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03 अगस्त का पवित्र वचन

03 अगस्त 2020
वर्ष का अठारहवाँ सामान्य सप्ताह, सोमवार

🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥🚥

📒 पहला पाठ : यिरमियाह 28:1-17

1) यूदा के राजा योशीया के शासनकाल के प्रारम्भ में, चैथे वर्ष के पाँचवें महीने में अज्जूर के पुत्र हनन्या- गिबओन में रहने वाले नबी- ने प्रभु के मन्दिर में याजकों तथा समस्त जनता के सामने यिरमियाह से यह कहा,

2) “विश्वमण्डल का प्रभु, इस्राएल का ईश्वर यह कहता हैः मैं बाबुल के राजा का जूआ तोडूँगा।

3) मैं ठीक दो वर्ष बाद प्रभु के मन्दिर के वे सब सामान वापस ले आऊँगा जिन्हें बाबुल का राजा नबूकदनेज़र यहाँ से बाबुल ले गया था।

4) यहोयाकीम के पुत्र, यूदा के राजा यकोन्याह को और यूदा के सब निर्वासितों को भी मैं बाबुल से यहाँ वापस ले आऊँगा- यह प्रभु की वाणी है- क्योंकि मैं बाबुल के राजा का जूआ तोड़ूँगा।“

5) किन्तु नबी यिरमियाह ने सब याजकों समस्त जनता के सामने नबी हनन्या को सम्बोधित करते हुए कहा,

6) “एवमस्तु! प्रभु ऐसा ही करें! प्रभु तुम्हारी भवियवाणी पूरी करे और प्रभु के मन्दिर के सब सामान और सब निर्वासितों को भी वापस ले आये।

7) किन्तु जो बात मैं तुम को और सारी जनता को बताने जा रहा हूँ, उसे ध्यान से सुनो।

8) तुम्हारे और मेरे पहले जो नबी थे, वे प्राचीन काल से, शक्तिशाली देशों और बड़े राज्यों के लिए युद्ध, विपत्ति और महामारी की भवियवाणी करते आ रहे हैं।

9) जो नबी शान्ति की भवियवाणी करता है, वह तभी प्रभु का भेजा हुआ नबी माना जा सकता है, जब उसकी भवियवाणी पूरी हो जाये।“

10) इस पर नबी हनन्या ने नबी यिरमियाह के कन्धे पर से जूआ उतारा और उसे तोड़ डाला।

11) तब हनन्या समस्त जनता के सामने यह बोला, “प्रभु यह कहता है: मैं इसी तरह बाबुल के राजा नबूकदनेज़र का जूआ तोड़ूँगा। मैं ठीक दो वर्ष बाद उसे सब राष्ट्रों के कन्धे पर से उतार कर तोड़ दूँगा।“ इसके बाद नबी यिरमियाह अपनी राह चला गया।

12) जब हनन्या ने नबी यिरमियाह के कन्धे पर से जूआ उतार कर तोड़ दिया था, तो उस के थोड़े समय बाद प्रभु की वाणी यिरमियाह को यह कहते हुए सुनाई दी,

13) “जाओ और हनन्या से कहो- यह प्रभु की वाणी है। तुमने लकड़ी का जूआ तोड़ा, इसके बदले लोहे का जूआ आयेगा;

14) क्योंकि विश्वमण्डल का प्रभु, इस्राएल का ईश्वर यह कहता हैः मैं सब राष्ट्रों के कन्धे पर लोहे का जूआ रखने जा रहा हूँ। वे सब बाबुल के राजा नबूकदनेज़र के अधीन होंगे। मैंने बनैले पशुओं को भी उसके अधीन कर दिया है।“

15) नबी यिरमियाह ने नबी हनन्या से कहा, “हनन्या! ध्यान से मेरी बात सुनो! प्रभु ने तुम को नहीं भेजा है। तुमने इस प्रजा को झूठी आशा दिलायी है।

16) इसलिए प्रभु यह कहता हैः मैं तुम को इस पृथ्वी पर से मिटा दूँगा। तुम इसी वर्ष मर जाओगे; क्योंकि तुमने प्रभु के विरुद्ध विद्रोह का प्रचार किया है।“

17) उसी वर्ष के सातवें महीने नबी हनन्या का देहान्त हो गया।

📙 सुसमाचार : मत्ती 14:22-36

22) इसके तुरन्त बाद ईसा ने अपने शिष्यों को इसके लिए बाध्य किया कि वे नाव पर चढ़ कर उन से पहले उस पार चले जायें; इतने में वे स्वयं लोगों को विदा कर देंगे।

23) ईसा लोगों को विदा कर एकान्त में प्रार्थना करने पहाड़ी पर चढे़। सन्ध्या होने पर वे वहाँ अकेले थे।

24) नाव उस समय तट से दूर जा चुकी थी। वह लहरों से डगमगा रही थी, क्योंकि वायु प्रतिकूल थी।

25) रात के चैथे पहर ईसा समुद्र पर चलते हुए शिष्यों की ओर आये।

26) जब उन्होंने ईसा को समुद्र पर चलते हुए देखा, तो वे बहुत घबरा गये और यह कहते हुए, "यह कोई प्रेत है", डर के मारे चिल्ला उठे।

27) ईसा ने तुरन्त उन से कहा, "ढारस रखो; मैं ही हूँ। डरो मत।"

28) पेत्रुस ने उत्तर दिया, "प्रभु! यदि आप ही हैं, तो मुझे पानी पर अपने पास आने की अज्ञा दीजिए"।

29) ईसा ने कहा, "आ जाओ"। पेत्रुस नाव से उतरा और पानी पर चलते हुए ईसा की ओर बढ़ा;

30) किन्तु वह प्रचण्ड वायु देख कर डर गया और जब डूबने लगा तो चिल्ला उठा, "प्रभु! मुझे बचाइए"।

31) ईसा ने तुरन्त हाथ बढ़ा कर उसे थाम लिया और कहा, "अल़्पविश्वासी! तुम्हें संदेह क्यों हुआ?"

32) वे नाव पर चढे और वायु थम गयी।

33) जो नाव में थे, उन्होंने यह कहते हुए ईसा को दण्डवत् किया "आप सचमुच ईश्वर के पुत्र हैं"।

34) वे पार उतर कर गेनेसरेत पहुँचे।

35) वहाँ के लोगों ने ईसा को पहचान लिया और आसपास के गाँवों में इसकी ख़बर फैला दी। वे सब रोगियों को ईसा के पास ले आ कर

36) उन से अनुनय-विनय करते थे कि वे उन्हें अपने कपड़े का पल्ला भर छूने दें। जितनों ने उसका स्पर्श किया, वे सब-के-सब अच्छे हो गये।

📚 मनन-चिंतन

आज हम इस पर मनन-चिंतन करते हैं कि किस तरह प्रभु येसु जो कुछ पल अकेले रहकर प्रार्थना करना चाहते थे, और बाद में अपने शिष्यों के साथ होना चाहते थे, लेकिन वे देखते हैं कि उनके शिष्य उनसे दूर जा चुके है और उनकी नाव लहरों में हिचकोले खा रही है। प्रभु येशु शिष्यों के डर और संघर्ष को महसूस कर सकते थे। उन्हें मालूम था कि भले ही शिष्यों ने उन्हें नहीं पुकारा लेकिन उन्हें जाकर उनके साथ रहना है, इतना ही उन्हें पर्याप्त साहस प्रदान करेगा। कभी-कभी जब हम अपने जीवन की चुनौतियों और कठिन परिस्थितियों में फँस जाते हैं तो प्रभु येसु की उपस्थिति मात्र से ही सारे संकट दूर हो जाएँगे, प्रभु येसु को कोई चमत्कार करने की ज़रूरत नहीं है, बस उनका हमारे साथ रहना ही काफ़ी है।

सबसे बढ़कर अच्छी बात तो यह है कि हम तक पहुँचने के लिए प्रभु येसु किसी बाधा को पार करने के लिए तैयार हैं, उन्हें कुछ भी नहीं रोक सकता है क्योंकि उनकी दृष्टि हमारी ओर लगी हुई है, उसके लिए हम मूल्यवान हैं। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न तो यह है कि हमारी दृष्टि किसकी ओर है, प्रभु की ओर या कहीं और? क्या हमारा ध्यान प्रभु येसु पर है या हमारे खुद के जीवन पर, खुद की परेशानियों और चिंताओं पर, हमारे डर और चुनौतियों पर? यदि ऐसा है तो हम भी सन्त पेत्रुस की तरह प्रभु येसु की तरफ़ बढ़ नहीं पाएँगे, बल्कि अगर हमारा ध्यान प्रभु येसु से हटा तो डूबने का भी ख़तरा बना रहेगा। आइए हम प्रभु येसु से सदा हमारे साथ रहने की कृपा माँगे और हमारे दिन-प्रतिदिन के जीवन में अपना ध्यान प्रभु पर लगाएँ। आमेन।


📚 REFLECTION

Today we see Jesus who went alone to pray, wanted to join the disciples, but they were away from the shore and the boat was being tossed by waves, the wind was against them. Jesus could feel the anguish and struggle of the disciples. He knew that even if they had not called him, he had to be with them, that would give them relief. Sometimes when we are amidst the problems and difficulties of our lives, mere presence of Jesus, can put them away, he need not do anything, just be with us and everything will be all right.

And we know that to reach to us he can cross all boundaries, nothing can stop him, because his focus is on us, we are precious to him. But the real question is where is our focus? Is our focus Jesus or our own life, our own fears, worries and problems? If so then we may not be able to walk like Peter and may even get drowned if we take away our focus from Jesus. Let us ask Jesus to always be with us and give us grace to always look to him in all our affairs of daily life. Amen.

 -Br Biniush Topno




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2 अगस्त का पवित्र वचन

02 अगस्त 2020
वर्ष का अठारहवाँ सामान्य सप्ताह, रविवार

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📒 पहला पाठ : इसायाह 55:1-3

1) “तुम सब, जो प्यासे हो, पानी के पास चले आओ। यदि तुम्हारे पास रुपया नहीं हो, तो भी आओ। मुफ़्त में अन्न ख़रीद कर खाओ, दाम चुकाये बिना अंगूरी और दूध ख़रीद लो।

2) जो भोजन नहीं है, उसके लिए तुम लोग अपना रुपया क्यों ख़र्च करते हो? जो तृप्ति नहीं दे सकता है, उसके लिए परिश्रम क्यों करते हो? मेरी बात मानो। तब खाने के लिए तुम्हें अच्छी चीज़ें मिलेंगी और तुम लोग पकवान खा कर प्रसन्न रहोगे।

3) कान लगा कर सुनो और मेरे पास आओ। मेरी बात पर ध्यान दो और तुम्हारी आत्मा को जीवन प्राप्त होगा। मैंने दाऊद से दया करते रहने की प्रतिज्ञा की थी। उसके अनुसार मैं तुम लोगों के लिए, एक चिरस्थायी विधान ठहराऊँगा।

📕 दूसरा पाठ : रोमियों 8:35, 37-39

35) कौन हम को मसीह के प्रेम से वंचित कर सकता है? क्या विपत्ति या संकट? क्या अत्याचार, भूख, नग्नता, जोखिम या तलवार?

37) किन्तु इन सब बातों पर हम उन्हीं के द्वारा सहज ही विजय प्राप्त करते है, जिन्होंने हमें प्यार किया।

38) मुझे दृढ़ विश्वास है कि न तो मरण या जीवन, न स्वर्गदूत या नरकदूत, न वर्तमान या भविष्य,

39) न आकाश या पाताल की कोई शक्ति और न समस्त सृष्टि में कोई या कुछ हमें ईश्वर के उस प्रेम से वंचित कर सकता है, जो हमें हमारे प्रभु ईसा मसीह द्वारा मिला है।

📙 सुसमाचार : मत्ती 14:13-21

13) ईसा यह समाचार सुन कर वहाँ से हट गये और नाव पर चढ़ कर एक निर्जन स्थान की ओर चल दिये। जब लोगों को इसका पता चला, तो वे नगर-नगर से निकल कर पैदल ही उनकी खोज में चल पड़े।

14) नाव से उतर कर ईसा ने एक विशाल जनसमूह देखा। उन्हें उन लोगों पर तरस आया और उन्होंने उनके रोगियों को अच्छा किया।

15) सन्ध्या होने पर शिष्य उनके पास आ कर बोले, "यह स्थान निर्जन है और दिन ढल चुका है। लोगों को विदा कीजिए, जिससे वे गाँवों में जा कर अपने लिए खाना खरीद लें।"

16) ईसा ने उत्तर दिया, "उन्हें जाने की ज़रूरत नहीं। तुम लोग ही उन्हें खाना दे दो।"

17) इस पर शिष्यों ने कहा "पाँच रोटियों और दो मछलियों के सिवा यहाँ हमारे पास कुछ नहीं है"।

18) ईसा ने कहा, उन्हें यहाँ मेरे पास ले आओ"।

19) ईसा ने लोगों को घास पर बैठा देने का आदेश दे कर, वे पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ ले ली़। उन्होंने स्वर्ग की और आँखें उठा कर आशिष की प्रार्थना पढ़ी और रोटियाँ तोड़-तोड़ कर शिष्यों को दीं और शिष्यों ने लोगों को।

20) सबों ने खाया और खा कर तृप्त हो गये, और बचे हुए टुकड़ों से बारह टोकरे भर गये।

21) भोजन करने वालों में स्त्रिीयों और बच्चों के अतिरिक्त लगभग पाँच हज़ार पुरुष थे।

📚 मनन-चिंतन

आज के पहले पाठ में हम ईश्वर के उस निशुल्क अवसर के बारे में सुनते हैं जो उनके लिए है जो सांसारिक भोजन के लिए कठिन परिश्रम करते हैं। हालाँकि यह मुक्ति निशुल्क है लेकिन उसे स्वीकार करने के लिए हमें ईश्वर और उसके विधान के प्रति वफ़ादार बनना पड़ेगा। दूसरे पाठ में भी सन्त पौलुस रोमियों को लिखते हुए अपने पत्र में हमें भरोसा दिलाते हैं कि स्वर्ग या पृथ्वी की कोई भी ताक़त हमें ईश्वर के प्रेम के अलग नहीं कर सकती। सुसमाचार में हम करुणामय प्रभु येसु को देखते हैं कि वह लोगों के दुःख-दर्द को महसूस करते हैं और उन्हें भोजन और विश्राम प्रदान करते हैं। प्रभु लोगों के प्रति अपने असीम प्रेम के कारण ही ऐसा करते हैं।

इस दुनिया में अपने माता-पिता के साथ सम्बन्ध से बढ़कर और कोई गहरा सम्बन्ध नहीं है। दूसरे सब प्रकार के रिश्ते धीरे-धीरे शिथिल हो जाते या समाप्त हो जाते हैं लेकिन माता-पिता के साथ रिश्ता कभी नहीं बदलता। माता जो अपने बच्चे की देख-भाल के लिए हर प्रकार के दुःख और कष्ट उठाने के लिए तैयार रहती है, वह अपने बच्चे को हर प्रकार का सुख और आराम देने के लिए सदैव तत्पर रहती है। माता और बच्चे के बीच एक अटूट बंधन बन जाता है। उसी तरह पिता भी बच्चे की हर ज़रूरत का ख़्याल रखता है, वास्तव में बच्चे के जन्म के बाद एक पिता का हर प्रयास बच्चे के जीवन को बेहतर बनाने का ही रहता है। भले ही बच्चा अपने माता-पिता के महान प्रेम और त्याग को भुला दे लेकिन माता-पिता का प्यार बच्चों के प्रति कभी कम नहीं होता। उनकी एकमात्र अभिलाषा यही होती है कि उनके बच्चे सदा सुखी रहें। इस संसार में एक माँ-बाप को इससे अधिक ख़ुशी की और कोई बात नहीं हो सकती कि उनके बच्चे जीवन में सदा सुखी रहें और फलते-फूलते रहें। उसी तरह ईश्वर भी हमारा देख-भाल करने वाला पिता और प्रेम रखने वाली माता है। उसने हमें अपनी योजना में ना केवल नौ महीने के लिए रखा बल्कि संसार के प्रारम्भ से ही हमें जाना और चुना (देखें एफ़ेसियों १:४), और हमारी देख-भाल की। वह सदा हमें ख़ुशी और आशीष प्रदान करना चाहता है। उनका हर कदम हमारे प्यार के लिए है और उसके प्रेम से हमें कोई भी वंचित नहीं कर सकता। वह बिना किसी शर्त के हमें प्यार करते हैं।

लेकिन हम ईश्वर के प्रेम को भूलकर सांसारिक चिंताओं में फँस जाते हैं। हम अपने कपड़ों, अपने भोजन, अपनी नौकरी, अपनी तनख़्वाह, अपनी दौलत, सफलता, अपने पसंद-नापसंद, आदि की चिंता करते हैं और इसी क्रम में हम ईश्वर को भूल जाते हैं और उसके प्रेम से दूर होते चले जाते हैं। आज हमें खुद को यह भरोसा दिलाना है कि हम भले ही इस ध्यान ना दें लेकिन ईश्वर सदा हमारी देख-भाल करता है। हमारे भविष्य के लिए उसकी योजनाएँ हैं (येरेमीयस २९:११), उसकी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता तो फिर बेवजह की चिन्ता क्यों? हमें ईश्वर को अपने जीवन का केन्द्र बनाना है, क्योंकि हम उसी के पास से आए हैं, और उसी की संताने हैं। वह हमें कभी नहीं भुला सकता क्योंकि उसने हममें से प्रत्येक को अपनी हथेली पर अंकित कर रखा है (इसायस ४९:१६)। आइए हम अपने आप को अपने दयालु पिता ईश्वर के हाथों में सौंप दें। आमेन।


📚 REFLECTION

The first reading of today gives us the glimpse of free offer of God to those who labour for worldly food. Though it is a free offer, but to accept this, we need to be faithful to Him and His covenant. In the second reading also St. Paul, while writing to the Romans, assures us that no power in heaven or on earth can separate us from God’s love. In the gospel we see compassionate Jesus, feeling the pain of the people, offers them food and rest. It is his unconditional love towards the people that moves him.

There is no deeper relationship on earth than the relationship with the mother and the father. Other relationships can gradually end or deteriorate or disappear, but the relationship with father and mother never changes. The mother who underwent pain and suffering to carry the baby in her belly, she took every care to keep the baby comfortable and happy. There is a great bond between mother and child. Similarly, father also takes care of the every need of the child, in fact, after the birth of the child, every action of the father is oriented towards taking care of the child. Even if the child forgets about their great love and sacrifice, their love remains the same. They always want their children to be happy. Nothing under the sky gives them more happiness than seeing their children happy and prospering. God is both, our loving mother and caring father. He has carried us in His plan not just for nine months but from the foundations of the world (cf Eph. 1:4), and took care of us. He always has been working to give us happiness and prosperity. His every action is oriented towards loving us, and nothing can come in between us and His love. He offers us His love unconditionally.

But forgetting God’s unconditional love we get worried about worldly things. We worry about food, our clothing, our job, our salary, our money, our success, our attachments and achievements, and in the process we forget him and start going astray from his love. Today we need to assure ourselves that God cares for us even if we are not aware of it. He has plans for our future (Jer29:11), nothing happens without His knowledge, so why worry? We need to make God as the center of our life, because we come from him and we are His children. He would never forget us because He has carved each one of us on the palm of His hand (Is 49:16). Let us surrender ourselves in the hands of our Heavenly Father. Amen.

 - Biniush Topno



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1 अगस्त का पवित्र पाठ

01 अगस्त 2020
वर्ष का सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह, शनिवार

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📒 पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 26:11-16,24

11) याजकों और नबियों ने शासकों और समस्त जनता से कहा, “यह व्यक्ति प्राणदण्ड के योग्य है। इसने इस नगर के विरुद्ध भवियवाणी की है, जैसा कि आपने अपने कानों से सुना है।“

12) किन्तु यिरमियाह ने शासकों और समस्त जनता से कहा, “तुम लोगों ने इस मन्दिर और इस नगर के विरुद्ध जो भवियवाणी सुनी है, मैंने उसे प्रभु के आदेश से घोषित किया है।

13) इसलिए अपना आचरण सुधारो। अपने प्रभु-ईश्वर की बात सुनो, जिससे उसने जो विपत्ति भेजने की धमकी दी है, वह उसका विचार छोड़ दे।

14) मैं तो तुम्हारे वश में हूँ- जो उचित और न्यायसंगत समझते हो, वही मेरे साथ करो।

15) किन्तु यह अच्छी तरह समझ लो कि यदि तुम मेरा वध करोगे, तो तुम अपने पर, इस नगर और इसके निवासियों पर निर्दोष रक्त बहाने का अपराध लगाओगे; क्योंकि प्रभु ने ही तुम्हें यह सब सुनाने मुझे तुम्हारे पास भेजा है।“

16) इस पर शासकों और समस्त जनता ने याजकों और नबियां से कहा, “यह व्यक्ति प्राणदण्ड के योग्य नहीं है। यह हमारे प्रभु ईश्वर के नाम पर हम से बोला है।“

24) शाफ़ान के पुत्र अहीकाम ने यिरमियाह की रक्षा की और उसे लोगों के हाथ नहीं पड़ने दिया, जो उसका वध करना चाहते थे।

📙 सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 14:1-12

1) उस समय राजा हेरोद ने ईसा की चर्चा सुनी।

2) और अपने दरबारियों से कहा, ’’यह योहन बपतिस्ता है। वह जी उठा है, इसलिए वह महान् चमत्कार दिखा रहा है।’’

3) हेरोद ने अपने भाई फि़लिप की पत्नी हेरोदियस के कारण योहन को गिरफ़्तार किया और बाँध कर बंदीगृह में डाल दिया था;

4) क्योंकि योहन ने उस से कहा था, ’’उसे रखना आपके लिए उचित नहीं है’’।

5) हेरोद योहन को मार डालना चाहता था; किन्तु वह जनता से डरता था, जो योहन को नबी मानती थी।

6) हेरोद के जन्मदिवस के अवसर पर हेरोदियस की बेटी ने अतिथियों के सामने नृत्य किया और हेरोद को मुग्ध कर दिया।

7) इसलिए उसने शपथ खा कर वचन दिया कि वह जो भी माँगेगी, उसे दे देगा।

8) उसकी माँ ने उसे पहले से सिखा दिया था। इसलिए वह बोली, ’’मुझे इसी समय थाली में योहन बपतिस्ता का सिर दीजिए’’।

9) हेरोद को धक्का लगा, परन्तु अपनी शपथ और अतिथियों के कारण उसने आदेश दिया कि उसे सिर दे दिया जाये।

10) और प्यादों को भेज कर उसने बंदीगृह में योहन का सिर कटवा दिया।

11) उसका सिर थाली में लाया गया और लड़की को दिया गया और वह उसे अपनी माँ के पास ले गयी।

12) योहन के शिष्य आ कर उसका शव ले गये। उन्होंने उसे दफ़नाया और जा कर ईसा को इसकी सूचना दी।

📚 मनन-चिंतन

आज के दोनों पाठों में हमें एक समान परिस्थिति दिखाई देती है, जहाँ पहले पाठ में नबी येरेमीयस को अत्याचार का सामना करना पड़ता है क्योंकि वह प्रभु की सत्य वाणी को लोगों तक पहुँचाना चाहता था। भले ही उसके शब्द सुनने में प्रिय नहीं थे, लेकिन वे सत्य से पूर्ण थे; वे ईश्वर के शब्द थे। मन्दिर के दूसरे पुजारी और नबी सत्य और ईमानदारी का जीवन नहीं जी रहे थे। वे अपना जीवन ईश्वर की इच्छानुसार नहीं जी रहे थे, वे बुराई के कार्यों में लिप्त थे, ऐसे कार्य जो उन्हें ईश्वर से दूर ले जाते थे। इसी प्रकार आज के सुसमाचार में हम योहन बप्तिस्ता को देखेत हैं जिसने हेरोद और उसके भाई की पत्नी हेरोदीयस के काले कारनामों का खुलकर विरोध किया। वे दोनों अनैतिक जीवन जीवन जी रहे थे जो ईश्वर की नज़रों में अप्रिय है। नबी येरेमीयस और योहन बप्तिस्ता दोनों को इस दुनिया को सही रहा दिखाने के कारण दुःख और अत्याचारों का सामना करना पड़ा था।

आज हम नबी येरेमीयस और योहन बप्तिस्ता के समय से अधिक पापी संसार में हैं। आज हम देखते हैं कि लोग नैतिकता और नैतिक मूल्यों से अनजान हैं, बुराई फल-फूल रही है, लोग ईश्वर की राह से अपनी आँखें और कान बन्द कर लेते हैं। लोग दुनिया के पापी मार्गों पर भटक जाना पसन्द करते हैं जो उन्हें ईश्वर से दूर विनाश की ओर ले जाते हैं। आज के पाठ हमें नबी येरेमीयस और योहन बप्तिस्ता की तरह ईश्वर की वाणी का माध्यम बनना है, भले ही इसके लिए हमें कितने भी कष्ट और अत्याचार क्यों ना सहने पड़ें। इस ज़िम्मेदारी के लिए ईश्वर ने हममें से प्रत्येक को व्यक्तिगत रूप से चुना है। हे प्रभु हमें आपकी आवाज़ बनने की कृपा और शक्ति प्रदान कीजिए ताकि हम संसार के सामने आपका साक्ष्य दे सकें। आमेन।



📚 REFLECTION

Today in both the readings we see a similar situation where in the first reading Jeremiah is subjected to torture because he spoke what the Lord had asked him to speak. Though the words were not pleasant to hear, but they were truth; they were from God. Other priests of the temple and prophets were not living an authentic and sincere life. They were not living a life as God wanted them to live, they involved themselves in evil ways; ways that led them away from God. Similarly, in the gospel we see John the Baptist who opposed and corrected the ways of Herod and his brother’s wife Herodias. They both were living immoral life, a life unacceptable in the eyes of the Lord. Both prophet Jeremiah and John the Baptist had to suffer for correcting the wrong ways of the world.

Today we live in a much evil world then at the time of Jeremiah or John the Baptist. We see that people have become alien to morality and moral values, evil is thriving, people close their eyes and ears from God’s ways. They like and choose to be lost in the evil ways of the world that lead them away from God. Today’s readings challenge and invite us to become the voice of the Lord like Jeremiah and John the Baptist, even at the cost of pain and suffering. God has chosen each one of us for this responsibility. Give us strength and courage Lord, to speak for you and to witness the Truth before the world. Amen

✍-Biniush Topno


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31 जुलाई का पवित्र पाठ

31 जुलाई 2020
वर्ष का सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह, शुक्रवार

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पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 26:1-9

1) योशीया के पुत्र यूदा के राजा यहोयाकीम के शासनकाल के प्रारम्भ में यिरमियाह को प्रभु की यह वाणी सुनाई पड़ीः

2) “प्रभु यह कहता है- प्रभु के मन्दिर के प्रांगण में खड़ा हो कर यूदा के सब नगरों के निवासियों को सम्बोधित करो, जो वहाँ आराधना करने आते हैं। जो कुछ मैं तुम्हें बताऊँगा, यह सब उन्हें सुनाओगे- एक शब्द भी नहीं छोड़ोगे।

3) हो सकता है कि वे सुनें और अपना कुमार्ग छोड़ कर मेरे पास लौट आयें। तब मैं भी अपना मन बदल कर उनके पापों के कारण उन पर विपत्ति भेजने का अपना विचार छोड़ दूँगा।

4) इसलिए उन से कहो: प्रभु यह कहता है -यदि तुम लोग मेरी बात नहीं सुनोगे और उस संहिता का पालन नहीं करोगे, जिसे मैंने तुम को दिया है;

5) यदि तुम मेरे सेवकों की उन नबियों की बात नहीं सुनोगे, जिन्हें मैं व्यर्थ ही तुम्हारे पास भेजता रहा,

6) तब मैं इस मन्दिर के साथ वही करूँगा, जो मैंने शिलो के साथ किया और मैं इस नगर को पृथ्वी के राष्ट्रों की दृष्टि में अभिशाप की वस्तु बना दूँगा।“

7) याजकों, नबियों और सभी लोगों ने प्रभु के मन्दिर में यिरमियाह का यह भाषण सुना।

8) जब यिरमियाह प्रभु के आदेश के अनुसार जनता को यह सब सुना चुका था, तो याजक, नबी और सब लोग यह कहते हुए उस पर टूट पड़े: “तुम को मरना ही होगा।

9) तुमने क्यों प्रभु के नाम पर भवियवाणी की है कि यह मन्दिर शिलो के सदृश और यह नगर एक निर्जन खँडहर हो जायेगा?“ सब लोगों ने प्रभु के मन्दिर में यिरमियाह को घेर लिया।

सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 13:54-58

54) वे अपने नगर आये, जहाँ वे लोगों को उनके सभाग्रह में शिक्षा देते थे। वे अचम्भे में पड़ कर कहते थे, ’’इसे यह ज्ञान और यह सामर्थ्य कहाँ से मिला?

55) क्या यह बढ़ई का बेटा नहीं है? क्या मरियम इसकी माँ नहीं? क्या याकूब, यूसुफ, सिमोन और यूदस इसके भाई नहीं?

56) क्या इसके सब बहनें हमारे बीच नहीं रहतीं? तो यह सब इसे कहाँ से मिला?’’

57) पर वे ईसा में विश्वास नहीं कर सके। ईसा ने उन से कहा, ’’अपने नगर और अपने घर में नबी का आदर नहीं होता।’’

58) लोगों के अविश्वास के कारण उन्होंने वहाँ बहुत कम चमत्कार दिखाये।

📚 मनन-चिंतन - 1

प्रभु येसु ईश्वर हैं। अपने देहधारण के द्वारा वे सभी बातों में हमारे जैसे बन गये। इब्रानियों का पत्र कहता है, "हमारे प्रधानयाजक हमारी दुर्बलताओं में हम से सहानुभूति रख सकते हैं, क्योंकि पाप के अतिरिक्त अन्य सभी बातों में उनकी परीक्षा हमारी ही तरह ली गयी है।" (4:15) अपने सांसारिक जीवन के दौरान, वे मनुष्यों के सभी दर्दनाक अनुभवों से गुजरे। हमारे समाज में लोगों को विभिन्न प्रकार के भेदभाव को झेलना पड़ता है। उनमें से एक है माता-पिता की जाति या उनके धन्धे को लेकर भेदभाव। निम्न जाति या वर्ग के लोगों और साधारण सेवा-कार्य करने वाले लोगों को इस प्रकार के भेदभाव का सामना पड़ता है। आज के सुसमाचार-भाग में, हम देखते हैं कि यद्यपि यीसु ने अपार ज्ञान की बात की थी, लेकिन उन्हें उनके परिवार की पैतृक पृष्ठभूमि और सामाजिक स्थिति के आधार पर आंका गया था। लोगों ने उन पर विश्वास नहीं किया और फलस्वरूप उन्होंने उनके लिए ज़्यादा चमत्कार नहीं किए। नबी इसायाह ने इसके बारे में भविष्यवाणी की थी: “वह मनुष्यों द्वारा निन्दित और तिरस्कृत था, शोक का मारा और अत्यन्त दुःखी था। लोग जिन्हें देख कर मुँह फेर लेते हैं, उनकी तरह ही वह तिरस्कृत और तुच्छ समझा जाता था। ”(इसायाह 53: 3)। हमारा समाज उन लोगों के प्रति निर्दयी है जो निम्न सामाजिक स्थिति के हैं। हममें से कई लोग शारीरिक, मानसिक या मनोवैज्ञानिक रूप से पीड़ित लोगों के प्रति कठोर मनोभाव अपनाते हैं। आइए हम हर जगह अच्छाई और सच्चाई को पहचानने और स्वीकार करने के लिए अपने मन और हृदय को खुले रखना सीखें।


📚 REFLECTION

Jesus is God. By incarnation he became like us in all things. The Letter to the Hebrews says, “For we do not have a high priest who is unable to sympathize with our weaknesses, but we have one who in every respect has been tested as we are, yet without sin.” (4:15) During his earthly life, he went through all painful experiences of human beings. One of the ways in which people suffer in our society is humiliation and discrimination based on parental background. This is suffered by people belonging lower caste or class and those doing menial jobs. In today’s Gospel passage, we see that although Jesus spoke unmatchable wisdom, he was judged on the basis of parental background and social status of his family. The people did not believe in him and consequently he did not work many miracles for them. Prophet Isaiah had foretold about it : “He was despised and rejected by others; a man of suffering and acquainted with infirmity; and as one from whom others hide their faces he was despised, and we held him of no account” (Is 53:3). Our society is unkind towards those who are of lower social status. Many of us are also harsh towards those with physical, mental or psychological disability. Let us learn to be open to recognize and accept goodness and truth anywhere.

 -Br. Biniush Topno



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30 जुलाई का पवित्र पाठ

30 जुलाई 2020
वर्ष का सत्रहवाँ सामान्य सप्ताह, गुरुवार

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पहला पाठ : यिरमियाह का ग्रन्थ 18:1-6

1) प्रभु की वाणी यिरमियाह को यह कहते हुए सुनाई पड़ी,

2) “उठो और कुम्हार के घर जाओ। वहाँ मैं तुम्हें अपना सन्देश दूँगा“

3) मैं कुम्हार के घर गया, जो चाक पर काम कर रहा था।

4) वह जो बरतन बना रहा था, जब वह उसके हाथ में बिगड़ जाता, तो वह उसकी मिट्टी से अपनी पसंद का दूसरा बरतन बनाता।

5) तब प्रभु की यह वाणी मुझे सुनाई पड़ी,

6) “इस्राएलियो! क्या मैं इस कुम्हार की तरह तुम्हारे साथ व्यवहार नहीं कर सकता?“ यह प्रभु की वाणी हैं। “इस्राएलियों! जैसे कुम्हार के हाथ में मिट्टी है, वैसे ही तुम भी मेरे हाथ में हो।

सुसमाचार : सन्त मत्ती का सुसमाचार 13:47-53

47) ’’फिर, स्वर्ग का राज्य समुद्र में डाले हुए जाल के सदृश है, जो हर तरह की मछलियाँ बटोर लाता है।

48) जाल के भर जाने पर मछुए उसे किनारे खींच लेते हैं। तब वे बैठ कर अच्छी मछलियाँ चुन-चुन कर बरतनों में जमा करते हैं और रद्दी मछलियाँ फेंक देते हैं।

49) संसार के अन्त में ऐसा ही होगा। स्वर्गदूत जा कर धर्मियों में से दुष्टों को अलग करेंगे।

50) और उन्हें आग के कुण्ड में झोंक देंगे। वहाँ वे लोग रोयेंगे और दाँत पीसते रहेंगे।

51) ’’क्या तुम लोग यह सब बातें समझ गये?’’ शिष्यों ने उत्तर दिया, ’’जी हाँ’’।

52) ईसा ने उन से कहा, ’’प्रत्येक शास्त्री, जो स्वर्ग के राज्य के विषय में शिक्षा पा चुका है, उस ग्रहस्थ के सदृश है, जो अपने ख़जाने से नयी और पुरानी चीज़ें निकालता है’’।

53) इन दृष्टान्तों के समाप्त होने पर ईसा वहाँ से चले गये।

📚 मनन-चिंतन - 1

आज, सुसमाचार में येसु अपने समय के मछुआरों के सामान्य अनुभवों को लेकर ईमेश्वर के राज्य के रहस्यों को प्रकट करते हैं। मछुआरों का यह नियमित काम था कि मछलियों को पकड़ने के बाद अच्छी मछलियों को बुरी मछलियों से अलग किया जाए। अच्छी मछलियों को इकट्ठा किया जाता और बुरी मछलियों को फेंक दिया जाता। येसु इस बात की तुलना अंतिम न्याय से करते हैं। हमारे कर्मों के अनुसार हमारा न्याय किया जाएगा। अंतिम निर्णय के दिन तक प्रभु प्रभु इंतज़ार करते हैं। प्रभु चाहते हैं कि हम इस बात से अवगत हों कि अंत में धर्मियों और दुष्टों का क्या होगा। यह हमारे लिए ज़रूरी है कि हम दोनों की नियति को जानकर धर्मी या दुष्ट बनने को चुनें। एक दिन हमारे लिए आवंटित समय अचानक समाप्त हो जाएगा और हमें आंका जाएगा। उस दिन हमारे पास कोई विकल्प नहीं होगा। चुनाव प्रभु का ही है। अच्छे लोगों की संगति उस दिन दुष्टों को नहीं बचाएगी। धर्मियों की भलाई दुष्टों की मदद नहीं करेगी। हम सभी का अपनी व्यक्तिगत पवित्रता के अनुसार न्याय किया जाएगा। क्या हम उस दिन के लिए तैयार हैं? यदि हम एक परीक्षा में असफल होते हैं, तो फिर से प्रयास कर सकते हैं; दुबारा लिख सकते हैं। यदि हम एक मैच में असफल होते हैं, तो हमारे पास दूसरी, तीसरी और चौथी मैचों में संभावनाएं हो सकती हैं। लेकिन मृत्यु पर मानव आत्मा को पता चलता है कि उसका एकमात्र अवसर खत्म हो गया है। मृत्यु का समय भी निश्चित नहीं है। यह कभी भी हो सकता है। इसलिए हमें हर समय तैयार रहने के लिए समझदार बनना चाहिए।


📚 REFLECTION

Today, in the Gospel Jesus takes the ordinary experiences of the fishermen of his time and reveals the mysteries of the Kingdom of God. It was a routine work of fishermen to separate the good fish from the bad fish after the catch. The good fish would be collected and the bad fish would be thrown away. Jesus compares this with what will happen to people at the final judgement. We shall be judged according to our deeds. The Lord is patient until the day of final judgement. The Lord wants us to be aware of what will happen to the righteous and the wicked at the end. It is for us to choose to be righteous or wicked after knowing the destiny of both. One day the time allotted to us will abruptly come to an end and we shall be judged. On that day we shall not have a choice. The choice is of the Lord. Company of good people will not save the wicked on that day. Their goodness will not come to the aid of the wicked. We will all be judged according to our personal sanctity. Are we ready for that day? If you fail in an examination, you may attempt again. If you fail in a match, you may have chances in successive matches. But human soul at death realises that it has been through its one and only chance. The time of death is not fixed. It can happen any time. Hence we need to be wise enough to be prepared at all times.

 -Br. Biniush Topno


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