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पुण्य शुक्रवार † अप्रैल 18, 2025*

 *✞ GOD'S WORD ✞*

 *CATHOLIC BIBLE MINISTRY* 

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*अप्रैल 18, 2025*


† *पुण्य शुक्रवार* †



*पहला पाठ*


_मनुष्य दुःख-तकलीफ का कारण नहीं समझता है। येसु हमें दुःख-सम्बन्धी दर्शनशास्त्र देने नहीं आये। वह हमें दुःख पर विजय प्राप्त करने की शक्ति प्रदान करने आये हैं। उनका उदाहरण देख कर हम समझ सकते हैं कि स्वर्ग के रास्ते में दुःख बाधक नहीं, बल्कि सहायक है।_


*नबी इसायस का ग्रंथ 52:13-53:12*


_“हमारे पापों के कारण वह छेदित किया गया।”_



देखो! मेरे सेवक का नाम फैल जायेगा; वह महिमान्वित किया जायेगा और अत्यन्त महान्‌ होगा। उसकी आकृति इतनी विरूपित की गयी थी कि वह मनुष्य नहीं जान पड़ता था; लोग देख कर दंग रह गये थे। उसी की ओर बहुत-से राष्ट्र आश्चर्य-चकित हो कर देखेंगे और उसी के सामने राजा मौन रहेंगे। क्योंकि उनके सामने एक आपूर्व दृश्य आ जायेगा और जो बात कभी सुनने में नहीं आयी, वे उसे अपनी आँखों से देखेंगे। कौन हमारे संदेश पर विश्वास करेगा? प्रभु का सामर्थ्य किस पर प्रकट हुआ है? वह हमारे सामने एक छोटे-से पौधे की तरह, सूखी भूमि की जड़ की तरह बढ़ गया। हमने उसे देखा था, उस में न तो सुन्दरता थी, न तेज और न कोई आकर्षण ही था। वह मनुष्यों द्वारा निन्दित और तिरस्कृत था, शोक का मारा और अत्यन्त दुःखी था। लोग जिन्हं देख कर मुँह फेर लेते हैं, उन्हीं की तरह वह तिरस्कृत और तुच्छ समझा जाता था। परन्तु वह हमारे ही रोगों को अपने ऊपर लेता था। और हमारे ही दुःखों से लदा हुआ था। और हम उसे दण्डित, ईश्वर का मारा हुआ और तिरस्कृत समझते थे। हमारे पापों के कारण वह छेदित किया गया; हमारे कुकर्मों के कारण वह कुचल दिया गया है। जो दण्ड वह भोगता था, उसके द्वारा हमें शांति मिली है और उसके घावों द्वारा हम भले-चंगे हो गये हैं। हम सब अपना-अपना रास्ता ले कर भेड़ों की तरह भटंक रहे थे। उसी पर प्रभु ने हम सबों के पापों का भार डाल दिया। वह अपने पर किया हुआ अत्याचार धैर्य से सहता गया और चुप रहा। वध के लिए ले जाये जाने वाले मेमने की तरह और ऊन कतरने वाले के सामने चुप रहने वाली भेड़ की तरह उसने अपना मुँह नहीं खोला। वे उसे बन्दीगृह और अदालत को ले गये; कोई भी उसकी परवाह नहीं करता था। वह जीवितों के बीच में से उठा लिया गया है और हमारे पापों के कारण वह मार डाला गया है। यद्यपि उसने कोई अन्याय नहीं किया था। और उसके मुँह से कभी छल-कपट की बात नहीं निकली थी किन्तु उसकी कब्र विधर्मियों के बीच बनायी गयी है और वह पापियों के साथ दफ़नाया गया है। प्रभु ने चाहा कि वह दुःख से रौंदा जाये। उसने प्रायश्चित के रूप में अपना जीवन अर्पित किया; इसलिए उसका वंश बहुत दिनों तक बना रहेगा और उसके द्वारा प्रभु की इच्छा पूरी होगी। वह अपने दुःखभोग का परिणाम देख कर सन्तुष्ट होगा। उसने दुःख सह कर जिन लोगों का अधर्म अपने ऊपर ले लिया था, वह उन्हें उनके पापों से मुक्त करेगा। इसलिए मैं उसे विरासत के रूप में बहुतों को प्रदान कंरूँगा और वह शक्तिशाली राजाओं के साथ लूट का माल बाँट लेगा। क्योंकि उसने बहुतों के अपराध अपने ऊपर लेते हुए और पापियों के लिए प्रार्थना करते हुए अपने को बलि चढ़ा दिया और उसकी गिनती कुकर्मियों में हुई।


प्रभु की वाणी।

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*भजन*

स्तोत्र 30:2,6,12-13,15-17,25


*अनुवाक्य : हे पिता! मैं अपनी आत्मा को तेरे हाथों सौंप देता हूँ।*


1. हेप्रभु! मैं तेरी शरण में आया हूँ! मुझे कभी निराश न होने दे। तू सत्यप्रतिज्ञ है, मेरा उद्धार कर। मैं अपनी आत्मा को तेरे हाथों सौंप देता हूँ। हे प्रभु! तू ही मेरा उद्धार करेगा।


2. मेरे विरोधी मेरा उपहास करते हैं; मेरे पड़ोसी मुझ से घृणा करते हैं; मेरे परिचित मुझ से डर जाते हैं। जो मुझे रास्ते में देखते हैं, वे भाग जाते हैं। मैं मुरदे की तरह भुला दिया गया हूँ; टूटे घड़े की तरह फेंक दिया गया हूँ।


3. हे प्रभु! तुझ पर ही मेरा भरोसा है। मैंने कहा - तू ही मेरा ईश्वर है। तेरे ही हाथों मेरा भाग्य है। शत्रुओं और अत्याचारियों से मुझे बचा।


4. अपने सेवक पर दयादृष्टि कर। तू दयासागर है, मुझे बचाने की कृपा कर। जो प्रभु पर भरोसा रखते हैं, वे सब के सब साहसपूर्वक ढारस रखें।

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 *दूसरा पाठ* 


_येसु ने हमें इतना प्यार किया कि वह हमारे लिए मनुष्य बन गये और क्रूस पर मर गये। हम उनके प्रेम पर दृढ़तापूर्वक विश्वास करें। हम उनकी सहायता से अपना दुःख धीरज के साथ सह सकेंगे।_


*इब्रानियों के नाम पत्र 4:14-16; 5:7-9*


_“उन्होंने आज्ञापालन सीख लिया और वह उन सबों के लिए मुक्ति का स्त्रोत बन गये, जो उनकी आज्ञाओं का पालन करते हैं।”_


भाइयो! हमारे एक अपने महान्‌ सहायक हैं, अर्थात्‌ ईश्वर के पुत्र येसु, जो स्वर्ग पहुँच गये हैं। इसलिए हम अपने विश्वास में सुदृढ़ रहें। हमारे महायाजक हमारी दुर्बलताओं में हम से सहानुभूति रख सकते हैं क्योंकि पाप को छोड़ कर सभी बातों में हमारी ही तरह उनकी परीक्षा ली गयी है। इसलिए हम भरोसे के साथ अनुग्रह के सिंहासन के पास जायें जिससे हमें दया मिल जाये और हम वह कृपा प्राप्त करें जो हमारी आवश्यकताओं में हमारी सहायता करेगी। येसु ने इस पृथ्वी पर रहते समय पुकार-पुकार कर और आँसू बहा कर ईश्वर से, जो उन्हें मृत्यु से बचा सकता था, प्रार्थना और अनुनय-विनय की है। श्रद्धालुता के कारण उनकी प्रार्थना सुनी गयी। ईश्वर का पुत्र होने पर भी उन्होंने दुःख सह कर आज्ञापालन सीख लिया। वह पूर्ण रूप से सिद्ध बन कर उन सबों के लिए अनन्त मुक्ति का स्रोत बन गये, जो उनकी आज्ञाओं का पालन करते हैं।


प्रभु की वाणी।

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*जयघोष*

फ़िल० 2:8-9

मसीह हमारे लिए मरण तंक, हाँ क्रूस के मरण तक, आज्ञाकारी बने। इसलिए ईश्वर ने उन को महान्‌ बना दिया है और उन को वह नाम प्रदान किया है, जो सब नामों में श्रेष्ठ है।

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 *सुसमाचार* 


*योहन के अनुसार प्रभु येसु का दुःखभोग 18:1-19,42*


येसु अपने शिष्यों के साथ केद्रोन नाले के उस पार गये। वहाँ एक बारी थी; उन्होंने अपने शिष्यों के साथ उस में प्रवेश किया। उनके विश्वासघाती यूदस को भी वह जगह मालूम थी, क्योंकि येसु अकसर अपने शिष्यों के साथ वहाँ गये थे। इसलिए यूदस पलटन और महायाजकों तथा फरीसियों के भेजे हुए प्यादों के साथ वहाँ आ पहुँचा। वे लोग लालटेनें, मशालें और हथियार लिये थे। येसु, यह जान कर कि मुझ पर क्या-क्या बीतेगी, आगे बढ़े और उन से बोले, “किसे ढूँढ़ते हो!” उन्होंने उत्तर दिया, "'येसु नाजरी को"। येसु ने उन से कहा, “मैं ही हूँ”। वहाँ उनका विश्वासघाती यूदस भी उन लोगों के साथ खड़ा था। जब येसु ने उन से कहा, “मैं ही हूँ”। तो वे पीछे हट कर भूमि पर गिर पड़े। येसु ने उन से फिर पूछा, “किसे ढूँढ़ते हो?” वे बोले, “'येसु नाजरी को “। इस पर येसु ने कहा, “'मैं तुम लोगों से कह चुका हूँ कि मैं ही हूँ। यदि तुम मुझे ढूँढ़ते हो, तो इन्हें जाने दो”। यह इसलिए हुआ कि उनका यह कथन पूरा हो जाये - तूने जिन्हें मुझे सौंपा है, मैंने उन में से एक का भी सर्वनाश नहीं होने दिया। उस समय सिमोन पेत्रुस ने अपनी तलवार खींच ली और प्रधानयाजक के नौकर पर चला कर उसका दाहिना कान उड़ा दिया। उस नौकर का नाम मलकुस था। येसु ने पेत्रुस से कहा, 'तलबवार म्यान में कर लो। जो प्याला पिता ने मुझे दिया है, क्या मैं उसे नहीं पिउँ!” तब पलटन, कप्तान और यहूदियों के प्यादों ने येसु को पकड़ कर बाँध लिया। वे उन्हें पहले अन्नास के यहाँ ले गये, क्योंकि वह उस वर्ष के प्रधानयाजक कैफस का ससुर था। यह वहीं कैफस था, जिसने यहूदियों को यह परामर्श दिया था - अच्छा यही है कि राष्ट्र के लिए एक ही मनुष्य मर जाये। सिमोन पेत्रुस और एक दूसरा शिष्य येसु के पीछे-पीछे चले। यह शिष्य प्रधानयाजक का परिचित था और येसु के साथ प्रधानयाजक के प्रांगण में चला गया, किन्तु पेत्रुस फाटक के पास बाहर खड़ा रहा। इसलिए वह दूसरा शिष्य, जो प्रधानयाजक का परिचित था, फिर बाहर गया और द्वारपाली से कह कर पेत्रुस को भीतर ले आया। द्वारपाली ने पेत्रुस से कहा, “कहीं तुम भी तो उस मनुष्य के शिष्य नहीं हो?” उसने उत्तर दिया, “नहीं हूँ। जाड़े के कारण नौकर और प्यादे आग सुलगा कर ताप रहे थे। पेत्रुस भी उनके साथ आग तापने लगा। प्रधानयाजक ने येसु से उनके शिष्यों और उनकी शिक्षा के विषय में पूछा। येसु ने उत्तर दिया, “मैं संसार के सामने प्रकट रूप से बोला हूँ। मैंने सदा सभागृह और मंदिर में, जहाँ सब यहूदी एकत्र हुआ करते हैं, शिक्षा दी है; मैंने गुप्त रूप से कुछ नहीं कहा। यह आप मुझ से क्यों पूछते हैं? उन से पूछ लीजिए, जिन्होंने मेरी शिक्षा सुनी है; वे जानते हैं कि मैंने क्या कहा है।” इस पर पास खड़े प्यादों में से एक ने येसु को थप्पड़ मार कर कहा, “तुम प्रधानयाजक को इस तरह जवाब देते हो?” येसु ने उस से कहा, “यदि मैंने गलत कहा, तो गलती बता दो; और यदि ठीक कहा, तो मुझे क्यों मारते हो?” इसके बाद अन्नास ने बाँधे हुए येसु को प्रधानयाजक कैफस के पास भेज दिया सिमोन पेत्रुस उस समय आग ताप रहा था। कुछ लोगों ने उस से कहा, “कहीं तुम भी तो उसके शिष्य नहीं हो?” उसने अस्वीकार करते हुए कहा, “नहीं हूँ”। प्रधानयाजक का एक नौकर उस व्यक्ति का संबंधी था जिसका कान पेत्रुस ने उड़ा दिया था। उसने कहा, “क्या मैंने तुम को उसके साथ बारी में नहीं देखा था?” पेत्रुस ने फिर अस्वीकार किया और उसी क्षण मुरगे ने बाँग दी। तब वे येसु को कैफस के यहाँ से राज्यपाल के भवन ले गये। अब भोर हो गया था । उन्होंने इसलिए भवन में प्रवेश नहीं किया कि वे अशुद्ध न हो जायें बल्कि पास्का का मेमना खा सकें। पिलातुस बाहर आ कर उन से मिला और बोला, “आप लोग इस मनुष्य पर कौन-सा अभियोग लगाते हैं?” उन्होंने उत्तर दिया, “यदि यह कुकर्मी नहीं होता, तो हमने इसे आपके हवाले नहीं किया होता”। पिलातुस ने उन से कहा, “आप लोग इसे ले जाइए, और अपनी संहिता के अनुसार इसका न्याय कीजिए। यहूदियों ने उत्तर दिया, “हमें किसी को प्राणदण्ड देने का अधिकार नहीं है”। यह इसलिए हुआ कि येसु का वह कथन पूरा हो जाये, जिसके द्वारा उन्होंने संकेत किया था कि उनकी मृत्यु किस प्रकार की होगी। तब पिलातुस ने भवन में वापस जा कर येसु को बुला भेजा और उन से कहा, “क्या तुम यहूदियों के राजा हो?” येसु ने उत्तर दिया, “क्या आप यह अपनी ओर से कहते हैं या दूसरों ने आप से मेरे विषय में यह कहा है?” पिलातुस ने कहा, “क्या मैं यहूदी हूँ? तुम्हारे ही लोगों ने और महायाजकों ने तुम्हें मेरे हवाले कर दिया है; तुमने क्या किया है?” येसु ने उत्तर दिया, “मेरा राज्य इस संसार का नहीं है। यदि मेरा राज्य इस संसार का होता, तो मेरे अनुयायी लड़ते और मैं यहूदियों के हवाले नहीं किया जाता। परन्तु मेरा राज्य यहाँ का नहीं है।” इस पर पिलातुस ने उन से कहा, “तो, तुम राजा हो?” येसु ने उत्तर दिया, “आप ठीक कहते हैं। मैं राजा हूँ। में इसलिए जन्मा और इसलिए संसार में आया हूँ कि सत्य के विषय में साक्ष्य दूँ। जो सत्य के पक्ष में है, वह मेरी सुनता है”। पिलातुस ने उन से कहा, “सत्य क्या है?” वह यह कह कर फिर बाहर गया और यहूदियों के पास आ कर उसने उन से कहा, “मैं तो उस में कोई भी दोष नहीं पाता हूँ, लेकिन तुम्हारे लिए पास्का के अवसर पर एक बन्दी को रिहा करने की प्रथा है। क्या तुम लोग चाहते हो कि मैं तुम्हारे लिए यहूदियों के राजा को रिहा कर दूँ?” इस पर वे फिर चिल््ला ने लगे, “इसे नहीं; बराब्बस को”। बराब्बसं तो डाकू था। तब पिलातुस ने येसु को ले जा कर कोडे लगाने का आदेश दिया। सैनिकों ने काँटों का मुकुट गूँथ कर उनके सिर पर रख दिया और उन्हें बैंगनी कपड़ा पहनाया। फिर वे उनके पास आ-आ कर कहने लगे, “यहूदियों के राजा, प्रणाम।” और वे उन्हें थप्पड़ मारते जाते थे। पिलातुस ने फिर बाहर जा कर लोगों से कहा, “देखो, मैं उसे तुम लोगों के सामने बाहर ले आता हूँ, जिससे तुम यह जान लो कि मैं उस में कोई भी दोष नहीं पाता हूँ”। तब येसु काँटों का मुकुट और बैंगनी कपड़ा पहने बाहर आये। पिलातुस ने लोगों से कहा, “यही है वह मनुष्य!” महायाजक और प्यादे उन्हें देखते ही चिल्ला उठे, “इसे क्रूस दीजिए! इसे क्रूस दीजिए!” पिलातुस ने उन से कहा, “तुम्हीं इसे ले जाओ और क्रूस पर चढ़ाओ। मैं तो इस में कोई भी दोष नहीं पाता”। यहूदियों ने उत्तर दिया, “हमारी एक संहिता है और उस संहिता के अनुसार यह प्राणदण्ड के योग्य है, क्योंकि इसने ईश्वर का पुत्र होने का दावा किया है”। पिलातुस यह सुन कर और भी डर गया। उसने फिर भवन के अन्दर जा कर येसु से पूछा, “तुम कहाँ के हो?” किन्तु येसु ने उसे कोई उत्तर नहीं दिया। इस पर पिलातुस ने उन से कहा, “तुम मुझ से क्यों नहीं बोलते? क्या तुम यह नहीं जानते कि मुझे तुम को रिहा कर देने का भी अधिकार है और तुम को क्रूस पर चढ़वाने का भी?” येसु ने उत्तर दिया, “यदि आप को ऊंपर से अधिकार न दिया गया होता, तो आपका मुझपर कोई अधिकार नहीं होता। इसलिए जिसने मुझे आपके हवाले कर दिया है, वह अधिक दोषी है।” उस समय से पिलातुस येसु को मुक्त करने का उपाय ढूँढ़ने लगा, परन्तु यहूदी चिल्ला कर कहने लगे, “यदि आप इसे रिहा करते हैं, तो आप कैसर के हितैषी नहीं हैं। जो अपने को राजा कहता है, वह कंसर का विरोध करता है”। यह सुन कर पिलातुस ने येसु को बाहर ले आने का आदेश दिया। वह अपने न्यायासन पर उस जगह, जो लिथोसत्रोतोस और इब्रानी में गब्बथा कहलाती है, बैठ गया। पास्का की तैयारी का दिन था। लगभग दोपहर का समय था। पिलातुस ने यहूदियों से कहा, “यही है तुम्हारा राजा!” इस पर वे चिल्ला उठे, “ले जाइए! ले जाइए! इसे क्रूस दीजिए!” पिलातुस ने उन से कहा, “क्या मैं तुम्हारे राजा को क्रूस पर चढ़वा दूँ?” महायाजकों ने उत्तर दिया, “'कैसर के सिवा हमारा कोई राजा नहीं!” तब पिलातुस ने येसु को क्रूस पर चढ़ाने के लिये उनके हवाले कर दिया । वे येसु को ले गये और वह अपना क्रूस ढोते हुए ’खोपड़ी की जगह' नामक स्थान गये; इब्रानी में उसका नाम गोलगोथा है। वहाँ उन्होंने येसु को और उनके साथ और दो व्यक्तियों को क्रूस पर चढ़ाया; एक को इस ओर, दूसरे को उस ओर और बीच में येसु को। पिलातुस ने एक दोषपत्र भी लिखवा कर क्रूस पर लगवा दिया। वह इस प्रकार था - येसु नाजरी, यहूदियों का राजा। बहुत-से यहूदियों ने यह दोषपत्र पढ़ा; क्योंकि वह स्थान, जहाँ येसु क्रूस पर चढ़ाये गये थे, शहर के पास ही था और दोषपत्र इब्रानी, लातीनी और युनानी भाषा में लिखा हुआ था । इसलिए यहूदियों के महायाजकों ने पिलातुस से कहा, “आप न लिखिए - यहूदियों का राजा; बल्कि - इसने कहा कि मैं यहूदियों का राजा हूँ”। पिलातुस ने उत्तर दिया, “मैंने जो लिख दिया, सो लिख दिया"। येसु को क्रूस पर चढ़ाने के बाद सैनिकों ने उनके कपडे ले लिये और कुरते के सिवा उन कपड़ों के चार भाग कर दिये - हर सैनिक के लिए एक भाग। उस कुरते में सीवन नहीं था; वह ऊपर से नीचे तक पूरा का पूरा बुना हुआ था। उन्होंने आपस में कहा, “हम इसे नहीं फाड़ें; चिट्ठी डाल कर देख लें कि यह किसे मिलता है”। यह इसलिए हुआ कि धर्मग्रंथ का यंह कथन पूरा हो जाये - उन्होंने मेरे कपड़े आपस में बाँट लिये और मेरे वस्त्र पर चिट्ठी डाली। सैनिकों ने ऐसा ही किया। येसु की माता, उसकी बहन, क्लोपस की पत्नी मरियम और मरियम मगदलेना उनके क्रूस के पास खड़ी थीं। येसु ने अपनी माता को और उसके पास अपने शिष्य को, जिसे वह प्यार करते थे, देखा। उन्होंने अपनी माता से कहा, “भद्रे, यह आपका पुत्र है”। इसके बाद उन्होंने उस शिष्य से कहा, “यह तुम्हारी माता है”। उस समय से उस शिष्य ने उसे अपने यहाँ आश्रय दिया । तब येसु ने, यह जान कर कि अब सब कुछ पूरा हो चुका है, धर्मग्रंथ का लेख पूरा करने के उद्देश्य से कहा, “मैं प्यासा हूँ।” वहाँ खट्टी अंगूरी से भरा एक पात्र रखा था; लोगों ने उस में एक पनसोख्ता डुबाया और उसे जूफे की डण्डी पर रख कर येसु के मुँह से लगा दिया। येसु ने खट्टी अंगूरी चख कर कहा, '“सब पूरा हो चुका है” और सिर झुका कर प्राण त्याग दिये । वह तैयारी का दिन था। यहूदी यह नहीं चाहते थे कि शव विश्राम के दिन क्रूस पर रह जायें, क्योंकि उस विश्राम के दिन बड़ा त्योहार पड़ता था। उन्होंने पिलातुस से निवेदन किया कि उनकी टाँगें तोड़ दी जायें और शव हटा दिये जायें। इसलिए सैनिकों ने आ कर येसु के साथ क्रूस पर चढ़ाये हुए पहले व्यक्ति की टाँगें तोड़ दीं, फिर दूसरे की भी। जब उन्होंने येसु के पास आ कर देखा कि वह मर चुके हैं, तो उन्होंने उनकी टाँगें नहीं तोड़ीं; लेकिन एक सैनिक ने उनकी बगल में भाला मारा और उस में से तुरन्त रक्त और जल बह निकला । जिसने यह देखा है, वहीं इसका साक्ष्य देता है और उसका साक्ष्य सच्चा है। वह जानता है कि मैं सच बोलता हूँ, जिससे आप लोग भी विश्वास करें यह इसलिए हुआ कि धर्मग्रंथ का यह कथन पूरा हो जाये - उसकी एक भी हड्डी नहीं तोड़ी जायेगी; फिर धर्मग्रंथ का एक दूसरा कथन इस प्रकार है - उन्होंने जिसे छेदा है, वे उसी की ओर देखेंगे। इसके बाद अरिमथिया के यूसुफ ने, जो यहूदियों के भय के कारण येसु का गुप्त शिष्य था, पिलातुस से येसु का शव ले जाने की अनुमति माँगी। पिलातुस ने अनुमति दे दी। इसलिए यूसुफ आ कर येसु का शव ले गया। निकोदेमुस भी पहुँचा, जो पहले रात को येसु से मिलने आया था। वह लगभग पचास सेर का गंधरस और अंगूर का संमिश्रण लाया। उन्होंने येसु का शव लिया और, यहूदियों की दफन की प्रथा के अनुसार, उसको सुगंधित द्रव्यों के साथ छालटी की पट्टियों में लपेटा। जहाँ येसु क्रूस पर चढ़ाये गये थे, वहाँ एक बारी थी और उस बारी में एक नयी कब्र, जिस में अब तक कोई भी नहीं रखा गया था। उन्होंने येसु को वहीं रख दिया, क्योंकि वह यहूदियों के लिए तैयारी क़ा दिन था और वह कब्र निकट ही थी।


प्रभु का सुसमाचार।


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        *Have a Blessed Day*

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फरवरी 23, 2025, वर्ष का सातवां सामान्य सप्ताह, इतवार

 *✞ GOD'S WORD ✞*

CATHOLIC BIBLE MINISTRY 



*फरवरी 23, 2025*


*वर्ष का सातवां सामान्य सप्ताह, इतवार*



*पहला पाठ*

समुएल का पहला ग्रन्थ 26:2.7-9.12-13.22-23


2) साऊल इस्राएल के तीन हज़ार चुने हुए योद्धाओं को ले कर ज़ीफ़ के उजाड़खण्ड की ओर चल दिया, जिससे वह ज़ीफ़ के उजाड़खण्ड में दाऊद का पता लगाये।


7) दाऊद और अबीशय रात को उन लोगों के पास पहुँचे। उन्होंने पड़ाव में साऊल को सोया हुआ पाया। उसका भाला उसके सिरहाने जमीन में गड़ा हुआ था। अबनेर और दूसरे योद्धा उसके चारों ओर लेटे हुए थे।


8) तब अबीशय ने दाऊद से कहा, ‘‘ईश्वर ने आज आपके शत्रु को आपके हाथ दे दिया है। मुझे करने दीजिए- मैं उसे उसके अपने भाले के एक ही बार से ज़मीन में जकड दूँगा। मुझे दूसरी बार वार करने की ज़रूरत नहीं पडे़गी।’’


9) दाऊद ने अबीशय को यह उत्तर दिया, ‘‘उसे मत मारो। कौन प्रभु के अभिषिक्त को मार कर दण्ड से बच सकता है?’’


12) दाऊद ने वह भाला और साऊल के सिरहाने के पास रखी हुई पानी की सुराही ले ली और वे चले गये। न किसी ने यह सब देखा, न किसी को इसका पता चला और न कोई जगा। वे सब-के-सब सोये हुए थे; क्योंकि प्रभु की ओर से भेजी हुई गहरी नींद उन पर छायी हुई थी।


13) दाऊद घाट पार कर दूर की पहाड़ी पर खड़ा हो गया- दोनों के बीच बड़ा अन्तर था।


22) दाऊद ने उत्तर दिया, ‘‘यह राजा का भाला है। नवयुवकों में से कोई आ कर इसे ले जाये।


23 (23-24) प्रभु हर एक को उसकी धार्मिकता तथा ईमानदारी का फल देगा। आज प्रभु ने आप को मेरे हाथ दे दिया था, किन्तु मैंने प्रभु के अभिषिक्त पर हाथ उठाना नहीं चाहा; क्योंकि आज आपका जीवन मेरी दृष्टि में मूल्यवान् था। इसलिए मेरा जीवन भी प्रभु की दृष्टि में मूल्यवान हो और वह मुझे सब संकटों से बचाता रहे।"

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*भजन* 

स्तोत्र 102:1-4,8-10,12-13


*अनुवाक्य : प्रभु दया तथा अनुकम्पा से परिपूर्ण है।*


1 मेरी आत्मा प्रभु को धन्य कहे, मेरा सर्वस्व उसके पवित्र नाम की स्तुति करे। मेरी आत्मा प्रभु को धन्य कहे और उसके वरदानों को कभी नहीं भुलाये।


2 वह मेरे सभी अपराध क्षमा करता और मेरी सारी कमजोरी दूर करता है। वह मुझे सर्वनाश से बचाता और प्रेम तथा अनुकम्पा से मुझे सँभालता है।


3 प्रभु दया तथा अनुकम्पा से परिपूर्ण है, वह सहनशील है और अत्यन्त प्रेममय। वह न तो हमारे पापों के अनुसार हमारे साथ व्यवहार करता और न हमारे अपराधों के अनुसार हमें दण्ड देता है।


4 पूर्व पश्चिम से जितना दूर है, प्रभु हमारे पापों को हम से उतना दूर कर देता है। पिता जिस तरह अपने पुत्रों पर दया करता है, प्रभु उसी तरह अपने भक्तों पर दया करता है।

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*दूसरा पाठ*

कुरिन्थियों के नाम सन्त पौलुस का पहला पत्र 15:45-49


45) धर्मग्रन्थ में लिखा है कि प्रथम मनुष्य आदम जीवन्त प्राणी बन गया और अन्तिम आदम जीवन्तदायक आत्मा।


46) जो पहला है, वह आध्यात्मिक नहीं, बल्कि प्राकृत है। इसके बाद ही आध्यात्मिक आता है।


47) पहला मनुष्य मिट्टी का बना है और पृथ्वी का है, दूसरा स्वर्ग का है।


48) मिट्टी का बना मनुष्य जैसा था, वैसे ही मिट्टी के बने मनुष्य हैं और स्वर्ग का मनुष्य जैसा है, वैसे ही सभी स्वर्गी होंगे;


49) जिस तरह हमने मिट्टी के बने मनुष्य का रूप धारण किया है, उसी तरह हम स्वर्ग के मनुष्य का भी रूप धारण करेंगे।

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*जयघोष* 

योहन 6:63,68

अल्लेलूया, अल्लेलूया! 

है प्रभु! तेरी शिक्षा आत्मा और जीवन है। तेरे ही शब्दों में अनन्त जीवन का सन्देश है।

अल्लेलूया!

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*सुसमाचार*

सन्त लूकस का सुसमाचार 6:27-38


27) ’’मैं तुम लोगों से, जो मेरी बात सुनते हो, कहता हूँ-अपने शत्रुओं से प्रेम करो। जो तुम से बैर करते हैं, उनकी भलाई करो।


28) जो तुम्हें शाप देते है, उन को आशीर्वाद दो। जो तुम्हारे साथ दुव्र्यवहार करते हैं, उनके लिए प्रार्थना करो।


29) जो तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ मारता है, दूसरा भी उसके सामने कर दो। जो तुम्हारी चादर छीनता है, उसे अपना कुरता भी ले लेने दो।


30) जो तुम से माँगता है, उसे दे दो और जो तुम से तुम्हारा अपना छीनता है, उसे वापस मत माँगो।


31) दूसरों से अपने प्रति जैसा व्यवहार चाहते हो, तुम भी उनके प्रति वैसा ही किया करो।


32) यदि तुम उन्हीं को प्यार करते हो, जो तुम्हें प्यार करते हैं, तो इस में तुम्हारा पुण्य क्या है? पापी भी अपने प्रेम करने वालों से प्रेम करते हैं।


33) यदि तुम उन्हीं की भलाई करते हो, जो तुम्हारी भलाई करते हैं, तो इस में तुम्हारा पुण्य क्या है? पापी भी ऐसा करते हैं।


34) यदि तुम उन्हीं को उधार देते हो, जिन से वापस पाने की आशा करते हो, तो इस में तुम्हारा पुण्य क्या है? पूरा-पूरा वापस पाने की आशा में पापी भी पापियों को उधार देते हैं।


35) परन्तु अपने शत्रुओं से प्रेम करो, उनकी भलाई करो और वापस पाने की आशा न रख कर उधार दो। तभी तुम्हारा पुरस्कार महान् होगा और तुम सर्वोच्च प्रभु के पुत्र बन जाओगे, क्योंकि वह भी कृतघ्नों और दुष्टों पर दया करता है।


36) ’’अपने स्वर्गिक पिता-जैसे दयालु बनो। दोष न लगाओ और तुम पर भी दोष नहीं लगाया जायेगा।


37) किसी के विरुद्ध निर्णय न दो और तुम्हारे विरुद्ध भी निर्णय नहीं दिया जायेगा। क्षमा करो और तुम्हें भी क्षमा मिल जायेगी।


38) दो और तुम्हें भी दिया जायेगा। दबा-दबा कर, हिला-हिला कर भरी हुई, ऊपर उठी हुई, पूरी-की-पूरी नाप तुम्हारी गोद में डाली जायेगी; क्योंकि जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिए भी नापा जायेगा।’’

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अक्टूबर 06, 2024, इतवार वर्ष का सत्ताईसवाँ सामान्य इतवार

 

अक्टूबर 06, 2024, इतवार

वर्ष का सत्ताईसवाँ सामान्य इतवार

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📒 पहला पाठ : उत्पत्ति ग्रन्थ 2:18-24

18) प्रभु ने कहा, ''अकेला रहना मनुष्य के लिए अच्छा नहीं। इसलिए मैं उसके लिए एक उपयुक्त सहयोगी बनाऊँगा।''

19) तब प्रभु ने मिट्ठी से पृथ्वी पर के सभी पशुओं और आकाश के सभी पक्षियों को गढ़ा और यह देखने के लिए कि मनुष्य उन्हें क्या नाम देगा, वह उन्हें मनुष्य के पास ले चला; क्योंकि मनुष्य ने प्रत्येक को जो नाम दिया होगा, वही उसका नाम रहेगा।

20) मनुष्य ने सभी घरेलू पशुओं, आकाश के पक्षियों और सभी जंगली जीव-जन्तुओं का नाम रखा। किन्तु उसे अपने लिए उपयुक्त सहयोगी नहीं मिला।

21) तब प्रभु-ईश्वर ने मनुष्य को गहरी नींद में सुला दिया और जब वह सो गया, तो प्रभु ने उसकी एक पसली निकाल ली और उसकी जगह को मांस से भर दिया।

22) इसके बाद प्रभु ने मनुष्य से निकाली हुई पसली से एक स्त्री को गढ़ा और उसे मनुष्य के पास ले गया।

23) इस पर मनुष्य बोल उठा, ''यह तो मेरी हड्डियों की हड्डी है और मेरे मांस का मांस। इसका नाम 'नारी' होगा, क्योंकि यह तो नर से निकाली गयी है।

24) इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोड़ेगा और अपनी पत्नी के साथ रहेगा और वे दोनों एक शरीर हो जायेंगे।

दूसरा पाठ: इब्रानियों के नाम पत्र 2:9-11

9) परन्तु हम यह देखते हैं कि मृत्यु की यन्त्रणा सहने के कारण ईसा को महिमा और सम्मान का मुकुट पहनाया गया है। वह स्वर्गदूतों से कुछ ही छोटे बनाये गये थे, जिससे वह ईश्वर की कृपा से प्रत्येक मनुष्य के लिए मर जायें।

10) ईश्वर, जिसके कारण और जिसके द्वारा सब कुछ होता है, बहुत-से पुत्रों को महिमा तक ले जाना चाहता था। इसलिए यह उचित था कि वह उन सबों की मुक्ति के प्रवर्तक हो, अर्थात् ईसा को दुःखभोग द्वारा पूर्णता तक पहुँचा दे।

11) जो पवित्र करता है और जो पवित्र किये जाते हैं, उन सबों का पिता एक ही है; इसलिए ईसा को उन्हें अपने भाई मानने में लज्जा नहीं होती और वह कहते हैं -

📒 सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 10:2-16

2 फ़रीसी ईसा के पास आये और उनकी परीक्षा लेते हुए उन्होंने प्रश्न किया, “क्या अपनी पत्नी का परित्याग करना पुरुष के लिए उचित है?“

3) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया? ’’मूसा ने तुम्हें क्या आदेश दिया?’’

4) उन्होंने कहा, “मूसा ने तो त्यागपत्र लिख कर पत्नी का परित्याग करने की अनुमति दी’’।

5) ईसा ने उन से कहा, ’’उन्होंने तुम्हारे हृदय की कठोरता के कारण ही यह आदेश लिखा।

6) किन्तु सृष्टि के प्रारम्भ ही से ईश्वर ने उन्हें नर-नारी बनाया;

7) इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोड़ेगा और दोनों एक शरीर हो जायेंगे।

8) इस तरह अब वे दो नहीं, बल्कि एक शरीर हैं।

9) इसलिए जिसे ईश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग नहीं करे।’’

10) शिष्यों ने, घर पहुँच कर, इस सम्बन्ध में ईसा से फिर प्रश्न किया

11) और उन्होंने यह उत्तर दिया, ’’जो अपनी पत्नी का परित्याग करता और किसी दूसरी स्त्री से विवाह करता है, वह पहली के विरुद्ध व्यभिचार करता है

12) और यदि पत्नी अपने पति का त्याग करती और किसी दूसरे पुरुष से विवाह करती है, तो वह व्यभिचार करती है’’।

13) लोग ईसा के पास बच्चों को लाते थे, जिससे वे उन पर हाथ रख दें; परन्तु शिष्य लोगों को डाँटते थे।

14) ईसा यह देख कर बहुत अप्रसन्न हुए और उन्होंने कहा, ’’बच्चों को मेरे पास आने दो। उन्हें मत रोको, क्योंकि ईश्वर का राज्य उन-जैसे लोगों का है।

15) मैं तुम से यह कहता हूँ- जो छोटे बालक की तरह ईश्वर का राज्य ग्रहण नहीं करता, वह उस में प्रवेश नहीं करेगा।’’

16) तब ईसा ने बच्चों को छाती से लगा लिया और उन पर हाथ रख कर आशीर्वाद दिया।



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सितंबर 01, 2024, इतवार वर्ष का बाईसवाँ सामान्य इतवार

 

सितंबर 01, 2024, इतवार

वर्ष का बाईसवाँ सामान्य इतवार

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📒 पहला पाठ : विधि-विवरण 4:1-2, 6ब-8

1) इस्राएलियों मैं जिन नियमों तथा आदेशों की शिक्षा तुम लोगों को आज दे रहा हूँ, उन पर ध्यान दो और उनका पालन करो, जिससे तुम जीवित रह सको और उस देश में प्रवेश कर उसे अपने अधिकार में कर सको, जिसे प्रभु, तुम्हारे पूर्वजों का ईश्वर तुम लोगों को देने वाला है।

2) मैं जो आदेश तुम लोगों को दे रहा हूँ, तुम उन में न तो कुछ बढ़ाओ और न कुछ घटाओ। तुम अपने प्रभु-ईश्वर के आदेशों का पालन वैसे ही करो, जैसे मैं तुम लोगों को देता हूँ।

6ब) जब वे उन सब आदेशों की चर्चा सुनेंगे, तो बोल उठेंगे ’उस महान् राष्ट्र के समान समझदार तथा बुद्धिमान और कोई राष्ट्र नहीं है’।

7) क्योंकि ऐसा महान राष्ट्र कहाँ है, जिसके देवता उसके इतने निकट हैं, जितना हमारा प्रभु-ईश्वर हमारे निकट तब होता है जब-जब हम उसकी दुहाई देते हैं?

8) और ऐसा महान् राष्ट्र कहाँ है, जिसके नियम और रीतियाँ इतनी न्यायपूर्ण है, जितनी यह सम्पूर्ण संहिता, जिसे मैं आज तुम लोगों को दे रहा हूँ?


📒 दूसरा पाठ : याकूब 1;17-18, 21ब-22, 27

17) सभी उत्तम दान और सभी पूर्ण वरदान ऊपर के हैं और नक्षत्रों के उस सृष्टिकर्ता के यहाँ से उतरते हैं, जिसमें न तो केाई परिवर्तन है और न परिक्रमा के कारण कोई अन्धकार।

18) उसने अपनी ही इच्छा से सत्य की शिक्षा द्वारा हम को जीवन प्रदान किया, जिससे हम एक प्रकार से उसकी सृष्टि के प्रथम फल बनें।

21ब) इसलिए आप लोग हर प्रकार की मलिनता और बुराई को दूर कर नम्रतापूर्वक ईश्वर का वह वचन ग्रहण करें, जो आप में रोपा गया है और आपकी आत्माओं का उद्धार करने में समर्थ है।

22) आप लोग अपने को धोखा नहीं दें। वचन के श्रोता ही नहीं, बल्कि उसके पालनकर्ता भी बनें।

27) हमारे ईश्वर और पिता की दृष्टि में शुद्ध और निर्मल धर्माचरण यह है- विपत्ति में पड़े हुए अनाथों और विधवाओं की सहायता करना और अपने को संसार के दूषण से बचाये रखना।


📒 सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 7:1-8,14-15, 21-23

1 फ़रीसी और येरुसालेम से आये हुए कई शास्त्री ईसा के पास इकट्ठे हो गये।

2) वे यह देख रहे थे कि उनके शिष्य अशुद्ध यानी बिना धोये हाथों से रोटी खा रहे हैं।

3) पुरखों की परम्परा के अनुसार फ़रीसी और सभी यहूदी बिना हाथ धोये भोजन नहीं करते।

4) बाज़ार से लौट कर वे अपने ऊपर पानी छिड़के बिना भोजन नहीं करते और अन्य बहुत-से परम्परागत रिवाज़ों का पालन करते हैं- जैसे प्यालों, सुराहियों और काँसे के बरतनों का शुद्धीकरण।

5) इसलिए फ़रीसियों और शास्त्रियों ने ईसा से पूछा, "आपके शिष्य पुरखों की परम्परा के अनुसार क्यों नहीं चलते? वे क्यों अशुद्ध हाथों से रोटी खाते हैं?

6) ईसा ने उत्तर दिया, "इसायस ने तुम ढोंगियों के विषय में ठीक ही भविष्यवाणी की है। जैसा कि लिखा है- ये लोग मुख से मेरा आदर करते हैं, परन्तु इनका हृदय मुझ से दूर है।

7) ये व्यर्थ ही मेरी पूजा करते हैं; और ये जो शिक्षा देते हैं, वे हैं मनुष्यों के बनाये हुए नियम मात्र।

8) तुम लोग मनुष्यों की चलायी हुई परम्परा बनाये रखने के लिए ईश्वर की आज्ञा टालते हो।"

14) ईसा ने बाद में लोगों को फिर अपने पास बुलाया और कहा, "तुम लोग, सब-के-सब, मेरी बात सुनो और समझो।

15) ऐसा कुछ भी नहीं है, जो बाहर से मनुष्य में प्रवेश कर उसे अशुद्ध कर सके; बल्कि जो मनुष्य में से निकलता है, वही उसे अशुद्ध करता है।

21) क्योंकि बुरे विचार भीतर से, अर्थात् मनुष्य के मन से निकलते हैं। व्यभिचार, चोरी, हत्या,

22) परगमन, लोभ, विद्वेष, छल-कपट, लम्पटता, ईर्ष्या, झूठी निन्दा, अहंकार और मूर्खता-

23) ये सब बुराइयाँ भीतर से निकलती है और मनुष्य को अशुद्ध करती हैं।



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जुलाई 21, 2024, इतवार वर्ष का सोलहवाँ सामान्य इतवार

 

जुलाई 21, 2024, इतवार


वर्ष का सोलहवाँ सामान्य इतवार

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📒 पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 23:1-6

1) “धिक्कार उन चरवाहों को जो मेरे चरागाह की भेड़ों को नष्ट और तितर-बितर हो जाने देते हैं!“ यह प्रभु की वाणी है।

2) इसलिए प्रभु, इस्राएल का ईश्वर अपनी प्रजा को चराने वालों से यह कहता है, “तुम लोगों ने मेरी भेड़ों को भटकने और तितर-बितर हो जाने दिया; तुमने उनकी देखरेख नहीं की। देखो! मैं तुम लोगों को तुम्हारे अपराधों का दण्ड दूँगा।“ यह प्रभु की वाणी है।

3) “इसके बाद मैं स्वयं अपने झुण्ड की बची हुई भेड़ों को उन सभी देशों से एकत्र कर लूँगा, जहाँ मैंने उन्हें बिखेर दिया है; मैं उन्हें उनके अपने मैदान वापस ले चलूँगा और वे फलेंगी-फूलेंगी।

4) मैं उनके लिए ऐसे चरवाहों को नियुक्त करूँगा, जो उन्हें सचमुच चरायेंगे। तब उन्हें न तो भय रहेगा, न आतंक और न उन में से एक का भी सर्वनाश होगा।“ यह प्रभु की वाणी है।

5) प्रभु यह कहता है: “वे दिन आ रहे हैं, जब मैं दाऊद के लिए एक न्यायी वंशज उत्पन्न करूँगा। वह राजा बन कर बुद्धिमानी से शासन करेगा और अपने देश में न्याय और धार्मिकता स्थापित करेगा।

6) उसके राज्यकाल में यूदा का उद्धार होगा और इस्राएल सुरक्षित रहेगा और उसका यह नाम रखा जायेगा- प्रभु ही हमारी धार्मिकता है।“

दूसरा पाठ: एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 2:13-18

13) आप लोग पहले दूर थे, किन्तु ईसा मसीह से संयुक्त हो कर आप अब मसीह के रक्त द्वारा निकट आ गये है;

14) क्योंकि वही हमारी शान्ति हैं। उन्होंने यहूदियों और गैर-यहूदियों को एक कर दिया है। दोनों में शत्रुता की जो दीवार थी, उसे उन्होंने गिरा दिया है।

15) और अपनी मृत्यु द्वारा विधि-निषेधों की संहिता को रद्द कर दिया। इस प्रकार उन्होंने यहूदियों तथा गैर-यहूदियों को अपने से मिला कर एक नयी मानवता की सृष्टि की और शान्ति की स्थापित की है।

16) उन्होंने क्रूस द्वारा दोनों का एक ही शरीर में ईश्वर के साथ मेल कराया और इस प्रकार शत्रुता को नष्ट कर दिया।

17) तब उन्होंने आ कर दोनों को शान्ति का सन्देश सुनाया - आप लोगों को, जो दूर थे और उन लोगों को, जो निकट थे;

18) क्योंकि उनके द्वारा हम दोनों एक ही आत्मा से प्रेरित हो कर पिता के पास पहुँच सकते हैं।

📒 सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 6:30-34

30) प्रेरितो ने ईसा के पास लौट कर उन्हें बताया कि हम लोगों ने क्या-क्या किया और क्या-क्या सिखलाया है।

31) तब ईसा ने उन से कहा, ’’तुम लोग अकेले ही मेरे साथ निर्जन स्थान चले आओ और थोड़ा विश्राम कर लो’’; क्योंकि इतने लोग आया-जाया करते थे कि उन्हें भोजन करने की भी फुरसत नही रहती थी।

32) इस लिए वे नाव पर चढ़ कर अकेले ही निर्जन स्थान की ओर चल दिये।

33) उन्हें जाते देख कर बहुत-से लोग समझ गये कि वह कहाँ जा रहे हैं। वे नगर-नगर से निकल कर पैदल ही उधर दौड़ पड़े और उन से पहले ही वहाँ पहुँच गये।

34) ईसा ने नाव से उतर कर एक विशाल जनसमूह देखा। उन्हें उन लोगों पर तरस आया, क्योंकि वे बिना चरवाहे की भेड़ों की तरह थे और वह उन्हें बहुत-सी बातों की शिक्षा देने लगे।




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जून 09, 2024, इतवार वर्ष का दसवाँ सामान्य इतवार

 

जून 09, 2024, इतवार

वर्ष का दसवाँ सामान्य इतवार

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📒 पहला पाठ : उत्पत्ति 3:9-15

9) प्रभु-ईश्वर ने आदम से पुकार कर कहा, ''तुम कहाँ हो?''

10) उसने उत्तर दिया, ''मैं बगीचे में तेरी आवाज सुन कर डर गया, क्योंकि में नंगा हूँ और मैं छिप गया''।

11) प्रभु ने कहा, ''किसने तुम्हें बताया कि तुम नंगे हो? क्या तुमने उस वृक्ष का फल खाया, जिस को खाने से मैंने तुम्हें मना किया था?''

12) मनुष्य ने उत्तर दिया, ''मेरे साथ रहने कि लिए जिस स्त्री को तूने दिया, उसी ने मुझे फल दिया और मैंने खा लिया''।

13) प्रभु-ईश्वर ने स्त्री से कहा, ''तुमने क्या किया है?'' और उसने उत्तर दिया, ''साँप ने मुझे बहका दिया और मैंने खा लिया''।

14) तब ईश्वर ने साँप से कहा, ''चूँकि तूने यह किया है, तू सब घरेलू तथा जंगली जानवरों में शापित होगा। तू पेट के बल चलेगा और जीवन भर मिट्टी खायेगा।

15) मैं तेरे और स्त्री के बीच, तेरे वंश और उसके वंश में शत्रुता उत्पन्न करूँगा। वह तेरा सिर कुचल देगा और तू उसकी एड़ी काटेगा''।

📒 दूसरा पाठ : 2 कुरिन्थियों 4:13-5:1

13) धर्मग्रन्थ कहता है- मैंने विश्वास किया और इसलिए मैं बोला। हम विश्वास के उसी मनोभाव से प्रेरित हैं। हम विश्वास करते हैं और इसलिए हम बोलते हैं।

14) हम जानते हैं कि जिसने प्रभु ईसा को पुनर्जीवित किया, वही ईसा के साथ हम को भी पुनर्जीवित कर देगा और आप लागों के साथ हम को भी अपने पास रख लेगा।

15) सब कुछ आप लोगों के लिए हो रहा है, ताकि जिस प्रकार बहुतों में कृपा बढ़ती जाती है, उसी प्रकार ईश्वर की महिमा के लिए धन्यवाद की प्रार्थना करने वालों की संख्या बढ़ती जाये।

16) यही कारण है कि हम हिम्मत नहीं हारते। हमारे शरीर की शक्ति भले ही क्षीण होती जा रही हो, किन्तु हमारे आभ्यान्तर में दिन-प्रतिदिन नये जीवन का संचार होता रहता है;

17) क्योंकि हमारी क्षण भर की हलकी-सी मुसीबत हमें हमेशा के लिए अपार महिमा दिलाती है।

18) इसलिए हमारी आँखें दृश्य पर नहीं, बल्कि अदृश्य चीजों पर टिकी हुई हैं, क्योंकि हम जो चीजें देखते हैं, वे अल्पकालिक हैं। अनदेखी चीजें अनन्त काल तक बनी रहती है।

5:1) हम जानते हैं कि जब यह तम्बू, पृथ्वी पर हमारा यह घर, गिरा दिया जायेगा, तो हमें ईश्वर द्वारा निर्मित एक निवास मिलेगा। वह एक ऐसा घर है, जो हाथ का बना नहीं है और अनन्त काल तक स्वर्ग में बना रहेगा।

📒 सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 3:20-35

20) वे घर लौटे और फिर इतनी भीड़ एकत्र हो गयी कि उन लोगों को भोजन करने की भी फुरसत नहीं रही।

21) जब ईसा के सम्बन्धियों ने यह सुना, तो वे उन को बलपूर्वक ले जाने निकले; क्योंकि कहा जाता था कि उन्हें अपनी सुध-बुध नहीं रह गयी है।

22) येरुसालेम से आये हुए शास्त्री कहते थे, ’’उसे बेलजे़बुल सिद्ध है’’ और ’’वह नरकदूतों के नायक की सहायता से नरकदूतों को निकालता है’’।

23) ईसा ने उन्हें अपने पास बुला कर यह दृष्टान्त सुनाया, ’’शैतान शैतान को कैसे निकाल सकता है?

24) यदि किसी राज्य में फूट पड़ गयी हो, तो वह राज्य टिक नहीं सकता।

25) यदि किसी घर में फूट पड़ गयी हो, तो वह घर टिक नहीं सकता।

26) और यदि शैतान अपने ही विरुद्ध विद्रोह करे और उसके यहाँ फूट पड़ गयी हो, तो वह टिक नहीं सकता, और उसका सर्वनाश हो गया है।

27) ’’कोई किसी बलवान् के घर में घुस कर उसका सामान तब तक नहीं लूट सकता, जब तक कि वह उस बलवान् को न बाँध ले। इसके बाद ही वह उसका घर लूट सकता है।

28) ’’मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- मनुष्य चाहे जो भी पाप या ईश-निन्दा करें, उन्हें सब की क्षमा मिल जायेगी;

29) परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा करने वाले को कभी भी क्षमा नहीं मिलेगी। वह अनन्त पाप का भागी है।’’

30) उन्होंने यह इसीलिए कहा कि कुछ लोग कहते थे, ’’उसे अपदूत सिद्ध है’’।

31) उस समय ईसा की माता और भाई आये। उन्होंने घर के बाहर से उन्हें बुला भेजा।

32) लोग ईसा के चारों ओर बैठे हुए थे। उन्होंने उन से कहा, ’’देखिए, आपकी माता और आपके भाई-बहनें, बाहर हैं। वे आप को खोज रहे हैं।’’

33) ईसा ने उत्तर दिया, ’कौन है मेरी माता, कौन हैं मेरे भाई?’’

34) उन्होंने अपने चारों ओर बैठे हुए लोगों पर दृष्टि दौड़ायी और कहा, ’’ये हैं मेरी माता और मेरे भाई।

35) जो ईश्वर की इच्छा पूरी करता है, वही है मेरा भाई, मेरी बहन और मेरी माता।’’