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Duliajan, Assam, India
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08 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

08 अक्टूबर 2020
वर्ष का सत्ताईसवाँ सामान्य सप्ताह, गुरुवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

📒 पहला पाठ : गलातियों के नाम सन्त पौलुस का पत्र 3:1-5

1) नासमझ गलातियों! किसने आप लोगों पर जादू डाला है? आप लोगों को तो सुस्पष्ट रूप से यह दिखलाया गया कि ईसा मसीह क्रूस पर आरोपित किये गये थे।

2) मैं आप लोगों से इतना ही जानना चाहता हूँ - आप को संहिता के कर्मकाण्ड के कारण आत्मा का वरदान मिला या सुसमाचार के सन्देश पर विश्वास करने के कारण?

3) क्या आप लोग इतने नासमझ हैं कि आपने जो कार्य आत्मा द्वारा प्रारम्भ किया, उसे अब शरीर द्वारा पूर्ण करना चाहते हैं?

4) क्या आप लोगों को व्यर्थ ही इतने वरदान प्राप्त हुए? मुझे ऐसा विश्वास नहीं है।

5) जब ईश्वर आप लोगों को आत्मा का वरदान देता है और आपके बीच चमत्कार दिखाता है, तो क्या वह संहिता के कर्मकाण्ड के कारण ऐसा करता है या इसलिए कि आप सुसमाचार के सन्देश पर विश्वास करते है?

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 11:5-13

5) फिर ईसा ने उन से कहा, ’’मान लो कि तुम में कोई आधी रात को अपने किसी मित्र के पास जा कर कहे, ’दोस्त, मुझे तीन रोटियाँ उधार दो,

6) क्योंकि मेरा एक मित्र सफ़र में मेरे यहाँ पहुँचा है और उसे खिलाने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है’

7) और वह भीतर से उत्तर दे, ’मुझे तंग न करो। अब तो द्वार बन्द हो चुका है। मेरे बाल-बच्चे और मैं, हम सब बिस्तर पर हैं। मैं उठ कर तुम को नहीं दे सकता।’

8) मैं तुम से कहता हूँ-वह मित्रता के नाते भले ही उठ कर उसे कुछ न दे, किन्तु उसके आग्रह के कारण वह उठेगा और उसकी आवश्यकता पूरी कर देगा।

9) ’’मैं तुम से कहता हूँ-माँगो और तुम्हें दिया जायेगा; ढूँढ़ो और तुम्हें मिल जायेगा; खटखटाओ और तुम्हारे लिए खोला जायेगा।

10) क्योंकि जो माँगता है, उसे दिया जाता है; जो ढूँढ़ता है, उसे मिल जाता है और जो खटखटाता है, उसके लिए खोला जाता है।

11) ’’यदि तुम्हारा पुत्र तुम से रोटी माँगे, तो तुम में ऐसा कौन है, जो उसे पत्थर देगा? अथवा मछली माँगे, तो मछली के बदले उसे साँप देगा?

12) अथवा अण्डा माँगे, तो उसे बिच्छू देगा?

13) बुरे होने पर भी यदि तुम लोग अपने बच्चों को सहज ही अच्छी चीज़ें देते हो, तो तुम्हारा स्वर्गिक पिता माँगने वालों को पवित्र आत्मा क्यों नहीं देगा?’’

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है। कलीसिया को प्रभु येसु का सबसे बड़ा उपहार पवित्र आत्मा है। आज का पहला पाठ (गलाती 3: 1-5) में संत पौलुस हमें सिखाता है कि सुसमाचार पर विश्वास करने से हमें पवित्र आत्मा प्राप्त होते हैं। और आज के सुसमाचार में येसु कहते हैं कि स्वर्गीय पिता उन लोगों को पवित्र आत्मा देंगे जो उनसे मांगते हैं।

येसु कहते हैं, “मांगो, और तुम्हें दिया जाएगा; ढूंढो और तुम पाओगे; खटखटाओ, और तुम्हारे लिए खोला जाएगा।” ईश्वर हमसे प्यार करता है। इसलिए वह चाहता है कि हमारी ज़रूरतें पूरी हों। वह चाहता है कि हमें अपनी खोज के उत्तर मिलें। वह चाहते हैं कि हमारे लिए नए अवसर खुल जायें। ईश्वर उन लोगों की प्रार्थनाओं का जवाब देता है जो उसे विश्वास के साथ मांगते हैं। प्रभु येसु कहता है कि माँगने वालों को पवित्र आत्मा देने के लिए हमारे पिता ईश्वर तैयार है। इसलिए हम विश्वास के साथ पिता ईश्वर से प्रार्थना करें की वह हमें पवित्र आत्मा प्रदान करें।

क्या मैं मेरी ज़रूरतों में प्रार्थना में ईश्वर के पास जाता हूँ? क्या मुझे विश्वास है कि ईश्वर मेरी प्रार्थनाओं का जवाब देंगे? क्या मैं साधारण, सांसारिक चीजों से संतुष्ट हूं या मैं वास्तव में पवित्र आत्मा की इच्छा रखता हूं? मांगो, ढूंढो, खटखटाओ - ईश्वर आपकी प्रार्थनाओं का जवाब देंगे। आमीन।



📚 REFLECTION

God loves us. The greatest gift of Jesus to the Church is the Holy Spirit. The first reading from Galatians chapter 3: 1-5 says that we receive the Holy Spirit by believing in the gospel. And Jesus says in today’s gospel that the heavenly Father will give the Holy Spirit to those who ask him.

Jesus says, “Ask, and it will be given to you; search, and you will find; knock, and the door will be opened to you”. God loves us. Therefore he wants us to have our needs fulfilled. He wants that we find the answers to our search. He wants that new opportunities be opened for us. God answers the prayers of those who ask him. And the greatest gift that Jesus wants us to have is the Holy Spirit, whom the Father is ready to give to those who ask him.

In my needs do I turn to God in prayer? Do I believe that God will answer my prayers? Am I satisfied with the ordinary, mundane things or do I really desire the Holy Spirit? Ask, seek, knock – God will answer your prayers.


                              ✍️- Biniush Topno

07 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

07 अक्टूबर 2020
वर्ष का सत्ताईसवाँ सामान्य सप्ताह, बुधवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥धन्य कुँवारी मरियम माला की महारानी : स्मृति

📒 पहला पाठ : प्रेरित-चरित 1:12-14

12) प्रेरित जैतून नामक पहाड़ से येरुसालेम लौटे। यह पहाड़ येरुसालेम के निकट, विश्राम-दिवस की यात्रा की दूरी पर है।

13) वहाँ पहुँच कर वे अटारी पर चढ़े, जहाँ वे ठहरे हुए थे। वे थे-पेत्रुस तथा योहन, याकूब तथा सिमोन, जो उत्साही कहलाता था और याकूब का पुत्र यूदस।

14) ये सब एकहृदय हो कर नारियों, ईसा की माता मरियम तथा उनके भाइयों के साथ प्रार्थना में लगे रहते थे।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस 01:26-38

26) छठे महीने स्वर्गदूत गब्रिएल, ईश्वर की ओर से, गलीलिया के नाजरेत नामक नगर में एक कुँवारी के पास भेजा गया,

27) जिसकी मँगनी दाऊद के घराने के यूसुफ नामक पुरुष से हुई थी, और उस कुँवारी का नाम था मरियम।

29) वह इन शब्दों से घबरा गयी और मन में सोचती रही कि इस प्रणाम का अभिप्राय क्या है।

30) तब स्वर्गदूत ने उस से कहा, ’’मरियम! डरिए नहीं। आप को ईश्वर की कृपा प्राप्त है।

31) देखिए, आप गर्भवती होंगी, पुत्र प्रसव करेंगी और उनका नाम ईसा रखेंगी।

32) वे महान् होंगे और सर्वोच्च प्रभु के पुत्र कहलायेंगे। प्रभु-ईश्वर उन्हें उनके पिता दाऊद का सिंहासन प्रदान करेगा,

33) वे याकूब के घराने पर सदा-सर्वदा राज्य करेंगे और उनके राज्य का अन्त नहीं होगा।’’

34) पर मरियम ने स्वर्गदूत से कहा, ’’यह कैसे हो सकता है? मेरा तो पुरुष से संसर्ग नहीं है।’’

35) स्वर्गदूत ने उत्तर दिया, ’’पवित्र आत्मा आप पर उतरेगा और सर्वोच्च प्रभु की शक्ति की छाया आप पर पड़ेगी। इसलिए जो आप से उत्पन्न होंगे, वे पवित्र होंगे और ईश्वर के पुत्र कहलायेंगे।

36) देखिए, बुढ़ापे में आपकी कुटुम्बिनी एलीज़बेथ के भी पुत्र होने वाला है। अब उसका, जो बाँझ कहलाती थी, छठा महीना हो रहा है;

37) क्योंकि ईश्वर के लिए कुछ भी असम्भव नहीं है।’’

38) मरियम ने कहा, ’’देखिए, मैं प्रभु की दासी हूँ। आपका कथन मुझ में पूरा हो जाये।’’ और स्वर्गदूत उसके पास से चला गया।

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है। ईश्वर हमसे प्यार करता है और हमें उस प्यार का अनुभव करने और उसे मनाने के लिए विभिन्न माध्यम देता है। पवित्र रोजरी माला की माँ का पर्व, जिसे हम आज मनाते है, हमारे प्रति ईश्वर का प्रेम का एक सुंदर उदाहरण है। आज के पाठ इस त्यौहार की दृष्टी से चुने गये हैं। आज का सुसमाचार में हम माता मरियम की भक्ति का और विशेष रूप से प्रणाम मरिया प्रार्थना का आधार पाते हैं। मरियम को सम्बोधित करते हुए स्वर्गदूत कहता है: "प्रणाम मरिया, प्रभु की कृपापात्री, प्रभु आपके साथ है"। "प्रणाम मरिया" पूर्ण रूप से बाइबिल पर आधारित एक प्रार्थना है।

संत पोप जॉन पॉल द्वितीय ने पवित्र रोजरी माला विनती को अपनी पसंदीदा प्रार्थना बताया। माता मरियम के साथ हम पवित्र रोजरी माला में येसु के जीवन के मूलभूत रहस्यों पर मनन-चिंतन करते हैं। पवित्र रोजरी माला के दौरान हम माता मरियम के ह्रदय के द्वारा येसु की उपासना करतेहैं।

कलीसिया के इतिहास में कठिन और विरोध की परिस्थितियों में विश्वासियों ने माला विनती द्वारा अपने विश्वास में बने रहे। आप लोगों ने अनुभव किया होगा कैसे लॉकडाउन के इन दिनों में पवित्र रोजरी माला की भक्तिमय प्रार्थना अपने विश्वास को जीने और उसे सक्रिय और जीवंत बनाये रखने में कितने मदत किये हैं।

क्या आप येसु को और अधिक प्यार करना चाहते हैं? यदि हाँ, तो अपनी रोजरी माला लेकर माता मरियम के पास जाईये। हे मरियम, पवित्र रोजरी माला की माँ, हमारे लिए विनती कर !



📚 REFLECTION

God loves us. God loves us and gives us various means to experience and celebrate that love. The feast of Our Lady of the Rosary, which we celebrate today, is a beautiful expression of God’s love for us. The readings are taken in view of this feast. The gospel passage of the annunciation to Mary contains the invocations in honour of Mary, “Hail Mary, full of grace, the Lord is with you”. “Hail Mary” is such a biblical prayer!

Saint Pope John Paul II described the rosary as his favourite prayer. In praying the rosary we reflect on the fundamental mysteries of the life of Jesus along with Mary. It is loving Jesus with the heart and mind of Mary.

During the hard times in the history of the church faith was kept alive by the recitation of the holy rosary by many people. It may be your experience that during these lockdown days rosary has played a great role in living and keeping alive our faith in a prayerful and devotional way.

Do you want to love Jesus more? Then go to Mother Mary and learn at her lap with your rosary in hand! Our Lady of the Rosary, pray for us!

 -Br. Biniush Topno (Duliajan)





06 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

06 अक्टूबर 2020
वर्ष का सत्ताईसवाँ सामान्य सप्ताह, मंगलवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

📒 पहला पाठ :गलातियों 1:13-24

13) आप लोगों ने सुना होगा कि जब मैं यहूदी धर्म का अनुयायी था, तो मेरा आचरण कैसा था। मैं ईश्वर की कलीसिया पर घोर अत्याचार और उसके सर्वनाश का प्रयत्न करता था।

14) मैं अपने पूर्वजों की परम्परओं का कट्टर समर्थक था और अपने समय के बहुत-से यहूदियों की अपेक्षा अपने राष्ट्रीय धर्म के पालन में अधिक उत्साह दिखलाता था।

15) किन्तु ईश्वर ने मुझे माता के गर्भ से ही अलग कर लिया और अपने अनुग्रह से बुलाया था;

16) इसलिए उसने मुझ पर- और मेरे द्वारा- अपने पुत्र को प्रकट करने का निश्चय किया, जिससे मैं गैर-यहूदियों में उसके पुत्र के सुसमाचार का प्रचार करूँ। इसके बाद मैंने किसी से परामर्श नहीं किया।

17) और जो मुझ से पहले प्रेरित थे, उन से मिलने के लिए मैं येरूसालेम नहीं गया; बल्कि मैं तुरन्त अरब देश गया और बाद में दमिश्क लौटा।

18) मैं तीन वर्ष बाद केफ़स से मिलने येरूसालेम गया और उनके साथ पंद्रह दिन रहा।

19) प्रभु के भाई याकूब को छोड़ कर मेरी भेंट अन्य प्रेरितों में किसी से नहीं हुई।

20) ईश्वर मेरा साक्षी है कि मैंने आप को जो लिखा है, वह एकदम सच है।

21) इसके बाद मैं सीरिया और किलिकिया प्रदेश गया।

22) उस समय यहूदिया की मसीही कलीसियाएं मुझे व्यक्तिगत रूप से नहीं जानती थीं।

23) उन्होंने इतना ही सुना था कि जो व्यक्ति हम पर अत्याचार करता था, वह अब उस विश्वास का प्रचार कर रहा है, जिसका वह सर्वनाश करने का प्रयत्न करता था

24) और वे मेरे कारण ईश्वर की स्तुति करती थीं।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस 10:38-42

38) ईसा यात्रा करते-करते एक गाँव आये और मरथा नामक महिला ने अपने यहाँ उनका स्वागत किया।

39) उसके मरियम नामक एक बहन थी, जो प्रभु के चरणों में बैठ कर उनकी शिक्षा सुनती रही।

40) परन्तु मरथा सेवा-सत्कार के अनेक कार्यों में व्यस्त थी। उसने पास आ कर कहा, ’’प्रभु! क्या आप यह ठीक समझते हैं कि मेरी बहन ने सेवा-सत्कार का पूरा भार मुझ पर ही छोड़ दिया है? उस से कहिए कि वह मेरी सहायता करे।’’

41) प्रभु ने उसे उत्तर दिया, ’’मरथा! मरथा! तुम बहुत-सी बातों के विषय में चिन्तित और व्यस्त हो;

42) फिर भी एक ही बात आवश्यक है। मरियम ने सब से उत्तम भाग चुन लिया है; वह उस से नहीं लिया जायेगा।’’

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है। जैसा कि संत पौलुस आज का पहला पाठ में कहता है, "उसने मुझ पर - और मेरे द्वारा - अपने पुत्र को प्रकट करने का निश्चय किया, जिससे मैं गैर यहूदियों में उसके पुत्र के सुसमाचार का प्रचार करूं"। उसने स्वयं प्रभु येसु से सुसमाचार का संदेश सीखा; किसी भी मानव स्रोत से नहीं। ईश्वर अपनी उदारता में अपने आपको हमारे सामने प्रकट करता है और चाहता है कि हम सभी लोगों के साथ सुसमाचार का आनंद का साझा करें।

आज का सुसमाचार का पाठ येसु के द्वारा मरथा और मरियम कों उनके घर में भेंट करने के बारे में है। मारथा ने येसु का उनके घर में स्वागत किया। मरियम ने प्रभु के चरणों में बैठकर उनकी शिक्षा सुनती रही। येसु ने मरथा से कहा, "तुम बहुत सी बातों के विषय में चिंतित और व्यस्त हो; फिर भी एक ही बात आवश्यक है। मरियम ने सबसे उत्तम भाग चुन लिया है; वह उस से नहीं लिया जायेगा"।

येसु के साथ व्यक्तिगत प्रार्थना में समय बिताने से और उनकी बात मौन-साधना और पवित्र वचन में सुनने से ही कोई येसु के साथ अपने सम्बन्ध में बढ़ सकता है। प्रार्थना में येसु के साथ समय बिताने से ही आध्यात्मिक जीवन का विकास होता है। प्रार्थना में प्रभु के साथ पहले समय बिताए बिना सुसमाचार की सच्ची घोषणा नहीं हो सकती है - येसु के संग रहना, उनकी शिक्षा सुनना, और सुसमाचार की घोषणा करना।

हम अपने आपसे पूछें: क्या मेरा प्रभु येसु के साथ व्यक्तिगत संबंध है? प्रभु से मेरा सम्बन्ध में बढ़ने के लिए मुझे क्या करना चाहिए ? क्या मैं इसे दैनिक व्यक्तिगत प्रार्थना और पवित्र वचन के पढ़न के द्वारा पोषण करता हूँ?



📚 REFLECTION

God loves us. As Paul says in today’s reading, “God revealed his son to me, so that I might preach the good news about him to the pagans.” He learned the truth of the gospel from the Lord Jesus himself; not from any human source. In his goodness God reveals himself to us and wants us to share the joy of the gospel with all people.

The gospel passage is about the visit of Jesus to the house of Martha and Mary. Martha welcomed Jesus into their house. Mary sat down at the Lord’s feet and listened to him speaking. About his Jesus said, “Mary has chosen the better part; and it is not to be taken from her”.

It is by spending time with Jesus in personal prayer and listening to him - in silence as well as in the Scriptures - that one grows in relationship with him. There can be no spiritual life without time spent with Jesus in prayer. And there can be no proclamation of the gospel without first spending time with the Lord in prayer. Spend time with Jesus, listen to him, and then proclaim the Gospel to others.

Let us ask ourselves: Do I have a personal relationship with the Lord? What must I do to grow in my relationship with him? Do I nourish it with daily personal prayer and reading of the Holy Scripture?

05 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

05 अक्टूबर 2020
वर्ष का सत्ताईसवाँ सामान्य सप्ताह, सोमवार

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📒 पहला पाठ :गलातियों 1:6-12

6) मुझे आश्चर्य होता है कि जिसने आप लोगों को मसीह के अनुग्रह द्वारा बुलाया, उसे आप इतना शीघ्र त्याग कर एक दूसरे सुसमाचार के अनुयायी बन गये हैं।

7) दूसरा तो है ही नहीं, किन्तु कुछ लोग आप में अशान्ति उत्पन्न करते और मसीह का सुसमाचार विकृत करना चाहते हैं।

8) लेकिन जो सुसमाचार मैंने आप को सुनाया, यदि कोई- चाहे वह मैं स्वयं या कोई स्वर्गदूत ही क्यों न हो- उस से भिन्न सुसमाचार सुनाये, तो वह अभिशप्त हो!

9) मैं जो कह चुका हूँ, वही दुहराता हूँ- जो सुसमाचार आप को मिला है, यदि कोई उस से भिन्न सुसमाचार सुनाये, तो वह अभिशप्त हो!

10) मैं अब किसका कृपापात्र बनने की कोशिश कर रहा हूँ - मनुष्यों का अथवा ईश्वर का? क्या मैं मनुष्यों को प्रसन्न करना चाहता हूँ? यदि मैं अब तक मनुष्यों को प्रसन्न करना चाहता, तो मैं मसीह का सेवक नहीं होता।

11) भाइयो! मैं आप लोगों को विश्वास दिलाता हूँ कि मैंने जो सुसमाचार सुनाया, वह मनुष्य-रचित नहीं है।

12) मैंने किसी मनुष्य से उसे न तो ग्रहण किया और न सीखा, बल्कि उसे ईसा मसीह ने मुझ पर प्रकट किया।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस 10:25-37

25) किसी दिन एक शास्त्री आया और ईसा की परीक्षा करने के लिए उसने यह पूछा, ’’गुरूवर! अनन्त जीवन का अधिकारी होने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?’’

26) ईसा ने उस से कहा, ’’संहिता में क्या लिखा है?’’ तुम उस में क्या पढ़ते हो?’’

27) उसने उत्तर दिया, ’’अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा, अपनी सारी शक्ति और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो और अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो’’।

28) ईसा ने उस से कहा, ’’तुमने ठीक उत्तर दिया। यही करो और तुम जीवन प्राप्त करोगे।’’

29) इस पर उसने अपने प्रश्न की सार्थकता दिखलाने के लिए ईसा से कहा, ’’लेकिन मेरा पड़ोसी कौन है?’’

30) ईसा ने उसे उत्तर दिया, ’’एक मनुष्य येरुसालेम से येरीख़ो जा रहा था और वह डाकुओं के हाथों पड़ गया। उन्होंने उसे लूट लिया, घायल किया और अधमरा छोड़ कर चले गये।

31) संयोग से एक याजक उसी राह से जा रहा था और उसे देख कर कतरा कर चला गया।

32) इसी प्रकार वहाँ एक लेवी आया और उसे देख कर वह भी कतरा कर चला गया।

33) इसके बाद वहाँ एक समारी यात्री आया और उसे देख कर उस को तरस हो आया।

34) वह उसके पास गया और उसने उसके घावों पर तेल और अंगूरी डाल कर पट्टी बाँधी। तब वह उसे अपनी ही सवारी पर बैठा कर एक सराय ले गया और उसने उसकी सेवा शुश्रूषा की।

35) दूसरे दिन उसने दो दीनार निकाल कर मालिक को दिये और उस से कहा, ’आप इसकी सेवा-शुश्रूषा करें। यदि कुछ और ख़र्च हो जाये, तो मैं लौटते समय आप को चुका दूँगा।’

36) तुम्हारी राय में उन तीनों में कौन डाकुओं के हाथों पड़े उस मनुष्य का पड़ोसी निकला?’’

37) उसने उत्तर दिया, ’’वही जिसने उस पर दया की’’। ईसा बोले, ’’जाओ, तुम भी ऐसा करो’’।

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है। हम आज से पहले पाठ के रूप में गलातियों के नाम संत पौलुस का पत्र से सुनते हैं। संत पौलुस का दावा है कि जिस सुसमाचार का उसने प्रचार किया वह कुछ ऐसा था जो उसने येसु मसीह के रहस्योद्घाटन के माध्यम से सीखा था, न कि उसे कोई पुरुषों के द्वारा दिया गया कुछ। इसलिए वह लोगों को इस सुसमाचार को किसी अन्य संदेश में बदलने के बारे में चेतावनी देता है।

आज का सुसमाचार पाठ में यह सवाल है, "मेरा पड़ोसी कौन है?"। यह प्रश्न पूछने में शात्री का उद्देश्य खुद को सही ठहराने का था, न की अपने पडोसी कौन है यह जानना और उसे मदद करना। प्रभु येसु ने उत्तर के रूप में भला सामरी का दृष्टांत सुनाया जिसमें यह बताया गया है कि कैसे कोई व्यक्ति जरूरतमंद लोगों की मदद करने के द्वारा एक अच्छा पड़ोसी बन सकता है।

कलीसिया के धर्म पुरखों ने इस दृष्टांत के पात्रों में इस्राइली जनता को और स्वयं येसु को देखते हैं। पड़ोसियों को प्यार करने से हम येसु को ही प्यार करते हैं। अच्छे पड़ोसी बनकर दूसरों को प्यार करने से हम स्वयं येसु की तरह व्यवहार करते हैं। यही है वह सुसमाचार का मर्म जिसका संत पौलुस ने प्रचार किया था।

येसु कहता है, “जाओ, तुम भी ऐसा ही करो!” हम अपने आपसे पूछें: क्या मैं एक अच्छा पड़ोसी हूँ या नहीं? और एक अच्छा पड़ोसी बनने के लिए मुझे क्या करने की आवस्यकता है?



📚 REFLECTION

God loves us. From today we listen to the letter to the Galatians in the first reading. Paul asserts that the Gospel that he preached was something that he learnt through a revelation of Jesus Christ, not something given to him by men. Therefore he warns people about diluting or replacing it with any other message.

The gospel contains the question, “who is my neighbour?’. The lawyer asked the question to justify himself rather than know and help the neighbour. The parable of the good Samaritan which Jesus gave as an answer ends up showing how one can and need to be a good neighbour - by loving, caring for, and helping those in need.

The Fathers of the Church have seen in this parable the story of Israel and Jesus himself as the good Samaritan. By loving the neighbours in need we are loving Jesus himself. By loving others by becoming good neighbours we are behaving like Jesus himself. This is the undiluted Gospel that Paul was preaching about.

Jesus says, “Go and do the same yourself!” Let us ask ourselves: Am I a good neighbour? What do I need to do to become a good neighbour?

04 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

04 अक्टूबर 2020
वर्ष का सत्ताईसवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार

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📒 पहला पाठ :इसायाह का ग्रन्थ 5:1-7

1) मैं अपने मित्र की दाखबारी के विषय में अपने मित्र को एक गीत सुनाऊँगा। उपजाऊ ढाल पर मेरे मित्र की दाखबारी थी।

2) उसने इसकी ज़मीन खुदवायी, इस में से पत्थर निकाल दिये और इस में बढ़िया दाखलता लगवा दी। उसने इसके बीच में मीनार बनवायी और इस में एक कोल्हू भी खुदवाया। उसे अच्छी फ़सल की आशा थी, किन्तु उसे खट्ठे अंगूर ही मिले।

3) “येरुसालेम के निवासियो! यूदा की प्रजा! अब तुम मेरा तथा मेरी दाख़बारी का न्याय करो।

4) कौन बात ऐसी थी, जो मैं अपने दाखबारी के लिए कर सकता था और जिसे मैंने उसके लिए नहीं किया? मुझे अच्छी फ़सल की आशा थी, उसने खट्ठे अंगूर क्यों पैदा किये?

5) अब, मैं तुम्हें बताऊँगा कि अपनी दाखबारी का क्या करूँगा। मैं उसका बाड़ा हटाऊँगा ओर पशु उस में चरने आयेंगे। मैं उसकी दीवारें ढाऊँगा और लोग उसे पैरों तले रौंदेंगे।

6) वह उजड़ जायेगी; कोई उसे छाँटने या खोदने नहीं आयेगा और उस में झाड़-झंखाड़ उग जायेगा। मैं बादलों को आदेश दूँगा कि वे उस पर पानी नहीं बरसायें।“

7) विश्वमण्डल के प्रभु की यह दाख़बारी इस्राएल का घराना है और इसके प्रिय पौधे यूदा की प्रजा हैं। प्रभु को न्याय की आशा थी और भ्रष्टाचार दिखाई दिया। उसे धर्मिकता की आशा थी और अधर्म के कारण हाहाकार सुनाई पड़ा।

📕 दूसरा पाठ: फ़िलिप्पियों 4:6-9

6) किसी बात की चिन्ता न करें। हर जरू़रत में प्रार्थना करें और विनय तथा धन्यवाद के साथ ईश्वर के सामने अपने निवेदन प्रस्तुत करें

7) और ईश्वर की शान्ति, जो हमारी समझ से परे हैं, आपके हृदयों और विचारों को ईसा मसीह में सुरक्षित रखेगी।

8) भाइयो! अन्त में यह जो कुछ सच है, आदरणीय है; जो कुछ न्यायसंगत है, निर्दोष है; जो कुछ प्रीतिकर है, मनोहर है; जो कुछ उत्तम है, प्रशंसनीय है: ऐसी बातों का मनन किया करें।

9) आप लोगों ने मुझ से जो सीखा, ग्रहण किया, सुना और मुझ में देखा, उसके अनुसार आचरण करें और शान्ति का ईश्वर आप लोगों के साथ रहेगा।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 21:33-44

33) ’’एक दूसरा दृष्टान्त सुनो। किसी भूमिधर ने दाख की बारी लगवायी, उसके चारों ओर घेरा बनवाया, उस में रस का कुण्ड खुदवाया और पक्का मचान बनवाया। तब उसे असामियों को पट्ठे पर दे कर वह परदेश चला गया।

34) फसल का समय आने पर उसने फसल का हिस्सा वसूल करने के लिए असामियों के पास अपने नौकरों को भेजा।

35) किन्तु असामियों ने उसके नौकरों को पकड़ कर उन में से किसी को मारा-पीटा, किसी की हत्या कर दी और किसी को पत्थरों से मार डाला।

36) इसके बाद उसने पहले से अधिक नौकरों को भेजा और असामियों ने उनके साथ भी वैसा ही किया।

37) अन्त में उसने यह सोच कर अपने पुत्र को उनके पास भेजा कि वे मेरे पूत्र का आदर करेंगे।

38) किन्तु पुत्र को देख कर असामियों ने एक दूसरे से कहा, ’यह तो उत्तराधिकारी है। चलो, हम इसे मार डालें और इसकी विरासत पर कब्जा कर लें।’

39) उन्होंने उसे पकड़ लिया और दाखबारी से बाहर निकाल कर मार डाला।

40) जब दाखबारी का स्वामी लौटेगा, तो वह उन असामियों का क्या करेगा?’’

41) उन्होंने ईसा से कहा, ’’वह उन दृष्टों का सर्वनाश करेगा और अपनी दाखबारी का पट्ठा दूसरे असामियों को देगा, जो समय पर फसल का हिस्सा देते रहेंगे’’।

42) ईसा ने उन से कहा, ’’क्या तुम लोगों ने धर्मग्रन्थ में कभी यह नहीं पढा? करीगरों ने जिस पत्थर को बेकार समझ कर निकाल दिया था, वही कोने का पत्थर बन गया है। यह प्रभु का कार्य है। यह हमारी दृष्टि में अपूर्व है।

43) इसलिए मैं तुम लोगों से कहता हूँ- स्वर्ग का राज्य तुम से ले लिया जायेगा और ऐसे राष्ट्रों को दिया जायेगा, जो इसका उचित फल उत्पन्न करेगा।

44) ’’जो इस पत्थर पर गिरेगा, वह चूर-चूर हो जायेगा और जिस पर वह पत्थर गिरेगा, उस को पीस डालेगा।’’

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है।

यह आज के पाठों से स्पष्ट है जिसमें इसराइल के प्रति ईश्वर के प्रेम को दिखाया गया है। पहला पाठ में नबी इसयास दाखबारी के प्रतीक के माध्यम से अपने लोगों के लिए ईश्वर का प्रेम और संरक्षण का वर्णन करता है। ईश्वर ने इसराइल को अपनी निजी प्रजा के में रूप में चुना, उन्हें सभी दुश्मनों से बचाया और उनकी देखभाल चमत्कारिक तरीके से की। आज का अनुवाक्य इस बात का स्मरण दिलाता है - "प्रभु की दाखबारी इस्राएल का घराना है"।

इस तरह के प्यार के बावजूद इस्राएली लोगों ने न्याय और निष्ठा के बजाय ईश्वर की इच्छाओं के खिलफ कुकर्म करते रहे। हम पढ़ते हैं, "उसे अच्छी फसल की आशा थी, किंतु उसे खट्टे अंगूर ही मिले"।

आज का सुसमाचार दाखबारी और असामियों का दृष्टांत का वर्णन है। यह ईश्वर के निरंतर प्रेम और मानव के कृतघ्नता और अपराधों को चित्रित करता है। दाखबारी का दृष्टान्त वास्तव में इज़राइल की कहानी है। यह दिखाता है कि कैसे ईश्वर ने अपने दूतों-नबियों के माध्यम से उनको सिखाना और उनका मार्गदर्शन करना जारी रखा। असामियों का व्यवहार इसराइल का व्यवहार की कहानी है - कैसे उन्होंने ईश्वर के दूतों के साथ बुरा व्यवहार किया और उन्हें मार डाला।

ईश्वर हमसे उम्मीद करता है कि हम उनके बच्चों जैसे फल उत्पन्न करे । जैसा कि येसु ने कहा है, एक वृक्ष अपने फल से पहचाना जाता है। इस बात पर मनन-चिंतन करना अच्छा होगा - "प्रभु की दाखबारी ने कैसे अयोग्य फल पैदा की?" वह इसलिए है की वे अन्य देवताओं के पीछे गए और ईश्वर की आज्ञाओं को त्याग दिया।

इज़राइल की कहानी प्रत्येक विश्वासी की भी कहानी है। पिता ईश्वर ने "संसार की सृष्टि से पहले मसीह में हमको चुना जिससे हम मसीह से संयुक्त होकर उसकी दृष्टि में पवित्र तथा निष्कलंक बने" (इफिसियों १: ४)। वह अपने वचन और संस्कारों से हमारा पोषण करता है और हमारी रक्षा करता है। उन्होंने हम में से प्रत्येक को एक जीवन-मिशन सौंपा है। ईश्वर की इच्छा के अनुसार व्यतीत एक जीवन आध्यात्मिक फलों से पहचाना जाता है।

कलीसिया ईश्वर की दाखबारी होने में आनंद मानती है। साथ ही कलीसिया में आत्मा-मंथन और प्रार्थना के कई कारण है। क्या मुझे एहसास है कि मैं ईश्वर के चुने हुए लोगों का सदस्य हूं? क्या मैं उसकी आज्ञाओं और शिक्षाओं को सुनता हूँ? सुसमाचार सेवकों के साथ मेरा कैसा व्यवहार है? मैं अपने जीवन में क्या फल उत्पन्न करता हुँ? मेरा जीवन-मिशन के प्रति मैं कितना ईमानदार हुँ?

आमीन



📚 REFLECTION

God loves us.

This is clear from today’s readings which show the love of the Lord for Israel. In the first reading prophet Isaiah, through the symbolism of the vineyard, describes the care and concern of God for his people. God chose Israel to be his people, protected them from all their enemies and cared for them in miraculous ways. This is emphasised in the responsorial psalm in which we pray, “the vineyard of the Lord is the house of Israel”.

In spite of such love the people acted against God’s desires by bloodshed and cries of distress instead of justice and integrity. As the passage says, “they yielded wild grapes instead of good ones”.

The gospel narrates the parable of the vineyard and the tenants. It portrays God’s steadfast love and human beings’ ingratitude and transgressions. The parable of the vineyard is in fact the story of Israel. It shows how God continued to teach and guide them through his messengers the prophets. The behaviour of the tenants is the story of Israel’s behaviour - how they did not listen to the prophets, God’s messengers and ill-treated and killed them.

God expects us to produce fruits that befit his children. As Jesus said, a tree is known by its fruits. It is good to ask the question, “How did the vineyard of the Lord produce unworthy fruits?” It is because they went after other gods and abandoned God’s commandments.

The story of Israel is also the story of each believer. Go chose us in Jesus Christ before the foundation of the world to be holy and blameless before him (Ephesian1:4). He continues to nourish and protect us with his word and sacraments. He has entrusted to each one of us a life-mission. A life lived in accordance with the will of God can be identified by the spiritual fruits that it bears.

The Church rejoices in being the vineyard of the lord. At the same time we have cause for much soul-searching and prayer. Do I realize that I am a member of the chosen people of God? Do I listen to his commands and teachings? How do I treat his messengers, who bring the good news to me? What fruits do I produce in my life? How responsible am I towards the life-mission that God has entrusted me?

Amen.


मनन्-चिंतन

‘‘ईश्वर ने संसार से इतना प्यार किया कि उसने उसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उस में विश्वास करता है, उसका सर्वनाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन प्राप्त करे’’(योहन 3:16)। प्रभु येसु अपने कार्य और भेजे जाने के मकसद को अच्छे से जानते थे। ‘‘जिसने मुझे भेजा, उसकी इच्छा पर चलना और उसका कार्य पूरा करना, यही मेरा भोजन है’’(योहन 4:34)। प्रभु येसु ईश्वरीय प्रेम को समझाने, बाँटने और फैलाने का कार्य करते थे। ‘‘जिस प्रकार मैने तुम लोगो को प्यार किया, उसी प्रकार तुम भी एक दूसरे को प्यार करो’’(योहन 13:34)। पिता ईश्वर संसार की सृष्टि के समय से इस पूरे संसार को प्रेम करते आये हैं और उनके प्रेम की पराकाष्ठा प्रभु येसु के आने पर हुई। उस पिता के असीम प्रेम को समझाने के लिए प्रभु येसु ने यह दृष्टांत सुनाया।

हम सब प्रभु के प्रतिरूप बनाये गये हैं ‘‘ईश्वर ने मनुष्य को अपना प्रतिरूप बनाया’’(उत्पत्ति 1:27)। ‘‘ईश्वर प्रेम है और जो प्रेम में दृढ़ रहता है, वह ईश्वर में निवास करता है और ईश्वर उस में’’(1 योहन 4:16)। अर्थात् हम सब प्रेम के प्रतिरूप बनाये गये हैं परन्तु जब जब हम ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध कार्य करते हैं या पाप करते हैं तब हम उनके प्रेम से दूर होते जाते हैं। यह तब होता है जब हम ईश्वर को छोड़ दुनिया के पीछे भागते हैं। ‘‘जो संसार को प्यार करता है, उसमें पिता का प्रेम नहीं’’(1 योहन 2:15)। हम सब सर्वप्रथम प्रभु से प्रेम करने के लिए बनाये गये हैं। ‘‘जो अपने पिता या अपनी माता को मुझ से अधिक प्यार करता है, वह मेरे योग्य नहीं। जो अपने पुत्र या अपनी पुत्री को मुझ से अधिक प्यार करता है, वह मेरे योग्य नही’’(मत्ती 10:37)। और यह संसार के सृष्टि से है। परन्तु मनुष्य इस बात को भूलकर दूसरी ओर कदम बढ़ाने लगा। प्रभु ने इस प्रेम को समझाने के लिए और लोगो को वापस बुलाने के लिए विभिन्न व्यक्तियों, नबियों, प्रभु भक्तों का सहारा लिया जैसे इब्राहीम, मूसा, योशुआ, न्यायकर्ताओं - ओतनीएल, एहूद, शमगर, दबोरा, बाराक, गिदओन, अबीमेलेक और यिफ्तह। परन्तु लोगो ने इनकी नही सुनी। फिर ईश्वर ने नबियों को भेजा - समूएल, इसायाह, यिमियाह, दानिएल, एज़ेकिएल, आमोस, होशुआ, योएल इत्यादि परन्तु लोगो ने इन्हें मारा, पीटा और इनकी नही सुना। अंत में ईश्वर ने स्वयं अपने पुत्र को भेजा परन्तु उन्होंने पुत्र के साथ भी वही व्यवहार किया। ‘‘वह अपने यहाँ आया और उसके अपने लोगों ने उसे नहीं अपनाया’’(योहन 1:11)। अंततः जो अनुग्रह उन लोगों पर था, उनसे ले लिया गया और उन लोगो को दिया गया जो ईश्वर के लिए तत्पर थे और इन अनुग्रह के सही हकदार थे।

ईश्वर ने हम सबको माता के गर्भ में बड़े प्रेम से गढ़ा, हमारा नाम लेकर पुकारा और जो हमारे लिए जरूरी है वह सब हमें प्रदान किया है। यहाँ तक कि हमें बड़े बड़े खतरों से, संकटो से बचाया है जिन्हें हम जानते या नही भी जानते हों। वह हर क्षण हमारे साथ रह कर हमारी रक्षा करता है। ‘‘मै संसार के अंत तक सदा तुम्हारे साथ हूँ’’ (मत्ती 28:20)। प्रभु येसु हमें पिता ईश्वर के साथ मेल कराना चाहते हैं जिससे हम ईश्वर से प्रेम करना सीखें जिसके लिए हम बने हैं। और हम न केवल ईश्वर से प्रेम करें परन्तु उस प्रेम को फैलायें अर्थात् उस प्रेम का सही फल उत्पन्न करें। ‘‘मैंने तुम्हें इसलिए चुना और नियुक्त किया कि तुम जा कर फल उत्पन्न करो .......... मैं तुम लोगों को यह आज्ञा देता हूँ- एक दूसरे को प्यार करो।’’ (योहन 16:17)

जब उन्होने हमारे लिए इतना सब किया है तो वे आशा भी रखते हैं कि हम फल उत्पन्न करें। लेकिन संसार ने क्या किया? संसार ने उसी ज्योति को ठुकरा दिया, उसे नही अपनाया (योहन 1:11)। ‘‘कौन बात ऐसी थी, जो मैं अपनी दाखबारी के लिए कर सकता था और जिसे मैंने उसके लिए नहीं किया? मुझे अच्छी फसल की आशा थी, उसने खट्टे अंगूर क्यों पैदा किये?’’ (इसायाह 5:4) यह बात केवल यहुदियो के लिए ही नही, परन्तु हम मसीहियों के लिए भी बहुत हद तक समान है। कई बार हम अपने मन, वचन और कर्मों से उस ज्योति को ठुकरा देते है।

अगर हम उस प्रेम का सही फल उत्पन्न नही कर पा रहें है तो इसका मतलब हम ईश्वर से पूर्ण रूप से नहीं जुड़े हैं ‘‘मै दाखलता हूँ और तुम डालियाँ हो। जो मुझ में रहता है और मैं जिस में रहता हूँ, वही बहुत फलता है; क्योंकि मुझ से अलग रह कर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।’’ (योहन 15:5)।

बपतिस्मा के द्वारा हम सबको वह अनमोल उपहार मिला है। मसीह का अनुसरण करने का अवसर मिला। परन्तु क्या हम मसीह के समान जीवन व्यतीत करते है? क्या हम उस उपहार का या उस विश्वास का फल उत्पन्न करते हैं? फल उत्पन्न करने का मतलब यहाँ पर प्रभु के वचन के अनुसार कार्य करना है। प्रभु का वचन सशक्त और किसी भी दुधारी तलवार से भी तेज है (इब्रानियों 4:12)। ईश्वर का वचन हमे प्रेम करने, क्षमा करने, दीन बनने, अपना क्रूस उठाने, अपने को छोटा बनाने तथा प्रभु में बने रहने को कहता है। इन सबसे बढ़ कर ईश्वर का वचन हमें ईश्वर को सारे हृदय से, सारे मन, सारी शक्ति से प्रेम करने और अपने पड़ोसियों को अपने समान प्रेम करने को कहता है। परन्तु क्या हम इनका अनुसरण करते है? कई बार हमारे गलत उदाहरण के कारण लोगों का हमसे विश्वास उठ जाता है। इसी कारण महात्मा गांधी ने कहा कि वह ख्रीस्त को पसंद करते हैं लेकिन ख्रीस्तीयों को नहीं, क्योंकि ख्रीस्तीय ख्रीस्त से बिल्कुल अलग हैं। यही कारण है कि हमारे जीवन द्वारा कोई फल उत्पन्न नहीं हो रहा है। आइये हम सब सच्चे ख्रीस्तीय या सच्चे मसीही बने। हम केवल वचनों से ही नहीं परन्तु कर्मों से येसु का अनुसरण करें।

3 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

03 अक्टूबर 2020
वर्ष का छब्बीसवाँ सामान्य सप्ताह, शनिवार

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📒 पहला पाठ : योब 42:1-3,5-6,12-17

1) अय्यूब ने प्रभु को यह उत्तर दिया:

2) मैं जानता हूँ कि तू सर्वशक्तिमान् है और अपनी सब योजनाएँ पूरी कर सकता है।

3) मैंने ऐसी बातों की चर्चा चलायी, जिन्हें मैं नहीं समझता। मैं ऐसे चमत्कारों के विषय में बोला, जो मेरी बुद्धि से परे हैं।

5) मैंने दूसरों से तेरी चर्चा सुनी थी अब मैंने तुझे अपनी आँखों से देखा है।

6) इसलिए मैं धूल और राख में बैठ कर रोते हुए पश्चात्ताप कर रहा हूँ।

12) प्रभु ने अय्यूब के पहले दिनों की अपेक्षा उसके पिछले दिनों को अधिक आशीर्वाद दिया। उसके पास चैदह हज़ार जोड़ियाँ और एक हज़ार गधियाँ थीं।

13) उसके सात पुत्र उत्पन्न हुए और तीन पुत्रियाँ।

14) उसने पहली का नाम ’यमीमा’ रखा दूसरी का ’कसीआ’ और तीसरी का ’केरेनहप्पूक’।

15) देश भर में ऐसी स्त्रियाँ नहीं मिली, जो अय्यूब की पुत्रियों के समान सुन्दर हों। अय्यूब ने उन्हें उनके भाइयों के साथ विरासत का भाग दिया।

16) इसके बाद अय्यूब एक सौ चालीस वर्ष तक जीवित रहा, अपने पुत्र-पौत्रों की चार पीढ़िया देखीं

17) और बहुत बड़ी उमर में संसार से विदा हुआ।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 10:17-24

17) बहत्तर शिष्य सानन्द लौटे और बोले, "प्रभु! आपके नाम के कारण अपदूत भी हमारे अधीन होते हैं"।

18) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, "मैंने शैतान को बिजली की तरह स्वर्ग से गिरते देखा।

19) मैंने तुम्हें साँपों, बिच्छुओं और बैरी की सारी शक्ति को कुचलने का सामर्थ्य दिया है। कुछ भी तुम्हें हानि नहीं पहुँचा सकेगा।

20) लेकिन, इसलिए आनन्दित न हो कि अपदूत तुम्हारे अधीन हैं, बल्कि इसलिए आनन्दित हो कि तुम्हारे नाम स्वर्ग में लिखे हुए हैं।"

21) उसी घड़ी ईसा ने पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो कर आनन्द के आवेश में कहा, "पिता! स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु! मैं तेरी स्तुति करता हूँ, क्योंकि तूने इन सब बातों को ज्ञानियों और समझदारों से छिपा कर निरे बच्चों पर प्रकट किया है। हाँ, पिता, यही तुझे अच्छा लगा

22) मेरे पिता ने मुझे सब कुछ सौंपा है। पिता को छोड़ कर यह कोई भी नहीं जानता कि पुत्र कौन है और पुत्र को छोड़ कर यह कोई नहीं जानता कि पिता कौन है। केवल वही जानता है, जिस पर पुत्र उसे प्रकट करने की कृपा करता है।"

23) तब उन्होंने अपने शिष्यों की ओर मुड़ कर एकान्त में उन से कहा, "धन्य हैं वे आँखें, जो वह देखती हैं जिसे तुम देख रहे हो!

24) क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ - तुम जो बातें देख रहे हो, उन्हें कितने ही नबी और राजा देखना चाहते थे, परन्तु उन्होंने उन्हें नहीं देखा और जो बातें तुम सुन रहे हो, वे उन्हें सुनना चाहते थे, परन्तु उन्होंने उन्हें नहीं सुना।"

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है! यह अय्यूब का अनुभव है जिसके बारे में हम आज का पहला पाठ में सुनते हैं। अय्यूब को अपने जीवन की सभी आपदाओं और संघर्षों के अंत में ईश्वर के व्यक्तिगत और गहरा अनुभव होता है। वह कहता है, “मैं ने दूसरों से तेरी चर्चा सुनी थी। अब मैं ने तुझे अपनी आँखों से देखा है” (अय्यूब ४२: ५)। अपने सभी संघर्षों में अय्यूब ने अपने मन को ईश्वर पर स्थिर रखा और ईश्वर ने उसे सौ गुणा पुरस्कृत किया। यह हमें रोमियों 8:28 की याद दिलाती है कि जो लोग प्रभु को प्यार करते हैं और उसके विधान के अनुसार बुलाये गये हैं, ईश्वर उनके कल्याण के लिए सभी बातों में उनकी सहायता करता हैं।

आज के सुसमाचार में हम बहत्तर शिष्यों को उनके मिशन के बाद आनन्दित होते हुए लौटते देखते हैं। वे येसु के नाम में किए हुए प्रभावशाली कार्यों के लिए खुश थे। तथापि येसु उन्हें चेतावनी देता हैं, "इसलिए आनंदित न हो कि अपदूत तुम्हारे अधीन हैं, बल्कि इसलिए आनंदित हो कि तुम्हारे नाम स्वर्ग में लिखे हुए हैं"। यह प्रभु पर हमारा ध्यान केंद्रित करने और उसके साथ रहने की इच्छा पर ध्यान देने का आह्वान है। प्रभु पर ध्यान देने के बजाय अपने काम और अपनी सफलता पर ध्यान केंद्रित करने का प्रलोभन हमेशा होता है। प्रभु हमें अपना बल देता है और ईश्वरीय कार्य के लिए हमें नियुक्त करता है। सोचिये, हम कितने सौभाग्यशाली हैं!

आइए हम अपने आप से पूछें कि हम ईश्वर के मिशन का जवाब कैसे देते हैं। क्या आपको ईश्वर और उसके प्रेम का व्यक्तिगत अनुभव है? ईश्वर को व्यक्तिगत रूप से अनुभव करने का प्रयास करें ताकि आप उस अनुभव और प्रेम को दूसरों को बाँट सकें।



📚 REFLECTION

God loves us. This is the experience of Job, as we hear in the first reading, who at the end of all the disasters and struggles of his life comes to a deep personal experience of God. He says, “I knew you then only from hearsay; but now I have seen you with my own eyes” (Job 42:5). In all his struggles Job kept his mind fixed on God and God rewarded him a hundredfold. We are reminded of Rom 8:28: "We know that in everyt6God works for good with those who love him, who are called according to his purpose."

In today’s gospel we see the seventy-two disciples coming back rejoicing after their mission. They were happy because of the mighty deeds that they were able to perform in the name of Jesus. However, Jesus cautions them, the true source of joy should be because their names are written in heaven. This is a call to focus our attention on the Lord and the desire to be with him. There is always the possible temptation to focus our attention on our work and our success rather than on the Lord. The Lord gives us his power and commissions us for his work. How privileged we are!

Let us ask ourselves how we respond to God’s mission entrusted to us. Do you have a personal experience of God and his love? Seek to experience him personally so that you can communicate that experience and love to others.

02 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

02 अक्टूबर 2020
वर्ष का छब्बीसवाँ सामान्य सप्ताह, शुक्रवार

पवित्र संरक्षक दूतॊ का पर्व

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📒 पहला पाठ : निर्गमन ग्रन्थ 23:20-23

20) मैं एक दूत को तुम्हारे आगे-आगे भेजता हूँ। वह रास्तें में तुम्हारी रक्षा करेगा और तुम्हें उस स्थान ले जायेगा, जिसे मैंने निश्चित किया है।

21) उसका सम्मान करो और उसकी बातें सुनो। उसके विरुद्ध विद्रोह मत करो। वह तुम्हारा अपराध नहीं क्षमा करेगा, क्योंकि उसे मेरी ओर से अधिकार मिला है।

22) यदि तुम उसकी बातें मानोगे, तो मैं तुम्हारे शत्रुओं का शत्रु और तुम्हारे विरोधियों का विरोधी बनूँगा।

23) मेरा दूत तुम्हारे आगे-आगे चलेगा और तुम्हें अमोरियों, हित्तियों, परिज्जियों, कनानियों, हिव्वियों, तथा यबूसियों के देश पहुँचा देगा और मैं उनका सर्वनाश करूँगा।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 18:1-5,10

1) उस समय शिष्य ईसा के पास आ कर बोले, ’’स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा कौन है?’’

2) ईसा ने एक बालक को बुलाया और उसे उनके बीच खड़ा कर

3) कहा, ’’मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- यदि तुम फिर छोटे बालकों-जैसे नहीं बन जाओगे, तो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करोगे।

4) इसलिए जो अपने को इस बालक-जैसा छोटा समझता है, वह स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा है।

5) और जो मेरे नाम पर ऐसे बालक का स्वागत करता है, वह मेरा स्वागत करता है।

10) ’’सावधान रहो, उन नन्हों में एक को भी तुच्छ न समझो। मैं तुम से कहता हूँ- उनके दूत स्वर्ग में निरन्तर मेरे स्वर्गिक पिता के दर्शन करते हैं।

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है! इस प्यार का अनुभव करने का एक तरीका संरक्षक दूतों के माध्यम से है। आज कलीसिया संरक्षक स्वर्गदूतों का त्यौहार मनाती है। हम सभी को हमारी रक्षा करने के लिए स्वर्गदूतों की ज़रूरत है, और सुसमाचार हमें बताता है कि हम सभी के पास एक संरक्षक दूत है! यह बहुत ही सुखद बात है। आज का सुसमाचार का पाठ कल का पाठ अधिक अंतिम वाक्य है, जो कहता है, "सावधान रहो, उन नन्हों में एक को भी तुच्छ न समझो। मैं तुमसे कहता हूं - उनके दूत स्वर्ग में निरंतर मेरे स्वर्गिक पिता के दर्शन करते हैं"।

ईश्वर ने हमारी रक्षा के लिए स्वर्गदूतों को नियुक्त किया है। इसका अर्थ है कि ईश्वर हमसे प्यार करता है और इसलिए वह हमें संरक्षक दूतों के माध्यम से अपनी दिव्य सुरक्षा प्रदान करता है। प्रभु कहता है, " यदि तुम उसकी बातें मानोगे और मैं जो कुछ कहूंगा, वह सब पूरा करोगे, तो मैं तुम्हारे शत्रुओं का शत्रु और तुम्हारे विरोधियों का विरोधी बनूँगा। मेरा दूत तुम्हारे आगे- आगे चलेगा"। यह हमारे दुश्मनों से सुरक्षा का एक निश्चित तरीका है।

आज का सुसमाचार पाठ बच्चों की सुरक्षा के प्रति हमारे कर्तव्यों के बारे में भी याद दिलाता है। बच्चों के खिलाफ लगातार बढ़ते अपराधों के संदर्भ में यह एक दिव्य अनुस्मारक है।

क्या मुझे अक्सर डर लगता है और क्या मैं अपने आप कों असुरक्षित महसूस करता हूँ? याद रखें - अगर ईश्वर हमारे साथ हैं तो कौन हमारे विरुद्ध हो सकता हैं? हम यह भी सवाल करें - बच्चों और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए मुझे क्या करने की आवश्यकता है?



📚 REFLECTION

God loves us. One way of experiencing that love is through the guardian angels. Today the church celebrates the feast of guardian angels. We all need angels to protect us, and the gospel tells us that we all have one! That’s a matter of great comfort. Today’s gospel passage is the same as yesterday, except for the last verse, which says, “See that you never despise any of these little ones, for I tell you that their angels in heaven are continually in the presence of my Father in heaven”.

God has set his angels to watch over us. It means that God loves us and therefore he provides us his divine protection through the guardian angels. The Lord says, "If you listen carefully to his voice and do all that I say, I shall be enemy to your enemies, foe to your foes. My angel will go before you". This is a sure way of protection from our enemies.

The gospel passage also reminds us about our duties towards the protection of children. In the context of ever-increasing crimes against children this is a divine reminder.

Am I often afraid and do I feel insecure? Remember - if God is with us who can be against us? Let us also ask ourselves - What do I need to do to protect children and their rights?