या से कहा, “हनन्या! ध्यान से मेरी बात सुनो! प्रभु ने तुम को नहीं भेजा है। तुमने इस प्रजा को झूठी आशा दिलायी है।

16) इसलिए प्रभु यह कहता हैः मैं तुम को इस पृथ्वी पर से मिटा दूँगा। तुम इसी वर्ष मर जाओगे; क्योंकि तुमने प्रभु के विरुद्ध विद्रोह का प्रचार किया है।“

17) उसी वर्ष के सातवें महीने नबी हनन्या का देहान्त हो गया।

📙 सुसमाचार : मत्ती 14:22-36

22) इसके तुरन्त बाद ईसा ने अपने शिष्यों को इसके लिए बाध्य किया कि वे नाव पर चढ़ कर उन से पहले उस पार चले जायें; इतने में वे स्वयं लोगों को विदा कर देंगे।

23) ईसा लोगों को विदा कर एकान्त में प्रार्थना करने पहाड़ी पर चढे़। सन्ध्या होने पर वे वहाँ अकेले थे।

24) नाव उस समय तट से दूर जा चुकी थी। वह लहरों से डगमगा रही थी, क्योंकि वायु प्रतिकूल थी।

25) रात के चैथे पहर ईसा समुद्र पर चलते हुए शिष्यों की ओर आये।

26) जब उन्होंने ईसा को समुद्र पर चलते हुए देखा, तो वे बहुत घबरा गये और यह कहते हुए, "यह कोई प्रेत है", डर के मारे चिल्ला उठे।

27) ईसा ने तुरन्त उन से कहा, "ढारस रखो; मैं ही हूँ। डरो मत।"

28) पेत्रुस ने उत्तर दिया, "प्रभु! यदि आप ही हैं, तो मुझे पानी पर अपने पास आने की अज्ञा दीजिए"।

29) ईसा ने कहा, "आ जाओ"। पेत्रुस नाव से उतरा और पानी पर चलते हुए ईसा की ओर बढ़ा;

30) किन्तु वह प्रचण्ड वायु देख कर डर गया और जब डूबने लगा तो चिल्ला उठा, "प्रभु! मुझे बचाइए"।

31) ईसा ने तुरन्त हाथ बढ़ा कर उसे थाम लिया और कहा, "अल़्पविश्वासी! तुम्हें संदेह क्यों हुआ?"

32) वे नाव पर चढे और वायु थम गयी।

33) जो नाव में थे, उन्होंने यह कहते हुए ईसा को दण्डवत् किया "आप सचमुच ईश्वर के पुत्र हैं"।

34) वे पार उतर कर गेनेसरेत पहुँचे।

35) वहाँ के लोगों ने ईसा को पहचान लिया और आसपास के गाँवों में इसकी ख़बर फैला दी। वे सब रोगियों को ईसा के पास ले आ कर

36) उन से अनुनय-विनय करते थे कि वे उन्हें अपने कपड़े का पल्ला भर छूने दें। जितनों ने उसका स्पर्श किया, वे सब-के-सब अच्छे हो गये।

📚 मनन-चिंतन

आज हम इस पर मनन-चिंतन करते हैं कि किस तरह प्रभु येसु जो कुछ पल अकेले रहकर प्रार्थना करना चाहते थे, और बाद में अपने शिष्यों के साथ होना चाहते थे, लेकिन वे देखते हैं कि उनके शिष्य उनसे दूर जा चुके है और उनकी नाव लहरों में हिचकोले खा रही है। प्रभु येशु शिष्यों के डर और संघर्ष को महसूस कर सकते थे। उन्हें मालूम था कि भले ही शिष्यों ने उन्हें नहीं पुकारा लेकिन उन्हें जाकर उनके साथ रहना है, इतना ही उन्हें पर्याप्त साहस प्रदान करेगा। कभी-कभी जब हम अपने जीवन की चुनौतियों और कठिन परिस्थितियों में फँस जाते हैं तो प्रभु येसु की उपस्थिति मात्र से ही सारे संकट दूर हो जाएँगे, प्रभु येसु को कोई चमत्कार करने की ज़रूरत नहीं है, बस उनका हमारे साथ रहना ही काफ़ी है।

सबसे बढ़कर अच्छी बात तो यह है कि हम तक पहुँचने के लिए प्रभु येसु किसी बाधा को पार करने के लिए तैयार हैं, उन्हें कुछ भी नहीं रोक सकता है क्योंकि उनकी दृष्टि हमारी ओर लगी हुई है, उसके लिए हम मूल्यवान हैं। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न तो यह है कि हमारी दृष्टि किसकी ओर है, प्रभु की ओर या कहीं और? क्या हमारा ध्यान प्रभु येसु पर है या हमारे खुद के जीवन पर, खुद की परेशानियों और चिंताओं पर, हमारे डर और चुनौतियों पर? यदि ऐसा है तो हम भी सन्त पेत्रुस की तरह प्रभु येसु की तरफ़ बढ़ नहीं पाएँगे, बल्कि अगर हमारा ध्यान प्रभु येसु से हटा तो डूबने का भी ख़तरा बना रहेगा। आइए हम प्रभु येसु से सदा हमारे साथ रहने की कृपा माँगे और हमारे दिन-प्रतिदिन के जीवन में अपना ध्यान प्रभु पर लगाएँ। आमेन।


📚 REFLECTION

Today we see Jesus who went alone to pray, wanted to join the disciples, but they were away from the shore and the boat was being tossed by waves, the wind was against them. Jesus could feel the anguish and struggle of the disciples. He knew that even if they had not called him, he had to be with them, that would give them relief. Sometimes when we are amidst the problems and difficulties of our lives, mere presence of Jesus, can put them away, he need not do anything, just be with us and everything will be all right.

And we know that to reach to us he can cross all boundaries, nothing can stop him, because his focus is on us, we are precious to him. But the real question is where is our focus? Is our focus Jesus or our own life, our own fears, worries and problems? If so then we may not be able to walk like Peter and may even get drowned if we take away our focus from Jesus. Let us ask Jesus to always be with us and give us grace to always look to him in all our affairs of daily life. Amen.

 -Br Biniush Topno




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