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शुक्रवार, 13 अगस्त, 2021

 

शुक्रवार, 13 अगस्त, 2021

वर्ष का उन्नीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : योशुआ का ग्रन्थ 24:1-13


1) योशुआ ने सिखेम में सब इस्राएली वंशों को इकट्टा कर लिया। इसके बाद उसने इस्राएल के वयोवृद्ध नेताओ, न्यायकर्ताओं और शास्त्रियों को बुला भेजा और वे सब ईश्वर के सामने उपस्थित हो गये।

2) तब योशुआ ने समस्त लोगों से कहा, इस्राएल का प्रभु ईश्वर यह कहता है प्राचीन काल में तुम लोगों के पूर्वज, इब्राहीम और नाहोर का पिता तेरह, फरात नदी के उस पार निवास करते थे। वे अन्य देवताओं की उपासना करते थे।

3) मैंने तुम्हारे पिता इब्राहीम को नदी के उस पार से बुलाया और सारा कनान देश घुमाया। मैंने उसके वंशजों की संख्या बढ़ायी मैंने उसे इसहाक को दिया

4) और इसहाक को मैंने याकूब और एसाव को प्रदान किया। मैंने एसाव को सेईर का पहाड़ी देश दे दिया, किन्तु याकूब और उसके पुत्र मिस्र चले गये।

5) मैंने मूसा और हारून को भेजा और चमत्कार दिखा कर मिस्रियों को पीड़ित किया। इसके बाद मैं तुम लोगों को निकाल लाया।

6) मैं तुम्हारे पूर्वजों को मिस्र से निकाल लाया और तुम लाल समुद्र तक पहुँचे। तब मिस्रियों ने रथों और घोड़ों पर सवार हो कर समुद्र तक तुम्हारे पूर्वजों का पीछा किया।

7) जब तुम्हारे पूर्वजों ने प्रभु की दुहाई दी, तो उसने तुम्हारे और मिस्रियों के बीच एक घना कुहरा फैला दिया और मिस्रियों पर समुद्र बहा दिया, जिससे वे डूब गये। तुमने अपनी ही आँखों से देखा कि मैंने मिस्र में तुम्हारे लिए क्या-क्या किया। इसके बाद तुम लोग बहुत समय तक मरुभूमि में निवास करते रहे।

8) तब मैं तुम को यर्दन के उस पार रहने वाले अमोरियों के देश ले गया। उन्होंने तुम पर आक्रमण किया और मैंने उन्हें तुम लोगों के हवाले कर दिया। तुमने उनका देश अपने अधिकार में कर लिया और मैंने तुम्हारे लिए उनका विनाश किया।

9) तब मोआब का राजा, सिप्पोर का पुत्र बालाक, इस्राएल के विरुद्ध युद्ध की तैयारी करने लगा। उसने तुम्हें अभिशाप देने के लिए बओर के पुत्र बिलआम को बुला भेजा।

10) किन्तु मैंने बिलआम की बात नहीं मानी और उसे तुम लोगों को आशीर्वाद देना पड़ा। इस प्रकार मैंने तुम को बालाक के हाथ से बचाया।

11) इसके बाद तुम लोग यर्दन पार कर येरीखो आये। येरीखो के नागरिकों अमोरियों, परिज्ज़ियों, कनानियों, हित्तियों, गिरगाषियों, हिव्वियों और यबूसियों ने तुम्हारा सामना किया, किन्तु मैंने उन्हें तुम लोगों के हवाले कर दिया।

12) मैंने तुम लोगों के आगे आतंक फैला दिया और इस कारण - तुम्हारी तलवार और तुम्हारे धनुष के कारण नहीं - अमोरियों के दोनों राजा तुम्हारे सामने से भाग गये।

13) मैंने तुम्हें एक ऐसा देश दे दिया, जिसके लिए तुमने परिश्रम नहीं किया, निवास के लिए ऐसे नगर दे दिये, जिन्हें तुमने नहीं बनाया और जीवन निर्वाह के लिए ऐसी दाखबारियों और जैतून के पेड़, जिन्हें तुमने नहीं लगाया।


सुसमाचार : सन्त मत्ती 19:3-12



3 फ़रीसी ईसा के पास आये और उनकी परीक्षा लेते हुए यह प्रश्न किया, ’’क्या किसी भी कारण से अपनी पत्नी का परित्याग करना उचित है?

4) ईसा ने उत्तर दिया, ’’क्या तुम लोगों ने यह नहीं पढ़ा कि सृष्टिकर्ता ने प्रारंभ से ही उन्हें नर-नारी बनाया।

5) और कहा कि इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोडे़गा और अपनी पत्नी के साथ रहेगा, और वे दोनों एक शरीर हो जायेंगे?

6) इस तरह अब वे दो नहीं, बल्कि एक शरीर है। इसलिए जिसे ईश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग नहीं करे।’’

7) उन्होंने ईसा से कहा, ’’तब मूसा ने पत्नी का परित्याग करते समय त्यागपत्र देने का आदेश क्यों दिया?

8) ईसा ने उत्तर दिया, ’’मूसा ने तुम्हारे हृदय की कठोरता के कारण ही तुम्हें पत्नी का परित्याग करने की अनुमति दी, किन्तु प्रारम्भ से ऐसा नहीं था।

9) मैं तुम लोगों से कहता हूँ कि व्यभिचार के सिवा किसी अन्य कारण से जो अपनी पत्नी का परित्याग करता और किसी दूसरी स्त्री से विवाह करता है, वह भी व्यभिचार करता है।’’

10) शिष्यों ने ईसा से कहा, ’’यदि पति और पत्नी का सम्बन्ध ऐसा है, तो विवाह नहीं करना अच्छा ही है’’।

11) ईसा ने उन से कहा ’’सब यह बात नहीं समझते, केवल वे ही समझते हैं जिन्हें यह वरदान मिला है;

12) क्योंकि कुछ लोग माता के गर्भ से नपुंसक उत्पन्न हुए हैं, कुछ लोगों को मनुष्यों ने नपुंसक बना दिया है और कुछ लोगों ने स्वर्गराज्य के निमित्त अपने को नपुंसक बना लिया है। जो समझ सकता है, वह समझ ले।’’


📚 मनन-चिंतन


आज के सुसमाचार में मत्ती हमें विवाह और ब्रह्मचर्य पर येसु की शिक्षा देते हैं। यद्यपि यहूदी परंपरा के अनुसार विधिविवरण की पुस्तक में तलाक की अनुमति दी गई है, पर प्रभु येसु ने उत्पत्ति की पुस्तक में ईश्वर द्वारा विवाह के सम्बन्ध में व्यक्त किए गए उनके मूल इरादे को वापस संदर्भित किया, जिसके अनुसार विवाह में पुरुष और महिला के बीच का मिलन स्थायी होना था। हम सभी इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि शादियां टूट जाती हैं। हमारे अपने परिवारों से भी ऐसे किस्से सुनने को हमें मिलते हैं। फिर भी अगर कलीसिया को येसु की शिक्षा के प्रति वफादार रहना है तो उसे - एक पुरुष और एक महिला द्वारा विवाह में एक दूसरे को पूरी तरह से प्रेम के बंधन में बढ़कर आजीवन वफादार रहने वाले ईश्वर के दृष्टिकोण को बढ़ावा देना चाहिए।

येसु उन्हें, जिन्हें यह वरदान दिया गया है कि वे एक ब्रह्मचर्य जीवन जिये उनके लिए ब्रह्मचर्य के मूल्य को भी स्वीकार करते हैं। येसु ने घोषणा की कि यह, ईश्वर के राज्य की दृष्टि से दिया गया एक बड़ा मूल्य है। ऐसे लोगों को ईश्वर के राज्य के लिए जीना है, ईश्वर के राज्य के आने और ईश्वर की इच्छा को पूरा करने के लिए आगे बढ़ाना है। चाहे विवाहित हों या अविवाहित, हम सभी को हमारे संसार और हमारे जीवन के लिए ईश्वर के उद्देश्य की सेवा में एक साथ काम करने के लिए बुलाया गया है, जैसा कि प्रभु येसु के द्वारा हमें बताया गया है।



📚 REFLECTION



In today's Gospel reading Matthew gives us Jesus’ teaching on marriage and celibacy. Even though within the Jewish tradition the Book of Deuteronomy allowed for divorce, Jesus refers back to the original intention of the Creator as expressed in the Book of Genesis, according to which the union between man and woman in marriage was to be enduring. We are all only too well aware that marriages break down. Many of us will know that from our own families. Yet if the church is to be faithful to the teaching of Jesus it must keep promoting God’s vision for marriage as the giving of a man and a woman to each other for life.

Jesus also acknowledges the value of celibacy, for those to whom it has been granted, for those who have the graced capacity for celibacy from God. Jesus declares that it is a value given with a view to a greater value, God’s kingdom. It is to be lived for the sake of that kingdom, to further the coming of God’s kingdom and the doing of God’s will. Whether married or single we are all called to work together in the service of God’s purpose for our world and our lives, as revealed to us by Jesus.


 -Br Biniush topno


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गुरुवार, 12 अगस्त, 2021 वर्ष का उन्नीसवाँ सामान्य सप्ताह

 

गुरुवार, 12 अगस्त, 2021

वर्ष का उन्नीसवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ : योशुआ का ग्रन्थ 3:7-11, 13-17


7) प्रभु ने योशुआ से यह कहा, "मैं आज से इस बात का ध्यान रखूँगा कि सभी इस्राएली तुम्हारा महत्व समझें और यह जान जायें कि जिस तरह मैं मूसा के साथ रहा उसी तरह तुम्हारे साथ भी रहूँगा।

8) तुम विधान की मंजूषा ढोने वाले याजको को यह आदेश दोगे, ’जब तुम लोग यर्दन नदी के तट पर पहुँचो, तो नदी में ही खडे़ हो जाओ’।"

9) इसके बाद योशुआ ने इस्राएलियों से कहा, "यहाँ आओ और अपने प्रभु ईश्वर का आदेश सुनों।"

10) योशुआ ने कहा, "अब तुम जान जाओगे कि जीवन्त ईश्वर तुम्हारे बीच है और तुम लोगों के सामने से कनानियों को निष्चय ही भगा देगा।

11) समस्त पृथ्वी के प्रभु के विधान की मंजूषा तुम लोगों से पहले यर्दन पार करेगी।

13) ज्यों ही समस्त पृथ्वी के प्रभु के विधान की मंजूषा ढोने वाले याजक यर्दन नदी के पानी में पैर रखेंगे त्यों ही ऊपर से बहने वाला पानी थम जायेगा और ठोस पुंज जैसा हो जायेगा।"

14) जब इस्राएली अपने तम्बू उखाड़ कर यर्दन पार करने निकले तो विधान की मंजूषा ढोने वाले याजक उनके आगे-आगे चलें।

15) ज्यों ही मंजूषा ढोने वाले याजकों ने यर्दन के पास जा कर पानी में पैर रखा- कटने के समय यर्दन का पानी उमड़ कर तट पर फैल जाता है -

16) त्यों ही ऊपर से बहने वाला पानी थम गया और सारतान के निकटवर्ती आदाम नगर तक ठोस पुंज- जैसा बन गया। अराबा के समुद्र अर्थात लवण समुद्र की ओर उतरने वाला पानी बह निकला और इस प्रकार इस्राएली येरीख़ो के सामने पार उतरे।

17) जब इस्राएली सूखे पाँव उस पार जा रहे थे तो प्रभु के विधान की मंजूषा ढोने वाले याजक यर्दन के बीच के सूखे तल पर तब तक खडे़ रहे, जब तक सभी लोग यर्दन के उस पार नहीं पहुँचे।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 18:21-19:1



21) तब पेत्रुस ने पास आ कर ईसा से कहा, "प्रभु! यदि मेरा भाई मेरे विरुद्ध अपराध करता जाये, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूँ? सात बार तक?"

22) ईसा ने उत्तर दिया, "मैं तुम से नहीं कहता ’सात बार तक’, बल्कि सत्तर गुना सात बार तक।

23) "यही कारण है कि स्वर्ग का राज्य उस राजा के सदृश है, जो अपने सेवकों से लेखा लेना चाहता था।

24) जब वह लेखा लेने लगा, तो उसका लाखों रुपये का एक कर्ज़दार उसके सामने पेश किया गया।

25) अदा करने के लिए उसके पास कुछ भी नहीं था, इसलिए स्वामी ने आदेश दिया कि उसे, उसकी पत्नी, उसके बच्चों और उसकी सारी जायदाद को बेच दिया जाये और ऋण अदा कर लिया जाये।

26) इस पर वह सेवक उसके पैरों पर गिर कर यह कहते हुए अनुनय-विनय करता रहा, ’मुझे समय दीजिए, और मैं आपको सब चुका दूँगा।

27) उस सेवक के स्वामी को तरस हो आया और उसने उसे जाने दिया और उसका कर्ज़ माफ़ कर दिया।

28) जब वह सेवक बाहर निकला, तो वह अपने एक सह- सेवक से मिला, जो उसका लगभग एक सौ दीनार का कर्ज़दार था। उसने उसे पकड़ लिया और उसका गला घोंट कर कहा, ’अपना कर्ज़ चुका दो’।

29) सह-सेवक उसके पैरों पर गिर पड़ा और यह कहते हुए अनुनय-विनय करता रहा, ’मुझे समय दीजिए और मैं आपको चुका दूँगा’।

30) परन्तु उसने नहीं माना और जा कर उसे तब तक के लिये बन्दीगृह में डलवा दिया, जब तक वह अपना कर्ज़ न चुका दे!

31) यह सब देख कर उसके दूसरे सह-सेवक बहुत दुःखी हो गये और उन्होंने स्वामी के पास जा कर सारी बातें बता दीं।

32) तब स्वामी ने उस सेवक को बुला कर कहा, ’दुष्ट सेवक! तुम्हारी अनुनय-विनय पर मैंने तुम्हारा वह सारा कजऱ् माफ़ कर दिया था,

33) तो जिस प्रकार मैंने तुम पर दया की थी, क्या उसी प्रकार तुम्हें भी अपने सह-सेवक पर दया नहीं करनी चाहिए थी?’

34) और स्वामी ने क्रुद्ध होकर उसे तब तक के लिए जल्लादों के हवाले कर दिया, जब तक वह कौड़ी-कौड़ी न चुका दे।

35) यदि तुम में हर एक अपने भाई को पूरे हृदय से क्षमा नहीं करेगा, तो मेरा स्वर्गिक पिता भी तुम्हारे साथ ऐसा ही करेगा।"

19:1) अपना यह उपदेश समाप्त कर ईसा गलीलिया से चले गये और यर्दन के पार यहूदिया प्रदेश पहुँचे।



📚 मनन-चिंतन


हम ईश्वर से यह उम्मीद नहीं करते कि वो हमें एक बार, दो बार अथवा कुछ सीमित समय तक माफ़ करें। उलटे हम यह चाहते हैं कि वे हमें असंख्य बार, जब- जब हम उनके विरुद्ध पाप करते हैं, हमें क्षमा करें। कलीसिया में ऐसा कोई नियम नहीं बना है कि कोई व्यक्ति एक साल में सिर्फ कुछ गिनती के दिनों में ही पापस्वीकार के लिए आ सकता है। नहीं पापस्वीकार का दरवाज़ा हर विश्वासी के के लिए हमेशा खुला रहता है चाहे वो कितनी ही बार उठकर आये।

यदि यह परमेश्वर के साथ हमारे संबंध के बारे में सच है, तो इसे दूसरों के साथ हमारे संबंधों में भी सत्य होना चाहिए। हमें हमेशा यह प्रयास करना चाहिए कि सुलह के प्रस्ताव को कभी भी अस्वीकार न करें। आज जब मैं इस सुसमाचार पर चिंतन कर रहा हूं, क्या कोई है जिसके साथ मुझे मेल-मिलाप करने की आवश्यकता है? प्रार्थना के इस समय में मेरे उस टूटे रिश्ते को और उस व्यक्ति को क्या मैं येसु के पास आज लाता हूँ और येसु की करुणा मेरे दिल में भरते हुए मैं उसे एक सच्ची क्षमा देता हूँ?



📚 REFLECTION



We do not expect God to forgive us once or twice or any limited number of times but every time. It isn’t written that we have, for example, only 10 chances of going to confession and once our quota is used up, there is nothing left. If that is true of our relationship with God, it also has to be true in our relationships with others. We should always strive to never refuse an offer of reconciliation. As I reflect on this gospel today is there someone I need to be reconciled with? Bring this relationship to Jesus in this time of prayer.


 -Br Biniush topno


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बुधवार, 11 अगस्त, 2021 वर्ष का उन्नीसवाँ सामान्य सप्ताह

 

बुधवार, 11 अगस्त, 2021

वर्ष का उन्नीसवाँ सामान्य सप्ताह



पहला पाठ : विधि-विवरण ग्रन्थ 34:1-12



1) इसके बाद मूसा मोआब के मैदान से नेबो पर्वत पर पिसगा की चोटी पर चढ़ा! यह येरीखो के सामने है। प्रभु ने उसे समस्त देश दिखाया - दान तक गिलआद को,

2) सारे नफ्ताली, एफ्रईम और मनस्से प्रदेश को पश्चिमी समुद्र तक समस्त यूदा प्रदेश को,

3) नेगेब और यर्दन की घाटी तथा सोअर तक खजूरों के नगर येरीख़ो के मैदान को।

4) तब प्रभु ने उस से कहा, “यही वह देश है, जिसके विषय में मैंने शपथ खाकर इब्राहीम इसहाक और याकूब से कहा - मैं उसे तुम्हारे वंशजों को प्रदान करूँगा। मैंने इसे तुम को दिखाया और तुमने इसे अपनी आँखों से देखा किन्तु तुम इस में प्रवेश नहीं करोगे।“

5) प्रभु के सेवक मूसा की वहाँ मोआब में मृत्यु हो गयी, जैसा कि प्रभु ने कहा था।

6) लोगों ने उसे बेत-पओर के सामने मोआब की घाटी में दफनाया, किन्तु अब कोई नहीं जानता कि उसकी कब्र कहाँ है।

7) मूसा का देहान्त एक सौ बीस वर्ष की उम्र में हुआ था। उसकी आँखांे की ज्योति धुँधलायी नहीं थी और न ही उसकी तेजस्विता घटी थी।

8) इस्राएलियों ने मोआब के मैदान में तीस दिन तक मूसा के लिए विलाप किया। इसके बाद मूसा के लिए शोक का समय समाप्त हुआ।

9) नून का पुत्र योशुआ प्रज्ञा-चेतना से परिपूर्ण था, क्योंकि मूसा ने उस पर हाथ रखे थे। इस्राएली उसका आज्ञापालन करते और इस प्रकार वे प्रभु का वह आदेश पूरा करते थे, जिसे प्रभु ने मूसा को दिया था।

10) बाद में मूसा के सदृश इस्राएल में ऐसा कोई नबी प्रकट नहीं हुआ, जिसने प्रभु को आमने-सामने देखा हो।

11) ऐसा कोई नबी प्रकट नहीं हुआ, जिसने प्रभु के द्वारा भेजा जा कर मिस्र में फ़िराउन, उसके सब दरबारियों और उसके समस्त देश को इतने चिन्ह तथा चमत्कार और

12) सब इस्राएलियों के सामने सामर्थ्य एवं आतंक के साथ इतने महान् कार्य कर दिखाये।



सुसमाचार : सन्त मत्ती 18:15-20



15) ’’यदि तुम्हारा भाई कोई अपराध करता है, तो जा कर उसे अकेले में समझाओ। यदि वह तुम्हारी बात मान जाता है, तो तुमने अपनी भाई को बचा लिया।

16) यदि वह तुम्हारी बात नहीं मानता, तो और दो-एक व्यक्तियों को साथ ले जाओ ताकि दो या तीन गवाहों के सहारे सब कुछ प्रमाणित हो जाये।

17) यदि वह उनकी भी नहीं सुनता, तो कलीसिया को बता दो और यदि वह कलीसिया की भी नहीं सुनता, तो उसे गैर-यहूदी और नाकेदार जैसा समझो।

18) मैं तुम से कहता हूँ- तुम लोग पृथ्वी पर जिसका निषेध करोगे, स्वर्ग में भी उसका निषेध रहेगा और पृथ्वी पर जिसकी अनुमति दोगे, स्वर्ग में भी उसकी अनुमति रहेगी।

19) ’’मैं तुम से यह भी कहता हूँ- यदि पृथ्वी पर तुम लोगों में दो व्यक्ति एकमत हो कर कुछ भी माँगेगे, तो वह उन्हें मेरे स्वर्गिक पिता की और से निश्चय ही मिलेगा;

20) क्योंकि जहाँ दो या तीन मेरे नाम इकट्टे होते हैं, वहाँ में उनके बीच उपस्थित रहता हूँ।’’


📚 मनन-चिंतन



कभी-कभी हम सोचते और बोलते भी हैं कि ईश्वर को हमारी बेहतर देखभाल करनी चाहिए। आज हम पेत्रुस को वैसी ही शिकायत करते हुए पाते हैं और उसके जवाब में येसु की ओर से एक कोमल प्रतिक्रिया हमें सुनने को मिलती है । भजन सहिंता में कई भजन शिकायतों से भरे हुए हैं; अय्यूब के ग्रन्थ में भी हम ऐसा ही पाते हैं। क्या मैं अपने दिल को ईश्वर के सामने रखने से रोकता हूँ, या क्या मैं पेत्रुस की तरह बेझिझक शिकायत करता हूँ?

मुझे सौ गुना दिए जाने का वादा किया गया है। क्या मैं कभी भी ईश्वर की महान उदारता को भांप सकता हूँ ? जब मैं उसके उपकारों को मेरे जीवन में समझने लगता हूँ तो एक गहरी कृतज्ञता से भर जाता हूँ और यह जानने के लिए अनुग्रह मांगता हूं कि मेरी कृतज्ञता को विश्वास में कैसे बदला जाए।



📚 REFLECTION



Sometimes I find myself thinking that God should take better care of me. Today I hear Peter making the same complaint, and receiving a gentle response from Jesus. The Psalms are full of complaints, so is most of the book of Job. Do I stop myself from baring my heart to God, or do I, like Peter, feel free to complain?

I am promised a hundredfold. Can I ever surpass God in his generosity? I spend some time getting in touch with the deep gratitude I feel for all I have received from God, and ask for the grace to know how to transform my gratitude into trust.



 -Br Biniush topno


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मंगलवार, 10 अगस्त, 2021

 

मंगलवार, 10 अगस्त, 2021

वर्ष का उन्नीसवाँ सामान्य सप्ताह

संत लौरेंस (उपयाजक और शहीद) – पर्व

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पहला पाठ : 2 कुरिन्थियों 9:6-10



6) इस बात का ध्यान रखें कि जो कम बोता है, वह कम लुनता है और जो अधिक बोता है, वह अधिक लुनता है।

7) हर एक ने अपने मन में जिनता निश्चित किया है, उतना ही दे। वह अनिच्छा से अथवा लाचारी से ऐसा न करे, क्योंकि ‘‘ईश्वर प्रसन्नता से देने वाले को प्यार करता है’’।

8) ईश्वर आप लोगों को प्रचुर मात्रा में हर प्रकार का वरदान देने में समर्थ है, जिससे आप को कभी किसी तरह की कोई कमी नहीं हो, बल्कि हर भले काम के लिए चन्दा देने के लिए भी बहुत कुछ बच जाये।

9) धर्मग्रन्थ में लिखा है- उसने उदारतापूर्वक दरिद्रों को दान दिया है, उसकी धार्मिकता सदा बनी रहती है।

10) जो बोने वाले को बीज और खाने वाले को भोजन देता है, वह आप को बोने के लिए बीज देगा, उसे बढ़ायेगा और आपकी उदारता की अच्छी फसल उत्पन्न करेगा।



सुसमाचार :योहन 12:24-26



24) मैं तुम लोगो से यह कहता हूँ- जब तक गेंहूँ का दाना मिटटी में गिर कर नहीं मर जाता, तब तक वह अकेला ही रहता है; परंतु यदि वह मर जाता है, तो बहुत फल देता है।

25) जो अपने जीवन को प्यार करता है, वह उसका सर्वनाश करता है और जो इस संसार में अपने जीवन से बैर करता है, वह उसे अनंत जीवन के लिये सुरक्षित रखता है।

26) यदि कोई मेरी सेवा करना चाहता है तो वह मेरा अनुसरण करे। जहाँ मैं हूँ वहीं मेरा सेवक भी होगा। जो मेरी सेवा करेगा, मेरा पिता उस को सम्मान प्रदान करेगा।



📚 मनन-चिंतन



गेहूँ के दाने को फल पैदा करने के लिए सिर्फ मरने से काम नहीं चलेगा। इसे 'पृथ्वी में गिरना' चाहिए, मिटटी में गिरना चाहिए। जहाँ से उसे एक नए जीवन की शुरुआत के लिए पर्याप्त उर्वरता, और खनिज पदार्थ प्राप्त होंगे। हम भी पाने जीवन में अपने दम पर कुछ हासिल नहीं कर पाएंगे। हमें उस पोषण की आवश्यकता है जो येसु प्रदान हमें करते है, क्योंकि वही हमारा जीवन है। "मार्ग सत्य और जीवन मैं हूँ। "

येसु यहां कहते हैं कि 'सेवा करना' और 'अनुसरण करना' एक ही बात है। यह हम पर निर्भर नहीं करता कि हम उनकी सेवा कैसे करें या कहाँ करें। हमें पहले उनका अनुसरण करना चाहिए और उन्हें हमें उस स्थान तक ले जाने देना चाहिए जहां वे सेवा या सेवकाई के लिए हमें ले जाना चाहते हैं। एक शिष्य यह नहीं कह सकता, 'मैंने इसे अपने तरीके से किया!' नहीं शिष्य यदि अपने तरीके से ही काम करे और अपना जीवन जीए तो वह शिष्य नहीं अपनी मर्ज़ी का मालिक है।



📚 REFLECTION



It will not do for the grain of wheat just to die in order to produce fruit. It must ‘fall into the earth’. We will achieve nothing on our own. We need the nourishment which Jesus provides, for he is our life. "I am the way, the truth and the life."

Jesus says here that ‘serving’ and ‘following’ him are the same thing. It is not for us to choose how or where to serve him. We must follow first and let him lead us to where he wants us to serve. A disciple cannot say, ‘I did it my way!’ One who does things his way, cannot be called a disciple for he is the master of his own will.


 -Br Biniush topno


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सोमवार, 09 अगस्त, 2021 वर्ष का उन्नीसवाँ सामान्य सप्ताह

 

सोमवार, 09 अगस्त, 2021

वर्ष का उन्नीसवाँ सामान्य सप्ताह

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पहला पाठ : विधि-विवरण ग्रन्थ 10:12-22



12) मूसा ने लोगों से कहा, “इस्राएल! तुम्हारा प्रभु-ईश्वर तुम से क्या चाहता है? वह यही चाहता है कि तुम अपने प्रभु-ईश्वर पर श्रद्धा रखो, उसके सब मार्गों पर चलते रहो, उसे प्यार करो, सारे हृदय और सारी आत्मा से अपने प्रभु-ईश्वर की सेवा करो और

13) प्रभु के उन सब आदेशों तथा नियमों का पालन करो, जिन्हें मैं आज तुम्हारे कल्याण के लिए तुम्हारे सामने रख रहा हूँ।

14) आकाश, सर्वाेच्च आकाश, पृथ्वी और जो कुछ उस में है - यह सब तुम्हारे प्रभु ईश्वर का है।

15) फिर भी प्रभु ने तुम्हारे पूर्वजों को प्यार किया और उन को अपनाया है। उनके बाद उसने उनके वंशजों को अर्थात् तुमको सभी राष्ट्रों में से अपनी प्रजा के रूप में चुन लिया, जैसे कि तुम आज हो।

16) अपने हृदयों का खतना करो और हठधर्मी मत बने रहो;

17) क्योंकि तुम्हारा प्रभु ईश्वर ईश्वरों का ईश्वर तथा प्रभुओं का प्रभु है। वह महान् शक्तिशाली तथा भीषण ईश्वर है। वह पक्षपात नहीं करता और घूस नहीं लेता।

18) वह अनाथ तथा विधवा को न्याय दिलाता है, वह परदेशी को प्यार करता है और उसे भोजन-वस्त्र प्रदान करता है।

19) तुम परदेशी को प्यार करो, क्योंकि तुम लोग भी मिस्र में परदेशी थे।

20) तुम अपने प्र्रभु-ईश्वर पर श्रद्धा रखोगे, उसकी सेवा करोगे, उस से संयुक्त रहोगे और उसके नाम की शपथ लोगे।

21) तुम को उसकी स्तुति करनी चाहिए। वह तुम्हारा ईश्वर है। उसने तुम्हारी आँखों के सामने तुम्हारे लिए महान् तथा विस्मयकायी कार्य सम्पन्न किये हैं।

22) जब तुम्हारे पूर्वज मिस्र में आए, तो उनकी संख्या सत्तर ही थी और अब तुम्हारे प्रभु-ईश्वर ने तुम लोगों को आकाश के तारों की तरह असंख्य बना दिया है।



सुसमाचार :मत्ती 17:22-27



22) जब वे गलीलियों में साथ-साथ धूमते थे; तो ईसा ने अपने शिष्यों से कहा, ’’मानव पुत्र मनुष्यों के हवाले कर दिया जावेगा।

23) वे उसे मार डालेंगे और वह तीसरे दिन जी उठेगा। यह सुनकर शिष्यों को बहुत दुःख हुआ।

24) जब वे कफ़रनाहूम आये थे, तो मंदिर का कर उगाहने वालों ने पेत्रुस के पास आ कर पूछा, ’’क्या तुम्हारे गुरू मंदिर का कर नहीं देते?’’

25) उसने उत्तर दिया, ’’देते हैं’’। जब पेत्रुस घर पहुँचा, तो उसके कुछ कहने से पहले ही ईसा ने पूछा, ’’सिमोन! तुम्हारा क्या विचार है? दुनिया के राजा किन लोगों से चंुगी या कर लेते हैं- अपने ही पुत्रों से या परायों से?’’

26) पेत्रुस ने उत्तर दिया, ’’परायों से’’। इस पर ईसा ने उस से कहा, ’’तब तो पुत्र कर से मुक्त हैं।

27) फिर भी हम उन लोगों को बुरा उदाहरण नदें; इसलिए तुम समुद्र के किनारे जा कर बंसी डालो। जो मछली पहले फॅसेगी, उसे पकड़ लेना और उसका मुँह खोल देना। उस में तुम्हें एक सिक्का मिलेगा। उस ले लेना और मेरे तथा अपने लिए उन को दे देना।’’




📚 मनन-चिंतन



आज के सुसमाचार के दो भाग हैं। पहले भाग में येसु ने अपने आने वाले दुख और मृत्यु की घोषणा की। परिणामस्वरूप, हमें बताया जाता है, शिष्यों पर बड़ा दुख छा गया। उदासी एक सामान्य प्रतिक्रिया है जब हम किसी ऐसे व्यक्ति की विदाई या मृत्यु बारे में सुनते हैं जिसे हम प्यार करते हैं। हम सभी उस तरह की उदासी, से वाकिफ़ हैं जो आज के सुसमाचार में शिष्यों को घेर लेती है। कुछ हद तक, हम भी हमारे जीवन में कई प्रकार से उदासी से घिरे रहते हैं, पर हम विश्वासी ऐसी उदासी को अपने ऊपर हावी नहीं होने दे सकते। हमें उस शक्ति में चलते रहना है जो प्रभु हमें देता है।

आज के सुसमाचार पाठ में, येसु और चेले इस कठोर वास्तविकता के क्षण के बाद भी यात्रा करते रहते हैं। आखिरकार वे सिमोन पेत्रुस के घर कफरनहूम आते हैं। वहाँ, एक अजीब सी घटना घटती है। आधा शेकेल कर वह कर है जो येसु के समय में हर यहूदी, मंदिर के रखरखाव के लिए सालाना चुकाता था। एक ओर येसु कहते हैं कि उन्हें और उनके अनुयायियों को इस कर से छूट प्राप्त है, क्योंकि येसु स्वयं अब नए विधान का मंदिर है। वहीँ दूसरी ओर, यीशु ने पेत्रुस से कर का भुगतान करने के लिए कहा ताकि धार्मिक नेताओं को ठेस न पहुंचे। दूसरे शब्दों में,येसु इस संबंध में स्वतंत्रता की घोषणा करते हैं, लेकिन फिर इस स्वतंत्रता को एक तरफ रखने की सलाह देते हैं ताकि अनावश्यक गलती न हो। इस तरह येसु हमें याद दिलाते हैं कि हालांकि हम कुछ मामलों में स्वतंत्र हो सकते हैं, कभी-कभी यह सही हो सकता है पर जब दूसरों की भलाई दांव पर हो तो अपनी स्वतंत्रता का उपयोग न करना ही बेहतर होगा।



📚 REFLECTION




Today's gospel has two parts. In the first part, Jesus announced his coming suffering and death. As a result, we are told, great misery fell upon the disciples. Sadness is a normal reaction when we face the departure or death of someone we love. We are all aware of the kind of sadness that surrounds the disciples in today's gospel. To some extent, we too are surrounded by sadness in many ways in our lives, but we believers cannot let such sadness overwhelm us. We have to keep walking in the power that the Lord gives us. In today's gospel, Jesus and the disciples continue to travel through this harsh reality moment. Eventually they come to Capernaum, the home of Simon Peter. There, a strange incident happens. The half-shekel is the tax that each Jewish temple paid annually for the maintenance of the temple in Jesus' time.

On the one hand, Jesus says that he and his followers are exempt from this tax, because Jesus himself is now the temple of the New Testament. On the other hand, Jesus asked Peter to pay the tax so that the religious leaders would not be offended. In other words, Jesus declares independence in this regard, but then advises setting aside this freedom so as not to make unnecessary mistakes. Thus, Jesus reminds us that although we may be free in some respects, it may be right at times, but it is better not to use our freedom when the well-being of others is at stake.


 -Br. Biniush topno


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Praise the Lord!

Daily Mass Readings for Sunday, 8 August 2021

 Daily Mass Readings for Sunday, 8 August 2021



First Reading: First Kings 19: 4-8


4 And he went forward, one day’s journey into the desert. And when he was there, and sat under a juniper tree, he requested for his soul that he might die, and said: It is enough for me, Lord, take away my soul: for I am no better than my fathers.

5 And he cast himself down, and slept in the shadow of the juniper tree: and behold an angel of the Lord touched him, and said to him: Arise and eat.

6 He looked, and behold there was at his head a hearth cake, and a vessel of water: and he ate and drank, and he fell asleep again.

7 And the angel of the Lord came again the second time, and touched him, and said to him: Arise, eat: for thou hast yet a great way to go.

8 And he arose, and ate, and drank, and walked in the strength of that food forty days and forty nights, unto the mount of God, Horeb.

Responsorial Psalm: Psalms 34: 2-3, 4-5, 6-7, 8-9


R. (9a) Taste and see the goodness of the Lord.

2 I will bless the Lord at all times, his praise shall be always in my mouth.

3 In the Lord shall my soul be praised: let the meek hear and rejoice.

R. Taste and see the goodness of the Lord.

4 O magnify the Lord with me; and let us extol his name together.

5 I sought the Lord, and he heard me; and he delivered me from all my troubles.

R. Taste and see the goodness of the Lord.

6 Come ye to him and be enlightened: and your faces shall not be confounded.

7 This poor man cried, and the Lord heard him: and saved him out of all his troubles.

R. Taste and see the goodness of the Lord.

8 The angel of the Lord shall encamp round about them that fear him: and shall deliver them.

9 O taste, and see that the Lord is sweet: blessed is the man that hopeth in him.

R. Taste and see the goodness of the Lord.

Second Reading: Ephesians 4: 30 – 5: 2


30 And grieve not the holy Spirit of God: whereby you are sealed unto the day of redemption.

31 Let all bitterness, and anger, and indignation, and clamour, and blasphemy, be put away from you, with all malice.

32 And be ye kind one to another; merciful, forgiving one another, even as God hath forgiven you in Christ.

5:1 Be ye therefore followers of God, as most dear children;

2 And walk in love, as Christ also hath loved us, and hath delivered himself for us, an oblation and a sacrifice to God for an odour of sweetness.

Alleluia: John 6: 51

R. Alleluia, alleluia.

51 I am the living bread that came down from heaven, says the Lord; whoever eats this bread will live forever.

R. Alleluia, alleluia.

Gospel: John 6: 41-51


41 The Jews therefore murmured at him, because he had said: I am the living bread which came down from heaven.

42 And they said: Is not this Jesus, the son of Joseph, whose father and mother we know? How then saith he, I came down from heaven?

43 Jesus therefore answered, and said to them: Murmur not among yourselves.

44 No man can come to me, except the Father, who hath sent me, draw him; and I will raise him up in the last day.

45 It is written in the prophets: And they shall all be taught of God. Every one that hath heard of the Father, and hath learned, cometh to me.

46 Not that any man hath seen the Father; but he who is of God, he hath seen the Father.

47 Amen, amen I say unto you: He that believeth in me, hath everlasting life.

48 I am the bread of life.

49 Your fathers did eat manna in the desert, and are dead.

50 This is the bread which cometh down from heaven; that if any man eat of it, he may not die.

51 I am the living bread which came down from heaven.If any man eat of this bread, he shall live for ever; and the bread that I will give, is my flesh, for the life of the world.

-Br. Biniush Topno




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इतवार, 08 अगस्त, 2021 वर्ष का उन्नीसवाँ सामान्य इतवार

 

इतवार, 08 अगस्त, 2021

वर्ष का उन्नीसवाँ सामान्य इतवार




पहला पाठ : राजाओं का पहला ग्रन्थ 19:4-8


4) और वह मरुभूमि में एक दिन का रास्ता तय कर एक झाड़ी के नीचे बैठ गया और यह कह कर मौत के लिए प्रार्थना करने लगा, ‘‘प्रभु! बहुत हुआ। मुझे उठा ले, क्योंकि मैं अपने पुरखों से अच्छा नहीं हूँ।’’

5) वह झाड़ी के नीचे लेट कर सो गया। किन्तु एक स्वर्गदूत ने उसे जगा कर कहा, ‘‘उठिए और खाइए’’।

6) उसने देखा कि उसके सिरहाने पकायी हुई रोटी और पानी की सुराही रखी हुई है। उसने खाया-पिया और वह फिर लेट गया।

7) किन्तु प्रभु के दूत ने फिर आ उसका स्पर्श किया और कहा, ‘‘उठिए और खाइए, नहीं तो रास्ता आपके लिए अधिक लम्बा हो जायेगा’’।

8) उसने उठ कर खाया-पिया और वह उस भोजन के बल पर चालीस दिन और चालीस रात चल कर ईश्वर के पर्वत होरेब तक पहुँचा।



दूसरा पाठ: एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 4:30-5:2



30) पवित्र आत्मा ने मुक्ति के दिन के लिए आप लोगों पर अपनी मोहर लगा दी है। आप उसे दुःख नहीं दें।

31) आप लोग सब प्रकार की कटुता, उत्तेजना, क्रोध, लड़ाई-झगड़ा, परनिन्दा और हर तरह की बुराई अपने बीच से दूर करें।

32) एक दूसरे के प्रति दयालु तथा सहृदय बनें। जिस तरह ईश्वर ने मसीह के कारण आप लोगों को क्षमा कर दिया, उसी तरह आप भी एक दूसरे को क्षमा करें।

1) आप लोग ईश्वर की प्रिय सन्तान हैं, इसलिए उसका अनुसरण करें

2) और प्रेम के मार्ग पर चलें, जिस तरह मसीह ने आप लोगों को प्यार किया और सुगन्धित भेंट तथा बलि के रूप में ईश्वर के प्रति अपने को हमारे लिए अर्पित कर दिया।

3) जैसा कि सन्तों के लिए उचित है, आप लोगों के बीच किसी प्रकार के व्यभिचार और अशुद्धता अथवा लोभ की चर्चा तक न हो,

4) और न भद्यी, मूर्खतापूर्ण या अश्लील बातचीत; क्योंकि यह अशोभनीय है- बल्कि आप ईश्वर को धन्यवाद दिया करें।

5) आप लोग यह निश्चित रूप से जान लें कि कोई व्यभिचारी, लम्पट या लोभी - जो मूर्तिपूजक के बराबर है- मसीह और ईश्वर के राज्य का अधिकारी नहीं होगा।



सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 6:41-51



41) ईसा ने कहा था, ‘‘स्वर्ग से उतरी हुई रोटी मैं हूँ’’। इस पर यहूदी यह कहते हुए भुनभुनाते थे,

42) ‘‘क्या वह यूसुफ का बेटा ईसा नहीं है? हम इसके माँ-बाप को जानते हैं। तो यह कैसे कह सकता है- मैं स्वर्ग से उतरा हूँ?’’

43) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, ‘‘आपस में मत भुनभुनाओ।

44) कोई मेरे पास तब तक नहीं आ सकता, जब तक कि पिता, जिसने मुझे भेजा, उसे आकर्षित नहीं करता। मैं उसे अन्तिम दिन पुनर्जीवित कर दूंगा।

45) नबियों ने लिखा है, वे सब-के-सब ईश्वर के शिक्षा पायेंगे। जो ईश्वर की शिक्षा सुनता और ग्रहण करता है, वह मेरे पास आता है।

46) ‘‘यह न समझो कि किसी ने पिता को देखा है; जो ईश्वर की ओर से आया है, उसी ने पिता को देखा है

47) मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- जो विश्वास करता है, उसे अनन्त जीवन प्राप्त है।

48) जीवन की रोटी मैं हूँ।

49) तुम्हारे पूर्वजों ने मरुभूमि में मन्ना खाया, फिर भी वे मर गये।

50) मैं जिस रोटी के विषय में कहता हूँ, वह स्वर्ग से उतरती है और जो उसे खाता है, वह नहीं मरता।

51) स्वर्ग से उतरी हुई वह जीवन्त रोटी मैं हूँ। यदि कोई वह रोटी खायेगा, तो वह सदा जीवित रहेगा। जो रोटी में दूँगा, वह संसार के लिए अर्पित मेरा मांस है।’’



📚 मनन-चिंतन


आज येसु हमें बुलाते हैं कि हम उनके पास आएं ताकि वो हमें तृप्त कर सकें। येसु स्वयं को उस रोटी के रूप में वर्णित करते हैं जो स्वर्ग से उतरती है और वे हमें इस रोटी को खाने के लिए बुलाते हैं। जब हम रोटी की बात सुनते हैं तो हम शायद सहज रूप से यूखारिस्त के बारे में सोचते हैं। फिर भी, यह बेहतर होगा कि आज हम यूखारिस्त से थोड़ा हटकर मनन चिंतन करें। प्रभु हमें आमंत्रित करते है कि हम उनके पास आएं और उसकी उपस्थिति का भोजन करें, और विशेष रूप से उनके वचन का भोजन करें। यहूदी शास्त्रों याने पुराने विधान में रोटी अक्सर ईश्वर के वचन का प्रतीक है। हम विधि विवरण ग्रन्थ के इस उद्धरण से परिचित हैं- "इससे उसने तुमको यह समझाना चाहा कि मनुष्य रोटी से ही नहीं जीता है। वह ईश्वर के मुख से निकलने वाले हर एक शब्द से जीता है।" (वि. वि. 8:3) हमें भौतिक रोटी तो की तो ज़रूरत पड़ती ही है, लेकिन हमें ईश्वर के वचन की आत्मिक रोटी भी चाहिए।

हम यीशु के पास उसके वचन से पोषित होने के लिए आते हैं। पिता हमें अपने पुत्र के पास ले जाता है ताकि उनके वचन से हमारा पोषण हो। उसके वचन का भोजन हमें जीवन की हमारी यात्रा में मज़बूत बनाए रखेगा, ठीक वैसे ही जैसे पहले पाठ में, एक पकी हुई रोटी से एलिय्याह अपने गंतव्य, ईश्वर के पर्वत तक पहुँचने तक जीवित रहा। जब हम येसु के पास आते रहेंगे और उसके वचन को खाते रहेंगे, तो वह वचन हमारे जीवन को आकार और एक नया स्वरुप देगा। यह हमें उस तरह का जीवन जीने की शक्ति देता है जो संत पौलुस आज के दूसरे पाठ में हमारे सामने रखते हैं, अनिवार्य रूप से प्रेम का जीवन, एक ऐसा जीवन जिसमें हम एक दूसरे को मसीह के रूप में प्यार करते हैं। संक्षेप में, यह हमारी बपतिस्माँ की बुलाहट है।


📚 REFLECTION




Today, Jesus calls on us to come to him with a view to our feeding on him. The language of the Gospel reading is very graphic. Jesus speaks of himself as the bread that comes down from heaven and calls on us to eat this bread. When we hear that kind of language we probably think instinctively of the Eucharist. Yet, it might be better not to jump to the Eucharist too quickly. The Lord invites us come to him and to feed on his presence, and in particular to feed on his Word. In the Jewish Scriptures bread is often a symbol of the word of God. We may be familiar with the quotation from the Deuteronomy, ‘we do not live on bread alone but on every word that comes from the mouth of God’. We need physical bread, but we also need the spiritual bread of God’s word. We come to Jesus to be nourished by his word. The Father draws us to his Son to be fed by his Word. The food of his Word will sustain us on our journey through life, just as, in the first reading, the baked scones sustained Elijah, until he reached his destination, the mountain of God. When we keep coming to Jesus and feeding on his Word, that Word will shape our lives. It empowers us to live the kind of life that Saint Paul puts before us in this morning’s second reading, a life of love essentially, a life in which we love one another as Christ as loved us, forgive one another as readily as God forgives us. That, in essence, is our baptismal calling.



मनन-चिंतन - 2



राजाओं के दूसरे ग्रंथ में हम नबी एलियस के जीवन की उस घटना के बारे में पढते हैं जब वे शत्रुओं से भाग रहे थे। थकान, भूख और विषम परिस्थितियों के कारण वे अत्याधिक क्षीण होकर सो जाते हैं। इस दौरान स्वर्गदूत उन्हें जगाते तथा रोटी और जल प्रदान करते हैं। इस प्रकार ईश्वर स्वयं नबी को रोटी प्रदान करते हैं। (1राजाओं 19:4-8) धर्मग्रंथ में अनेक अवसरों पर ईश्वर मनुष्यों को रोटी प्रदान करते हैं। मरूभूमि में ईश्वर लोगों को मन्ना अर्थात रोटी प्रदान करते हैं। ’’प्रभु ने मूसा से कहा, मैं तुम लोगों के लिए आकाश से रोटी बरसाऊँगा।...मूसा ने लोगों से कहा, ’’यह वही रोटी है, जिसे प्रभु तुम लोगों को खाने के लिए देता है।’’ (निर्गमन 16:4,15) जब नबी दानिएल को सिंहों के खडड में डाल दिया गया था तो ईश्वर नबी हबक्कूक को दानिएल के लिए भोजन ले जाने को कहते हैं, ’’प्रभु के दूत ने हबक्कूक से कहा, ’अपने पास का यह भोजन बाबुल के सिंहों के खड्ड में दानिएल के पास ले जाओ’’। (दानिएल 14:34) इसी प्रकार प्रभु सरेप्ता की विधवा को भी अकाल के दौरान रोटी प्रदान करते हैं। ’’इस्राएल का प्रभु-ईश्वर यह कहता हैः जिस दिन तक प्रभु पृथ्वी पर पानी न बरसाये, उस दिन तक न तो बर्तन में आटा समाप्त होगा और न तेल की कुप्पी खाली होगी।’’ (1राजाओं 17:14) सुसमाचार में येसु रोटी के चमत्कार के द्वारा लोगों के लिए रोटी का प्रबंध करते हैं, (मत्ती 14:13-21; मारकुस 6:30-44; लूकस 9:10-17; योहन 6:1-15)

योहन 6:41-51 में येसु समझाते हैं कि जो रोटी मरुभूमि में उन्हें प्रदान की गयी थी वह रोटी सचमुच में ईश्वर ने प्रदान की थी किन्तु वह भोजन मात्र था जिसका उद्देश्य शारीरिक भूख मिटाना था। वह रोटी उन्हें अनंत मृत्यु से बचाने में असमर्थ थी। ’’तुम्हारे पूर्वजों ने मरुभूमि में मन्ना खाया; फिर भी वे मर गये।’’ किन्तु येसु आगे कहते हैं ’’स्वर्ग से उतरी हुई वह जीवंत रोटी मैं हूँ। यदि कोई वह रोटी खाये, तो वह सदा जीवित रहेगा।’’

येसु ने शिष्यों के साथ अपने भोज में यूखारिस्त की स्थापना करते हुये पुनः अपने शरीर को रोटी के रूप में घोषित किया, ’’यह मेरा शरीर है, जो तुम्हारे लिए दिया जा रहा है। यह मेरी स्मृति में किया करो’’ (लूकस 22:19) (देखिए मत्ती 26:26; मारकुस 14:22; 1कुरि.11:24) येसु तो उस भोज के दौरान रोटी देते हैं किन्तु कलवारी पर वह अपने शरीर, जिसे उन्होंने रोटी कहा था, को क्रूस पर चढा कर सचमुच में अपने शरीर को वह रोटी बना देते हैं जो हम विश्वासियों को मुक्ति प्रदान करेगी।

जो येसु को रोटी के रूप में ग्रहण करता है वह अपने जीवन में क्रूस की शिक्षा को भी अपनाता है। इसके द्वारा वह सदैव प्रभु में जीवित रहता है तथा प्रभु उसमें। इस विश्वास के द्वारा हम जीवन की सारी अनिश्चिताओं एवं विपत्तियों पर विजयी प्राप्त कर सकते हैं। येसु जो ’स्वर्ग से उतरी जीवंत रोटी’ के रहस्य हैं, उनको समझने के लिए विश्वास की आवश्यकता पडती है जो केवल पिता ही दे सकता है। ’’कोई मेरे पास तक नही आ सकता जब तक कि पिता, जिसने मुझे भेजा है, उसे आकर्षित न करे।’’(योहन 6:44) ’’इसलिए मैंने तुम लोगों से यह कहा कि कोई भी मेरे पास तब तक नहीं आ सकता, जब तक उसे पिता से यह वरदान न मिला हो।’’ (6:65) इसलिए हमें येसु में ईश्वरीयता को पहचानने तथा उसे स्वीकार करने के लिए विश्वास के वरदान के लिए पिता से प्रार्थना करना चाहिए तथा सांसारिक सोच से ऊपर उठकर येसु को अपनाना चाहिए। यहूदी येसु को मात्र मनुष्य समझते और तिरस्कृत करते हुए कहते हैं, ’’क्या यह यूसुफ का बेटा येसु नहीं है? हम इसके मॉ-बाप को जानते हैं। तो यह कैसे कह सकता है-मैं स्वर्ग से उतरा हूँ?’’ ऐसी सांसारिक सोच के विरूद्ध संत पौलुस चेतावनी देते हैं, ’’यदि मसीह पर हमारा भरोसा इस जीवन तक ही सीमित है, तो हम सब मनुष्यों में सब से अधिक दयनीय है। (1 कुरि. 15:19) कई बार हमारी सोच इस नश्वर संसार तक सीमित रहती है। इस कारण हम येसु में अंनत जीवन के महान रहस्य को समझने में विफल होकर भटकते रहते हैं। आईये हम विश्वास के वरदान के लिए प्रार्थना करे तथा येसु जो जीवंत रोटी है को ग्रहण कर अंनत जीवन प्राप्त करे।


-Br. Biniush Topno



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