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15 अगस्त का पवित्र वचन

 

15 अगस्त 2020, शनिवार

माता मरियम का स्वर्गारोपण; स्वतंत्रता दिवस

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📒 पहला पाठ : प्रकाशना ग्रन्थ 11:19a;12:1-6a,10ab

19) तब स्वर्ग में ईश्वर का मन्दिर खुल गया और मन्दिर में ईश्वर के विधान की मंजूषा दिखाई पड़ी।

1) आकाश में एक महान् चिन्ह दिखाई दिया: सूर्य का वस्त्र ओढ़े एक महिला दिखाई पड़ी। उसके पैरों तले चन्द्रमा था और उसके सिर पर बारह नक्षत्रों का मुकुट।

2) वह गर्भवती थी और प्रसव-वेदना से पीडि़त हो कर चिल्ला रही थी।

3) तब आकाश में एक अन्य चिन्ह दिखाई पड़ा- लाल रंग का एक बहुत बड़ा पंखदार सर्प। उसके सात सिर थे, दस सींग थे और हर एक सिर पर एक मुकुट था।

4) उसकी पूँछ ने आकाश के एक तिहाई तारे बुहार कर पृथ्वी पर फेंक दिये। वह पंखदार सर्प प्रसव-पीडि़त महिला के सामने खड़ा रहा, जिससे वह नवजात शिशु को निगल जाये।

5) उस महिला ने एक पुत्र प्रसव किया, जो लोह-दण्ड से सब राष्ट्रों पर शासन करेगा। किसी ने उस शिशु को उठाकर ईश्वर और उसके सिंहासन तक पहुंचा दिया

6) और वह महिला मरुभूमि की ओर भाग गयी, जहाँ ईश्वर ने उसके लिए आश्रय तैयार करवाया था और उसे बारह सौ साठ दिनों तक भोजन मिलने वाला था।

10) मैंने स्वर्ग में किसी को ऊँचे स्वर से यह कहते सुना, ’अब हमारे ईश्वर की विजय, सामर्थ्य तथा राजत्व और उसके मसीह का अधिकार प्रकट हुआ है; क्योंकि हमारे भाइयों का वह अभियोक्ता नीचे गिरा दिया गया है, जो दिन-रात ईश्वर के सामने उस पर अभियोग लगाया करता था।

📕 दूसरा पाठ: कुरिन्थियों के नाम सन्त पौलुस का पहला पत्र 15:20-27a

20) किन्तु मसीह सचमुच मृतकों में से जी उठे। जो लोग मृत्यु में सो गये हैं, उन में वह सब से पहले जी उठे।

21) चूँकि मृत्यु मनुष्य द्वारा आयी थी, इसलिए मनुष्य द्वारा ही मृतकों का पुनरूत्थान हुआ है।

22) जिस तरह सब मनुष्य आदम (से सम्बन्ध) के कारण मरते हैं, उसी तरह सब मसीह (से सम्बन्ध) के कारण पुनर्जीवित किये जायेंगे-

23) सब अपने क्रम के अनुसार, सब से पहले मसीह और बाद में उनके पुनरागमन के समय वे जो मसीह के बन गये हैं।

24) जब मसीह बुराई की सब शक्तियों को नष्ट करने के बाद अपना राज्य पिता-परमेश्वर को सौंप देंगे, तब अन्त आ जायेगा;

25) क्योंकि वह तब तक राज्य करेंगे, जब तक वह अपने सब शत्रुओं को अपने पैरों तले न डाल दें।

26) सबों के अन्त में नष्ट किया जाने वाला शत्रु है- मृत्यु।

27) धर्मग्रन्थ कहता है कि उसने सब कुछ उसके अधीन कर दिया है; किन्तु जब वह कहता है कि ’’सब कुछ उसके अधीन हैं’’, तो यह स्पष्ट है कि ईश्वर, जिसने सब कुछ मसीह के अधीन किया है, इस ’सब कुछ’ में सम्मिलित नहीं हैं।

📙 सुसमाचार : सन्त लूकस का सुसमाचार 1:39-56

39) उन दिनों मरियम पहाड़ी प्रदेश में यूदा के एक नगर के लिए शीघ्रता से चल पड़ी।

40) उसने ज़करियस के घर में प्रवेश कर एलीज़बेथ का अभिवादन किया।

41) ज्यों ही एलीज़बेथ ने मरियम का अभिवादन सुना, बच्चा उसके गर्भ में उछल पड़ा और एलीज़बेथ पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गयी।

42) वह ऊँचे स्वर से बोली उठी, ’’आप नारियों में धन्य हैं और धन्य है आपके गर्भ का फल!

43) मुझे यह सौभाग्य कैसे प्राप्त हुआ कि मेरे प्रभु की माता मेरे पास आयीं?

44) क्योंकि देखिए, ज्यों ही आपका प्रणाम मेरे कानों में पड़ा, बच्चा मेरे गर्भ में आनन्द के मारे उछल पड़ा।

45) और धन्य हैं आप, जिन्होंने यह विश्वास किया कि प्रभु ने आप से जो कहा, वह पूरा हो जायेगा!’’

46) तब मरियम बोल उठी, ’’मेरी आत्मा प्रभु का गुणगान करती है,

47) मेरा मन अपने मुक्तिदाता ईश्वर में आनन्द मनाता है;

48) क्योंकि उसने अपनी दीन दासी पर कृपादृष्टि की है। अब से सब पीढि़याँ मुझे धन्य कहेंगी;

49) क्योंकि सर्वशक्तिमान् ने मेरे लिए महान् कार्य किये हैं। पवित्र है उसका नाम!

50) उसकी कृपा उसके श्रद्धालु भक्तों पर पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनी रहती है।

51) उसने अपना बाहुबल प्रदर्शित किया है, उसने घमण्डियों को तितर-बितर कर दिया है।

52) उसने शक्तिशालियों को उनके आसनों से गिरा दिया और दीनों को महान् बना दिया है।

53) उसने दरिंद्रों को सम्पन्न किया और धनियों को ख़ाली हाथ लौटा दिया है।

54) इब्राहीम और उनके वंश के प्रति अपनी चिरस्थायी दया को स्मरण कर,

55) उसने हमारे पूर्वजों के प्रति अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार अपने दास इस्राएल की सुध ली है।’’

56) लगभग तीन महीने एलीज़बेथ के साथ रह कर मरियम अपने घर लौट गयी।

14 अगस्त का पवित्र वचन

 

14 अगस्त 2020
वर्ष का उन्नीसवाँ सामान्य सप्ताह, शुक्रवार

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📒 पहला पाठ : एज़ेकिएल का ग्रन्थ 16:1-15,60,63

1) प्रभु की वाणी मुझे यह कहते हुए सुनाई दी,

2) “मानवपुत्र! येरुसालेम को उसके वीभत्स कर्मों का विवरण सुनाओं।

3) उस से कहोः प्रभु-ईश्वर येरुसालेम से यह कहता है- वंश और जन्म ही दृष्टि से तुम कनानी हो। तुम्हारा पिता अमोरी था और तुम्हारी माता हित्ती थी।

4) जन्म के समय तुम्हारी नाल नहीं काटी गयी, शुद्धीकरण के हेतु तुम को पानी से नहीं नहलाया गया। लोगों ने तुम्हारे शरीर पर नमक नहीं लगाया और तुम को कपड़ों में नहीं लपेटा।

5) किसी ने भी तुम्हारे लिए यह सब करने की परवाह नहीं की। किसी को को भी तुम पर ममता नहीं हुई। तुम्हारे जन्म के दिन तुम को घृणित समझ कर खुले मैंदान में छोड़ दिया गया।

6) “उस समय मैं तुम्हारे पास से हो कर जा रहा था। मैंने तुम को तुम्हारे अपने रक्त में लोटता हुआ देखा और तुम से, जो अपने रक्त से सनी हुई थी, कहा- जीती रहो, जीती रहो!

7) तुम मेरी देखरेख में खेत के फूल की तरह बढ़ती गयी। तुम बढ़ कर बड़ी हो गयी। तुम बहुत सुन्दर थी। तुम्हारे स्तन उठने और तुम्हारे केश बढ़ने लगे, किन्तु तुम उस समय तक नग्न और विवस्त्र थी।

8) “जब मैं दुबारा तुम्हारे पास से हो कर गया, तो मैंने देखा कि तुम विवाह-योग्य हो गयी हो। मैंने अपने वस्त्र का पल्ला तुम पर डाल तुम्हारा नग्न शरीर ढक दिया। मैंने शपथ खा कर तुम से समझौता किया और तुम मेरी हो गयी। यह प्रभु की वाणी है।

9) मैंने तुम को पानी से नहलाया, तुम पर लगा हुआ रक्त धो डाला और तुम पर तेल का विलेपन किया।

10) मैंने तुम को बेलबूटेदार कपड़े और बढिया चमडे़ के जूते पहनाये। मैंने तुम को छालटी का सरबन्द और रेशमी वस्त्र प्रदान किये।

11) मैंने तुम को आभूषण पहनाये, तुम्हारे हाथों में कंगन और तुम्हारे गले में हार डाला।

12) मैंने तुम्हारी नाक में नथ लगाया, तुम्हारे कानों में बालियाँ पहनायी और तुम्हारे सिर पर शानदार मुकुट रख दिया।

13) तुम सोने और चाँदी से अलंकृत थी। तुम छालटी, रेशम और बेलबूटेदार कपड़े पहनती थी। तुम्हारा भोजन मैदे, मधु और तेल से बनता था। तुम राजरानी के सदृश अत्यन्त सुुन्दर हो गयी।

14) तुम्हारे सौन्दर्य का ख्याति संसार भर में फैल गयी, क्योंकि मैंने तुम को अपूर्व गौरव प्रदान किया था। यह प्रभु-ईश्वर की वाणी है।

15) “किन्तु तुम्हारे सौन्दर्य ने तुम को बहका दिया। तुम अपनी ख्याति को दुरुपयोग करते हुए व्यभिचार करने लगी। तुमने किसी भी बटोही को अपना सौन्दर्य बेच दिया।

60) फ़िर भी मैं उस प्रतिज्ञा को याद रखूँगा, जो मैंने तुम्हारी जवानी के दिनों तुम से की थी। मेरा और तुम्हारा विधान सदा के लिए बना रहेगा।

63) जब तुम अपना अतीत याद करोगी, तो तुम लज्जा के मारे एक भी शब्द कहने का साहस नहीं करोगी; क्योकि मैंने तुम्हारे सभी अपराध क्षमा कर दिये। यह प्रभु-ईश्वर की वाणी है।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 19:3-12

3 फ़रीसी ईसा के पास आये और उनकी परीक्षा लेते हुए यह प्रश्न किया, ’’क्या किसी भी कारण से अपनी पत्नी का परित्याग करना उचित है?

4) ईसा ने उत्तर दिया, ’’क्या तुम लोगों ने यह नहीं पढ़ा कि सृष्टिकर्ता ने प्रारंभ से ही उन्हें नर-नारी बनाया।

5) और कहा कि इस कारण पुरुष अपने माता-पिता को छोडे़गा और अपनी पत्नी के साथ रहेगा, और वे दोनों एक शरीर हो जायेंगे?

6) इस तरह अब वे दो नहीं, बल्कि एक शरीर है। इसलिए जिसे ईश्वर ने जोड़ा है, उसे मनुष्य अलग नहीं करे।’’

7) उन्होंने ईसा से कहा, ’’तब मूसा ने पत्नी का परित्याग करते समय त्यागपत्र देने का आदेश क्यों दिया?

8) ईसा ने उत्तर दिया, ’’मूसा ने तुम्हारे हृदय की कठोरता के कारण ही तुम्हें पत्नी का परित्याग करने की अनुमति दी, किन्तु प्रारम्भ से ऐसा नहीं था।

9) मैं तुम लोगों से कहता हूँ कि व्यभिचार के सिवा किसी अन्य कारण से जो अपनी पत्नी का परित्याग करता और किसी दूसरी स्त्री से विवाह करता है, वह भी व्यभिचार करता है।’’

10) शिष्यों ने ईसा से कहा, ’’यदि पति और पत्नी का सम्बन्ध ऐसा है, तो विवाह नहीं करना अच्छा ही है’’।

11) ईसा ने उन से कहा ’’सब यह बात नहीं समझते, केवल वे ही समझते हैं जिन्हें यह वरदान मिला है;

12) क्योंकि कुछ लोग माता के गर्भ से नपुंसक उत्पन्न हुए हैं, कुछ लोगों को मनुष्यों ने नपुंसक बना दिया है और कुछ लोगों ने स्वर्गराज्य के निमित्त अपने को नपुंसक बना लिया है। जो समझ सकता है, वह समझ ले।’’

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में कुछ फरीसी लोग प्रभु येसु के पास तलाक़ के बारे में बड़ा ही संवेदनशील सवाल लेकर आते हैं। लेकिन प्रभु येसु ना केवल तलाक़ के बारे में समझाते हैं, बल्कि उस से भी बढ़कर विवाह के पवित्र बंधन के बारे में सही तरह से समझाते हैं। विवाह की जोड़ियाँ ईश्वर बनाते हैं और ईश्वर के किए हुए को कौन मिटा सकता है, कौन उसकी योजनाओं के विरुद्ध जा सकता है? प्रभु येसु विवाह के बंधन में विकट समस्या और बड़े ख़तरे के बारे में भी समझाते हैं, और वह है हृदय की कठोरता। विवाह का बंधन दो आत्माओं के मिलन का बंधन है और अगर उनमें से एक भी ह्रदय की कठोरता का शिकार हो जाए तो इस बंधन पर ख़तरा मंडराने लगता है।

इसी तरह का एक अटूट बंधन हम उनके जीवन में भी देखते हैं जो, ईश्वर के राज्य की ख़ातिर खुद को विवाह के बंधन से दूर रखते हैं। इनमें पुरोहित और धर्म-भाई बहनें हैं जो ईश्वर और कलीसिया की सेवा के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं। यह बंधन भी एक अटूट बंधन है और ऐसे समर्पित लोग इस बंधन को सुरक्षित बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। उन्हीं में से एक हैं सन्त मैक्सिमिलीयन कोल्बे जिनका त्योहार आज हम मनाते हैं और जिन्होंने ईश्वर की सेवा और लोगों की सेवा के अपने समर्पण को तोड़ने की बजाय अपना जीवन क़ुर्बान करना अधिक बेहतर समझा। उन्होंने एक मिशाल पेश की कि नाज़ी कैम्प की निर्दयी परिस्थिति में भी आशा की नयी किरण जगायी जा सकती है। वह अन्त तक ईश्वर और कलीसिया के प्रति वफ़ादार बने रहे। सन्त कोल्बे हमारे लिए प्रार्थना करें। आमेन।



📚 REFLECTION

Today some Pharisees come to Jesus with a very sensitive question about divorce. But Jesus not only explains to them about divorce, but more than that he explains about the sacred bond of marriage. It is God who makes this bond and who has power to undo what God does, or who can go against the designs of God. Jesus also indicates one of the most pertinent problem and biggest threat in the bond of marriage that is hard heartedness. Marriage is two-sided effort and if one partner becomes hardhearted and does not adjust, then comes the problem.

Similar bond we see in them who do not marry because they want to work for God. The priests give their life for God and the church. This bond is unbreakable and priests would go to any extent to safeguard this sacred bond. One such priest we remember today, St. Maximilian Kolbe, who chose to die rather than break the bond of serving God and church. He set an example, that even being in such a hopeless situation in concentration camps, but he brought hope and life to others. He remained a faithful priest to God and to the Church till the end. May St. Kolbe pray for all.

✍Br. Biniush Topno





13 अगस्त का पवित्र वचन

 

13 अगस्त 2020
वर्ष का उन्नीसवाँ सामान्य सप्ताह, गुरुवार

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📒 पहला पाठ : एज़ेकिएल का ग्रन्थ 12:1-12

1) प्रभु की वाणी मुझे यह कहते हुई सुनाई दी,

2) “मानवपुत्र! तुम विद्रोही लोगों के बीच रहते हो। देखने के लिए उनके आँखें हैं, किन्तु वे देखते नहीं; सुनने के लिए कान हैं, किन्तु वे सुनते नहीं;

3) क्योंकि वे विद्रोही हैं। मानवपुत्र! प्रवास का सामान बाँध लो और दिन में सब के देखते प्रवास के लिए प्रस्थान करो। तुम जहाँँ रहते हो, उनके देखते ही वहाँ से प्रवास के लिए प्रस्थान करो। हो सकता है कि वे समझ जायें कि वे एक विद्रोही प्रजा हैं।

4) प्रवास का सामान दिन में ही उनके देखते-देखते बाहर रखो और सन्ध्या को उनकी आँखों के सामने प्रवास के लिए प्रस्थान करो।

5) उनके देखते ही दीवार में छेद करो और उस से निकल जाओ।

6) उनके देखते ही सामान कन्धो पर रख कर सन्ध्या के समय प्रस्थान करो। अपना मुँह ढक लो, जिससे तुम भूमि नहीं देख सको; क्योंकि मैं तुम्हें इस्राएली प्रजा के सामने एक चिन्ह के रूप में प्रस्तुत करने जा रहा हूँ।“

7) मुझे जैसा आदेश मिला था, मैंने वैसा ही किया। मैंने दिन में प्रवास का सामान बाहर रखा और सन्ध्या के समय अपने हाथ से दीवार में छेद किया। मैं झुटपुटे में कन्धे पर सामान रख कर उनके देखते ही चला गया।

8) दूसरे दिन प्रातः मुझे प्रभु की वाणी यह कहते हुए सुनाई पड़ी,

9) “मानवपुत्र! क्या इस्राएल की विद्रोही प्रजा ने तुम से यह नहीं पूछा कि तुम क्या करते हो?

10) उन से कहोः प्रभु-ईश्वर यह कहता है। यह येरुसालेम के राजा और वहाँ रहने वाली समस्त इस्राएली प्रजा के विषय में भवियवाणी है।

11) उन से यह कहोः मैं तुम लोगों के लिए एक चिन्ह हूँ। तुमने जैसा किया, उन लोगों के साथ वैसा ही किया जायेगा। वे बन्दी बनकर निर्वासित किये जायेंगे।

12) उन लोगों का राजा सन्ध्या के समय अपना सामान कन्धे पर रख कर नगर से चला जायेगा। लोग दीवार में छेद करेंगे, जिससे वह बाहर जा सके। वह अपना मुँह ढक लेगा, जिससे वह अपनी आँखों से यह भूमि न देखे।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 18:21-19:1

21) तब पेत्रुस ने पास आ कर ईसा से कहा, ’’प्रभु! यदि मेरा भाई मेरे विरुद्ध अपराध करता जाये, तो मैं कितनी बार उसे क्षमा करूँ? सात बार तक?’’

22) ईसा ने उत्तर दिया, ’’मैं तुम से नहीं कहता ’सात बार तक’, बल्कि सत्तर गुना सात बार तक।

23) ’’यही कारण है कि स्वर्ग का राज्य उस राजा के सदृश है, जो अपने सेवकों से लेखा लेना चाहता था।

24) जब वह लेखा लेने लगा, तो उसका लाखों रुपये का एक कर्ज़दार उसके सामने पेश किया गया।

25) अदा करने के लिए उसके पास कुछ भी नहीं था, इसलिए स्वामी ने आदेश दिया कि उसे, उसकी पत्नी, उसके बच्चों और उसकी सारी जायदाद को बेच दिया जाये और ऋण अदा कर लिया जाये।

26) इस पर वह सेवक उसके पैरों पर गिर कर यह कहते हुए अनुनय-विनय करता रहा, ’मुझे समय दीजिए, और मैं आपको सब चुका दूँगा।

27) उस सेवक के स्वामी को तरस हो आया और उसने उसे जाने दिया और उसका कजऱ् माफ़ कर दिया।

28) जब वह सेवक बाहर निकला, तो वह अपने एक सह- सेवक से मिला, जो उसका लगभग एक सौ दीनार का कर्ज़दार था। उसने उसे पकड़ लिया और उसका गला घांेट कर कहा, ’अपना कर्ज़ चुका दो’।

29) सह-सेवक उसके पैरों पर गिर पड़ा और यह कहते हुए अनुनय-विनय करता रहा, ’मुझे समय दीजिए और मैं आपको चुका दूँगा’।

30) परन्तु उसने नहीं माना और जा कर उसे तब तक के लिये बन्दीगृह में डलवा दिया, जब तक वह अपना कर्ज़ न चुका दे!

31) यह सब देख कर उसके दूसरे सह-सेवक बहुत दुःखी हो गये और उन्होंने स्वामी के पास जा कर सारी बातें बता दीं।

32) तब स्वामी ने उस सेवक को बुला कर कहा, ’दृष्ट सेवक! तुम्हारी अनुनय-विनय पर मैंने तुम्हारा वह सारा कजऱ् माफ़ कर दिया था,

33) तो जिस प्रकार मैंने तुम पर दया की थी, क्या उसी प्रकार तुम्हें भी अपने सह-सेवक पर दया नहीं करनी चाहिए थी?’

34) और स्वामी ने क्रुद्ध होकर उसे तब तक के लिए जल्लादों के हवाले कर दिया, जब तक वह कौड़ी-कौड़ी न चुका दे।

35) यदि तुम में हर एक अपने भाई को पूरे हृदय से क्षमा नहीं करेगा, तो मेरा स्वर्गिक पिता भी तुम्हारे साथ ऐसा ही करेगा।’’

1) अपना यह उपदेश समाप्त कर ईसा गलीलिया से चले गये और यर्दन के पार यहूदिया प्रदेश पहुँचे।

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में संत पेत्रुस के पूछने पर कि उसे अपने भाई को कितने बार क्षमा करना चाहिए, इस पर प्रभु येसु क्षमा के महत्व और ज़रूरत को समझाते हैं। प्रभु येसु परोक्ष रूप से इस ओर इंगित करते हैं कि किसी को क्षमा करते हुए हमें यह नहीं गिनना चाहिए कि हमने उस व्यक्ति को कितने बार क्षमा किया, किसी को भी असीमित बार क्षमा करना चाहिए क्योंकि हमारा स्वर्गिक पिता भी हमें क्षमा करते समय नहीं गिनता, बल्कि उसकी क्षमा हमारे लिए असीम है।

मनुष्य स्वभाव से ही पापी है और कोई यह दावा नहीं कर सकता कि वह निष्पाप है (देखें 1 योहन 1:8,10). यदि हम पापी नहीं होते तो हमें अपनी मुक्ति के लिए किसी भी मुक्तिदाता की ज़रूरत नहीं पड़ती। लेकिन हम कमजोर हैं और इतने बार पापों में गिरते हैं कि अगर हमारे पापों का लेखा-जोखा रखा जाए तो हम कभी भी उनका हिसाब नहीं चुका सकते। कल्पना कीजिए कि पूरे दिन में हम अपनी वाणी से, अपने कर्मों से, अपने बुरे और अपवित्र विचारों से और पूरे दिन हम जो कुछ भी करते हैं, उस सब से कितने बार पाप करते हैं। हम उसी क़र्ज़दार के समान है जिसके पास अपना क़र्ज़ चुकाने के लिए कुछ भी नहीं था, लेकिन सौभाग्य से हमारा स्वर्गीय पिता बहुत दयालु है और हमारा पापरूपी क़र्ज़ ख़ुशी-ख़ुशी माफ़ करने के लिए तैयार है। इसका मतलब यह है कि हमें दूसरों अनगिनत बार माफ़ करना है क्योंकि हमें भी अनगिनत बार माफ़ी की ज़रूरत पड़ती है। ईश्वर हमें अपने भाई-बहनों को बिना शर्त अनगिनत बार क्षमा करने की कृपा प्रदान करे। आमेन।



📚 REFLECTION

Today Jesus talks about forgiveness, when Peter asks him as to how many times we should forgive someone who wrongs. Jesus indirectly points out that we should not count the number of times but forgive unlimited times because we have been forgiven unlimited times.

Human beings by very nature are sinful and no one can claim to be without sin (cf.1 Jn.1:8,10). Because if we were without sin then there is no need of a saviour. But we are weak and fall into sin so many times that if we are to be accounted for all our sins, we will not be able to repay for our sins. Just imagine in whole day how many times we sin, may be by the words that we speak, may be the thoughts that we have in our hearts, our impure thoughts and may be our actions, the things that we do in a whole day. We can easily identify ourselves with the debtor who had no way of paying his debt back, but luckily we have a compassionate father who is ready to forgive our debts. This necessitates the need to forgive others and we know if we make mistake unlimited times then others also deserve to be forgiven unlimited times. May God grant us this grace to forgive our fellow-brethren unconditionally.

 -Br. Biniush Topno


12 अगस्त का पवित्र वचन

 

12 अगस्त 2020
वर्ष का उन्नीसवाँ सामान्य सप्ताह, बुधवार

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📒 पहला पाठ : एज़ेकिएल 9:1-7; 10:18-22

1) मैंने प्रभु को ऊँचे स्वर से यह कहते सुना, “जो नगर को दण्ड देने के लिये नियुक्त हैं, वे विनाश के शस्त्र हाथ पर लिये निकट आ रहे हैं“।

2) इस पर उत्तर के ऊपरी फाटक से हो कर छः व्यक्ति आ गये- नगर का विनाश करने के लिए उनके हाथ में शस्त्र थे। उन में से एक छालटी के कपड़े पहने था और उसके कमरबन्द से लेखनसामग्री की थैली लटक रही थी। वे आकर काँसे की वेदी के पास खड़े हो गये।

3) तब इस्राएल के ईश्वर की महिमा, जो केरूबों के ऊपर विराजमान थी, ऊपर उठ मन्दिर की देहली पर आ गयी। प्रभु ने छालटी के कपड़े पहने मनुष्य को, जिसके कमरबन्द से लेखन-सामग्री की थैली लटक रही थी, बुलाया

4) और उस से कहा, “नगर के आरपार जाओ, सारे येरूसालेम में घूम कर उन लोगों का पता लगाओ, जो वहाँ हो रहे वीभत्स कर्मों के कारण रोते और विलाप करते हैं और उनके मस्तक पर ताव अक्षर का चिह्न अंकित करो“।

5) मैंने उसे दूसरे से यह कहते सुना, “इसके पीछे-पीछे चलो और सभी निवासियों को दया किये बिना मारो। कोई बचने न पाये।

6) तुम बूढ़ों, नवयुवकों और नवयुवतियों को, दुधमुँहे बच्चों और स्त्रियों को दया किये बिना मारो। किन्तु जिन पर ताव अक्षर का चिह्न अंकित हैं, उन पर हाथ मत लगाओ। मन्दिर से शुरू करो।“ उन्होंने पहले मन्दिर के सामने के बूढ़ों को मार डाला।

7) तब उसने उन से कहा, “मन्दिर को अपवित्र करो और प्रांगण को लाशों से भर दो। इसके बाद नगर जा कर लोगों का वध कर दो।“ वे आगे बढ़कर नगर के लोगों का वध करने लगे।

10:18) तब प्रभु की महिमा मन्दिर की देहली से उठ कर केरूबों पर उतरी।

19) केरूब पंख फैला कर मेरे देखते ज़मीन के ऊपर उठे और पहिये भी उनके साथ चले गये। वे मन्दिर के पूर्वी द्वार के पास उतरे और इस्राएल के ईश्वर की महिमा उनके ऊपर विराजमान रही।

20) वे वही प्राणी थे, जिन्हें मैंने कबार नदी के पास रहते समय इस्राएल के ईश्वर के नीचे देखा था और अब मैं समझा कि वे केरूब थे।

21) प्रत्येक के चार मुख और प्रत्येक के चार पंख थे और उनके पंखों के नीचे मनुष्य के जैसे हाथ थे।

22) उनके मुख की वही आकृति थी, जिसे मैंने कबार के पास देखा था और प्रत्येक अपने सामने सीधे आगे बढ़ता जा रहा था।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती 18:15-20

15) ’’यदि तुम्हारा भाई कोई अपराध करता है, तो जा कर उसे अकेले में समझाओ। यदि वह तुम्हारी बात मान जाता है, तो तुमने अपनी भाई को बचा लिया।

16) यदि वह तुम्हारी बात नहीं मानता, तो और दो-एक व्यक्तियों को साथ ले जाओ ताकि दो या तीन गवाहों के सहारे सब कुछ प्रमाणित हो जाये।

17) यदि वह उनकी भी नहीं सुनता, तो कलीसिया को बता दो और यदि वह कलीसिया की भी नहीं सुनता, तो उसे गैर-यहूदी और नाकेदार जैसा समझो।

18) मैं तुम से कहता हूँ- तुम लोग पृथ्वी पर जिसका निषेध करोगे, स्वर्ग में भी उसका निषेध रहेगा और पृथ्वी पर जिसकी अनुमति दोगे, स्वर्ग में भी उसकी अनुमति रहेगी।

19) ’’मैं तुम से यह भी कहता हूँ- यदि पृथ्वी पर तुम लोगों में दो व्यक्ति एकमत हो कर कुछ भी माँगेगे, तो वह उन्हें मेरे स्वर्गिक पिता की और से निश्चय ही मिलेगा;

20) क्योंकि जहाँ दो या तीन मेरे नाम इकट्टे होते हैं, वहाँ में उनके बीच उपस्थित रहता हूँ।’’

📚 मनन-चिंतन

आज के सुसमाचार में प्रभु येसु हमारे भाई-बहनों को समझाने और उन्हें सही राह पर लाने की हमारी ज़िम्मेदारी के बारे में बात करते हैं। किसी की कमजोरी या पाप के लिए किसी को सजा देने से पहले प्रभु येसु हमें तीन अवसर प्रदान करने की सलाह देते हैं, और सिर्फ़ चौथे चरण में ही कोई व्यक्ति परित्यक्त किया जा सकता है या विनाश के लिए अकेला छोड़ दिया जा सकता है। हम अक्सर किसी व्यक्ति को सही मार्ग पर लाने की कोशिश किए बग़ैर उस पर दोषारोपण करना शुरू कर देते हैं और उनके साथ एक बुरे इंसान की तरह व्यवहार करते हैं।

ईश्वर ने हममें से प्रत्येक को अपने भाई -बहनों का ख़्याल रखने की ज़िम्मेदारी सौंपी है। यदि हमारा भाई या बहन अगर ग़लत रास्ते पर जाता है तो हम बराबर के ज़िम्मेदार होंगे। यदि मैं भाई या बहन को ग़लत रास्ते पर जाते हुए देखकर भी उसे सही रास्ते पर लाने की कोशिश नहीं करता तो मैं भी उसके पाप और दण्ड का भागी बनता हूँ। प्रभु ने काइन को उसके भाई के बारे मैं पूछा, “तुम्हारा भाई कहाँ है? (उत्पत्ति ग्रन्थ 4:9).” इसी तरह अगर हमारे दिन-प्रतिदिन के जीवन में अगर कुछ ग़लत हो रहा है, और हम उसका विरोध नहीं करते तो हम भी उसके सहभागी बनते हैं, भले ही हम प्रत्यक्ष रूप से कुछ भी ना कर रहे हों। अपने भाई-बहन को उनकी गलती का एहसास कराने के पीछे हमारा उद्धेश्य उनको सही मार्ग पर लाना होना चाहिए ना कि उनकी बेइज़्ज़ती करना या उन्हें नीचा दिखाना है, इसलिए प्रभु येसु हमें तीन अवसर देने के लिए कहते हैं। क्या अपने भाई-बहन के प्रति ज़िम्मेदारी का मुझे एहसास है?



📚 REFLECTION

Today Jesus talks about the need to correct our brothers and sisters and thus try to save them. Jesus gives three steps for correction before we condemn a person for his/her weakness or mistakes and only the fourth step is to leave them to be condemned and judged and punished. Very often we simply jump to fourth step without even making an effort to bring back the strayed persons to right path.

God has given each one of us the responsibility to take care of brothers and sisters. We are always accountable if my brother or sister goes on the wrong path. I am equally responsible and punishable for my brother’s or sister’s mistake if I don’t correct or try to bring him/her to the right path. The Lord asked Cain about his brother, “Where is your brother?” (Gen.4:9). Even in our day-to-day life if we don’t protest what is wrong, then we contribute in doing it, even when we apparently don’t do anything. Our intention to bring back my fellow brethren must be to save them and not to destroy them, that’s why Jesus gives us three steps. Do I understand my responsibility towards my brother? 

 ✍-Br. Biniush Topno


11अगस्त का पवित्र वचन

 

11 अगस्त 2020
वर्ष का उन्नीसवाँ सामान्य सप्ताह, मंगलवार

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📒 पहला पाठ : एज़ेकिएल का ग्रन्थ 2:8-3:4

8) “मानवपुत्र! मैं जो कहने जा रहा हूँ, उसे सुनो। इस विद्रोही प्रजा की तरह विद्रोह मत करो। अपना मुँह खोलो और जो दे रहा हूँ, उसे खा लो।“

9) मैंने आँखें ऊपर उठा कर देखा कि एक हाथ मेरी ओर बढ़ रहा है और उस में एक लपेटी हुई पुस्तक थी।

10) उसने उसे खोल दिया। काग़ज पर दोनों ओर लिखा हुआ था- उस पर विलाप, मातम और शोक गीत अंकित थे।

1) उसने मुझ से कहा, “मानवपुत्र! जो अपने-सामने हैं, उसे खा लो। यह पुस्तक खा जाओ और तब इस्राएल की प्रजा को सम्बोधित करो।“

2) मैंने अपना मुँह खोला और उसने मुझे यह पुस्तक खिलायी।

3) उसने मुझ से कहा “मानवपुत्र! मैं जो पुस्तक दे रहा हूँ, उसे खाओ और उस से अपना पेट भर लो“। मैंने उसे खा लिया; मेरे मुँह में उसका स्वाद मधु-जैसा मीठा था।

4) उसने मुझ से कहा, “मानवपुत्र! इस्राएल की प्रजा के पास जा कर उसे मेरे शब्द सुनाओ।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 18:1-5,10,12-14

1) उस समय शिष्य ईसा के पास आ कर बोले, ’’स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा कौन है?’’

2) ईसा ने एक बालक को बुलाया और उसे उनके बीच खड़ा कर

3) कहा, ’’मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- यदि तुम फिर छोटे बालकों-जैसे नहीं बन जाओगे, तो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करोगे।

4) इसलिए जो अपने को इस बालक-जैसा छोटा समझता है, वह स्वर्ग के राज्य में सबसे बड़ा है।

5) और जो मेरे नाम पर ऐसे बालक का स्वागत करता है, वह मेरा स्वागत करता है।

10) ’’सावधान रहो, उन नन्हों में एक को भी तुच्छ न समझो। मैं तुम से कहता हूँ- उनके दूत स्वर्ग में निरन्तर मेरे स्वर्गिक पिता के दर्शन करते हैं।

12) तुम्हारा क्या विचार है - यदि किसी के एक सौ भेड़ें हों और उन में से एक भी भटक जाये, तो क्या वह उन निन्यानबे भेड़ों को पहाड़ी पर छोड़ कर उस भटकी हुई को खोजने नहीं जायेगा?

13) और यदि वह उसे पाये, तो मैं विश्वास दिलाता हूँ कि उसे उन निन्यानबे की अपेक्षा, जो भटकी नहीं थी, उस भेड़ के कारण अधिक आनंद होगा।

14) इसी तरह मेरा स्वर्गिक पिता नहीं चाहता कि उन नन्हों में से एक भी खो जाये।

📚 मनन-चिंतन

इस दुनिया के किसी भी व्यक्ति ने स्वर्गराज्य को साक्षात नहीं देखा है। प्रभु येसु ही हैं जिन्होंने स्वर्गराज्य के आगमन की घोषणा की। उनके दिए हुए उदाहरणों और स्वर्गराज्य के बारे में उनकी शिक्षाओं से हम अपने मन मंग स्वर्ग और स्वर्गराज्य की कल्पना कर सकते हैं। प्रभु येसु ही स्वर्गराज्य के मूल्यों के बारे में बताते हैं, ईशराज्य की विशेषताओं के बारे में बताते हैं। स्वर्गराज्य के बहुत से मूल्य सांसारिक मूल्यों से विपरीत जान पड़ते हैं। संसार सिखाता है कि महान बनना है तो सबसे आगे आना है, लेकिन प्रभु येसु कहते हैं, “अगर हमें ईश्वर के राज्य के योग्य बनना है तो हमें सबसे पीछे होना है, जीवन बचाए रखना है, तो उसे पहले खोना है।

जो लोग अभी विलाप करते हैं वे स्वर्गराज्य में आनंद मनाएँगे, और जो अभी ख़ुशी मनाते हैं, वे शोक करेंगे।ईश्वर के राज्य के बारे में हम आज के सुसमाचार में एक उदाहरण देखते हैं जो एक बालक के समान बनने का उदाहरण है।सांसारिक अर्थ में बच्चे बड़ों के सामने कोई महत्व नहीं रखते, उनकी कोई नहीं सुनता, वे दूसरों पर निर्भर रहते हैं, वे बुद्धिमान या होशियार नहीं होते, ना शक्तिशाली और ना ही समझदार होते। लेकिन ईश्वर के राज्य के अधिकारी बनने के लिए ये विशेषताएँ होनी चाहिए: एक नन्हें बच्चे की भाँति अपने आप को ईश्वर के हाथों में सौंप देना, निर्बल बन जाना, और एक बालक की भाँति साधारण बनना। हे प्रभु हमें नन्हे बच्चों के समान बनाइए ताकि हम आपके राज्य के योग्य बन सकें। आमेन।


📚 REFLECTION

No living human being has seen the heaven or kingdom of heaven. It is Jesus who proclaims the arrival of the kingdom of heaven. From the examples that he gives and glimpses that we get from his teachings, helps us to create a picture of heaven and kingdom of heaven. It is Jesus who explains about the values of the kingdom of heaven, about the characteristics of God’s kingdom. Many of these values seem just the opposite to the worldly values. The world would say being great is to be first, but Jesus says, “to be fit for the kingdom of heaven we need to be last, if you want to save your life, then loose it.

In the kingdom of heaven, those who are mourning will be happy and those who rejoice will be sad. One of such example we see in today’s gospel about being like child. In worldly sense, children are of no significance they have no say, they are dependent, not wise or intelligent, not even powerful, not mature etc. but to be worthy of God’s kingdom, these are the qualities that are required; surrendering to God like a child, becoming weak, and simple like child. Lord make us like children, so that we may become worthy of you. Amen

 -Br Biniush Topno

10 अगस्त का पवित्र वचन

 

10 अगस्त 2020
सन्त लोरेन्स

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📒 पहला पाठ : कुरिन्थियों के नाम सन्त पौलुस का दूसरा पत्र 9:6-10

6) इस बात का ध्यान रखें कि जो कम बोता है, वह कम लुनता है और जो अधिक बोता है, वह अधिक लुनता है।

7) हर एक ने अपने मन में जिनता निश्चित किया है, उतना ही दे। वह अनिच्छा से अथवा लाचारी से ऐसा न करे, क्योंकि ‘‘ईश्वर प्रसन्नता से देने वाले को प्यार करता है’’।

8) ईश्वर आप लोगों को प्रचुर मात्रा में हर प्रकार का वरदान देने में समर्थ है, जिससे आप को कभी किसी तरह की कोई कमी नहीं हो, बल्कि हर भले काम के लिए चन्दा देने के लिए भी बहुत कुछ बच जाये।

9) धर्मग्रन्थ में लिखा है- उसने उदारतापूर्वक दरिद्रों को दान दिया है, उसकी धार्मिकता सदा बनी रहती है।

10) जो बोने वाले को बीज और खाने वाले को भोजन देता है, वह आप को बोने के लिए बीज देगा, उसे बढ़ायेगा और आपकी उदारता की अच्छी फसल उत्पन्न करेगा।

📙 सुसमाचार : सन्त योहन का सुसमाचार 12:24-26

24) मैं तुम लोगो से यह कहता हूँ- जब तक गेंहूँ का दाना मिटटी में गिर कर नहीं मर जाता, तब तक वह अकेला ही रहता है; परंतु यदि वह मर जाता है, तो बहुत फल देता है।

25) जो अपने जीवन को प्यार करता है, वह उसका सर्वनाश करता है और जो इस संसार में अपने जीवन से बैर करता है, वह उसे अनंत जीवन के लिये सुरक्षित रखता है।

26) यदि कोई मेरी सेवा करना चाहता है तो वह मेरा अनुसरण करे। जहाँ मैं हूँ वहीं मेरा सेवक भी होगा। जो मेरी सेवा करेगा, मेरा पिता उस को सम्मान प्रदान करेगा।

📚 मनन-चिंतन

आज हम आत्म समर्पण और त्याग के सदगुण पर मनन-चिंतन करते हैं। आज के पहले पाठ में सन्त पौलुस हमें बताते हैं कि ‘ईश्वर प्रसन्नता से देने वाले को प्यार करता है,’ और सुसमाचार में प्रभु येसु उनकी प्रशंसा करते हैं जो ईश्वर के राज्य के लिए और लोगों की सेवा के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं। प्रभु येसु गेहूँ के दाने का उदाहरण देते हैं जो अकेला रहता है लेकिन जब वह मिट्टी में गिरकर मर जाता है, अपने आप को बलिदान कर देता है, तो बहुत फल देता है।

दुनिया में ऐसे बहुत से लोगों के उदाहरण हैं, जिन्होंने अपने जीवन से बहुत प्यार किया और उसे सुरक्षित रखना चाहा लेकिन उन्हें उसे खो दिया, और वे भुला दिये गये। वहीं दूसरी ओर ऐसे लोगों के भी अनेक उदाहरण हैं, जिन्होंने ईश्वर और मानव सेवा में अपना जीवन क़ुर्बान कर दिया और दुनिया की नज़रों में “खो दिया” लेकिन ईश्वरीय दृष्टि में अपना सुरक्षित रखा जो आज भी यादों में जीवित हैं। उन्हीं में से एक हैं संत लॉरेन्स जिनका पर्व आज हम मनाते हैं।

वह सन 258 ईसवीं में सन्त पापा सिक्स्तुस द्वितीय के समय में उपयाजक थे और कलिसिया की सम्पत्ति के इंचार्ज थे, ख्रिस्तियों पर अत्याचार के समय जब रोम के शासक ने लॉरेन्स से कलिसिया की सारी सम्पत्ति को सौंपने के लिए कहा तो उन्होंने सारी सम्पत्ति ग़रीबों और जरूरतमंदो, लाचारों और अनाथों में बाँट दी और उन्हें शासक के सामने यह कहते हुए प्रस्तुत कर दिया कि यही है कलिसिया की असली सम्पत्ति। उन्होंने ईश्वर और लोगों की सेवा के लिए अपना जीवन क़ुर्बान कर दिया। ना केवल उन्होंने सांसारिक सम्पत्ति को दान कर दिया बल्कि अपना जीवन भी विश्वास की ख़ातिर दे दिया। इसी तरह के शहीद संतों के बलिदान द्वारा कलिसिया का विश्वास फल-फूलता और सौ गुना फल उत्पन्न करता है।


📚 REFLECTION

Today we are invited to reflect on the virtue of self-giving or self sacrifice. St.Paul, in the first reading, tells us that God loves a cheerful giver, and in the gospel, Jesus praises those who give their lives in the service of God and humanity. Jesus gives the example of the grain of wheat which remains single and of not much use, but If it is falls in the soil and sacrifices itself it bears much fruit.

There are so many people who loved themselves and tried to preserve their lives but lost it, and are forgotten. And on the other hand there are many examples of such people who gave their lives in the service of God and others and in worldly sense “lost their lives” but in reality they saved their lives and are still living with us in memory. One of them is St. Lawrence whose feast we celebrate today.

He was the in-charge of the church property and when asked by the prefect of Rome to surrender the property, he distributed it to the destitute and presented them before the prefect. He was martyred for God and people. He not only gave the worldly wealth away but also gave his life for faith. It is because of the sacrifice of the martyrs that Christian faith flourishes and their sacrifice bears much fruits.

 Br. Biniush Topno




9 अगस्त का पवित्र वचन

 

09 अगस्त 2020
वर्ष का उन्नीसवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार

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📒 पहला पाठ :राजाओं का पहला ग्रन्थ 19:9a.11-13a

9) एलियाह होरेब पर्वत के पास पहुँचा और एक गुफा के अन्दर चल कर उसने वहाँ रात बितायी।

11) प्रभु ने उस से कहा, ‘‘निकल आओ, और पर्वत पर प्रभु के सामने उपस्थित हो जाओ“। तब प्रभु उसके सामने से हो कर आगे बढ़ा। प्रभु के आगे-आगे एक प्रचण्ड आँधी चली- पहाड़ फट गये और चट्टानें टूट गयीं, किन्तु प्रभु आँधी में नहीं था। आँधी के बाद भूकम्प हुआ, किन्तु प्रभु भूकम्प में नहीं था।

12) भूकम्प के बाद अग्नि दिखई पड़ी, किन्तु प्रभु अग्नि में नहीं था। अग्नि के बाद मन्द समीर की सरसराहट सुनाई पड़ी।

13) एलियाह ने यह सुनकर अपना मुँह चादर से ढक लिया और वह बाहर निकल कर गुफा के द्वार पर खड़ा हो गया।

📕 दूसरा पाठ : रोमियों 9: 1-5

1) मैं मसीह के नाम पर सच कहता हूँ और मेरा अन्तःकरण पवित्र आत्मा से प्रेरित हो कर मुझे विश्वास दिलाता है कि मैं झूठ नहीं बोलता-

2) मेरे हृदय में बड़ी उदासी तथा निरन्तर दुःख होता है।

3) मैं अपने रक्त-सम्बन्धी भाइयों के कल्याण के लिए मसीह से वंचित हो जाने के लिए तैयार हूँ।

4) वे इस्राएली हैं। ईश्वर ने उन्हें गोद लिया था। उन्हें ईश्वर के सान्निध्य की महिमा, विधान, संहिता, उपासना तथा प्रतिज्ञाएं मिली है।

5) कुलपति उन्हीं के हैं और मसीह उन्हीं में उत्पन्न हुए हैं। मसीह सर्वश्रेष्ठ हैं तथा युगयुगों तक परमधन्य ईश्वर हैं। आमेन।

📙 सुसमाचार :मत्ती 14:22-33

22) इसके तुरन्त बाद ईसा ने अपने शिष्यों को इसके लिए बाध्य किया कि वे नाव पर चढ़ कर उन से पहले उस पार चले जायें; इतने में वे स्वयं लोगों को विदा करदेंगे।

23) ईसा लोगों को विदा कर एकान्त में प्रार्थना करने पहाड़ी पर चढे़। सन्ध्या होने पर वे वहाँ अकेले थे।

24) नाव उस समय तट से दूर जा चुकी थी। वह लहरों से डगमगा रही थी, क्योंकि वायु प्रतिकूल थी।

25) रात के चैथे पहर ईसा समुद्र पर चलते हुए शिष्यों की ओर आये।

26) जब उन्होंने ईसा को समुद्र पर चलते हुए देखा, तो वे बहुत घबरा गये और यह कहते हुए, ’’यह कोई प्रेत है‘‘, डर के मारे चिल्ला उठे।

27) ईसा ने तुरन्त उन से कहा, ’’ढारस रखो; मैं ही हूँ। डरो मत।‘‘

28) पेत्रुस ने उत्तर दिया, ’’प्रभु! यदि आप ही हैं, तो मुझे पानी पर अपने पास आने की अज्ञा दीजिए‘‘।

29) ईसा ने कहा, ’’आ जाओ‘‘। पेत्रुस नाव से उतरा और पानी पर चलते हुए ईसा की ओर बढ़ा;

30) किन्तु वह प्रचण्ड वायु देख कर डर गया और जब डूबने लगा तो चिल्ला उठा, ’’प्रभु! मुझे बचाइए’’।

31) ईसा ने तुरन्त हाथ बढ़ा कर उसे थाम लिया और कहा, ’’अल़्पविश्वासी! तुम्हें संदेह क्यों हुआ?’’

32) वे नाव पर चढे और वायु थम गयी।

33) जो नाव में थे, उन्होंने यह कहते हुए ईसा को दण्डवत् किया ’’आप सचमुच ईश्वर के पुत्र हैं’’।

📚 मनन-चिंतन

आज के पाठ हमें ईश्वर के स्वभाव के दर्शन कराते हैं। पहले पाठ में हम नबी एलियस को देखते हैं जो आँधी-तूफ़ान या भूकम्प या अग्नि में ईश्वर के दर्शन नहीं करते बल्कि मंद समीर के झोंके में ईश्वर को पाते हैं। दूसरे पाठ में सन्त पौलुस अपने इस्राएली भाइयों के लिए दुःख व्यक्त करते हैं कि उनके पास सब कुछ था, वे चुनी हुई प्रजा थे लेकिन फिर भी उन्होंने प्रभु ख्रिस्त को नहीं स्वीकारा जो सदा सर्वदा सारी सृष्टि के प्रभु और उद्धारकर्ता हैं। आज का सुसमाचार हमें प्रभु येसु की झलक दिखलाता है, समुद्र और वायु भी जिनके वश में है, वह ना केवल सारी मानव जाति के बल्कि समस्त प्राकृतिक शक्तियों के भी प्रभु हैं।

प्रेरित संत थोमस जो सुसमाचार प्रचार के लिए हमारे देश भारत आए थे, उनके बारे में एक दिलचस्प घटना प्रचलित है। यह घटना उस समय घटी जब वह केरल प्रान्त के पालयुर नामक स्थान पर पहुँचे तो उन्होंने देखा कि तालिकुलम (तालाब) में कुछ पुजारी लोग सूर्य देवता को तर्पण कर रहे थे। उसने उनसे पूछा कि सूर्य देवता उनके तर्पण को स्वीकार क्यों नहीं कर रहे क्योंकि जल नीचे गिर जाता था। लेकिन उन्होंने कहा कि ऐसा सम्भव नहीं है कि जल नीचे ना आये, तब सन्त थोमस ने कुछ जल लिया और उसे ऊपर की ओर उछाला और जल की बूँदे चमकते मोतियों की तरह बीच हवा में ही ठहर गयीं। तब उन ब्राह्मण पुजारियों ने सर्वशक्तिमान ईश्वर में विश्वास किया, जो सारी सृष्टि का संचालन करता है, और जिसके वश में सब कुछ, सूर्य, चंद्रमा धरती आदि है। वह तालाब, वह स्थान और वह चर्च जिसकी स्थापना सन्त थोमस ने की, आज भी केरल में विध्यमान है।

सारी सृष्टि को बनाने के बाद ईश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की। ईश्वर ने मनुष्य को सृष्टि में उसकी देख-भाल करने के लिए बनाया, लेकिन धीरे-धीरे मनुष्य शक्ति का भूखा, स्वार्थी और लालची बनता गया। उसने सृष्टि को अपने वश में करना प्रारम्भ कर दिया, प्रकृति और जीव-जंतुओं पर राज करना शुरू कर दिया। यह क्रम आज भी जारी है, और इसी कारण कभी-कभी प्रकृति मनुष्य के विरुद्ध उठ खड़ी होती है, और भारी विनाश करती है जो मनुष्य के सामर्थ्य से परे है। मनुष्य प्राकृतिक शक्तियों से डरना शुरू कर देता है और ईश्वर की बनायी हुई प्रकृति को ईश्वर की तरह मानने लगता है, यहाँ तक कि ईश्वर के स्थान पर प्रकृति की ही पूजा करने लगता है। जहाँ उसे ईश्वर से डरना चाहिए, वह ईश्वर द्वारा बनयी हुई चीज़ों से डरने लगता है। ईश्वर सब कुछ को अपने वश में करता और सब कुछ का संचालन करता है; मनुष्य नहीं, प्राकृतिक शक्तियाँ नहीं, बल्कि सर्वशक्तिमान ईश्वर ही सब कुछ का स्वामी है।

प्रकृति के द्वारा हम उसके रचियेता के दर्शन कर सकते हैं, लेकिन हमें सृष्टि की नहीं सृष्टिकर्ता की पूजा-आराधना करनी है। हम सन्त पेत्रुस को देखते हैं जो हमेशा सबसे आगे रहता है, अपने विश्वास की घोषणा करने में, प्रभु येसु द्वारा कोई सवाल करने पर उसका जवाब देने में भी सबसे आगे रहता है। आज के सुसमाचार में वह प्रभु येसु की तरह पानी पर चलना चाहता है, लेकिन जब वह तूफ़ान और उमड़ती लहरों को देखता है तो उसका ध्यान प्रभु येसु से हटकर समुद्र और लहरों पर (सृष्टिकर्ता से हटकर सृष्टि की ओर) चला जाता है और वह डगमगा जाता है, और डूबने लगता है। आइए हम अपना विश्वास प्रभु में रखें और उसी से डरें। हमारा ध्यान सब कुछ के सृष्टिकर्ता और स्वामी पर हो ना कि उसकी बनायी हुई वस्तुओं पर। आइए हम प्रभु येसु को अपने जीवन का और हम जो कुछ भी करते हैं, उस सब का स्वामी बनायें और हमारे जीवन की सारी आँधी और तूफ़ान अपने आप थम जाएँगे। आमेन।



📚 REFLECTION

Today’s readings give a glimpse of the nature of God. In the first reading we see prophet Elijah encounters God not in strong heavy winds, or in earthquake or fire but in a tiny whispering sound. In the second reading St. Paul expresses his anguish for his brethren Israelites for having everything, being specially chosen people and yet they could not accept Christ, the master and God forever. The gospel gives us the glimpse of Jesus being the master of the sea and winds and Lord of not only humanity but even of the powerful natural forces.

There is very interesting story of St. Thomas, the apostle who was sent to India, when he reached a place called Palayur in Kerala. He saw some Brahmins doing Tarpanam (offering water to the sun god) in Talikulam. He asked them why their offering was not accepted by the sun god, because the water came down. But they said it is not possible, then St. Thomas took water and threw it up, and it remained up, like glittering drops. The Brahmins then believed in Almighty God, who controls whole creation, even sun, moon and earth. The place, the pond and church he established are still there in Kerala.

Man was created after the whole beautiful creation. He was placed amidst the creation to take care of the creation, but slowly he became ambitious and power crazy. He started to subdue the creation, control the nature and creatures. It continues even today, and because of that sometimes creation retorts and goes beyond man’s control. Man starts fearing the natural forces and even stars treating God’s creation like god, replacing the True God. Where he should fear God, he fears created things. It is God who controls everything; it is not man, it is not natural forces, it is God, the master of the universe.

Through the creation we can encounter the creator, but it is the creator whom we need to worship. We see Peter who was always forward and proclaiming his faith, and answering all questions before anybody else could. In the gospel today he happily wants to walk on water like Jesus, but when he looks at the fierce winds and waves, his focus changes from Jesus to the sea and waves (from creator to the creation), and he starts stumbling. Let us put our trust in God, fear Him alone. Let our focus be the creator and master of everything rather than his created things. Let us make Jesus as the master of our lives and everything that we do, and all storms and waves will be calmed down. Amen.


मनन-चिंतन - 2

आज के सुसमाचार में हम देखते हैं कि जब शिष्य समुद्र में नाव से उस पार जा रहे थे, तब अचानक समुद्र में तूफ़ान आ जाता है। शिष्य उन तूफ़ानी लहरों और प्रचण्ड वायु का सामना करते हैं और पूरी कोशिश करते हैं कि किसी तरह उस पार पहुँच सकें लेकिन वे अपने इस प्रयास में असफल रहते हैं क्योंकि वायु प्रतिकूल थी और शिष्य भयभीत थे कि कहीं वह डूब न जाये, उनकी मृत्यु न हो जाये। साथ ही साथ इस विकट परिस्थिति में नाव में येसु उनके साथ उपस्थित नहीं थे। शिष्यों के सामने खतरा मंडराने लगा था, परन्तु प्रभु येसु समुद्र पर चल कर उन्हें बचाने आते हैं और उन्हें इस विपरीत परिस्थिति से बाहर निकालते हैं।

हमारी जिन्दगी भी चारों तरफ़ तूफ़ानों व अनेक प्रकार की समस्याओं से घिरी हुयी है। हम भी बार-बार इससे बाहर निकलने की कोशिश करते हैं, घंटों इसी बारे में सोचते रहते हैं, चिंता में डूबे रहते तथा कई बार अपनी समस्याओं का हल खोजने के लिए दूसरों के पास जाते हैं, एवं जब समस्या का समाधान नहीं हो पाता, तब हम हमेशा चिंता व तनाव अपने जीवन में महसूस करते हैं कि आगे भविष्य में क्या होगा। हम भी समस्या, संकट आने पर शिष्यों की तरह घबरा जाते हैं।

शिष्यों का अविश्वास पेत्रुस में प्रकट होता है। वह प्रचण्ड वायु देख कर डर गया और जब डूबने लगा तो चिल्ला उठा, ’’प्रभु! मुझे बचाइए’’ (मत्ती 14:30)। प्रभु का सवाल - “अल़्पविश्वासी! तुम्हें संदेह क्यों हुआ?” (मत्ती 14:31)– यह दर्शाता है कि विश्वास और सन्देह एक दूसरे के विपरीत है। जहाँ विश्वास है, वहाँ सन्देह नहीं हो सकता। सन्देह विश्वास की कमी को दर्शाता है। यह ईश्वर पर विश्वास, दूसरों पर विश्वास और आत्मविश्वास के बारे में सच है। जो ईश्वर पर विश्वास करते हैं वे ईश्वर पर सन्देह नहीं करते हैं; जो दूसरों पर विश्वास करते हैं, वे दूसरों पर शक नहीं करते हैं और जो अपनी क्षमता पर विश्वास करते हैं, वे अपनी क्षमता पर सन्देह नहीं करते हैं। वास्तव दूसरों एवं स्वयं पर विश्वास भी हमारे ईश्वरीय विश्वास पर निर्भर करता है। जो ईश्वर पर विश्वास करते हैं, वे जानते और मानते हैं कि सब कुछ ईश्वर पर निर्भर है, ईश्वर मेरी भलाई चाहते हैं और ईश्वर की अनुमति के बिना मुझ पर कुछ नहीं बीतेगा।

निर्गमन ग्रन्थ 14:30-31 में हम पढ़ते हैं, “ उस दिन प्रभु ने इस्राएलियों को मिस्रियों के हाथ से छुड़ा दिया। इस्राएलियों ने समुद्र के किनारे पर पड़े हुए मरे मिस्रियों को देखा। इस्राएली मिस्रियों के विरुद्ध किया हुआ प्रभु का यह महान् कार्य देख कर प्रभु से डरने लगे। उन्होंने प्रभु में और उसके सेवक मूसा में विश्वास किया।” इस्राएली लोग ईश्वर पर विश्वास करने के साथ-साथ मूसा पर भी विश्वास करने लगते हैं।

जो ईश्वर पर विश्वास करते हैं, उनका आत्मविश्वास भी मज़बूत होता है। उन्हें मालूम होता है कि ईश्वर उन्हें प्यार करते हैं और उनकी सहायता करते हैं। रोमियों 8:28 में संत पौलुस कहते हैं, “हम जानते हैं कि जो लोग ईश्वर को प्यार करते हैं और उसके विधान के अनुसार बुलाये गये हैं, ईश्वर उनके कल्याण के लिए सभी बातों में उनकी सहायता करता है”।

एक दूसरे पर शक करने के कारण कितने रिश्ते टूटते हैं, कितने परिवारों में अशांति फैल जाती है। स्वयं पर सन्देह करने के कारण कितने लोग परीक्षा में अनुत्तीर्ण होते हैं, इन्टर्व्यू ठीक से नहीं दे पाते हैं, प्रतियोगिताओं में पीछे रह जाते हैं।

ईश्वर का अनुभव हमारे ईश्वर पर, दूसरों पर और स्वयं पर विश्वास को बढ़ाता है। प्रभु ने अपना अनुभव देकर संत थॉमस के विश्वास को बढ़ाया। अकसर हम संत थॉमस को अविश्वासी शिष्य कहते हैं। वास्तव में सभी शिष्य अविश्वासी थे। मारकुस 16:9-13 में हम पढ़ते हैं, “ईसा सप्ताह के प्रथम दिन प्रातः जी उठे। वे पहले मरियम मगदलेना को, जिस से उन्होंने सात अपदूतों को निकाला था, दिखाई दिये। उसने जा कर उनके शोक मनाते और विलाप करते हुए अनुयायियों को यह समाचार सुनाया। किन्तु जब उन्होंने यह सुना कि ईसा जीवित हैं और उसने उन्हें देखा है, तो उन्हें इस पर विश्वास नहीं हुआ। इसके बाद ईसा दूसरे वेश में उन में दो को दिखाई दिये, जो पैदल देहात जा रहे थे। उन्होंने लौट कर शेष शिष्यों को यह समाचार सुनाया, किन्तु शिष्यों को उन दोनों पर भी विश्वास नहीं हुआ।”

प्रभु हमें बताते हैं कि विश्वास में कितनी ताकत है – “मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- यदि तुम्हें विश्वास हो और तुम संदेह न करो, तो तुम न केवल वह करोगे, जो मैं अंजीर के पेड़ के साथ कर चुका हूँ, बल्कि यदि तुम इस पहाड़ से यह कहो - ’उठ, समुद्र में गिर जा’, तो वैसा ही हो जायेगा। और जो कुछ तुम विश्वास के साथ प्रार्थना में माँगोगे, वह तुम्हें मिल जायेगा।’’ (मत्ती 21:21-22)

ईश्वर का अनुभव हमारे विश्वास को बढ़ाता है। हम प्रभु से विनती करें कि वे अपना अनुभव हमें प्रदान कर हमारे विश्वास को बढ़ायें।

✍️-Br.  Biniush Topno





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