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28 मार्च 2021, इतवार खजूर इतवार

 

28 मार्च 2021, इतवार

खजूर इतवार

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पहला पाठ : इसायाह 50:4-7


4) प्रभु ने मुझे शिय बना कर वाणी दी है, जिससे मैं थके-माँदे लोगों को सँभाल सकूँ। वह प्रतिदिन प्रातः मेरे कान खोल देता है, जिससे मैं शिय की तरह सुन सकूँ।

5) प्रभु ने मेरे कान खोल दिये हैं; मैंने न तो उसका विरोध किया और न पीछे हटा।

6) मैंने मारने वालों के सामने अपनी पीठ कर दी और दाढ़ी नोचने वालों के सामने अपना गाल। मैंने अपमान करने और थूकने वालों से अपना मुख नहीं छिप़ाया।

7) प्रभु मेरी सहायता करता है; इसलिए मैं अपमान से विचलित नहीं हुआ। मैंने पत्थर की तरह अपना मुँह कड़ा कर लिया। मैं जानता हूँ कि अन्त में मुझे निराश नही होना पड़ेगा।


दूसरा पाठ : फिलिप्पियों 2:6-11


6) वह वास्तव में ईश्वर थे और उन को पूरा अधिकार था कि वह ईश्वर की बराबरी करें,

7) फिर भी उन्होंने दास का रूप धारण कर तथा मनुष्यों के समान बन कर अपने को दीन-हीन बना लिया और उन्होंने मनुष्य का रूप धारण करने के बाद

8) मरण तक, हाँ क्रूस पर मरण तक, आज्ञाकारी बन कर अपने को और भी दीन बना लिया।

9) इसलिए ईश्वर ने उन्हें महान् बनाया और उन को वह नाम प्रदान किया, जो सब नामों में श्रेष्ठ है,

10) जिससे ईसा का नाम सुन कर आकाश, पृथ्वी तथा अधोलोक के सब निवासी घुटने टेकें

11) और पिता की महिमा के लिए सब लोग यह स्वीकार करें कि ईसा मसीह प्रभु हैं।


सुसमाचार : सन्त मारकुस 14:1-15


1) ईसा किसी विश्राम के दिन एक प्रमुख फ़रीसी के यहाँ भोजन करने गये। वे लोग उनकी निगरानी कर रहे थे।

2) ईसा ने अपने सामने जलोदर से पीडि़त एक मनुष्य को देख कर

3) शास्त्रियों तथा फ़रीसियों से यह कहा, "विश्राम के दिन चंगा करना उचित है या नहीं?"

4) वे चुप रहे। इस पर ईसा ने जलोदर-पीडि़त का हाथ पकड़ कर उसे अच्छा कर दिया और विदा किया।

5) तब ईसा ने उन से कहा, "यदि तुम्हारा पुत्र या बैल कुएँ में गिर पड़े, तो तुम लोगों में ऐसा कौन है, जो उसे विश्राम के दिन ही तुरन्त बाहर निकाल नहीं लेगा?"

6) और वे ईसा को कोई उत्तर नहीं दे सके।

7) ईसा ने अतिथियों को मुख्य-मुख्य स्थान चुनते देख कर उन्हें यह दृष्टान्त सुनाया,

8) "विवाह में निमन्त्रित होने पर सब से अगले स्थान पर मत बैठो। कहीं ऐसा न हो कि तुम से प्रतिष्ठित कोई अतिथि निमन्त्रित हो

9) और जिसने तुम दोनों को निमन्त्रण दिया है, वह आ कर तुम से कहे, ’इन्हें अपनी जगह दीजिए’ और तुम्हें लज्जित हो कर सब से पिछले स्थान पर बैठना पड़े।

10) परन्तु जब तुम्हें निमन्त्रण मिले, तो जा कर सब से पिछले स्थान पर बैठो, जिससे निमन्त्रण देने वाला आ कर तुम से यह कहे, ’बन्धु! आगे बढ़ कर बैठिए’। इस प्रकार सभी अतिथियों के सामने तुम्हारा सम्मान होगा;

11) क्योंकि जो अपने को बड़ा मानता है, वह छोटा बनाया जायेगा और जो अपने को छोटा बनाया जायेगा और जो अपने को छोटा मानता है, वह बड़ा बनाया जायेगा।"

12) फिर ईसा ने अपने निमन्त्रण देने वाले से कहा, "जब तुम दोपहर या शाम का भोज दो, तो न तो अपने मित्रों को बुलाओ और न अपने भाइयों को, न अपने कुटुम्बियों को और न धनी पड़ोसियों को। कहीं ऐसा न हो कि वे भी तुम्हें निमन्त्रण दे कर बदला चुका दें।

13) पर जब तुम भोज दो, तो कंगालों, लूलों, लँगड़ों और अन्धों को बुलाओ।

14) तुम धन्य होगे कि बदला चुकाने के लिए उनके पास कुछ नहीं है, क्योंकि धर्मियों के पुनरूत्थान के समय तुम्हारा बदला चुका दिया जायेगा।"

15) साथ भोजन करने वालों में किसी ने यह सुन कर ईसा से कहा, "धन्य है वह, जो ईश्वर के राज्य में भोजन करेगा!"


📚 मनन-चिंतन


प्यारे विश्वासियों, आज खजूर रविवार है और आज से पवित्र हफता आरम्भ होता है। इस हफते में प्रभु येसु के पीडा सहन और दुःख भोग पर मनन चिन्तन करते है। और आज हम विशेष रूप में प्रभु येसु के बछेडे के ऊपर बैट कर लोगों के द्वारा होसाना होसाना नरा लगाते हुए सुनकर, येरूसालेम मन्दिर में प्रवेश करने का पर्व मना रहे है।

प्रभु येसु जहॉ कहीं ईश्वर का विशेष निवास स्थान है उन सारी जगहों को शुद्ध करने केलिए इस दुनिया में पधारे। येरूसालेम मन्दिर एैसी जगह है जहॉ हमेशा ईश्वर की आराधना होती है। लेकिन येसु के समय इस मन्दिर अपना मुख्य उद्वेश खो चुका था और यह जगह बाजार बन गया था। इस पर येसु क्रोधित हो गये और उन्होंने रस्सियों का कोड़ा बना कर मन्दिर से बिक्री करने वालों को निष्कासित किया। येसु ने यह इसलिए किया कि ईश्वर के घर का उत्साह उन्हें खा जा रहा था।

यही उत्साह येसु को हमारे प्रति भी है; हमारे अन्तरतम को शुद्ध करें। इसलिए हमारे अन्तकरण को शुद्ध करने के लिए येसु ने पीड़ा सहन क्रूस मरण सहन किया। क्योंकि हम भी ईश्वर के मन्दिर है। 1कुरिन्थियों 3:16-17 क्या आप यह नहीं जानते कि आप ईश्वर के मन्दिर हैं और ईश्वर का आत्मा आप में निवास करता है? यदि कोई ईश्वर का मन्दिर नष्ट करेगा, तो ईश्वर उसे नष्ट करेगा; क्योंकि ईश्वर का मन्दिर पवित्र है और वह मन्दिर आप लोग हैं। 1कुरिन्थियों 6:19-20 क्या आप लोग यह नहीं जानते कि आपका शरीर पवित्र आत्मा का मन्दिर है? वह आप में निवास करता है और आप को ईश्वर से प्राप्त हुआ है। आपका अपने पर अधिकार नहीं है; क्योंकि आप लोग कीमत पर खरीदे गये हैं। इसलिए आप लोग अपने शरीर में ईश्वर की महिमा प्रकट करें।

प्यारे विश्वासियों आज हमारे लिए उपयुक्त समय है हमारे पापों केलिए येसु से क्षमा याचना करने केलिए। प्रभु ने हमें एक और अवसर प्रदान किया है कि हमारे जीवन में हम सुधार लाये। जैसे येसु बछडे के ऊपर सवार हो कर आये तो लोगों ने कपडे और डालियॉ येसु के सामने बिछाकर उनको अपनी और स्वागत किया, उसी प्रकार हम भी येसु के सामने अपने पापों को प्रार्थनाओं को बिचाकर येसु को हमारे दिल में स्वागत करें।



📚 REFLECTION



Friends, today is Palm Sunday and the holy week begins from today. In this week we very specially meditate upon the passion and death of our Lord Jesus Christ. Today we commemorate the entry of Jesus into Jerusalem on a donkey. People welcomed him by singing hosanna hosanna… and Jesus enters into Jerusalem temple.

Jesus came into this world in order to clean all the places where there should be the presence of God. The Temple of Jerusalem is a place where there is the mighty presence of God and supposed to be sacrifices offered for various needs. However, at the time of Jesus, Jerusalem Temple became a market place. And Jesus was very angry seeing this and he made a whip with cords and began to chase everyone out of the temple. Jesus did this because zeal for the house of God was consuming him.

Jesus has this passion towards us too; that is to cleanse our inner self. It is to cleanse our inner self that Jesus died on the cross, because we are also the temple of God. 1Cor 3:16-17 Do you not know that you are God’s temple and that God’s Spirit dwells in you? If anyone destroys God’s temple, God will destroy that person. For God’s temple is holy, and you are that temple. 1Cor 6:19-20 Or do you not know that your body is a temple of the Holy Spirit within you, which you have from God, and that you are not your own? For you were bought with a price; therefore glorify God in your body.

Friends, it is a fitting time for us to ask pardon from Jesus for all our sins. God has provided to us one more opportunity to make our lives better. As Jesus entered into Jerusalem people placed before him their clothes and olive branches, so also we should place before Jesus our sinfulness and ask him to enter into our hearts to clean it from all sinfulness.



मनन- चिं तन


काथलिक कलीसिया की लातीनी पूजनविधि के अनुसार आज एक ऐसा दिन है जब एक मिस्सा बलिदान के दौरान सुसमाचार के दो पाठ पढ़े जाते हैं। एक शुरूआत में जुलूस के पूर्व पढ़ा जाता है जिस में येसु की येरूसालेम यात्रा का वर्णन है। बडे आदर-सम्मान के साथ समाज के साधारण लोगों ने येसु को एक गदही के बछडे पर बिठा कर अपने कपड़े रास्ते में बिछा दिये। कुछ लोगों ने खेतों में हरी-भरी डालियाँ काट कर फैला दीं। फिर ईसा के आगे-आगे जाते हुए और पीछे-पीछे आते हुए लोग यह नारा लगा रहे थे, "होसन्ना! धन्य हैं वह, जो प्रभु के नाम पर आते हैं! धन्य हैं हमारे पिता दाऊद का आने वाला राज्य! सर्वोच्च स्वर्ग में होसन्ना!" (मारकुस 11:8-10) येसु विजेता के समान येरूसालेम में प्रवेश करते हैं।

मिस्सा बलिदान के दौरान अन्य पाठों के साथ-साथ सुसमाचार से एक और पाठ घोषित किया जाता है, जिस में येसु के दुख-भोग का वर्णन है। तब जो पहले ’होसन्ना’ बोल रहे थे, वे ही “उसे क्रूस दीजिए, उसे क्रूस दीजिए” बोलने लगते हैं। इस प्रकार आज की पूजन-विधि में एक तरफ खुशी का माहौल है, तो दूसरी तरफ दुख का। ऐसा क्यों? आइए हम इस पर थोडा मनन-चिंतन करते हैं।

कई बार इस बात पर ईशशास्त्रियों के बीच वाद-विवाद होता है कि प्रभु येसु की मृत्यु एक बलिदान थी या एक हत्या। वास्तव में पवित्र ग्रन्थ को पढ़ने और समझने पर हमें यह ज्ञात होता है कि येसु की ओर से वह एक बलिदान थी। योहन 10:18 में प्रभु कहते हैं, “कोई मुझ से मेरा जीवन नहीं हर सकता; मैं स्वयं उसे अर्पित करता हूँ। मुझे अपना जीवन अर्पित करने और उसे फिर ग्रहण करने का अधिकार है। मुझे अपने पिता की ओर से यह आदेश मिला है।” इस से यह स्पष्ट होता है कि येसु ने अपने जीवन को अपने पिता के आदेश का पालन करते हुए स्वेच्छा से अर्पित किया। मरते-मरते उन्होंने कहा, “पिता! मैं अपनी आत्मा को तेरे हाथों सौंपता हूँ"(लूकस 23:46) योहन 15:12-13 में प्रभु येसु कहते हैं, “मेरी आज्ञा यह है, जिस प्रकार मैंने तुम लोगो को प्यार किया, उसी प्रकार तुम भी एक दूसरे को प्यार करो। इस से बडा प्रेम किसी का नहीं कि कोई अपने मित्रों के लिये अपने प्राण अर्पित कर दे।” यहाँ पर येसु अपने प्रेम को हमारे लिए आदर्श के रूप में प्रस्तुत करते हैं। येसु स्वयं हमें समझाते हैं कि उन्होंने क्रूस पर अपने जीवन की कुर्बानी दे कर हमारे प्रति उनके सर्वोत्तम प्रेम का प्रमाण दिया। इब्रानियों के पत्र में ईशवचन कहता है, “उन्होंने बकरों तथा बछड़ों का नहीं, बल्कि अपना रक्त ले कर सदा के लिए एक ही बार परमपावन स्थान में प्रवेश किया और इस तरह हमारे लिए सदा-सर्वदा रहने वाला उद्धार प्राप्त किया है” (इब्रानियों 9:12)। इस प्रकार हम देख सकते हैं कि येसु अब येरूसालेम में अपने पिता की इच्छा को पूरा करने हेतु तथा हमारे प्रति अपने प्रेम को प्रकट करते हुए अपने जीवन की कुर्बानी देने के लिए प्रवेश कर रहे थे।

परन्तु, जिन्होंने येसु को मार डाला, उनके लिए यह एक हत्या थी। यहूदी लोग येसु को मार डालने का षड़यन्त्र रच रहे थे और येसु इस बात को भली भाँति जानते थे। इसलिए योहन 8:40 में वे यहूदियों से कहते हैं, “अब तो तुम मुझे इसलिए मार डालने की ताक में रहते हो कि मैंने जो सत्य ईश्वर से सुना, वह तुम लोगों को बता दिया”। मारकुस के सुसमाचार के अध्याय 12 में प्रभु येसु असामियों के दृष्टान्त द्वारा यह स्पष्ट करते हैं – “अब उसके पास एक ही बच गया- उसका परमप्रिय पुत्र। अन्त में उसने यह सोच कर उसे उनके पास भेजा कि वे मेरे पुत्र का आदर करेंगे। किन्तु उन असामियों ने आपस में कहा, ‘यह तो उत्तराधिकारी है। चलो, हम इसे मार डालें और इसकी विरासत हमारी हो जायेगी।’ उन्होंने इसे पकड़ कर मार डाला और दाखबारी के बाहर फेंक दिया।” (मारकुस 12:6-8) पेन्तेकोस्त के बाद संत पेत्रुस ने इस्राएलियों के सामने प्रवचन देते हुए कहा, “आप लोगों ने सन्त तथा धर्मात्मा को अस्वीकार कर हत्यारे की रिहाई की माँग की। जीवन के अधिपति को आप लोगों ने मार डाला; किन्तु ईश्वर ने उन्हें मृतकों में से जिलाया। हम इस बात के साक्षी हैं।” (प्रेरित-चरित 3:14-15) संत पेत्रुस और

अन्य प्रेरितों ने निडर हो कर प्रधानयाजक से भी कहा था, “आप लोगों ने ईसा को क्रूस के काठ पर लटका कर मार डाला था” (प्रेरित-चरित 5:30) 1 थेसलनीकियों 2:15 में संत पौलुस भी कहते हैं, “यहूदियों ने ईसा मसीह तथा नबियों का वध किया और हम पर घोर अत्याचार किया”। इस प्रकार यहूदी नेताओं ने रोमी शासकों के साथ मिल कर येसु की हत्या की। यह एक दर्दनाक घटना थी।

इस प्रकार आज के मिस्सा बलिदान मे बलिदान और हत्या – दोनों का वातावरण बना रहता है। येसु क्रूस को टाल सकते थे, परन्तु पवित्र वचन हमें समझाता है – “वह वास्तव में ईश्वर थे और उन को पूरा अधिकार था कि वह ईश्वर की बराबरी करें, फिर भी उन्होंने दास का रूप धारण कर तथा मनुष्यों के समान बन कर अपने को दीन-हीन बना लिया और उन्होंने मनुष्य का रूप धारण करने के बाद मरण तक, हाँ क्रूस पर मरण तक, आज्ञाकारी बन कर अपने को और भी दीन बना लिया।”

इस प्रकार आज के पाठ हमें भी ईश्वर की इच्छा को ईमानदारी से खोजने तथा विनम्रता से स्वीकार करने के लिए प्रेरित करते हैं।


✍ Br. Biniush Topno

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Daily Mass Readings for Saturday, 27 March 2021

 Daily Mass Readings for Saturday, 27 March 2021

First Reading: Ezekiel 37: 21-28


21 And thou shalt say to them: Thus saith the Lord God: Behold, I will take the children of Israel from the midst of the nations whither they are gone: and I will gather them on every side, and will bring them to their own land.

22 And I will make them one nation in the land on the mountains of Israel, and one king shall be king over them all: and they shall no more be two nations, neither shall they be divided any more into two kingdoms.

23 Nor shall they be defiled any more with their idols, nor with their abominations, nor with all their iniquities: and I will save them out of all the places in which they have sinned, and I will cleanse them: and they shall be my people, and I will be their God.

24 And my servant David shall be king over them, and they shall have one shepherd: they shall walk in my judgments, and shall keep my commandments, and shall do them.

25 And they shall dwell in the land which I gave to my servant Jacob, wherein your fathers dwelt, and they shall dwell in it, they and their children, and their children’s children, for ever: and David my servant shall be their prince for ever.

26 And I will make a covenant of peace with them, it shall be an everlasting covenant with them: and I will establish them, and will multiply them, and will set my sanctuary in the midst of them for ever.

27 And my tabernacle shall be with them: and I will be their God, and they shall be my people.

28 And the nations shall know that I am the Lord the sanctifier of Israel, when my sanctuary shall be in the midst of them for ever.

Responsorial Psalm: Jeremiah 31: 10, 11-12abcd, 13


R. (see 10d) The Lord will guard us, as a shepherd guards his flock.

10 Hear the word of the Lord, O ye nations, and declare it in the islands that are afar off, and say: He that scattered Israel will gather him: and he will keep him as the shepherd doth his flock.

R. The Lord will guard us, as a shepherd guards his flock.

11 For the Lord hath redeemed Jacob, and delivered him out of the hand of one that was mightier than he.

12 And they shall come, and shall give praise in mount Sion: and they shall flow together to the good things of the Lord, for the corn, and wine, and oil, and the increase of cattle and herds.

R. The Lord will guard us, as a shepherd guards his flock.

13 Then shall the virgin rejoice in the dance, the young men and old men together: and I will turn their mourning into joy, and will comfort them, and make them joyful after their sorrow.

R. The Lord will guard us, as a shepherd guards his flock.

Verse Before the Gospel: Ezekiel 18: 31


31 Cast away from you all your transgressions, says the Lord, and make to yourselves a new heart, and a new spirit.

Gospel: John 11: 45-56


45 Many therefore of the Jews, who were come to Mary and Martha, and had seen the things that Jesus did, believed in him.

46 But some of them went to the Pharisees, and told them the things that Jesus had done.

47 The chief priests therefore, and the Pharisees, gathered a council, and said: What do we, for this man doth many miracles?

48 If we let him alone so, all will believe in him; and the Romans will come, and take away our place and nation.

49 But one of them, named Caiphas, being the high priest that year, said to them: You know nothing.

50 Neither do you consider that it is expedient for you that one man should die for the people, and that the whole nation perish not.

51 And this he spoke not of himself: but being the high priest of that year, he prophesied that Jesus should die for the nation.

52 And not only for the nation, but to gather together in one the children of God, that were dispersed.

53 From that day therefore they devised to put him to death.

54 Wherefore Jesus walked no more openly among the Jews; but he went into a country near the desert, unto a city that is called Ephrem, and there he abode with his disciples.

55 And the pasch of the Jews was at hand; and many from the country went up to Jerusalem, before the pasch to purify themselves.

56 They sought therefore for Jesus; and they discoursed one with another, standing in the temple: What think you that he is not come to the festival day?

✍️- Br. Biniush Topno

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27 मार्च 2021, शनिवार चालीसे का पांचवां सप्ताह

 

27 मार्च 2021, शनिवार

चालीसे का पांचवां सप्ताह

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पहला पाठ : एज़ेकिएल का ग्रन्थ 37:21-28


21) और उन से कहो: प्रभु-ईश्वर यह कहता है- मैं इस्राएलियों को उन राष्ट्रों में से इकट्ठा करूँगा, जहाँ वे चले गये हैं। मैं उन्हें चारों दिशाओं से इकट्ठा करूँगा और उन्हें उनकी निजी भूमि वापस ले जाऊँगा।

22) मैं अपने देश में तथा इस्राएल के पर्वतों पर उन्हें एक राष्ट्र बना दूँगा और एक ही राजा उन सब का राजा होगा। वे अब से न तो दो राष्ट्र होंगे और न दो राज्यों में विभाजित।

23) वे फिर घृणास्पद मूर्तिपूजा और अधर्म से अपने को दूशित नहीं करेंगे। उन्होंने मरे साथ कितनी बार विश्वासघात किया! फिर भी मैं उन सब पापों से उन्हें छुडाऊँगा और शुद्ध करूँगा वे मेरी प्रजा होंगे और मैं उनका ईश्वर होऊँगा।

24) मेरा सेवक दाऊद उनका राजा बनेगा आर उन सबों का एक ही चरवाहा होगा। वे मरे नियमों पर चलेंगे और मेरी आज्ञाओं को विधिवत् पालन करेंगे।

25) वे और उनके पुत्र-पौत्र सदा-सर्वदा अपने पूर्वजों के देश में निवास करेंगे, जिस मैंने अपने सेवक याकूब को दे दिया है। मेरा सेवक दाऊद सदा के लिए उनका राजा होगा।

26) मैं उनके लिए शांति का विधान निर्धारित करूँगा, एक ऐसा विधान, जो सदा बना रहेंगा। मैं उन्हें फिर बसाऊँगा, उनकी संख्या बढाऊँगा और उनके बीच सदा के लिए अपना मन्दिर बनाऊँगा।

27) मैं उनके बीच निवास करूँगा, मैं उनका ईश्वर होऊँगा और वे मेरी प्रजा होंगे।

28) जब मेरा मंदिर सदा के लिए उनके बीच स्थापित होगा, तब सभी राष्ट्र यह जान जायेंगे कि मैं प्रभु हूँ, जो इस्राएल को पवत्रि करता है।’’


सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 11:45-56


45) जो यहूदी मरियम से मिलने आये थे और जिन्होंने ईसा का यह चमत्कार देखा, उन में से बहुतों ने उन में विश्वास किया।

46) पंरतु उन में से कुछ लोगों ने फरीसियों के पास जाकर बताया कि ईसा ने क्या किया था।

47) तब महायाजकों और फरीसियों ने महासभा बुलाकर कहा ’’हम क्या करें? वह मनुष्य बहुत से चमत्कार दिखा रहा है।

48) यदि हम उसे ऐसा करते रहने देंगे, तो सभी उस में विश्वास करेंगे ओर रोमन लोग आकर हमारा मन्दिर और हमारा राष्ट्र नष्ट कर देंगे।’’

49) उन में से एक ने जिसका नाम केफस था और जो उस वर्ष प्रधान याजक था उन से कहा, ’’आप लोगो की बुद्वि कहाँ हैं?

50) आप यह नही समझते कि हमारा कल्याण इस में है कि जनता के लिये एक ही मनुष्य मरे और समस्त राष्ट्र का सर्वनाश न हो।

51) उसने यह बात अपनी ओर से नहीं कही। उसने उस वर्ष के प्रधानयाजक के रूप में भविष्यवाणी की कि ईसा राष्ट्र के लिये मरेंगे

52) और न केवल राष्ट्र के लिये बल्कि इसलिये भी कि वे ईश्वर की बिखरी हुई संतान को एकत्र कर लें।

53) उसी दिन उन्होनें ईसा को मार डालने का निश्चय किया।

54) इसलिये ईसा ने उस समय से यहूदियों के बीच प्रकट रूप से आना-जाना बन्द कर दिया। वे निर्जन प्रदेश के निकटवर्ती प्रांत के एफ्राइम नामक नगर गये और वहाँ अपने शिष्यों के साथ रहने लगे।

55) यहूदियों का पास्का पर्व निकट था। बहुत से लोग पास्का से पहले शुद्वीकरण के लिये देहात से येरुसालेम आये।

56) वे ईसा को ढूढ़ते थे और मन्दिर में आपस में कहते थे ’’आपका क्या विचार है? क्या वह पर्व के लिये नहीं आ रहे हैं?’’


📚 मनन-चिंतन


ईश्वर की दृष्टि में हमेंशा हमारे लिए अच्छी योजना है। जैसे कि वचन में कहता है यिरमियाह 29:11 - क्योंकि मैं तुम्हारे लिए निर्धारित अपनी योजनाएॅ जानता हॅू-यह प्रभु की वाणी है- तुम्हारे हित की योजनाएॅ, अहित की नहीं, तुम्हारे लिए आशामय भविष्य की योजनाएॅ। ईश्वर ने हमें बरबाद करने के लिए नहीं, बल्कि अच्छ जीवन बिताने के लिए बनाया है। प्रभु कहते है एज़ेकिएल 33:11 मुझे दुष्ट की मृत्यु से प्रसन्नता नहीं होती, बल्कि इस से होती है कि दुष्ट अपना कुमार्ग छोड़े दे और जीवित रहे। यह उस समय साकार होता है कि जब हम उनकी इच्छाओं के अनुसार जीवन बिताते है।

आज के पहले पाठ एज़ेकिएल 37:21-22 में ईश्वर कहते है कि मैं इस्राएलियों को उन राष्ट्रों से जहॉ वे दासता में है, वापस ले आ आऊॅगा और उन्हें उनकी निजी भूमि वापस ले आऊॅगा। और उन सब के लिए एक ही राजा होगा। प्यारे विश्वासियों यह प्रभु येसु के बारे में बताया गया भविष्यवाणी है। जैसे येसु ने कहा योहन 10: 16 कि तब एक ही झुण्ड होगा और एक ही गड़ेरिया। कलोसियों 3:11 जहॉ न यूनानी है या यहूदी, न ख़तना है या ख़तने का अभाव, न बर्बर है, न स्कूती, न दास और न स्वतन्त्र। वहॉ केवल मसीह हैं, जो सब कुछ और सब में हैं। 1कुरिन्थियों 15:28 जब सब कुछ पुत्र के अधीन कर दिया जायेगा, तब पुत्र स्वयं उस ईश्वर के अधीन हो जायेगा, जिसने सब कुछ उसके अधीन कर दिया और इस प्रकार ईश्वर सब पर पूर्ण शासन करेगा।

इस कार्य को पूरा करने के लिए पिता ईश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को इस दुनिया में भेजा। संत पौलूस कहते है रोमियों 5:10 कि जब येसु इस दुनिया में आये तब हम सब घोर पाप करने के कारण ईश्वर के शत्रु थे। लेकिन ईश्वर करूणा सागर है। जैसे कि हम पहले पाठ में ईश्वर कहते हुए सुना कि इस्राएलियों ने मेरे साथ कितनी बार विश्वासघात किया! फिर भी मैं उन सब पापों से उन्हें छुड़ाऊॅगा और शुद्ध करूॅूगा।

यह करने केलिए येसु को हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए अपने आप को बली के रूप में अर्पित करना पडा। इस चालिसा काल में हम उसी प्रभु येसु के चरणों में जायें और विनती करें कि वे हमें पूर्ण चंगाई प्रदान करें ताकी हम सब शुद्ध हो जाये।




📚 REFLECTION



God has a wonderful plan for everyone of us. As the word of God says in Jer 29:11 For surely I know the plans I have for you, sys the Lord, plans for your welfare and not for harm, to give you a future with hope. Remember God did not created us to destroy our life, but to live a good life. In Ezek 33:11 God says I have no pleasure in the death of the wicked, but that the wicked turn from their ways and live. Our life becomes most beautiful when we live our lives according to the plan of God.

In the first reading God says Ezk 37:21-22 I will take the people of Israel from the nations among which they have gone, and will gather them from every quarter, and bring them to their own land. I will make them one nation in the land, on the mountains of Israel; and one king shall be king over them all. This is a prophesy about Jesus himself. Jesus himself says in Jn 10:16 I have other sheep that do not belong to this fold. I must bring them also, and they will listen to my voice. So there will be one flock one shepherd. In Col 3:11 in that renewal there is no longer Greek and Jew, circumcised and uncircumcised, barbarian, Scythian, slave and free; but Christ is all and in all. 1Cor 15:28 when all things are subjected to him, then the Son himself will also be subjected to the one who put all things in subjection under him, so that God may be all in all.

In order to fulfill this mission God the Father sent Jesus into this world. St. Paul says in Rom 5:10 that when we were because of our sins, enemies of God at that time God sent his Son. God is compassionate. We see this face of God in today’s first reading that Israelites abandoned God many time, yet the Lord says I will wash them of their sins, I will show mercy. In order this dream come true Jesus had to sacrifice his life on the cross; he had to shed his blood. In this season of lent let’s all go to the feet of the crucified Jesus and ask the Lord to cleanse us thoroughly from all our sins and make us clean.


✍ -Br. Biniush Topno


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Daily Mass Readings for Friday, 26 March 2021

 Daily Mass Readings for Friday, 26 March 2021


First Reading: Jeremiah 20:10-13


10 For I heard the reproaches of many, and terror on every side: Persecute him, and let us persecute him: from all the men that were my familiars, and continued at my side: if by any means he may be deceived, and we may prevail against him, and be revenged on him.

11 But the Lord is with me as a strong warrior: therefore they that persecute me shall fall, and shall be weak: they shall be greatly confounded, because they have not understood the everlasting reproach, which never shall be effaced.

12 And thou, O Lord of hosts, prover of the just, who seest the reins and the heart: let me see, I beseech thee, thy vengeance on them: for to thee I have laid open my cause.

13 Sing ye to the Lord, praise the Lord: because he hath delivered the soul of the poor out of the hand of the wicked.

Responsorial Psalm: Psalms 18: 2-3a, 3bc-4, 5-6, 7


R. (7) In my affliction I called upon the Lord, and I cried to my God: And he heard my voice.

2 I will love thee, O Lord, my strength:

3 The Lord is my firmament, my refuge, and my deliverer.

R. In my affliction I called upon the Lord, and I cried to my God: And he heard my voice.

3 My God is my helper, and in him will I put my trust. My protector and the horn of my salvation, and my support.

4 Praising I will call upon the Lord: and I shall be saved from my enemies.

R. In my affliction I called upon the Lord, and I cried to my God: And he heard my voice.

5 The sorrows of death surrounded me: and the torrents of iniquity troubled me.

6 The sorrows of hell encompassed me: and the snares of death prevented me.

R. In my affliction I called upon the Lord, and I cried to my God: And he heard my voice.

7 In my affliction I called upon the Lord, and I cried to my God: And he heard my voice from his holy temple: and my cry before him came into his ears.

R. In my affliction I called upon the Lord, and I cried to my God: And he heard my voice.

Verse Before the Gospel: John 6: 63c, 68c

63c, 68cThe words that I have spoken to you, are spirit and life. Thou hast the words of eternal life.

Gospel: John 10: 31-42


31 The Jews then took up stones to stone him.

32 Jesus answered them: Many good works I have shewed you from my Father; for which of these works do you stone me?

33 The Jews answered him: For a good work we stone thee not, but for blasphemy; and because that thou, being a man, maketh thyself God.

34 Jesus answered them: Is it not written in your law: I said you are gods?

35 If he called them gods, to whom the word of God was spoken, and the scripture cannot be broken;

36 Do you say of him whom the Father hath sanctified and sent into the world: Thou blasphemest, because I said, I am the Son of God?

37 If I do not the works of my Father, believe me not.

38 But if I do, though you will not believe me, believe the works: that you may know and believe that the Father is in me, and I in the Father.

39 They sought therefore to take him; and he escaped out of their hands.

40 And he went again beyond the Jordan, into that place where John was baptizing first; and there he abode.

41 And many resorted to him, and they said: John indeed did no sign.

42 But all things whatsoever John said of this man, were true. And many believed in him.


✍️- Br. Biniush Topno

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Praise the lord


26 मार्च 2021, शुक्रवार चालीसे का पांचवां सप्ताह

 

26 मार्च 2021, शुक्रवार

चालीसे का पांचवां सप्ताह

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पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 20:10-13


10) मैंने बहुतों को यह फुसफुसाते हुए सुना है- “चारों ओर आतंक फैला हुआ हैं। उस पर अभियोग लगाओ! हम उस पर अभियोग लगायें“। जो पहले मेरे मित्र थे, वे सब इस ताक में रहते हैं कि मैं कोई ग़लती कर बैठूँ और कहते हैं, “वह शायद भटक जायेगा और हम उस पर हावी हो कर उस से बदला लेंगे''।

11) परन्तु प्रभु एक पराक्रमी शूरवीर की तरह मेरे साथ हैं। मेरे विरोधी ठोकर खा कर गिर जायेंगे। वे मुझ पर हावी नहीं हो पायेंगे और अपनी हार का कटु अनुभव करेंगे। उनका अपयश सदा बना रहेगा।

12) विश्वमण्डल के प्रभु! तू धर्मी की परीक्षा करता और मन तथा हृदय की थाह लेता है। मैं अपने को तुझ पर छोड़ता हूँ। मैं दूखूँगा कि तू उन लोगों से क्या बदला लेता है।

13) प्रभु का गीत गाओ! प्रभु की स्तुति करो! क्योंकि वह दरिद्रों के प्राणों को दुष्टों के हाथ से छुडाता है।


सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 10:31-42


31) यहँदियों ने ईसा को मार डालने के लिये फिर पत्थर उठाये।

32) ईसा ने उन से कहा, मैनें अपने पिता के सामर्थ्य से तुम लोगों के सामने बहुत से अच्छे कार्य किये हैं। उन में किस कार्य के लिये मुझे पत्थरों से मार डालना चाहते हो?

33) यहूदियों ने उत्तर दिया, किसी अच्छे कार्य के लिये नहीं, बल्कि ईश-निन्दा के लिये हम तुम को पत्थरों से मार डालना चाहते हैं क्योंकि तुम मनुष्य होकर अपने को ईश्वर मानते हो।

34) ईसा ने कहा, ’’क्या तुम लोगो की संहिता में यह नहीं लिखा है, मैने कहा तुम देवता हो?

35) जिन को ईश्वर का संदेश दिया गया था, यदि संहिता ने उन को देवता कहा- और धर्मग्रंथ की बात टल नहीं सकती-

36) तो जिसे पिता ने अधिकार प्रदान कर संसार में भेजा है, उस से तुम लोग यह कैसे कहते हो- तुम ईश-निन्दा करते हो; क्योंकि मैने कहा, मैं ईश्वर का पुत्र हूँ?

37) यदि मैं अपने पिता के कार्य नहीं करता, तो मुझ पर विश्वास न करो।

38) किन्तु यदि मैं उन्हें करता हूँँ, तो मुझ पर विश्वास नहीं करने पर भी तुम कार्यों पर ही विश्वास करो, जिससे तुम यह जान जाओ और समझ लो कि पिता मुझ में है और मैं पिता में हूँ।’’

39) इस पर उन्होंने फिर ईसा को गिरफ़्तार करने का प्रयत्न किया, परन्तु वे उनके हाथ से निकल गये।

40) ईसा यर्दन के पार उस जगह लौट गये, जहाँ पहले योहन बपतिस्मा दिया करता था, और वहीं रहने लगे।

41) बहुत-से लोग उनके पास आये। वे कहते थे, योहन ने तो कोई चमत्कार नहीं दिखाया, परंतु उसने इनके विषय में जो कुछ कहा, वह सब सच निकला।

42) और वहाँ बहुत से लोगों ने उन में विश्वास किया।


📚 मनन-चिंतन


आज के दोनों पाठों में हम देखते है कि यिरमियाह ईश्वर की वाणी सुनाने के कारण, सच बोलने के कारण उनको विरोध का सामना करना पडता है। और सुसमाचार में येसु पिता की वाणी सुनाने के कारण और पिता के साथ उनके संबध के बारे में बोलने के कारण विरोध का सामना करना पडता है। लेकिन वे सच्चाई से पीछे नहीं हटते।

लोग शुरूवात में येसु को समझ नहीं पाये। क्योंकि लोगों ने सोचा कि येसु एक नबी है। संत मत्ती 16ः13से हम पढते है ईसा ने शिष्यों से पूछा, मानव पुत्र कौन है, इस विषय में लोग क्या कहते हैं? उन्होंने उत्तर दिया, कुछ लोग कहते हैं योहन बपतिस्ता; कुछ कहते हैं-एलियस; और कुछ लोग कहते हैं-येेरेमियस अथवा नबियों में से कोई। इसलिए यहूदियों ने येसु से कहा तुम ईश निन्दा कर रहे हो क्योंकि तुम मनुष्य हो कर अपने को ईश्वर मानते हो। हॉ यह सही है उस समय लोग येसु को सही रूप में समझ नहीं पाये। येसु ईश्वर के एकलौते पुत्र है इसलिए येसु स्वयं ईश्वर है। संत योहत अपने सुसमाचार ये सच्चाई बताते हुए शुरू करते है 1ः1- आदि में शब्द था, शब्द ईश्वर के साथ था और शब्द ईश्वर था। संत पौलूस येसु के बारे में कहते है फिलिप्पियों 2ः6-7 वह वास्तव में ईश्वर थे और उन को पूरा अधिकार था कि वह ईश्वर की बराबरी करें, फिर भी उन्होंने दास का रूप धारण कर तथा मनुष्यों के समान बन कर अपने को दीन हीन बना लिया।

येसु ने अपने शिष्यों से पूछा तूम क्या कहते हो कि मैं कौन हॅू? पेत्रुस ने कहाः आप मसीह है, आप जीवन्त ईश्वर के पुत्र है। आईए इस चालिसा काल में येसु को और गहराई में जानने कि कोशीष करें और उनके साथ गहरा संबध रखें। हमारे लिए संत पौलूस की प्रार्थना यह हैं एफेसियों 3ः17-18 कि विश्वास द्वारा मसीह आपके ह्रदयों में निवास करें, प्रेम में आपकी जडें गहरी हों और नींव सुदृढ़ हो। इस तरह, आप लोग अन्य सभी सन्तों के साथ मसीह के प्रेम की लम्बाई, चौडाई, ऊॅचाई और गहराई समझ सकेंगे।




📚 REFLECTION



In today’s both the readings we have the same theme that Jeremiah faces opposition for having proclaimed the word of God, having proclaimed the truth. In the Gospel also we have the same thing that Jesus having proclaimed the truth about him, he faces opposition. However they remain for the truth.

The Jews could not understand Jesus in the beginning. Because the Jews though Jesus was a prophet. Mt 16:13-14 Jesus asked his disciples: who do people say that the Son of Man is? And they said “Some say John the Baptist, but others Elijah, and still others Jeremiah or one of the prophets.” Therefore the Jews said to Jesus that he is blaspheming, because he being a human claiming to be God. Jesus was speaking the truth but the people could not grasp it.

Jesus being the only Son of the Father is God himself. St. John begins his gospel with this 1:1 in the beginning was the Word, and the Word was with God and the word was God. St. Paul says the same in Philip 2:6-7 though he was in the form of God, did not regard equality with God as something to be exploited, but emptied himself, taking the form of a slave, being born in human likeness and being found in human form, he humbled himself.

Jesus asked his disciples that what do you say about me? And Peter said that you are the Christ the Son of the living God. Dear friends, come during this season of lent let us make effort to know Jesus more and more and make our relationship with him deeper. St. Paul’s prayer for us is that Eph 3:17-18 and that Christ may dwell in your hearts through faith, as you are being rooted and grounded in love. I pray that you may have the power to comprehend, with all the saints, what is the breadth and length and height and depth of the love of Christ.



मनन-चिंतन-2


जब ईसा गलीलिया में घूम-घूमकर लोगों को उपदेश देते थे, विभिन्न चमत्कार करते थे, तो बहुत सारे लोग आश्चर्य में पड़ जाते थे और सब के मन में यही प्रश्न होता था कि यह कौन है? (मारकुस 4:41 लूकस 4:22) इस प्रकार का प्रश्न पिलातुस के मन में भी था इसलिए वह सत्य को जानना चाहता था (देखिए योहन18:38)। प्रभु येसु ने संत योहन के सुसमाचार के द्वारा अपने विषय में कई सारी बातें इस विषय में बताई है कि वे कौन हैं। वे कहते हैं, ’’जीवन की रोटी मैं हूँ’’, ‘‘संसार की ज्योति मैं हूँ’’, ‘‘पुनरूत्थान और जीवन मैं हूँ,’’ ’’मार्ग, सत्य और जीवन मैं हूँ,’’ ’’मैं दाखलता हूँ,’’ और ’’भला गडेरिया मैं हूँ,’’। आज का सुसमाचार हमें चरवाहा और भेड़ों के बीच के रिश्ते पर मनन चिंतन करने के लिए आह्वान करता है।

प्रभु येसु संत योहन के सुसमाचार 10:11 में कहते हैं कि भला गडेरिया मैं हूँ। भले गडेरिये के कुछ गुण होते हैं जैसे- भला गडेरिया अपनी भेड़ों के लिए अपने प्राण दे देता है, अपने भेड़ों को जानता है, भेड़ों को हरे मैदानों में बैठाता और शांत जल के पास ले जा कर उनमें नवजीवन का संचार करता है। भला चरवाहा एक भेड़ के भटक जाने पर निन्यानवे भेडों को छोड़ उस भटकी हुई भेड़ को खोजने जाता है। ये सब गुण हम प्रभु येसु के जीवन में पाते हैं। प्रभु येसु सचमुच में भले गडेरिये है जो अपनी भेड़ों के लिए अपने प्राण अर्पित करते है। वे भटकी हुई भेड़ की खोज में जाते है। प्रभु ने अपने जीवन के द्वारा यह सिद्ध किया कि वे सचमुच में भले गडेरिया है।

लेकिन आज का सुसमाचार भले गडेरिये के ऊपर नहीं परन्तु भली भेड़ के ऊपर है। आज हम सब के लिए बड़ा प्रश्न यह है कि प्रभु येसु तो सचमुच में भले गडेरिये हैं परंतु क्या हम उस भले गडेरिये की भली भेड़ें हैं। वे हम सभी भेड़ों को नाम से जानते हैं और सदा हमें अपने पास बुलाते हैं, पर क्या हम भली भेड़ के समान अपना जीवन व्यतीत करते हैं?

भली भेड़ या सच्ची भेड़ का चिन्ह क्या है? आज का सुसमाचार के अनुसार सच्ची भेड़ भले चरवाहे की आवाज़ पहचानती है तथा उनका अनुसरण करती है। प्रभु येसु या ईश्वर की आवाज़ पहचानना एक सच्ची भेड़ की अहम निशानी है। बाइबिल में हम देखते हैं कि कौन-कौन ईश्वर की आवाज़ पहचानता एवं सुनता था।

बाइबिल में हम नूह, इब्राहिम, इसहाक, याकूब, युसूफ, मूसा, योशुआ, कई न्यायकर्ताओं, कई नबियों को जानते हैं जो ईश्वर की आवाज़ सुनते और उनका अनुसरण करते थे। हम अपने जीवन में किसकी आवाज़ बहुत अच्छी से पहचानते है? जाहिर सी बात है कि हम अपने जीवन में अपने माता-पिता या परिवार वालों की आवाज़ अच्छे से पहचानते हैं। वह किस लिए? क्योंकि हम अपना ज्यादातार समय अपने परिवार के साथ बिताते हैं तथा उनकी आवाज़ को सुनते रहते हैं। इसी तरह हम किसी व्यक्ति को पंसद करते हैं तथा रोजाना उससे बात करते हैं - आमने सामने या मोबाईल पर - तब हम उसकी आवाज़ को पहचानने लगेंगे। अर्थात् जितना ज्यादा सम्पर्क हम किसी भी व्यक्ति से बनाते हैं - चाहे वह परिवार का हो या परिवार से दूर का हो - उतना ज्यादा हम उसकी आवाज़ को पहचानते हैं। इसलिए अगर वे किसी अन्जान नम्बर से फोन करेंगे तब भी हम उनकी आवाज़ पहचान जायेंगें। आज के इस आधुनिक युग में क्या हम येसु की आवाज़ पहचानते हैं? येसु की आवाज़ कौन पहचान पायेगा? वही जो येसु के साथ ज्यादा सम्पर्क में रहा है। येसु के साथ सम्पर्क में रहने का तात्पर्य है उसके साथ प्रार्थना में जुडे रहना, रोजाना प्रार्थना करना, बाइबिल पठन करना, वचनों पर मनन चिंतन करना, यूखारिस्त में भाग लेना। इन सबके द्वारा हम येसु के सम्पर्क में बने रहते हैं। और जितना ज्यादा हम उनसे जुड़े रहेंगे उतने स्पष्ट रूप से हम येसु की आवाज़ सुन पायेंगे और पहचान पायेंगे।

येसु की आवाज़ सुनना ही काफी नहीं परन्तु उनका अनुसरण करना ही हमें स्च्ची भेड़ होने का दर्जा देता है। हम प्रभु की आवाज़ बाइबिल से, पवित्र आत्मा से, अभिषिक्त पुरोहितों से, प्रार्थनामय इंसान से सुन सकते हैं। परंतु उनका पालन करना या न करना हम पर निर्भर करता हैं। प्रभु कहते हैं कि जो मेरा अनुसरण करना चाहता है वह आत्मत्याग करे, अपना क्रूस उठायें और मेरे पीछे हो ले। प्रभु की वाणी के अनुसार चलने के लिए हमें सर्वप्रथम आत्मत्याग की जरूरत है। जब तक हम अपने शरीर की इच्छाओं का दमन नहीं करेंगे तब तक हम आत्मा के अनुसार नही चल पायेंगे क्योंकि ‘‘आत्मा और शरीर एक दूसरे के विरोधी है’’ (गलातियों 5:17)। इसलिए हमें हमेशा प्रार्थना करते रहना चाहिए क्योंकि आत्मा तो तत्पर है परन्तु शरीर दुर्बल है (देखिए मारकुस 14:38)। हम सब प्रभु की सच्ची भेड़ बनने के लिए बुलाये गये हैं। प्रभु कहते हैं, ‘‘मैं द्वार के सामने खड़ा हो कर खटखटाता हूँ। यदि कोई मेरी वाणी सुन कर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके यहाँ आ कर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ’’ (प्रकाशना 3:20)। आज हम सब को उनकी आवाज़ पहचानते हुए उनका अनुसरण करने की जरूरत हैं जिससे हम उनके सच्चे शिष्य, सच्ची भेड़ सिद्ध हो जाएँ। ’’यदि तुम मेरी शिक्षा पर दृढ़ रहोगे, तो सचमुच मेरे शिष्य सिद्ध होगे’’ (योहन 8:31)


✍ -Biniush Topno


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Praise the Lord!