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28;जुलाई का पाठ

28 जुलाई 2020
वर्ष का सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह, मंगलवार

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पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 14:17-22

17) “तुम उन्हें यह कहोगे: ’मैं दिन-रात निरन्तर आँसू बहाता रहता हूँ, क्योंकि मेरी पुत्री विपत्ति की मारी है, मेरी प्रजा घोर संकट में पड़ी हुई है।

18) यदि मैं खेतों की ओर जाता हूँ, तो तलवार से मारे हुए लोगों को देखता हूँ और यदि मैं नगर में आता हूँ, तो उन्हें भूखों मरते देखता हूँ। नबी और याजक भी देश में मारे-मारे फिरते हैं और नहीं समझते हैं कि क्या हो रहा है?।“

19) क्या तूने यूदा को त्याग दिया है? क्या तुझे सियोन से घृणा हो गयी है? तूने हमें क्यों इस प्रकार मारा है, कि अब उपचार असम्भव हो गया है। हम शान्ति की राह देखते रहे, किन्तु वह मिली नहीं। हम कल्याण की प्रतीक्षा करते रहे, किन्तु आतंक बना रहा।

20) प्रभु! हम अपनी दुष्टता और अपने पूर्वजों का अपराध स्वीकार करते हैं। हमने तेरे विरुद्ध पाप किया है।

21) अपने नाम के कारण हमें न ठुकरा; अपने महिमामय सिंहासन का अपमान न होने दे। हमारे लिए अपने विधान को न भुला और उसे भंग न कर।

22) क्या राष्ट्रों के देवताओं में कोई पानी बरसा सकता है? क्या आकाश अपने आप वर्षा कर सकता है? हमारे प्रभु-ईश्वर! तुझ में ही यह सामर्थ्य है। इसलिए हमें तेरा भरोसा है; क्योंकि तू ही यह सब करता है।

सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 13:36-43

36) ईसा लोगों को विदा कर घर लौटे। उनके शिष्यों ने उनके पास आ कर कहा, ’’खेत में जंगली बीज का दृष्टान्त हमें समझा दीजिए’’।

37) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, ’’अच्छा बीज बोने बाला मानव पुत्र हैं;

38) खेत संसार है; अच्छा बीज राज्य की प्रजा है; जंगली बीज दृष्ट आत्मा की प्रजा है;

39) बोने बाला बैरी शैतान है; कटनी संसार का अंत है; लुनने वाले स्वर्गदूत हैं।

40) जिस तरह लोग जंगली बीज बटोर कर आग में जला देते हैं, वैसा ही संसार के अंत में होगा।

41) मानव पुत्र अपने स्वर्गदूतों को भेजेगा और वे उसके राज्य क़़ी सब बाधाओं और कुकर्मियों को बटोर कर आग के कुण्ड में झोंक देंगें।

42) वहाँ वे लोग रोयेंगे और दाँत पीसते रहेंगे।

43) तब धर्मी अपने पिता के राज्य में सूर्य की तरह चमकेंगे। जिसके कान हों, वह सुन ले।

📚 मनन-चिंतन - 1

खेत के जंगली बीज के दृष्टांत के माध्यम से प्रभु येसु हमें यह बताना चाहते हैं कि हम इस दुनिया में जीवन भर अच्छे और बुरे के बीच संघर्ष में शामिल हैं। प्रभु ईश्वर अच्छे बीज बोते रहते हैं। शैतान जंगली बीज बोता रहता है। हमें, जो ज्ञान और विवेक के साथ सृष्ट किये गये हैं, लगभग हर समय अच्छे और बुरे के बीच वास्तविक चयन करना पडता है। धर्मियों को अंत में, अच्छाई की अंतिम जीत पर पुरस्कृत किया जाएगा। दृष्टान्त तब अधिक जटिल हो जाता है जब हम सीखते हैं कि जिस जंगली बीज का ज़िक्र प्रभु येसु करते हैं, वह गेहूँ की तरह ही दिखता है। दाने दिखाई देने पर ही अंतर स्पष्ट हो जाता है। सन्देश स्पष्ट है - शैतान हमें धोखा देने की कोशिश करता है। जब तक हम सतर्क और सावधान नहीं रहेंगे, हम उसके धोखे के शिकार बने रहेंगे। सूक्ति 14:12 में हम पढ़ते हैं, "कुछ लोग अपना आचरण ठीक समझते हैं, किन्तु वह अन्त में उन्हें मृत्यु की ओर ले जाता है"। संत पौलुस कहते हैं, "यह आश्चर्य की बात नहीं, क्योंकि स्वयं शैतान ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का स्वाँग रचता है" (2 कुरिन्थियों 11:14)। 2 कुरिन्थियों 11: 3 में वे कहते हैं कि शैतान "ने अपनी धूर्तता से हेवा को धोखा दिया था”। प्रकाशना 12: 9 में शैतान को सारे संसार को भटकाने वाला कहा गया है। इस प्रकार आज का सुसमाचार ख्रीस्तीय जीवन में सावधानी और सतर्कता का आह्वान करता है।



📚 REFLECTION

Through the parable of the weeds of the field, Jesus wants us to know that we are constantly involved in a conflict between good and evil throughout our lives in this world. God keeps sowing the good seeds. The devil keeps sowing weeds. We who are gifted with reasoning and discernment are to make real choices between good and evil almost all the time. The righteous will be rewarded at the end of the battle, at the ultimate victory of goodness. The parable becomes more complex when we learn that the darnel is a weed that looks like wheat. The differences become apparent only when the grains appear. Hence the devil tries to deceive us. Unless we are alert and careful, we shall be cheated by him. In Prov 14:12 we read, “There is a way that seems right to a person, but its end is the way to death”. St. Paul says, “Even Satan disguises himself as an angel of light” (2 Cor 11:14). In 2Cor 11:3 he speaks about the devil who deceived Eve “by his craftiness”. Rev 12:9 refers to Satan as one “who deceives the whole world”. This calls for caution and alertness.

✍️ - Br. Biniush Topno

27 जुलाई का पाठ

27 जुलाई 2020
वर्ष का सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह, सोमवार

पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 13:1-11

1) प्रभु ने मुझ से यह कहा, “तुम जा जा कर छालटी की पेटी ख़रीदो और कमर में बाँध लो, किन्तु उसे पानी में नहीं डुबाओ“।

2) मैंने प्रभु के आदेशानुसार पेटी खरीद कर कमर में बाँध ली।

3) प्रभु ने मुझ से दूसरी बार कहा,

4) “तुमने जो पेटी खरीदी, उसे कमर में बाँध कर तुरन्त फ़रात नदी जाओ और उसे वहाँ किसी चट्टान की दरार में छिपा दो।“

5) मैंने प्रभु के आदेशानुसार फ़रात जा कर वहाँ पेटी छिपा दी।

6) बहुत समय बाद प्रभु ने मुझ से कहा, “फ़रात जा कर वह पेटी ले आओ, जिसे तुमने मेरे आदेशानुसार वहाँ छिपाया।“

7) मैंने फ़रात जा कर उस जगह का पता लगाया, जहाँ मैंने पेटी छिपायी थी। मैंने उसे निकाल कर देखा कि वह बिगड़ गयी है और किसी काम की नहीं रह गयी है।

8) तब प्रभु की वाणी मुझे यह कहते हुए सुनाई पड़ी,

9) “प्रभु यह कहता हैः “मैं इसी प्रकार यूदा और येरुसालेम का गौरव नष्ट हो जाने दूँगा।

10) यह दुष्ट प्रजा मेरी एक भी नहीं सुनना चाहती और हठपूर्वक अपनी राह चलती है। यह दूसरे देवताओं की अनुयायी बन कर उनकी उपासना और आराधना करती है। इसलिए यह इस पेटी की तरह किसी काम की नहीं रहेगी ;

11) क्योंकि जिस तरह पेटी मनुय की कमर में कस कर बाँधी जाती है, उसी तरह मैंने समस्त इस्राएल और यूदा को अपने से बाँध लिया था, जिससे वे मेरी प्रजा, मेरा गौरव, मेरी कीर्ति और मेरी शोभा बन जायें। किन्तु उन्होंने मेरी एक भी न सुनी।’ यह प्रभु की वाणी है।

सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 13:31-35

31) ईसा ने उनके सामने एक और दृष्टान्त प्रस्तुत किया, ’’स्वर्ग का राज्य राई के दाने के सदृश है, जिसे ले कर किसी मनुष्य ने अपने खेत में बोया।

32) वह तो सब बीजों से छोटा है, परन्तु बढ़ कर सब पोधों से बड़ा हो जाता है और ऐसा पेड़ बनता है कि आकाश के पंछी आ कर उसकी डालियों में बसेरा करते हैं।’’

33) ईसा ने उन्हें एक दृष्टान्त सुनाया,’’स्वर्ग का राज्य उस ख़मीर के सदृश है, जिसे लेकर किसी स्त्री ने तीन पंसेरी आटे में मिलाया और सारा आटा खमीर हो गया’’।

34) ईसा दृष्टान्तों में ही ये सब बातें लोगों को समझाते थे। वह बिना दृष्टान्त के उन से कुछ नहीं कहते थे,

35) जिससे नबी का यह कथन पूरा हो जाये- मैं दृष्टान्तों में बोलूँगा। पृथ्वी के आरम्भ से जो गुप्त रहा, उसे मैं प्रकट करूँगा।

📚 मनन-चिंतन - 1

आज का सुसमाचार राई के बीज को सभी बीजों में से सबसे छोटे के रूप में प्रस्तुत करता है और स्वर्गराज्य की तुलना इस सबसे छोटे बीज से की जाती है। जबकि राई का बीज सबसे छोटा बीज है या नहीं, इस बारे में एक अनिर्णायक और अनिश्चित बहस हो सकती है, अगर हम इस तरह की बहस में प्रवेश करते हैं तो हम केवल भटक जायेंगे और सुसमाचार के वास्तविक संदेश से वंचित रह जाएंगे। वह बीज अंकुरित होता है और एक बड़ा पेड़ बन जाता है और आकाश के पंछी आ कर उसकी डालियों में बसेरा करने लगते हैं।

दूसरे दृष्टान्त में प्रभु येसु स्वर्गराज्य की तुलना ख़मीर से करते हैं, जिसे लेकर किसी स्त्री ने तीन पंसेरी आटे में मिलाया और सारा आटा खमीर हो गया। प्रभु येसु हमें यह बताना चाहते हैं कि सबसे छोटे तरीके से मौजूद स्वर्गराज्य के रहस्यों का समाज पर बहुत प्रभाव हो सकता है। इन दोनों उदाहरणों में छोटी सी शुरुआत है, लेकिन बड़ी वृद्धि है। करुणा के सबसे छोटे कार्य का भी आस-पास के लोगों पर बहुत प्रभाव पड़ेगा। थोड़ी मुस्कुराहट, दया का कोई लघुकार्य, सांत्वना का एक शब्द - इन सभी का दूसरों पर बहुत प्रभाव हो सकता है। ईश्वर के राज्य के सन्देशवाहक बहुत फल उत्पन्न करने वाले प्रभु पर भरोसा रखते हुए दयालुता और उदारता के सरल कर्मों को अंजाम देते रहते हैं। कलकत्ता की संत तेरेसा ने एक बार कहा था, “हम में से सब महान कार्य नहीं कर सकते हैं। लेकिन हम छोटे काम बड़े प्यार से कर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा, "दयालुता का एक शब्द, बोलने में आसान हो सकते हैं और छोटा भी, लेकिन उसकी गूँज वास्तव में अंतहीन होती है"।

✍- ब्रो बिनियु्स टोपनो


📚 REFLECTION

The Gospel passage of today presents the mustard seed as the smallest of all seeds and the kingdom of heaven is compared to this smallest seed. While there can be an inconclusive and ongoing debate about whether mustard seed is the smallest seed, if we enter into such debates we shall only lose the focus and be deprived of the real message of the Gospel. The seed sprouts and grows into a large tree so as to give shelter to the birds of the air.

We also have the parable of the leaven influencing the whole dough. Jesus wants us to know that the Kingdom of heaven present even in the smallest ways can have great influence on the society. Both these examples have small unassuming beginnings, but great growth. Even the smallest act of compassion will have great influence on the people around. A little smile, a kind gesture, a word of consolation – all these can have great influence on others. The messengers of the Kingdom of God are to carry out simple deeds of kindness and generosity trusting in the Lord who brings us results. St. Theresa of Calcutta once said, “Not all of us can do great things. But we can do small things with great love”. She also said, “Kind words can be short and easy to speak, but their echoes are truly endless”.

 Br. Biniush Topno



26 July Bible Reading

26 जुलाई 2020
वर्ष का सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार

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पहला पाठ : राजाओं का पहला ग्रन्थ 3:5, 7-12

3) सुलेमान को प्रभु से प्रेम था और वह अपने पिता दाऊद के विधानों के अनुसार कार्य करता था; लेकिन वह पहाड़ी पूजास्थानों पर बलि चढ़ाता और धूप दिया करता था।

7) प्रभु! मेरे ईश्वर! तूने अपने इस सेवक को अपने पिता दाऊद के स्थान पर राजा बनाया, लेकिन मैं अभी छोटा हूँ। मैं यह नहीं जानता कि मुझे क्या करना चाहिए।

8) मैं यहाँ तेरी चुनी हुई प्रजा के बीच हूँ। यह राष्ट्र इतना महान् है कि इसके निवासियों की गिनती नहीं हो सकती।

9) अपने इस सेवक को विवेक देने की कृपा कर, जिससे वह न्यायपूर्वक तेरी प्रजा का शासन करे और भला तथा बुरा पहचान सके। नहीं तो, कौन तेरी इस असंख्य प्रजा का शासन कर सकता है?’’

10) सुलेमान का यह निवेदन प्रभु को अच्छा लगा।

11) प्रभु ने उसे से कहा, ‘‘तुमने अपने लिए न तो लम्बी आयु माँगी, न धन-सम्पत्ति और न अपने शत्रुओं का विनाश।

12) तुमने न्याय करने का विवेक माँगा है। इसलिए मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा। मैं तुम को ऐसी बुद्धि और ऐसा विवेक प्रदान करता हूँ कि तुम्हारे समान न तो पहले कभी कोई था और न बाद में कभी कोई होगा।

दूसरा पाठ : रोमियों 8:28-30

28) हम जानते हैं कि जो लोग ईश्वर को प्यार करते हैं और उसके विधान के अनुसार बुलाये गये हैं, ईश्वर उनके कल्याण के लिए सभी बातों में उनकी सहायता करता है;

29) क्योंकि ईश्पर ने निश्चित किया कि जिन्हें उसने पहले से अपना समझा, वे उसके पुत्र के प्रतिरूप बनाये जायेंगे, जिससे उसका पुत्र इस प्रकार बहुत-से भाइयों का पहलौठा हो।

30) उसने जिन्हें पहले से निश्चित किया, उन्हें बुलाया भी है: जिन्हें बुलाया, उन्हें पाप से मुक्त भी किया है और जिन्हें पाप से मुक्त किया, उन्हें महिमान्वित भी किया है।

सुसमाचार : मत्ती 13:44-52

44) ’’स्वर्ग का राज्य खेत में छिपे हुए ख़ज़ाने के सदृश है, जिसे कोई मनुष्य पाता है और दुबारा छिपा देता है। तब वह उमंग में जाता और सब कुछ बेच कर उस खेत को ख़रीद लेता है।

45) ’’फिर, स्वर्ग का राज्य उत्तम मोती खोजने वाले व्यापारी के सदृश है।

46) एक बहुमूल्य मोती मिल जाने पर वह जाता और अपना सब कुछ बेच कर उस मोती को मोल ले लेता है।

47) ’’फिर, स्वर्ग का राज्य समुद्र में डाले हुए जाल के सदृश है, जो हर तरह की मछलियाँ बटोर लाता है।

48) जाल के भर जाने पर मछुए उसे किनारे खींच लेते हैं। तब वे बैठ कर अच्छी मछलियाँ चुन-चुन कर बरतनों में जमा करते हैं और रद्दी मछलियाँ फेंक देते हैं।

49) संसार के अन्त में ऐसा ही होगा। स्वर्गदूत जा कर धर्मियों में से दुष्टों को अलग करेंगे।

50) और उन्हें आग के कुण्ड में झोंक देंगे। वहाँ वे लोग रोयेंगे और दाँत पीसते रहेंगे।

51) ’’क्या तुम लोग यह सब बातें समझ गये?’’ शिष्यों ने उत्तर दिया, ’’जी हाँ’’।

52) ईसा ने उन से कहा, ’’प्रत्येक शास्त्री, जो स्वर्ग के राज्य के विषय में शिक्षा पा चुका है, उस ग्रहस्थ के सदृश है, जो अपने ख़जाने से नयी और पुरानी चीज़ें निकालता है’’।

📚 मनन-चिंतन - 1

हम अक्सर 'ट्रेजर हंट' नामक खेल खेलते हैं। इस खेल में हम कुछ चीज़ की खोज का प्रयास करते हैं जो परिसर में कहीं छिपायी गयी है। कुछ लोग इस तरह के खेलों में भाग लेना ही पसंद नहीं करते क्योंकि वे बहुत सारे प्रयासों की मांग करते हैं, जबकि कई अन्य लोग आश्वस्त लेकिन अज्ञात निश्चितता का सामना करने में रुचि रखते हैं। इस खेल में जब यह देखा जाता है कि अधिकांश खिलाड़ी अपने प्रयासों के बावजूद असफल होते हैं, तब जो खेल का संचालन करता है वह सामान्य रूप से कुछ सुराग देता है। तब खिलाड़ी दिए गए सुरागों के आधार पर अपने प्रयासों को आगे बढ़ाते हैं और कोई खजाना पाने में सफल होता है।

आज का सुसमाचार, ईश्वर के राज्य को खेत में छिपे खजाने के रूप में प्रस्तुत करता है। खजाने को छिपे हुए के रूप में प्रस्तुत करके, येसु हमें यह बताना चाहते हैं कि हमें सबसे पहले खजाने की अमूल्यता और महानता के बारे में पता होना चाहिए। सुसमाचार में उल्लेख व्यक्ति को ख़ज़ाने के अस्तित्व के बारे में दृढ़धारणा है और इसीलिए वह इसकी खोज में निकल पड़ता है। वह इसे पाने के लिए आशावान रहता है। फिर वह उसे खोजने का प्रयास करता है। वह खजाना सहजता से उसे नहीं मिलता है। उसे तलाश करना पड़ता है। इस स्तर पर उसे उस खजाने को हासिल करने के अपने प्रयासों को सही दिशा-निर्देश देना होगा, अन्य मामलों में व्यस्त नहीं रहना चाहिए। उसे प्राप्त करने की दिशा में हर प्रयास को बदलना होगा। उसे प्राप्त करने के बाद, उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यह कभी खो न जाए। उसके संरक्षण के लिए भी उसे प्रयास करते रहना पड़ता है।

यह ईश्वर के राज्य की वास्तविकता है। हमें इस तरह के खजाने के अस्तित्व के बारे में आश्वस्त होना चाहिए और इसे खोजने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। मिल जाने के बाद, हमें इसे महत्व देने और इसे संरक्षित रखना चाहिए। हमें हमारे प्रयासों को उस खजाने पर केन्द्रित करना तथा भटकने से बचना होगा।

दूसरे दृष्टांत में, येसु ने ईश्वर के राज्य की तुलना एक ऐसे व्यापारी से की है जो बढ़िया मोती खोज रहा है और उस मूल्यवान खजाने को हासिल करने के लिए वह अपनी सारी संपत्ति बेचता है। वह उस नए पाए गए बहुमूल्य मोती को प्राप्त करने के लिए कम मूल्य के अन्य सभी मोती देने को तैयार है।

इन दोनों दृष्टांतों के द्वारा प्रभु येसु चाहते हैं कि हम राज्य की महानता से अवगत हों, उसे हासिल करने और संरक्षित करने के लिए हर संभव प्रयास करें। हमें अपनी बहुत सी छोटी-छोटी चीज़ों को त्यागने और ईश्वर के राज्य की खातिर अपने आराम क्षेत्रों से बाहर निकलने के लिए तैयार रहना चाहिए।

संत पौलुस कहते हैं, “ मैं जिन बातों को लाभ समझता था, उन्हें मसीह के कारण हानि समझने लगा हूँ। इतना ही नहीं, मैं प्रभु ईसा मसीह को जानना सर्वश्रेष्ठ लाभ मानता हूँ और इस ज्ञान की तुलना में हर वस्तु को हानि ही मानता हूँ। उन्हीं के लिए मैंने सब कुछ छोड़ दिया है और उसे कूड़ा समझता हूँ, जिससे मैं मसीह को प्राप्त करूँ और उनके साथ पूर्ण रूप से एक हो जाऊँ। मुझे अपनी धार्मिकता का नहीं, जो संहिता के पालन से मिलती है, बल्कि उस धार्मिकता का भरोसा है, जो मसीह में विश्वास करने से मिलती है, जो ईश्वर से आती है और विश्वास पर आधारित है।” (फिलिप्पियों 3: 7-9)।


📚 REFLECTION

We often play the game called ‘Treasure Hunt’. In this game we are to make efforts to search for some specific material which is hidden somewhere in the campus. Some do not like to participate in such games since they demand a lot of efforts, while others are interested in confronting the assured but unknown certainty. When it is noticed that most of the players are unsuccessful in spite of their efforts, the one who conducts the game normally gives some clues. Then the players refocus their efforts based on the clues given and someone succeeds in finding the treasure.

The Gospel presents the Kingdom of God as a Treasure hidden in the field. By presenting the treasure as hidden, Jesus wants us to know that we need to first of all be aware of the preciousness and greatness of the treasure. The man in the Gospel is convinced of the existence of the treasure and that is why he sets out to search for it. He is hopeful in finding it. Then he makes effort to find it. It does not effortlessly come to him. He has to seek. At this stage he has to refocus his efforts to acquire that treasure, not getting diverted to other matters. He has to channelize every effort towards acquiring it. Once acquired, he needs to value it and ensure that it is never lost. Preservation also calls for efforts.

This is the reality of the Kingdom of God. We are to be convinced of the existence of such a treasure and set out to seek it and make every effort to find it. Once found, we need to value it and preserve it. We have to avoid distractions and diversions to have the possession of the treasure.

In another parable, Jesus compares the Kingdom of God to a merchant looking for fine pearls and finding one of great value he sells all his possessions to acquire that valuable treasure. The merchant is willing to give up all other pearls of lower value to acquire that newly found precious pearl.

In both these parables Jesus wants us to be aware the greatness of the Kingdom, to make every effort to acquire and preserve it. We should be willing to forego many of our little possessions and move out of our comfort zones for the sake of the Kingdom of God.

In the first reading, we find that Solomon was a humble seeker of God’s wisdom. He was focussed too. When the Lord said to him, “Ask what you would like me to give you”, he simply asked for “a heart to understand how to govern your people, how to discern between good and evil”. The Lord lavished upon him wisdom that he asked for and wealth and prosperity which he had not asked for. He was, no doubt, seeking a treasure. For sometime he valued that treasure; yet in the latter part of his life, he lost focus and began to seek passing pleasures of this world. Thus he lost the favour of the Lord.

St. Paul says, “Yet whatever gains I had, these I have come to regard as loss because of Christ. More than that, I regard everything as loss because of the surpassing value of knowing Christ Jesus my Lord. For his sake I have suffered the loss of all things, and I regard them as rubbish, in order that I may gain Christ and be found in him” (Phil 3:7-9).

The parable of the fishing net, reminds us of the reality of the final judgment when the righteous will inherit the Kingdom and the wicked will receive eternal punishment. Nothing unclean can enter heaven, because holiness and evil cannot co-exist just as light and darkness cannot co-exist.

 -Br. Biniush Topno

मनन-चिंतन

जब गिबओन में प्रभु रात को राजा सुलेमान को स्वप्न में दिखाई दिये और उन्होंने कहा, ‘‘बताओ, मैं तुम्हें क्या दे दूँ?’’ तब सुलेमान ने प्रभु से प्रभु की चुनी हुयी प्रजा पर न्यायपूर्वक शासन करने तथा भला तथा बुरा पहचान सकने के लिए विवेक माँगा। प्रभु इस बात पर बहुत प्रसन्न हुए कि सुलेमान ने अपने लिए न तो लम्बी आयु माँगी, न धन-सम्पत्ति और न अपने शत्रुओं का विनाश बल्कि न्याय करने का विवेक माँगा। इसलिए प्रभु ने सुलेमान को अतुलनीय बुद्धि और विवेक प्रदान किया। उसके साथ-साथ प्रभु ने उन्हें अतुलनीय धन-सम्पत्ति तथा ऐश्वर्य भी प्रदान किया, जिससे कोई भी राजा उनकी बराबरी नहीं कर पाये।

इब्राहीम ने ईश्वर से सोदम और गोमोरा के लोगों को बचाने के लिए ईश्वर से प्रार्थना की (दे. उत्पत्ति 18)। निर्गमन ग्रन्थ में हम यह पाते हैं कि मूसा बार-बार इस्राएलियों को विभिन्न संकटों से बचाने के लिए ईश्वर से प्रार्थना करते हैं। यूदीत और एस्तेर ने ईश्वर की प्रजा की सुरक्षा के लिए प्रभु से प्रार्थना की थी। दानिएल ने ईश्वर से ईश्वर के रहस्यों को जानने की कृपा माँगी। टोबीत, सारा और सुसन्ना ने अपने जीवन की निराशामय परिस्थिति में ईश्वर से राहत के लिए प्रार्थना की।

1 समुएल 1:1-17 में हम देखते हैं कि एल्काना नामक सूफ़वंशी मनुष्य की पत्नी अन्ना शिलो जाकर मन्दिर में दुःखी हो कर प्रभु से प्रार्थना करती है कि प्रभु उसे एक पुत्र प्रदान करे। वह प्रभु से वादा करती है कि अगर उसे एक पुत्र प्राप्त होगा तो वह उसे जीवन भर के लिए प्रभु को अर्पित करेगी।

सुसमाचार में हम देखते हैं कि कई लोग प्रभु येसु के पास आकर चंगाई के लिए या अपदूतों से छुटकारा पाने के लिए या किसी मृतक को जिलाने के लिए प्रार्थना करते हैं। मारकुस 10:37 में ज़बेदी के पुत्र याकूब और योहन प्रभु येसु से अपने राज्य की महिमा में उन दोनों को अपने साथ - एक को अपने दायें और एक को अपने बायें - बैठने देने की कृपा माँगते हैं’’।

अब हम ये प्रश्न उठा सकते हैं कि हम ईश्वर से क्या-क्या माँगते हैं। हममें से ज़्यादात्तर लोग अपने दैनिक जीवन की छोटी-मोटी ज़रूरतों की पूर्ति के लिए ही ईश्वर से वरदान माँगते हैं। कभी हम आर्थिक संकट से बचने के लिए कृपा माँगते हैं तो कभी नौकरी मिलने के लिए। कभी हम चंगाई की माँग करते हैं तो कभी हम बच्चों की अच्छी पढ़ाई के लिए मदद माँगते हैं।

ईश्वर सुलेमान की माँग पर प्रसन्न हुये। अब हम इस पर मनन चिंतन करें कि ईश्वर क्या चाहते हैं कि हम माँगे।

मत्ती 6:6-13 में प्रभु हमें समझाते हैं कि हमें लम्बी-लम्बी प्रार्थनाएँ कर अपनी माँगों को ईश्वर के समक्ष रखने की कोई ज़रूरत नहीं हैं क्योंकि हमारे माँगने पहले स्वर्गिक पिता जानते हैं कि हमंा किन-किन चीज़ों की ज़रूतत हैं। तत्प श्चात प्रभु शिष्यों से ईश्वर का नाम पवित्र माना जाने, ईश्वर का राज्य आने, ईश्वर की इच्छा इस पृथ्वी पर पूरी होने, प्रतिदिन का भोजन मिलने तथा बुराई से बचने के लिए प्रार्थना करना सिखाया।

मत्ती 9:37 में प्रभु येसु फ़सल के स्वामी से अपनी फ़सल काटने हेतु मज़दूरों को भेजने के लिए विनती करने को कहते हैं। लूकस 11:13 में प्रभु हमें अपने स्वर्गिक पिता से पवित्र आत्मा माँगने का आह्वान करते हैं। योहन 4:10 में प्रभु येसु समारी स्त्री को संजीवन जल के लिए प्रार्थना करने की सलाह देते हैं। प्रेरित-चरित 1 में हम अटारी में माता मरियम और येसु के प्रेरितों के साथ पवित्र आत्मा के आगमन के लिए प्राथना करने वाले करीब 120 लोगों के समुदाय को पाते हैं। प्रेरित-चरित 4:29-30 में हम देखते हैं विश्वासियों का समुदाय ईश्वर से निर्भीकता से वचन सुनाने तथा ईसा के नाम पर स्वास्थ्यलाभ, चिन्ह तथा चमत्कार प्रकट होने के लिए प्रार्थना करते हैं।

सूक्ति 30:7-9 में पवित्र वचन कहता है - “मैं तुझ से दो वरदान माँगता हूँ, उन्हे मेरे जीवनकाल में ही प्रदान कर। मुझ से कपट और झूठ को दूर कर दे। मुझे न तो गरीबी दे और न अमीरी- मुझे आवश्यक भोजन मात्र प्रदान कर। कहीं ऐसा न हो कि मैं धनी बन कर तुझे अस्वीकार करते हुए कहूँ ‘‘प्रभु कौन है?‘‘ अथवा दरिद्र बन कर चोरी करने लगूँ और अपने ईश्वर का नाम कलंकित कर दूँ।“

शोकगीत 2:18-21 में सारे हृदय से प्रभु, सियोन के रक्षक से आँसू दिन-रात नदी की तरह बहाते हुए हृदय की गहराई से अपने बच्चों के प्राण बचाने के लिए प्रभु के सामने हाथ उठा कर प्रार्थना करने का आह्वन है। संत योहन कहते हैं, ““हमें ईश्वर पर यह भरोसा है कि यदि हम उसकी इच्छानुसार उस से कुछ भी मांगते हैं, तो वह हमारी सुनता है”। (योहन 5:14)

इस प्रकार यह साफ है, प्रभु की इच्छा यह है कि हम निस्वार्थ भाव से आध्यात्मिक वरदानों के लिए प्रार्थना करें। सबसे बडी प्रार्थना ईश्वर की इच्छा को स्वीकार करने की हिम्मत पाने की पार्थना है। इसी प्रकार की प्रार्थना प्रभु येसु ने गेदसेमनी में की थी। हम विनती करें कि ईश्वर की कृपा से हम भी अपने दैनिक जीवन में ईश्वर की इच्छा सहर्ष स्वीकार कर पायें।

-ब्रो बिनीयुस टोपनो


25 जुलाई 2020 आज का पवित्र पाठ

25 जुलाई 2020
प्रेरित याकूब का पर्व

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पहला पाठ : 2 कुरिन्थियों 4:7-15

7) यह अमूल्य निधि हम में-मिट्टी के पात्रों में रखी रहती है, जिससे यह स्पष्ट हो जाये कि यह अलौकिक सामर्थ्य हमारा अपना नहीं, बल्कि ईश्वर का है।

8) हम कष्टों से घिरे रहते हैं, परन्तु कभी हार नहीं मानते, हम परेशान होते हैं, परन्तु कभी निराश नहीं होते।

9) हम पर अत्याचार किया जाता है, परन्तु हम अपने को परित्यक्त नहीं पाते। हम को पछाड़ दिया जाता है, परन्तु हम नष्ट नहीं होते।

10) हम हर समय अपने शरीर में ईसा के दुःखभोग तथा मृत्यु का अनुभव करते हैं, जिससे ईसा का जीवन भी हमारे शरीर में प्रत्यक्ष हो जाये।

11) हमें जीवित रहते हुए ईसा के कारण निरन्तर मृत्यु का सामना करना पड़ता है, जिससे ईसा का जीवन भी हमारे नश्वर शरीर में प्रत्यक्ष हो जाये।

12) इस प्रकार हम में मृत्यु क्रियाशील है और आप लोगों में जीवन।

13) धर्मग्रन्थ कहता है- मैंने विश्वास किया और इसलिए मैं बोला। हम विश्वास के उसी मनोभाव से प्रेरित हैं। हम विश्वास करते हैं और इसलिए हम बोलते हैं।

14) हम जानते हैं कि जिसने प्रभु ईसा को पुनर्जीवित किया, वही ईसा के साथ हम को भी पुनर्जीवित कर देगा और आप लागों के साथ हम को भी अपने पास रख लेगा।

15) सब कुछ आप लोगों के लिए हो रहा है, ताकि जिस प्रकार बहुतों में कृपा बढ़ती जाती है, उसी प्रकार ईश्वर की महिमा के लिए धन्यवाद की प्रार्थना करने वालों की संख्या बढ़ती जाये।

सुसमाचार : मत्ती 20:20-28

20) उस समय जेबेदी के पुत्रों की माता अपने पुत्रों के साथ ईसा के पास आयी और उसने दण्डवत् कर उन से एक निवेदन करना चाहा।

21) ईसा ने उस से कहा, ’’क्या चाहती हो?’’ उसने उत्तर दिया, ’’ये मेरे दो बेटे हैं। आप आज्ञा दीजिए कि आपके राज्य में एक आपके दायें बैठे और एक आपके बायें।’’

22) ईसा ने उन से कहा, ’’तुम नहीं जानते कि क्या माँग रहे हो। जो प्याला मैं पीने वाला हूँ, क्या तुम उसे पी सकते हो?’’ उन्होंने उत्तर दिया, ’’हम पी सकते हैं।’’

23) इस पर ईसा ने उन से कहा, ’’मेरा प्याला तुम पिओगे, किन्तु तुम्हें अपने दायें या बायें बैठने का अधिकार मेरा नहीं है। वे स्थान उन लोगों के लिए हैं, जिनके लिए मेरे पिता ने उन्हें तैयार किया है।’’

24) जब दस प्रेरितों को यह मालूम हुआ, तो वे दोनों भाइयों पर क्रुद्ध हो गये।

25) ईसा ने अपने शिष्यों को अपने पास बुला कर कहा, ’’तुम जानते हो कि संसार के अधिपति अपनी प्रजा पर निरंकुश शासन करते हैं और सत्ताधारी लोगों पर अधिकार जताते हैं।

26) तुम में ऐसी बात नहीं होगी। जो तुम लोगों में बडा होना चाहता है, वह तुम्हारा सेवक बने

27) और जो तुम में प्रधान होना चाहता है, वह तुम्हारा दास बने;

28) क्योंकि मानव पुत्र भी अपनी सेवा कराने नहीं, बल्कि सेवा करने तथा बहुतों के उद्धार के लिए अपने प्राण देने आया है।’’

📚 मनन-चिंतन - 1

हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां ज्यादातर लोग दूसरों के साथ व्यापार करते हैं। दूसरों के साथ व्यवहार करते समय हम अनजाने में ही अपने से पूछते हैं, कि ’मुझे क्या मिलेगा’। और जब हम यह सुनिश्चित करते हैं कि हम खोने से ज्यादा हासिल कर रहे हैं, तब हम लेन-देन करते हैं। नहीं तो, हम पीछे हट जाते हैं। वास्तव में, जब भी हम लोगों के सामने आते हैं, हम अपने अन्दर ही पूछते रहते हैं - मुझे क्या मिल सकता है? इससे पता चलता है कि हमारे अंदर स्वार्थ है। आज के सुसमाचार में, याकूब और योहन की माँ अपने बेटों के लिए येसु के राज्य में उनके दाहिने और बाएं की सीट सुनिश्चित करना चाहती है। अन्य सुसमाचारों में माँ का उल्लेख नहीं है, लेकिन दो शिष्य स्वयं येसु के पास जाते हैं। बाइबिल हमें बताती है कि अन्य दस शिष्यों ने इस बारे में सुना और इस पर वे दोनों भाइयों से नाराज थे। फिर भी, येसु जानते थे कि ऐसी इच्छा उनके सभी चेलों के दिल में थी। मत्ती 19:27 में, पेत्रुस येसु से पूछते हैं, “देखिए, हम लोग अपना सब कुछ छोड़ कर आपके अनुयायी बन गये हैं। तो, हमें क्या मिलेगा?” मत्ती 26:15 में हम देखते हैं कि यूदस महा याजकों के पास जाकर उनसे पूछता है, “यदि मैं ईसा को आप लोगों के हवाले कर दूँ, तो आप मुझे क्या देने को तैयार हैं?" बेशक, जब शिष्य यह जानना चाहते थे कि उनके समर्पण, बलिदान और अपमान के जीवन के बदले में उन्हें क्या मिलेगा, उनके अलग-अलग विचार थे।

प्रभु ईश्वर दाता हैं और वे देते रहते हैं। वे बदले में कुछ भी पाने की उम्मीद किए बिना देते रहते हैं। वे उदारता से देते रहते हैं। फिर भी हम अक्सर उनके दानों को प्राप्त करने में असमर्थ होते हैं। मत्ती 5:43-48 में येसु अपने शिष्यों से उदार बनने को कहते हैं जिस प्रकार स्वर्ग के पिता उदार हैं। वे चाहते हैं कि उनके शिष्य स्वर्ग में रहने वाले पिता के उदार प्रेम पर भरोसा रखें और उन पर विश्वास करें, जो देने में शानदार और अतुलनीय हैं।

 ब्रो बीनियूस टोपनो


📚 REFLECTION

We live in a world where most people do business with others. While dealing with others many of us unconsciously though asक ourselves ‘what will I get’. And when we are sure of gaining more than what we are losing, we transact. In fact, every time we come across people, we keep asking – what can I get? This shows that there is selfishness in us. In the Gospel today, we find the mother of James and John wanting to ensure the seats on the right and left of Jesus in his kingdom. Other Gospels do not mention the mother, but the two disciples themselves approaching Jesus. The Bible tells us that the other ten heard about this they were indignant with the two brothers. Yet, Jesus knew that such a desire was in the heart of all his disciples. In Mt 19:27, Peter asks Jesus,“Look, we have left everything and followed you. What then will we have?” In Mt 26:15 we see Judas asking the chief priests, “What will you give me if I betray him to you?” Of course, the disciples had different concerns when they wanted to find out what they would get in return for their life of dedication, detachment, sacrifices and humiliation.

The Lord is a giver and He keeps giving. He keeps giving without expecting anything in return. He keeps giving generously. It is often we who are unable to receive. In Mt 5:43-48 Jesus asks his disciples to be generous as the Heavenly Father is generous. He wants his disciples to concentrate on giving themselves and trust in the generous love of the Heavenly Father who is magnanimous and incomparable in giving.

 -Br. Biniush Topno


24 जुलाई 2020 का बाइबल पाढ़

24 जुलाई 2020
वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह, शुक्रवार

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पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 3:14-17

14) प्रभु यह कहता हैः “विद्रोही पुत्रो! मेरे पास लौट आओ। मैं ही तुम्हारा स्वामी हूँ। मैं तुम लोगों को, सब नगरों और राष्ट्रों से निकाल कर, सियोन में वापस ले आऊँगा।

15) में तुम्हें अपने मन के अनुकूल चरवाहों को प्रदान करूँगा, जो विवेक और बुद्धिमानी से तुम्हें चरायेंगे।“

16) प्रभु यह कहता हैः “जब देश में तुम लोगों की संख्या बहुत बढ़ेगी और तुम्हारी बड़ी उन्नति होगी, तब कोई प्रभु के विधान की मंजूषा की चरचा नहीं करेगा। कोई उसे याद नहीं करेगा। किसी को उसका अभाव नहीं खटकेगा और उसके स्थान पर कोई दूसरी मंजूषा नहीं बनायी जायेगी।

17) उस समय येरुसालेम ’प्रभु का सिंहासन’ कहलायेगा। सभी राष्ट्र प्रभु के नाम पर येरुसालेम में एकत्र हो जायेंगे। वे फिर कभी अपने दुष्ट और हठीले हृदय की वासनाओं के अनुसार नहीं चलेंगे।

सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 13:18-23

18) ’’अब तुम लोग बोने वाले का दृष्टान्त सुनो।

19) यदि कोई राज्य का वचन सुनता है, लेकिन समझता नहीं, तब उसके मन में जो बोया गया है, उसे शैतान आ कर ले जाता हैः यह वह है, जो रास्ते के किनारे बोया गया है।

20) जो पथरीली भूमि मे बोया गया है, यह वह है, जो वचन सुनते ही प्रसन्नता से ग्रहण करता है;

21) परन्तु उस में जड़ नहीं है, और वह थोड़े ही दिन दृढ़ रहता है। वचन के कारण संकट या अत्याचार आ पड़ने पर वह तुरन्त विचलित हो जाता है।

22) जो काँटों में बोया गया हैः यह वह है, जो वचन सुनता है; परन्तु संसार की चिन्ता और धन का मोह वचन को दबा देता है और वह फल नहीं लाता।

23) जो अच्छी भूमि में बोया गया हैः यह वह है, जो वचन सुनता और समझता है और फल लाता है, कोई सौ गुना, कोई साठ गुना, और कोई तीस गुना।’’

📚 मनन-चिंतन - 1

बोने वाले का ज़िक्र करते हुए, प्रभु येसु मानव हृदय में ईश्वर के भले कार्य की बात कर रहे थे। ग्रहणशीलता और अनुकूल परिस्थितियों के आधार पर, भलाई का बीज मानव हृदय में बढ़ता है। मानव-उद्धार ईश्वर और मनुष्य का एक संयुक्त उद्यम है। ईश्वर मुक्ति प्रदान करता है और मनुष्य को सचेत रूप से इसे ग्रहण करना चाहिए और इसे अपने जीवन में फल लाने देना चाहिए। मानव हृदय, रास्ते के किनारे के समान हो सकता है - बहुत अधिक चिंताओं, बहुत सारी दिशाओं और अल्पकालिक प्रतिबद्धता के साथ व्यस्त। यह पथरीली जमीन की तरह हो सकता है – असंवेदनशील, कठोर और अभेद्य। यह शारीरिक वासनाओं तथा सांसारिक मोहमाया से भरे कांटेदार क्षेत्र की तरह भी हो सकता है। लेकिन अच्छी मिट्टी वांछनीय है, जहां भलाई के लिए ग्रहणशीलता है और ईश्वर के वचन को अंकुरित होने, बढ़ने और फल लाने के लिए अनुकूल वातावरण है। हमें ईश्वर के वचन के लिए अपने हृदयों को तैयार करना चाहिए। यिरमियाह 4: 3-4 में, प्रभु कहते हैं, "अपनी पड़ती ज़मीन को जोतो और काँटों में बीज मत बोओ। यूदा के लोगों और येरूसालेम के निवासियों! प्रभु के लिए अपने शरीर और अपने हृदय का ख़तना करो। नहीं तो तुम्हारे कुकर्मों के कारण मेरा क्रोध आग की तरह भड़क उठेगा और कोई उसे बुझाने में समर्थ नहीं होगा।” यहाँ यह स्पष्ट है कि संदर्भ मानव हृदय का है। नबी होशेआ कहते हैं, “तुम धार्मिकता बोओ, तो भक्ति लुनोगे। अपनी परती भूमि जोतो, क्योंकि समय आ गया है। प्रभु को तब तक खोजते रहो, जब तक वह आ कर धार्मिकता न बरसाये।” (होशेआ 10:12)। एज्रा के बारे में, यह कहा जाता है कि उन्होंने "प्रभु की संहिता के अध्ययन में, उसके पालन और इस्राएल की विधियों और रीति-रिवाजों की शिक्षा में मन लगाया था" (एज्रा 7:10)। हम अपने आप से सवाल करें - क्या मैंने अपने दिल को ईश्वर के जीवन्त वचन के लिए तैयार किया है?

 -ब्रो बीनियुस टोपनो


📚 REFLECTION

While speaking about the sower, Jesus was referring to God sowing goodness in human heart. Depending on receptivity and conducive circumstances the seed of goodness grows in human heart. Human salvation is a joint venture. God offers salvation and man has to consciously receive it and allow it to bear fruit in his life. Human heart can be like the wayside – busy with too many concerns, too many directions and wavering commitment. It can be like the rocky ground – devoid of sensitivity, hardened and impenetrable. It can be like the thorny field full of desires of flesh and worldly ambitions. But the desirable sort is good soil where there is receptivity to goodness and a favorable ambience for the Word of God to germinate, grow and bear fruit. We need to prepare our hearts for the Word of God. In Jer 4:3-4, the Lord says, “Break up your fallow ground, and do not sow among thorns. Circumcise yourselves to the Lord, remove the foreskin of your hearts, O people of Judah and inhabitants of Jerusalem, or else my wrath will go forth like fire, and burn with no one to quench it, because of the evil of your doings.” It is evident here that the reference is to the human heart. Prophet Hosea says, “Sow for yourselves righteousness; reap steadfast love; break up your fallow ground; for it is time to seek the Lord, that he may come and rain righteousness upon you.” (Hos 10:12). About Ezra, it is said that he “had set his heart to study the law of the Lord, and to do it, and to tea huwach the statutes and ordinances in Israel” (Ezra 7:10). Have I prepared my heart for the Living Word?

 -Bro Biniush Topno



23 july Bible Reading

GOSPELTOONS

जुलाई    2020

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23 जुलाई 2020
वर्ष का सोलहवाँ सामान्य सप्ताह, गुरुवार

अथवा - मरियम मगदलेना– त्योहार

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पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 2:1-3,7-8,12-13

1) प्रभु की वाणी मुझे यह कहते हुए सुनाई पड़ी -

2) “जाओ और येरुसालेम को यह सन्देश सुनाओ। प्रभु यह कहता हैः मुझे तेरी जवानी की भक्ति याद है, जब तू मुझे नववधू की तरह प्यार करती थी। तू मरुभूमि में, बंजर भूखण्ड में मेरे पीछे-पीछे चलती थी।

3) उस समय इस्राएल प्रभु की अपनी पवित्र वस्तु था, उसकी फ़सल के प्रथम फल। जो उस में कुछ लेने का साहस करते थे, उन्हें दण्ड दिया जाता था, उन पर विपत्ति आ पड़ती थी।“ यह प्रभु की वाणी है।

7) में तुम लोगों को एक उपजाऊ भूमि में ले आया। मैंने तुम्हें उसके उत्तम फलों से तृप्त किया। किन्तु तुम लोगों ने उस में प्रवेश करते हुए उसे अपवत्रि कर दिया, जिससे मुझे अपनी विरासत से घृणा हो गयी है।

8) याजकों को प्रभु की कोई चिन्ता नहीं थी। संहिता के शास्त्री मेरी कोई परवाह नहीं करते थे। शासक मेरे विरुद्ध विद्रोह करते थे। नबी, बाल के नबी बन कर, ऐसे देवताओं के अनुयायी हो जाते थे, जिन से कोई लाभ नहीं।“

12) आकाश इस पर आश्चर्य करे और विस्मित हो कर काँपें।“ यह प्रभु की वाणी है।

13) “मेरी प्रजा ने दो अपराध कर डालेः उसने मुझे, संजीवन जल के स्त्रोत को त्याग दिया और अपने लिए ऐसे कुण्ड बनाये, जिन में दरारें हैं और जिन में पानी नहीं ठहरता।

सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 13:10-17

10) ईसा के शिष्यों ने आ कर उन से कहा, ’’आप क्यों लोगों को दृष्टान्तों में शिक्षा देते हैं?‘‘

11) उन्होंने उत्तर दिया, ’’यह इसलिए है कि स्वर्गराज्य का भेद जानने का वरदान तुम्हें दिया गया है, उन लोगों को नहीं;

12) क्योंकि जिसके पास कुछ है, उसी को और दिया जायेगा और उसके पास बहुत हो जायेगा। लेकिन जिसके पास कुछ नहीं है, उससे वह भी ले लिया जायेगा, जो उसके पास है।

13) मैं उन्हें दृष्टान्तों में शिक्षा देता हूँ, क्योंकि वे देखते हुए भी नहीं देखते और सुनते हुए भी न सुनते और न समझते हैं।

14) इसायस की यह भविष्यवाणी उन लोगों पर पूरी उतरती है- तुम सुनते रहोगे, परन्तु नहीं समझोगे। तुम देखते रहोगे, परन्तु तुम्हें नहीं दिखेगा;

15) क्योंकि इन लोगों की बुद्धि मारी गई है। ये कानों से सुनना नहीं चाहते; इन्होंने अपनी आँख बंद कर ली हैं। कहीं ऐसा न हो कि ये आँखों से देख ले, कानों से सुन लें, बुद्धि से समझ लें, मेरी ओर लौट आयें और मैं इन्हें भला चंगा कर दूँ।

16) परन्तु धन्य हैं तुम्हारी आँखें, क्योंकि वे देखती हैं और धन्य हैं तुम्हारे कान, क्योंकि वे सुनते हैं!

17) मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- तुम जो बातें देख रहे हो, उन्हें कितने ही नबी और धर्मात्मा देखना चाहते थे; परन्तु उन्होंने उन्हें नहीं देखा और तुम जो बातें सुन रहो, वे उन्हें सुनना चाहते थे, परन्तु उन्होंने उन्हें नहीं सुना।

📚 मनन-चिंतन - 1

प्रभु येसु ने स्वर्गिक रहस्यों को स्पष्ट करने के लिए साधारण सांसारिक जीवन की कहानियों और घटनाओं का उपयोग किया। उन्होंने मछली पकड़ने, खेती, चरवाहे, निर्माण-कार्य और शासन के बारे में बात की। उन्होंने बीज, फूल, पक्षी, रोटी, दाखबारी, भोज, यात्रा आदि का जिक्र किया। जो लोग गहराई में जाने की जहमत नहीं उठाते थे, उनके लिए ये बातें सामान्य कहानियाँ और घटनाएँ थीं। लेकिन जो लोग छिपे हुए रहस्यों को सीखने में रुचि रखते थे, उनके लिए वे साधारण कहानियों में प्रस्तुत किए गए शाश्वत सत्य थे। रहस्यों को समझने के लिए कई परतें हैं। केवल उन लोगों के लिए जो इन रहस्यों को गहराई से समझने में रुचि रखते हैं, स्पष्टीकरण सार्थक होंगे। येसु द्वारा सुनाये गये दृष्टान्त और उनके स्पष्टीकरणों को सुनने वाले शिष्य भाग्यशाली थे। ईश्वरीय रहस्य अक्षय हैं। जितना अधिक आप ध्यान-मनन्‍ करते हैं, उतना ही आप समझ पाते हैं। आप जितना गहराई में जाते हैं, आपको हर बार अधिक ज्ञान मिलता है। हर बार आप सीखते हैं, तो आप महसूस करते हैं कि आपके पास सीखने के लिए बहुत कुछ है। पुराने विधान में नये विधान की घटनाओं की छाया है। नये विधान में पुराना विधान पूरा हो गया है। इसलिए येसु ने अपने शिष्यों से कहा, “धन्य हैं तुम्हारी आँखें, क्योंकि वे देखती हैं और धन्य हैं तुम्हारे कान, क्योंकि वे सुनते हैं! मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ - तुम जो बातें देख रहे हो, उन्हें कितने ही नबी और धर्मात्मा देखना चाहते थे; परन्तु उन्होंने उन्हें नहीं देखा और तुम जो बातें सुन रहे हो, वे उन्हें सुनना चाहते थे, परन्तु उन्होंने उन्हें नहीं सुना।” (मत्ती 13: 16-17)। ईश्वर का देहधारण इतिहास की सबसे महान तथा अनोखी घटना थी। स्वाभाविक रूप से, जिन्होंने उस घटना को देखा और महसूस किया, वे सौभाग्यशाली हैं। यह रहस्य हमारे सामने है। यह सदा के लिए महत्व रखता है। हम इस रहस्य के सामने निष्क्रिय नहीं हो सकते हैं।



📚 REFLECTION

Jesus used stories and events from ordinary earthly life to elucidate heavenly mysteries. He spoke about fishing, farming, shepherding, building and governing. He referred to seeds, flowers, birds, bread, vineyards, banquets, journey and so forth. For those who did not bother to go deeper, they were ordinary stories and events. But for those who were interested in learning the hidden mysteries, they were eternal truths presented in ordinary stories. Mysteries have many layers to understand. Only for those who are interested in delving deep into these mysteries, the explanations will be meaningful. The disciples were fortunate to listen to the parables narrated by Jesus and their explanations. The divine mysteries are inexhaustible. The more you meditate, the more you grasp. The deeper you go, you find greater wisdom every time. Every time you learn, you realise that you have much more to learn. In the Old Testament we have shadows of many New Testament events. Hence the Old Testament is fulfilled in the New. That is why Jesus told his disciples, “But blessed are your eyes, for they see, and your ears, for they hear. Truly I tell you, many prophets and righteous people longed to see what you see, but did not see it, and to hear what you hear, but did not hear it.” (Mt 13:16-17). Incarnation was a unique event in history and the greatest. Naturally, those who witnessed that event and realized its significance were fortunate. We have this mystery revealed to us in history with the testimony of those who heard, saw and touched the Incarnate Word or the Word made flesh or God in human form. It has implications for all times to come. We cannot be inactive in the face of this mystery.

 -Be, Biniush Topno