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20 सितंबर का पवित्र वचन

 

20 सितंबर 2020
वर्ष का पच्चीसवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार

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📒 पहला पाठ : इसायाह का ग्रन्थ 55:6-9

6) “जब तक प्रभु मिल सकता है, तब तक उसके पास चली जा। जब तक वह निकट है, तब तक उसकी दुहाई देती रह।

7) पापी अपना मार्ग छोड़ दे और दुष्ट अपने बुरे विचार त्याग दे। वह प्रभु के पास लौट आये और वह उस पर दया करेगा; क्योंकि हमारा ईश्वर दयासागर है।

8) प्रभु यह कहता है- तुम लोगों के विचार मेरे विचार नहीं हैं और मेरे मार्ग तुम लोगों के मार्ग नहीं हैं।

9) जिस तरह आकश पृथ्वी के ऊपर बहुत ऊँचा है, उसी तरह मेरे मार्ग तुम्हारे मार्गों से और मेरे विचार तुम्हारे विचारों से ऊँचे हैं।

दूसरा पाठ : फ़िलिप्पियों के नाम पत्र 1:20c,24,27a

20) मसीह मुझ में महिमान्वित होंगे।

24) किन्तु शरीर में मेरा विद्यमान रहना आप लोगों के लिए अधिक हितकर है।

27) आप लोग एक बात का ध्यान रखें- आपका आचरण मसीह के सुसमाचार के योग्य हो।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 20: 1-16a

1) ’’स्वर्ग का राज्य उस भूमिधर के सदृश है, जो अपनी दाखबारी में मज़दूरों को लगाने के लिए बहुत सबेरे घर से निकला।

2) उसने मज़दूरों के साथ एक दीनार का रोज़ाना तय किया और उन्हें अपनी दाखबारी भेजा।

3) लगभग पहले पहर वह बाहर निकला और उसने दूसरों को चैक में बेकार खड़ा देख कर

4) कहा, ’तुम लोग भी मेरी दाखबारी जाओ, मैं तुम्हें उचित मज़दूरी दे दूँगा’ और वे वहाँ गये।

5) लगभग दूसरे और तीसरे पहर भी उसने बाहर निकल कर ऐसा ही किया।

6) वह एक घण्टा दिन रहे फिर बाहर निकला और वहाँ दूसरों को खड़ा देख कर उन से बोला, ’तुम लोग यहाँ दिन भर क्यों बेकार खड़े हो’

7) उन्होंने उत्तर दिया, ’इसलिए कि किसी ने हमें मज़दूरी में नहीं लगाया’ उसने उन से कहा, ’तुम लोग भी मेरी दाखबारी जाओ।

8) ’’सन्ध्या होने पर दाखबारी के मालिक ने अपने कारिन्दों से कहा, ’मज़दूरों को बुलाओ। बाद में आने वालों से ले कर पहले आने वालों तक, सब को मज़दूरी दे दो’।

9) जब वे मज़दूर आये, जो एक घण्टा दिन रहे काम पर लगाये गये थे, तो उन्हें एक एक दीनार मिला।

10) जब पहले मज़दूर आये, तो वे समझ रहे थे कि हमें अधिक मिलेगा; लेकिन उन्हें भी एक-एक दीनार ही मिला।

11) उसे पाकर वे यह कहते हुए भूमिधर के विरुद्ध भुनभुनाते थे,

12) इन पिछले मज़दूरों ने केवल घण्टे भर काम किया। तब भी आपने इन्हें हमारे बराबर बना दिया, जो दिन भर कठोर परिश्रम करते और धूप सहते रहे।’

13) उसने उन में से एक को यह कहते हुए उत्तर दिया, ’भई! मैं तुम्हारे साथ अन्याय नहीं कर रहा हूँ। क्या तुमने मेरे साथ एक दीनार नहीं तय किया था?

14) अपनी मजदूरी लो और जाओ। मैं इस पिछले मजदूर को भी तुम्हारे जितना देना चाहता हूँ।

15) क्या मैं अपनी इच्छा के अनुसार अपनी सम्पत्ति का उपयोग नहीं कर सकता? तुम मेरी उदारता पर क्यों जलते हो?

16) इस प्रकार जो पिछले हैं, अगले हो जायेंगे।’’

📚 मनन-चिंतन

दाखखबारी में मज़दूरों को काम देने वाले मालिक के दृष्टांत में हम देखते हैं कि वह करीबन शाम के समय काम पर लगे लोगों के प्रति उदारता दिखता है और उन्हें भी उन लोगों के बराबर ही मज़दूरी देता है जो सुबह से काम कर रहे थे। इस पर जो पहले आये थे वे इसपर आपत्ति उठाते हैं। उन्हें मालिक की उदारता अन्यायपूर्ण लगती हैं।

यह दृष्टांत मुझे ऊडाऊ पुत्र के दृष्टांत की याद दिलाता है, जहाँ पर पिता अपने छोटे वाले बेटे के प्रति बड़ी दया व उदारता दिखता है। तब बड़े बेटे को इस पर आपत्ति होती है। इन दृष्टांतों में पहले आये मज़दूर और बड़ा बेटा दोनों धर्मी लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं, और बाद में आये मज़दूर तथा छोटा बेटा पापियों का। दोनों ही दृष्टांतो में पापियों के प्रति मालिक या पिताजी बहुत ही उदारता दिखाते हैं। ऐसी उदारता जिसके वे वास्तव में हकदार नहीं हैं। उन्हें जो मिलना चाहिए था उससे अधिक उन्हें दिया जाता है। उड़ाऊ बेटा यह सोचकर वापस जाता है कि उसका पिता उसे एक नौकर की तरह रख लें। और वे मज़दूर शाम तक चौक पर इसलिए नहीं खड़े थे कि कोई उन्हें पूरी मज़दूरी देकर काम पर लगाए। पर उन्हें उनकी उम्मीद से कहीं ज़्यादा ही मिल जाता है।

यहाँ पर हम ईश्वर के राज्य के मापदंड और दुनिया के मापदंड के बीच एक सपष्ट अंतर पाते हैं। दुनिया की धारणा यह है कि केवल धर्मी ही ईश्वर के प्यार के हकदार हैं। पर बाइबिल का ईश्वर यह स्पष्ट करता है कि उनकी रूचि पापियों में अधिक है। वे कहते हैं - "मैं धर्मियों को नहीं, पापियों को पश्चाताप के लिए बुलाने आया हूँ।" (लूकस 5:32)

हम पर इतनी दया और करुणा दिखने वाला ईश्वर हमारी ज़िन्दगी की शाम होने तक हमारे लौटने का इंतज़ार करता है। और हम सब को वही पुरस्कार देने को तैयार है जिसे उन्होंने याकूब, अब्राहम, मूसा, पेत्रुस, पौलुस, और संत फ्राँसिस असीसी आदि को दिया है। हम बिना वक्त जाया करे हमारे प्रभु के पास लौट आएं और उनकी उदारता से मुक्ति का उपहार प्राप्त करें.



📚 REFLECTION

In the parable of the employer who employs the workers in his vineyard, we see that he shows a lot of generosity to the people, who join the work late at evening hours, and they are given wages equal to those who were working since morning. Those who had worked the whole day object to this. They find the boss's generosity unjust.

This parable reminds me of the parable of the prodigal son, where the father shows great kindness and generosity to his younger son. Then the elder son objected to this. In these parables both the first workers and the elder son represent the righteous, and the workers and the younger son represent the sinners. In both instances, the owner or the father is very generous towards sinners. The prodigal son goes back thinking that his father should keep him as a servant and in the similar way the workers were not standing till evening with the expectation of being haired and paid the full wages at that point of time. But they get much more than they expected.

Here we find a clear distinction between the criteria of the kingdom of God and the criteria of the world. The belief of the world is that only the righteous are entitled to the love of God. But the God of the Bible makes it clear that He is more interested in sinners. He says - "I have come to call the sinners to repentance, not the righteous." (Luke 5:32)

The God, who looks upon us with so much compassion and awaits our return till the evening of our life; and is ready to give the same award to us which He have gave to Jacob, Abraham, Moses, Peter, Paul, and Saint, Augustine and Francis Assisi and all the saints etc. We go back to our Lord without delay and get the gift of salvation from His generosity. Amen.


मनन-चिंतन

ईर्ष्या एवं आपसी प्रतिस्पर्धा की भावना ने अनेक मानवीय त्रासदियों को जन्म दिया है। दूसरों को प्राप्त उपहारों एवं वरदानों के कारण मनुष्य ईर्ष्या की भावना से भर जाता है तथा इस दुर्भावना से प्रेरित उसके सोच विचार उसके पतन का कारण बनते हैं। यह मानवीय स्वाभाव हम हमारे आदि माता-पिता की संतानों में भी पाते हैं। जब ईश्वर ने हाबिल का चढावा स्वीकार किया तो काइन ईर्ष्या से भर गया। ’’प्रभु ने हाबिल पर प्रसन्न होकर उसकी भेंट स्वीकार की, किन्तु उसने काइन और उसकी भेंट को अस्वीकार किया। काइन बहुत कुद्ध हुआ और उसका चेहरा उतर गया।’’ (उत्पत्ति 4:4-5) इस दुर्भावना से प्रेरित होकर उसने हाबिल की हत्या कर दी। ईश्वर द्वारा ठुकराया जाना तथा अपने भाई की भेंट सुग्राहय पाये जाने के कारण काइन बहुत उत्तेजित हो जाता है। ईश्वर ने काइन को यह कहकर समझाने की कोशिश की, ’’तुम क्यों क्रोध करते हो और तुम्हारा चेहरा उतरा हुआ क्यों है? जब तुम भला करोगे, तो प्रसन्न होगे। (उत्पत्ति 4:6-7) हालॅाकि ईश्वर द्वारा काइन का चढावा अस्वीकार करने के लिए हाबिल जिम्मेदार नहीं था, फिर भी काइन ने अपने इस अपमान, ईर्ष्या और क्रोध को हाबिल पर उतारा।

आज के सुसमाचार के दृष्टांत में दाखबारी का स्वामी सबको पूर्वनिश्चित एक समान मजदूरी देता हैं। किन्तु जिन मजदूरों ने पहले पहर से काम किया था जब उन्होंने देखा कि सभी को एक समान मजदूरी दी गयी है तो वे कुडकुडाने लगे। वे समय के अनुपात में मजदूरी चाहते थे जिससे उन्हें दूसरों से ज्यादा मिले या फिर दूसरों को उनसे कम मिले। इस दृष्टांत के माध्यम से येसु ने स्पष्ट कर दिया कि सर्वप्रथम, ईश्वर किसी के साथ अन्याय नहीं करते तथा सभी को उनका हक प्रदान करते हैं। दूसरा, ईश्वर का प्रेम सभी मानवीय गणनाओं से परे है। तीसरा, हमें पाये हुए उपहारों के लिए ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए तथा दूसरों को क्या हो रहा है या मिल रहा है इस बात को आधार बनाकर अपनी खुशी का निर्धारण नहीं करना चाहिए।

लगभग ऐसी ही भावना हम पेत्रुस में भी पाते है। येसु ने पेत्रुस को उनकी रेवड की देखभाल का महान कार्य सौंपा था। ’’मेरी भेडों को चराओ।’’ (देखिए योहन 21:15-17) किन्तु उसके तुरन्त बाद ’’पेत्रुस ने मुड कर उस शिष्य को पीछे-पीछे आते देखा, जिसे ईसा प्यार करते थे...’’। पेत्रुस को योहन का इस प्रकार प्रभु के पीछे खडा होना शायद अच्छा नहीं लगा हो या फिर ईर्ष्या की भावना उत्पन्न हुई होगी इसलिए वे प्रभु से पूछते है, ’’प्रभु! इनका क्या होगा!’’ इस प्रश्न से प्रभु येसु प्रसन्न नहीं होते। इस कारण वे पेत्रुस की बात का उत्तर न देकर उलटा उससे पूछते हैं, ’’यदि मैं चाहता हूँ कि यह मेरे आने तक रह जाये, तो इससे तुम्हें क्या? तुम मेरा अनुसरण करो। (योहन 21:21-22) दूसरों के जीवन पर नज़रे गडाये रखने से हम अपने जीवन के दानों को नज़रअंदाज कर देते हैं। पेत्रुस के साथ भी यही परेशानी थी।

नबी योना ने ईश्वर के निर्देश पर निनीवे के लोगों को पश्चात्ताप का उपदेश दिया। लोगों ने उसके उपदेश पर विश्वास करके घोर पश्चात्ताप किया। इस पर ईश्वर द्रवित हो गये और उन्होंने जिस विपत्ति की धमकी दी थी, उसे उन पर नहीं आने दिया। योना को यह बात बहुत बुरी लगी। प्रभु की इस दया के कारण योना रूठ जाता है क्योंकि ईश्वर ने निनीवे को नष्ट नहीं किया। योना के इस व्यवहार पर ईश्वर योना से पूछते हैं, ’’क्या तुम्हारा क्रोध उचित है?’’ ईश्वर योना को एक कुंडरू लता के द्वारा परिस्थितियों की वास्तविकता समझाते हैं। जब योना तेज धूप में बैठा था तो प्रभु ने उसे आराम पहुँचाने के उद्देष्य से एक कुंडरू लता उगायी। वह लता तुरंत ही उस छप्पर पर फैल गयी जिसके नीचे योना बैठा हुआ था। इससे योना को बहुत आराम पहुँचा। दूसरे दिन एक कीडा लता को काट देता है जिससे वह सूख जाती है। इससे भयंकर गर्मी पडने लगती तथा योना बेहोश हो जाता है। वह बहुत क्रोधित होकर कहता है, ’’जीवित रहने की अपेक्षा मेरे लिए मर जाना कहीं अच्छा है।’’(योना 4:8) ईश्वर योना से कहते हैं, ’’तुम तो उस लता की चिन्ता करते हो। तुमने उसके लिए कोई परिश्रम नहीं किया। तुमने उसे नहीं उगाया। वह एक रात में उग गयी और एक रात में नष्ट हो गयी। तो क्या मैं इस महान् नगर निनीवे की चिन्ता नहीं करूँ? उस में एक लाख बीस हजार से अधिक ऐसे मनुष्य रहते हैं, जो अपने दाहिने तथा बायें हाथ का अंतर नहीं जानते, और असंख्य जानवर भी।’’ (योना 4:10-11) इस प्रकार हम देखते हैं कि योना नबी होकर भी दूसरों के लिए की गयी प्रभु की दया एवं वरदानों पर ईर्ष्या करता था।

उडाऊँ पुत्र के दृष्टांत में जब पिता अपने पुत्र के लौटने पर बडे समारोह का आयोजन करता है तो उसके बडे लडके का दृष्टिकोण भी काइन, पेत्रुस, योना के समान होता है क्योंकि वह कहता है, ’’देखिए, मैं इतने बरसों से आपकी सेवा करता आया हूँ। मैंने कभी आपकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया। फिर भी आपने कभी मुझे बकरी का बच्चा तक नहीं दिया, ताकि मैं अपने मित्रों के साथ आनन्द मनाऊँ। पर जैसे ही आपका यह बेटा आया, जिसने वेश्याओं के पीछे आपकी सम्पत्ति उड़ा दी है, आपने उसके लिए मोटा बछड़ा मार डाला है।’’ (लूकस 15:29-30) बडे लडके को परेशानी तब होती है जब उसके भाई के लिए आनन्द मनाया जा रहा है। इससे उसकी अपने भाई के प्रति ईर्ष्या की दुर्भावना प्रदर्षित होती है।

संत पौलुस इस असमानता को ईश्वर की स्वतंत्रता तथा प्रज्ञा बताते हुये कहते हैं, ’’अरे भई! तुम कौन हो, जो ईश्वर से विवाद करते हो? क्या प्रतिमा अपने गढ़ने वाले से कहती है, ’तुमने मुझे ऐसा क्यों बनाया?’ क्या कुम्हार को यह अधिकार नहीं कि वह मिट्टी के एक ही लौंदे से एक पात्र ऊँचे प्रयोजन के लिए बनाये और दूसरा पात्र साधारण प्रयोजन के लिए? यदि ईश्वर ने अपना क्रोध प्रदर्शित करने तथा अपना सामर्थ्य प्रकट करने के उद्देश्य से बहुत समय तक कोप के उन पात्रों को सहन किया, जो विनाश के लिए तैयार थे, तो कौन आपत्ति कर सकता है? उसने ऐसा इसलिए किया कि वह दया के उन पात्रों पर अपनी महिमा का वैभव प्रकट करना चाहता है, जिन्हें अपने प्रारम्भ से ही उस महिमा के लिए तैयार किया था।’’ (रोमियों 9:20-23)

जब योहन बपतिस्ता के शिष्यों ने उनसे कहा, ‘‘गुरुवर! देखिए, जो यर्दन के उस पार आपके साथ थे और जिनके विषय में आपने साक्ष्य दिया, वह बपतिस्मा देते हैं और सब लोग उनके पास जाते हैं’’। तब योहन इस बात में ईश्वर की प्रज्ञा तथा योजना को समझते हुए कहते हैं, ‘‘मनुष्य को वही प्राप्त हो सकता हे, जो उसे स्वर्ग की ओर से दिया जाये।’’ (योहन 3:26-27) हमें भी जीवन में दूसरों की उन्नति को ईश्वर की योजना का हिस्सा मानकर ईश्वर को इसके लिए धन्यवाद देना चाहिए न कि ईर्ष्या। धर्मग्रंथ हमें सिखाता है कि ईश्वर को यह ईर्ष्या पंसद नहीं है। जैसे कि नबी इसायाह के द्वारा ईश्वर कहते हैं, ’’तुम लोगों के विचार मेरे विचार नहीं हैं और मेरे मार्ग तुम लोगों के मार्ग नहीं हैं। जिस तरह आकश पृथ्वी के ऊपर बहुत ऊँचा है, उसी तरह मेरे मार्ग तुम्हारे मार्गों से और मेरे विचार तुम्हारे विचारों से ऊँचे हैं।’’ (इसायाह 55:8-9) आइये हम भी दूसरों के प्रति अपने जीवन के दृष्टिकोण को बदले तथा उन्हें ईश्वर के विचार के अनुसार ढालें। ऐसा करने से हमारा जीवन भी शांत, सौम्य एवं सरल बन जायेगा।

19 सितंबर का पवित्र वचन

 

19 सितंबर 2020
वर्ष का चौबीसवाँ सामान्य सप्ताह, शनिवार

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📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 15:35-37, 42-49

35) अब कोई प्रश्न पूछ सकता है, "मृतक कैसे जी उठते हैं? वे कौन-सा शरीर ले कर आते हैं?"

36) अरे मूर्ख! तू जो बोता है, वह जब तक नहीं मरता तब तक उस में जीवन नहीं आ जाता।

37) तू जो बोता है, वह बाद में उगने वाला पौधा नहीं, बल्कि निरा दाना है, चाहे वह गेहूँ का हो या दूसरे प्रकार का।

42) मृतकों के पुनरुत्थान के विषय में भी यही बात है। जो बोया जाता है, वह नश्वर है। जो जी उठता है, वह अनश्वर है।

43) जो बोया जाता है, वह दीन-हीन है। जो जी उठता है, वह महिमान्वित है। जो बोया जाता है, वह दुर्बल है। जो जी उठता है, वह शक्तिशाली है।

44) एक प्राकृत शरीर बोया जाता है और एक आध्यात्मिक शरीर जी उठता है। प्राकृत शरीर भी होता है और आध्यात्मिक शरीर भी।

45) धर्मग्रन्थ में लिखा है कि प्रथम मनुष्य आदम जीवन्त प्राणी बन गया और अन्तिम आदम जीवन्तदायक आत्मा।

46) जो पहला है, वह आध्यात्मिक नहीं, बल्कि प्राकृत है। इसके बाद ही आध्यात्मिक आता है।

47) पहला मनुष्य मिट्टी का बना है और पृथ्वी का है, दूसरा स्वर्ग का है।

48) मिट्टी का बना मनुष्य जैसा था, वैसे ही मिट्टी के बने मनुष्य हैं और स्वर्ग का मनुष्य जैसा है, वैसे ही सभी स्वर्गी होंगे;

49) जिस तरह हमने मिट्टी के बने मनुष्य का रूप धारण किया है, उसी तरह हम स्वर्ग के मनुष्य का भी रूप धारण करेंगे।


सुसमाचार :लूकस 8:4-15

4) एक विशाल जनसमूह एकत्र हो रहा था और नगर-नगर से लोग ईसा के पास आ रहे थे। उस समय उन्होंने यह दृष्टान्त सुनाया,

5) "कोई बोने वाला बीज बोने निकला। बोते-बोते कुछ बीज रास्ते के किनारे गिरे। वे पैरों से रौंदे गये और आकाश के पक्षियों ने उन्हें चुग लिया।

6) कुछ बीज पथरीली भूमि पर गिरे। वे उग कर नमी के अभाव में झुलस गये।

7) कुछ बीज काँटों में गिरे। साथ-साथ बढ़ने वाले काँटों ने उन्हें दबा दिया।

8) कुछ बीज अच्छी भूमि पर गिरे। वे उग कर सौ गुना फल लाये।" इतना कहने के बाद वह पुकार कर बोले, "जिसके सुनने के कान हों, वह सुन ले"।

9) शिष्यों ने उन से इस दृष्टान्त का अर्थ पूछा।

10) उन्होंने उन से कहा, "तुम लोगों को ईश्वर के राज्य का भेद जानने का वरदान मिला है। दूसरों को केवल दृष्टान्त मिले, जिससे वे देखते हुए भी नहीं देखें और सुनते हुए भी नहीं समझें।

11) "दृष्टान्त का अर्थ इस प्रकार है। ईश्वर का वचन बीज है।

12) रास्ते के किनारे गिरे हुए बीज वे लोग हैं, जो सुनते हैं, परन्तु कहीं ऐसा न हो कि वे विश्वास करें और मुक्ति प्राप्त कर लें, इसलिए शैतान आ कर उनके हृदय से वचन ले जाता है।

13) चट्टान पर गिरे हुए बीज वे लोग हैं, जो वचन सुनते ही प्रसन्नता से ग्रहण करते हैं, किन्तु जिन में जड़ नहीं है। वे कुछ ही समय तक विश्वास करते हैं और संकट के समय विचलित हो जाते हैं।

14) काँटों में गिरे हुए बीज वे लोग हैं, जो सुनते हैं, परन्तु आगे चल कर वे चिन्ता, धन-सम्पत्ति और जीवन का भोग-विलास से दब जाते हैं और परिपक्वता तक नहीं पहुँच पाते।

15) अच्छी भूमि पर गिरे हुए बीज वे लोग हैं, जो सच्चे और निष्कपट हृदय से वचन सुन कर सुरक्षित रखते और अपने धैर्य के कारण फल लाते हैं।

📚 मनन-चिंतन

यीशु ने आज जो दृष्टांत सुनाया है, उसमे जितना बीज बोया गया वह पूरा का पूरा फल नहीं ला पाता। वास्तव में बीज का एक बड़ा हिस्सा बेकार चला जाता है। केवल कुछ सही मिट्टी पाता है और अच्छी फसल प्रदान करता है। इस बार मालवा क्षेत्र में सोयाबीन की फसल में अफलन की शिकायत बहुत आ रही है और मक्का की फसल में कीड़े लगने की शिकायत। फसल उगाना और अच्छी पैदावार पाना उतना आसान नहीं यह एक चुनौती है । बीज एक कमजोर व नाज़ुक चीज़ होती है; इसके खिलाफ काम करने वाले बहुत सारे तत्व अथवा ताकतें हो सकती हैं। वातावरण हमेशा बीज का समर्थन नहीं करता है। यही हमारे जीवन के बारे में कहा जा सकता है।

बपतिस्मा के समय हमारे दिल में जो विश्वास व वचन का बीज बोया जाता है, वह कमजोर होता है। जिस वातावरण में हम रहते हैं वह हमेशा हमारे विश्वास का समर्थन नहीं करता है। परीक्षा की घडी में हमारा विश्वास डाँवाँडोल हो सकता है। जीवन की चिंताएं और धन का सुख इसे दबा सकते हैं। हमें उस विश्वास के बीज को जो हमें प्राप्त हुआ है, पोषित करने की आवश्यकता है । हमें विश्वास और वचन रूपी बीज के लिए अच्छी मिट्टी प्रदान करने के की जरूरत है। ऐसी अच्छी मिट्टी का एक तत्व प्रार्थना है, हमारी अपनी व्यक्तिगत प्रार्थना और विश्वासियों के समुदाय की प्रार्थना दोनों।

आज का सुसमाचार वचन सुनने और उसे हृदय में उतारने के बारे में बतलाता है। प्रार्थना, विशेष रूप से वचन रुपी बीज को बढ़ने के लिए उचित वातावरण बनाती है। हम प्रार्थनामय जीवन बिताएं और वचन को बढ़ने के लिए उचित वातावरण प्रदान करें।



📚 REFLECTION

All the seed sown in Jesus' parable today does not bring the full fruit. In fact a large part of the seed goes waste. Only some of those which fell on the good soil provide good crops. This year, the soya bean and corn crop has failed in the Malwa region. Growing crops and getting good yields is not an easy task, it is a challenge. The seed is a vulnerable thing; there can be many elements or forces working against it. The environment does not always support seeds.

The same can be said about our lives. The seed of faith and the Word that is sown in our heart at the time of baptism is vulnerable. The environment in which we live does not always support our faith. Our faith in the hour of temptations can be shaken. The worries of life and the pleasures of wealth can suppress it. We need to nurture the seed of faith that we have received. We need to provide good soil for seeds of faith and the Word of God. One element of such good soil is prayer, both personal prayer and the community prayer.

Today's Gospel speaks about hearing the word and bringing it to heart. Prayer, very especially, creates an environment for the seed to grow. Let us lead a prayerful life and provide the right environment for Word to grow inside of us.

18 सितमबर का पवित्र वचन

 

18 सितंबर 2020
वर्ष का चौबीसवाँ सामान्य सप्ताह, शुक्रवार

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📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 15:12-20

12) यदि हमारी शिक्षा यह है कि मसीह मृतकों में से जी उठे, तो आप लोगों में कुछ यह कैसे कहते हैं कि मृतकों का पुनरूत्थान नहीं होता?

13) यदि मृतकों का पुनरूत्थान नहीं होता, तो मसीह भी नहीं जी उठे।

14) यदि मसीह नहीं जी उठे, तो हमारा धर्मप्रचार व्यर्थ है और आप लोगों का विश्वास भी व्यर्थ है।

15) तब हम ने ईश्वर के विषय में मिथ्या साक्ष्य दिया; क्योंकि हमने ईश्वर के विषय में यह साक्ष्य दिया कि उसने मसीह को पुनर्जीवित किया और यदि मृतकों का पुनरूत्थान नहीं होता, तो उसने ऐसा नहीं किया।

16) कारण, यदि मृतकों का पुनरुत्थान नहीं होता, तो मसीह भी नहीं जी उठे।

17) यदि मसीह नहीं जी उठे, तो आप लोगों का विश्वास व्यर्थ है और आप अब तक अपने पापों में फंसे हैं।

18) इतना ही नहीं, जो लोग मसीह में विश्वास करते हुए मरे हैं, उनका भी विनाश हुआ है।

19) यदि मसीह पर हमारा भरोसा इस जीवन तक ही सीमित है, तो हम सब मनुष्यों में सब से अधिक दयनीय हैं।

20) किन्तु मसीह सचमुच मृतकों में से जी उठे। जो लोग मृत्यु में सो गये हैं, उन में वह सब से पहले जी उठे।


सुसमाचार :लूकस 8:1-3

1) इसके बाद ईसा नगर-नगर और गाँव-गाँव घूम कर उपदेश देते और ईश्वर के राज्य का सुसमाचार सुनाते रहे। बारह प्रेरित उनके साथ थे

2) और कुछ नारियाँ भी, जो दुष्ट आत्माओं और रोगों से मुक्त की गयी थीं-मरियम, जिसका उपनाम मगदलेना था और जिस से सात अपदूत निकले थे,

3) हेरोद के कारिन्दा खूसा की पत्नी योहन्ना; सुसन्ना और अनेक अन्य नारियाँ भी, जो अपनी सम्पत्ति से ईसा और उनके शिष्यों की सेवा-परिचर्या करती थीं।

📚 मनन-चिंतन

अपनी सेवकाई की शुरुआत से, येसु अपने लिए शिष्यों का एक समुदाय इकट्ठा करते रहे हैं। आज का सुसमाचार स्पष्ट करता है कि येसु ने इस समुदाय में न केवल पुरुषों, बल्कि महिलाओं को भी शामिल किया। इन गलीली महिलाओं का जिक्र संत लूकस के द्वारा फिर से किया जाएगा जहाँ वे येसु की मृत्यु की गवाह बनते हुए गोलगोथा से कुछ दूरी पर खड़ी होंगी है, फिर वे येसु को दफनाते समय मौजूद रहती हैं और पास्का की सुबह वे कब्र पर प्रभु की लाश का विलेपन करने जाती हैं।

आज के सुसमाचार में यह बतलाया गया है कि इन महिलाओं ने येसु से चंगाई का अनुभव किया था। ईश्वर की कृपा का अपने जीवन में अनुभव कर उन्होंने अपना जीवन उस ईश्वर की सेवा में समर्पित कर दिया। येसु से जो कुछ भी उन्हें मिला था, उसके लिए वे अब उनकी सेवा और शिष्यों की सेवा में समर्पित हो गईं, उन्होंने येसु की सेवकाई में सहयोग हेतु, उनकी तरफ से वे जो कुछ भी दे सकती थी दिया और कर सकती थी किया।

ये नारियां हमारे लिए येसु के शिष्य बनने के लिए एक आदर्श पेश करतीं हैं कि हमें येसु के अनुग्रह को प्राप्त करने के लिए खुद को खोलना तथा उनकी आशीष व कृपा से भरकर उनके लिए उदारता पूर्वक देने को तैयार होना चाहिए। हमने हमारे जीवन में बहुत अनुग्रह पाया है, तो आइये हमें जो कुछ भी मिला है, उसके बदले हम भी देना सीखें । जो कुछ हमें मिला है, उसमे से देने, वालों को येसु आश्वासन देते हैं कि उन्हें और भी अधिक मिलेगा (दो और तुम्हें दिया जायेगा )।



📚 REFLECTION

From the beginning of his ministry, Jesus has been gathering a community of disciples for himself. The gospel of today makes it clear that Jesus included not only men but also women in this community. These Galilean women will be mentioned again by Saint Luke where they will stand at some distance from Golgotha, witnessing the death of Jesus, then present at the time of burial of Jesus and on the morning of Easter Sunday, they will go to embalm the Body of the Lord.

Today's gospel states that these women had experienced healing from Jesus. After experiencing the grace of God in their lives, they dedicated their life to the service of God. For whatever they had received from Jesus, they were now devoted to his service and service to support Jesus’ ministry. They gave, whatever they could give and they did whatever they could do.

These women offer a model for us to become disciples of Jesus that we should be willing to open ourselves to receive the grace of Jesus and be filled with his blessings.

We have found a lot of graces and blessings in our life, so let us also learn to give what we have got. Jesus assures, for those who give in return for what they have received, they will get more (Give and, more will be given to you).

17 सितंबर का पवित्र वचन

 

17 सितंबर 2020
वर्ष का चौबीसवाँ सामान्य सप्ताह, गुरुवार

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📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 15:1-11

1) भाइयो! मैं आप लोगेां को उस सुसमाचार का स्मरण दिलाना चाहता हूँ, जिसका प्रचार मैंने आपके बीच किया, जिसे आपने ग्रहण किया, जिस में आप दृढ बने हुये हैं,

2) और यदि आप उसे उसी रूप में बनाये रखेंगे, जिस रूप में मैंने उसे आप को सुनाया, तो उसके द्वारा आप को मुक्ति मिलेगी। नहीं तो आपका विश्वाश व्यर्थ होगा।

3) मैंने आप लोगों को मुख्य रूप से वही शिक्षा सुनायी, जो मुझे मिली थी और वह इस प्रकार है- मसीह हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए मरे, जैसा कि धर्मग्रन्थ में लिखा है।

4) वह कब्र में रखे गये और तीसरे दिन जी उठे, जैसा कि धर्मग्रन्थ में लिखा है।

5) वह कैफ़स को और बाद में बारहों में दिखाई दिये।

6) फिर वही एक ही समय पाँच सौ से अधिक भाइयों को दिखाई दिये। उन में से अधिकांश आज भी जीवित हैं, यद्यपि कुछ मर गये हैं।

7) बाद में वह याकूब को और फिर सब प्रेरितों को दिखाई दिये।

8) सब के बाद वह मुझे भी, मानों ठीक समय से पीछे जन्में को दिखाई दिये।

9) मैं प्रेरितों में सब से छोटा हूँ। सच पूछिए, तो मैं प्रेरित कहलाने योग्य भी नहीं; क्योंकि मैंने ईश्वर की कलीसिया पर अत्याचार किया है।

10) मैं जो कुछ भी हूँ, ईश्वर की कृपा से हूँ और मुझे उस से जो कृपा मिली, वह व्यर्थ नहीं हुई। मैंने उन सब से अधिक परिश्रम किया है- मैंने नहीं, बल्कि ईश्वर की कृपा ने, जो मुझ में विद्यमान है।

11) ख़ैर, चाहे मैं होऊँ, चाहे वे हों - हम वही शिक्षा देते हैं और उसी पर आप लोगों ने विश्वास किया।


सुसमाचार :लूकस 7:36-50

36) किसी फ़रीसी ने ईसा को अपने यहाँ भोजन करने का निमन्त्रण दिया। वे उस फ़रीसी के घर आ कर भोजन करने बैठे।

37) नगर की एक पापिनी स्त्री को यह पता चला कि ईसा फ़रीसी के यहाँ भोजन कर रहे हैं। वह संगमरमर के पात्र में इत्र ले कर आयी

38) और रोती हुई ईसा के चरणों के पास खड़ी हो गयी। उसके आँसू उनके चरण भिगोने लगे, इसलिए उसने उन्हें अपने केशों से पोंछ लिया और उनके चरणो को चूम-चूम कर उन पर इत्र लगाया।

39) जिस फ़रीसी ने ईसा को निमन्त्रण दिया था, उसने यह देख कर मन-ही-मन कहा, "यदि वह आदमी नबी होता, तो जरूर जाना जाता कि जो स्त्री इसे छू रही है, वह कौन और कैसी है-वह तो पापिनी है"।

40) इस पर ईसा ने उस से कहा, "सिमोन, मुझे तुम से कुछ कहना है"। उसने उत्तर दिया, "गुरूवर! कहिए"।

41) "किसी महाजन के दो कर्जदार थे। एक पाँच सौ दीनार का ऋणी था और दूसरा, पचास का।

42) उनके पास कर्ज अदा करने के लिए कुछ नहीं था, इसलिए महाजन ने दोनों को माफ़ कर दिया। उन दोनों में से कौन उसे अधिक प्यार करेगा?"

43) सिमोन ने उत्तर दिया, "मेरी समझ में तो वही, जिसका अधिक ऋण माफ हुआ"। ईसा ने उस से कहा, "तुम्हारा निर्णय सही है।"।

44) तब उन्होंने उस स्त्री की ओर मुड़ कर सिमोन से कहा, "इस स्त्री को देखते हो? मैं तुम्हारे घर आया, तुमने मुझे पैर धोने के लिए पानी नहीं दिया; पर इसने मेरे पैर अपने आँसुओं से धोये और अपने केशों से पोंछे।

45) तुमने मेरा चुम्बन नहीं किया, परन्तु यह जब से भीतर आयी है, मेरे पैर चूमती रही है।

46) तुमने मेरे सिर में तेल नहीं लगाया, पर इसने मेरे पैरों पर इत्र लगाया है।

47) इसलिए मैं तुम से कहता हूँ, इसके बहुत-से पाप क्षमा हो गये हैं, क्योंकि इसने बहुत प्यार दिखाया है। पर जिसे कम क्षमा किया गया, वह कम प्यार दिखाता है।"

48) तब ईसा ने उस स्त्री से कहा, "तुम्हारे पाप क्षमा हो गये हैं"।

49) साथ भोजन करने वाले मन-ही-मन कहने लगे, "यह कौन है जो पापों को भी क्षमा करता है?"

50) पर ईसा ने उस स्त्री से कहा, "तुम्हारे विश्वास ने तुम्हारा उद्धार किया है। शान्ति प्राप्त कर जाओ।"

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में तीन किरदार हैं,सिमोन जिन्होंने भोजन की मेजबानी की, येसु उनके मेहमान, और एक महिला जिसे किसी ने भी उम्मीद नहीं की थी कि वो वहाँ आये। हम जैसे-जैसे कहानी में आगे बढ़ते हैं, हमें पता चलता है कि मेजबान सिमोन, येसु के प्रति अपना प्रेम दिखाने में असफल या असमर्थ रहता है। जबकि बिन बुलाई मेहमान उस नारी ने येसु को बहुत प्रेम दिखाया। उसने येसु के पैरों को अश्कों से धो कर इत्र से उनका विलापन किया, जिसे सिमोन ने पापी माना। उसने येसु को ऐसा प्यार दिखाया जो कि मेजबान उसे दिखाने में नाकामियाब रहा।

दो देनदारों के दृष्टान्त के माध्यम से येसु, बताते हैं कि उस स्त्री ने येसु को सिमोन की तुलना में अधिक प्रेम क्यों दिखाया। उसने अधिक प्यार दिखाया क्योंकि उसे अधिक क्षमा किया गया था। इस भोजन से पहले उसने येसु से क्षमा का अनुभव किया था और उस पर उसका परिवर्तनकारी प्रभाव पड़ा था। दिव्य प्रेम के इस उपहार के उनके अनुभव ने उन्हें एक प्यार करने वाली नारी बना दिया। इसके विपरीत, सिमोन ने येसु से ईश्वर के क्षमा व प्रेम का अनुभव नहीं किया था, शायद इसलिए कि उसने इसे ज़रूरी ही नहीं समझा।

यह दृष्टांत हमें बतलाता है कि हम सभी को ईश्वर की क्षमा की समान रूप से आवश्यकता है। हम अपने गुनाहों के बोझ को येसु के पास लेकर आएं और उनसे क्षमा की याचना करें। वो हमें माफ़ करेगा और हम पर अपना प्रेम प्रदर्शित करेगा; और उनका यह प्रेम हमारे दिल में इस कदर प्रवाहित होता रहेगा की हम उन्हें और दूसरों को भी प्रेम करने के लिए सदा तत्पर बने रहेंगे।



📚 REFLECTION

There are three characters in today's Gospel, Simon who hosted the meal, Jesus as his guest, and a woman whom no one expected to be there. As we move forward in the story, we learn that the host Simon did not show his love to Jesus, while uninvited guest, the woman whom Simon considered a sinner, showed greater love to Jesus. She washed Jesus’ feet with her tears and wiped with her hair and applied precious perfume. She showed Jesus the love that the host failed to show him.

Through the parable of the two debtors, Jesus explains why the woman showed more love to Jesus than Simon. She showed more love because she was forgiven more. Before this meal she had experienced forgiveness from Jesus and had a transformative effect on her. Her experience of this gift of divine love made her a loving woman. On the contrary, Simon did not experience God's forgiveness and love of Jesus, perhaps because he did not think it necessary.

This illustration tells us that we all need God's forgiveness equally. We should bring the burden of our sins to Jesus and ask for forgiveness from him. He will forgive us and show us his love; and his love will continue to flow in our hearts so much that we will always be ready to love him and others as well.



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16 सितंबर का पवित्र वचन

 

16 सितंबर 2020
वर्ष का चौबीसवाँ सामान्य सप्ताह, बुधवार

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📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 12:31-13:13

12:31) आप लोग उच्चतर वरदानों की अभिलाषा किया करें। मैं अब आप लोगों को सर्वोत्तम मार्ग दिखाता चाहता हूँ।

13:1) मैं भले ही मनुष्यों तथा स्वर्गदूतों की सब भाषाएँ बोलूं; किन्तु यदि मुझ में प्रेम का अभाव है, तो मैं खनखनाता घडि़याल या झनझनाती झाँझ मात्र हूँ।

2) मुझे भले ही भविष्यवाणी का वरदान मिला हो, मैं सभी रहस्य जानता होऊँ, मुझे समस्त ज्ञान प्राप्त हो गया हो, मेरा विश्वास इतना परिपूर्ण हो कि मैं पहाड़ों को हटा सकूँ; किन्तु यदि मुझ में प्रेम का अभाव हैं, तो मैं कुछ भी नहीं हूँ।

3) मैं भले ही अपनी सारी सम्पत्ति दान कर दूँ और अपना शरीर भस्म होने के लिए अर्पित करूँ; किन्तु यदि मुझ में प्रेम का अभाव है, तो इस से मुझे कुछ भी लाभ नहीं।

4) प्रेम सहनशील और दयालु है। प्रेम न तो ईर्ष्या करता है, न डींग मारता, न घमण्ड, करता है।

5) प्रेम अशोभनीय व्यवहार नहीं करता। वह अपना स्वार्थ नहीं खोजता। प्रेम न तो झुंझलाता है और न बुराई का लेखा रखता है।

6) वह दूसरों के पाप से नहीं, बल्कि उनके सदाचरण से प्रसन्न होता है।

7) वह सब-कुछ ढाँक देता है, सब-कुछ पर विश्वास करता है, सब-कुछ की आशा करता है और सब-कुछ सह लेता है।

8) भविष्यवाणियाँ जाती रहेंगी, भाषाएँ मौन हो जायेंगी और ज्ञान मिट जायेगा, किन्तु प्रेम का कभी अन्त नहीं होगा;

9) क्योंकि हमारा ज्ञान तथा हमारी भविष्यवाणियाँ अपूर्ण हैं

10) और जब पूर्णता आ जायेगी, तो जो अपूर्ण है, वह जाता रहेगा।

11) मैं जब बच्चा था, तो बच्चों की तरह बोलता, सोचता और समझता था; किन्तु सयाना हो जाने पर मैंने बचकानी बातें छोड़ दीं।

12) अभी तो हमें आईने में धुँधला-सा दिखाई देता है, परन्तु तब हम आमने-सामने देखेंगे। अभी तो मेरा ज्ञान अपूर्ण है; परन्तु तब मैं उसी तरह पूर्ण रूप से जान जाऊँगा, जिस तरह ईश्वर मुझे जान गया है।

13) अभी तो विश्वास, भरोसा और प्रेम-ये तीनों बने हुए हैं। किन्तु उनमें प्रेम ही सब से महान् हैं।


सुसमाचार :लूकस 7:31-35

31) मैं इस पीढ़ी के लोगों की तुलना किस से करूँ? वे किसके सदृश हैं?

32) वे बाज़ार में बैठे हुए छोकरों के सदृश हैं, जो एक दूसरे को पुकार कर कहते हैं: हमने तुम्हारे लिए बाँसुरी बजायी और तुम नहीं नाचे, हमने विलाप किया और तुम नहीं रोये;

33) क्योंकि योहन बपतिस्ता आया, जो न रोटी खाता और न अंगूरी पीता है और तुम कहते हो-उसे अपदूत लगा है।

34) मानव पुत्र आया, जो खाता-पीता है और तुम कहते हो-देखो, यह आदमी पेटू और पियक्कड़ है, नाकेदारों और पापियों का मित्र है।

35) किन्तु ईश्वर की प्रज्ञा उसकी प्रजा द्वारा सही प्रमाणित हुई है।"

📚 मनन-चिंतन

सुसमाचारों से हमें पता चलता है कि येसु का बच्चों के साथ एक अद्भुत रिश्ता था। जब उनके अपने शिष्य उन्हें उनसे दूर रखने की कोशिश कर रहे थे, तो उन्होंने यह कहते हुए उनका स्वागत किया बच्चों को मेरे पास आने दो। उन्होंने उनके खुलेपन के कारण उन्हें शिष्यों के लिए भी एक शिक्षक के रूप में इंगित किया। याने बच्चों से सिखने को कहा। उन्होंने पूरी तरह से यह घोषणा करते हुए, उनके साथ खुद की पहचान की, कि जो लोग ऐसे बच्चों का स्वागत करते हैं वे उनका स्वागत करते हैं।

आज के सुसमाचार को पढ़ने से पता चलता है कि येसु बाजार में बच्चों के खेलने के प्रति बहुत चौकस थे । कुछ बच्चों के दूसरे बच्चों के खेल में शामिल होने से इनकार करने की घटना उन्हें अपने समय के उन लोगों की याद दिलाती है जिन्होंने योहन बपतिस्ता और स्वयं येसु की बातों और सेवकाई को गंभीरता से नहीं लिया। बच्चों के अंतिम संस्कार के खेलों ने उन्हें योहन की सेवकाई की याद दिला दी, वहीँ उनके नृत्य वाले खेलों ने उन्हें अपनी खुद की सेवकाई की याद दिला दी।

येसु को एक बांसुरी वादक के रूप में सोचना काफी दिलचस्प है जो हमारे लिए नृत्य करने के लिए एक धुन बजाते है। यीशु ईश्वर का संगीत है। उनके संगीत पर नाचने का अर्थ है ईश्वर के दिव्य संगीत याने उनकी मधुर वाणी को अपने दिल और आत्मा में उतारना और और उनके नख्शे कदम पर चलना। आज का सुसमाचार हम सब का आह्वान करता है कि हम ईश्वर के संगीत याने उनकी वाणी को हमारे जीवन में उतरने की अनुमति दें, जिसे येसु हमारे जीवन को संचालित करने और हर एक आत्मा को छूने के लिए हमें प्रदान करते हैं।



📚 REFLECTION

The Gospels reveal that Jesus had a wonderful relationship with children. When his own disciples were trying to keep them away from him, he welcomed them saying let the children come to me. He also pointed them as the teachers for the disciples because of their openness and asked the disciples to learn from them. He identified himself with them, fully declaring that those who welcome such children welcome Him.

Today's gospel shows that Jesus was very attentive to the children's play in the market. The incident of some children refusing to participate in other children's games reminds him of those who did not take the words and ministry of John the Baptist and Jesus himself seriously. Children's funeral games reminded him of John’s ministry, while their dance games reminded him of his own ministry.

It is quite interesting to think of Jesus as a flute player who plays a tune for us to dance. Jesus is the music of God. To dance to his music means to bring the divine music of God, his sweet Word in our heart and soul, and to follow his footsteps. Today's gospel calls upon all of us to allow God's music and his Word, to enter our lives, to direct our lives and lead us to Him.

15 सितंबर का पवित्र वचन

 

मंगलवार, 15 सितम्बर 2020

दुखों की कुँवारी मरियम अनिवार्य स्मृति

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📒 पहला पाठ : इब्रानियों के नाम पत्र 5:7-9

7) मसीह ने इस पृथ्वी पर रहते समय पुकार-पुकार कर और आँसू बहा कर ईश्वर से, जो उन्हें मृत्यु से बचा सकता था, प्रार्थना और अनुनय-विनय की। श्रद्धालुता के कारण उनकी प्रार्थना सुनी गयी।

8) ईश्वर का पुत्र होने पर भी उन्होंने दुःख सह कर आज्ञापालन सीखा।

9 (9-10) वह पूर्ण रूप से सिद्ध बन कर और ईश्वर से मेलखि़सेदेक की तरह प्रधानयाजक की उपाधि प्राप्त कर उन सबों के लिए मुक्ति के स्रोत बन गये, जो उनकी आज्ञाओं का पालन करते हैं।

📙 सुसमाचार : सन्त योहन 19:25-27

25) ईसा की माता, उसकी बहिन, क्लोपस की पत्नि मरियम और मरियम मगदलेना उनके कू्रस के पास खडी थीं।

26) ईसा ने अपनी माता को और उनके पास अपने उस शिष्य को, जिसे वह प्यार करते थे देखा। उन्होंने अपनी माता से कहा, ’’भद्रे! यह आपका पुत्र है’’।

27) इसके बाद उन्होंने उस शिष्य से कहा, ’’यह तुम्हारी माता है’’। उस समय से उस शिष्य ने उसे अपने यहाँ आश्रय दिया।

📚 मनन-चिंतन

कल हमने प्रभु के क्रूस विजय का पर्व मनाया और आज हम दुखित माता मरियम का पर्व मानते हैं, जिनका दुःख येसु के क्रूस से जुड़ा हुआ था। जब हमारे कोई करीबी लोग पीड़ित होते हैं तब हमें भी दुख होता है । जब बच्चे बीमार होते हैं, तो माता-पिता पीड़ा से गुजरते हैं। इसके विपरीत, जब माता-पिता बीमार हो जाते हैं, तो उनके वयस्क बच्चे भावनात्मक रूप से उनके संघर्षों में शामिल हो जाते हैं। येसु की माँ मरियम की पीड़ा और दुख उनके पुत्र के कष्टों और दुखों से जुड़े हुए हैं। आज के सुसमाचार में धर्मी सिमियोन, मरियम के जीवन और उनके पुत्र के जीवन के इस अंतर्संबंध पर प्रकाश डालता है । वह मरियम के बेटे के बारे में कहता है कि वह एक ऐसा चिन्ह है जिसे अस्वीकार कर दिया जायेगा और तुरंत माता मरियम के बारे में कहता है कि एक तलवार उनके हृदय को आघात करेगी ।

माइकल एंजेलो की प्रसिद्ध मूर्ति जिसे पिएता, कहते हैं, जिसमें मरियम, येसु की पवित्र लाश को अपनी गोद में लिए, दिखाई गयी है। इस कलाकारी में येसु के दुख और मृत्यु और माँ मरियम के दुखों के अंतर्कलह की पूर्ण अभिव्यक्ति देखने को मिलती है । येसु के दुखों को सबसे करीबी से मरियम ने ही समझा व अनुभव किया इसलिए जब-जब येसु को दर्द हुआ और पीड़ा हुई, माँ ने उसका अनुभव खुद की रूह और बदन में किया। जैसा कि पहले पाठ में येसु मसीह के बारे में कहा गया है कि उन्होंने पृथ्वी पर रहते समय पुकार-पुकार के और आँसू बहाकर ईश्वर से प्रार्थना और अनुनय विनय की; वही मरियम के बारे में कहा जा सकता है येसु के साथ कलवारी की राहों पर माँ ने भी पुकार-पुकारकर और आँसू बहकर प्रार्थना की। मरियम अपने बेटे के प्रति वफादार थी, भले ही उसके लिए उन्हें येसु की क्रूस पीड़ा में भागीदार होना ही क्यों न पड़ा हों।

येसु के चेले होने के नाते, हम मरियम की ओर अपनी निगाहें करें , जो क्रूस-मार्ग और कलवारी तक येसु के दुखों में सहभागी हुई , वैसे ही हमें भी हमारे जीवन में आने वाले दुखों को मरियम की तरह ईश्वर की योजना जानकर सहर्ष स्वीकार करना चाहिए।



📚 REFLECTION

Yesterday we celebrated the Victory of the Cross and today we celebrate the feast of ‘Our Lady of Sorrows.’ When some of our close people suffer, we also feel sad. When the children are ill, the parents go through suffering. Conversely, when parents become ill, their adult children become emotionally involved in their conflicts. The suffering and sorrows of Mary are associated with the sufferings and sorrows of her son Jesus. In today's gospel the righteous Simeon throws light on this interrelationship of the sorrows of Mary's life and her son's life. He tells of Jesus that he was a symbol that would be rejected and immediately he tells of Mother Mary that a sword would strike her heart.

The famous statue of Michelangelo, called Pieta, depicts Mary, with the holy corpse of Jesus, in her lap. In this artwork, the full expression of the discord of the suffering and death of Jesus and the sufferings of Mother Mary is seen. Mary was the one who understood and experienced the sufferings of Jesus most closely, so whenever Jesus underwent pain, Mother experienced it in her own soul and body. The first reading of today tells us of Jesus, “He offered up prayers and supplications, with loud cries and tears, to the one who was able to save him from death.” (Heb 5:7) The same can be said about Mother Mary who walked along, the road of Calvary, and cried and prayed with tears. Mary was loyal to her son, even if she had to share in the passion and death of Jesus.

As disciples of Jesus, let us look at Mary, who participated in the sufferings of Jesus on the road of Calvary, until his death on the Cross, likewise, we should gladly accept the sufferings of our life, knowing that it is the plan of God for our life, just like Mary did.

14 सितंबर का पवित्र वचन

 

सोमवार, 14 सितम्बर 2020

पवित्र क्रूस का विजयोत्सव : पर्व

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

📒 पहला पाठ : गणना ग्रन्थ 4b-9

4) यात्रा करते-करते लोगों का धैर्य टूट गया

5) और वे यह कहते हुए ईश्वर और मूसा के विरुद्ध भुनभुनाने लगे, ''आप हमें मिस्र देश से निकाल कर यहाँ मरुभूमि में मरने के लिए क्यों ले आये हैं? यहाँ न तो रोटी मिलती है और न पानी। हम इस रूखे-सूखे भोजन से ऊब गये हैं।''

6) प्रभु ने लोगों के बीच विषैले साँप भेजे और उनके दंष से बहुत-से इस्राएली मर गये।

7) तब लोग मूसा के पास आये और बोले, ''हमने पाप किया। हम प्रभु के विरुद्ध और आपके विरुद्ध भुनभुनाये। प्रभु से प्रार्थना कीजिए कि वह हमारे बीच से साँपों को हटा दे।'' मूसा ने जनता के लिए प्रभु से प्रार्थना की

8) और प्रभु ने मूसा से कहा, ''काँसे का साँप बनवाओ और उसे डण्डे पर लगाओ। जो साँप द्वारा काटा गया, वह उसकी ओर दृष्टि डाले और वह अच्छा हो जायेगा।''

9) मूसा ने काँसे का साँप बनवाया और उसे डण्डे पर लगा दिया। जब किसी को साँप काटता था, तो वह काँसे के साँप की ओर दृष्टि डाल कर अच्छा हो जाता था।

📙 सुसमाचार : सन्त योहन 3:13-17

13) मानव पुत्र स्वर्ग से उतरा है। उसके सिवा कोई भी स्वर्ग नहीं पहुँचा।

14) जिस तरह मूसा ने मरुभूमि में साँप को ऊपर उठाया था, उसी तरह मानव पुत्र को भी ऊपर उठाया जाना है,

15) जिससे जो उस में विश्वास करता है, वह अनन्त जीवन प्राप्त करे।’’

16) ईश्वर ने संसार को इतना प्यार किया कि उसने इसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उस में विश्वास करता हे, उसका सर्वनाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन प्राप्त करे।

17) ईश्वर ने अपने पुत्र को संसार मं इसलिए नहीं भेजा कि वह संसार को दोषी ठहराये। उसने उसे इसलिए भेजा कि संसार उसके द्वारा मुक्ति प्राप्त करे।

📚 मनन-चिंतन

सम्राट कॉन्स्टेंटाइन की मां, संत हेलेना द्वारा येसु के वास्तविक क्रूस के अवशेषों की खोज 14 सितंबर, 320 को की गई। उस घटना का वार्षिक स्मरणोत्सव तब से मनाया जाता आ रहा है। येसु के समय में 'क्रूस की विजय' इस अभिव्यक्ति का शायद ही कुछ अर्थ कोई समझ पता होगा। क्योंकि क्रूस पर मौत किसी की महिमा अथवा सम्मान, को नहीं दर्शाता अपितु इसके विपरीत क्रूस पर मृत्यु सबसे शर्मनाक मौत थी, यह तो महिमा, सम्मान और प्रतिष्ठा की पूर्ण अनुपस्थिति थी। पर जो पर्व आज हम मना रहे हैं वह यही है 'क्रूस की विजय का पर्व।' येसु, सूली पर चढ़ाए गए, और विजय हुए। यह घृणा पर प्रेम की विजय थी।

जैसा कि संत योहन आज के सुसमाचार में बताते हैं - ईश्वर ने संसार को इतना प्यार किया कि उसने इसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उस में विश्वास करता हे, उसका सर्वनाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन प्राप्त करे। यीशु ने अपने वचनो और कार्यों के द्वारा ईश्वर के प्रेम का खुलासा किया, और इस प्रेम को उन्होंने पूरी तरह से क्रूस पर प्रकट किया। संत योहन कहते हैं कि क्रूस पर येसु ने ईश्वर की महिमा को प्रकट किया। सच्चा प्रेम हमेशा जीवन देने वाला होता है और यही ईश्वर के प्रेम की विशेषता है।

घृणा पर प्रेम की विजय होने के साथ-साथ, यीशु का क्रूस-मरण जीवन की विजय है। येसु को सबसे क्रूर तरीके से मारा गया, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद वे एक नए जीवन में प्रवेश करते हैं और अपने पुनरुत्थान द्वारा हम सबों को जीवन प्रदान करते हैं। संत योहन के सुसमाचार में येसु की बगल से बहने वाला रक्त और जल हमें उस जीवन के बारे में बताता है जो येसु की मृत्यु के दौरान बहता है और हमें अनंत जीवन देता है। विभिन्न कलाकारों ने क्रूस को जीवन के वृक्ष के रूप में दर्शाया है । क्रूस की विजय, जो ईश्वर की विजय है और येसु की शैतान और बुराई और मृत्यु की सभी शक्तियों पर विजय है, यही एक विजय है,जिसमें हम सभी भागिदार हैं। येसु ने क्रूस पर से हम सभी को परमेश्वर के प्रेम और जीवन की ओर खींचा है । जैसा कि वह योहन के सुसमाचार में कहते हैं - और मैं, जब पृथ्वी के ऊँपर उठाया जाऊँगा तो सब मनुष्यों को अपनी ओर आकर्षित करूँगा।

हम इस व विजयमान क्रूस को गले लगाएं और हमारी मुक्ति के इस साधन की आध्यात्मिकता को आत्मसात करें और अपना निजी क्रूस उठाकर येसु का अनुसरण करें।



📚 REFLECTION

On September 14, 320, the relics of the real cross of Jesus were discovered by Saint Helena, the mother of Emperor Constantine. The annual commemoration of that event has been celebrated since then, as the Feast of the Exaltation of the Cross or the victory or the triumph of the Holy Cross. In Jesus' time, the expression 'Victory of the Cross' hardly could make any sense, because death on the cross does not signify one's glory or honor, but on the contrary death on the cross was the most shameful death, it was a complete absence of glory, honor and dignity. But the feast, we are celebrating today is the feat of the Victory of the Cross.' Jesus was crucified, and he conquered: It was the victory of love over hatred.

As St. John says in today's gospel - “For God so loved the world that he gave his only Son, so that everyone who believes in him may not perish but may have eternal life.” Jesus revealed the love of God through his words and actions, and he fully revealed this love on the cross. St. John says that Jesus revealed the glory of God on the cross. True love is always life-giving and this is the specialty of God's love. Along with the triumph of love over hatred, Jesus' death on the Cross is the triumph of life. Jesus is killed in the cruelest way, but after his death he enters a new life and through his resurrection gives life to all of us. The blood and water flowing from the side of Jesus in the Gospel of St. John tells us about the life that flows during the death of Jess and gives us eternal life. Various artists have depicted the cross as a tree of life. The victory of the Cross is the victory of God, over Satan and all the forces of evil and death. From the Cross, Jesus has drawn all of us to the love and life of God, as he says in the Gospel of John – “When I am lifted up from the earth, will draw all people to myself.” (Jn12:32) Let us embrace this victorious Cross and imbibe the spirituality of this instrument of our salvation and follow Jesus by taking up our personal cross.