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Duliajan, Assam, India
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27 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

27 अक्टूबर 2020
वर्ष का तीसवाँ सामान्य सप्ताह, मंगलवार

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📒 पहला पाठ : एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 5:21-33

21) हम मसीह के प्रति श्रद्धा रखने के कारण एक दूसरे के अधीन रहें।

22) पत्नी प्रभु जैसे अपने पति के अधनी रहे।

23) पति उसी तरह पत्नी का शीर्ष है, जिस तरह मसीह कलीसिया के शीर्ष हैं और उसके शरीर के मुक्तिदाता।

24) जिस तरह कलीसिया मसीह के अधीन रहती है, उसी तरह पत्नी को भी सब बातों में अपने पति के अधीन रहना चाहिए।

25) पतियो! अपनी पत्नी को उसी तरह प्यार करो, जिस तरह मसीह ने कलीसिया को प्यार किया। उन्होंने उसके लिए अपने को अर्पित किया,

26) जिससे वह उसे पवित्र कर सकें और वचन तथा जल के स्नान द्वारा शुद्ध कर सकें;

27) क्योंकि वह एक ऐसी कलीसिया अपने सामने उपस्थित करना चाहते थे, जो महिमामय हो, जिस में न दाग हो, न झुर्री और न कोई दूसरा दोष, जो पवित्र और निष्कलंक हो।

28) पति अपनी पत्नी को इस तरह प्यार करे, मानो वह उसका अपना शरीर हो।

29) कोई अपने शरीर से बैर नहीं करता। उल्टे, वह उसका पालन-पोषण करता और उसकी देख-भाल करता रहता है। मसीह कलीसिया के साथ ऐसा करते हैं,

30) क्योंकि हम उनके शरीर के अंग हैं।

31) धर्मग्रन्थ में लिखा है- पुरुष अपने माता-पिता को छोड़ेगा और अपनी पत्नी के साथ रहेगा और वे दोनों एक शरीर हो जायेंगे।

32) यह एक महान रहस्य है। मैं समझता हूँ कि यह मसीह और कलीसिया के सम्बन्ध की ओर संकेत करता है।

33) जो भी हो, आप लोगों में हर एक अपनी पत्नी को अपने समान प्यार करे और पत्नी अपने पति का आदर करे।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 13:18-21

18) ईसा ने कहा, ’’ईश्वर का राज्य किसके सदृश है? मैं इसकी तुलना किस से करूँ?

19) वह उस राई के दाने के सदृश है, जिसे ले कर किसी मनुष्य ने अपनी बारी में बोया। वह बढ़ते-बढ़ते पेड़ हो गया और आकाश के पंछी उसकी डालियों में बसेरा करने आये।’’

20) उन्होंने फिर कहा, ’’मैं ईश्वर के राज्य की तुलना किस से करूँ?

21) वह उस ख़मीर के सदृश है, जिसे ले कर किसी स्त्री ने तीन पंसेरी आटे में मिलाया और सारा आटा ख़मीर हो गया।’’

📚 मनन-चिंतन

आज का पहला पाठ में संत पौलुस विवाहित जीवन में प्रेम के महत्त्व के बारे में बताते है। यह मसीह और उसके शरीर, कलीसिया के बीच संबंध पर आधारित होना चाहिए। पति और पत्नी को मसीह की आज्ञा मानते हुए एक-दूसरे को समर्पित करना है। उनके रिश्ते को आपसी प्यार और सम्मान से निर्देशित होना चाहिए।

आज का अनुवाक्य प्रभु पर श्रद्धा रखने वालों के लिए प्रतिज्ञात आशीर्वादों के बारे में है।

ईश्वर के राज्य के बारे में आज के सुसमाचार पाठ में येसु के दो छोटे दृष्टांत हैं: राई का दाना और खमीर का दृष्टान्त। ईश्वर के राज्य की अपनी छोटी और विनम्र शुरुआत है। ईश्वर अपने रहस्यमय तरीकों से इसे विकसित करेगा, फल देगा और इसे परिपूर्णता तक ले जायेगा। कलीसिया के सदस्यों और परिवारों के बीच संबंधों को ईश्वर के राज्य का सारांश, यानी प्रेम के सूत्र द्वारा निर्देशित किया जाना चाहिए। प्यार और दयालुता के छोटे और अक्सर गुमनाम कार्यों के द्वारा ही लोग अपने जीवन में ईश्वर का प्रेम और संरक्षण के अनुभव करते हैं। हम किसी का या किसी चीज़ का तिरस्कार न करें क्योंकि वे छोटे या तुच्छ हो। ईश्वर की दृष्टि में हर कोई कीमती और मूल्यवान है। राई का दाना से उत्पन्न पौधा आकाश के पक्षियों को आश्रय दे सकता है! जैसा कि संत मदर तेरेसा कहती हैं, शांति एक मुस्कान से शुरू होती है!

क्या आप दूसरों को घृणा करते हैं क्योंकि वे छोटे या तुच्छ हैं? क्या आप कुछ करने के लिए अनिच्छुक हैं क्योंकि यह छोटा है या तुच्छ है? आज दया के कुछ छोटे और अनाम कार्य करें। याद रखें कि आप ऐसा करने में ईश्वर के राज्य की वृद्धि में योगदान देते हैं !



📚 REFLECTION

In today’s first reading St. Paul speaks about the implications of love in married life. It must be based on the relations between Christ and his body, the Church. Husband and wife must give to one another in obedience to Christ. Their relationship must be guided by mutual love and respect.

The responsorial psalm speaks about the blessings in store for those who fear the Lord.

The gospel contains two small parables of Jesus about the Kingdom of God: the parable of the mustard seed and the yeast. The Kingdom of God has its small and humble beginnings. God in his mysterious ways will make it grow, bear fruit and bring it to fulfilment. Relations between members of the church and families must be guided by the quintessence of the Kingdom of God, that is, love. It is small and often anonymous acts of love and kindness that help people experience God’s love and concern in their lives. Let us not despise someone or something because they are small or insignificant. Everyone is precious and valuable in God’s sight. A mustard seed can give shelter to the birds of the air! As St. Mother Teresa says, peace begins with a smile!

Do you despise people because they are small or insignificant? Are you reluctant to do something because it is small or little? Do some small and anonymous acts of kindness today. Remember you will be contributing to the growth of the Kingdom of God!

✍Br. Biniush topno  



✍️-Br. Biniush Topno
albiniusht8133981546@gmail.com
© www.atpresentofficial.blogspot.com
Praise the Lord!

English Bible reading 27 October 2020

 

First Reading: Ephesians 5:21-33

21 Being subject one to another, in the fear of Christ.

22 Let women be subject to their husbands, as to the Lord:

23 Because the husband is the head of the wife, as Christ is the head of the church. He is the saviour of his body.

24 Therefore as the church is subject to Christ, so also let the wives be to their husbands in all things.

25 Husbands, love your wives, as Christ also loved the church, and delivered himself up for it:

26 That he might sanctify it, cleansing it by the laver of water in the word of life:

27 That he might present it to himself a glorious church, not having spot or wrinkle, or any; such thing; but that it should be holy, and without blemish.

28 So also ought men to love their wives as their own bodies. He that loveth his wife, loveth himself.

29 For no man ever hated his own flesh; but nourisheth and cherisheth it, as also Christ doth the church:

30 Because we are members of his body, of his flesh, and of his bones.

31 For this cause shall a man leave his father and mother, and shall cleave to his wife, and they shall be two in one flesh.

32 This is a great sacrament; but I speak in Christ and in the church.

33 Nevertheless let every one of you in particular love his wife as himself: and let the wife fear her husband.

Responsorial Psalm: Psalms 128: 1-2, 3, 4-5

1 Blessed are all they that fear the Lord: that walk in his ways.

2 For thou shalt eat the labours of thy hands: blessed art thou, and it shall be well with thee.

3 Thy wife as a fruitful vine, on the sides of thy house.

4 Behold, thus shall the man be blessed that feareth the Lord.

5 May the Lord bless thee out of Sion: and mayest thou see the good things of Jerusalem all the days of thy life.

Gospel: Luke 13: 18-21

18 He said therefore: To what is the kingdom of God like, and whereunto shall I resemble it?

19 It is like to a grain of mustard seed, which a man took and cast into his garden, and it grew and became a great tree, and the birds of the air lodged in the branches thereof.

20 And again he said: Whereunto shall I esteem the kingdom of God to be like?

21 It is like to leaven, which a woman took and hid in three measures of meal, till the whole was leavened.

✍️Br. Biniush Topno

(Duliajan)

26 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

26 अक्टूबर 2020
वर्ष का तीसवाँ सामान्य सप्ताह, सोमवार

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📒 पहला पाठ : एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 4:32-5:8

32) एक दूसरे के प्रति दयालु तथा सहृदय बनें। जिस तरह ईश्वर ने मसीह के कारण आप लोगों को क्षमा कर दिया, उसी तरह आप भी एक दूसरे को क्षमा करें।

1) आप लोग ईश्वर की प्रिय सन्तान हैं, इसलिए उसका अनुसरण करें

2) और प्रेम के मार्ग पर चलें, जिस तरह मसीह ने आप लोगों को प्यार किया और सुगन्धित भेंट तथा बलि के रूप में ईश्वर के प्रति अपने को हमारे लिए अर्पित कर दिया।

3) जैसा कि सन्तों के लिए उचित है, आप लोगों के बीच किसी प्रकार के व्यभिचार और अशुद्धता अथवा लोभ की चर्चा तक न हो,

4) और न भद्यी, मूर्खतापूर्ण या अश्लील बातचीत; क्योंकि यह अशोभनीय है- बल्कि आप ईश्वर को धन्यवाद दिया करें।

5) आप लोग यह निश्चित रूप से जान लें कि कोई व्यभिचारी, लम्पट या लोभी - जो मूर्तिपूजक के बराबर है- मसीह और ईश्वर के राज्य का अधिकारी नहीं होगा।

6) कोई निरर्थक तर्कों से आप लोगों को धोखा न दे। इन बातों के कारण ईश्वर का क्रोध विद्रोही लोगों पर आ पड़ता है।

7) इसलिए उन लोगों से कोई सम्बन्ध न रखें।

8) आप लोग पहले ’अन्धकार’ थे, अब प्रभु के शिष्य होने के नाते ’ज्योति’ बन गये हैं। इसलिए ज्योति की सन्तान की तरह आचरण करें।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 13:10-17

10) ईसा विश्राम के दिन किसी सभागृह में शिक्षा दे रहे थे।

11) वहाँ एक स्त्री आयी, जो अपदूत लग जाने के कारण अठारह वर्षों से बीमार थी। वह एकदम झुक गयी थी और किसी भी तरह सीधी नहीं हो पाती थी।

12) ईसा ने उसे देख कर अपने पास बुलाया और उस से कहा, ’’नारी! तुम अपने रोग से मुक्त हो गयी हो’’

13) और उन्होंने उस पर हाथ रख दिये। उसी क्षण वह सीधी हो गयी और ईश्वर की स्तुति करती रही।

14) सभागृह का अधिकारी चिढ़ गया, क्योंकि ईसा ने विश्राम के दिन उस स्त्री को चंगा किया था। उसने लोगों से कहा, ’’छः दिन हैं, जिन में काम करना उचित है। इसलिए उन्हीं दिनों चंगा होने के लिए आओ, विश्राम के दिन नहीं।’’

15) परन्तु प्रभु ने उसे उत्तर दिया, ’’ढोंगियो! क्या तुम में से हर एक विश्राम के दिन अपना बैल या गधा थान से खोल कर पानी पिलाने नहीं ले जाता?

16) शैतान ने इस स्त्री, इब्राहीम की इस बेटी को इन अठारह वर्षों से बाँध रखा था, तो क्या इसे विश्राम के दिन उस बन्धन से छुड़ाना उचित नहीं था?’’

17) ईसा के इन शब्दों से उनके सब विरोधी लज्जित हो गये; लेकिन सारी जनता उनके चमत्कार देख कर आनन्दित होती थी।

📚 मनन-चिंतन

संत पौलुस आज का पहला पाठ में हमें याद दिलाता है कि मसीह का अनुयायी कैसे होना चाहिए - "आप लोग ईश्वर की प्रिय संतान हैं, इसलिए उसका अनुकरण करें और प्रेम के मार्ग पर चलें, जिस तरह मसीह ने आप लोगों को प्यार किया।" यह सुसमाचार का सार है। येसु ने कहा, “मैं तुम लोगों को एक नयी आज्ञा देता हूँ - तुम एक दूसरे को प्यार करो। जिस प्रकार मैं ने तुम लोगों को प्यार किया, उसी प्रकार तुम भी एक दूसरे को प्यार करो। यदि तुम तुम एक दूसरे को प्यार करोगे, तो उसी से सब लोग जान जायेंगे कि तुम मेरे शिष्य हो। (Jn 13: 34-5)। हमें सतर्क रहना चाहिए कि हम गलत तर्कों से धोखा नहीं खाये और इस तरह ईश्वर के क्रोध से बचे रहें। हमारे सभी कार्यों और दूसरों के साथ संबंधों को प्यार के सिद्धांत द्वारा निर्देशित किया जाना चाहिए। एक ईसाई का पहचान-चिह्न प्रेम है, मसीह की तरह प्रेम। जो भी इसे विपरीत है वे सब अंधेरे की संतानों की बात है। हमें प्रभु के प्रकाश में चलना चाहिए।

आज का अनुवक्य इस पर ज़ोर देता है, "ईश्वर का अनुकरण की कोशिश करें, क्योंकि वह अपने बच्चों से प्यार करता है"।

आज का सुसमाचार हमें येसु के प्रेम का एक और उदाहरण देता है। विश्राम के दिन येसु ने सभागृह में एक महिला को चंगा किया जो अठारह साल से एक दुष्टात्मा से अपंग थी। इसके कारण सभागृह के अधिकारी क्रुद्ध हो गया। येसु सीखना चाहता है कि किसी को भी बांध रखने में नहीं बल्कि उनको स्वतंत्र करने में ही ईश्वर इच्छा है। "विश्राम दिवस मनुष्य के लिए बना है, न कि मनुष्य विश्राम-दिवस के लिए।"

जैसा कि संत पापा फ्रांसिस हमें हमेशा याद दिलाते हैं, हमें नियमें का पालन दया के साथ करना और करवाना चाहिए। संत पापा कहता है, "ईश्वर का नाम दया है।" क्या आप इंसान और उनकी आवश्यकताओं के ऊपर नियमों को महत्त्व देनेवाले हो ? पवित्र आत्मा से प्राथना करें कि आप दया और करुणा के साथ दूसरों से व्यवहार करना सीखें।


📚 REFLECTION

St. Paul reminds us how to be a follower of Christ -“Imitate God, as children of his that he loves, and follow Christ by loving as he loved”. This is pure preaching of the gospel. This is the essence of the gospel. Jesus said, “I give you a new commandment: love one another as I have loved you. It is by your love for one another, that everyone will recognize you as my disciples” (John 13:34-5). We must not allow ourselves to be deceived by empty arguments and thus invite God’s anger upon us. All our actions and relationships with others must be guided by the principle of love. The mark of a Christian is love, love like that of Christ. Anything else belongs to the children of darkness. We must walk in the light of the Lord.

The responsorial psalm emphasizes this, “try to imitate God, as children of his that he loves” (Ps 1:1-4; R Eph 5:1).

The gospel gives us yet another example of the way Jesus loved. On a Sabbath day Jesus healed a woman who was crippled for eighteen years by a spirit. This led to the indignation of the synagogue official for healing on a Sabbath. Not keeping bound, but untying the bonds and liberating people from whatever cripples people, even on a Sabbath is according to the will of God. “Sabbath is made for humans, not humans for Sabbath.”

As Pope Francis reminds us always we must apply rules with mercy. God’s name is mercy. Are you a legalistic person? Ask the Holy Spirit to help you to relate with people with mercy and compassion.

✍ -Br. Biniush Topno

(Duliajan Assam)



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Today's Holy Word in English Bible

First Reading: Ephesians 4:32 – 5: 8

32 And be ye kind one to another; merciful, forgiving one another, even as God hath forgiven you in Christ.

5:1 Be ye therefore followers of God, as most dear children;

2 And walk in love, as Christ also hath loved us, and hath delivered himself for us, an oblation and a sacrifice to God for an odour of sweetness

3 But fornication, and all uncleanness, or covetousness, let it not so much as be named among you, as becometh saints:

4 Or obscenity, or foolish talking, or scurrility, which is to no purpose; but rather giving of thanks.

5 For know you this and understand, that no fornicator, or unclean, or covetous person (which is a serving of idols), hath inheritance in the kingdom of Christ and of God.

6 Let no man deceive you with vain words. For because of these things cometh the anger of God upon the children of unbelief.

7 Be ye not therefore partakers with them.

8 For you were heretofore darkness, but now light in the Lord. Walk then as children of the light.

Responsorial Psalm: Psalms 1: 1-2, 3, 4 and 6

1 Blessed is the man who hath not walked in the counsel of the ungodly, nor stood in the way of sinners, nor sat in the chair of pestilence.

2 But his will is in the law of the Lord, and on his law he shall meditate day and night.

3 And he shall be like a tree which is planted near the running waters, which shall bring forth its fruit, in due season. And his leaf shall not fall off: and all whatsoever he shall do shall prosper.

4 Not so the wicked, not so: but like the dust, which the wind driveth from the face of the earth

6 For the Lord knoweth the way of the just: and the way of the wicked shall perish.

Gospel: Luke 13: 10-17

10 And he was teaching in their synagogue on their sabbath.

11 And behold there was a woman, who had a spirit of infirmity eighteen years: and she was bowed together, neither could she look upwards at all.

12 Whom when Jesus saw, he called her unto him, and said to her: Woman, thou art delivered from thy infirmity.

13 And he laid his hands upon her, and immediately she was made straight, and glorified God.

14 And the ruler of the synagogue (being angry that Jesus had healed on the sabbath) answering, said to the multitude: Six days there are wherein you ought to work. In them therefore come, and be healed; and not on the sabbath day.

15 And the Lord answering him, said: Ye hypocrites, doth not every one of you, on the sabbath day, loose his ox or his ass from the manger, and lead them to water?

16 And ought not this daughter of Abraham, whom Satan hath bound, lo, these eighteen years, be loosed from this bond on the sabbath day?

17 And when he said these things, all his adversaries were ashamed: and all the people rejoiced for all the things that were gloriously done by him.

Br. Biniush Topno

(Duliajan Assam)

25 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

25 अक्टूबर 2020
वर्ष का तीसवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार

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📒 पहला पाठ : निर्गमन ग्रन्थ 22:20-26

20) तुम लोग परदेशी के साथ अन्याय मत करो, उस पर अत्याचार मत करो, क्योंकि तुम भी मिस्र देश में परदेशी थे।

21) तुम विधवा अथवा अनाथ के साथ दुर्व्यवहार मत करो।

22) यदि तुम उनके साथ दुर्व्यवहार करोगे और वे मेरी दुहाई देंगे, तो मैं उनकी पुकार सुनूँगा

23) और मेरा क्रोध भड़क उठेगा। मैं तुम को तलवार के घाट उतरवा दूँगा और तुम्हारी पत्नियाँ विधवा और बच्चे अनाथ हो जायेंगे।

24) ''यदि तुम अपने बीच रहने वाले किसी दरिद्र देश-भाई को रुपया उधार देते हो, तो सूदखोर मत बनो - तुम उस से ब्याज मत लो।

25) यदि तुम रहने के तौर पर किसी की चादर लेते हो, तो सूर्यास्त से पहले उसे लौटा दो;

26) क्योंकि ओढ़ने क लिए उसके पास और कुछ नहीं है। वह उसी से अपना शरीर ढक कर सोता है। यदि वह मेरी दुहाई देगा, तो मैं उसकी सुनूँगा, क्योंकि मैं दयालु हूँ।

📕 दूसरा पाठ: थेसलनीकियों के नाम सन्त पौलुस का पहला पत्र 1:5c-10

5) आप लोग जानते हैं कि आपके कल्याण के लिए हमारा आचरण आपके यहाँ कैसा था।

6) आप लोगों ने हमारा तथा प्रभु का अनुसरण किया और घोर कष्टों का सामना करते हुए पवित्र आत्मा की प्रेरणा से आनन्दपूर्वक सुसमाचार स्वीकार किया।

7) इस प्रकार आप मकेदूनिया तथा अखै़या के सब विश्वासियों के लिए आदर्श बन गये।

8) आप लोगों के यहाँ से प्रभु का सुसमाचार न केवल मकेदूनिया तथा अखैया में फैला, बल्कि ईश्वर में आपके विश्वास की चर्चा सर्वत्र हो रही है। हमें कुछ नहीं कहना है।

9) लोग स्वयं हमें बताते है। कि आपके यहाँ हमारा कैसा स्वागत हुआ और आप किस प्रकार देवमूर्तियाँ छोड़ कर ईश्वर की ओर अभिमुख हुए,

10) जिससे आप सच्चे तथा जीवन्त ईश्वर के सेवक बनें और उसके पुत्र ईसा की प्रतीक्षा करें, जिन्हें ईश्वर ने मृतकों में से जिलाया। यही ईसा स्वर्ग से उतरेंगे और हमें आने वाले प्रकोप से बचायेंगे।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 22:34-40

34) जब फरीसियों ने यह सुना कि ईसा ने सदूकियों का मुँह बन्द कर दिया था, तो वे इकट्ठे हो गये।

35) और उन में से एक शास्त्री ने ईसा की परीक्षा लेने के लिए उन से पूछा,

36) गुरुवर! संहिता में सब से बड़ी आज्ञा कौन-सी है?’’

37) ईसा ने उस से कहा, ’’अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो।

38) यह सब से बड़ी और पहली आज्ञा है।

39) दूसरी आज्ञा इसी के सदृश है- अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो।

40) इन्हीं दो आज्ञायों पर समस्त संहिता और नबियों की शिक्षा अवलम्बित हैं।’’

📚 मनन-चिंतन

आज के पवित्र पाठों में हमारे विश्वास के सबसे मौलिक आज्ञाओं के बारे में बताये गए हैं। वे प्रेम की प्रधानता के बारे में बोलते हैं - ईश्वर के प्रति प्रेम और अपने पड़ोसियों के प्रति प्रेम।

पहला पाठ गरीबों को प्यार करने की बात करता है। ईश्वर का गरीब लोगों के प्रति विशेष प्रेम है। इसलिए ईश्वर माँग करता है कि हम गरीब, पराये, पददलितों के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करें।

आज का अनुवाक्य शक्ति और सुरक्षा के स्रोत के रूप में ईश्वर की महिमा करता है। भजनकार एक महान योद्धा और रक्षक के रूप में ईश्वर का वर्णन करता है। परमेश्वर उन लोगों के शत्रुओं पर बल और विजय का स्रोत है, जो उन पर भरोसा करते हैं। सच्चे विश्वासी अपना जीवन ईश्वर के नियंत्रण में छोड़ देते है ।

आज का दूसरा पाठ ईश्वर के वचन से प्रेम करने और उसे जीवन में फैलाने की बात करता है। संत पौलुस ने थेसालोनिका के लोगों को संबोधित करते हुए उनसे आग्रह किया कि वे विश्वास के कार्यों को जारी रखें जो उन्होंने पहले ही शुरू कर दिया है: मूर्तिपूजा से दूर होकर एक दूसरे की देखभाल करना।

सुसमाचार प्रेम की सबसे बड़ी आज्ञा के बारे में बात करता है। येसु उन को फंसाने के उद्देश्य से फरीसियों द्वारा किए गए एक सवाल का जवाब देता है । येसु मूसा द्वारा दिए गए सभी कानून और उनके विश्लेषणों को दो वाक्यांशों में सारांशित करता है: ईश्वर के प्रति पूर्ण और सम्पूर्ण प्रेम जो दूसरों के प्रति प्रेम का स्रोत बनता है।

येसु का कानून और आदेशों का सारांश वास्तव में वह मापदंड है जिसके द्वारा हमें कार्य करना चाहिए। हमें यह देखना चाहिए कि हमारे कार्य ईश्वर के लिए हमारे पूर्ण और कुल प्रेम को कैसे प्रकट करते हैं और दूसरों की देखभाल के लिए हमारे विवेकपूर्ण निर्णय। येसु का अनुयायी होना का मतलब है कि हम उनके समान ईश्वर को और दूसरों को प्यार करें।

कई लोग प्यार को सिर्फ एक सुखद भावना मानते हैं। लेकिन प्रेम, जैसा कि बाइबिल में वर्णित है, दूसरों के साथ होने और उनके हित कार्य करने का एक निर्णय है। प्रेम का उच्चतम रूप दूसरे के लिए पूरी तरह से स्वयं को समर्पित करना है। दूसरों के लिए एक का जीवन देना पड़ोसी प्रेम का सबसे बड़ा उदाहरण है। ठीक यही येसु ने अपने मानव बनने और हमारे बीच रहने के द्वारा किया था। हमारे प्रति उनके प्रेम के कारण वह क्रूस पर बलि बन गयी।

कई लोगों के लिए विश्वास और आध्यात्मिकता केवल उनका और ईश्वर का सम्बन्ध है। यह केवल "मैं और येसु" मनोभाव जिसमें अन्य लोग और उनकी ज़रूरतें शामिल नहीं है सच्चा विश्वास और सच्ची आध्यात्मिकता नहीं है। ईश्वर और मनुष्य - दोनों के प्रति संबंधों का संतुलन बनाये रखना है।

बेशक, ईश्वर के प्रति प्रेम की एक प्राथमिकता है। यह न केवल इस तथ्य को दर्शाता है कि हमंा हमेशा अपने जीवन में अन्य सभी चीजों से पहले ईश्वर के प्यार को स्थान देना चाहिए, बल्कि, एक निश्चित तरीके से, इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि हम ईश्वर से प्यार करने से जो ताकत प्राप्त करते हैं उसी से हमें अपने पड़ोसियों से खुद की तरह प्यार करने की ताकत मिलती है। ईश्वर की कृपा और अनुग्रह के बिना हम उनके जैसे प्यार नहीं कर सकते हैं। येसु कहता है, "मेरे बिना तुम कुछ नहीं कर सकते," तो विशेष रूप से, उसके बिना हम उसे और उसके जैसे प्यार नहीं कर सकते।

ईसाई समुदाय प्रेम का समुदाय है। प्यार के बिना दूसरों के साथ संबंध स्थापित करना असंभव है। प्रेम के बिना हम कलीसिया की सेवा नहीं कर सकते, गरीबों और शोषितों की रक्षा नहीं कर सकते हैं, बिना प्रेम के हम अत्याचारियों में बदल सकते हैं, बिना प्रेम के कोई उद्धार नहीं।

पवित्र यूखरिस्त प्रेम का संस्कार है। पवित्र यूखरिस्त में भागीदारी इसका संकेत है कि हम ईश्वर से प्यार करते हैं और हम अपने पड़ोसियों और गरीबों की जिम्मेदारी लेते हैं। यह प्यार करने वालों का संस्कार है।

ईश्वर आज के पाठों के द्वारा हम लोगों को प्यार करने की चुनौती देते है । अपने आप से पूछें: क्या आप एक प्यार करने वाले व्यक्ति हैं? क्या आपका विश्वास का मतलब केवल आप और ईश्वर के बीच सम्बन्ध है? आप अपने पडोसी को कैसे देखते हैं? उनके प्रति आपका क्या दृष्टिकोण है? क्या आप स्वयं एक अच्छे पड़ोसी हैं?


📚 REFLECTION

Today’s readings speak about the most fundamental laws that must guide our life of faith. They speak about the primacy of Love – love of God and love of one’s neighbours as oneself.

The first reading talks about loving the poor. God has a special love for the poor people. Therefore God demands that we show love to the poor, the alien, the stranger.

The responsorial psalm proclaims God as source of strength and protection. The psalmist describes God in terms of a great warrior and defender. God is the source of strength and the victor over the enemies of those who trust in the Lord. For the true believer, God is in control and the only thing that the believer must do is to acknowledge the supremacy of God.

The second reading talks about loving the word of God and spreading it through life. St. Paul addresses the people of Thessalonika urging them to continue the acts of faith which they have already begun: turning away from idolatrous worship and caring for one another.

The gospel talks about the greatest commandment of love. In the Gospel, Jesus responds to a tricky question posed by the Pharisees. Jesus generalizes and summarizes all the Mosaic Law into two phrases: Complete and total love of God which flows into love and concern for others.

Jesus’ summary of the law and commands is truly the measuring stick by which we must act. We must look at how our actions manifest our complete and total love for God and our conscientious decision to care for others. Being a follower of Jesus is an invitation to act like our God Who is Love.

Many consider love as just a pleasurable feeling. But love, as described throughout scriptures, is a decision to do and be for another. The highest form of love is giving totally of one’s self for another. And giving of one’s life for another person is the greatest example of love of neighbour. That is exactly what Jesus did in His becoming human and living among us. It resulted in His death. Yet Jesus made the decision to do all He could so that people would come to know the great love God has for them and they in turn would share that message with others.

A “me and Jesus” Christianity that does not include the service of the People of God (and all others in need) is not a true Christianity that is consistent with the Judeo-Christian tradition. The Lord Jesus invites us to strike a right balance between the two.

There is, of course, a logical priority to the First. It not only concerns the obvious fact that we should always place the Love of God before all other things in our lives, but, in a certain way, more importantly, the strength that we receive from loving God and being loved by Him is precisely where we get the strength to love our neighbors as ourselves. We cannot love the way that the Lord Jesus calls us to love without His grace and His strength. If “without Me you can do nothing,” then in particular, without Him we cannot love as He calls us to. Let us place Him first and plead with Him for the grace to love others, even as He has loved us!

Christian community is a community of love. Without love it is impossible to establish relationship with others. Without love we cannot serve the Church, defend the poor and the oppressed, without love we can turn into oppressors, without love there no salvation.

The Eucharist is the sacrament of love. Participation in the Eucharist is a sign that we love God and we take responsibility for the neighbour/poor. It is the sacrament of those who love.

Today we are challenged to be loving people. Ask yourself: Are you a loving person? Is your faith limited to the relation between you and God? How do you view your neigbour? What is your attitude towards them? Are you a good neighbour?


मनन-चिंतन

जो इस जीवन के यथार्थ एवं क्षणभंगुरता को समझता है, वह व्यक्ति आने वाले जीवन या अनंत जीवन के लिए जरूर तत्पर रहता है। मत्ती 19 में हम ऐसे ही एक महत्त्वाकांक्षी युवक जिसने धन कमाया था, अनन्त जीवन की प्राप्ति के लिए प्रभु के पास आता है और यह सवाल करता है, ‘‘गुरुवर! अनन्त जीवन प्राप्त करने के लिए मैं कौन सा भला कार्य करूँ?’’ (मत्ती 19:16) प्रभु येसु उससे कहते हैं, ‘‘यदि तुम जीवन में प्रवेश करना चाहते हो, तो आज्ञाओं का पालन करो।’’ (मत्ती 19:17)। अर्थात् आज्ञाओं का पालन करना हम सबके लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है। जो प्रभु की आज्ञाओं का पालन करता हैं उसे आर्शीवाद प्राप्त होता है। ‘‘प्रभु की जो आज्ञाएँ मैं आज तुम्हारे सामने रख रहा हूँ, यदि तुम उनका पालन करोगे, तो तुम्हें आर्शीवाद प्राप्त होगा’’ (विधि 11:27)। ‘‘यदि तुम प्रभु, अपने ईश्वर की वाणी पर ध्यान दोगे और उन सब आदेशों का पालन करोगे, जिन्हें मैं आज तुम को दे रहा हूँ। तो वह तुम्हें पृथ्वी भर के राष्ट्रों से महान् बनायेगा। यदि तुम प्रभु, अपने ईश्वर की वाणी पर ध्यान दोगे, तो ये सब वरदान तुम को मिलेंगे और तुम्हारा साथ देते रहेंगे। नगर में तुम्हारा कल्याण होगा और देहात में तुम्हारा कल्याण होगा। तुम्हारी सन्तान, तुम्हारी भूमि की उपज, तुम्हारे पशुधन, तुम्हारी गायों और भेड़-बकरियों के बच्चों को आशीर्वाद प्राप्त होगा। तुम्हारी टोकरी और आटा गूँधने के पात्र को आशीर्वाद प्राप्त होगा। घर से बाहर जाने पर, दोनों यमय तुम्हें आशीर्वाद प्राप्त होगा। प्रभु तुम्हारा विरोध करने वाले शत्रओं को पराजित करेगा। वे एक मार्ग से तुम पर आक्रमण करने आयेंगे, परन्तु तुम्हारे सामने से हो कर सात मार्गों से भग निकलेंगे। प्रभु तुम को तुमहारे भण्डारो और तुम्हारे सब कार्यों में आशीर्वाद देता रहेगा। प्रभु, तुम्हारा ईश्वर तुम्हें उस देश में आशीर्वाद देता रहेगा, जिसे वह तुम्हें प्रदान करने वाला है। यदि तुम प्रभु, अपने ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करते हुए उसके बताये मार्गों पर चलोगे, तो प्रभु तुम को अपनी पवित्र प्रजा बनायेगा, जैसी कि उसने तुम से शपथपूर्वक प्रतिज्ञा की है.......तो तुम्हारी अवनति नहीं, बल्कि उन्नति होती रहेगी।’’ (विधि विवरण 28:1-16) इतने सारे आशीर्वाद मात्र ईश्वर की आज्ञाओ का पालन करने से है। अब सवाल यह उठता है कि कौन सी आज्ञा सबसे महत्वपूर्ण है। आज के सुसमाचार में प्रभु येसु बताते हैं कि पूरी संहिता में सब से बड़ी आज्ञा कौन सी है जिसका हमे पालन करना चाहिए।

प्रभु येसु सबसे बड़ी आज्ञा के विषय में बताते हैं- ‘‘अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो और अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो’’ (मत्ती 22:37,39)। अर्थात् सबसे पहली आज्ञा का मतलब प्रभु ईश्वर को अपनी जिन्दगी में प्रथम स्थान देना - हर क्षेत्र में, हर कार्य में, अपनी पूरी जिन्दगी में। और फिर अपने पड़ोसियों को अपने समान समझना है।

इन दो आज्ञाओ में समस्त संहिता और नबियों की शिक्षा अवलंबित है। अर्थात् इन दो आज्ञाओ में हमारा जीवन टिका हुआ है। ये दो आज्ञाएं हमारे जीवन का स्तम्भ है। यह किस प्रकार से यह हमारे जीवन का स्तम्भ है, आईये इस बात पर मनन-चिंतन करें।

अगर कोई व्यक्ति किसी चीज़ का अविष्कार करता है तो वह कई वर्षों से रिसर्च करता है और उस खोज से जुडी हर एक बात पर बारीकियों से ध्यान देता है। अर्थात् जो व्यक्ति किसी भी यंत्र का निर्माण करता है तो वह उसकी छोटी से छोटी चीज़ों तथा उसकी प्रत्येक अच्छाई-बुराई से अच्छी तरह परिचित होता है। ठीक उसी प्रकार ईश्वर ने हम सभी को बनाया है और यह जीवन दिया हैं और वे हमारी अच्छाई और बुराई के बारे में सब जानते हैं। ‘‘माता के गर्भ में तुम को रचने से पहले ही, मैंने तुम को जान लिया’’ (यिरमियाह 1:5)। ‘‘प्रभु! तूने मेरी थाह ली है; तू मुझे जानता है। तूने मेरे शरीर की सृष्टि की; तूने माता के गर्भ में मुझे गढ़ा। जब मैं अदृश्य में बन रहा था, जब मैं गर्भ के अन्धकार में गढ़ा जा रहा था, तो तूने मेरी हड्डियों को बढ़ते देखा। तूने मेरे सब कर्मों को देखा’’ (स्तोत्र 139:1,13,15-16)। ईश्वर को अच्छी तरह मालूम है कि हमारा जीवन किस प्रकार से चलना चाहिए। ईश्वर इसे भली भांति जानते हैं। ‘‘मैं तुम्हारे लिए निर्धारित अपनी योजनाएँ जानता हूँ- तुम्हारे हित की योजनाएँ, अहित की नहीं, तुम्हारे लिए आशामय भविष्य की योजनाएँ’’ (यिरमियाह 29:11)। हमारे जीवन को सही रूप से या अच्छे रूप से चलने के लिए उन्होंने हमारे लिए मूसा द्वारा हमें दस नियम दिये हैं। कुछ लोगों ने इसको समझा और अपनाया परन्तु कुछ ने इन्हें अस्वीकार किया। बाद में प्रभु येसु ने इन दस नियमों को सरलता प्रदान करते हुए इन्हें दो नियमों में संयोजित कर दिया। इन दो नियमों में बाकी सब नियम समाहित है और अगर हम मात्र इन दो नियमों या आज्ञाओं का पालन करेंगे तो हमारे जीवन अर्थपूर्ण रूप से चलने लगेगे और जितने भी आशीर्वाद विधि विवरण ग्रंथ में बताये गये है वे हमें प्राप्त होंगे और हमें अनन्त जीवन की प्राप्ति में मदद मिलेगी।

ईश्वर से प्रेम और पड़ोसी से प्रेम एक दूसरे के पूरक हैं। जो व्यक्ति ईश्वर से प्रेम करता है वह दूसरों से भी उसी प्रकार से प्रेम करेगा। ‘‘मेरी आज्ञा यह है- जिस प्रकार मैंने तुम लोगो को प्यार किया है, उसी प्रकार तुम भी एक दूसरे को प्यार करो’’ (योहन 15:12)। अर्थात् जो ईश्वर से सच्चा प्रेम करता और उनकी आज्ञाओं का पालन करता है तो वह ज़रूर दूसरो से भी उसी प्रकार प्रेम करेगा। अगर वह ईश्वर के सामने भक्त बना रहता है पूजा पाठ करता है परंतु अपने पड़ोसियो से प्रेम नहीं करता तो उसका प्रेम झूठा है। ‘‘यदि वह अपने भाई को, जिसे वह देखता है, प्यार नहीं करता, तो वह ईश्वर को, जिसे उसने कभी देखा नहीं, प्यार नहीं कर सकता।’’ (1 योहन 4:20)। ऐसे लोगो के लिए प्रभु येसु कहते हैं, ‘‘ढ़ोंगियो! इसायस ने यह कह कर तुम्हारे विषय में ठीक ही भविष्यवाणी की है- वे लोग मुख से मेरा आदर करते हैं, परन्तु इनका ह्दय मुझ से दूर है।’’ (मत्ती 15:7-8)। परन्तु जो ईश्वर से सच्चा प्रेम करता वह इस प्रेम को दूसरों को बॉंटने के लिए दौड़ता है जिस प्रकार मरियम पवित्र आत्मा के प्रेम से प्रेरित होकर एलिजबेथ की सेवा करने के लिए शीघ्रता से चल पड़ती है (लूकस 1:39)। समारी स्त्री ईश्वर के पुत्र और उनके प्रेम को पहचान कर दूसरों को उस मसीहा तथा उनके प्रेम को देखने को बुलाती है (योहन 4:28-29)। कलकत्ता की संत तेरेसा प्रभु येसु से इतना प्रेम करती है कि वह दूसरे में येसु को पाकर उन मनुष्यों से भी उतना ही प्रेम करती हैं। अगर हम सबसे पहली आज्ञा का सच्चे रूप में पालन करने लगेंगे तो हम में ईश्वर का निवास होगा। ‘‘यदि कोई मुझे प्यार करेगा, तो वह मेरी शिक्षा पर चलेगा। मेरा पिता उसे प्यार करेगा और हम उसके पास आ कर उस में निवास करेंगे’’ (योहन 14:23)। “और उस समय हम यह कह सकेंगे कि ‘‘मैं अब जीवित नहीं रहा, बल्कि मसीह मुझ में जीवित हैं’’ (गलातियों 4:20)। और इसके साथ साथ हम दूसरों में ईश्वर के रूप को देख सकेंगे। ‘‘मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ - तुमने मेरे इन भाइयों में से किसी एक के लिए, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, जो कुछ किया, वह तुमने मेरे लिए ही किया’’(मत्ती 25:40)।

- Br. Biniush Topno
(Duliajan Assam)

24 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

24 अक्टूबर 2020
वर्ष का उन्तीसवाँ सामान्य सप्ताह, शनिवार

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📒 पहला पाठ : एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 4:7-16

7) मसीह ने जिस मात्रा में देना चाहा, उसी मात्रा में हम में प्रत्येक को कृपा प्राप्त हुई है।

8) इसलिए धर्मग्रन्थ कहता है- वह ऊँचाई पर चढ़ा और बन्दियों को ले गया। उसने मनुष्यों को दान दिये।

9) वह चढ़ा - इसका अर्थ यह है कि वह पहले पृथ्वी के निचले प्रदेशों में उतरा।

10) जो उतरा, वह वही है जो आकाश से भी ऊपर चढ़ा, जिससे वह सब कुछ परिपूर्ण कर दे।

11) उन्होंने कुछ लोगों को प्रेरित, कुछ को नबी, कुछ को सुसमाचार-प्रचारक और कुछ को चरवाहे तथा आचार्य होने का वरदान दिया।

12) इस प्रकार उन्होंने सेवा-कार्य के लिए सन्तों को नियुक्त किया, जिससे मसीह के शरीर का निर्माण तब तक होता रहे,

13) जब तक हम विश्वास तथा ईश्वर के पुत्र के ज्ञान में एक नहीं हो जायें और मसीह की परिपूर्णता के अनुसार पूर्ण मनुष्यत्व प्राप्त न कर लें।

14) इस प्रकार हम बालक नहीं बने रहेंगे और भ्रम में डालने के उद्देश्य से निर्मित धूर्त मनुष्यों के प्रत्येक सिद्धान्त के झोंके से विचलित हो कर बहकाये नहीं जायेंगे।

15) हम प्रेम से प्रेरित हो कर सत्य बोलें और इस तरह मसीह की परिपूर्णता प्राप्त करें। वह हमारे शीर्ष हैं।

16) और उन से समस्त शरीर को बल मिलता है। वह शरीर अपनी सब सन्धियों द्वारा सुसंघटित हो कर प्रत्येक अंग की समुचित सक्रियता से अपनी परिपूर्णता तक पहुँचता और प्रेम द्वारा अपना निर्माण करता है।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 13:1-9

1) उस समय कुछ लोग ईसा को उन गलीलियों के विषय में बताने आये, जिनका रक्त पिलातुस ने उनके बलि-पशुओं के रक्त में मिला दिया था।

2) ईसा ने उन कहा, ’’क्या तुम समझते हो कि ये गलीली अन्य सब गलीलियों से अधिक पापी थे, क्योंकि उन पर ही ऐसी विपत्ति पड़ी?

3) मैं तुम से कहता हूँ, ऐसा नहीं है; लेकिन यदि तुम पश्चात्ताप नहीं करोगे, तो सब-के-सब उसी तरह नष्ट हो जाओगे।

4) अथवा क्या तुम समझते हो कि सिल़ोआम की मीनार के गिरने से जो अठारह व्यक्ति दब कऱ मर गये, वे येरुसालेम के सब निवासियों से अधिक अपराधी थे?

5) मैं तुम से कहता हूँ, ऐसा नहीं है; लेकिन यदि तुम पश्चात्ताप नहीं करोगे, तो सब-के-सब उसी तरह नष्ट हो जाओगे।’’

6) तब ईसा ने यह दृष्टान्त सुनाया, ’’किसी मनुष्य की दाखबारी में एक अंजीर का पेड़ था। वह उस में फल खोजने आया, परन्तु उसे एक भी नहीं मिला।

7) तब उसने दाखबारी के माली से कहा, ’देखो, मैं तीन वर्षों से अंजीर के इस पेड़ में फल खोजने आता हूँ, किन्तु मुझे एक भी नहीं मिलता। इसे काट डालो। यह भूमि को क्यों छेंके हुए हैं?’

8) परन्तु माली ने उत्तर दिया, ’मालिक! इस वर्ष भी इसे रहने दीजिए। मैं इसके चारों ओर खोद कर खाद दूँगा।

9) यदि यह अगले वर्ष फल दे, तो अच्छा, नहीं तो इसे काट डालिएगा’।’’

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है। इसलिए हममें से प्रत्येक को ईश्वर की कृपा का हिस्सा दिया गया है, जैसा कि मसीह ने उसे आवंटित किया है। हर वरदान का उद्देश्य यह है कि हमें इसका उपयोग मसीह का शरीर,यानि कलीसिया के निर्माण के लिए करें। यदि हम सच्चाई और प्रेम से जीते हैं तो हमारा आध्यात्मिक विकास होता है। मसीह कलीसिया का प्रमुख है और हम सभी सदस्य हैं। विश्वासियों का समूह, कलीसिया, प्रेम में बनाया गया है।

आज का सुसमाचार में हम यह संदेश सुनते हैं कि यदि हम पश्चाताप नहीं करते हैं तो हम सभी नष्ट हो जाएंगे। पश्चाताप करने का प्रकट रूप है कि हम ईश्वर के राज्य अनुयोज्य फल उत्पन्न करें। येसु अंगूर के बाग में अंजीर के पेड़ के दृष्टांत का वर्णन करते हैं, जो तीन साल से फल नहीं दे रहा था। बगीचे की देखरेख करने वाले व्यक्ति के अनुरोध पर, स्वामी ने फल उत्पन्न करने के लिए एक और वर्ष, एक और मौका प्रदान करता है; अन्यथा इसे काट दिया जाएगा।

ईश्वर हमें पश्चाताप करने के लिए आमंत्रित करता है। खुश खबरि यह है कि वह हमें फल उत्पन्न करने के लिए कुछ और समय एवं मौका देता है। अवसर चूकना नहीं है। प्रभु की हनशीलता हमारी मुक्ति के लिए एक अवसर है। cf (2Pet 3:15) "क्या तुम ईश्वर की असीम दयालुता, सहनशीलता और धैर्य का तिरस्कार करते और यह नहीं समझते कि ईश्वर की दयालुता तुम्हें पश्चाताप की ओर ले जाना चाहती है ?"(रोम 2: 4)।

आप के जीवन के किस बात में या क्षेत्र में पश्चाताप की आवस्यकता है? अवसर और समय गंवाए बिना प्रभु की ओर चलो!


📚 REFLECTION

Each one of us has been given a share of God’s grace, as Christ has allotted it. The purpose of every gift is that we should use it for the building up of the body of Christ, the Church. We grow in all ways if we live by the truth and in love. Christ is the head of the Church and we are all members. The Church is built up in love.

In the gospel we hear the message that if we do not repent, we all will perish. The way to repent is by producing the fruits befitting the kingdom of God. Jesus narrates the parable of the fig tree in the vineyard, which was not producing fruits for three years. At the request of the man who looked after the garden the master gave more year to bear fruits; it not it would be cut down.

God is inviting us to repent. The good news is that he gives us one more opportunity with some more time to produce fruits. The opportunity is not to be missed. “Think of our Lord’s patience as your opportunity to be saved” (2Pet 3:15). “”Are you not disregarding his, tolerance and patience, failing to realize that this generosity of God is meant to bring you to repentance/” (Rom 2:4).

What is the area of repentance that the Lord is reminding you about? Act upon it without delay!

✍ -Br. Biniush Topno

(Duliajan Assam)

23 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

23 अक्टूबर 2020
वर्ष का उन्तीसवाँ सामान्य सप्ताह, शुक्रवार

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📒 पहला पाठ : एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 4:1-6

1) ईश्वर ने आप लोगों को बुलाया है। आप अपने इस बुलावे के अनुसार आचरण करें - यह आप लोगों से मेरा अनुरोध है, जो प्रभु के कारण कै़दी हूँ।

2) आप पूर्ण रूप से विनम्र, सौम्य तथा सहनशील बनें, प्रेम से एक दूसरे को सहन करें

3) और शान्ति के सूत्र में बँध कर उस एकता को बनाये रखने का प्रयत्न करते रहें, जिसे पवित्र आत्मा प्रदान करता है।

4) एक ही शरीर है, एक ही आत्मा और एक ही आशा, जिसके लिए आप लोग बुलाये गये हैं।

5) एक ही प्रभु है, एक ही विश्वास और एक ही बपतिस्मा।

6) एक ही ईश्वर है, जो सबों का पिता, सब के ऊपर, सब के साथ और सब में व्याप्त है।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 12:54-59

54) ईसा ने लोगों से कहा, “यदि तुम पश्चिम से बादल उमड़ते देखते हो, तो तुरन्त कहते हो, ’वर्षा आ रही है‘ और ऐसा ही होता है,

55) जब दक्षिण की हवा चलती है, तो कहते हो, ’लू चलेगी’ और ऐसा ही होता है।

56 ढोंगियों! यदि तुम आकाश और पृथ्वी की सूरत पहचान सकते हो, तो इस समय के लक्षण क्यों नहीं पहचानते?

57) ’’तुम स्वयं क्यों नहीं विचार करते कि उचित क्या है?

58) जब तुम अपने मुद्यई के साथ कचहरी जा रहे हो, तो रास्ते में ही उस से समझौता करने की चेष्टा करो। कहीं ऐसा न हो कि वह तुम्हें न्यायकर्ता के पास खींच ले जाये और न्यायकर्ता तुम्हें प्यादे के हवाले कर दे और प्यादा तुम्हें बन्दीगृह में डाल दे।

59) मैं तुम से कहता हूँ, जब तक कौड़ी-कौड़ी न चुका दोगे, तब तक वहाँ से नहीं निकल पाओगे।’’

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है। वह हमें विश्वासियों के समुदाय में इस प्रेम का अनुभव करने के लिए कहता है। कलीसिया एक शरीर है जिसका एक ईश्वर, एक विश्वास और एक बपतिस्मा है। संत पौलुस एफेसियों को याद दिलाता है कि वे मसीह के शरीर के सदस्य होने के कारण अपने इस महान बुलावे के अनुसार जीवन जियें। उनके आपसी संबंध प्रेम,निस्वार्थता, सौम्यता और क्षमाशीलता द्वारा निर्देशित किया जाना है। यह बात आज का अनुवाक्य में प्रतिध्वनित होता है, जो साफ-सुथरे हाथों और शुद्ध हृदय वाले लोगों की सराहना करता है, न कि बेकार चीज़ों की लालसा करनेवलों की।

आज का सुसमाचार में येसु समय के संकेतों की पहचान करने के बारे में शिक्षा देता है। लोग प्रकृति के संकेतों को परखना बहुत अच्छी तरह से जानते हैं लेकिन वे येसु के सुसमाचार प्रचार से जुड़े संकेतों को परखने में असफल रहे। नबियों के द्वारा घोषित मुक्तिदाता येसु है; यह समझने के लिए यह पर्याप्त था कि लोग येसु के जीवन और सेवा कार्य और उसे सम्बंधित बातों को देखें और समझें। सुसमाचार सुनकर जीवन सुधर का समय अब है; विलम्ब करने पर देर हो जाएगी। हमें अपने जीवन को सुधारने के लिए दिए गए समय का सदुपयोग करना चाहिए। प्रभु में अपना विश्वास अर्पित कर हम अनंत दंड से बच सकता है।

आपके संबंधों का क्या स्वाभाव है? क्या वे निस्वार्थ प्रेम द्वारा निर्देशित हैं जो सौम्यता और क्षमाशीलता में प्रकट होता है? क्या आप समय के संकेतों और उनके अर्थ को पहचान पा रहे हैं? ईश्वर के द्वारा प्रदत्त चिन्हों को पहचानो और उनकी ओर अपना जीवन फिराओ।


📚 REFLECTION

God loves us. He calls us to experience this love in the community of believers which is one Body with one Lord, one faith, and one baptism. St. Paul reminds the Ephesians to live a life worthy of their vocation as members of the Body of Christ. Their mutual relations are to be guided by charity, selflessness, gentleness and patience. This is echoed by the Responsorial Psalm, which commends those with clean hands and pure heart, desiring not worthless things.

In the gospel Jesus speaks about interpreting the signs of the times. The people knew very well to read the signs of nature but they failed to read the signs surrounding Jesus’ preaching. The signs around Jesus are enough for the discerning ones to understand that now is the time announced by the prophets, when people must be converted and acknowledge the Saviour. Tomorrow will be too late. We are on our way to God’s judgement; we must make use of the time given to us to reform our lives. We can be saved from judgement by believing in Jesus.

What characterizes your relationships? Are they guided by selfless love which expresses itself in gentleness and patience? Are we able to see the signs of the times and understand their meaning for our lives?

✍ -Br. Biniush Topno

(Duliajan Assam)