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शुक्रवार, 11 जून, 2021

येसु के पवित्रतम हृदय का महोत्सव


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पहला पाठ : होशेआ 11:1, 3-4, 8स-9



1) इस्राएल जब बालक था, तो मैं उसे प्यार करता था और मैंने मिस्र देश से अपने पुत्र को बुलाया।

3) मैंने एफ्राईम को चलना सिखाया। मैं उन्हें गोद में उठाय करता था, किन्तु वे नहीं समझे कि मैं उनकी देखरेख करता था।

4) मैं उन्हें दया तथा प्रेम की बागडोर से टहलाता था। जिस तरह कोई बच्चे को उठा कर गले लगाता है, उसी तरह मैं भी उनके साथ व्यवहार करता था। मैं झुक कर उन्हें भोजन दिया करता था।

8) एफ्राईम! मैं तुम्हें कैसे त्याग दूँ? इस्राएल! मैं तुम्हें कैसे शत्रु के हाथों सौप दूँ? मैं तुम्हें अदमा के समान कैसे राख में मिला दूँ? मैं तुम्हें सबोयीम के समान कैसे भस्म कर दूँ? मेरा हृदय यह नहीं मानता, मुझ में दया उमड आती है।

9) मैं अपना क्रोध भडकने नहीं दूँगा, मैं फिर एफ्राईम का विनाश नहीं करूँगा, क्योंकि मैं मनुय नहीं, ईश्वर हूँ। मैं तुम्हारे बीच परमपावन प्रभु हूँ- मुझे विनाश करने से घृणा है।



दूसरा पाठ: एफेसियों 3:8-12, 14-19



8) मुझे, जो सतों में सब से छोटा हूँ, यह वरदान मिला है कि मैं गैर-यहूदियों को मसीह की अपार कृपानिधि का सुसमाचार सुनाऊँ

9) और मुक्ति-विधान का वह रहस्य पूर्ण रूप से प्रकट करूँ, जिसे समस्त विश्व के सृष्टिकर्ता ने अब तक गुप्त रखा था।

10) इस तरह, कलीसिया के माध्यम से स्वर्ग के दूत ईश्वर की बहुविध प्रज्ञा का ज्ञान प्राप्त करेंगे।

11) ईश्वर ने अनन्त काल से जो उद्देश्य अपने मन में रखा, उसने उसे हमारे प्रभु ईसा मसीह द्वारा पूरा किया।

12) हम मसीह में विश्वास करते हैं और इस कारण हम पूरे भरोसे के साथ निर्भय हो कर ईश्वर के पास जाते हैं।

14 (14-15) मैं उस पिता के सामने, जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर प्रत्येक परिवार का मूल आधार है, घुटने टेक कर यह प्रार्थना करता हूँ

16) कि वह अपने आत्मा द्वारा आप लोगों को अपनी अपार कृपानिधि से आभ्यन्तर शक्ति और सामर्थ्य प्रदान करें,

17) जिससे विश्वास द्वारा मसीह आपके हृदयों में निवास करें, प्रेम में आपकी जड़ें गहरी हों और नींव सुदृढ़ हो।

18) इस तरह आप लोग अन्य सभी सन्तों के साथ मसीह के प्रेम की लम्बाई, चैड़ाई, ऊँचाई और गहराई समझ सकेंगे।

19) आप लोगों को उनके प्रेम का ज्ञान प्राप्त होगा, यद्यपि वह ज्ञाने से परे है। इस प्रकार आप लोग, ईश्वर की पूर्णता तक पहुँच कर, स्वयं परिपूर्ण हो जायेंगे।



सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 19:31-37



31) वह तैयारी का दिन था। यहूदी यह नहीं चाहते थे कि शव विश्राम के दिन कू्रस पर रह जाये क्योंकि उस विश्राम के दिन बड़ा त्यौहार पडता था। उन्होंने पिलातुस से निवेदन किया कि उनकी टाँगें तोड दी जाये और शव हटा दिये जायें।

32) इसलिये सैनिकों ने आकर ईसा के साथ क्रूस पर चढाये हुये पहले व्यक्ति की टाँगें तोड दी, फिर दूसरे की।

33) जब उन्होंने ईसा के पास आकर देखा कि वह मर चुके हैं तो उन्होंने उनकी टाँगें नहीं तोडी;

34) लेकिन एक सैनिक ने उनकी बगल में भाला मारा और उस में से तुरन्त रक्त और जल बह निकला।

35) जिसने यह देखा है, वही इसका साक्ष्य देता है, और उसका साक्ष्य सच्चा है। वह जानता है कि वह सच बोलता है, जिससे आप लोग भी विश्वास करें।

36) यह इसलिये हुआ कि धर्मग्रंथ का यह कथन पूरा हो जाये- उसकी एक भी हड्डी नहीं तोडी जायेगी;

37) फिर धर्मग्रन्थ का एक दूसरा कथन इस प्रकार है- उन्होंने जिसे छेदा, वे उसी की ओर देखेगें।



📚 मनन-चिंतन



आज हम प्रभु येसु के पवित्र हदय का पर्व मनाते हैं। प्रभु येसु के पवित्र हदय हम मानवों के लिए अथाह प्रेम का चिन्ह है। प्रभु येसु इसे अपने जीवन, दुःख भोग एवं मृत्यु द्वारा हमें प्रदर्शित करते हैं। यदि हमें प्रभु येसु के प्यार की गहराई को समझना है तो हमें उनके हदय जो हमारे लिए छेदा गया, उसेे देखना होगा। यही कारण था कि उन्होंने क्रूस पर से हमें पाप और उसकी गुलामी से मुक्त किया। सच्चा प्यार कभी कीमत पर निर्भर नहीं रहता, लेकिन सब कुछ सह लेता है। प्रभु येसु का पवित्र क्रूस उनके प्यार का चिन्ह है जो हमारे लिए छेदा गया। कौन ईश्वर के इस प्रेम के गहराई को समझ सकता है? वही समझ सकता है जो पश्चातापी हदय से ईश्वर की प्रेम को जो प्रभु येसु में देखता है। प्रभु हमें इस प्रेम को अपने जीवन को समर्पित करने एवं एक दूसरे के प्रेम से प्रदर्शित करने का निमत्रंण देते हैं।

पहले पाठ नबी होसेया बताते हैं, ईश्वर एक पिता की तरह अपने प्रिय पुत्र से बात करते हैं। उसे चलना सिखाता है, अपने गोद में लेता है और उनकी देखरेख करता है। ईश्वर सब कुछ हमारे लिए अपने प्रेम के कारण करता है।

दूसरे पाठ में संत पौलुस एफेसियों को बताते हैं कि ईश्वर का प्रेम हमारे लिए अपार कृपा निधि हैं। यह हमें ईश्वर के प्रेम को जानने में हमारी सहायता करता है। आज जब हम प्रभु येसु के अनन्त प्रेम का पर्व मनाते हैं, आइये हम उनके प्रेम को पहचानने का प्रयास करें और अपनी इच्छाओं को उनकी इच्छा के अनुरूप बना सकें।




📚 REFLECTION




Today we celebrate the feast of the Sacred Heart of Jesus. Special love expressed through the life, sufferings and death of Jesus. If we want to fathom the love of God’s love, which was pierced with a lance for our sake, we have to gaze at his love. This is the reason why he went on the cross to redeem us from the slavery of sin and death. The true love does not count the cost, but gives everything for the beloved. The cross shows the love of Christ broken and pierced for our sake. Who can fathom the love of God? Only a broken and contrite heart can fathom the mercy of God revealed in Jesus Christ. The Lord Jesus calls us to lay down our lives in sacrificial love for one another.

In the first reading Hosea speaks that God speaks to us as a parent speaking to his son. He teaches him to walk, takes on his lap and looks after. God does everything for the sake of love. In the second reading, Paul speaks to the Ephesians that God’s love is a God’s gift of grace. This helps us to know the love of God and try to comprehend his will.


 -Br Biniush Topno


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गुरुवार, 10 जून, 2021 वर्ष का दसवाँ सप्ताह

 

गुरुवार, 10 जून, 2021

वर्ष का दसवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : 2 कुरिन्थियों 3:15-4:1,3-6



15) जब मूसा का ग्रन्थ पढ़ कर सुनाया जाता है, तो उनके मन पर आज भी वह परदा पड़ा रहता है।

16) किन्तु जब कोई प्रभु की ओर अभिमुख हो जाता है, तो वह परदा हटा दिया जाता है;

17) क्योंकि प्रभु तो आत्मा है, और जहाँ प्रभु का आत्मा है, वहाँ स्वतन्त्रता है।

18) जहाँ तक हम सबों का प्रश्न है, हमारे मुख पर परदा नहीं है और हम सब दर्पण की तरह प्रभु की महिमा प्रतिबिम्बित करते हैं। इस प्रकार हम धीरे-धीरे उसके महिमामय प्रतिरूप में रूपान्तरित हो जाते हैं और वह रूपान्तरण प्रभु अर्थात् आत्मा का कार्य है।

4:1) ईश्वर की दया ने हमें यह सेवा-कार्य सौंपा है, इसलिए हम कभी हार नहीं मानते।

3) यदि हमारा सुसमाचार किसी तरह गुप्त या अस्पष्ट है, तो उन लोगों के लिए, जो विनाश के मार्ग पर चलते हैं।

4) इस संसार के देवता ने अविश्वासियों का मन इतना अन्धा कर दिया है कि वे ईश्वर के प्रतिरूप, मसीह के महिमामय सुसमाचार की ज्योति को देखने में असमर्थ हैं।

5) हम अपना नहीं, बल्कि प्रभु ईसा मसीह का प्रचार करते हैं। हम ईसा के कारण अपने को आप लोगों का दास समझते हैं।

6) ईश्वर ने आदेश दिया था कि अन्धकार में प्रकाश हो जाये। उसी ने हमारे हृदयों को अपनी ज्योति से आलोकित कर दिया है, जिससे हम ईश्वर की वह महिमा जान जायें, जो मसीह के मुखमण्डल पर चमकती है।



सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 5:20-26



(20) मैं तुम लोगों से कहता हूँ - यदि तुम्हारी धार्मिकता शास्त्रियों और फ़रीसियों की धार्मिकता से गहरी नहीं हुई, तो तुम स्वर्गराज्य में प्रवेश नहीं करोगे।

(21) "तुम लोगों ने सुना है कि पूर्वजों से कहा गया है- हत्या मत करो। यदि कोई हत्या करे, तो वह कचहरी में दण्ड के योग्य ठहराया जायेगा।

(22) परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ - जो अपने भाई पर क्रोध करता है, वह कचहरी में दण्ड के योग्य ठहराया जायेगा। यदि वह अपने भाई से कहे, ’रे मूर्ख! तो वह महासभा में दण्ड के योग्य ठहराया जायेगा और यदि वह कहे, ’रे नास्तिक! तो वह नरक की आग के योग्य ठहराया जायेगा ।

(23) "जब तुम वेदी पर अपनी भेंट चढ़ा रहे हो और तुम्हें वहाँं याद आये कि मेरे भाई को मुझ से कोई शिकायत है,

(24) तो अपनी भेंट वहीं वेदी के सामने छोड़ कर पहले अपने भाई से मेल करने जाओ और तब आ कर अपनी भेंट चढ़ाओ।

(25) "कचहरी जाते समय रास्ते में ही अपने मुद्दई से समझौता कर लो। कहीं ऐसा न हो कि वह तुम्हें न्यायाकर्ता के हवाले कर दे, न्यायाकर्ता तुम्हें प्यादे के हवाले कर दे और प्यादा तुम्हें बन्दीगृह में डाल दे।

(26) मैं तुम से यह कहता हूँ - जब तक कौड़ी-कौड़ी न चुका दोगे, तब तक वहाँ से नहीं निकल पाओगे।



📚 मनन-चिंतन



आज का सुसमाचार संत मत्ती 5:20-26, में हम सुनते हैं कि हमें किस प्रकार अधार्मिकता को नियंत्रित करना है, हमारी मानवीय स्वभाव है कि हम क्रोध, बदले की भवना, बुरी आदतें और घृणा से ग्रसित हैं। मैं समझता हूँ कि इस प्रकार की भावनाओं से कोई भी व्याक्ति अच्छूता नहीं है। इसे हम उत्पत्ति ग्रन्थ 4:6-7 में पाते हैं। प्रभु ने काइन से कहा, ’’तुम क्यों क्रोध करते हो और तुम्हारा चेहरा क्यों उतरा हुआ है? जब तुम भला करोगे, तो प्रसन्न होगे। यदि तुम भला नहीं करोगे, तो पाप हिंस्र पशु की तरह तुम पर झपटने के लिए तुम्हारे द्वार पर घात लगा कर बैठेगा। क्या तुम उसका दमन कर सकोगे? इस प्रकार की भावनाएँ हमारे जीवन का अंग है। हमारी भावनाएँ अच्छी या बुरी हो सकती है। अच्छी भावनाएँ हमें सदगुणों से सम्पन्न करती है, जबकि अवगुण हमें बुरी विचारों से भरकर बुरी सोचने के लिए बाध्य करता है।

आज प्रभु येसु अपने शिष्यों और हमें बताते हैं कि कैसे सही गुणों का चुनाव किया जाए। हम उन गुणों का चुनाव करें जिससे हमारी अधार्मिकता दूर हो सके। जैसे प्रेम, आशा, दया और विश्वास। सुसमाचार में हम पाते हैं कि नाकेदार, वेश्याएँ, परस्त्रीगामियों, अपराधियों समाज से तिरष्कृत लोगों ने प्रभु येसु को पहचाना, लेकिन स्थापित धार्मिक अधिकारियों ने नहीं। धर्मान्तरित अपने विश्वास पर हमेशा प्रसंनचित होगें क्योंकि उन्होंने अपने पुराने गहरे घाव (तिनका) अपने हदय में बसा था। और जो आंधे थे वे हमेशा खुशी महसूस करेगें क्योंकि उन्होंने अंधकार से ज्योति में प्रवेश किया।




📚 REFLECTION




In today’s gospel reading Mt.5: 20-26, we hear that how we need to control our unrighteousness. It is our human nature that we are easily prone to anger, hatred, jealousy, evil intention creep in us. I think from these nobody is an exception. We find it in Gen.4:6-7, The Lord said to Cain, “why are you angry and why has your countenance fallen? If you do well, will you not be accepted? And if you do not do well, sin is lurking at the door; its desire is for you, but you must master it.” As human beings we experience these emotions in our life. They are part and parcel of our life. Our emotions can be positive or negative. Positive emotions lead us to do well, whereas negative emotions compel us to think contrary or opposite.

Today Jesus tells his disciples choose the right perspective of life. We need to choose right perspective which enables us to overcome our unrighteousness. We find in the gospels that the tax collectors, prostitutes, adulterers, criminals, rejects of the society recognised who Christ was before most of the established religious authorities did. Converts to the faith will always have a much deeper appreciation for the faith because they had a deeper wound (splinter) in their heart. The blind will always cherish their sight more than those could see because they went from darkness to light.



 -Br Biniush Topno


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बुधवार, 09 जून, 2021 वर्ष का दसवाँ सप्ताह

 

बुधवार, 09 जून, 2021

वर्ष का दसवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : 2 कुरिन्थियों 3:4-11



4) हम यह दावा इसलिए कर सकते हैं कि हमें मसीह के कारण ईश्वर पर भरोसा है।

5) इसका अर्थ यह नहीं कि हमारी कोई अपनी योग्यता है। हम अपने को किसी बात का श्रेय नहीं दे सकते। हमारी योग्यता का स्त्रोत ईश्वर है। उसने हमें एक नये विधान के सेवक होने के योग्य बनाया है

6) और यह विधान अक्षरों का नहीं, बल्कि आत्मा का है; क्योंकि अक्षर तो घातक हैं, किन्तु आत्मा जीवनदायक हैं।

7) उस विधान के अक्षर पत्थर पर अंकित थे और उसके द्वारा प्राणदण्ड दिया जाता था। फिर भी उसकी महिमामय घोषणा के फलस्वरूप मूसा का मुखमण्डल इतना दीप्तिमय हो गया था कि इस्राएली उस पर आँख जमाने में असमर्थ थे, यद्यपि मूसा के मुखमण्डल की दीप्ति अस्थायी थी।

8) यदि पुराना विधान इतना महिमामय था, तो आत्मा का विधान कहीं अधिक महिमामय होगा।

9) यदि दोषी ठहराने वाले विधान का सेवा-कार्य इतना महिमामय था, तो दोषमुक्त करने वाले विधान का सेवा-कार्य कहीं अधिक महिमामय होगा।

10) इस वर्तमान परमश्रेष्ठ महिमा के सामने वह पूर्ववर्ती महिमा अब निस्तेज हो गयी है।

11) यदि अस्थायी विधान इतना महिमामय था, तो चिरस्थायी विधान कहीं अधिक महिमामय होगा।



सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 5:17-19



(17) "यह न समझो कि मैं संहिता अथवा नबियों के लेखों को रद्द करने आया हूँ। उन्हें रद्द करने नहीं, बल्कि पूरा करने आया हूँ।

(18) मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ - आकाश और पृथ्वी भले ही टल जाये, किन्तु संहिता की एक मात्रा अथवा एक बिन्दु भी पूरा हुए बिना नहीं टलेगा।

(19) इसलिए जो उन छोटी-से-छोटी आज्ञाओं में एक को भी भंग करता और दूसरों को ऐसा करना सिखाता है, वह स्वर्गराज्य में छोटा समझा जायेगा। जो उनका पालन करता और उन्हें सिखाता है, वह स्वर्गराज्य में बड़ा समझा जायेगा।



📚 मनन-चिंत


आज के सुसमाचार में केवल तीन ही पद है। तथापि, यह एक शाक्तिशाली संदेश है। प्रभु येसु अपने शिष्यों को यह कहते हुए शुरूआत करते हैं कि उनका उद्द्ेश्य संहिता को रद्द करना या आलोचना करना नहीं था जिन्हें नबियों ने घोषित और सिखाया था प्रभु येसु की इच्छा सभी लेखों को पुरा करना था। प्रभु येसु जोर देकर कहते हैं कि आज्ञाओं का पालन करना आवश्यक है।

हलाँकि फरीसियों की दृष्टि में, प्रभु येसु ने यहुदियों की आज्ञाओं का उलंघन भी किया। वे उनेकों बार प्रभु येसु की आलोचना किए कि वे उनके आज्ञाओं का पालन नहीं करते ऐसा उन्होंने विश्वास किया कि वे उन्हें इनका पालन करना चाहिए और उनके पास आलोचना करने का आधार था। उन्होंने उन लेखों को नहीं अपनाया जैसा फरीसियों में सोचा और पालन किया। फरीसियों ने लेखों का अक्षरसः पालन किया।

प्रभु येसु हलाँकि एक अलग तरह के लेख को अपनाया, प्रेम के लेख। प्रभु येसु बहुधा यहुदियों के लेखों और परम्पराओं का पालन किया। तथपि, जब भी मनुष्यों की आवश्यकता की जरूरत थी, तो उन्होंने प्रेम और दया को अपनाया, प्रभु येसु ईश्वर के लेख के अनुसार जीवन जीया। हाँ उनके लिए सभी आज्ञाएँ महत्वपूर्ण एवं आश्वयक है। प्रभु येसु के लिए पहले दो आज्ञाएँ महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है। प्रभु येसु के लिए पहले दो आज्ञाएँ बाकी सभी आज्ञाओं का आधार है ईश्वरीय प्रेम और पड़ोसी प्रेम।



📚 REFLECTION



The gospel reading of today has only three verses. However, it has a powerful message. Jesus begins by telling his disciples that his purpose is not to abolish law or to criticize what the prophets proclaimed and taught. Jesus’ intent was to fulfil the law. Jesus emphasises that keeping the commandment is essential.

However, in the eyes of the Pharisees, Jesus frequently disobeyed Jewish law. They often criticized him for not following the law- at least as they believed it should be obeyed. And they did have grounds for their criticism of Jesus. He did not follow the law as the Pharisees thought it should be followed. The Pharisees lived by the letter of the law.

Jesus however, lived by a different law, the law of love! He followed most of the Jewish laws and customs. However, when it came to people in need of love and compassion, he lived by the law of God! Yes, all the commandments are important and necessary. For Jesus, the first two commandments are the foundation for the other eight commandments: love of God and love of neighbour.


 -Br Biniush Topno



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मंगलवार, 08 जून, 2021 वर्ष का दसवाँ सप्ताह

 

मंगलवार, 08 जून, 2021

वर्ष का दसवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : 2 कुरिन्थियों 1:18-22



18) ईश्वर की सच्चाई की शपथ! मैंने आप लोगों को जो सन्देश दिया, उस में कभी ’हाँ’ और कभी ’नहीं’-जैसी बात नहीं है;

19) क्योंकि सिल्वानुस, तिमथी और मैंने आपके बीच जिनका प्रचार किया, उन ईश्वर के पुत्र ईसा मसीह में कभी ’हाँ’ और कभी ’नहीं’-जैसी बात नहीं - उन में मात्र ’हाँ’ है।

20) उन्हीं में ईश्वर की समस्त प्रतिज्ञाओं की ’हाँ’ विद्यमान है, इसलिए हम ईश्वर की महिमा के लिए उन्हीं के द्वारा ’आमेन’ कहते हैं।

21) ईश्वर आप लोगों के साथ हम को मसीह में सुदृढ़ बनाये रखता है और उसी ने हमारा अभिशेक किया है।

22) उसी ने हम पर अपनी मुहर लगायी और अग्रिम के रूप में हमारे हृदयों को पवित्र आत्मा प्रदान किया है।



सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 5:13-16



(13) "तुम पृथ्वी के नमक हो। यदि नमक फीका पड़ जाये, तो वह किस से नमकीन किया जायेगा? वह किसी काम का नहीं रह जाता। वह बाहर फेंका और मनुष्यों के पैरों तले रौंदा जाता है।

(14) "तुम संसार की ज्योति हो। पहाड़ पर बसा हुआ नगर छिप नहीं सकता।

(15) लोग दीपक जला कर पैमाने के नीचे नहीं, बल्कि दीवट पर रखते हैं, जहाँ से वह घर के सब लोगों को प्रकाश देता है।

(16) उसी प्रकार तुम्हारी ज्योति मनुष्यों के सामने चमकती रहे, जिससे वे तुम्हारे भले कामों को देख कर तुम्हारे स्वर्गिक पिता की महिमा करें।



📚 मनन-चिंतन



आज के सुसमाचार पर्वत प्रवचन में हम सुनते हैं कि प्रभु येसु हमें नमक और ज्योति के बारे में बताते हैं। नमक की अपने आप में कोई उपयोगिता नहीं है। यदि हमें कितनी ही मँहगी और स्वादिष्ट भोजन दिया जाए यदि उसमें नमक ना हो तो वह फीका ही समझा जायेगा। वह फेका और पैरों तले रौंदा जाता है। दोनों नमक और ज्योति अपने गुणों द्वारा अपने आस-पास के लोगों और वस्तुओं को प्रभावित करते हैं। नमक का अर्थ है कि हम अपने अच्छे गुणों द्वारा उनके जीवन को प्रभावित कर प्रभु येसु के असीम प्रेम को दूसरों तक अपने अच्छे कार्यों द्वारा दिखा सकें। नमक का उपयोग वस्तु को सड़ने या गलने से रोकने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है। उसी प्रकार ज्योति के महत्व को हम तब समझते हैं जब हम अंधकार में फंस जाते हैं।

हमें अपने ख्रीस्तीय जीवन में नमक और ज्योति तरह बनकर दुसरों के लिए सार्थक और उपयोगी बनना है। यही हमारे ख्रीस्तीय जीवन का सार है। इसीलिए प्रभु येसु हमे संत योहन के सुसमाचार 01:4-5 में कहते हैं, उसमें जीवन था, और वह जीवन मनुष्यों की ज्योति था। वह ज्योति अंधकार में चमकती रहती है - अंधकार ने उसे नहीं बुझाया।



📚 REFLECTION



In today’s gospel reading Sermon on the Mount, we hear very important things told by Jesus about salt and light. Salt by itself has no utility. If we are served a costly and delicious meal; but if it has no salt then it will be of no use. It will be thrown away and trampled by foot. Both salt and light have properties which affect things around them. To ‘be salt’ means to deliberately seek the influence the people in one’s life by showing them the unconditional love of Christ through good deeds. And also salt is used to enhance flavour and as a preservative. Similarly, we feel the importance light when we are in darkness; and we look for light; without light we cannot do anything.

In our Christian life we need to be useful as salt and light for others and make their lives meaningful and useful. This is the core message of Christian life. That’s why Jesus says in St.John’s gospel 1:4-5, in him was life, and the life was the light of all people. The light shines in the darkness, and the darkness did not overcome it.


 -Br Biniush Topno



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सोमवार, 07 जून, 2021 वर्ष का दसवाँ सप्ताह

 

सोमवार, 07 जून, 2021

वर्ष का दसवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : 2 कुरिन्थियों 1:1-7



1) कुरिन्थ में ईश्वर की कलीसिया तथा समस्त अख़ैया में रहने वाले सभी सन्तों के नाम पौलुस, जो ईश्वर द्वारा ईसा मसीह का प्रेरित नियुक्त हुआ है, और भाई तिमथी का पत्र।

2) हमारा पिता ईश्वर, और प्रभु ईसा मसीह आप लोगों को अनुग्रह तथा शान्ति प्रदान करें।

3) धन्य है ईश्वर, हमारे प्रभु ईसा मसीह का पिता, परमदयालु पिता और हर प्रकार की सान्त्वना का ईश्वर।

4) वह सारी दुःख तकलीफ़ में हम को सान्त्वना देता रहता है, जिसमें ईश्वर की ओर से हमें जो सान्त्वना मिलती है, उसके द्वारा हम दूसरों को भी, उनकी हर प्रकार की तकलीफ में सान्त्वना देने के लिए समर्थ हो जायें;

5) क्योंकि जिस प्रकार हम प्रचुर मात्रा में मसीह के दुःख-भोग के सहभागी हैं, उसी प्रकार मसीह द्वारा हम को प्रचुर मात्रा में सान्त्वना भी मिलती है।

6) यदि हमें दुःख भोगना पड़ता है, तो आप लोगों की सान्त्वना और मुक्ति के लिए, और यदि हमें सान्त्वना मिलती है, तो इसलिए की हम आप लोगों को सान्त्वना दे सकें, जिससे आप धैर्य के साथ वह दुःख सहने में समर्थ हों, जिसे हम भोगते हैं।

7) आप लोगों के विषय में हमारी आशा सुदृढ़ है; क्योंकि हम जानते हैं कि जिस प्रकार आप हमारे दुःख के भागी हैं, उसी प्रकार आप हमारी सान्त्वना के भी भागी होंगे।



सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 5:1-12



(1) ईसा यह विशाल जनसमूह देखकर पहाड़ी पर चढ़े और बैठ गए। उनके शिष्य उनके पास आये।

(2) और वे यह कहते हुए उन्हें शिक्षा देने लगेः

(3) "धन्य हैं वे, जो अपने को दीन-हीन समझते हैं! स्वर्गराज्य उन्हीं का है।

(4) धन्य हैं वे जो नम्र हैं! उन्हें प्रतिज्ञात देश प्राप्त होगा।

(5) धन्य हैं वे, जो शोक करते हैं! उन्हें सान्त्वना मिलेगी।

(6) घन्य हैं, वे, जो धार्मिकता के भूखे और प्यासे हैं! वे तृप्त किये जायेंगे।

(7) धन्य हैं वे, जो दयालू हैं! उन पर दया की जायेगी।

(8) धन्य हैं वे, जिनका हृदय निर्मल हैं! वे ईश्वर के दर्शन करेंगे।

(9) धन्य हैं वे, जो मेल कराते हैं! वे ईश्वर के पुत्र कहलायेंगे।

(10) धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के कारण अत्याचार सहते हैं! स्वर्गराज्य उन्हीं का है।

(11) धन्य हो तुम जब लोग मेरे कारण तुम्हारा अपमान करते हैं, तुम पर अत्याचार करते हैं और तरह-तरह के झूठे दोष लगाते हैं।

(12) खुश हो और आनन्द मनाओ - स्वर्ग में तुम्हें महान् पुरस्कार प्राप्त होगा। तुम्हारे पहले के नबियों पर भी उन्होंने इसी तरह अत्याचार किया।



📚 मनन-चिंतन



पर्वत प्रवचन शायद प्रभु येसु के सभी प्रवचनों से प्रसिध्द है। यहाँ पर वे स्वर्गराज्य के रहस्यों को किस प्रकार होना चाहिए उसे बताते हैं। यह प्रभु येसु की अभिव्यक्ति है।

आज के सुसमाचार में हम सभी प्रकार के लोगों को पाते हैंः गरीब, शोक मनाने वाले, भूखे, प्यासे, दयालू, निर्मल, मेल कराने वाले, अत्याचार। ये सभी लोग अलग हैं, उनके अलग कहानी, कमजोरी और शक्ति है, और उनके अलग उदेश्य, चुनौती और जीवन के अलग अनुभव है। फिर भी प्रभु येसु उन्हें धन्य कहते हैं उनके विभिन्नताओं के बौजुद, वे उन्हें अपने पास बुलाते हैं और अपने प्रेम को दिखाते हैं।

आज का सुसमाचार संत फ्रासिंस के शब्दों में, ’’यह एक नया नियम है, एक जिसे हम ’आर्शीवचन’ कहते हैं। यह प्रभु का हमारे लिए नया नियम है.....................ख्रीस्तीय जीवन का राह-माप जो हमें आगे बढ़ने के लिए सच्ची राह दिखाता है।’’



📚 REFLECTION




Sermon on the Mount is perhaps the best known and loved of Christ’s sermon. Here he tells how the members of the kingdom should be. This is the manifesto of Christ. In today’s gospel we find people of all kinds: the poor, the mourning, meek, hungry, merciful, pure, peacemakers, persecuted. All these people are different, have different stories weakness and strengths; also have different goals and challenges and life experiences. And yet Jesus calls them blessed despite their differences, Christ calls them to himself and shows them his love.

In the words of Pope Francis, “This is the new law, the one we call the ‘Beatitudes’. It’s the Lord’s new law for us... the roadmap of Christian life which gives us the indications to move forward on the right path.”(Jan.6th 2016).


 -Br Biniush Topno


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इतवार, 06 जून, 2021 येसु के पवित्रतम शरीर और रक्त का महोत्सव (Corpus Christi)

 

इतवार, 06 जून, 2021

येसु के पवित्रतम शरीर और रक्त का महोत्सव (Corpus Christi)

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पहला पाठ : निर्गमन 24:3-8



3) मूसा ने सीनई पर्वत से उतर कर प्रभु के सब वचन और आदेश लोगों को सुनाये। लोगों ने एक स्वर से इस प्रकार उत्तर दिया, ''प्रभु ने जो कुछ कहा है, हम उसका पालन करेंगे।''

4) मूसा ने प्रभु के सब आदेश लिख दिये और दूसरे दिन, भोर को, उसने पर्वत के नीचे एक वेदी बनायी और इस्राएल के बारह वंषों के लिए बारह पत्थर खड़े कर दिये।

5) उसने इस्राएली नवयुवकों को आदेश दिया कि वे होम-बलि चढ़ायें और शांतियज्ञ के लिए बछड़ों का वध करें।

6) तब मूसा ने पशुओं का आधा रक्त पात्रों में इकट्ठा किया और आधा वेदी पर छिड़का।

7) उसने विधान की पुस्तक ली और उसे लोगों को पढ़ सुनाया। लोगों ने उत्तर दिया, प्रभु ने जो कुछ कहा है, हम उसके अनुसार चलेंगे और उसका पालन करेंगे।

8) इस पर मूसा ने रक्त ले लिया और उसे लोगों पर छिड़कते हुए कहा, ''यह उस विधान का रक्त है, जिसे प्रभु ने उन सब आदेशों के माध्यम से तुम लोगों के लिए निर्धारित किया है।




दूसरा पाठ : इब्रानियों 9:11-15



11) किन्तु अब मसीह हमारे भावी कल्याण के प्रधानयाजक के रूप में आये हैं और उन्होंने एक ऐसे तम्बू को पार किया, जो यहूदियों के तम्बू से महान् तथा श्रेष्ठ है, जो मनुष्य के हाथ से नहीं बना और इस पृथ्वी का नहीं है।

12) उन्होंने बकरों तथा बछड़ों का नहीं, बल्कि अपना रक्त ले कर सदा के लिए एक ही बार परमपावन स्थान में प्रवेश किया और इस तरह हमारे लिए सदा-सर्वदा रहने वाला उद्धार प्राप्त किया है।

13) याजक बकरों तथा सांड़ों का रक्त और कलोर की राख अशुद्ध लोगों पर छिड़कता है और उनका शरीर फिर शुद्ध हो जाता है। यदि उस में पवित्र करने की शक्ति है,

14) तो फिर मसीह का रक्त, जिसे उन्होंने शाश्वत आत्मा के द्वारा निर्दोष बलि के रूप में ईश्वर को अर्पित किया, हमारे अन्तःकरण को पापों से क्यों नहीं शुद्ध करेगा और हमें जीवन्त ईश्वर की सेवा के योग्य बनायेगा?

15) मसीह पहले विधान के समय किये हुए अपराधों की क्षमा के लिए मर गये हैं और इस प्रकार वह एक नये विधान के मध्यस्थ हैं। ईश्वर जिन्हें बुलाते हैं, वे अब उसकी प्रतिज्ञा के अनुसार अनन्त काल तक बनी रहने वाली विरासत प्राप्त करते हैं।



सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 14:12-16,22-26



12) बेख़मीर रोटी के पहले दिन, जब पास्का के मेमने की बलि चढ़ायी जाती है, शिष्यों ने ईसा से कहा, ’’आप क्या चाहते हैं? हम कहाँ जा कर आपके लिए पास्का भोज की तैयारी करें?’’

13) ईसा ने दो शिष्यों को यह कहते हुए भेजा, ’’शहर जाओ। तुम्हें पानी का घड़ा लिये एक पुरुष मिलेगा। उसके पीछे-पीछे चलो।

14) और जिस घर में वह प्रवेश करे, उस घर के स्वामी से यह कहो, ’गुरुवर कहते हैं- मेरे लिए अतिथिशाला कहाँ हैं, जहाँ मैं अपने शिष्यों के साथ पास्का का भोजन करूँ?’

15) और वह तुम्हें ऊपर सजा-सजाया बड़ा कमरा दिखा देगा वहीं हम लोगों के लिए तैयार करो।’’

16) शिष्य चल पड़े। ईसा ने जैसा कहा था, उन्होंने शहर पहुँच कर सब कुछ वैसा ही पाया और पास्का-भोज की तैयारी कर ली।

22) उनके भोजन करते समय ईसा ने रोटी ले ली, और आशिष की प्रार्थना पढ़ने के बाद उसे तोड़ा और यह कहते हुए शिष्यों को दिया, ’’ले लो, यह मेरा शरीर है’’।

23) तब उन्होंने प्याला ले कर धन्यवाद की प्रार्थना पढ़ी और उसे शिष्यों को दिया और सब ने उस में से पीया।

24) ईसा ने उन से कहा, ’’यह मेरा रक्त है, विधान का रक्त, जो बहुतों के लिए बहाया जा रहा है।

25) मैं तुम से यह कहता हूँ- जब तक मैं ईश्वर के राज्य में नवीन रस न पी लूँ, तब तक मैं दाख का रस फिर नहीं पिऊँगा।’’

26) भजन गाने के बाद वे जैतून पहाड़ चल दिये।



📚 मनन-चिंतन



निर्गमन ग्रन्थ 24:3-8 इब्रानियों 9:11-15, मारकुस 14:12-16,22-26

आज हम प्रभु येसु के पवित्र शरीर व रक्त का पर्व मनाते हैं। पवित्र युख्ररिस्त या प्रभु येसु के शरीर और रक्त का त्यौहार हमारे ख्रीस्तिीय जीवन का अभिन्न अंग है क्योंकि प्रभु येसु ने इसे हमारे पापों की क्षमा एवं मुक्ति के लिए स्थापित किया है। इसमें प्रभु येसु हमें पूर्णतः अपने को हमारे लिए देते हैं। व हमारे लिए भोजन और बलि बन जाते हैं। यह त्यौहार हमारे लिए उनकी समृति में मनाया जाता है। उन्होंने हमें आज्ञा दी है कि हम इसे उनकी स्मृति मनाये। मानवीय पोषण के अध्ययन से हमें पता चलता है कि ’’जो हम खाते हैं वही बनते हैं और अच्छी खादय प्रदार्थ हमारे शरीर को पोषित करता है।’’ जैसे हम भौतिक भोजन अपने शरीर को जीवित रखने के लिए खाते हैं, वैसे ही हमारी अध्यात्मिक भोजन हमारी आत्मा को बचाने के लिए आवश्यक है। उसी प्रकार युख्ररिस्त हमारे शरीर और आत्मा को स्वास्थ्य रखता है।

आज के पहले पाठ में मूसा ने इस्रलियों को ईश्वर के आदेश और वचन को सुनाते हैं और लोगों ने एक स्वर से इस प्रकार उत्तर दिया, ’’प्रभु ने जो कुछ कहा है, हम उसका पालन करेंगें (निर्गमन 24:3)। मूसा ने प्रभु के सब आदेश लिख दिये और जोर से पढ़कर सुनाया, लोगों ने पुनः अपनी प्रतिज्ञाओं को दुहराया, प्रभु ने जो कहा है, हम उसके अनुसार चलेंगे और उसका पालन करेंगे। (निर्गमन 34:7)। स्तोत्र ग्रन्थ 116:18 प्रभु की सारी प्रजा के सामने प्रभु के लिए अपनी मन्नतें पुरी करूँगा।

आज का दूसरा पाठ और सुसमाचार हम ख्रीस्तीयों के लिए महिमामय आशा की सुचक है। युख्रीस्तीय संस्कार में प्रभु येसु को ग्रहण कर हम उनके साथ एक हो जाते हैं। प्रभु येसु हमें निमत्रंण देते हुए कहतें हैं, ’’ले लो, यह मेरा शरीर है।’’ (मारकुस 14:22) और पुनः कहते हैं, ’’यह मेरा रक्त है, विधान का रक्त, जो बहुतों के लिए बहाया जा रहा है।’’ (मारकुस 14:24) प्रभु येसु अपने प्रेम को एक पवित्र सहभागिता से पूर्ण करते है।

प्रभु येसु के पवित्र शरीर एवं रक्त के विषय में संत पिता योहन पौलुस द्वितीय ने कहा कि ’’हमारा विश्वास ईश्वर में शरीर धारण किया जिससे हम उनके मित्र बन सकें।’’ उन्हें हम हर जगह घोषित करें, विशेष करके हमारे घरों में, समाज में और हमारे संसार में।




📚 REFLECTION




Today, we celebrate the feast of Holy Eucharist or Holy Body and Blood of Christ. The Eucharist is offered by believers, to the Heavenly Father together with Jesus for the remission of sins and as an offering of gratitude and thanksgiving. The Holy Eucharist is the indivisible part of our Christian life; Jesus instituted it for the forgiveness of our sins and salvation. In the Eucharist Jesus gives himself totally to us and he becomes our food and sacrifice. This feast is celebrated because he has given us the commandment that we celebrate in his memory. From the human nutrition study, it is known that, “we eat what we become,” and good food nourishes the body”. As physical food we eat nourishes the body, so the spiritual food nourishes our soul, and prepares and preserves for eternity, likewise Eucharist keeps our body and soul fit and healthy.

In the first reading today Moses tells to the people Lord’s words and ordinances, and the people respond it, “All the words that the Lord has spoken we will do.” Then Moses wrote down the words of the Lord and read it aloud and the people reaffirm it, “All that the Lord has spoken we will do, and we will be obedient.” We also find similar response of the people in Psalm 116:18, “I will pay my vows to the Lord in the presence of his people.”

Today’s second reading and the gospel is a reminder of his glorious hope of God’s blessing. After receiving the Eucharist we become one with Christ. And Jesus invites us and says, “Take; this is my blood”. And again Jesus said, “This is my blood of the covenant, which is poured out for many.” Jesus completely gives his body and blood for us to become his sons and daughters. St. John Paul II said, “Our faith in God took flesh in order to become our companion along the way need to be everywhere proclaimed, especially in our streets and homes, as an expression of our grateful love as an inexhaustible source of blessings.”




मनन-चिंतन- 2



योहन 15:13 में प्रभु येसु कहते हैं, “इस से बडा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिये अपने प्राण अर्पित कर दे”। प्रभु येसु यही सर्वोत्तम प्रेम क्रूस पर प्रस्तुत करते हैं जब वे कलवारी पहाडी पर क्रूस पर हमारे लिए, सारी मानव-जाति के लिए अपने प्राण अर्पित करते हैं। प्रेम के इस बलिदान को अटारी में शिष्यों के साथ अंतिम भोज के समय एक अमर चिह्न के रूप में प्रदान कर प्रभु ने यूखारिस्तीय संस्कार की स्थापना की। इसलिए यूखारिस्त सर्वोत्तम प्रेम का बलिदान है।

पुराने विधान में पशुओं के बलिदान चढाये जाते थे। परन्तु नये विधान में एक अनोखा बलिदान चढाया जाता है। इस संदर्भ में इब्रानियों के पत्र में प्रभु का वचन कहता है, “प्रधानयाजक ही, वर्ष में एक बार, पिछले कक्ष में वह रक्त लिये प्रवेश करता था, जिसे वह अपने और प्रजा के दोषों के लिए प्रायश्चित के रूप में चढ़ाता था।.... किन्तु अब मसीह हमारे भावी कल्याण के प्रधानयाजक के रूप में आये हैं और उन्होंने एक ऐसे तम्बू को पार किया, जो यहूदियों के तम्बू से महान् तथा श्रेष्ठ है, जो मनुष्य के हाथ से नहीं बना और इस पृथ्वी का नहीं है। उन्होंने बकरों तथा बछड़ों का नहीं, बल्कि अपना रक्त ले कर सदा के लिए एक ही बार परमपावन स्थान में प्रवेश किया और इस तरह हमारे लिए सदा-सर्वदा रहने वाला उद्धार प्राप्त किया है।“ (इब्रानियों 9:7, 11-12)

निर्गमन 24:6,8 में हम देखते हैं कि मूसा ने बलि-पशुओं का आधा रक्त लोगों पर छिड़कते हुए कहा, ''यह उस विधान का रक्त है, जिसे प्रभु ने उन सब आदेशों के माध्यम से तुम लोगों के लिए निर्धारित किया है”। अंतिम भोज के समय प्रभु येसु “ने प्याला लिया, धन्यवाद की प्रार्थना पढ़ी और कहा, ‘‘इसे ले लो और आपस में बाँट लो; क्योंकि मैं तुम लोगों से कहता हूँ, जब तक ईश्वर का राज्य न आये, मैं दाख का रस फिर नहीं पिऊँगा’’। उन्होंने रोटी ली और धन्यवाद की प्रार्थना पढ़ने के बाद उसे तोड़ा और यह कहते हुए शिष्यों को दिया, ‘‘यह मेरा शरीर है, जो तुम्हारे लिए दिया जा रहा है। यह मेरी स्मृति में किया करो’’। (लूकस 22:17-19) उसी आज्ञा के अनुसार आज भी दुनिया भर के गिरजाघरों में वही बलिदान प्रभु येसु की स्मृति में मनाया जाता है।

जब प्रभु इस्राएलियों को मिस्र देश से छुडाने पर थे, तब ईश्वर ने आज्ञा दी थी कि हर इस्राएली परिवार में एक मेमने का वध किया जाये और उसका रक्त घर के चौखटों पर पुताया जाये ताकि विनाशक दूत मेमने के रक्त से पुते इस्राएली घरों को कोई हानि नहीं पहुँचाये। इस्राएली लोग निर्गमन से संबंधित घटनाओं को याद करते हुए हर वर्ष पास्का त्योहार मनाते थे। प्रभु येसु नये विधान का मेमना है। संत योहन बपतिस्ता अपने शिष्यों को येसु से परिचित कराते हुए कहते हैं, “देखो-ईश्वर का मेमना, जो संसार का पाप हरता है” (योहन 1:29)। ह्म उन्हीं प्रभु के रक्त से खरीदे गये हैं, बचाये गये है। संत पेत्रुस कहते हैं, “आप लोग जानते हैं कि आपके पूर्वजों से चली आयी हुई निरर्थक जीवन-चर्या से आपका उद्धार सोने-चांदी जैसी नश्वर चीजों की कीमत पर नहीं हुआ है, बल्कि एक निर्दोष तथा निष्कलंक मेमने अर्थात् मसीह के मूल्यवान् रक्त की कीमत पर।” (1 पेत्रुस 1:18-19)

कलवारी पर प्रभु येसु के बलिदान की महानता की ओर इशारा करते हुए नबी इसायाह कहते हैं, “विश्वमण्डल का प्रभु इस पर्वत पर सब राष्ट्रों के लिए एक भोज का प्रबन्ध करेगाः उस में रसदार मांस परोसा जायेगा और पुरानी तथा बढ़िया अंगूरी। वह इस पर्वत पर से सब लोगों तथा सब राष्ट्रों के लिए कफ़न और शोक के वस्त्र हटा देगा, वह सदा के लिए मृत्यु समाप्त करेगा। प्रभु-ईश्वर सबों के मुख से आँसू पोंछ डालेगा। वह समस्त पृथ्वी पर से अपनी प्रजा का कलंक दूर कर देगा। प्रभु ने यह कहा है।” (इसायाह 25:6-8) इसी कारण इस बलिदान में बडी शक्ति है। राजाओं के पहले ग्रन्थ के अध्याय 19 में हम पढ़ते हैं कि नबी एलियाह ईश्वर के दिये हुए भोजन के बल पर चालीस दिन और चालीस रात चल कर ईश्वर के पर्वत होरेब तक पहुँच कर वहाँ ईश्वर के दर्शन करते हैं। आज विश्वासी लोग यूखारिस्तीय बलिदान से अपने दैनिक जीवन की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति पाते हैं। येसु के द्वारा रोटियों के चमत्कार तथा पानी को अंगूरी में बदलना यूखारिस्तीय संस्कार की ओर शिष्यों को ले चलने वाली घटनाओं के रूप में भी देखे जा सकते हैं। इस महानतम संस्कार को योग्य रीति से ग्रहण करने के विषय में संत पौलुस कहते हैं, “जो अयोग्य रीति से वह रोटी खाता या प्रभु का प्याला पीता है, वह प्रभु के शरीर और रक़्त के विरुद्ध अपराध करता है। अपने अन्तःकरण की परीक्षा करने के बाद ही मनुष्य वह रोटी खाये और वह प्याला पिये।” (1 कुरिन्थियों 11:27-28) आइए, हम इस बलिदान में भाग लेने योग्य बनने के लिए ईश्वर की कृपा माँगे।


-Br Biniush Topno


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शनिवार, 05 जून, 2021 वर्ष का नौवाँ सप्ताह

 

शनिवार, 05 जून, 2021

वर्ष का नौवाँ सप्ताह

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पहला पाठ : टोबीत का ग्रन्थ 12:1,5-15,20



1) टोबीत ने विवाहोत्सव के बाद अपने पुत्र टोबीयाह को बुला कर उस से कहा, "हमें उस व्यक्ति को, जो तुम्हारे साथ गया, वेतन के सिवा कुछ और देना चाहिए"।

5) टोबीयाह ने उसे बुलाया और कहा, "जो कुछ तुम अपने साथ ले आये, उसका आधा भाग वेतन के रूप में स्वीकार करो और सकुशल विदा लो"।

6) इस पर रफ़ाएल ने दोनों को एकान्त में बुला कर उन से कहा, "ईश्वर का धन्यवाद कीजिए और सब प्राणियों के सामने यह घोषित कीजिए कि उसने हमारा कितना उपकार किया है। उसके नाम के आदर में धन्यवाद और स्तुतिगान कीजिए। ईश्वर के सत्कार्य प्रकट करने में संकोच मत कीजिए।

7) राजा का रहस्य अवश्य गुप्त रखना चाहिए, किन्तु ईश्वर के कार्य घोषित करना और योग्य रीति से उसकी स्तुति करना उचित है। भलाई कीजिए और बुराई आपके पास नहीं फटकेगी।

8) प्रार्थना तथा उपवास और भिक्षादान तथा धार्मिकता उत्तम हैं। दुष्टता से संचित धन-सम्पदा की अपेक्षा धार्मिकता से कमाया हुआ थोड़ा धन भी अच्छा है। भिक्षादान स्वर्ण-संचय से श्रेष्ठ है।

9) भिक्षादान मृत्यु से बचाता और हर प्रकार का पाप हरता है। जो भिक्षादान करता है, उसे पूर्ण जीवन प्राप्त होगा।

10) जो पाप और अन्याय किया करते हैं, वे अपने को हानि पहुँचाते हैं।

11) मैं आपके लिए पूरा सत्य प्रकट करूँगा और आप लोगों से कुछ भी नहीं छिपाऊँगा। मैं आप से कह चुका हूँ कि राजा का रहस्य अवश्य गुप्त रखना चाहिए, किन्तु ईश्वर के कार्य घोषित करना उचित है।

12) जब आप और सारा प्रार्थना कर रहे थे, तो मैं अपनी प्रार्थना ईश्वर की महिमा के सामने प्रस्तुत कर रहा था। जब आप मुरदों को दफ़नाते थे, तो मैं यही करता था।

13) जब आप आगा-पीछा किये बिना अपना भोजन छोड़ कर मुरदा दफ़नाने गये, तो मुझे आपकी परीक्षा करने भेजा गया।

14) ईश्वर ने मुझे फिर भेजा, जिससे मैं आप को और आपकी बहू को स्वस्थ करूँ।

15) मैं स्वर्गदूत रफ़ाएल हूँ। मैं उन सात स्वर्गदूतों में से एक हूँ, जो प्रभु की महिमा के सामने उपस्थित रहते हैं।"

20) अब पृथ्वी पर प्रभु का धन्यवाद कीजिए और ईश्वर के महान् कार्यो का बखान कीजिए। मैं अब उसके पास जा रहा हूँ, जिसने मुझे भेजा है। आपके साथ जा कुछ घटित हुआ, वह सब लिख लीजिए"। स्वर्गदूत ऊपर चल पड़ा।



सुसमाचार : सन्त मारकुस का सुसमाचार 12:38-44



38) ईसा ने शिक्षा देते समय कहा, "शास्त्रियों से सावधान रहो। लम्बे लबादे पहन कर टहलने जाना, बाज़ारों में प्रणाम-प्रणाम सुनना,

39) सभागृहों में प्रथम आसनों पर और भोजों में प्रथम स्थानों पर विराजमान होना- यह सब उन्हें बहुत पसन्द है।

40) वे विधवाओं की सम्पत्ति चट कर जाते और दिखावे के लिए लम्बी-लम्बी प्रार्थनाएँ करते हैं। उन लोगों को बड़ी कठोर दण्डाज्ञा मिलेगी।"

41) ईसा ख़जाने के सामने बैठ कर लोगों को उस में सिक्के डालते हुए देख रहे थे। बहुत-से धनी बहुत दे रहे थे।

42) एक कंगाल विधवा आयी और उसने दो अधेले अर्थात् एक पैसा डाल दिया।

43) इस पर ईसा ने अपने शिष्यों को बुला कर कहा, "मैं तुम से यह कहता हूँ - ख़जाने में पैसे डालने वालों में से इस विधवा ने सब से अधिक डाला है;

44) क्योंकि सब ने अपनी समृद्धि से कुछ डाला, परन्तु इसने तंगी में रहते हुए भी जीविका के लिए अपने पास जो कुछ था, वह सब दे डाला।"



📚 मनन-चिंतन


जब हम आज के सुसमाचार को पढ़ते हैं, तक सबसे पहले हमारे मन में यही सोच आता है कि हमारी धार्मिकता कैसी है? क्या हमारा जीवन और कार्य में एकरूपता है? एक बार शास्त्री उपदेश दे रहा था, उसने अपनी उपदेश का सार्थक बनाने के लिए एवं विश्वासियों का ध्यान आर्कषित करने के लिए कई उदाहरण दिया। उसके उपदेश को सुनने के बाद कई विश्वासी उनसे एक सवाल पुछें। आप वाकई, अपने उपदेश से सभों को मत्रमुग्ध कर दिये, लोग आपकी प्रसंशा करने से नहीं भूलेंगे।

एक सप्ताह बाद वही शास्त्री अपने विश्वासियों के द्वारा किसी बीमार से पीड़ित के घर देखे गये और उसने उसे कई आश्वासन दिये और वह वहाँ से चला गया, उसके बाद वहीं पर एक दूसरा व्यक्ति आया और उसने उस बीमार व्यक्ति की सेवा की और आर्थिक मद्द भी किया। इन दोनों व्याक्तियों में शास्त्री और एक आम व्यक्ति में फर्क इतना था की साधारण व्यक्ति बीमार से पीड़ित व्यक्ति के हदय को पहचाना, जबकि शास्त्री केवल अपने ज्ञान और धन दौलत से आशक्त था उसने उस बीमार से पीड़ित के हदय को नहीं पहचान सका। आज के सुसमाचार में प्रभु येसु एक कगांल विधवा की प्रसंशा किये बिना नहीं रह सके, क्योंकि येसु उसके हदय के भावना को समझते थे। इस लिए ईसा ने अपने शिष्यों को बुलाकर कहा, ’’मैं तुमसे यह कहता हॅँू-खजाने में पैसा डालने वालों में से इस विधवा ने सबसे अधिक डाला हैं क्योंकि सब ने अपनी समृध्दि से कुछ डाला, परन्तु इसने तंगी मे रहते हुए भी जीविका के लिए अपने पास जो कुछ था, वह सब दे डाला। (मारकुस 12:43-44)



📚 REFLECTION



When we read today’s gospel what comes first to our mind is that, how is our spiritual life? Is it in conformity with our life? There is a story told of a Scribe. Once he was giving a sermon, to make his sermon gorgeous and catch the interest of the faithful; he cited numerous instances. Having listened to his sermon one of the attendants asked him, you have really won the heart of the listeners; People would never forget your sermon.

After a week the same Scribe was seen by the same people who had heard him speaking so emphatically in the sermon met a sick man, and gave a lot of assurances and went away; incidentally after that a simple ordinary man also reached to the sick man and took care of him. He did everything to make his life happy that he could do. When we see the life of these two men what difference we find is that; the Scribe was a selfish man he was worried about himself where as the ordinary man was really concerned about the wellbeing of the sick man; he could touch his heart and where as the Scribe was far away from him.

That’s why Jesus in today’s gospel praised the widow because Jesus understood the emotion of heart and called his disciples and said to them, “Truly I tell you, this poor widow has put in more than all those who are contributing to the treasury. For all of them have contributed out of their abundance; but she out of her poverty has put in everything she had, all she had to live on.”(Mk.12:43-44).


 -Br Biniush Topno


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