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17 सितंबर का पवित्र वचन

 

17 सितंबर 2020
वर्ष का चौबीसवाँ सामान्य सप्ताह, गुरुवार

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📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 15:1-11

1) भाइयो! मैं आप लोगेां को उस सुसमाचार का स्मरण दिलाना चाहता हूँ, जिसका प्रचार मैंने आपके बीच किया, जिसे आपने ग्रहण किया, जिस में आप दृढ बने हुये हैं,

2) और यदि आप उसे उसी रूप में बनाये रखेंगे, जिस रूप में मैंने उसे आप को सुनाया, तो उसके द्वारा आप को मुक्ति मिलेगी। नहीं तो आपका विश्वाश व्यर्थ होगा।

3) मैंने आप लोगों को मुख्य रूप से वही शिक्षा सुनायी, जो मुझे मिली थी और वह इस प्रकार है- मसीह हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए मरे, जैसा कि धर्मग्रन्थ में लिखा है।

4) वह कब्र में रखे गये और तीसरे दिन जी उठे, जैसा कि धर्मग्रन्थ में लिखा है।

5) वह कैफ़स को और बाद में बारहों में दिखाई दिये।

6) फिर वही एक ही समय पाँच सौ से अधिक भाइयों को दिखाई दिये। उन में से अधिकांश आज भी जीवित हैं, यद्यपि कुछ मर गये हैं।

7) बाद में वह याकूब को और फिर सब प्रेरितों को दिखाई दिये।

8) सब के बाद वह मुझे भी, मानों ठीक समय से पीछे जन्में को दिखाई दिये।

9) मैं प्रेरितों में सब से छोटा हूँ। सच पूछिए, तो मैं प्रेरित कहलाने योग्य भी नहीं; क्योंकि मैंने ईश्वर की कलीसिया पर अत्याचार किया है।

10) मैं जो कुछ भी हूँ, ईश्वर की कृपा से हूँ और मुझे उस से जो कृपा मिली, वह व्यर्थ नहीं हुई। मैंने उन सब से अधिक परिश्रम किया है- मैंने नहीं, बल्कि ईश्वर की कृपा ने, जो मुझ में विद्यमान है।

11) ख़ैर, चाहे मैं होऊँ, चाहे वे हों - हम वही शिक्षा देते हैं और उसी पर आप लोगों ने विश्वास किया।


सुसमाचार :लूकस 7:36-50

36) किसी फ़रीसी ने ईसा को अपने यहाँ भोजन करने का निमन्त्रण दिया। वे उस फ़रीसी के घर आ कर भोजन करने बैठे।

37) नगर की एक पापिनी स्त्री को यह पता चला कि ईसा फ़रीसी के यहाँ भोजन कर रहे हैं। वह संगमरमर के पात्र में इत्र ले कर आयी

38) और रोती हुई ईसा के चरणों के पास खड़ी हो गयी। उसके आँसू उनके चरण भिगोने लगे, इसलिए उसने उन्हें अपने केशों से पोंछ लिया और उनके चरणो को चूम-चूम कर उन पर इत्र लगाया।

39) जिस फ़रीसी ने ईसा को निमन्त्रण दिया था, उसने यह देख कर मन-ही-मन कहा, "यदि वह आदमी नबी होता, तो जरूर जाना जाता कि जो स्त्री इसे छू रही है, वह कौन और कैसी है-वह तो पापिनी है"।

40) इस पर ईसा ने उस से कहा, "सिमोन, मुझे तुम से कुछ कहना है"। उसने उत्तर दिया, "गुरूवर! कहिए"।

41) "किसी महाजन के दो कर्जदार थे। एक पाँच सौ दीनार का ऋणी था और दूसरा, पचास का।

42) उनके पास कर्ज अदा करने के लिए कुछ नहीं था, इसलिए महाजन ने दोनों को माफ़ कर दिया। उन दोनों में से कौन उसे अधिक प्यार करेगा?"

43) सिमोन ने उत्तर दिया, "मेरी समझ में तो वही, जिसका अधिक ऋण माफ हुआ"। ईसा ने उस से कहा, "तुम्हारा निर्णय सही है।"।

44) तब उन्होंने उस स्त्री की ओर मुड़ कर सिमोन से कहा, "इस स्त्री को देखते हो? मैं तुम्हारे घर आया, तुमने मुझे पैर धोने के लिए पानी नहीं दिया; पर इसने मेरे पैर अपने आँसुओं से धोये और अपने केशों से पोंछे।

45) तुमने मेरा चुम्बन नहीं किया, परन्तु यह जब से भीतर आयी है, मेरे पैर चूमती रही है।

46) तुमने मेरे सिर में तेल नहीं लगाया, पर इसने मेरे पैरों पर इत्र लगाया है।

47) इसलिए मैं तुम से कहता हूँ, इसके बहुत-से पाप क्षमा हो गये हैं, क्योंकि इसने बहुत प्यार दिखाया है। पर जिसे कम क्षमा किया गया, वह कम प्यार दिखाता है।"

48) तब ईसा ने उस स्त्री से कहा, "तुम्हारे पाप क्षमा हो गये हैं"।

49) साथ भोजन करने वाले मन-ही-मन कहने लगे, "यह कौन है जो पापों को भी क्षमा करता है?"

50) पर ईसा ने उस स्त्री से कहा, "तुम्हारे विश्वास ने तुम्हारा उद्धार किया है। शान्ति प्राप्त कर जाओ।"

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में तीन किरदार हैं,सिमोन जिन्होंने भोजन की मेजबानी की, येसु उनके मेहमान, और एक महिला जिसे किसी ने भी उम्मीद नहीं की थी कि वो वहाँ आये। हम जैसे-जैसे कहानी में आगे बढ़ते हैं, हमें पता चलता है कि मेजबान सिमोन, येसु के प्रति अपना प्रेम दिखाने में असफल या असमर्थ रहता है। जबकि बिन बुलाई मेहमान उस नारी ने येसु को बहुत प्रेम दिखाया। उसने येसु के पैरों को अश्कों से धो कर इत्र से उनका विलापन किया, जिसे सिमोन ने पापी माना। उसने येसु को ऐसा प्यार दिखाया जो कि मेजबान उसे दिखाने में नाकामियाब रहा।

दो देनदारों के दृष्टान्त के माध्यम से येसु, बताते हैं कि उस स्त्री ने येसु को सिमोन की तुलना में अधिक प्रेम क्यों दिखाया। उसने अधिक प्यार दिखाया क्योंकि उसे अधिक क्षमा किया गया था। इस भोजन से पहले उसने येसु से क्षमा का अनुभव किया था और उस पर उसका परिवर्तनकारी प्रभाव पड़ा था। दिव्य प्रेम के इस उपहार के उनके अनुभव ने उन्हें एक प्यार करने वाली नारी बना दिया। इसके विपरीत, सिमोन ने येसु से ईश्वर के क्षमा व प्रेम का अनुभव नहीं किया था, शायद इसलिए कि उसने इसे ज़रूरी ही नहीं समझा।

यह दृष्टांत हमें बतलाता है कि हम सभी को ईश्वर की क्षमा की समान रूप से आवश्यकता है। हम अपने गुनाहों के बोझ को येसु के पास लेकर आएं और उनसे क्षमा की याचना करें। वो हमें माफ़ करेगा और हम पर अपना प्रेम प्रदर्शित करेगा; और उनका यह प्रेम हमारे दिल में इस कदर प्रवाहित होता रहेगा की हम उन्हें और दूसरों को भी प्रेम करने के लिए सदा तत्पर बने रहेंगे।



📚 REFLECTION

There are three characters in today's Gospel, Simon who hosted the meal, Jesus as his guest, and a woman whom no one expected to be there. As we move forward in the story, we learn that the host Simon did not show his love to Jesus, while uninvited guest, the woman whom Simon considered a sinner, showed greater love to Jesus. She washed Jesus’ feet with her tears and wiped with her hair and applied precious perfume. She showed Jesus the love that the host failed to show him.

Through the parable of the two debtors, Jesus explains why the woman showed more love to Jesus than Simon. She showed more love because she was forgiven more. Before this meal she had experienced forgiveness from Jesus and had a transformative effect on her. Her experience of this gift of divine love made her a loving woman. On the contrary, Simon did not experience God's forgiveness and love of Jesus, perhaps because he did not think it necessary.

This illustration tells us that we all need God's forgiveness equally. We should bring the burden of our sins to Jesus and ask for forgiveness from him. He will forgive us and show us his love; and his love will continue to flow in our hearts so much that we will always be ready to love him and others as well.



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16 सितंबर का पवित्र वचन

 

16 सितंबर 2020
वर्ष का चौबीसवाँ सामान्य सप्ताह, बुधवार

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📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 12:31-13:13

12:31) आप लोग उच्चतर वरदानों की अभिलाषा किया करें। मैं अब आप लोगों को सर्वोत्तम मार्ग दिखाता चाहता हूँ।

13:1) मैं भले ही मनुष्यों तथा स्वर्गदूतों की सब भाषाएँ बोलूं; किन्तु यदि मुझ में प्रेम का अभाव है, तो मैं खनखनाता घडि़याल या झनझनाती झाँझ मात्र हूँ।

2) मुझे भले ही भविष्यवाणी का वरदान मिला हो, मैं सभी रहस्य जानता होऊँ, मुझे समस्त ज्ञान प्राप्त हो गया हो, मेरा विश्वास इतना परिपूर्ण हो कि मैं पहाड़ों को हटा सकूँ; किन्तु यदि मुझ में प्रेम का अभाव हैं, तो मैं कुछ भी नहीं हूँ।

3) मैं भले ही अपनी सारी सम्पत्ति दान कर दूँ और अपना शरीर भस्म होने के लिए अर्पित करूँ; किन्तु यदि मुझ में प्रेम का अभाव है, तो इस से मुझे कुछ भी लाभ नहीं।

4) प्रेम सहनशील और दयालु है। प्रेम न तो ईर्ष्या करता है, न डींग मारता, न घमण्ड, करता है।

5) प्रेम अशोभनीय व्यवहार नहीं करता। वह अपना स्वार्थ नहीं खोजता। प्रेम न तो झुंझलाता है और न बुराई का लेखा रखता है।

6) वह दूसरों के पाप से नहीं, बल्कि उनके सदाचरण से प्रसन्न होता है।

7) वह सब-कुछ ढाँक देता है, सब-कुछ पर विश्वास करता है, सब-कुछ की आशा करता है और सब-कुछ सह लेता है।

8) भविष्यवाणियाँ जाती रहेंगी, भाषाएँ मौन हो जायेंगी और ज्ञान मिट जायेगा, किन्तु प्रेम का कभी अन्त नहीं होगा;

9) क्योंकि हमारा ज्ञान तथा हमारी भविष्यवाणियाँ अपूर्ण हैं

10) और जब पूर्णता आ जायेगी, तो जो अपूर्ण है, वह जाता रहेगा।

11) मैं जब बच्चा था, तो बच्चों की तरह बोलता, सोचता और समझता था; किन्तु सयाना हो जाने पर मैंने बचकानी बातें छोड़ दीं।

12) अभी तो हमें आईने में धुँधला-सा दिखाई देता है, परन्तु तब हम आमने-सामने देखेंगे। अभी तो मेरा ज्ञान अपूर्ण है; परन्तु तब मैं उसी तरह पूर्ण रूप से जान जाऊँगा, जिस तरह ईश्वर मुझे जान गया है।

13) अभी तो विश्वास, भरोसा और प्रेम-ये तीनों बने हुए हैं। किन्तु उनमें प्रेम ही सब से महान् हैं।


सुसमाचार :लूकस 7:31-35

31) मैं इस पीढ़ी के लोगों की तुलना किस से करूँ? वे किसके सदृश हैं?

32) वे बाज़ार में बैठे हुए छोकरों के सदृश हैं, जो एक दूसरे को पुकार कर कहते हैं: हमने तुम्हारे लिए बाँसुरी बजायी और तुम नहीं नाचे, हमने विलाप किया और तुम नहीं रोये;

33) क्योंकि योहन बपतिस्ता आया, जो न रोटी खाता और न अंगूरी पीता है और तुम कहते हो-उसे अपदूत लगा है।

34) मानव पुत्र आया, जो खाता-पीता है और तुम कहते हो-देखो, यह आदमी पेटू और पियक्कड़ है, नाकेदारों और पापियों का मित्र है।

35) किन्तु ईश्वर की प्रज्ञा उसकी प्रजा द्वारा सही प्रमाणित हुई है।"

📚 मनन-चिंतन

सुसमाचारों से हमें पता चलता है कि येसु का बच्चों के साथ एक अद्भुत रिश्ता था। जब उनके अपने शिष्य उन्हें उनसे दूर रखने की कोशिश कर रहे थे, तो उन्होंने यह कहते हुए उनका स्वागत किया बच्चों को मेरे पास आने दो। उन्होंने उनके खुलेपन के कारण उन्हें शिष्यों के लिए भी एक शिक्षक के रूप में इंगित किया। याने बच्चों से सिखने को कहा। उन्होंने पूरी तरह से यह घोषणा करते हुए, उनके साथ खुद की पहचान की, कि जो लोग ऐसे बच्चों का स्वागत करते हैं वे उनका स्वागत करते हैं।

आज के सुसमाचार को पढ़ने से पता चलता है कि येसु बाजार में बच्चों के खेलने के प्रति बहुत चौकस थे । कुछ बच्चों के दूसरे बच्चों के खेल में शामिल होने से इनकार करने की घटना उन्हें अपने समय के उन लोगों की याद दिलाती है जिन्होंने योहन बपतिस्ता और स्वयं येसु की बातों और सेवकाई को गंभीरता से नहीं लिया। बच्चों के अंतिम संस्कार के खेलों ने उन्हें योहन की सेवकाई की याद दिला दी, वहीँ उनके नृत्य वाले खेलों ने उन्हें अपनी खुद की सेवकाई की याद दिला दी।

येसु को एक बांसुरी वादक के रूप में सोचना काफी दिलचस्प है जो हमारे लिए नृत्य करने के लिए एक धुन बजाते है। यीशु ईश्वर का संगीत है। उनके संगीत पर नाचने का अर्थ है ईश्वर के दिव्य संगीत याने उनकी मधुर वाणी को अपने दिल और आत्मा में उतारना और और उनके नख्शे कदम पर चलना। आज का सुसमाचार हम सब का आह्वान करता है कि हम ईश्वर के संगीत याने उनकी वाणी को हमारे जीवन में उतरने की अनुमति दें, जिसे येसु हमारे जीवन को संचालित करने और हर एक आत्मा को छूने के लिए हमें प्रदान करते हैं।



📚 REFLECTION

The Gospels reveal that Jesus had a wonderful relationship with children. When his own disciples were trying to keep them away from him, he welcomed them saying let the children come to me. He also pointed them as the teachers for the disciples because of their openness and asked the disciples to learn from them. He identified himself with them, fully declaring that those who welcome such children welcome Him.

Today's gospel shows that Jesus was very attentive to the children's play in the market. The incident of some children refusing to participate in other children's games reminds him of those who did not take the words and ministry of John the Baptist and Jesus himself seriously. Children's funeral games reminded him of John’s ministry, while their dance games reminded him of his own ministry.

It is quite interesting to think of Jesus as a flute player who plays a tune for us to dance. Jesus is the music of God. To dance to his music means to bring the divine music of God, his sweet Word in our heart and soul, and to follow his footsteps. Today's gospel calls upon all of us to allow God's music and his Word, to enter our lives, to direct our lives and lead us to Him.

15 सितंबर का पवित्र वचन

 

मंगलवार, 15 सितम्बर 2020

दुखों की कुँवारी मरियम अनिवार्य स्मृति

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📒 पहला पाठ : इब्रानियों के नाम पत्र 5:7-9

7) मसीह ने इस पृथ्वी पर रहते समय पुकार-पुकार कर और आँसू बहा कर ईश्वर से, जो उन्हें मृत्यु से बचा सकता था, प्रार्थना और अनुनय-विनय की। श्रद्धालुता के कारण उनकी प्रार्थना सुनी गयी।

8) ईश्वर का पुत्र होने पर भी उन्होंने दुःख सह कर आज्ञापालन सीखा।

9 (9-10) वह पूर्ण रूप से सिद्ध बन कर और ईश्वर से मेलखि़सेदेक की तरह प्रधानयाजक की उपाधि प्राप्त कर उन सबों के लिए मुक्ति के स्रोत बन गये, जो उनकी आज्ञाओं का पालन करते हैं।

📙 सुसमाचार : सन्त योहन 19:25-27

25) ईसा की माता, उसकी बहिन, क्लोपस की पत्नि मरियम और मरियम मगदलेना उनके कू्रस के पास खडी थीं।

26) ईसा ने अपनी माता को और उनके पास अपने उस शिष्य को, जिसे वह प्यार करते थे देखा। उन्होंने अपनी माता से कहा, ’’भद्रे! यह आपका पुत्र है’’।

27) इसके बाद उन्होंने उस शिष्य से कहा, ’’यह तुम्हारी माता है’’। उस समय से उस शिष्य ने उसे अपने यहाँ आश्रय दिया।

📚 मनन-चिंतन

कल हमने प्रभु के क्रूस विजय का पर्व मनाया और आज हम दुखित माता मरियम का पर्व मानते हैं, जिनका दुःख येसु के क्रूस से जुड़ा हुआ था। जब हमारे कोई करीबी लोग पीड़ित होते हैं तब हमें भी दुख होता है । जब बच्चे बीमार होते हैं, तो माता-पिता पीड़ा से गुजरते हैं। इसके विपरीत, जब माता-पिता बीमार हो जाते हैं, तो उनके वयस्क बच्चे भावनात्मक रूप से उनके संघर्षों में शामिल हो जाते हैं। येसु की माँ मरियम की पीड़ा और दुख उनके पुत्र के कष्टों और दुखों से जुड़े हुए हैं। आज के सुसमाचार में धर्मी सिमियोन, मरियम के जीवन और उनके पुत्र के जीवन के इस अंतर्संबंध पर प्रकाश डालता है । वह मरियम के बेटे के बारे में कहता है कि वह एक ऐसा चिन्ह है जिसे अस्वीकार कर दिया जायेगा और तुरंत माता मरियम के बारे में कहता है कि एक तलवार उनके हृदय को आघात करेगी ।

माइकल एंजेलो की प्रसिद्ध मूर्ति जिसे पिएता, कहते हैं, जिसमें मरियम, येसु की पवित्र लाश को अपनी गोद में लिए, दिखाई गयी है। इस कलाकारी में येसु के दुख और मृत्यु और माँ मरियम के दुखों के अंतर्कलह की पूर्ण अभिव्यक्ति देखने को मिलती है । येसु के दुखों को सबसे करीबी से मरियम ने ही समझा व अनुभव किया इसलिए जब-जब येसु को दर्द हुआ और पीड़ा हुई, माँ ने उसका अनुभव खुद की रूह और बदन में किया। जैसा कि पहले पाठ में येसु मसीह के बारे में कहा गया है कि उन्होंने पृथ्वी पर रहते समय पुकार-पुकार के और आँसू बहाकर ईश्वर से प्रार्थना और अनुनय विनय की; वही मरियम के बारे में कहा जा सकता है येसु के साथ कलवारी की राहों पर माँ ने भी पुकार-पुकारकर और आँसू बहकर प्रार्थना की। मरियम अपने बेटे के प्रति वफादार थी, भले ही उसके लिए उन्हें येसु की क्रूस पीड़ा में भागीदार होना ही क्यों न पड़ा हों।

येसु के चेले होने के नाते, हम मरियम की ओर अपनी निगाहें करें , जो क्रूस-मार्ग और कलवारी तक येसु के दुखों में सहभागी हुई , वैसे ही हमें भी हमारे जीवन में आने वाले दुखों को मरियम की तरह ईश्वर की योजना जानकर सहर्ष स्वीकार करना चाहिए।



📚 REFLECTION

Yesterday we celebrated the Victory of the Cross and today we celebrate the feast of ‘Our Lady of Sorrows.’ When some of our close people suffer, we also feel sad. When the children are ill, the parents go through suffering. Conversely, when parents become ill, their adult children become emotionally involved in their conflicts. The suffering and sorrows of Mary are associated with the sufferings and sorrows of her son Jesus. In today's gospel the righteous Simeon throws light on this interrelationship of the sorrows of Mary's life and her son's life. He tells of Jesus that he was a symbol that would be rejected and immediately he tells of Mother Mary that a sword would strike her heart.

The famous statue of Michelangelo, called Pieta, depicts Mary, with the holy corpse of Jesus, in her lap. In this artwork, the full expression of the discord of the suffering and death of Jesus and the sufferings of Mother Mary is seen. Mary was the one who understood and experienced the sufferings of Jesus most closely, so whenever Jesus underwent pain, Mother experienced it in her own soul and body. The first reading of today tells us of Jesus, “He offered up prayers and supplications, with loud cries and tears, to the one who was able to save him from death.” (Heb 5:7) The same can be said about Mother Mary who walked along, the road of Calvary, and cried and prayed with tears. Mary was loyal to her son, even if she had to share in the passion and death of Jesus.

As disciples of Jesus, let us look at Mary, who participated in the sufferings of Jesus on the road of Calvary, until his death on the Cross, likewise, we should gladly accept the sufferings of our life, knowing that it is the plan of God for our life, just like Mary did.

14 सितंबर का पवित्र वचन

 

सोमवार, 14 सितम्बर 2020

पवित्र क्रूस का विजयोत्सव : पर्व

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📒 पहला पाठ : गणना ग्रन्थ 4b-9

4) यात्रा करते-करते लोगों का धैर्य टूट गया

5) और वे यह कहते हुए ईश्वर और मूसा के विरुद्ध भुनभुनाने लगे, ''आप हमें मिस्र देश से निकाल कर यहाँ मरुभूमि में मरने के लिए क्यों ले आये हैं? यहाँ न तो रोटी मिलती है और न पानी। हम इस रूखे-सूखे भोजन से ऊब गये हैं।''

6) प्रभु ने लोगों के बीच विषैले साँप भेजे और उनके दंष से बहुत-से इस्राएली मर गये।

7) तब लोग मूसा के पास आये और बोले, ''हमने पाप किया। हम प्रभु के विरुद्ध और आपके विरुद्ध भुनभुनाये। प्रभु से प्रार्थना कीजिए कि वह हमारे बीच से साँपों को हटा दे।'' मूसा ने जनता के लिए प्रभु से प्रार्थना की

8) और प्रभु ने मूसा से कहा, ''काँसे का साँप बनवाओ और उसे डण्डे पर लगाओ। जो साँप द्वारा काटा गया, वह उसकी ओर दृष्टि डाले और वह अच्छा हो जायेगा।''

9) मूसा ने काँसे का साँप बनवाया और उसे डण्डे पर लगा दिया। जब किसी को साँप काटता था, तो वह काँसे के साँप की ओर दृष्टि डाल कर अच्छा हो जाता था।

📙 सुसमाचार : सन्त योहन 3:13-17

13) मानव पुत्र स्वर्ग से उतरा है। उसके सिवा कोई भी स्वर्ग नहीं पहुँचा।

14) जिस तरह मूसा ने मरुभूमि में साँप को ऊपर उठाया था, उसी तरह मानव पुत्र को भी ऊपर उठाया जाना है,

15) जिससे जो उस में विश्वास करता है, वह अनन्त जीवन प्राप्त करे।’’

16) ईश्वर ने संसार को इतना प्यार किया कि उसने इसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उस में विश्वास करता हे, उसका सर्वनाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन प्राप्त करे।

17) ईश्वर ने अपने पुत्र को संसार मं इसलिए नहीं भेजा कि वह संसार को दोषी ठहराये। उसने उसे इसलिए भेजा कि संसार उसके द्वारा मुक्ति प्राप्त करे।

📚 मनन-चिंतन

सम्राट कॉन्स्टेंटाइन की मां, संत हेलेना द्वारा येसु के वास्तविक क्रूस के अवशेषों की खोज 14 सितंबर, 320 को की गई। उस घटना का वार्षिक स्मरणोत्सव तब से मनाया जाता आ रहा है। येसु के समय में 'क्रूस की विजय' इस अभिव्यक्ति का शायद ही कुछ अर्थ कोई समझ पता होगा। क्योंकि क्रूस पर मौत किसी की महिमा अथवा सम्मान, को नहीं दर्शाता अपितु इसके विपरीत क्रूस पर मृत्यु सबसे शर्मनाक मौत थी, यह तो महिमा, सम्मान और प्रतिष्ठा की पूर्ण अनुपस्थिति थी। पर जो पर्व आज हम मना रहे हैं वह यही है 'क्रूस की विजय का पर्व।' येसु, सूली पर चढ़ाए गए, और विजय हुए। यह घृणा पर प्रेम की विजय थी।

जैसा कि संत योहन आज के सुसमाचार में बताते हैं - ईश्वर ने संसार को इतना प्यार किया कि उसने इसके लिए अपने एकलौते पुत्र को अर्पित कर दिया, जिससे जो उस में विश्वास करता हे, उसका सर्वनाश न हो, बल्कि अनन्त जीवन प्राप्त करे। यीशु ने अपने वचनो और कार्यों के द्वारा ईश्वर के प्रेम का खुलासा किया, और इस प्रेम को उन्होंने पूरी तरह से क्रूस पर प्रकट किया। संत योहन कहते हैं कि क्रूस पर येसु ने ईश्वर की महिमा को प्रकट किया। सच्चा प्रेम हमेशा जीवन देने वाला होता है और यही ईश्वर के प्रेम की विशेषता है।

घृणा पर प्रेम की विजय होने के साथ-साथ, यीशु का क्रूस-मरण जीवन की विजय है। येसु को सबसे क्रूर तरीके से मारा गया, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद वे एक नए जीवन में प्रवेश करते हैं और अपने पुनरुत्थान द्वारा हम सबों को जीवन प्रदान करते हैं। संत योहन के सुसमाचार में येसु की बगल से बहने वाला रक्त और जल हमें उस जीवन के बारे में बताता है जो येसु की मृत्यु के दौरान बहता है और हमें अनंत जीवन देता है। विभिन्न कलाकारों ने क्रूस को जीवन के वृक्ष के रूप में दर्शाया है । क्रूस की विजय, जो ईश्वर की विजय है और येसु की शैतान और बुराई और मृत्यु की सभी शक्तियों पर विजय है, यही एक विजय है,जिसमें हम सभी भागिदार हैं। येसु ने क्रूस पर से हम सभी को परमेश्वर के प्रेम और जीवन की ओर खींचा है । जैसा कि वह योहन के सुसमाचार में कहते हैं - और मैं, जब पृथ्वी के ऊँपर उठाया जाऊँगा तो सब मनुष्यों को अपनी ओर आकर्षित करूँगा।

हम इस व विजयमान क्रूस को गले लगाएं और हमारी मुक्ति के इस साधन की आध्यात्मिकता को आत्मसात करें और अपना निजी क्रूस उठाकर येसु का अनुसरण करें।



📚 REFLECTION

On September 14, 320, the relics of the real cross of Jesus were discovered by Saint Helena, the mother of Emperor Constantine. The annual commemoration of that event has been celebrated since then, as the Feast of the Exaltation of the Cross or the victory or the triumph of the Holy Cross. In Jesus' time, the expression 'Victory of the Cross' hardly could make any sense, because death on the cross does not signify one's glory or honor, but on the contrary death on the cross was the most shameful death, it was a complete absence of glory, honor and dignity. But the feast, we are celebrating today is the feat of the Victory of the Cross.' Jesus was crucified, and he conquered: It was the victory of love over hatred.

As St. John says in today's gospel - “For God so loved the world that he gave his only Son, so that everyone who believes in him may not perish but may have eternal life.” Jesus revealed the love of God through his words and actions, and he fully revealed this love on the cross. St. John says that Jesus revealed the glory of God on the cross. True love is always life-giving and this is the specialty of God's love. Along with the triumph of love over hatred, Jesus' death on the Cross is the triumph of life. Jesus is killed in the cruelest way, but after his death he enters a new life and through his resurrection gives life to all of us. The blood and water flowing from the side of Jesus in the Gospel of St. John tells us about the life that flows during the death of Jess and gives us eternal life. Various artists have depicted the cross as a tree of life. The victory of the Cross is the victory of God, over Satan and all the forces of evil and death. From the Cross, Jesus has drawn all of us to the love and life of God, as he says in the Gospel of John – “When I am lifted up from the earth, will draw all people to myself.” (Jn12:32) Let us embrace this victorious Cross and imbibe the spirituality of this instrument of our salvation and follow Jesus by taking up our personal cross.

13 सितंबर का पवित्र वचन

 

13 सितंबर 2020
वर्ष का चौबीसवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार

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📒 पहला पाठ : प्रवक्ता-ग्रन्थ 27:33-28:9

27) मैं बहुत-सी बातों से घृणा करता हूँ, किन्तु ऐसे व्यक्ति से सब से अधिक। प्रभु को भी उस से घृणा है।

28) जो पत्थर ऊपर फेंकता, वह उसे अपने सिर पर गिराता है, जो षड्यन्त्र रचता, वह उस से घायल हो जायेगा।

29) जो गड्ढा खोदता, वह स्वयं उसी में गिरेगा, जो अपने पड़ोसी के लिए पत्थर रखता, वह उसी से ठोकर खायेगा और जो जाल बिछाता, वह उसी में फँसेगा।

30) जो बुराई करता, उसे उस से हानि होती है, यद्यपि वह नहीं जानता कि वह कहाँ से आती है।

31) घमण्डी का उपहास और अपमान किया जायेगा और प्रतिशोध घात में बैठे हुए सिंह की तरह उसकी प्रतीक्षा करता है।

32) जो धर्मियों के पतन पर आनन्दित है, वे स्वयं जाल में फँसेंगे और वे मृत्यु से पहले वेदना से धुल जायेंगे।

33) विद्वेष और क्रोध घृणित है, तो भी पापी दोनों किया करता है।

1) ईश्वर बदला लेने वाले को दण्ड देगा और उसके पापों का पूरे-पूरा लेखा रखेगा।

2) अपने पड़ोसी का अपराध क्षमा कर दो और प्रार्थना करने पर तुम्हारे पाप क्षमा किये जायेंगे।

3) यदि कोई अपने मन में दूसरों पर क्रोध बनाये रखता है, तो वह प्रभु से क्षमा की आशा कैसे कर सकता है?

4) यदि वह अपने भाई पर दया नहीं करता, तो वह अपने पापों के लिए क्षमा कैसे माँग सकता है?

5) निरा मनुष्य होते हुए भी यदि वह बैर बनाये रखता, तो उसे अपने पापों की क्षमा कैसे मिल सकती है? उसके पापों की क्षमा के लिए कौन प्रार्थना करेगा?

6) अन्तिम बातों का ध्यान रखो और बैर रखना छोड़ दो।

7) विकृति तथा मृत्यु को याद रखो और आज्ञाओें का पालन करो।

8) आज्ञाओें का ध्यान रखो और अपने पड़ोसी से बैर न रखो।

9) सर्वोच्च ईश्वर के विधान का ध्यान रखो और दूसरो के अपराध क्षमा कर दो।

📕 दूसरा पाठ :रोमियो 14:7-9

7) कारण, हम में कोई न तो अपने लिए जीता है और न अपने लिए मरता है।

8) यदि हम जीते रहते हैं, तो प्रभु के लिए जीते हैं और यदि मरते हैं, तो प्रभु के लिए मरते हैं। इस प्रकार हम चाहे जीते रहें या मर जायें, हम प्रभु के ही हैं।

9) मसीह इसलिए मर गये और जी उठे कि वह मृतकों तथा जीवितों, दोनों के प्रभु हो जायें।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 18:21-35

21) तब पेत्रुस ने पास आ कर ईसा से कहा, ’’प्रभु! यदि मेरा भाई मेरे विरुद्ध अपराध करता जाये, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूँ? सात बार तक?’’

22) ईसा ने उत्तर दिया, ’’मैं तुम से नहीं कहता ’सात बार तक’, बल्कि सत्तर गुना सात बार तक।

23) ’’यही कारण है कि स्वर्ग का राज्य उस राजा के सदृश है, जो अपने सेवकों से लेखा लेना चाहता था।

24) जब वह लेखा लेने लगा, तो उसका लाखों रुपये का एक कर्ज़दार उसके सामने पेश किया गया।

25) अदा करने के लिए उसके पास कुछ भी नहीं था, इसलिए स्वामी ने आदेश दिया कि उसे, उसकी पत्नी, उसके बच्चों और उसकी सारी जायदाद को बेच दिया जाये और ऋण अदा कर लिया जाये।

26) इस पर वह सेवक उसके पैरों पर गिर कर यह कहते हुए अनुनय-विनय करता रहा, ’मुझे समय दीजिए, और मैं आपको सब चुका दूँगा।

27) उस सेवक के स्वामी को तरस हो आया और उसने उसे जाने दिया और उसका कजऱ् माफ़ कर दिया।

28) जब वह सेवक बाहर निकला, तो वह अपने एक सह- सेवक से मिला, जो उसका लगभग एक सौ दीनार का कर्ज़दार था। उसने उसे पकड़ लिया और उसका गला घांेट कर कहा, ’अपना कर्ज़ चुका दो’।

29) सह-सेवक उसके पैरों पर गिर पड़ा और यह कहते हुए अनुनय-विनय करता रहा, ’मुझे समय दीजिए और मैं आपको चुका दूँगा’।

30) परन्तु उसने नहीं माना और जा कर उसे तब तक के लिये बन्दीगृह में डलवा दिया, जब तक वह अपना कर्ज़ न चुका दे!

31) यह सब देख कर उसके दूसरे सह-सेवक बहुत दुःखी हो गये और उन्होंने स्वामी के पास जा कर सारी बातें बता दीं।

32) तब स्वामी ने उस सेवक को बुला कर कहा, ’दृष्ट सेवक! तुम्हारी अनुनय-विनय पर मैंने तुम्हारा वह सारा कजऱ् माफ़ कर दिया था,

33) तो जिस प्रकार मैंने तुम पर दया की थी, क्या उसी प्रकार तुम्हें भी अपने सह-सेवक पर दया नहीं करनी चाहिए थी?’

34) और स्वामी ने क्रुद्ध होकर उसे तब तक के लिए जल्लादों के हवाले कर दिया, जब तक वह कौड़ी-कौड़ी न चुका दे।

35) यदि तुम में हर एक अपने भाई को पूरे हृदय से क्षमा नहीं करेगा, तो मेरा स्वर्गिक पिता भी तुम्हारे साथ ऐसा ही करेगा।’’

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में येसु ने एक निर्दय सेवक के बारे में बताया जो अपने स्वामी से क्षमा का उपहार प्राप्त करता है, लेकिन वह अपने सह- सेवक को क्षमा करने से इंकार कर देता है। यह दृष्टान्त जहाँ एक ओर ईश्वर की क्षमाशीलता को दर्शाता है, वहीँ हमें अपने अपराधियों को क्षमा करने के लिए आह्वान करता है।

हमारे जीवन में हम देखते हैं कि जब हमारी बारी आती है, तो हम औरों से हमारी बड़ी से बड़ी गलती की भी क्षमा की उम्मीद करते हैं पर जब दूसरों को क्षमा देने की बात आती है तो फिर हमें वहाँ पर न्याय चाहिए होता है। यही माविय प्रवृति है। अगर ईश्वर हमारे हर-एक गुनाह के अनुसार हमारे साथ बर्ताव करता तो बताओ कौन उनके सामने टिक सकता जैसा के भजन संहिंता 130:3 में हम पढ़ते है - "प्रभु! यदि तू हमारे अपराधों को याद रखेगा, तो कौन टिका रहेगा?"

जिस तरह से ईश्वर हमारे साथ बर्ताव करता है, हम कितना दूसरों के साथ वैसा ही बर्ताव कर पाते हैं। हम तो हमारी स्वार्थी प्रवृति के शिकार हैं और सिर्फ खुद का भला सोचते हैं। पर हमें याद रहे कि ऐसी प्रवृति तो सांसारिक है, और हम सांसारिक नहीं स्वर्गिक हैं। इसलिए हमारे मनोभाव स्वर्ग के मुताबिक होने चाहिए। संत मत्ती 5:48 में येसु कहते हैं - "इसलिए तुम पूर्ण बनो, जैसे तुम्हारा स्वर्गिक पिता पूर्ण है।" और संत लूकस इसी बात को थोड़ा सा अलग रूप में पेश करते हैं - "अपने स्वर्गिक पिता-जैसे दयालु बनो।" पूर्णता का आह्वान ईश्वर के समान उदार और प्रेममय क्षमा करने का आह्वान है। प्रभु हमें सिर्फ पूर्णता के जीवन का आह्वान ही नहीं देते, पर इस आह्वान को अपने जीवन में साकार करने के लिए साधन भी मुहैया कराते हैं और वह साधन, निश्चित रूप से, पवित्र आत्मा है, जिसे संत पौलुस ईश्वर के प्रेम का आत्मा कहता है, जिसे ईश्वर ने हमारे दिलों में रोपित किया है।

जब हम आत्मा से संचालित जीवन जियेंगे, तो हम हमारे स्वर्गिक पिता जैसा प्यार और क्षमा दूसरों को दिखा पाएंगे।



📚 REFLECTION

In today's gospel, Jesus tells of an unforgiving servant who receives the gift of forgiveness from his master, but refuses to forgive his co-servant. While this parable shows God's forgiveness on the one hand, it calls on us to forgive our fellow brothers or sisters on the other hand.

In our lives we see that when it is our turn, we expect forgiveness of even our biggest mistake from others, but when it comes to forgiving others, and then we need justice there. This is the social trend. If God treats us according to our every wrongdoing, then, who can stand in front of Him, as we read in Psalm 130: 3 - "Lord! If you remember our sins, then who will stand?"

How much are we able to treat others as God treats us? We are victims of our selfish tendencies and think only of ourselves. But let us remember that such a tendency is worldly and we are heavenly, not earthly. Therefore our attitude should be in accordance with heaven. In St. Matthew 5:48, Jesus says - "Therefore, be perfect, as your heavenly Father is perfect." And Saint Luke presents this in a slightly different form- "Be merciful as your heavenly Father is merciful."

The call to perfection is a call to generous and loving forgiveness like God. The Lord not only gives us the call to a life of perfection, but also provides the means to make this call come true in our lives and that means, of course, is the Holy Spirit, which Saint Paul calls the Spirit of God's love, Which God has planted in our hearts.

When we live a spirit-driven life, we will be able to show to others the love and forgiveness like our Heavenly Father.


मनन-चिंतन

हम संत लूकस के सुसमाचार अध्याय 15 में ईश्वरीय प्रेम और क्षमा पर आधारित उडाऊ पुत्र का दृष्टान्त पढ़ते हैं । इस दृष्टान्त से हम सब परिचित है । एक पिता के दो पुत्र थे । छोटे पुत्र ने अपने पिता से कहा कि सम्पत्ति का जो हिस्सा मेरा है वह मुझे दे दीजिए और पिता ने दोनों में अपनी सम्पत्ति का बटॅंवारा कर दिया । इस तरह छोटा बेटा अपनी सम्पत्ति लेकर अपने पिता और घर से दूर चला जाता है और वहाँ घोर पापमय जीवन जीता है और अपनी धन-सम्पत्ति का दुरुपयोग करता है और सब कुछ समाप्त होने के बाद, पश्चात्ताप करते हुए वह घर लौटता है । तब पिता उसके अपराधों को क्षमा करते हुए घर में उसका स्वागत करते हैं। यह दृष्टान्त हम मनुष्यों के पाप, पश्चाताप और पिता परमेश्वर के प्रेम और क्षमा पर आधारित है। इस दृष्टान्त से हम सब भली भांति परिचित है। हम इस कहानी के दूसरे भाग के बारे में भी कल्पना कर सकते हैं। कल्पना कीजिए कि इस प्रकार घर आने के बाद वह उडाऊ पुत्र अपने पिता के साथ खुशी से रहता है और कुछ समय बाद उसका विवाह होता है। विवाह के पश्चात अपने पिता के ही समान उसके भी दो पुत्र होते हैं, पुत्रों के बड़े होने पर जैसा कि उडाऊ पुत्र ने अपने पिता के साथ किया, ठीक वैसे ही उसका पुत्र भी उसके साथ करता है। वह सम्पत्ति का हिस्सा माँगता है और अपने पिता व घर से दूर चला जाता है, पिता की सम्पत्ति का दुरूपयोग करता है, पापमय जीवन जीता है और सब कुछ समाप्त होने के पश्चात, पश्चाताप करते हुए अपने पिता के पास लौट आता है। घर लौटने पर क्या उडाऊ पुत्र अपने बेटे को अपने पिता के समान स्वीकार करेगा या नहीं? यदि वह अपने पिता के समान अपने पुत्र का स्वागत करता है तो वह अपने पिता के समान बन जाता है। परन्तु यदि वह अपने पिता के विपरीत अपने पुत्र का स्वागत नहीं करता है तो वह अपने पिता के साथ रहने के बावजूद भी अपने पिता से दूर है। हमारी बुलाहट पिता के समान बनने के लिए है। प्रभु कहते हैं कि हमें स्वर्गीय पिता के समान दयालु और परिपूर्ण बनना चहिए।

उडाऊ पुत्र के दृष्टान्त के द्वारा पुत्र के पश्चाताप और पिता के घर में वापस लौटने पर जोर दिया गया है। अपनी गलतियों के लिए क्षमा माँगते हुए ईश्वर के पास आना हमारी आत्मीय यात्रा की शुरूआत हैं । आत्मीय जीवन में हमारा लक्ष्य पिता परमेश्वर के समान बनना हैं इसलिए हमारी बुलाहट में दया, क्षमा, प्रेम आदि होना चाहिए ताकि हम पिता परमेश्वर के समान बन सकें।

आज के सुसमाचार में हमने सुना कि जब सेवक अपने मालिक से दया की याचना करता है, तो उसे दया मिल जाती हैं। लेकिन वही सेवक अपने सह कर्मियों के साथ विपरीत व्यवहार करता है। उसने अपने मालिक से दया व क्षमा प्राप्त की है परन्तु फिर भी वह मालिक के समान नही बन पाया क्योंकि उसमें दयालुता की भावना नही है। इसी कारण उसे दंड भी मिलता है ।

हम पिता ईश्वर से दया व क्षमा की प्रार्थना करते हैं और वे हमारे अपराधों केा क्षमा भी करते हैं। क्या हम क्षमा प्राप्त करने के पश्चात प्रभु के समान बनने की कोशिश करते हैं या नहीं? प्रभु चाहते है कि हम पिता के समान बने जिन्होंने हमें अपनी असीम दया और क्षमा प्रदान की है।

उत्पत्ति ग्रंथ अध्याय 33 में याकूब को अपने भाई से मिलते इुए हम देखते हैं। याकूब ने अपने भाई को धोखा दिया था तथा उसके इस धोखे के कारण ही उसका बडा भाई एसाव अपने जीवन में पिता की आशिष से वंचित रह गया था। कई सालों के बाद याकूब एसाव से मिलने जाता है। उस समय वह बहुत डरा हुआ था लेकिन उसकी सोच के विपरीत एसाव उसके पास स्नेह से आता है और उसे गले लगाता है। तब याकूब अपने भाई से कहता है, ”मेरे लिए आपके दर्शन ईश्वर के दर्शनों के तुल्य है”। जो कोई भी दूसरों के अपराधों को क्षमा करता है व दया दिखाता है वह प्रभु के समान बन जाता है। इसलिए हमें भी प्रभु के समान बनने की कोशिश करना चाहिए। हम प्रभु से प्रार्थना करें कि हम प्रभु के समान क्षमाशील व दयावान बनें ताकि दूसरों के अपराधो व गुनाहों को माफ कर सकें और प्रभु के नजदीक जा सकें ।

-फादर वर्गीस पल्लिपरम्पिल


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12 सितंबर का पवित्र वचन

 

12 सितंबर 2020, शनिवार
कुँवारी मरियम का पवित्र नाम

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📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 10:14-22

14) प्रिय भाइयो! आप मूर्तिपूजा से दूर रहें।

15) मैं आप लोगों को समझदार जान कर यह कह रहा हूँ। आप स्वयं मेरी बातों पर विचार करें।

16) क्या आशिष का प्याला, जिस पर हम आशिष की प्रार्थना पढ़ते हैं, हमें मसीह के रक्त का सहभागी नहीं बनाता? क्या वह रोटी, जिसे हम तोड़ते हैं, हमें मसीह के शरीर का सहभागी नहीं बनाती?

17) रोटी तो एक ही है, इसलिए अनेक होने पर भी हम एक हैं; क्योंकि हम सब एक ही रोटी के सहभागी हैं।

18) इस्राएलियों को देखिए! क्या बलि खाने वाले वेदी के सहभागी नहीं हैं?

19) मैं यह नहीं कहता कि देवता को चढ़ाये हुए मांस की कोई विशेषता है अथवा यह कि देवमूर्तियों का कुछ महत्व है।

20) किन्तु-धर्मग्रन्थ के अनुसार- गैर-यहूदियों के बलिदान ईश्वर को नहीं, बल्कि अपदूतों को चढ़ाये जाते हैं। मैं यह नहीं चाहता कि आप लोग अपदूतों के सहभागी बनें।

21) आप प्रभु का प्याला और अपदूतों का प्याला, दोनों नहीं पी सकते। आप प्रभु की मेज़ और अपदूतों की मेज़, दोनों के सहभागी नहीं बन सकते।

22) क्या हम प्रभु को चुनौती देना चाहते हैं? क्या हम उस से बलवान् हैं?


सुसमाचार : लूकस 6:43-49

43) "कोई अच्छा पेड़ बुरा फल नहीं देता और न कोई बुरा पेड़ अच्छा फल देता है।

44) हर पेड़ अपने फल से पहचाना जाता है। लोग न तो कँटीली झाडि़यों से अंजीर तोड़ते हैं और न ऊँटकटारों से अंगूर।

45) अच्छा मनुष्य अपने हृदय के अच्छे भण्डार से अच्छी चीजे़ं निकालता है और जो बुरा है, वह अपने बुरे भण्डार से बुरी चीज़ें निकालता है; क्योंकि जो हृदय में भरा है, वहीं तो मुँह से बाहर आता है।

46) "जब तुम मेरा कहना नहीं मानते, तो ’प्रभु! प्रभु! कह कर मुझे क्यों पुकारते हो?

47) जो मेरे पास आ कर मेरी बातें सुनता और उन पर चलता है-जानते हो, वह किसके सदृश है?

48) वह उस मनुष्य के सदृश है, जो घर बनाते समय गहरा खोदता और उसकी नींव चट्टान पर डालता है। बाढ़ आती है, और जलप्रवाह उस मकान से टकराता है, किन्तु वह उसे ढा नहीं पाता; क्योंकि वह घर बहुत मज़बूत बना है।

49) परन्तु जो मेरी बातें सुनता है और उन पर नहीं चलता, वह उस मनुष्य के सदृश है, जो बिना नींव डाले भूमितल पर अपना घर बनाता है। जल-प्रवाह की टक्कर लगते ही वह घर ढह जाता है और उसका सर्वनाश हो जाता है।"

कुँवारी मरियम का पवित्र नाम

📒 पहला पाठ : गलातियों 4:4-7

4) किन्तु समय पूरा हो जाने पर ईश्वर ने अपने पुत्र को भेजा। वह एक नारी से उत्पन्न हुए और संहिता के अधीन रहे,

5) जिससे वह संहिता क अधीन रहने वालों को छुड़ा सकें और हम ईश्वर के दत्तक पुत्र बन जायें।

6) आप लोग पुत्र ही हैं। इसका प्रमाण यह है कि ईश्वर ने हमारे हृदयों में अपने पुत्र का आत्मा भेजा है, जो यह पुकार कर कहता है -"अब्बा! पिता!" इसलिए अब आप दास नहीं, पुत्र हैं और पुत्र होने के नाते आप ईश्वर की कृपा से विरासत के अधिकारी भी हैं।

7) इसलिए अब आप दास नहीं, पुत्र हैं और पुत्र होने के नाते आप ईश्वर की कृपा से विरासत के अधिकारी भी हैं।

अथवा - पहला पाठ : एफ़ेसियों 1:3-6

3) धन्य है हमारे प्रभु ईसा मसीह का ईश्वर और पिता! उसने मसीह द्वारा हम लोगों को स्वर्ग के हर प्रकार के आध्यात्मिक वरदान प्रदान किये हैं।

4) उसने संसार की सृष्टि से पहले मसीह में हम को चुना, जिससे हम मसीह से संयुक्त हो कर उसकी दृष्टि में पवित्र तथा निष्कलंक बनें।

5) उसने प्रेम से प्रेरित हो कर आदि में ही निर्धारित किया कि हम ईसा मसीह द्वारा उसके दत्तक पुत्र बनेंगे। इस प्रकार उसने अपनी मंगलमय इच्छा के अनुसार

6) अपने अनुग्रह की महिमा प्रकट की है। वह अनुग्रह हमें उसके प्रिय पुत्र द्वारा मिला है,


सुसमाचार : लूकस 1:39-47

39) उन दिनों मरियम पहाड़ी प्रदेश में यूदा के एक नगर के लिए शीघ्रता से चल पड़ी।

40) उसने ज़करियस के घर में प्रवेश कर एलीज़बेथ का अभिवादन किया।

41) ज्यों ही एलीज़बेथ ने मरियम का अभिवादन सुना, बच्चा उसके गर्भ में उछल पड़ा और एलीज़बेथ पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गयी।

42) वह ऊँचे स्वर से बोली उठी, "आप नारियों में धन्य हैं और धन्य है आपके गर्भ का फल!

43) मुझे यह सौभाग्य कैसे प्राप्त हुआ कि मेरे प्रभु की माता मेरे पास आयीं?

44) क्योंकि देखिए, ज्यों ही आपका प्रणाम मेरे कानों में पड़ा, बच्चा मेरे गर्भ में आनन्द के मारे उछल पड़ा।

45) और धन्य हैं आप, जिन्होंने यह विश्वास किया कि प्रभु ने आप से जो कहा, वह पूरा हो जायेगा!"

46) तब मरियम बोल उठी, "मेरी आत्मा प्रभु का गुणगान करती है,

47) मेरा मन अपने मुक्तिदाता ईश्वर में आनन्द मनाता है;

📚 मनन-चिंतन

आज हम माता मरियम के पवित्र नाम का पर्व मानते हैं। मरियम के पवित्र नाम का बखान भक्त विश्वासी मंडली सदियों से करती आ रही है। और आज का यह पर्व हमारी मरियम के प्रति उसी श्रद्धा को दर्शाता है। मरियम के नाम के लगभग सत्तर अलग-अलग अर्थ हैं। उन सब में सबसे आकर्षक अर्थ है - "ईश्वर की प्रिय।"

अपने नाम के अनुरूप ही मरियम ज़रूर ईश्वर की प्रिय रही है। सभी मुष्यों में ईश्वर की मर्ज़ी को पूरी तरह से पूरा करने और ईश्वर को हमेशा प्रसन्न करने में मरियम सदा अग्रणी रहीं है, क्योंकि वह हमेशा पाप से मुक्त थी (निष्कलंक गर्भाधान), और इस तरह हमेशा सर्वशक्तिमान की प्यारी रही। अनंत काल से ईश्वर ने उनसे प्यार किया; प्यार से उसकी श्रष्टि की ; उसके प्रति प्रेम के कारण उसने उन्हें पाप से बचाए रखा; प्रेम के खातिर उसने उसे सब कृपाओं व अनुग्रह से सुशोभित किया। हर दृष्टि से उसका नाम पवित्र है।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि माता कलीसिया उनके नाम का सम्मान करती है। कोई आश्चर्य नहीं कि कलीसिया के संतों और पिताओं ने उसकी प्रशंसा की है। उदाहरण के लिए :

संत बॉनावेन्चर : "धन्य है वह मनुष्य जो तेरे नाम को प्यार करता है, हे! मरियम । हाँ, वास्तव में धन्य है वह जो तेरे प्यारे नाम को प्यार करता है, हे ईश्वर की माँ, तेरा नाम इतना शानदार और सराहनीय है, कि जो कोई, इसका स्मरण करता है, उसे मौत की घडी का कोई डर नहीं। "

तो, प्यारे विश्वासियों, स्वर्ग दूत गेब्रियल की तरह जब-जब हम रोजरी माला विनती करें, हम मरियम का नाम नित पुकारते रहें : "प्रणाम मरिया कृपापूर्ण प्रभु आपके साथ है---," और वह हम पापियों के लिए नित प्रार्थना करती रहेगी।



📚 REFLECTION

Today we honour the holy name of ‘Mary’ the Mother of God. The devout people of God have been honoring the holy name of Mary for centuries. And this feast of today shows the same reverence for our beloved Mother Mary. Mary’s name has about seventy different meanings. The most attractive meaning of them all is - "Beloved of God."

According to this meaning she has definitely been dear to God. In all matters, she has always been at the forefront in fulfilling God's will and pleasing God, as she was always free from sin (immaculate conception), and thus was always beloved of the Almighty. God loved her from the eternity; He created her with love; He kept her from sin because of his love for her; for the great love he adorned her with all the graces. From every point of view her name is sacred.

It is no wonder that the mother Church honors her name; No wonder she is praised by the saints and fathers of the church, for example : Saint Bonaventure: "Blessed is the man who loves your name, O Mary! Yes, indeed blessed is the one who loves your beloved name, O Mother of God, your name is so magnificent and admirable, that whoever honours your name, will have no fear of death.” So, dear brothers and sisters, as we pray, the Rosary, like the angel Gabriel, we keep on calling Mary's name constantly: "Hail Mary, full of Grace, the Lord is with you ---," and she will continue to pray for us sinners.

11 सितंबर का पवित्र वचन

 

11 सितंबर 2020
वर्ष का तेईसवाँ सामान्य सप्ताह, शुक्रवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

📒 पहला पाठ : 1 कुरिन्थियों 9:16-19, 22-27

16) मैं इस पर गौरव नहीं करता कि मैं सुसमाचार का प्रचार करता हूँ। मुझे तो ऐसा करने का आदेश दिया गया है। धिक्कार मुझे, यदि मैं सुसमाचार का प्रचार न करूँ!

17) यदि मैं अपनी इच्छा से यह करता, तो मुझे पुरस्कार का अधिकार होता। किन्तु मैं अपनी इच्छा से यह नहीं करता। मुझे जो कार्य सौंपा गया है, मैं उसे पूरा करता हूँ।

18) तो, पुरस्कार पर मेरा कौन-सा दावा है? वह यह है कि मैं कुछ लिये बिना सुसमाचार का प्रचार करता हूँ और सुसमाचार-सम्बन्धी अपने अधिकारों का पूरा उपयोग नहीं करता।

19) सब लोगों से स्वतन्त्र होने पर भी मैंने अपने को सबों का दास बना लिया है, जिससे मैं अधिक -से-अधिक लोगों का उद्धार कर सकूँ।

20) मैं यहूदियों के लिए यहूदी-जैसा बना, जिससे मैं यहूदियों का उद्धार कर सकँू। जो लोग संहिता के अधीन हैं, उनका उद्धार करने के लिए मैं संहिता के अधीन-जैसा बना, यद्यपि मैं वास्तव में संहिता के अधीन नहीं हूँ।

21) जो लोग संहिता के अधीन नहीं है, उनका उद्धार करने के लिए मैं उनके जैसा बना, यद्यपि मैं मसीह की संहिता के अधीन होने के कारण मैं वास्तव में ईश्वर की संहिता से स्वतन्त्र नहीं हूँ।

22) मैं दुर्बलों के लिए दुर्बल-जैसा बना, जिससे मैं उनका उद्धार कर सकूँ। मैं सब के लिए सब कुछ बन गया हूँ, जिससे किसी-न-किसी तरह कुछ लोगों का उद्धार कर सकूँ।

23) मैं यह सब सुसमाचार के कारण कर रहा हूँ, जिससे मैं भी उसके कृपादानों का भागी बन जाऊँ।

24) क्या आप लोग यह नहीं जानते कि रंगभूमि में तो सभी प्रतियोगी दौड़ते हैं, किन्तु पुरस्कार एक को ही मिलता है? आप इस प्रकार दौड़ें कि पुरस्कार प्राप्त करें।

25) सब प्रतियोगी हर बात में संयम रखते हैं। वे नश्वर मुकुट प्राप्त करने के लिए ऐसा करते हैं, जब कि हम अनश्वर मुकुट के लिए।

26) इसलिए मैं एक निश्चित लक्ष्य सामने रख कर दौड़ता हूँ। मैं ऐसा मुक्केबाज़ हूँ, जो हवा में मुक्का नहीं मारता।

27) मैं अपने शरीर को कष्ट देता हूँ और उसे वश में रखता हूँ। कहीं ऐसा न हो कि दूसरों को प्रवचन देने के बाद स्वयं मैं ही ठुकरा दिया जाऊँ।


सुसमाचार : लूकस 6:39-42

39) ईसा ने उन्हें एक दृष्टान्त सुनाया, "क्या अन्धा अन्धे को राह दिखा सकता है? क्या दोनों ही गड्ढे में नहीं गिर पडेंगे?

40) शिष्य गुरू से बड़ा नहीं होता। पूरी-पूरी शिक्षा प्राप्त करने के बाद वह अपने गुरू-जैसा बन सकता है।

41) "जब तुम्हें अपनी ही आँख की धरन का पता नहीं, तो तुम अपने भाई की आँख का तिनका क्यों देखते हो?

42) जब तुम अपनी ही आँख की धरन नहीं देखते हो, तो अपने भाई से कैसे कह सकते हो, ’भाई! मैं तुम्हारी आँख का तिनका निकाल दूँ?’ ढोंगी! पहले अपनी ही आँख की धरन निकालो। तभी तुम अपने भाई की आँख का तिनका निकालने के लिए अच्छी तरह देख सकोगे।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में प्रभु येसु हम सबसे दूसरों में गलतियां तलाशने से पहले अपनी गिरेबाँह में झाँकने के लिए आह्वान करते हैं। दूसरों में दोष देखना बहुत आसान है पर खुद की कमज़ोरियों पर ध्यान देना और उन्हें स्वीकार करना मुश्किल होता है। यदि आज की आधुनिक फोटोग्राफी तकनिकी की भाषा में बोले, तो हम दुसरों की बुराइयों को हाईलाइट अथवा zoom करके दिखाते हैं पर खुद की कमज़ोरियों को blur कर देते हैं।

दुनिया का नजरिया दूसरों में दोष ढूंढकर उस पर स्पॉट लाइट फोकस करने का होता है परन्तु प्रभु येसु हमारे दोषों व गुनाहों को अपने लहू से ढककर हम पर अपनी दया प्रदर्शित करते हैं. योहन 8:1-11 में हम पढ़ते हैं लोगों को उस व्यभिचारिणी नारी में सिर्फ गुनाह ही दिखा, पर येसु ने उसके गुनाहों पर फोकस न करके उसपर दया की और उसे उस पाप के दल-दल से बहार निकाला। वैसे ही लुकस 19 में हम देखते ज़केउस में लोगों ने सिर्फ एक पापी को ही देखा, परन्तु परन्तु येसु ने उसमे इब्राहम के बेटे को देखा और उसका उद्धार किया।

आइये आज हम विचार करें कि उत्तम क्या है दूसरोंको को दोषी ठहराना या उन पर दया दिखना। किसी को बदनाम करके उसे और अधिक बुराई करने के लिए मज़बूर करना या उसके साथ नरमी से पेश आते हुए उसे प्रेम व दया के साथ सही मार्ग पर लाना। आइये हम जो सही व उत्तम है उसका चयन करें व अपने व औरों के जीवन को सुन्दर बनायें.



📚 REFLECTION

In today's gospel, Jesus calls us to look into our own faults, before looking for the faults of others. It is very easy to see faults in others, but it is difficult to focus on our own weaknesses and accept them. If I speak in the language of today's photography, then, we show the evils of others by highlighting or zooming them, but we tend to blur our own weaknesses.

The trend of the world is to focus the spot light on others by finding faults in them, but Lord Jesus shows his mercy to us by covering our faults and sins with his precious blood. In John 8: 1-11, we read that people saw only sin in that adulterous woman, but Jesus did not focus on her sins and took pity on her and drove her out of the sinful situation. Likewise in Luke 19 we see, in the story of Zacchaeus, people saw only a sinner in him, but Jesus saw Abraham's son in him and saved him.

Let us consider today what is best: to blame others or to show compassion; to discredit someone and force him/her to do more evil or to treat him/her tenderly and to bring him/her to the right path with love and kindness. Let us choose what is right and good and make the life of others beautiful.