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05 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

05 अक्टूबर 2020
वर्ष का सत्ताईसवाँ सामान्य सप्ताह, सोमवार

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📒 पहला पाठ :गलातियों 1:6-12

6) मुझे आश्चर्य होता है कि जिसने आप लोगों को मसीह के अनुग्रह द्वारा बुलाया, उसे आप इतना शीघ्र त्याग कर एक दूसरे सुसमाचार के अनुयायी बन गये हैं।

7) दूसरा तो है ही नहीं, किन्तु कुछ लोग आप में अशान्ति उत्पन्न करते और मसीह का सुसमाचार विकृत करना चाहते हैं।

8) लेकिन जो सुसमाचार मैंने आप को सुनाया, यदि कोई- चाहे वह मैं स्वयं या कोई स्वर्गदूत ही क्यों न हो- उस से भिन्न सुसमाचार सुनाये, तो वह अभिशप्त हो!

9) मैं जो कह चुका हूँ, वही दुहराता हूँ- जो सुसमाचार आप को मिला है, यदि कोई उस से भिन्न सुसमाचार सुनाये, तो वह अभिशप्त हो!

10) मैं अब किसका कृपापात्र बनने की कोशिश कर रहा हूँ - मनुष्यों का अथवा ईश्वर का? क्या मैं मनुष्यों को प्रसन्न करना चाहता हूँ? यदि मैं अब तक मनुष्यों को प्रसन्न करना चाहता, तो मैं मसीह का सेवक नहीं होता।

11) भाइयो! मैं आप लोगों को विश्वास दिलाता हूँ कि मैंने जो सुसमाचार सुनाया, वह मनुष्य-रचित नहीं है।

12) मैंने किसी मनुष्य से उसे न तो ग्रहण किया और न सीखा, बल्कि उसे ईसा मसीह ने मुझ पर प्रकट किया।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस 10:25-37

25) किसी दिन एक शास्त्री आया और ईसा की परीक्षा करने के लिए उसने यह पूछा, ’’गुरूवर! अनन्त जीवन का अधिकारी होने के लिए मुझे क्या करना चाहिए?’’

26) ईसा ने उस से कहा, ’’संहिता में क्या लिखा है?’’ तुम उस में क्या पढ़ते हो?’’

27) उसने उत्तर दिया, ’’अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा, अपनी सारी शक्ति और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो और अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो’’।

28) ईसा ने उस से कहा, ’’तुमने ठीक उत्तर दिया। यही करो और तुम जीवन प्राप्त करोगे।’’

29) इस पर उसने अपने प्रश्न की सार्थकता दिखलाने के लिए ईसा से कहा, ’’लेकिन मेरा पड़ोसी कौन है?’’

30) ईसा ने उसे उत्तर दिया, ’’एक मनुष्य येरुसालेम से येरीख़ो जा रहा था और वह डाकुओं के हाथों पड़ गया। उन्होंने उसे लूट लिया, घायल किया और अधमरा छोड़ कर चले गये।

31) संयोग से एक याजक उसी राह से जा रहा था और उसे देख कर कतरा कर चला गया।

32) इसी प्रकार वहाँ एक लेवी आया और उसे देख कर वह भी कतरा कर चला गया।

33) इसके बाद वहाँ एक समारी यात्री आया और उसे देख कर उस को तरस हो आया।

34) वह उसके पास गया और उसने उसके घावों पर तेल और अंगूरी डाल कर पट्टी बाँधी। तब वह उसे अपनी ही सवारी पर बैठा कर एक सराय ले गया और उसने उसकी सेवा शुश्रूषा की।

35) दूसरे दिन उसने दो दीनार निकाल कर मालिक को दिये और उस से कहा, ’आप इसकी सेवा-शुश्रूषा करें। यदि कुछ और ख़र्च हो जाये, तो मैं लौटते समय आप को चुका दूँगा।’

36) तुम्हारी राय में उन तीनों में कौन डाकुओं के हाथों पड़े उस मनुष्य का पड़ोसी निकला?’’

37) उसने उत्तर दिया, ’’वही जिसने उस पर दया की’’। ईसा बोले, ’’जाओ, तुम भी ऐसा करो’’।

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है। हम आज से पहले पाठ के रूप में गलातियों के नाम संत पौलुस का पत्र से सुनते हैं। संत पौलुस का दावा है कि जिस सुसमाचार का उसने प्रचार किया वह कुछ ऐसा था जो उसने येसु मसीह के रहस्योद्घाटन के माध्यम से सीखा था, न कि उसे कोई पुरुषों के द्वारा दिया गया कुछ। इसलिए वह लोगों को इस सुसमाचार को किसी अन्य संदेश में बदलने के बारे में चेतावनी देता है।

आज का सुसमाचार पाठ में यह सवाल है, "मेरा पड़ोसी कौन है?"। यह प्रश्न पूछने में शात्री का उद्देश्य खुद को सही ठहराने का था, न की अपने पडोसी कौन है यह जानना और उसे मदद करना। प्रभु येसु ने उत्तर के रूप में भला सामरी का दृष्टांत सुनाया जिसमें यह बताया गया है कि कैसे कोई व्यक्ति जरूरतमंद लोगों की मदद करने के द्वारा एक अच्छा पड़ोसी बन सकता है।

कलीसिया के धर्म पुरखों ने इस दृष्टांत के पात्रों में इस्राइली जनता को और स्वयं येसु को देखते हैं। पड़ोसियों को प्यार करने से हम येसु को ही प्यार करते हैं। अच्छे पड़ोसी बनकर दूसरों को प्यार करने से हम स्वयं येसु की तरह व्यवहार करते हैं। यही है वह सुसमाचार का मर्म जिसका संत पौलुस ने प्रचार किया था।

येसु कहता है, “जाओ, तुम भी ऐसा ही करो!” हम अपने आपसे पूछें: क्या मैं एक अच्छा पड़ोसी हूँ या नहीं? और एक अच्छा पड़ोसी बनने के लिए मुझे क्या करने की आवस्यकता है?



📚 REFLECTION

God loves us. From today we listen to the letter to the Galatians in the first reading. Paul asserts that the Gospel that he preached was something that he learnt through a revelation of Jesus Christ, not something given to him by men. Therefore he warns people about diluting or replacing it with any other message.

The gospel contains the question, “who is my neighbour?’. The lawyer asked the question to justify himself rather than know and help the neighbour. The parable of the good Samaritan which Jesus gave as an answer ends up showing how one can and need to be a good neighbour - by loving, caring for, and helping those in need.

The Fathers of the Church have seen in this parable the story of Israel and Jesus himself as the good Samaritan. By loving the neighbours in need we are loving Jesus himself. By loving others by becoming good neighbours we are behaving like Jesus himself. This is the undiluted Gospel that Paul was preaching about.

Jesus says, “Go and do the same yourself!” Let us ask ourselves: Am I a good neighbour? What do I need to do to become a good neighbour?

04 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

04 अक्टूबर 2020
वर्ष का सत्ताईसवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार

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📒 पहला पाठ :इसायाह का ग्रन्थ 5:1-7

1) मैं अपने मित्र की दाखबारी के विषय में अपने मित्र को एक गीत सुनाऊँगा। उपजाऊ ढाल पर मेरे मित्र की दाखबारी थी।

2) उसने इसकी ज़मीन खुदवायी, इस में से पत्थर निकाल दिये और इस में बढ़िया दाखलता लगवा दी। उसने इसके बीच में मीनार बनवायी और इस में एक कोल्हू भी खुदवाया। उसे अच्छी फ़सल की आशा थी, किन्तु उसे खट्ठे अंगूर ही मिले।

3) “येरुसालेम के निवासियो! यूदा की प्रजा! अब तुम मेरा तथा मेरी दाख़बारी का न्याय करो।

4) कौन बात ऐसी थी, जो मैं अपने दाखबारी के लिए कर सकता था और जिसे मैंने उसके लिए नहीं किया? मुझे अच्छी फ़सल की आशा थी, उसने खट्ठे अंगूर क्यों पैदा किये?

5) अब, मैं तुम्हें बताऊँगा कि अपनी दाखबारी का क्या करूँगा। मैं उसका बाड़ा हटाऊँगा ओर पशु उस में चरने आयेंगे। मैं उसकी दीवारें ढाऊँगा और लोग उसे पैरों तले रौंदेंगे।

6) वह उजड़ जायेगी; कोई उसे छाँटने या खोदने नहीं आयेगा और उस में झाड़-झंखाड़ उग जायेगा। मैं बादलों को आदेश दूँगा कि वे उस पर पानी नहीं बरसायें।“

7) विश्वमण्डल के प्रभु की यह दाख़बारी इस्राएल का घराना है और इसके प्रिय पौधे यूदा की प्रजा हैं। प्रभु को न्याय की आशा थी और भ्रष्टाचार दिखाई दिया। उसे धर्मिकता की आशा थी और अधर्म के कारण हाहाकार सुनाई पड़ा।

📕 दूसरा पाठ: फ़िलिप्पियों 4:6-9

6) किसी बात की चिन्ता न करें। हर जरू़रत में प्रार्थना करें और विनय तथा धन्यवाद के साथ ईश्वर के सामने अपने निवेदन प्रस्तुत करें

7) और ईश्वर की शान्ति, जो हमारी समझ से परे हैं, आपके हृदयों और विचारों को ईसा मसीह में सुरक्षित रखेगी।

8) भाइयो! अन्त में यह जो कुछ सच है, आदरणीय है; जो कुछ न्यायसंगत है, निर्दोष है; जो कुछ प्रीतिकर है, मनोहर है; जो कुछ उत्तम है, प्रशंसनीय है: ऐसी बातों का मनन किया करें।

9) आप लोगों ने मुझ से जो सीखा, ग्रहण किया, सुना और मुझ में देखा, उसके अनुसार आचरण करें और शान्ति का ईश्वर आप लोगों के साथ रहेगा।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 21:33-44

33) ’’एक दूसरा दृष्टान्त सुनो। किसी भूमिधर ने दाख की बारी लगवायी, उसके चारों ओर घेरा बनवाया, उस में रस का कुण्ड खुदवाया और पक्का मचान बनवाया। तब उसे असामियों को पट्ठे पर दे कर वह परदेश चला गया।

34) फसल का समय आने पर उसने फसल का हिस्सा वसूल करने के लिए असामियों के पास अपने नौकरों को भेजा।

35) किन्तु असामियों ने उसके नौकरों को पकड़ कर उन में से किसी को मारा-पीटा, किसी की हत्या कर दी और किसी को पत्थरों से मार डाला।

36) इसके बाद उसने पहले से अधिक नौकरों को भेजा और असामियों ने उनके साथ भी वैसा ही किया।

37) अन्त में उसने यह सोच कर अपने पुत्र को उनके पास भेजा कि वे मेरे पूत्र का आदर करेंगे।

38) किन्तु पुत्र को देख कर असामियों ने एक दूसरे से कहा, ’यह तो उत्तराधिकारी है। चलो, हम इसे मार डालें और इसकी विरासत पर कब्जा कर लें।’

39) उन्होंने उसे पकड़ लिया और दाखबारी से बाहर निकाल कर मार डाला।

40) जब दाखबारी का स्वामी लौटेगा, तो वह उन असामियों का क्या करेगा?’’

41) उन्होंने ईसा से कहा, ’’वह उन दृष्टों का सर्वनाश करेगा और अपनी दाखबारी का पट्ठा दूसरे असामियों को देगा, जो समय पर फसल का हिस्सा देते रहेंगे’’।

42) ईसा ने उन से कहा, ’’क्या तुम लोगों ने धर्मग्रन्थ में कभी यह नहीं पढा? करीगरों ने जिस पत्थर को बेकार समझ कर निकाल दिया था, वही कोने का पत्थर बन गया है। यह प्रभु का कार्य है। यह हमारी दृष्टि में अपूर्व है।

43) इसलिए मैं तुम लोगों से कहता हूँ- स्वर्ग का राज्य तुम से ले लिया जायेगा और ऐसे राष्ट्रों को दिया जायेगा, जो इसका उचित फल उत्पन्न करेगा।

44) ’’जो इस पत्थर पर गिरेगा, वह चूर-चूर हो जायेगा और जिस पर वह पत्थर गिरेगा, उस को पीस डालेगा।’’

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है।

यह आज के पाठों से स्पष्ट है जिसमें इसराइल के प्रति ईश्वर के प्रेम को दिखाया गया है। पहला पाठ में नबी इसयास दाखबारी के प्रतीक के माध्यम से अपने लोगों के लिए ईश्वर का प्रेम और संरक्षण का वर्णन करता है। ईश्वर ने इसराइल को अपनी निजी प्रजा के में रूप में चुना, उन्हें सभी दुश्मनों से बचाया और उनकी देखभाल चमत्कारिक तरीके से की। आज का अनुवाक्य इस बात का स्मरण दिलाता है - "प्रभु की दाखबारी इस्राएल का घराना है"।

इस तरह के प्यार के बावजूद इस्राएली लोगों ने न्याय और निष्ठा के बजाय ईश्वर की इच्छाओं के खिलफ कुकर्म करते रहे। हम पढ़ते हैं, "उसे अच्छी फसल की आशा थी, किंतु उसे खट्टे अंगूर ही मिले"।

आज का सुसमाचार दाखबारी और असामियों का दृष्टांत का वर्णन है। यह ईश्वर के निरंतर प्रेम और मानव के कृतघ्नता और अपराधों को चित्रित करता है। दाखबारी का दृष्टान्त वास्तव में इज़राइल की कहानी है। यह दिखाता है कि कैसे ईश्वर ने अपने दूतों-नबियों के माध्यम से उनको सिखाना और उनका मार्गदर्शन करना जारी रखा। असामियों का व्यवहार इसराइल का व्यवहार की कहानी है - कैसे उन्होंने ईश्वर के दूतों के साथ बुरा व्यवहार किया और उन्हें मार डाला।

ईश्वर हमसे उम्मीद करता है कि हम उनके बच्चों जैसे फल उत्पन्न करे । जैसा कि येसु ने कहा है, एक वृक्ष अपने फल से पहचाना जाता है। इस बात पर मनन-चिंतन करना अच्छा होगा - "प्रभु की दाखबारी ने कैसे अयोग्य फल पैदा की?" वह इसलिए है की वे अन्य देवताओं के पीछे गए और ईश्वर की आज्ञाओं को त्याग दिया।

इज़राइल की कहानी प्रत्येक विश्वासी की भी कहानी है। पिता ईश्वर ने "संसार की सृष्टि से पहले मसीह में हमको चुना जिससे हम मसीह से संयुक्त होकर उसकी दृष्टि में पवित्र तथा निष्कलंक बने" (इफिसियों १: ४)। वह अपने वचन और संस्कारों से हमारा पोषण करता है और हमारी रक्षा करता है। उन्होंने हम में से प्रत्येक को एक जीवन-मिशन सौंपा है। ईश्वर की इच्छा के अनुसार व्यतीत एक जीवन आध्यात्मिक फलों से पहचाना जाता है।

कलीसिया ईश्वर की दाखबारी होने में आनंद मानती है। साथ ही कलीसिया में आत्मा-मंथन और प्रार्थना के कई कारण है। क्या मुझे एहसास है कि मैं ईश्वर के चुने हुए लोगों का सदस्य हूं? क्या मैं उसकी आज्ञाओं और शिक्षाओं को सुनता हूँ? सुसमाचार सेवकों के साथ मेरा कैसा व्यवहार है? मैं अपने जीवन में क्या फल उत्पन्न करता हुँ? मेरा जीवन-मिशन के प्रति मैं कितना ईमानदार हुँ?

आमीन



📚 REFLECTION

God loves us.

This is clear from today’s readings which show the love of the Lord for Israel. In the first reading prophet Isaiah, through the symbolism of the vineyard, describes the care and concern of God for his people. God chose Israel to be his people, protected them from all their enemies and cared for them in miraculous ways. This is emphasised in the responsorial psalm in which we pray, “the vineyard of the Lord is the house of Israel”.

In spite of such love the people acted against God’s desires by bloodshed and cries of distress instead of justice and integrity. As the passage says, “they yielded wild grapes instead of good ones”.

The gospel narrates the parable of the vineyard and the tenants. It portrays God’s steadfast love and human beings’ ingratitude and transgressions. The parable of the vineyard is in fact the story of Israel. It shows how God continued to teach and guide them through his messengers the prophets. The behaviour of the tenants is the story of Israel’s behaviour - how they did not listen to the prophets, God’s messengers and ill-treated and killed them.

God expects us to produce fruits that befit his children. As Jesus said, a tree is known by its fruits. It is good to ask the question, “How did the vineyard of the Lord produce unworthy fruits?” It is because they went after other gods and abandoned God’s commandments.

The story of Israel is also the story of each believer. Go chose us in Jesus Christ before the foundation of the world to be holy and blameless before him (Ephesian1:4). He continues to nourish and protect us with his word and sacraments. He has entrusted to each one of us a life-mission. A life lived in accordance with the will of God can be identified by the spiritual fruits that it bears.

The Church rejoices in being the vineyard of the lord. At the same time we have cause for much soul-searching and prayer. Do I realize that I am a member of the chosen people of God? Do I listen to his commands and teachings? How do I treat his messengers, who bring the good news to me? What fruits do I produce in my life? How responsible am I towards the life-mission that God has entrusted me?

Amen.


मनन्-चिंतन

‘‘ईश्वर ने संसार से इतना प्यार किया कि उसने उसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उस में विश्वास करता है, उसका सर्वनाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन प्राप्त करे’’(योहन 3:16)। प्रभु येसु अपने कार्य और भेजे जाने के मकसद को अच्छे से जानते थे। ‘‘जिसने मुझे भेजा, उसकी इच्छा पर चलना और उसका कार्य पूरा करना, यही मेरा भोजन है’’(योहन 4:34)। प्रभु येसु ईश्वरीय प्रेम को समझाने, बाँटने और फैलाने का कार्य करते थे। ‘‘जिस प्रकार मैने तुम लोगो को प्यार किया, उसी प्रकार तुम भी एक दूसरे को प्यार करो’’(योहन 13:34)। पिता ईश्वर संसार की सृष्टि के समय से इस पूरे संसार को प्रेम करते आये हैं और उनके प्रेम की पराकाष्ठा प्रभु येसु के आने पर हुई। उस पिता के असीम प्रेम को समझाने के लिए प्रभु येसु ने यह दृष्टांत सुनाया।

हम सब प्रभु के प्रतिरूप बनाये गये हैं ‘‘ईश्वर ने मनुष्य को अपना प्रतिरूप बनाया’’(उत्पत्ति 1:27)। ‘‘ईश्वर प्रेम है और जो प्रेम में दृढ़ रहता है, वह ईश्वर में निवास करता है और ईश्वर उस में’’(1 योहन 4:16)। अर्थात् हम सब प्रेम के प्रतिरूप बनाये गये हैं परन्तु जब जब हम ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध कार्य करते हैं या पाप करते हैं तब हम उनके प्रेम से दूर होते जाते हैं। यह तब होता है जब हम ईश्वर को छोड़ दुनिया के पीछे भागते हैं। ‘‘जो संसार को प्यार करता है, उसमें पिता का प्रेम नहीं’’(1 योहन 2:15)। हम सब सर्वप्रथम प्रभु से प्रेम करने के लिए बनाये गये हैं। ‘‘जो अपने पिता या अपनी माता को मुझ से अधिक प्यार करता है, वह मेरे योग्य नहीं। जो अपने पुत्र या अपनी पुत्री को मुझ से अधिक प्यार करता है, वह मेरे योग्य नही’’(मत्ती 10:37)। और यह संसार के सृष्टि से है। परन्तु मनुष्य इस बात को भूलकर दूसरी ओर कदम बढ़ाने लगा। प्रभु ने इस प्रेम को समझाने के लिए और लोगो को वापस बुलाने के लिए विभिन्न व्यक्तियों, नबियों, प्रभु भक्तों का सहारा लिया जैसे इब्राहीम, मूसा, योशुआ, न्यायकर्ताओं - ओतनीएल, एहूद, शमगर, दबोरा, बाराक, गिदओन, अबीमेलेक और यिफ्तह। परन्तु लोगो ने इनकी नही सुनी। फिर ईश्वर ने नबियों को भेजा - समूएल, इसायाह, यिमियाह, दानिएल, एज़ेकिएल, आमोस, होशुआ, योएल इत्यादि परन्तु लोगो ने इन्हें मारा, पीटा और इनकी नही सुना। अंत में ईश्वर ने स्वयं अपने पुत्र को भेजा परन्तु उन्होंने पुत्र के साथ भी वही व्यवहार किया। ‘‘वह अपने यहाँ आया और उसके अपने लोगों ने उसे नहीं अपनाया’’(योहन 1:11)। अंततः जो अनुग्रह उन लोगों पर था, उनसे ले लिया गया और उन लोगो को दिया गया जो ईश्वर के लिए तत्पर थे और इन अनुग्रह के सही हकदार थे।

ईश्वर ने हम सबको माता के गर्भ में बड़े प्रेम से गढ़ा, हमारा नाम लेकर पुकारा और जो हमारे लिए जरूरी है वह सब हमें प्रदान किया है। यहाँ तक कि हमें बड़े बड़े खतरों से, संकटो से बचाया है जिन्हें हम जानते या नही भी जानते हों। वह हर क्षण हमारे साथ रह कर हमारी रक्षा करता है। ‘‘मै संसार के अंत तक सदा तुम्हारे साथ हूँ’’ (मत्ती 28:20)। प्रभु येसु हमें पिता ईश्वर के साथ मेल कराना चाहते हैं जिससे हम ईश्वर से प्रेम करना सीखें जिसके लिए हम बने हैं। और हम न केवल ईश्वर से प्रेम करें परन्तु उस प्रेम को फैलायें अर्थात् उस प्रेम का सही फल उत्पन्न करें। ‘‘मैंने तुम्हें इसलिए चुना और नियुक्त किया कि तुम जा कर फल उत्पन्न करो .......... मैं तुम लोगों को यह आज्ञा देता हूँ- एक दूसरे को प्यार करो।’’ (योहन 16:17)

जब उन्होने हमारे लिए इतना सब किया है तो वे आशा भी रखते हैं कि हम फल उत्पन्न करें। लेकिन संसार ने क्या किया? संसार ने उसी ज्योति को ठुकरा दिया, उसे नही अपनाया (योहन 1:11)। ‘‘कौन बात ऐसी थी, जो मैं अपनी दाखबारी के लिए कर सकता था और जिसे मैंने उसके लिए नहीं किया? मुझे अच्छी फसल की आशा थी, उसने खट्टे अंगूर क्यों पैदा किये?’’ (इसायाह 5:4) यह बात केवल यहुदियो के लिए ही नही, परन्तु हम मसीहियों के लिए भी बहुत हद तक समान है। कई बार हम अपने मन, वचन और कर्मों से उस ज्योति को ठुकरा देते है।

अगर हम उस प्रेम का सही फल उत्पन्न नही कर पा रहें है तो इसका मतलब हम ईश्वर से पूर्ण रूप से नहीं जुड़े हैं ‘‘मै दाखलता हूँ और तुम डालियाँ हो। जो मुझ में रहता है और मैं जिस में रहता हूँ, वही बहुत फलता है; क्योंकि मुझ से अलग रह कर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।’’ (योहन 15:5)।

बपतिस्मा के द्वारा हम सबको वह अनमोल उपहार मिला है। मसीह का अनुसरण करने का अवसर मिला। परन्तु क्या हम मसीह के समान जीवन व्यतीत करते है? क्या हम उस उपहार का या उस विश्वास का फल उत्पन्न करते हैं? फल उत्पन्न करने का मतलब यहाँ पर प्रभु के वचन के अनुसार कार्य करना है। प्रभु का वचन सशक्त और किसी भी दुधारी तलवार से भी तेज है (इब्रानियों 4:12)। ईश्वर का वचन हमे प्रेम करने, क्षमा करने, दीन बनने, अपना क्रूस उठाने, अपने को छोटा बनाने तथा प्रभु में बने रहने को कहता है। इन सबसे बढ़ कर ईश्वर का वचन हमें ईश्वर को सारे हृदय से, सारे मन, सारी शक्ति से प्रेम करने और अपने पड़ोसियों को अपने समान प्रेम करने को कहता है। परन्तु क्या हम इनका अनुसरण करते है? कई बार हमारे गलत उदाहरण के कारण लोगों का हमसे विश्वास उठ जाता है। इसी कारण महात्मा गांधी ने कहा कि वह ख्रीस्त को पसंद करते हैं लेकिन ख्रीस्तीयों को नहीं, क्योंकि ख्रीस्तीय ख्रीस्त से बिल्कुल अलग हैं। यही कारण है कि हमारे जीवन द्वारा कोई फल उत्पन्न नहीं हो रहा है। आइये हम सब सच्चे ख्रीस्तीय या सच्चे मसीही बने। हम केवल वचनों से ही नहीं परन्तु कर्मों से येसु का अनुसरण करें।

3 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

03 अक्टूबर 2020
वर्ष का छब्बीसवाँ सामान्य सप्ताह, शनिवार

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📒 पहला पाठ : योब 42:1-3,5-6,12-17

1) अय्यूब ने प्रभु को यह उत्तर दिया:

2) मैं जानता हूँ कि तू सर्वशक्तिमान् है और अपनी सब योजनाएँ पूरी कर सकता है।

3) मैंने ऐसी बातों की चर्चा चलायी, जिन्हें मैं नहीं समझता। मैं ऐसे चमत्कारों के विषय में बोला, जो मेरी बुद्धि से परे हैं।

5) मैंने दूसरों से तेरी चर्चा सुनी थी अब मैंने तुझे अपनी आँखों से देखा है।

6) इसलिए मैं धूल और राख में बैठ कर रोते हुए पश्चात्ताप कर रहा हूँ।

12) प्रभु ने अय्यूब के पहले दिनों की अपेक्षा उसके पिछले दिनों को अधिक आशीर्वाद दिया। उसके पास चैदह हज़ार जोड़ियाँ और एक हज़ार गधियाँ थीं।

13) उसके सात पुत्र उत्पन्न हुए और तीन पुत्रियाँ।

14) उसने पहली का नाम ’यमीमा’ रखा दूसरी का ’कसीआ’ और तीसरी का ’केरेनहप्पूक’।

15) देश भर में ऐसी स्त्रियाँ नहीं मिली, जो अय्यूब की पुत्रियों के समान सुन्दर हों। अय्यूब ने उन्हें उनके भाइयों के साथ विरासत का भाग दिया।

16) इसके बाद अय्यूब एक सौ चालीस वर्ष तक जीवित रहा, अपने पुत्र-पौत्रों की चार पीढ़िया देखीं

17) और बहुत बड़ी उमर में संसार से विदा हुआ।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 10:17-24

17) बहत्तर शिष्य सानन्द लौटे और बोले, "प्रभु! आपके नाम के कारण अपदूत भी हमारे अधीन होते हैं"।

18) ईसा ने उन्हें उत्तर दिया, "मैंने शैतान को बिजली की तरह स्वर्ग से गिरते देखा।

19) मैंने तुम्हें साँपों, बिच्छुओं और बैरी की सारी शक्ति को कुचलने का सामर्थ्य दिया है। कुछ भी तुम्हें हानि नहीं पहुँचा सकेगा।

20) लेकिन, इसलिए आनन्दित न हो कि अपदूत तुम्हारे अधीन हैं, बल्कि इसलिए आनन्दित हो कि तुम्हारे नाम स्वर्ग में लिखे हुए हैं।"

21) उसी घड़ी ईसा ने पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो कर आनन्द के आवेश में कहा, "पिता! स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु! मैं तेरी स्तुति करता हूँ, क्योंकि तूने इन सब बातों को ज्ञानियों और समझदारों से छिपा कर निरे बच्चों पर प्रकट किया है। हाँ, पिता, यही तुझे अच्छा लगा

22) मेरे पिता ने मुझे सब कुछ सौंपा है। पिता को छोड़ कर यह कोई भी नहीं जानता कि पुत्र कौन है और पुत्र को छोड़ कर यह कोई नहीं जानता कि पिता कौन है। केवल वही जानता है, जिस पर पुत्र उसे प्रकट करने की कृपा करता है।"

23) तब उन्होंने अपने शिष्यों की ओर मुड़ कर एकान्त में उन से कहा, "धन्य हैं वे आँखें, जो वह देखती हैं जिसे तुम देख रहे हो!

24) क्योंकि मैं तुम से कहता हूँ - तुम जो बातें देख रहे हो, उन्हें कितने ही नबी और राजा देखना चाहते थे, परन्तु उन्होंने उन्हें नहीं देखा और जो बातें तुम सुन रहे हो, वे उन्हें सुनना चाहते थे, परन्तु उन्होंने उन्हें नहीं सुना।"

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है! यह अय्यूब का अनुभव है जिसके बारे में हम आज का पहला पाठ में सुनते हैं। अय्यूब को अपने जीवन की सभी आपदाओं और संघर्षों के अंत में ईश्वर के व्यक्तिगत और गहरा अनुभव होता है। वह कहता है, “मैं ने दूसरों से तेरी चर्चा सुनी थी। अब मैं ने तुझे अपनी आँखों से देखा है” (अय्यूब ४२: ५)। अपने सभी संघर्षों में अय्यूब ने अपने मन को ईश्वर पर स्थिर रखा और ईश्वर ने उसे सौ गुणा पुरस्कृत किया। यह हमें रोमियों 8:28 की याद दिलाती है कि जो लोग प्रभु को प्यार करते हैं और उसके विधान के अनुसार बुलाये गये हैं, ईश्वर उनके कल्याण के लिए सभी बातों में उनकी सहायता करता हैं।

आज के सुसमाचार में हम बहत्तर शिष्यों को उनके मिशन के बाद आनन्दित होते हुए लौटते देखते हैं। वे येसु के नाम में किए हुए प्रभावशाली कार्यों के लिए खुश थे। तथापि येसु उन्हें चेतावनी देता हैं, "इसलिए आनंदित न हो कि अपदूत तुम्हारे अधीन हैं, बल्कि इसलिए आनंदित हो कि तुम्हारे नाम स्वर्ग में लिखे हुए हैं"। यह प्रभु पर हमारा ध्यान केंद्रित करने और उसके साथ रहने की इच्छा पर ध्यान देने का आह्वान है। प्रभु पर ध्यान देने के बजाय अपने काम और अपनी सफलता पर ध्यान केंद्रित करने का प्रलोभन हमेशा होता है। प्रभु हमें अपना बल देता है और ईश्वरीय कार्य के लिए हमें नियुक्त करता है। सोचिये, हम कितने सौभाग्यशाली हैं!

आइए हम अपने आप से पूछें कि हम ईश्वर के मिशन का जवाब कैसे देते हैं। क्या आपको ईश्वर और उसके प्रेम का व्यक्तिगत अनुभव है? ईश्वर को व्यक्तिगत रूप से अनुभव करने का प्रयास करें ताकि आप उस अनुभव और प्रेम को दूसरों को बाँट सकें।



📚 REFLECTION

God loves us. This is the experience of Job, as we hear in the first reading, who at the end of all the disasters and struggles of his life comes to a deep personal experience of God. He says, “I knew you then only from hearsay; but now I have seen you with my own eyes” (Job 42:5). In all his struggles Job kept his mind fixed on God and God rewarded him a hundredfold. We are reminded of Rom 8:28: "We know that in everyt6God works for good with those who love him, who are called according to his purpose."

In today’s gospel we see the seventy-two disciples coming back rejoicing after their mission. They were happy because of the mighty deeds that they were able to perform in the name of Jesus. However, Jesus cautions them, the true source of joy should be because their names are written in heaven. This is a call to focus our attention on the Lord and the desire to be with him. There is always the possible temptation to focus our attention on our work and our success rather than on the Lord. The Lord gives us his power and commissions us for his work. How privileged we are!

Let us ask ourselves how we respond to God’s mission entrusted to us. Do you have a personal experience of God and his love? Seek to experience him personally so that you can communicate that experience and love to others.

02 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

02 अक्टूबर 2020
वर्ष का छब्बीसवाँ सामान्य सप्ताह, शुक्रवार

पवित्र संरक्षक दूतॊ का पर्व

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📒 पहला पाठ : निर्गमन ग्रन्थ 23:20-23

20) मैं एक दूत को तुम्हारे आगे-आगे भेजता हूँ। वह रास्तें में तुम्हारी रक्षा करेगा और तुम्हें उस स्थान ले जायेगा, जिसे मैंने निश्चित किया है।

21) उसका सम्मान करो और उसकी बातें सुनो। उसके विरुद्ध विद्रोह मत करो। वह तुम्हारा अपराध नहीं क्षमा करेगा, क्योंकि उसे मेरी ओर से अधिकार मिला है।

22) यदि तुम उसकी बातें मानोगे, तो मैं तुम्हारे शत्रुओं का शत्रु और तुम्हारे विरोधियों का विरोधी बनूँगा।

23) मेरा दूत तुम्हारे आगे-आगे चलेगा और तुम्हें अमोरियों, हित्तियों, परिज्जियों, कनानियों, हिव्वियों, तथा यबूसियों के देश पहुँचा देगा और मैं उनका सर्वनाश करूँगा।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 18:1-5,10

1) उस समय शिष्य ईसा के पास आ कर बोले, ’’स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा कौन है?’’

2) ईसा ने एक बालक को बुलाया और उसे उनके बीच खड़ा कर

3) कहा, ’’मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- यदि तुम फिर छोटे बालकों-जैसे नहीं बन जाओगे, तो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करोगे।

4) इसलिए जो अपने को इस बालक-जैसा छोटा समझता है, वह स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा है।

5) और जो मेरे नाम पर ऐसे बालक का स्वागत करता है, वह मेरा स्वागत करता है।

10) ’’सावधान रहो, उन नन्हों में एक को भी तुच्छ न समझो। मैं तुम से कहता हूँ- उनके दूत स्वर्ग में निरन्तर मेरे स्वर्गिक पिता के दर्शन करते हैं।

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करता है! इस प्यार का अनुभव करने का एक तरीका संरक्षक दूतों के माध्यम से है। आज कलीसिया संरक्षक स्वर्गदूतों का त्यौहार मनाती है। हम सभी को हमारी रक्षा करने के लिए स्वर्गदूतों की ज़रूरत है, और सुसमाचार हमें बताता है कि हम सभी के पास एक संरक्षक दूत है! यह बहुत ही सुखद बात है। आज का सुसमाचार का पाठ कल का पाठ अधिक अंतिम वाक्य है, जो कहता है, "सावधान रहो, उन नन्हों में एक को भी तुच्छ न समझो। मैं तुमसे कहता हूं - उनके दूत स्वर्ग में निरंतर मेरे स्वर्गिक पिता के दर्शन करते हैं"।

ईश्वर ने हमारी रक्षा के लिए स्वर्गदूतों को नियुक्त किया है। इसका अर्थ है कि ईश्वर हमसे प्यार करता है और इसलिए वह हमें संरक्षक दूतों के माध्यम से अपनी दिव्य सुरक्षा प्रदान करता है। प्रभु कहता है, " यदि तुम उसकी बातें मानोगे और मैं जो कुछ कहूंगा, वह सब पूरा करोगे, तो मैं तुम्हारे शत्रुओं का शत्रु और तुम्हारे विरोधियों का विरोधी बनूँगा। मेरा दूत तुम्हारे आगे- आगे चलेगा"। यह हमारे दुश्मनों से सुरक्षा का एक निश्चित तरीका है।

आज का सुसमाचार पाठ बच्चों की सुरक्षा के प्रति हमारे कर्तव्यों के बारे में भी याद दिलाता है। बच्चों के खिलाफ लगातार बढ़ते अपराधों के संदर्भ में यह एक दिव्य अनुस्मारक है।

क्या मुझे अक्सर डर लगता है और क्या मैं अपने आप कों असुरक्षित महसूस करता हूँ? याद रखें - अगर ईश्वर हमारे साथ हैं तो कौन हमारे विरुद्ध हो सकता हैं? हम यह भी सवाल करें - बच्चों और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए मुझे क्या करने की आवश्यकता है?



📚 REFLECTION

God loves us. One way of experiencing that love is through the guardian angels. Today the church celebrates the feast of guardian angels. We all need angels to protect us, and the gospel tells us that we all have one! That’s a matter of great comfort. Today’s gospel passage is the same as yesterday, except for the last verse, which says, “See that you never despise any of these little ones, for I tell you that their angels in heaven are continually in the presence of my Father in heaven”.

God has set his angels to watch over us. It means that God loves us and therefore he provides us his divine protection through the guardian angels. The Lord says, "If you listen carefully to his voice and do all that I say, I shall be enemy to your enemies, foe to your foes. My angel will go before you". This is a sure way of protection from our enemies.

The gospel passage also reminds us about our duties towards the protection of children. In the context of ever-increasing crimes against children this is a divine reminder.

Am I often afraid and do I feel insecure? Remember - if God is with us who can be against us? Let us also ask ourselves - What do I need to do to protect children and their rights?

01 अक्टूबर का पवित्र वचन

 

01 अक्टूबर 2020
वर्ष का छब्बीसवाँ सामान्य सप्ताह, गुरुवार

बालक येसु की सन्त तेरेसा

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📒 पहला पाठ : इसायाह का ग्रन्थ 66:10-14

10) “येरुसालेम के साथ आनन्द मनाओ। तुम, जो येरुसालेम को प्यार करते हो, उसके कारण उल्लास के गीत गाओ। तुम, जो उसके लिए विलाप करते थे, उसके कारण आनन्दित हो जाओ,

11) जिससे तुम उसकी संतान होने के नाते सान्त्वना का दूध पीते हुए तृप्त हो जाओ और उसकी गोद में बैठ कर उसकी महिमा पर गौरव करो“;

12) क्योंकि प्रभु यह कहता है, “मैं शान्ति को नदी की तरह और राष्ट्रों की महिमा को बाढ़ की तरह येरुसालेम की ओर बहा दूँगा। उसकी सन्तान को गोद में उठाया और घुटनों पर दुलारा जायेगा।

13) जिस तरह माँ अपने पुत्र को दिलासा देती है, उसी तरह मैं तुम्हें सान्त्वना दूँगा। तुम्हें येरुसालेम से दिलासा मिलेगा।“

14) तुम्हारा हृदय यह देख कर आनन्दित हो उठेगा, तुम्हारा हड्डियाँ हरी-भरी घास की तरह लहलहा उठेंगी। प्रभु अपने सेवकों के लिए अपना सामर्थ्य, किंतु अपने शत्रुओं पर अपना क्रोध प्रदर्शित करेगा।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 18:1-5; 10

1) उस समय शिष्य ईसा के पास आ कर बोले, ’’स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा कौन है?’’

2) ईसा ने एक बालक को बुलाया और उसे उनके बीच खड़ा कर

3) कहा, ’’मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- यदि तुम फिर छोटे बालकों-जैसे नहीं बन जाओगे, तो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करोगे।

4) इसलिए जो अपने को इस बालक-जैसा छोटा समझता है, वह स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा है।

📚 मनन-चिंतन

ईश्वर हमसे प्यार करते हैं और चाहते हैं कि हम सभी स्वर्ग में उनके साथ रहें। और वह हमें वहां पहुंचने का एक निश्चित मार्ग देता है, यानी बच्चों जैसा बनना! शिष्यों ने येसु से पूछा, "स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा कौन है?" उन्हें उत्तर देते हुए येसु ने कहा, "मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ, यदि तुम फिर छोटे बालकों-जैसे नहीं बन जाओगे, तो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करोगे। इसलिए जो अपने को इस बालक-जैसा छोटा समझता है, वह स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा है।” इसलिए येसु ने कहा, जैसा कि हम संत मत्ती 19:14 में पढ़ते हैं, “बच्चों को मेरे पास आने दो; उन्हें मेरे पास आने से मत रोको ”।

आज का सुसमाचार का पाठ इसलिए चुना गया है क्योंकि आज बालक येसु की संत थेरेसा का पर्व है, जिसे लिटिल फ्लावर भी कहा जाता है। वह अपने बच्चों की जैसी सादगी और ईश्वर पर निर्भरता के लिए जानी जाती है। यद्यपि वह बहुत कम उम्र में मर गई, अधिक शिक्षा प्राप्त नहीं की और अपने कॉन्वेंट से बाहर नहीं निकली, फिर भी वह कलीसिया की धर्माचार्या के रूप में सम्मानित की जाती है, क्योंकि उसने ईश्वर के महान रहस्यों को समझा और उन्हें दुनिया को सिखाया। वह अपने "छोटे मार्ग" के लिए प्रसिद्द है, जिसका मतलब है छोटे से छोटे कार्यों कों भी बड़े प्रेम के साथ करना। जैसा कि संत पॉल कहते हैं, मानवीय ज्ञान और शक्ति की तुलना में दिव्य मूर्खता और दुर्बलता अधिक विवेकपूर्ण और शक्तिशाली है!

आज के सुसमाचार के प्रकाश में मैं अपने आप को कैसे पाता हूँ? क्या मेरे पास ईश्वर के राज्य में प्रवेश करने के लिए बच्चों-जैसे गुण हैं? मुझे एक बालक की तरह बनने के लिए क्या करने की आवश्यकता है ताकि मैं स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकूँ?



📚 REFLECTION

God loves us and wants all of us to be with him in heaven. And he gives us a sure way to get there. That is, to be like children. Answering the question of the disciples, “who is the greatest in the kingdom of heaven” Jesus said, “I tell you solemnly, unless you change and become like little children you will never enter the kingdom of heaven. And so, the one who makes himself as little as this child is the greatest in the kingdom of heaven”. Therefore Jesus said, as we read in Mt 19:14, “Let children come to me; do not stop them from coming to me”.

Today’s gospel passage is chosen as it is the feast day of St. Terese of Child Jesus, also called the Little Flower. She is known for her child-like simplicity and dependence on God and her Little Way. Though she died at a young age, without much education and not stepping out of her convent, she is honoured by the church as a Doctor of the Church, as one who understood the great mysteries of God and taught them to the world. She is known for her Little Way, which means doing even the smallest things with great love! As St. Paul says, divine foolishness and weakness are greater and stronger than human wisdom and strength!

How do I find myself in the light of today’s gospel? Do I have the child-like qualities to enter into the Kingdom of God? What do I need to do to become like a child so that I may enter the kingdom of heaven?

30 सितंबर का पवित्र वचन

 

30 सितंबर 2020
वर्ष का छब्बीसवाँ सामान्य सप्ताह, बुधवार

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📒 पहला पाठ : अय्यूब (योब) का ग्रन्थ 9:1-12,14-16

1) अय्यूब ने अपने मित्रों से कहा:

2) मैं निश्चित रूप से जानता हूँ कि तुम लोगों का कहना सच है। मनुष्य अपने को ईश्वर के सामने निर्दोष प्रमाणित नहीं कर सकता।

3) यदि वह ईश्वर के साथ बहस करना चाहेगा, तो ईश्वर हजार प्रश्नों में एक का भी उत्तर नहीं देगा।

4) ईश्वर सर्वज्ञ और सर्वशक्मिान् है। कौन मनुष्य उसका सामना करने के बाद जीवित रहा?

5) ईश्वर पर्वतों को अचानक हटाता और अपने क्रोध में उलट देता है।

6) वह पृथ्वी को उसके स्थान से खिसकाता और उसके खम्भों को हिला देता है।

7) वह नक्षत्रों को ढाँकता और उसके आदेश पर सूर्य नहीं दिखाई देता।

8) वह अकेला आकाश ही आकाश फैलाता और समुद्र की लहरों पर चलता है।

9) उसने सप्तर्शि, मृग, कृत्तिका और दक्षिण नक्षत्रों की सृष्टि की है।

10) वह महान् एवं रहस्यमय कार्य सम्पन्न करता और असंख्य चमत्कार दिखाता है।

11) वह मेरे पास आता है और मैं उसे नहीं देखता। वह आगे बढ़ता है और मुझे इसका पता नहीं चलता।

12) जब वह कुछ ले जाता है, तो कौन उसे रोकेगा? कौन उस से कहेगा, ’’तू यह क्या कर रहा है?’’

14) मैं उस को कैसे जवाब दे सकता हूँ? मुझे उस से बहस करने को शब्द कहाँ से मिलेंगे?

15) यदि मेरा पक्ष न्यायसंगत है, तो भी मैं क्या कहूँ? मैं केवल दया-याचना ही कर सकता हूँ?

16) यदि वह मेरी दुहाई का उत्तर देता, तो मुझे विश्वास नहीं होता कि वह मेरी प्रार्थना पर ध्यान देता है।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 09:57-62

57) ईसा अपने शिष्यों के साथ यात्रा कर रहे थे कि रास्ते में ही किसी ने उन से कहा, ’’आप जहाँ कहीं भी जायेंगे, मैं आपके पीछे-पीछे चलूँगा’’।

58) ईसा ने उसे उत्तर दिया, ’’लोमडि़यों की अपनी माँदें हैं और आकाश के पक्षियों के अपने घोंसले, परन्तु मानव पुत्र के लिए सिर रखने को भी अपनी जगह नहीं है’’।

59) उन्होंने किसी दूसरे से कहा, ’’मेरे पीछे चले आओ’’। परन्तु उसने उत्तर दिया, ’’प्रभु! मुझे पहले अपने पिता को दफ़नाने के लिए जाने दीजिए’’।

60) ईसा ने उस से कहा, ’’मुरदों को अपने मुरदे दफनाने दो। तुम जा कर ईश्वर के राज्य का प्रचार करो।’’

61) फिर कोई दूसरा बोला, ’’प्रभु! मैं आपका अनुसरण करूँगा, परन्तु मुझे अपने घर वालों से विदा लेने दीजिए’’।

62) ईसा ने उस से कहा, ’’हल की मूठ पकड़ने के बाद जो मुड़ कर पीछे देखता है, वह ईश्वर के राज्य के योग्य नहीं’’।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में, येसु घोषणा करते हैं कि एक बार उनका अनुसरण करने के लिए हाँ कहने के बाद जो पीछे मुड़कर देखता है वह उनके लिए, ईश्वर के राज्य के लिए उपयुक्त है। किसान का हल चलाते समय पीछे मुड़कर देखना याने यह चेक करना कि उसकी लाईन सीधी है या नहीं अथवा हल कितना गहरा जा रहा है आदि। बुलाहट के सन्दर्भ में पीछे मुड़कर देखने का आशय सबसे पहले तो अपने लक्ष्य याने येसु के अनुसरण से निगाहें हटाकर अपने पुराने सांसारिक जीवन की और लौटना होगा। इसके अलावा इसका आशय, अपने अतीत को देखना या फिर अपनी क्षमता को आंकना होगा। किसान का हल सीधी लाईन में तब चलेगा जब वह आगे देखकर हल चलाएगा पीछे देखकर नहीं। जो भी पीछे छूटजाना है। गया है उसके ख्यालों में रहने से येसु का अनुसरण नहीं होता। येसु जिसे अपना शिष्य हैं उसके अतीत को, अतीत की कड़वी यादों को, बुराई की राहों को वे ठीक करते हैं। हमें उसकी चिंता करने की ज़रूरत नहीं। हमें तो अपनी निगाहे येसु पर लगाकर उनकी राहों पर चलते जाना है। वो जैसा दिशा निर्देश अपने वचनों द्वारा हमें देते हैं उनका पालन करते हुए नित आगे बढ़ते रहना है। तभी हम सच्चे अर्थों में उनके शिष्य कहलायेंगे।



📚 REFLECTION

In today's gospel, Jesus tells us he who decides to follow Him and looks back is not fit for Him, and the kingdom of God. While ploughing the farmer, looks back and checks whether his line is straight or not, or how deep the plow is going. In the context of the call, the intention of looking back, first of all, will be to return to one’s old worldly life and not focusing his eyes on Christ. Apart from this, it means to look at your past or to evaluate your own potential. The plow of the farmer will run in a straight line only when he sees the plow by looking forward and not by looking back. Jesus does not call us by looking at our past. In the Bible we see a God who calls the weak, the sinners and the incapables and He heals their past; He transforms them and makes them capable. So in following Jesus we don’t need to look back and brood over our past. We need to look at Jesus and keep marching with Him on the way of Salvation. Only then will we be called his disciples in a true sense.

29 सितंबर का पवित्र वचन

 

29 सितंबर 2020, मंगलवार
संत मिखाएल, गाब्रिएल और रफाएल - महादूत

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📒 पहला पाठ : दानिएल 7:9-10, 13-14

9) मैं देख ही रहा था कि सिंहासन रख दिये गये और एक वयोवृद्ध व्यक्ति बैठ गया। उसके वस्त्र हिम की तरह उज्जवल थे और उसके सिर के केश निर्मल ऊन की तरह।

10) उसका सिंहासन ज्वालाओं का समूह था और सिहंासन के पहिये धधकती अग्नि। उसके सामने से आग की धारा बह रही थी। सहस्रों उसकी सेवा कर रहे थे। लाखों उसके सामने खड़े थे। न्याय की कार्यवाही प्रारंभ हो रही थी। और पुस्तकें खोल दी गयीं।

13) तब मैंने रात्रि के दृश्य में देखा कि आकाश के बादलों पर मानवपुत्र-जैसा कोई आया। वह वयोवृद्ध के यहाँ पहुँचा और उसके सामने लाया गया।

14) उसे प्रभुत्व, सम्मान तथा राजत्व दिया गया। सभी देश, राष्ट्र और भिन्न-भिन्न भाषा-भाषी उसकी सेवा करेंगे। उसका प्रभुत्व अनन्त है। वह सदा ही बना रहेगा। उसके राज्य का कभी विनाश नहीं होगा।

अथवा - पहला पाठ : प्रकाशना 12:7-12अ

7) तब स्वर्ग में युद्ध छिड़ गया। मिखाएल और उसके दूतों को पंखदार सर्प से लड़ना पड़ा। पंखदार सर्प और उसके दूतों ने उनका सामना किया,

8) किन्तु वे नहीं टिक सके। और स्वर्ग में उनके लिए कोई स्थान नहीं रहा।

9) तब वह विशालकाय पंखदार सर्प वह पुराना सांप, जो इबलीस या शैतान कहलाता और सारे संसार को भटकाता है- अपने दूतों के साथ पृथ्वी पर पटक दिया गया।

10) मैंने स्वर्ग में किसी को ऊँचे स्वर से यह कहते सुना, ’अब हमारे ईश्वर की विजय, सामर्थ्य तथा राजत्व और उसके मसीह का अधिकार प्रकट हुआ है; क्योंकि हमारे भाइयों का वह अभियोक्ता नीचे गिरा दिया गया है, जो दिन-रात ईश्वर के सामने उस पर अभियोग लगाया करता था।

11) "वे मेमने के रक्त और अपने साक्ष्य के द्वारा उस पर विजयी हुए, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन का मोह छोड़ कर मृत्यु का स्वागत किया;

12) "इसलिए स्वर्ग और उसके निवासी आनन्द मनायें। किन्तु धिक्कार तुम्हें, ऐ पृथ्वी और समुद्र! क्योंकि शैतान, यह जान कर कि मेरा थोड़ा समय ही शेष है, तीव्र क्रोध के आवेश में तुम पर उतर आया है।"


सुसमाचार :योहन 1:47-51

47) ईसा ने नथानाएल को अपने पास आते देखा और उसके विषय में कहा, "देखो, यह एक सच्चा इस्राएली है। इस में कोई कपट नहीं।"

48) नथानाएल ने उन से कहा, "आप मुझे कैसे जानते हैं?" ईसा ने उत्तर दिया, "फिलिप द्वारा तुम्हारे बुलाये जाने से पहले ही मैंने तुम को अंजीर के पेड़ के नीचे देखा"।

49) नथानाएल ने उन से कहा, "गुरुवर! आप ईश्वर के पुत्र हैं, आप इस्राएल के राजा हैं"।

50) ईसा ने उत्तर दिया, "मैंने तुम से कहा, मैंने तुम्हें अंजीर के पेड़ के नीचे देखा, इसीलिए तुम विश्वास करते हो। तुम इस से भी महान् चमत्कार देखोगे।"

51) ईसा ने उस से यह भी कहा, "मैं तुम से यह कहता हूँ- तुम स्वर्ग को खुला हुआ और ईश्वर के दूतों को मानव पुत्र के ऊपर उतरते-चढ़ते हुए देखोगे"।

📚 मनन-चिंतन

आज, माता कलीसिया, महादूत मिखाएल, गाब्रिएल और राफ़ाएल का महापर्व मानती है। प्रभु येसु अपने प्रेरितों और बाकी सभी लोगों के लिए, स्वर्गदूतों की उपस्थिति और उनके साथ उनके संबंध के बारे में बताते है।स्वर्गदूत ईश्वर की स्वर्गीय महिमा में हैं, जहां वे निरंतर मानवपुत्र, का बखान करते रहते हैं, वे उसे घेरे हुए हैं और उसकी सेवा में हैं।

स्वर्गदूतों का चढ़ना उतरना पुराने विधान के याकूब की उस घटना की याद दिलाता है, जब वो अपने पूर्वजों के देश की यात्रा कर रहा था और रस्ते में विश्राम करते वक्त उसे स्वप्न में उन्हें स्वर्गदूतों के दर्शन होते हैं जो एक रहस्यमयी में सीढ़ी से "उतरते और चढ़ते" थे , जो धरती से स्वर्ग तक पहुँची थी। हमें दिव्य संचार अथवा संवाद और स्वर्गदूतों की सक्रिय भूमिका के बीच संबंध पर ध्यान देना चाहिए कि किस प्रकार से ईश्वर स्वर्गदूतों इ माध्यम से अपने लोगों के संपर्क सधता है।

यूँ तो पवित्र बाइबल में स्वर्गदूतों के बारे में कई वर्णन है परन्तु मिखाएल, गाब्रिएल और राफ़ाएल अपनी अलग-अलग भूमिकाओं में दिखाई देते हैं; वे सबसे बड़े मिशनों में भेजे जाते हैं अतः वे महादूत अथवा स्वर्गदूतों के राजकुमार कहलाते हैं।

गेब्रियल को धन्य कुंवारी मारिया के पास मसीह की माँ बनने का संचार लेके भेजा गया था। (cf. लूकस 1: 28-30)। माइकल विद्रोही स्वर्गदूतों से लड़ता है जिन्हें स्वर्ग से बाहर निकाल दिया जाता है (cf. प्रकाशना 12)। आज संत मिखाएल सब प्रकार की शैतानी ताकतों के विरुद्ध हमारे आध्यात्मिक युद्ध में हमारे साथ रहकर हमारी ओर से लड़ता है और हमें विजय दिलाता है। राफ़ाएल युवक तोबियस के साथ जाता है, उसकी रक्षा करता है और उसे सलाह देता है, और आखिरकार, अपने पिता तोबित को चंगा करता है।

आज का यह पर्व हमें याद दिलाता है कि स्वर्गदूत ईश्वर की सेवा निरंतर करते हैं पर वे हमारे खातिर ईश्वर की सेवा में लगे हैं। वे समय- समय पर ईश्वर की तरफ से हमारी मदद करते रहते हैं। इस पापमय दुनिया में बुरी आत्माओं, शैतान और उसकी सब प्रकार की बारे का सामना करने के लिए हम अकेले नहीं है. ये स्वर्गदूत हमारे साथ रहते हैं और हमारी आध्यतमिक लड़ाई में हमें सहारा व बल देते हैं।

आइये हम इन स्वर्गदूतों के सहयोग से इस संसार व सांसारिक प्रलोभनों, रोगों व बुराई की अन्य ताकतों को हराकर विजयमान मेमने के सम्मुख असंख्य दूतों व् संतों के साथ ईश्वर की महिमा गाने के काबिल बन जाएँ।



📚 REFLECTION

Today, the mother Church celebrates the Solemnity of the Archangels Michael, Gabriel, and Raphael.The angels are in the heavenly glory of God, where they are constantly praising the Son of Man; they surround Him and serve Him. The ascending of the angels reminds us of the incident of Jacob of the Old Testament when he was traveling to the land of his ancestors and while resting on the road, he had a vision of angels who ascended and descended the ladder which reached from the earth to heaven.

We should pay attention to the connection between divine communication or dialogue and the active role of angels, how God communicates with people through angels.

Although there are many descriptions of angels in the Holy Bible, but Michael, Gabriel, and Raphael appear in important roles; they are sent in the biggest missions, so they are called the archangel or the prince of Angels. Gabriel was sent to the Blessed Virgin Mary carrying a message to become the mother of Christ. (cf. Lucas 1: 28–30). Michael fights rebellious angels who are cast out of heaven (cf. Revelation 12). Today St. Michael continues to fight on our behalf and gives us victory in our spiritual warfare against all kinds of evil forces. Raphael goes with the young man Tobias, protects and advises him, and finally, heals his father, Tobit.

Today's feast reminds us that angels continue to serve God, but they are engaged in serving God for our sake. They help us from time to time on behalf of God. In this sinful world we are not alone to face evil spirits. These angels are with us and support and provide supernatural powers to us in our spiritual battle.


 -Br. Biniush Topno


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