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Duliajan, Assam, India
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23 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

23 अक्टूबर 2020
वर्ष का उन्तीसवाँ सामान्य सप्ताह, शुक्रवार

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📒 पहला पाठ : एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 4:1-6

1) ईश्वर ने आप लोगों को बुलाया है। आप अपने इस बुलावे के अनुसार आचरण करें - यह आप लोगों से मेरा अनुरोध है, जो प्रभु के कारण कै़दी हूँ।

2) आप पूर्ण रूप से विनम्र, सौम्य तथा सहनशील बनें, प्रेम से एक दूसरे को सहन करें

3) और शान्ति के सूत्र में बँध कर उस एकता को बनाये रखने का प्रयत्न करते रहें, जिसे पवित्र आत्मा प्रदान करता है।

4) एक ही शरीर है, एक ही आत्मा और एक ही आशा, जिसके लिए आप लोग बुलाये गये हैं।

5) एक ही प्रभु है, एक ही विश्वास और एक ही बपतिस्मा।

6) एक ही ईश्वर है, जो सबों का पिता, सब के ऊपर, सब के साथ और सब में व्याप्त है।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 12:54-59

54) ईसा ने लोगों से कहा, “यदि तुम पश्चिम से बादल उमड़ते देखते हो, तो तुरन्त कहते हो, ’वर्षा आ रही है‘ और ऐसा ही होता है,

55) जब दक्षिण की हवा चलती है, तो कहते हो, ’लू चलेगी’ और ऐसा ही होता है।

56 ढोंगियों! यदि तुम आकाश और पृथ्वी की सूरत पहचान सकते हो, तो इस समय के लक्षण क्यों नहीं पहचानते?

57) ’’तुम स्वयं क्यों नहीं विचार करते कि उचित क्या है?

58) जब तुम अपने मुद्यई के साथ कचहरी जा रहे हो, तो रास्ते में ही उस से समझौता करने की चेष्टा करो। कहीं ऐसा न हो कि वह तुम्हें न्यायकर्ता के पास खींच ले जाये और न्यायकर्ता तुम्हें प्यादे के हवाले कर दे और प्यादा तुम्हें बन्दीगृह में डाल दे।

59) मैं तुम से कहता हूँ, जब तक कौड़ी-कौड़ी न चुका दोगे, तब तक वहाँ से नहीं निकल पाओगे।’’

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है। वह हमें विश्वासियों के समुदाय में इस प्रेम का अनुभव करने के लिए कहता है। कलीसिया एक शरीर है जिसका एक ईश्वर, एक विश्वास और एक बपतिस्मा है। संत पौलुस एफेसियों को याद दिलाता है कि वे मसीह के शरीर के सदस्य होने के कारण अपने इस महान बुलावे के अनुसार जीवन जियें। उनके आपसी संबंध प्रेम,निस्वार्थता, सौम्यता और क्षमाशीलता द्वारा निर्देशित किया जाना है। यह बात आज का अनुवाक्य में प्रतिध्वनित होता है, जो साफ-सुथरे हाथों और शुद्ध हृदय वाले लोगों की सराहना करता है, न कि बेकार चीज़ों की लालसा करनेवलों की।

आज का सुसमाचार में येसु समय के संकेतों की पहचान करने के बारे में शिक्षा देता है। लोग प्रकृति के संकेतों को परखना बहुत अच्छी तरह से जानते हैं लेकिन वे येसु के सुसमाचार प्रचार से जुड़े संकेतों को परखने में असफल रहे। नबियों के द्वारा घोषित मुक्तिदाता येसु है; यह समझने के लिए यह पर्याप्त था कि लोग येसु के जीवन और सेवा कार्य और उसे सम्बंधित बातों को देखें और समझें। सुसमाचार सुनकर जीवन सुधर का समय अब है; विलम्ब करने पर देर हो जाएगी। हमें अपने जीवन को सुधारने के लिए दिए गए समय का सदुपयोग करना चाहिए। प्रभु में अपना विश्वास अर्पित कर हम अनंत दंड से बच सकता है।

आपके संबंधों का क्या स्वाभाव है? क्या वे निस्वार्थ प्रेम द्वारा निर्देशित हैं जो सौम्यता और क्षमाशीलता में प्रकट होता है? क्या आप समय के संकेतों और उनके अर्थ को पहचान पा रहे हैं? ईश्वर के द्वारा प्रदत्त चिन्हों को पहचानो और उनकी ओर अपना जीवन फिराओ।


📚 REFLECTION

God loves us. He calls us to experience this love in the community of believers which is one Body with one Lord, one faith, and one baptism. St. Paul reminds the Ephesians to live a life worthy of their vocation as members of the Body of Christ. Their mutual relations are to be guided by charity, selflessness, gentleness and patience. This is echoed by the Responsorial Psalm, which commends those with clean hands and pure heart, desiring not worthless things.

In the gospel Jesus speaks about interpreting the signs of the times. The people knew very well to read the signs of nature but they failed to read the signs surrounding Jesus’ preaching. The signs around Jesus are enough for the discerning ones to understand that now is the time announced by the prophets, when people must be converted and acknowledge the Saviour. Tomorrow will be too late. We are on our way to God’s judgement; we must make use of the time given to us to reform our lives. We can be saved from judgement by believing in Jesus.

What characterizes your relationships? Are they guided by selfless love which expresses itself in gentleness and patience? Are we able to see the signs of the times and understand their meaning for our lives?

 -Br. Biniush Topno

(Duliajan Assam)

22 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

22 अक्टूबर 2020
वर्ष का उन्तीसवाँ सामान्य सप्ताह, गुरुवार

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📒 पहला पाठ : एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 3:14-21

14 (14-15) मैं उस पिता के सामने, जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर प्रत्येक परिवार का मूल आधार है, घुटने टेक कर यह प्रार्थना करता हूँ

16) कि वह अपने आत्मा द्वारा आप लोगों को अपनी अपार कृपानिधि से आभ्यन्तर शक्ति और सामर्थ्य प्रदान करें,

17) जिससे विश्वास द्वारा मसीह आपके हृदयों में निवास करें, प्रेम में आपकी जड़ें गहरी हों और नींव सुदृढ़ हो।

18) इस तरह आप लोग अन्य सभी सन्तों के साथ मसीह के प्रेम की लम्बाई, चैड़ाई, ऊँचाई और गहराई समझ सकेंगे।

19) आप लोगों को उनके प्रेम का ज्ञान प्राप्त होगा, यद्यपि वह ज्ञाने से परे है। इस प्रकार आप लोग, ईश्वर की पूर्णता तक पहुँच कर, स्वयं परिपूर्ण हो जायेंगे।

20) जिसका सामर्थ्य हम में क्रियाशील है और जो वे सब कार्य सम्पन्न कर सकता है, जो हमारी प्रार्थना और कल्पना से अत्यधिक परे है,

21) उसी को कलीसिया और ईसा मसीह द्वारा पीढ़ी दर-पीढ़ी युग-युगों तक महिमा! आमेन!

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 12:49-53

49) ’’मैं पृथ्वी पर आग ले कर आया हूँ और मेरी कितनी अभिलाषा है कि यह अभी धधक उठे!

50) मुझे एक बपतिस्मा लेना है और जब तक वह नहीं हो जाता, मैं कितना व्याकुल हूँ!

51) ’’क्या तुम लोग समझते हो कि मैं पृथ्वी पर शान्ति ले कर आया हूँ? मैं तुम से कहता हूँ, ऐसा नहीं है। मैं फूट डालने आया हूँ।

52) क्योंकि अब से यदि एक घर में पाँच व्यक्ति होंगे, तो उन में फूट होगी। तीन दो के विरुद्ध होंगे और दो तीन के विरुद्ध।

53) पिता अपने पुत्र के विरुद्ध और पुत्र अपने पिता के विरुद्व। माता अपनी पुत्री के विरुद्ध होगी और पुत्री अपनी माता के विरुद्ध। सास अपनी बहू के विरुद्ध होगी और बहू अपनी सास के विरुद्ध।’’

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है। अक्सर हम दूसरों के प्यार और देखरेख के माध्यम से ईश्वर के प्यार का अनुभव करते हैं। एफेसियों के लिए संत पौलुस की प्रार्थना ऐसे प्रेम की एक सुंदर अभिव्यक्ति है। वह प्रार्थना करता है कि पवित्र आत्मा की शक्ति के माध्यम से वे मजबूत हो जाएँ, ताकि मसीह विश्वास के माध्यम से उनके दिलों में रह सकें। वह कहता है कि वे प्यार में रोपे और विकसित किये गये हैं। इसका मतलब है कि ईश्वर ने उन्हें अपना बना लिया है और प्यार के साथ उनका पालन-पोषण करते हैं। हमारे प्रति ईश्वर के प्रेम कितना बड़ा है!

ईश्वर का यह महान प्रेम आज का अनुवाक्य में व्यक्त किया गया है: "प्रभु पृथ्वी को अपने प्रेम से भर देते हैं।"

आज का सुसमाचार का पाठ में हम येसु के दो विवादास्पत कथन पाते हैं। पहला इस प्रकार है जहां येसु कहता है, “मैं पृथ्वी पर आग लेकर आया हूँ, और मेरी कितनी अभिलाषा है कि यह अभी धधक उठे! मुझे एक बपतिस्मा लेना है और जब तक वह नहीं हो जाता, मैं कितना व्याकुल हूँ!" येसु अपने मिशन का वर्णन करने के लिए आग और पानी (बपतिस्मा) के प्रतीकों का उपयोग करता है। अग्नि परीक्षण और निर्णय का प्रतीक है। बपतिस्मा जो उसे प्राप्त करना है, वह उसके दुखभोग और मृत्यु का है। दूसरा विवादास्पत बयान है, "क्या तुम लोग समझते हो की मैं पृथ्वी पर शांति ले कर आया हूँ? मैं हूँ, ऐसा नहीं है। मैं फूट हूँ।" इस का अर्थ यह है कि येसु राष्ट्रों और व्यक्तियों के बीच विभाजन का एक स्रोत तब बनेगा जब येसु पर विश्वास नहीं करनेवाले लोग विश्वास करनेवालों के खिलाफ हो जाएंगे, यहां तक कि उनका उतपीठन करेंगे।

आइए हम हमेशा येसु के पक्ष में रहने का अनुग्रह की माँग करें।


📚 REFLECTION

God loves us. Often we experience that love through the love and care of others. St. Paul’s prayer for the Ephesians is a beautiful expression of such love. He prays that through the power of the Holy Spirit they may grow strong, so that Christ may live in their hearts through faith. He says that they are planted and built in love. It means that God has made them his own and continues to nurture them with his love. What a great love God has for us!

This great love of God is expressed in the Response: “the Lord fills the earth with his love.”

The gospel passage contains two of the intriguing statements of Jesus. The first one says, “I have come to bring fire to the earth, and how I wish it were blazing already! There is a baptism I must still receive, and how great is my distress till it is over!” Jesus uses the terms fire and water (baptism) to describe his mission. Fire is a symbol of testing and judgement. The baptism that he has to receive is that of his passion and death. The second upsetting statement is, “I am here not to bring peace but division!” Jesus is a source of division among nations and individuals in the sense that those who do not believe in Jesus will turn against those who believe and even turn into persecutors.

Let us ask for the grace to be always on the side of Jesus.

 -Br. Biniush Topno

(Duliajan Assam)

21 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

21 अक्टूबर 2020
वर्ष का उन्तीसवाँ सामान्य सप्ताह, बुधवार

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📒 पहला पाठ : एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 3:2-12

2) आप लोगों ने अवश्य सुना होगा कि ईश्वर ने आप लोगों की भलाई के लिए मुझे अपनी कृपा का सेवा-कार्य सौंपा है।

3) उसने मुझ पर वह रहस्य प्रकट किया है, जिसका मैं संक्षिप्त विवरण ऊपर दे चुका हूँ।

4) उसे पढ़ कर आप लोग जान सकते हैं कि मैं मसीह का रहस्य समझता हूँ।

5) वह रहस्य पिछली पीढि़यों में मनुष्य को नहीं बताया गया था और अब आत्मा के द्वारा उसके पवित्र प्रेरितों और नबियों का प्रकट किया गया है।

6) वह रहस्य यह है कि सुसमाचार के द्वारा यहूदियों के साथ गैर-यहूदी एक ही विरासत के अधिकारी हैं, एक ही शरीर के अंग हैं और ईसा मसीह-विषयक प्रतिज्ञा के सहभागी हैं।

7) ईश्वर ने अपने सामर्थ्य के अधिकार से मुझे यह कृपा प्रदान की कि मैं उस सुसमाचार का सेवक बनूँ।

8) मुझे, जो सतों में सब से छोटा हूँ, यह वरदान मिला है कि मैं गैर-यहूदियों को मसीह की अपार कृपानिधि का सुसमाचार सुनाऊँ

9) और मुक्ति-विधान का वह रहस्य पूर्ण रूप से प्रकट करूँ, जिसे समस्त विश्व के सृष्टिकर्ता ने अब तक गुप्त रखा था।

10) इस तरह, कलीसिया के माध्यम से स्वर्ग के दूत ईश्वर की बहुविध प्रज्ञा का ज्ञान प्राप्त करेंगे।

11) ईश्वर ने अनन्त काल से जो उद्देश्य अपने मन में रखा, उसने उसे हमारे प्रभु ईसा मसीह द्वारा पूरा किया।

12) हम मसीह में विश्वास करते हैं और इस कारण हम पूरे भरोसे के साथ निर्भय हो कर ईश्वर के पास जाते हैं।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 12:39-48

39) यह अच्छी तरह समझ लो-यदि घर के स्वामी को मालूम होता कि चोर किस घड़ी आयेगा, तो वह अपने घर में सेंध लगने नहीं देता।

40) तुम भी तैयार रहो, क्योंकि जिस घड़ी तुम उसके आने की नहीं सोचते, उसी घड़ी मानव पुत्र आयेगा।’’

41) पेत्रुस ने उन से कहा, ’’प्रभु! क्या आप यह दृष्टान्त हमारे लिए कहते हैं या सबों के लिए?’’

42) प्रभु ने कहा, ’’कौन ऐसा ईमानदार और बुद्धिमान् कारिन्दा है, जिसे उसका स्वामी अपने नौकर-चाकरों पर नियुक्त करेगा ताकि वह समय पर उन्हें रसद बाँटा करे?

43) धन्य हैं वह सेवक, जिसका स्वामी आने पर उसे ऐसा करता हुआ पायेगा!

44) मैं तुम से यह कहता हूँ, वह उसे अपनी सारी सम्पत्ति पर नियुक्त करेगा।

45) परन्तु यदि वह सेवक अपने मन में कहे, ’मेरा स्वामी आने में देर करता है’ और वह दासदासियों को पीटने, खाने-पीने और नशेबाजी करने लगे,

46) तो उस सेवक का स्वामी ऐसे दिन आयेगा, जब वह उसकी प्रतीक्षा नहीं कर रहा होगा और ऐसी घड़ी जिसे वह जान नहीं पायेगा। तब स्वामी उसे कोड़े लगवायेगा और विश्वासघातियों का दण्ड देगा।

47) ’’अपने स्वामी की इच्छा जान कर भी जिस सेवक ने कुछ तैयार नहीं किया और न उसकी इच्छा के अनुसार काम किया, वह बहुत मार खायेगा।

48) जिसने अनजाने ही मार खाने का काम किया, वह थोड़ी मार खायेगा। जिसे बहुत दिया गया है, उस से बहुत माँगा जायेगा और जिसे बहुत सौंपा गया है, उस से अधिक माँगा जायेगा।

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है। इसलिए उसने येसु मसीह के माध्यम से हमें अपना ज्ञान प्रदान किया है। दिव्य आशीर्वाद का अनुभव करने के लिए हम येसु मसीह में ईश्वर की अनंत योजना का हिस्सा हैं। इसलिए हम पूरे विश्वास और भरोसे के साथ ईश्वर के पास जाने के आत्मविश्वास रखते हैं।

यह हमें आज अनुवाक्य में भजनहार के साथ प्रार्थना करने के लिए प्रेरित करता है, "तुम आनंदित होकर मुक्ति के स्रोत में जल भरोगे"। सचमुच, ईश्वर मेरा उद्धारकर्ता है, मैं उन पर भरोसा रखता हूँ, मुझे कोई भय नहीं होगा।

ज़िम्मेदारी विश्वसनीयता के बारे में कल के सुसमाचार की चर्चा जारी रखते हुए यीशु कहते हैं, जब किसी व्यक्ति को बहुत कुछ दिया है, तो उस व्यक्ति से बहुत बड़ी उम्मीद की जाएगी। इसका मतलब है, ईश्वर का आशीर्वाद जितना बड़ा होगा, दूसरों के प्रति जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होगी। ईश्वर हमसे उदारता से प्यार करते हैं ताकि हम दूसरों के प्रति उदार हो सकें, स्वार्थी नहीं।

अपने जीवन के अनुग्रहों को गिनें और देखें कि ईश्वर आपसे कितना प्यार करते हैं। अपने आप से पूछें, "क्या मैं विश्वसनीय या अविश्वसनीय, मेहनती या आलसी, उदार या स्वार्थी हूं? आइए हम प्रार्थना करें कि हम अपने जीवन में आभारी और उदार बने रहें।


📚 REFLECTION

God loves us. Therefore he has made known his wisdom to us through Jesus Christ. And we are part of God’s plan in Jesus Christ to experience the divine blessings. Therefore we are bold enough to approach God in complete confidence, through our faith in him.

This is what prompts us to pray with the psalmist in the Response, “With joy you will draw water from the wells of salvation”. Truly, God is my salvation, I trust, I shall not fear.

Continuing with yesterday’s gospel about responsibility Jesus says, when a person has had a great deal given to him/her, a great deal will be expected of that person. That means, the greater the blessings of God, the greater the responsibility towards others. God loves us generously so that we can be generous towards others, not selfish.

Count your blessings and see how much God loves you. Ask yourself’ “Am I reliable or unreliable, hardworking or lazy, generous or selfish? Let us ask for the grace to be grateful and generous.

 -Br. Biniush Topno

(Duliajan) Assam India

20 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

20 अक्टूबर 2020
वर्ष का उन्तीसवाँ सामान्य सप्ताह, मंगलवार

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📒 पहला पाठ : एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 2:12-22

12) आप याद रखें कि पहले आप मसीह से अलग थे, इस्राएल के समुदाय के बाहर थे, विधान की प्रतिज्ञाओं से अपरिचित और इस संसार में आशा और ईश्वर से रहित थे।

13) आप लोग पहले दूर थे, किन्तु ईसा मसीह से संयुक्त हो कर आप अब मसीह के रक्त द्वारा निकट आ गये है;

14) क्योंकि वही हमारी शान्ति हैं। उन्होंने यहूदियों और गैर-यहूदियों को एक कर दिया है। दोनों में शत्रुता की जो दीवार थी, उसे उन्होंने गिरा दिया है।

15) और अपनी मृत्यु द्वारा विधि-निषेधों की संहिता को रद्द कर दिया। इस प्रकार उन्होंने यहूदियों तथा गैर-यहूदियों को अपने से मिला कर एक नयी मानवता की सृष्टि की और शान्ति की स्थापित की है।

16) उन्होंने क्रूस द्वारा दोनों का एक ही शरीर में ईश्वर के साथ मेल कराया और इस प्रकार शत्रुता को नष्ट कर दिया।

17) तब उन्होंने आ कर दोनों को शान्ति का सन्देश सुनाया - आप लोगों को, जो दूर थे और उन लोगों को, जो निकट थे;

18) क्योंकि उनके द्वारा हम दोनों एक ही आत्मा से प्रेरित हो कर पिता के पास पहुँच सकते हैं।

19) आप लोग अब परेदशी या प्रवासी नहीं रहे, बल्कि सन्तों के सहनागरिक तथा ईश्वर के घराने के सदस्य बन गये हैं।

20) आप लोगों का निर्माण भवन के रूप में हुआ है, जो प्रेरितों तथा नबियों की नींव पर खड़ा है और जिसका कोने का पत्थर स्वयं ईसा मसीह हैं।

21) उन्हीं के द्वारा समस्त भवन संघटित हो कर प्रभु के लिए पवित्र मन्दिर का रूप धारण कर रहा है।

22) उन्हीं के द्वारा आप लोग भी इस भवन में जोड़े जाते हैं, जिससे आप ईश्वर के लिए एक आध्यात्मिक निवास बनें।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 12:35-38

35) ’’तुम्हारी कमर कसी रहे और तुम्हारे दीपक जलते रहें।

36) तुम उन लोगों के सदृश बन जाओ, जो अपने स्वामी की राह देखते रहते हैं कि वह बारात से कब लौटेगा, ताकि जब स्वामी आ कर द्वार खटखटाये, तो वे तुरन्त ही उसके लिए द्वार खोल दें।

37) धन्य हैं वे सेवक, जिन्हें स्वामी आने पर जागता हुआ पायेगा! मैं तुम से यह कहता हूँः वह अपनी कमर कसेगा, उन्हें भोजन के लिए बैठायेगा और एक-एक को खाना परोसेगा।

38) और धन्य हैं वे सेवक, जिन्हें स्वामी रात के दूसरे या तीसरे पहर आने पर उसी प्रकार जागता हुआ पायेगा!

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है। उस प्रेम का महान संकेत यह है कि उसने हमें येसु मसीह के माध्यम से शांति प्रदान की है। और हमें परमेश्वर के घराने के सदस्य बनाये गये है। हम एक पवित्र मंदिर में बनाया जा रहा है, जहाँ परमेश्वर आत्मा में रहता है। ईश्वर हमसे इतना प्यार करता है कि वह वास्तव में हमारे भीतर बसता है। जैसा कि संत पौलुस ने कुरिन्थियों को लिखे अपने पत्र में लिखा है, "क्या आप यह नहीं जानते कि आप ईश्वर के मंदिर हैं और ईश्वर का आत्मा आप में निवास करता है?" (1 Cor 3:16)

आज के सुसमाचार में हमारे लिए परमेश्वर के प्रेम का एक और संकेत है। ईश्वर हम पर भरोसा करता है और हमें कई जिम्मेदारियां सौंपता है। वह हमसे विश्वास और सतर्कता की उम्मीद करता है। जैसा कि संत मदर तेरेसा ने कहा, "ईश्वर चाहता है कि हम विश्वसनीय हों, सफल नहीं"। प्रभु के द्वारा हमें सौंपी हुई जिम्मेदारियों को विश्वासपूर्वक करने में ही आध्यात्मिक सफलता है। धन्य हैं वे सेवक जिन्हें अपस्वामी तैयार और वफादार पाएंगे!

आज हमें अपने जीवन के महान मूल्य के मनन चिंतन करने के लिए कहा जाता है। क्या आपको एहसास है कि आप ईश्वर का मंदिर हैं जहां उनका आत्मा निवास करता है? अपने आप से पूछें - क्या आप अपने जीवन और उसकी जिम्मेदारियों को आशीर्वाद के रूप में या बोझ के रूप में लेते हैं?


📚 REFLECTION

God loves us. The great sign of that love is that he has brought us peace through Jesus Christ. And we have been made members of the household of God. We are being built into a holy temple where God lives, in the Spirit. God loves us so much that he really dwells within us. As St. Paul writes in his letter to the Corinthians, “Do you not know that you are God’s temple and that God’s Spirit dwells in you?” (1 Cor 3:16).

We find another sign of God’s love for us in today’s gospel. God trusts us and entrusts us with many responsibilities. He expects faithfulness and alertness from us. As Mother Teresa said, “God wants us to be faithful, not successful”. Spiritual success is in doing faithfully what the Lord has entrusted us to do. Blessed are those whom the Master will find ready and faithful!

Today we are called to reflect on the great value of our lives. Do you realize that you are the temple of God where his Spirit lives? Ask yourself - do you take your life and its responsibilities as a blessing or as a burden?


19 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

19 अक्टूबर 2020
वर्ष का उन्तीसवाँ सामान्य सप्ताह, सोमवार

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📒 पहला पाठ : एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 2:1-10

1) आप लोग अपने अपराधों और पापों के कारण मर गये थे;

2) क्योंकि आपका आचरण पहले इस संसार की रीति के अनुकूल, आकाश में विचरने वाले अपदूतों के नायक के अनुकूल था, उस आत्मा के अनुकूल था, जो अब तक ईश्वर के विरोधियों में क्रियाशील है।

3) हम सभी पहले उन विरोधियों में सम्मिलित थे, जब हम अपनी वासनाओं के वशीभूत हो कर अपने शरीर और मन की वासनाओं को तृप्त करते थे। हम दूसरों की तरह अपने स्वभाव के कारण ईश्वर के कोप के पात्र थे।

4) परन्तु ईश्वर की दया अपार है। हम अपने पापों के कारण मर गये थे, किन्तु उसने हमें इतना प्यार किया

5) कि उसने हमें मसीह के साथ जीवन प्रदान किया। उसकी कृपा ने आप लोगों का उद्धार किया।

6) उसने ईसा मसीह के द्वारा हम लोगों को पुनर्जीवित किया और स्वर्ग में बैठाया।

7) उसने ईसा मसीह में जो दयालुता दिखायी, उसके द्वारा उसने आगामी युगों के लिए अपने अनुग्रह की असीम समृद्धि को प्रदर्शित किया।

8) उसकी कृपा ने विश्वास द्वारा आप लोगों का उद्धार किया है। यह आपके किसी पुण्य का फल नहीं है। यह तो ईश्वर का वरदान है।

9) यह आपके किसी कर्म का पुरस्कार नहीं -कहीं ऐसा न हो कि कोई उस पर गर्व करे।

10) ईश्वर ने हमारी रचना की। उसने ईसा मसीह द्वारा हमारी सृष्टि की, जिससे हम पुण्य के कार्य करते रहें और उसी मार्ग पर चलते रहें, जिसे ईश्वर ने हमारे लिए तैयार किया है।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 12:13-21

13) भीड़ में से किसी ने ईसा से कहा, ’’गुरूवर! मेरे भाई से कहिए कि वह मेरे लिए पैतृक सम्पत्ति का बँटवारा कर दें’’।

14) उन्होंने उसे उत्तर दिया, ’’भाई! किसने मुझे तुम्हारा पंच या बँटवारा करने वाला नियुक्त किया?’’

15) तब ईसा ने लोगों से कहा, ’’सावधान रहो और हर प्रकार के लोभ से बचे रहो; क्योंकि किसी के पास कितनी ही सम्पत्ति क्यों न हो, उस सम्पत्ति से उसके जीवन की रक्षा नहीं होती’’।

16) फिर ईसा ने उन को यह दृष्टान्त सुनाया, ’’किसी धनवान् की ज़मीन में बहुत फ़सल हुई थी।

17) वह अपने मन में इस प्रकार विचार करता रहा, ’मैं क्या करूँ? मेरे यहाँ जगह नहीं रही, जहाँ अपनी फ़सल रख दूँ।

18) तब उसने कहा, ’मैं यह करूँगा। अपने भण्डार तोड़ कर उन से और बड़े भण्डार बनवाऊँगा, उन में अपनी सारी उपज और अपना माल इकट्ठा करूँगा

19) और अपनी आत्मा से कहूँगा-भाई! तुम्हारे पास बरसों के लिए बहुत-सा माल इकट्ठा है, इसलिए विश्राम करो, खाओ-पिओ और मौज उड़ाओ।’

20) परन्तु ईश्वर ने उस से कहा, ’मूर्ख! इसी रात तेरे प्राण तुझ से ले लिये जायेंगे और तूने जो इकट्ठा किया है, वह अब किसका ह़ोगा?’

21) यही दशा उसकी होती है जो अपने लिए तो धन एकत्र करता है, किन्तु ईश्वर की दृष्टि में धनी नहीं है।’’

📚 मनन-चिंतन

हम सभी अपने पापों और अपराधों के कारण मर चुके थे जब हम इस दुनिया के मार्ग पर चल रहे थे। जब हम कामुक जीवन जी रहे थे, पूरी तरह से अपनी शारीरिक इच्छाओं और अपने स्वयं के विचार से से शासित थे तो हम सभी मर चुके थे। लेकिन परमेश्वर ने हमें इतना प्यार किया कि उसने हमें मसीह के साथ जीवन में लाया। ईश्वर हमारे प्रति प्रेममय, दयालु और उदार है; वह हमें अपनी कृपा से बचाते हैं।

हमें आज का अनुवाक्य में इस सत्य की याद दिलाई जाती है - "उसने हमें बनाया, हम उसके हैं"। ऐसे प्यार के लिए हमें ईश्वर का शुक्रिया अदा करना चाहिए और उनके नाम को धन्य करना चाहिए।

आज का सुसमाचार का दृष्टान्त एक ऐसे व्यक्ति के बारे में है जिसने अपने धन पर भरोसा किया। उसने खुद को मूर्ख साबित किया क्योंकि उसके धन उसकी आत्मा को नहीं बचा सके। हमें एक बार फिर याद दिलाया जाता है कि हम ईश्वर की कृपा से मुक्ति पाते हैं जो कि ईश्वर की ओर से एक उपहार है। ईश्वर हमें अपने वरदान और समृद्धि देता है क्योंकि वह हमसे प्यार करता है। लेकिन जब हम धन पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं और ईश्वर को, जो सभी आशीर्वादों के दाता है, भूल जाते हैं, तो हम कयामत और मौत के रास्ते पर हैं।

आप किसमें भरोसा करते हैं और गर्व करते हैं - ईश्वर की कृपा या आपके भौतिक संपत्ति में? हमें संत पौलुस के साथ यह कहना चाहिए, "आपकी कृपा मेरे लिए पर्याप्त है"।


📚 REFLECTION

We were all dead because of our sins and crimes in which we used to live when we were following the way of this world. When we were living sensual lives, ruled entirely by our own physical desires and our own idea we were all dead. But God loved us so much that he brought us to life with Christ. God is loving, merciful and generous towards us. We are saved by grace.

We are reminded of this truth in today’s Response – “He made us, we belong to him”. For such love we must thank God and bless his name.

The gospel story is about a man who trusted in his riches to save him. He proved himself to be a fool because his riches could not save his soul. We are once again reminded that we are saved by grace which is a gift from God. God gives us his gifts and prosperity because he loves us. But when we focus our attention on the riches and forget God - the Giver of all blessings - then we are on the way to doom and death.

In what do you rely and glory in - in the grace of God or in your material possessions? We must be able to say with St. Paul, “Your grace is enough for me”.

 -Br. Biniush Topno

(Duliajan)-Assam

18 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

18 अक्टूबर 2020
वर्ष का उन्तीसवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार

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📒 पहला पाठ :इसायाह का ग्रन्थ 45:1, 4-6

1) प्रभु ने अपने अभिषिक्त सीरुस का दाहिना हाथ सँभाला है। उसने राष्ट्रों को सीरुस के अधीन कर दिया और राजाओं के शस्त्र ले लिये। प्रभु ने उसके लिए फाटकों को तोड़ दिया। अब उसके सामने कोई भी द्वार बन्द नहीं रहा। प्रभु उसी सीरुस से यह कहता है-

4) मैंने अपने सेवक याकूब तथा अपने कृपापात्र इस्राएल के कारण तुम को नाम ले कर बुलाया और महान् बना दिया है, यद्यपि तुम मुझे नहीं जानते।

5) मैं ही प्रभु हूँ, कोई दूसरा नहीं है; मेरे सिवा कोई अन्य ईश्वर नहीं। यद्यपि तुम मुझे नहीं जानते, तो भी मैंने तुम्हें शस्त्र प्रदान किये,

6) जिससे पूर्व से पश्चिम तक सभी लोग यह जान जायें कि मेरे सिवा कोई दूसरा नहीं। मैं ही प्रभु हूँ, कोई दूसरा नहीं।

📕 दूसरा पाठ: थेसलनीकियों के नाम सन्त पौलुस का पहला पत्र 1:1-5b

1) पिता-परमेश्वर और प्रभु ईसा मसीह पर आधारित थेसलनीकियों की कलीसिया के नाम पौलुस, सिल्वानुस और तिमथी का पत्र। आप लोगों को अनुग्रह तथा शान्ति!

2 (2-3) जब-जब हम आप लोगों को अपनी प्रार्थनाओं में याद करते हैं, तो हम हमेशा आप सब के कारण ईश्वर को धन्यवाद देते है। आपका सक्रिय विश्वास, प्रेम से प्रेरित आपका परिश्रम तथा हमारे प्रभु ईसा मसीह पर आपका अटल भरोसा- यह सब हम अपने ईश्वर और पिता के सामने निरन्तर स्मरण करते हैं।

4) भाइयो! ईश्वर आप को प्यार करता है। हम जानते हैं कि ईश्वर ने आप को चुना है,

5) क्योंकि हमने निरे शब्दों द्वारा नहीं, बल्कि सामर्थ्य, पवित्र आत्मा तथा दृढ़ विश्वास के साथ आप लोगों के बीच सुसमाचार का प्रचार किया। आप लोग जानते हैं कि आपके कल्याण के लिए हमारा आचरण आपके यहाँ कैसा था।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 22:15-21

15) उस समय फरीसियों ने जा कर आपस में परामर्श किया कि हम किस प्रकार ईसा को उनकी अपनी बात के फन्दे में फँसायें।

16) इन्होंने ईसा के पास हेरोदियों के साथ अपने शिष्यों को यह प्रश्न पूछने भेजा, ’’गुरुवर! हम यह जानते हैं कि आप सत्य बोलते हैं और सच्चाई से ईश्वर के मार्ग कि शिक्षा देते हैं। आप को किसी की परवाह नहीं। आप मुँह-देखी बात नहीं करते।

17) इसलिए हमें बताइए, आपका क्या विचार है- कैसर को कर देना उचित है या नहीं’’

18) उनकी धूर्त्तता भाँप कर ईसा ने कहा, ’’ढ़ोगियों! मेरी परीक्षा क्यों लेते हो?

19) कर का सिक्का मुझे दिखलाओ।’’ जब उन्होंने एक दीनार प्रस्तुत किया,

20) तो ईसा ने उन से कहा, ’’यह किसका चेहरा और किसका लेख है?’’

21) उन्होंने उत्तर दिया, ’’कैसर का’’। इस पर ईसा ने उन से कहा, ’’तो, जो कैसर का है, उसे कैसर को दो और जो ईश्वर का है, उसे ईश्वर को’’।

📚 मनन-चिंतन

"मैं प्रस्तुत हूँ, मुझ को भेज!" यह है संत पापा फ्रांसिस द्वारा इस वर्ष के मिशन रविवार के लिए चुना गया विषय। यह पिछले वर्ष अक्टूबर के विशेष मिशनरी महीने के कार्यक्रम को जारी रखता है, जिसका विषय था, "अभिषिक्त और प्रेषित: कलीसिया दुनिया में मिशन पर"।

मिशन इतवार के दौरान हमें पिता ईश्वर की ओर से येसु के मिशन की याद दिलाई जाती है, जिसमें कलीसिया और हर एक विश्वासी का मिशन का स्रोत है। अपने पुनरुत्थान के बाद येसु ने उनके शिष्यों से कहा, " जिस प्रकार पिता ने मुझे भेजा, उसी प्रकार मैं तुम्हें भेजता हूँ" (Jn 20:21)। अपने स्वर्गारोहण के पहले येसु उन्हें आज्ञा दी, "संसार के कोने-कोने में जा कर साडी सृष्टि को सुसमाचार सुनाओ" (Mk 16:15)।

येसु स्वर्गीय पिता के मिशनरी हैं: हमारे प्रति उनके प्यार के कारण ईश्वर ने अपने पुत्र येसु को हमारे मुक्तिदाता के रूप में भेजा (cf. Jn 3:16)। येसु का जीवन और सेवाकार्य पिता की इच्छा के प्रति उसकी पूर्ण आज्ञाकारिता को प्रकट करती है (cf. Jn 4:34; 6:38; 8: 12-30; Heb 10: 5-10)। क्रूसित और पुनर्जीवित येसु हमें उसके प्रेम के मिशन में शामिल करता है। अपना आत्मा की शक्ति से कलीसिया उनकी संतानों को अपना मिशन में शामिल करता है।

मिशन ईश्वर की पुकार पर हमारा स्वतंत्र और सचेत प्रत्युत्तर है। ईश्वर पूछता है, "मैं किसे भेजूं?"। हम इस आह्वान को तभी स्वीकार करते हैं जब हम विश्वासियों का समूह कलीसिया में उपस्थित येसु के साथ प्रेम का व्यक्तिगत संबंध रखते हैं। सुसमाचार कार्य संबंधों से शुरू होता है; एक दूसरे के साथ संबंध, और मसीह के साथ संबंध।

हम अपने आप से पूछें:

क्या हम अपने रोजमर्रा की जिंदगी की घटनाओं में मिशन की पुकार को सुनने के लिए पवित्र आत्मा की उपस्थिति का स्वागत करने के लिए तैयार हैं, चाहे हम विवाहित जीवन जीते हो, या समर्पित जीवन जीते हो?

क्या हम किसी भी समय या जगह पर भेजे जाने के लिए तैयार हैं, ताकि हम ईश्वर के प्रेम और दयालुता के गवाह बनें, येसु मसीह के सुसमाचार की घोषणा करें, और पवित्र आत्मा की शक्ति में कलीसिया का निर्माण करें?

क्या हम माता मरियम की तरह पूर्ण रूप से ईश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए तैयार हैं (cf. Lk 1:38)? यह आंतरिक मनोभाव आवश्यक है अगर हम ईश्वर से कहें: "मैं प्रस्तुत हूँ, मुझ को भेज।"

इस वर्ष का मिशन रविवार और मिशनरी यात्रा कोविद -19 महामारी द्वारा उत्पन्न कष्टों और चुनौतियों से प्रभावित है। ईश्वर का निमंत्रण, "मैं किसे भेजूं?", वर्तमान विश्व संकट में कलीसिया और पुरो मानव जाती चुनौती देता है। पूरी दुनिया इस महामारी से प्रभावित है। सुसमाचार में शिष्यों की तरह हम एक अप्रत्याशित, अशांत तूफान से बिना कोई पूर्व तैयारी से पकड़े गए हैं।

महामारी के इस समय ईश्वर हमसे क्या कह रहा है यह समझना कलीसिया के मिशन के लिए एक चुनौती है। बीमारी, पीड़ा, भय और अलगाव हमें चुनौती देते हैं। अकेले मरने वालों की अवस्था, तिरस्कृत लोग, अपनी नौकरी और आय खोये हुए लोग, बेघर और जिनके पास भोजन की कमी है, वे सब हमारे लिए चुनौती हैं। सामाजिक दूरी रखने और घर पर रहने के लिए मजबूर होना हमें इस बात को याद दिलाती है कि हमें सामाजिक रिश्तों के साथ-साथ ईश्वर के साथ अपने सामूहिक संबंधों की कितनी जरूरत है। अविश्वास और उदासीनता को बढ़ावा देने के बजाय लॉक डाउन की इस स्थिति को हमें दूसरों से निकट सम्बन्ध बनाये रखने के लिए अधिक चौकस बनाना चाहिए। और प्रार्थना, जिसमें ईश्वर हमारे दिलों को छूता है और प्रभावित करता है, हमें अपने भाई-बहनों की ज़रूरतों के लिए संवेदनशील बनाना चाहिए, साथ ही साथ सारी सृष्टि की देखभाल करने की हमारी ज़िम्मेदार भी महसूस कराना चाहिए। पवित्र यूखरिस्त मनाने के लिए सामूहिक रूप में इकट्ठा होने की असंभवता ने हमें कई ईसाई समुदायों के अनुभव को साझा करने के लिए प्रेरित किया है जो हर रविवार को पवित्र यूखरिस्त नहीं मना सकते हैं। इन सब में, ईश्वर का प्रश्न: "मैं किसे भेजूँ?" हमें एक बार और संबोधित किया जाता है और एक उदार और ठोस प्रत्युत्तर का इंतजार करता है: "मैं प्रस्तुत हूँ, मुझ को भेज!" (इसायस 6: 8)। ईश्वर उन लोगों की तलाश में है जो दुनिया में और राष्ट्रों के बीच उसके प्रेम और मुक्ति के सन्देश के गवाह बन सकें।

संत पिता फ्रांसिस इस महामारी के दौरान मिशन के तीन विशिष्ट रूपों का प्रस्ताव करता है: वे हैं, शेयरिंग, सेवा और मध्यस्थ प्रार्थना। अपने संसाधनों, प्रतिभाओं और अनुभवों को साझा करना मिशन का एक तरीका है। जरूरतमंद लोगों की सेवा करना, विशेष रूप से महामारी के कारण उत्पन्न गरीबी के नए रूपों से पीड़ित लोगों की सेवा करना सुसमाचार की एक सामयिक और प्रासंगिक गवाही होगी। दूसरों की जरूरतों के लिए प्रार्थना करना कलीसिया के मिशन में भाग लेने का एक निश्चित तरीका है।

प्रार्थना कीजिये की प्रभु का मिशन का आह्वान सुनने और यह प्रत्युत्तर देने के लिए आपको कृपा मिले:"मैं प्रस्तुत हूँ, मुझ को भेज!"



📚 REFLECTION

The theme chosen by Pope Francis for his year’s Mission Sunday is, “Here am I, send me (Is 6:8).” This is in continuation of the Extraordinary Missionary Month of last October which had the theme, “Baptized and Sent: the Church of Christ on Mission in the World”.

During the mission Sunday celebration we are reminded of the mission of Jesus from the Father, from which springs the mission of the Church and that of every baptized. After the resurrection Jesus told his disciples, “As the Father sent me, so am I sending you” (Jn 20:21). He commanded them, “Go out to the whole world, and proclaim the gospel to the whole creation” (Mk 16:15).

Jesus is the Father’s Missionary: Out of his love for us, God the Father sent his Son Jesus (cf. Jn 3:16). The life and ministry of Jesus reveal his total obedience to the Father’s will (cf. Jn 4:34; 6:38; 8:12-30; Heb 10:5-10). Jesus, crucified and risen for us, draws us in turn into his mission of love. With his Spirit Jesus enlivens the Church, he makes us his disciples and sends us on a mission to the world and to its peoples.

Mission is a free and conscious response to God’s call, who asks, “Whom shall I send?” We discern this call only when we have a personal relationship of love with Jesus present in his Church. Let us ask ourselves:

Are we prepared to welcome the presence of the Holy Spirit in our lives, to listen to the call to mission, whether in our life as married couples or as consecrated persons or those called to the ordained ministry, and in all the everyday events of life?

Are we willing to be sent forth at any time or place to witness to our faith in God the merciful Father, to proclaim the Gospel of salvation in Jesus Christ, to share the divine life of the Holy Spirit by building up the Church?

Are we, like Mary, the Mother of Jesus, ready to be completely at the service of God’s will (cf. Lk 1:38)? This interior openness is essential if we are to say to God: “Here am I, Lord, send me” (cf. Is 6:8).

The Mission Sunday and missionary journey of the Church this year is marked by the suffering and challenges created by the Covid-19 pandemic. The invitation from God, “whom shall I send?,” challenges both the Church and humanity as a whole in the current world crisis. The whole world is affected by the pandemic. “Like the disciples in the Gospel we were caught unprepared by an unexpected, turbulent storm.”

Understanding what God is saying to us at this time of pandemic represents a challenge for the Church’s mission. Illness, suffering, fear and isolation challenge us. The poverty of those who die alone, the abandoned, those who have lost their jobs and income, the homeless and those who lack food challenge us. Being forced to observe social distancing and to stay at home invites us to rediscover that we need social relationships as well as our communal relationship with God. Instead of increasing mistrust and indifference, this situation should make us even more attentive to our way of relating to others. And prayer, in which God touches and moves our hearts, should make us ever more open to the need of our brothers and sisters, as well as our responsibility to care for all creation. The impossibility of gathering as a Church to celebrate the Eucharist has led us to share the experience of the many Christian communities that cannot celebrate Mass every Sunday. In all of these, God’s question: “Whom shall I send?” is addressed once more to us and awaits a generous and convincing response: “Here am I, send me!” (Is 6:8). God continues to look for those whom he can send forth into the world and to the nations to bear witness to his love, his deliverance from sin and death, his liberation from evil (cf. Mt 9:35-38; Lk 10:1-12).

The Holy Father proposes three specific forms of mission during this pandemic: sharing, service and intercessory prayer. Sharing your resources, talents and experiences is a way of mission. Serving those in need, especially those in new forms of poverty caused by the pandemic is a powerful way of bearing witness to the gospel. Praying for the needs of others is a sure way of participating in the mission of the Church.

May you have the grace to respond to the Lord’s invitation, saying “Here I am, send me!”


आज के सुसमाचार में प्रभु कहते हैं, “जो कैसर का है, उसे कैसर को दो और जो ईश्वर का है, उसे ईश्वर को” (मत्ती 22:21। यहाँ पर एक प्रकार से ईश्वर और राजा या कैसर की तुलना की गयी है। हमें इस बात पर मनन-चिंतन करना चाहिए कि ईश्वर का क्या है और कैसर का क्या है। 1 कुरिन्थियों 4:7 में संत पौलुस कहते हैं, “आपके पास क्या है, जो आपको न दिया गया है? और यदि आप को सब कुछ दान में मिला है, तो इस पर गर्व क्यों करते हैं, मानो यह आप को न दिया गया हो?” अब सवाल उठता है कि हमारे पास जो कुछ है, वह सब किसका दिया हुआ है। इब्रानियों 2:10 हमें बताता है कि ईश्वर के कारण और ईश्वर के द्वारा ही सब कुछ होता है। स्तोत्र 24:1 कहता है – “पृथ्वी और जो कुछ उस में है, संसार और उसके निवासी-सब प्रभु का है”। विधि-विवरण 10:14 में वचन कहता है – “आकाश, सर्वोच्च आकाश, पृथ्वी और जो कुछ उस में है - यह सब तुम्हारे प्रभु ईश्वर का है।”

अब आती है, राजाओं की बात। स्तोत्र 47:8-10 में हम पढ़ते हैं - “ईश्वर समस्त पृथ्वी का राजा है। उसके आदर में शिक्षा-गीत सुनाओ। ईश्वर सभी राष्ट्रों पर राज्य करता है। वह अपने सिंहासन पर विराजमान है। अन्य राष्ट्रों के शासक इब्राहीम के ईश्वर की प्रजा से मेल करते हैं। पृथ्वी के शासक ईश्वर के अधीन है। ईश्वर सबों पर राज्य करता है।” ईश्वर राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु हैं “जो अमरता का एकमात्र स्रोत है, जो अगम्य ज्योति में निवास करता है, जिसे न तो किसी मनुष्य ने कभी देखा है और न कोई देख सकता है। उसे सम्मान तथा अनन्त काल तक बना रहने वाला सामर्थ्य!” (1 तिमथी 6:15-16, देखिए प्रकाशना 17:14)

इसके साथ-साथ पवित्र वचन हमें यह भी समझाता है कि अधिकारियों की व्यवस्था ईश्वर द्वारा की गयी है। प्रभु येसु पिलातुस से कहते हैं, “यदि आप को ऊपर से अधिकार न दिया गया होता तो आपका मुझ पर कोई अधिकार नहीं होता”। नबी दानिएल राजा नबूकदनेज़र को संबोधित करते हुए कहते हैं, “राजा! आप राजाओं के राजा हैं। स्वर्ग के ईश्वर ने आप को राजत्व, अधिकार, सामर्थ्य और सम्मान प्रदान किया। उसने मनुष्यों, मैदान के पशुओं और आकाश के पक्षियों को- वे चाहें कहीं भी निवास करें- आपके हाथों सौंपा और आप को सब का अधिपति बना दिया। संत पौलुस कहते हैं,“प्रत्येक व्यक्ति अधिकारियों के अधीन रहे, क्येांकि ऐसा कोई अधिकार नहीं, जो ईश्वर का दिया हुआ न हो। वर्तमान अधिकारियों की व्यवस्था ईश्वर द्वारा की गयी है।“ (रोमियों 13:1) वे यह भी समझाते हैं, कि “न केवल दण्ड से बचने के लिए, बल्कि अन्तःकरण के कारण भी अधिकारियों के अधीन रहना चाहिए। आप इसीलिए राजकर चुकाते हैं। अधिकारीगण ईश्वर के सेवक हैं और वे अपने कर्तव्य में लगे रहते हैं।“ (रोमियों 13:1-6)

इस दुनिया में रहते समय हरेक व्यक्ति की अधिकारों तथा जिम्मेदारियों को निभाने हेतु कुछ व्यवस्था की ज़रूरत है। यह शांतिमय वातावरण तथा प्रगति के लिए भी जरूरी है। शासन की व्यवस्था भी इसी मतलब से बनायी गयी है। इसलिए संत पौलुस हमसे अधिकारियों तथा शासकों के लिए प्रार्थना करने को कहते हैं। “मैं सब से पहले यह अनुरोध करता हूँ कि सभी मनुष्यों के लिए, विशेष रूप से राजाओं और अधिकारियों के लिए, अनुनय-विनय, प्रार्थना निवेदन तथा धन्यवाद अर्पित किया जाये, जिससे हम भक्ति तथा मर्यादा के साथ निर्विघ्न तथा शान्त जीवन बिता सकें। यह उचित भी है और हमारे मुक्तिदाता ईश्वर को प्रिय भी” (1 तिमथी 2:1-3)।

इस प्रकार ख्रीस्तीय शिक्षा के अनुसार विश्वासियों को राजाओं के राजा और प्रभुओं के प्रभु ईश्वर को प्रथम स्थान देने के साथ-साथ राष्ट्र-निर्माण के लिए अपना सहयोग देना चाहिए। सभी विश्वासी ईश्वर के राज्य की स्थापना करने के साथ-साथ समाज की प्रगति तथा कल्याण के लिए भी प्रयत्न करते रहें। उनका कर्तव्य है कि वे सभी देशवासियों के साथ मिल कर मानवता तथा स्वतंत्रता के हित में कार्य करें।

✍️Br. Biniush Topno


17 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

17 अक्टूबर 2020
वर्ष का अट्ठाइसवाँ सामान्य सप्ताह, शनिवार

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📒 पहला पाठ : एफ़ेसियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 1:15-23

15) मैंने प्रभु ईसा में आप लोगों के विश्वास और सभी सन्तों के प्रति आपके भ्रातृप्रेम के विषय में सुना है। मैं आप लोगों के कारण ईश्वर को निरन्तर धन्यवाद देता

16) और अपनी प्रार्थनाओं में आप लोगों का स्मरण करता रहता हूँ।

17) महिमामय पिता, हमारे प्रभु ईसा मसीह का ईश्वर, आप लोगों को प्रज्ञा तथा आध्यात्मिक दृष्टि प्रदान करे, जिससे आप उसे सचमुच जान जायें।

18) वह आप लोगों के मन की आँखों को ज्योति प्रदान करे, जिससे आप यह देख सकें कि उसके द्वारा बुलाये जाने के कारण आप लोगों की आशा कितनी महान् है और सन्तों के साथ आप लोगों को जो विरासत मिली है, वह कितनी वैभवपूर्ण तथा महिमामय है,

19) और हम विश्वासियों के कल्याण के लिए सक्रिय रहने वाले ईश्वर का वही सामर्थ्य कितना अपार है।

20) ईश्वर ने मसीह वही सामर्थ्य प्रदर्शित किया, जब उसने मृतकों में से उन्हें पुनर्जीवित किया और स्वर्ग में अपने दाहिने बैठाया।

21) स्वर्ग में कितने ही प्राणी क्यों न हों और उनका नाम कितना ही महान् क्यों न हो, उन सब के ऊपर ईश्वर ने इस युग के लिए और आने वाले युग के लिए मसीह को स्थान दिया।

22) उसने सब कुछ मसीह के पैरों तले डाल दिया और उन को सब कुछ पर अधिकर दे कर कलीसिया का शीर्ष नियुक्त किया।

23) कलीसिया मसीह का शरीर और उनकी परिपूर्णता है। मसीह सब कुछ, सब तरह से, पूर्णता तक पहुँचाते हैं।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 12:8-12

8) ’’मैं तुम से कहता हूँ, जो मुझे मनुष्यों के सामने स्वीकार करेगा, उसे मानव पुत्र भी ईश्वर के दूतों के सामने स्वीकार करेगा।

9) परन्तु जो मुझे मनुष्यों के सामने अस्वीकार करेगा, वह ईश्वर के दूतों के सामने अस्वीकार किया जायेगा।

10) ’’जो मानव पुत्र के विरुद्ध कुछ कहेगा, उसे क्षमा मिल जायेगी, परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा करने वाले को क्षमा नहीं मिलेगी।

11) ’’जब वे तुम्हें सभागृहों, न्यायाधीशों और शासकों के सामने खींच ले जायेंगे, तो यह चिन्ता न करो कि हम कैसे बोलेंगे और अपनी ओर से क्या कहेंगे;

12) क्योंकि उस घड़ी पवित्र आत्मा तुम्हें सिखायेगा कि तुम्हें क्या-क्या कहना चाहिए।’’

📚 मनन-चिंतन

एफेसियों के लिए संत पौलुस की प्रार्थना जो हम आज का पहला पाठ में सुनते हैं उनके लिए उनका प्रेम का एक सुंदर अभिव्यक्ति है और साथ ही उनके लिए ईश्वर का आशीर्वाद की कामना भी है। वह ज्ञान और आध्यात्मिक अंतरदृष्टी के लिए प्रार्थना करता है ताकि वे ईश्वर को पूरी तरह से जान सकें। वह मन की आँखों की ज्योति के लिए प्रार्थना करता है ताकि वे येसु मसीह के माध्यम से ईश्वर में प्रतिज्ञात आशा का आशीर्वाद देख सकें। येसु न केवल सारी सृष्टि का प्रभु और शासक है, बल्कि वह कलीसिया का प्रमुख भी है, जो उसका शरीर है।

येसु कलीसिया की, जो अपने शरीर है, परवाह करता है। कल के सुसमाचार की शिक्षा के समान प्रभु येसु आज का सुसमाचार में भी कहता हैं कि डरने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि ईश्वर हमें हमारी सहायता करने के लिए पवित्र आत्मा देगा। हमें निडर होकर येसु में अपना विश्वास व्यक्त करन है। निश्चित रूप से प्रभु भक्तों का विरोध, और यहां तक कि उत्पीड़न भी होगा। लेकिन पवित्र आत्मा उन लोगों की सहायता करेगा जो ईश्वर में भरोसा करते हैं। ऐसे अवसर में चिंतित होना स्वाभाविक है। परंतु येसु हमें ढाड़स बांधाते हुए कहता है, “यह चिंता न करो कि हम कैसे बोलेंगे और अपनी ओर से क्या कहेंगे; क्योंकि उन घड़ी पवित्र आत्मा तुम्हें सिखाएगा कि तुम्हें क्या-क्या कहना चाहिए।”

सोचिये, हमारे जीवन में पवित्र आत्मा की दिव्य सहायता का होना कितना सौभाग्य की बात है! क्या आप अपने विश्वास को व्यक्त करने के लिए सही शब्द खोजने के लिए संघर्ष करते हैं? अपने आप को पवित्र आत्मा को आत्मसमर्पण कीजिये और वह निश्चित रूप से आपका मार्गदर्शन और आपकी सहायता करेगा।


📚 REFLECTION

St. Paul’s prayer for the Ephesians is a beautiful expression of his concern for them as well as God’s promised blessings for them. He prays for a spirit of wisdom and perception of God’s revelation so that they may know Him fully. He prays for enlightenment of the mind so that they can see blessings of hope in God through Jesus Christ. Jesus is not only the Lord and ruler of the whole of creation but he is also the head of the Church, which is his body.

Jesus cares for his body, the Church. In continuation of yesterday’s gospel passage, Jesus says, that there is no need to be afraid because God will give us the Holy Spirit to assist us. We are called to fearlessly declare our faith in Jesus. There will certainly be resistance, opposition and even persecution. But the Holy Spirit will assist those who trust in God. “Do not worry about how to defend yourselves or what to say, because when the time comes, the Holy Spirit will teach you what you must say.”

What a privilege it is to have the divine assistance of the Holy Spirit in our lives! Do you struggle to find the right words to express your faith? Surrender yourself to the Holy Spirit and he will surely guide you and assist you.

 -Br. Biniush Topno

(Duliajan) Assam